आज देश यह कैसे जाति-धर्म के टकराव में उलझा दिया गया?

संपादकीय
8 अप्रैल 2018


हिन्दुस्तान एक बार फिर जाति और धर्म के मुद्दों से बुरी तरह घिरा हुआ दिख रहा है। वैसे तो यह सिलसिला हाल के बरसों में बढ़ा और बढ़ते चले गया, लेकिन बिल्कुल आज का माहौल अगर देखें तो बहुत से प्रदेशों में, और कुछ मोर्चों पर पूरे देश में, जाति और धर्म का मुद्दा ऐसा लगने लगा है कि मानो वह लोगों की रोजी-रोटी से भी अधिक मायने रखता है। दलितों के खिलाफ दिख रहे सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से यह सिलसिला एकदम रफ्तार पकड़ चुका है, और अब एक-एक करके पांच ऐसे भाजपा सांसद सामने आ चुके हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह लिखा है कि पिछले चार बरस में दलितों के साथ कैसा अन्याय हुआ है, या आज उनके साथ कैसा सुलूक हो रहा है। दूसरी तरफ कर्नाटक को देखें जहां पर कि चुनाव होने जा रहे हैं, और वहां पर राहुल गांधी ने जाकर जिस तरह से कुछ मठों का दौरा किया, और वहां की कुछ जातियों को हिन्दू धर्म से परे अलग दर्जा देने की घोषणा राहुल की पार्टी की कर्नाटक सरकार ने की, उससे ऐसा लगता है कि भाजपा भी कुछ हड़बड़ाई है, और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल के मुकाबले कुछ अधिक मठों में जाकर मत्था टिकाया है। यह मौका बसपा की नेता मायावती के लिए भी एक नया जीवनदान लेकर आया दिख रहा है जब उसने उत्तरप्रदेश में अपनी ऐतिहासिक दुश्मन पार्टी, सपा के साथ मिलकर भाजपा को हराने का काम किया है, और अब दलित-आदिवासियों के भारत बंद के बाद मायावती ने एक बार फिर दलितों के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है, और देश की सरकार को, भाजपा को चुनौती दी है। 
लोगों को याद होगा कि अभी एक-दो बरस पहले हरियाणा में जाट आंदोलन हुआ, उसके पहले गुजरात में एक बड़ा पटेल आंदोलन हुआ, और अभी गुजरात के नौजवान पटेल नेता हार्दिक अपने बागी तेवरों के साथ मध्यप्रदेश का दौरा कर रहे हैं, और उनके विरोधी उन पर स्याही या कालिख फेंककर उन्हें और बड़ा नेता बना रहे हैं। और फिर मानो आज देश में भड़की हुई दलित भावनाओं पर और चोट करने के लिए, मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार ने एक अभूतपूर्व काम किया है, उसने सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर आंदोलन की घोषणा करने वाले पांच भगवों को मंत्री का दर्जा दिया है। अब हिन्दू समाज के ऐसे आक्रामक तबके को एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में इस किस्म से सिर पर बिठाने के बहुत से सामाजिक असर होंगे, और इसका पहला असर तो यह हुआ है कि एक शंकराचार्य से लेकर बहुत से और साधुओं ने इसका खुला विरोध किया है, और भोपाल में मुख्यमंत्री निवास पर एक भगवा प्रदर्शन भी हो गया है। 
अब देश में चुनाव जीतने के लिए धर्म और जाति के आधार पर जितने किस्म के ध्रुवीकरण जरूरी समझे जा रहे हैं, उससे अलग-अलग तबकों को तो एक-दूसरे के खिलाफ भड़काकर एक किया जा रहा है, लेकिन देश का नक्शा एक से अनेक होते दिख रहा है। नक्शे का मतलब राज्यों की सरहद अलग नहीं हो रही है, यह समाज के भीतर अलग-अलग रंगों का अलग-अलग होना चल रहा है। जो देश आज अपनी खुद की बुनियादी जरूरतों से जूझ रहा है, और जिसके सामने आज के अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में चीन जैसी ताकत के सामने टिकने की जरूरत है, जिसे आज अपनी अर्थव्यवस्था में खरबपतियों के घोटालों को रोकने की जरूरत है, वह देश आज दुनिया की महाशक्ति बनने का सपना तो पाल रहा है, लेकिन धर्म और जाति, आस्था और नफरत के गैरजरूरी मुद्दों को भड़का भी रहा है। यह समझने की जरूरत है कि चीन जैसी बड़ी आक्रामक अर्थव्यवस्था जाति और धर्म ऐसे पाखंडी विवादों से आजाद है। दुनिया में मैन्यूफेक्चरिंग करने वाले वियतनाम जैसे मेहनतकश देशों को देखें तो वे पूरी ताकत से जुटकर दुनिया भर के सामान बनाने में लगे हैं। भारत में देश के लोगों की ताकत को, यहां की नौजवान पीढ़ी को गैरजरूरी मुद्दों में उलझाकर अनुत्पादक बना दिया जा रहा है। चीन या किसी दूसरे देश से तुलना न भी करें, तो भी यह बात समझने की जरूरत है कि भारत अपने पैरों में पाखंड की ऐसी बेडिय़ां डालकर अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में भी कहीं नहीं पहुंच सकता, और खुद अपनी संभावनाओं को छूने के लिए भी नहीं दौड़ सकता। आज भारत की आर्थिक तरक्की के आंकड़े ऐसा लगता है कि बहुत हद तक फर्जी भी हैं। एक के बाद दूसरे बैंक घोटाले से यह भी समझ आ रहा है कि आंकड़ों और हकीकत में एक बड़ा चौड़ा फासला है। फिर एक बात तो अपनी जगह है ही कि देश की पूरी अर्थव्यवस्था के आंकड़े आम जनता की औसत कमाई को आंकड़ों में बताते हैं, जो कि हकीकत नहीं होते। भारत को सामाजिक न्याय स्थापित करना होगा क्योंकि आज अगर समाज के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे को कोसना और गाली देना फिर से शुरू कर रहे हैं, तो यह नफरत जल्द खत्म होने वाली नहीं है।  आज जिस तरह से दलितों के सबसे बड़े आस्था केन्द्र अंबेडकर की प्रतिमाओं को जगह-जगह तोड़ा जा रहा है, जगह-जगह गांधी की प्रतिमा को तोड़ा जा रहा है, दलित संतों की प्रतिमाओं पर कालिख पोती जा रही है, उससे पैदा होने वाले जख्म जल्दी भरने वाले नहीं हैं।
-सुनील कुमार

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