दीवारों पर लिक्खा है, 31 मई

शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी प्राथमिकता बच्चे होना चाहिए

संपादकीय
31 मई 2018


दुनिया के एक प्रमुख और जाने-माने विश्वविद्यालय हार्वर्ड, के एक शोध कार्य का नतीजा है कि बहुत अधिक गर्मी के बीच बच्चों की पढ़ाई पर ऐसा असर पड़ता है कि वे इम्तिहान में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। इस रिसर्च में तापमान और सफलता के बीच पर्याप्त रिश्ता जोडऩे वाला निष्कर्ष पाया गया है। परीक्षा के दिन अगर गर्मियों में हैं, तो जब तक कमरे एयरकंडीशंड न हों, बच्चों के पर्चे अच्छे नहीं बन पाते। अमरीका के पिछले 13 बरस के एक करोड़ बच्चों पर किया गया यह शोधकार्य सुझाता है कि स्कूल की क्लास को ठंडा रखने के लिए एसी इस्तेमाल करना चाहिए। शोधकर्ताओं ने यह पाया है कि गर्मी के बीच बच्चों की एकाग्रता नहीं हो पाती, वे जल्दी विचलित होते हैं, और वे ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते। 
अब अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों से भारत की स्कूलों के हालचाल की कोई तुलना करना कोई अच्छी बात नहीं है, लेकिन फिर भी एक जगह के शोध-निष्कर्षों से दूसरी जगह कुछ सीखा जा सकता है। भारत जैसे गर्म देश में जहां देश का अधिकतर हिस्सा गर्मियों में बहुत गर्म हो जाता है, वहां पर आमतौर पर इम्तिहान गर्मियों में ही होते हैं। और अधिकतर स्कूलों के कमरों में एसी और कूलर की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती, पंखा भी पता नहीं कितने कमरों में होगा। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि अधिकतर गरीब बच्चे भयानक गर्मी में भी पैदल आते-जाते हैं, उनमें से जो संपन्न हैं, वे रिक्शा, ऑटोरिक्शा, या साइकिलों से आते-जाते हैं, और पूरी गर्मी झेलते हैं। जब मौसम जानलेवा होने लगता है तो लू से मौत का खतरा देखकर उस डर में राज्य सरकार या कुछ जिलों के कलेक्टर स्कूलों को कुछ दिनों के लिए बंद करते हैं। लेकिन बोर्ड परीक्षाओं के दिन तो पूरे देश में एक सरीखे रहते हैं, और किसी गर्मी से उनकी तारीखें भी नहीं बदलती हैं। ऐसे में बच्चे सेहत का खतरा उठाकर गर्मियों में स्कूल आते-जाते हैं, और शायद बिना किसी पंखे के भी इम्तिहान देते हैं। 
अभी रोजाना किसी न किसी राज्य या बोर्ड की परीक्षाओं के नतीजे आ रहे हैं। और यह बात भी चल रही है कि क्या पूरे देश के लिए एक ही बोर्ड बनाया जा सकता है जिससे बच्चे एक ही कोर्स को पढ़ें, और एक ही तरह की परीक्षा दें। इस सोच के पक्ष और विपक्ष में बहुत से तर्क हो सकते हैं, लेकिन हम इसके छोटे से पहलू पर आज के मुद्दे के संदर्भ में यह कहना चाहते हैं कि भारत इतना लंबा-चौड़ा देश है कि न तो दिन के एक ही वक्त पूरे देश में परीक्षा लेना ठीक है, और न ही किसी एक मौसम में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक परीक्षा ली जा सकती है। इसके लिए फर्क करने की जरूरत है, और परीक्षाओं को बच्चों की इंसानी जरूरतों से अधिक अहमियत देना बहुत ही नासमझी की बात होगी, और गलत काम भी होगा। 
भारत कोई एक देश नहीं है, यह कई बड़े-बड़े प्रांतों में बंटा हुआ है इतना विशाल इलाका है कि यहां एक टाईमजोन भी गलत है। जब उत्तर-पूर्व को जागकर काम करते कुछ घंटे हो जाते हैं, तब भारत का पश्चिमी इलाका जागता है। यह बात भी लंबे समय से चल रही है कि भारत को एक से अधिक टाईमजोन में बांटा जाए। उसके खिलाफ यह तर्क दिया जाता था कि यहां अनपढ़ आबादी बहुत अधिक है जो कि किसी अलग टाईमजोन वाले प्रदेश में पहुंचकर अपनी घड़ी में वक्त नहीं बदल पाएगी। लेकिन अब तो मोबाइल फोन की वजह से वह दिक्कत भी दूर हो गई है और फोन अपने आप अलग जोन में पहुंचकर अपना समय बदल लेंगे। 
लेकिन जिस मुद्दे से बात शुरू की है, उस मुद्दे पर अगर लौटें, तो इम्तिहानों की सहूलियत अधिक महत्वपूर्ण बात नहीं है, देश के अलग-अलग मौसम में रहने वाले बच्चों की अपनी स्थानीय जरूरतों को अधिक महत्व देना चाहिए। हो सकता है कि देश में कई बोर्ड काम करते रहें, और अगर पूरे देश में एक ही बोर्ड हो, तो भी मौसम के हिसाब से वह अलग-अलग प्रदेशों के लिए अलग-अलग इम्तिहान करवा सकता है। भारत इतना गर्म देश है, और यहां की अधिकतर स्कूलें इतनी बदहाल हैं कि बच्चों को भरी गर्मी में भी कोई राहत नहीं मिल सकती। इसलिए बच्चों की सहूलियत को देखकर पूरे देश के लिए कुछ नर्म पैमाने बनाने की जरूरत है। बच्चों की पढ़ाई कारखानों की तरह नहीं करवाई जानी चाहिए कि वे कितनी भी गर्मी में सामान की तरह शिक्षित बनते रहें। अलग-अलग प्रदेशों में छुट्टियों का वक्त भी अलग होना चाहिए, और परीक्षा का वक्त भी। इसके खिलाफ कई तर्क दिए जा सकते हैं कि आगे के दाखिला-इम्तिहानों का वक्त निकल जाएगा, लेकिन लोगों को, जानकार लोगों को बैठकर इन सबका रास्ता निकालना चाहिए, और इसमें सबसे बड़ी, और अकेली प्राथमिकता बच्चे होना चाहिए, पढ़ाई के लिए भी, और परीक्षाओं के लिए भी।  (Daily Chhattisgarh)

दिल्ली के इस बाईपास से पूरा देश सबक ले सकता है

संपादकीय
30 मई 2018


दिल्ली से मेरठ के लिए देश का सबसे चौड़ा एक्सप्रेस हाईवे अभी पूरा बना नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसके एक हिस्से का उद्घाटन किया है। हो सकता है कि इस उद्घाटन का उत्तरप्रदेश सहित कुछ और जगहों पर हो रहे उपचुनावों से लेना-देना रहा हो, लेकिन उससे परे एक दूसरी दिलचस्प बात भी सामने आई है। इस एक एक्सप्रेस हाईवे की वजह से दिल्ली शहर में घुसने वाली ट्रकों में इतनी कमी आ गई है कि सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि पहले ही दिन पचास हजार ट्रकें कम घुसीं। ये ट्रकें दिल्ली शहर के बाहर से ही मेरठ की तरफ मुड़ गईं, और दिल्ली की भयानक जहरीली हो चुकी प्रदूषित हवा के प्रदूषण स्तर में इससे बड़ी गिरावट दर्ज हुई। 
सड़कों का जो ढांचा पिछले दशकों में देश में बढ़ा है उससे अपार फायदा हुआ है। लोगों का सफर का वक्त घटा, कारखानों से निकलकर बाजार तक पहुंचने वाले सामानों का वक्त कम हुआ, इससे आर्थिक गतिविधि तेज हुई। इसके अलावा जो गाडिय़ां देश के ट्रांसपोर्ट ढांचे का हिस्सा हैं, उन गाडिय़ों का इस्तेमाल तेज हुआ जिससे उनके मालिकों का नफा बढ़ा। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और बातें भी हुईं। गांव-गांव से होकर गुजरने वाली भारी गाडिय़ों को अब बड़े-बड़े फ्लाईओवर और ओवरब्रिज मिल गए, जिससे इन गांवों के इंसानों और जानवरों का मरना भी घटा। और अभी जैसा कि दिल्ली के इस मामले से सामने आया है, प्रदूषण भी घटा। जब रास्ता जाम रहता है, तो खड़े-खड़े धुआं छोडऩे वाली गाडिय़ां पूरे इलाके को प्रदूषित करती हैं। इसलिए सड़कों का ढांचा चाहे वह महानगरों के बीच में हो, चाहे वह गांव-गांव तक बिखरा हुआ हो, वह देश की आर्थिक बेहतरी के लिए एक बड़ा योगदान रहता है, और भारत में पिछले दशकों में इस मोर्चे पर बड़ी कामयाबी हासिल की है। 
चाहे यूपीए सरकार रही हो, या उसके पहले की अटल सरकार, सभी सरकारों ने सड़कों के ढांचे को बढ़ाने के महत्व को समझा, और जैसा कि किसी भी सरकारी निर्माण में होता है, नेता-अफसर-ठेकेदार, सभी की खासी कमाई भी होती है, इसलिए ऐसे बड़े निर्माण कार्य करवाने में सभी की दिलचस्पी रहती है। लेकिन भ्रष्टाचार की संभावना को हम काम न करवाने का तर्क नहीं मानते। अगर भ्रष्टाचार होना तय है तो सारे काम ही रोक दिए जाएं यह बात भी ठीक नहीं है। छत्तीसगढ़ में एक-दो ऐसे वक्त देखे हैं जब हजारों करोड़ के सड़कों के काम को कुछ अफसरों ने इसलिए रोक दिया था कि उनके पीछे भारी भ्रष्टाचार की साजिश का उनको पता लग गया था। भ्रष्टाचार से निपटने के कुछ और तरीके हो सकते हैं, लेकिन सड़कों का जाल जितना बढ़ सके, उतना ही देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। 
इस मुद्दे पर लिखते हुए छत्तीसगढ़ की राजधानी का खास जिक्र जरूरी है। इस शहर के आरपार एक मुर्दा नहर रह गई थी जिससे कोई पानी कहीं आता-जाता नहीं था। और ऐसी बंजर नहर पर पूरी तरह से अवैध झोपड़पट्टियां बस गई थीं। कुछ बरस पहले इस नहर की जगह एक सड़क बनाने की सोची गई, और इससे शहर के आरपार एक इतनी बड़ी और इतनी प्रमुख सड़क बन गई है जो कम से कम दो दर्जन सड़कों को चीरते हुए जाती है, और इसने लोगों की जिंदगी आसान कर दी है। शहरों के बाहर तो रिंग रोड या बाईपास सभी जगह बन जाते हैं, लेकिन यह रायपुर शहर के भीतर इतना बड़ा बाईपास बन गया है जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकते थे। अब शहर के बीच से एक दर्जन सड़कों को क्रास करते हुए जाने वाली छोटी लाईन रेल पटरी की जगह सड़क बन रही है। जिन लोगों को अंदाज नहीं है, उन्हें भी यह दूसरी सड़क चालू हो जाने के बाद समझ आएगा कि किस तरह इस शहर को अगले सौ बरस के लिए मानो लहू दौड़ाने वाली धमनियां मिल गई हैं जिनसे एक नई जिंदगी ही इस शहर के ढांचे को मिल रही है। 
दिल्ली के एक बाईपास का फायदा देखकर देश के बाकी सभी प्रदूषित शहरों को तेजी से यह सोचना चाहिए कि वे बड़ी गाडिय़ों को अपने शहर के भीतर आने देने से कैसा रोकें और कैसे इसके लिए बाहर-बाहर रास्ते बनाएं। इंसानों को बचाने के लिए यही एक जरिया है, और इसी से प्रदूषण घटेगा।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मई

प्रतिभा को सलाम और लोकतंत्र को चुनौती...

संपादकीय
29 मई 2018


हर बड़े इम्तिहान के बाद कोई न कोई ऐसी दिल छू लेने वाली खबर आती है कि जिसे स्कूल-कॉलेज के हर बच्चों के मां-बाप जरूर ही पढ़ते होंगे। आज की खबर है कि गुजरात में दसवीं बोर्ड में एक ऑटो रिक्शा चालक की बेटी ने 98 फीसदी से भी अधिक नंबर पाए हैं। इस मुस्लिम ऑटो ड्राइवर के साथ बेटी की तस्वीर देखने लायक है। एक तो गरीब परिवार, ऊपर से मुस्लिम परिवार जहां कि लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई कुछ पिछड़ी हुई भी रहती है। ऐसे में विपरीत परिस्थितियों में एक बच्ची ऐसी कामयाबी पाती है, तो पूरे देश का सीना खुशी से फूल उठता है। इसी तरह देश की सबसे बड़ी परीक्षाएं जब नौकरियां तय करती हैं, तब भी कहीं मजदूर की बेटी तो कहीं किसी रिक्शेवाले का बेटा आईएएस बनते दिखते हैं। 
इस बात पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि जैसे
वंचित तबकों के बच्चे ऐसी कामयाबी पाते हैं, उन्हें देखकर लगता है कि अगर इन्हें इम्तिहान की तैयारी के बराबरी के अवसर मिलते, तो ये बच्चे जाने कहां पहुंचते। आज देश में हालात यह है कि हर किस्म के मुकाबले में ताकतवर तबका अपने बच्चों को कामयाबी तक पहुंचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देता है। राजस्थान के कोटा में परीक्षा की तैयारी के कारखाने चलते हैं, और एक-एक बरस पर मां-बाप 5-10 लाख रुपए खर्च करते हैं, और बच्चे आईआईटी या ऐसे दूसरे संस्थानों में पहुंचते हैं। दूसरी तरफ जो बच्चे गरीब परिवारों के रहते हैं, उन्हें बिजली भी नसीब नहीं होती, कोई कहीं मुफ्त के इंटरनेट का इस्तेमाल करके केरल के कुली की तरह कामयाब होते हैं, तो कोई बिना किताबें खरीदे किसी और परीक्षा में चुने जाते हैं। इससे एक बात साफ लगती है कि प्रतिभा किसी जाति या सम्पन्नता, शहर या शिक्षित परिवार की मोहताज नहीं होती है। ऐसी प्रतिभा को अगर बराबरी का मौका मिले, थोड़ी सी और अधिक सहूलियतें मिल जाएं, तो देश की तस्वीर बदल सकती है। 
हम इम्तिहानों से अलग हटकर बात करें, तो संसद और विधानसभा के चुनावों से लेकर म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनावों तक पैसों का जो बोलबाला रहता है, उसमें किसी गरीब की जीत की संभावना लगभग शून्य रहती है। ऐसे में अगर बराबरी के हालात पैदा न किए जा सकें, तो उसका मतलब लोकतंत्र की बहुत बुरी नाकामयाबी ही होता है। आज यह बात जगह-जगह साफ होती है कि चुनावी मुकाबले दौलतमंद पार्टियों के दौलतमंद लोगों के बीच होते हैं। इनमें वोटर के पास महज किसी एक दौलत को चुनने की पूरी आजादी रहती है। अब जब संसद और विधानसभाएं करोड़पतियों से भर जाने के बाद अरबपतियों से भर रही हैं, तब लोकतंत्र की शक्ल और उसकी आत्मा दोनों का बदलना तो तय है ही।
स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं से लेकर नौकरियों तक अगर गरीब और वंचित, दबे-कुचले तबकों के लोगों का आना बढ़ेगा नहीं, तो जिस संपन्न तबके के बच्चे महंगी तैयारी के बाद सरकारी नौकरियों तक पहुंचते हैं, उनकी हिंदुस्तानी जमीनी हकीकत की समझ तो बड़ी ही सीमित और कमजोर रहना तय रहता है। हमारा मानना है कि भारत के स्कूल-कॉलेज और यहां की हर किस्म की सरकारी नौकरियों के तमाम मुकाबले ऐसे ही होने चाहिए जिसमें हर बच्चे को तैयारी का बराबरी का हक मिल सके। हो सकता है कि ऐसा करने के लिए कोचिंग कारखानों को बंद भी करना पड़े, या फिर गरीबों के लिए भी बराबरी की कोचिंग शुरू करना पड़े। छत्तीसगढ़ में कुछ जिलों में ऐसा शुरू हुआ भी है। गरीबी के बीच से उठ खड़ी होती हुई प्रतिभा को सलाम, और लोकतंत्र को चुनौती कि वह बराबरी के मौके देकर दिखाए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मई

मोहब्बत जिंदाबाद...

संपादकीय
28 मई 2018


आज एक खबर है कि एक बहुत छोटी हिन्दू बच्ची को खून की जरूरत थी तो एक मुस्लिम नौजवान खून देने पहुंचा। वह रोजे पर था और भूखे पेट खून दिया नहीं जा सकता इसलिए डॉक्टरों ने उसे कुछ खाने कहा। उसने बच्ची की जान बचाने को रोजे से ऊपर माना और कुछ खाकर खून दिया। दो-चार दिन पहले एक और जगह ऐसी ही एक घटना सामने आई थी। उसमें भी एक मुस्लिम नौजवान ने एक हिन्दू जिंदगी बचाने के लिए रोजा तोड़कर खून दिया था। आज ही एक दूसरी खबर है कि पंजाब के एक गांव में एक बहुत पुरानी मस्जिद है और बगल के गुरुद्वारे का ग्रंथी ही मस्जिद की देखरेख करता है। जबकि यह मस्जिद भारत पर हमला करने वाले मुगलों के वक्त की है, और पंजाब के सिखों ने भारत-पाक विभाजन के वक्त बड़े पैमाने पर सिख-मुस्लिम हिंसा देखी हुई है। इसके बावजूद आज भी पंजाब और दूसरी जगहों पर से ऐसी तस्वीरें आती हैं कि कहीं गुरुद्वारों को बारिश के वक्त नमाज के लिए खोल दिया गया तो कहीं पंजाब के सिख समाजसेवी जम्मू के रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी शिविरों में लोगों का ख्याल रख रहे हैं।
आज देश में बड़े-बड़े लोग जिस बड़े पैमाने पर नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि हिन्दुस्तान आज अगर बाकी है तो वह आम लोगों की वजह से, खास लोगों की वजह से नहीं है। खास लोगों के खास मकसद होते हैं, उनकी खास रणनीति होती है, खास मंजिलें होती हैं। लेकिन आम लोग जब तक खास लोगों के झांसे में न आ जाएं, वे इंसान बने रहते हैं। वे न भक्त बनते हैं, न आतंकी बनते हैं, न हिंसक बनते हैं। आज अगर कुछ दिनों के लिए मीडिया और सोशल मीडिया बंद हो जाए, तो आम लोगों के बीच नफरत का फैलना और उनका नफरत की गिरफ्त में आना स्थगित हो जाएगा, और धीरे-धीरे घट जाएगा। आज जाने-माने चेहरे, तरह-तरह के ओहदों पर बैठे हुए लोग, अपनी सारी ताकत लगा रहे हैं कि कहीं कोई हिन्दू इफ्तार की दावत न कर ले, कहीं कोई मुस्लिम महिला अपने बुर्के के साथ चलती हुई अपने बच्चे को फैंसी ड्रेस में कृष्ण न बना ले, कहीं ईसाई और हिन्दू मिलकर साथ न रह लें, और तो और जिन दलितों को हिन्दू धर्म के भीतर गिनकर हिन्दुओं की आबादी को अधिक बताया जाता है, उन दलितों को भी ऊंची कही और समझी जाने वाली हिन्दू जातियों के हाथों मारने का इंतजाम करवाया जाता है, उसे बचाया जाता है, उसे बढ़ाया जाता है। 
लेकिन हम बार-बार गली-मोहल्लों में ऐसी मिसालें देखते हैं कि लोग किस तरह एक-दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं, कहीं कोई मुस्लिम नौजवान गणेशोत्सव समिति का अध्यक्ष रहता है, और रोज प्रसाद का इंतजाम करता है, रोज आरती करता है, और घर-घर घूमकर पंडाल सजाने के लिए सामान भी मांगता है। बंगाल अगर देखें, तो वहां दुर्गा पूजा में अनगिनत मुस्लिम जुड़े रहते हैं, और शायद ही किसी के दिल-दिमाग में धर्म का भेदभाव आड़े आता हो। ऐसे में आज मीडिया और सोशल मीडिया इन दोनों में जो भी जिम्मेदार लोग बचे हैं, उनकी यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वे सकारात्मक खबरों को भी नफरत के बीच सांस लेने की थोड़ी सी जगह दे दें। सकारात्मक खबरें कम लुभावनी होती हैं, कम आकर्षक होती हैं, और लोगों का ध्यान कम खींचती हैं। यह बात जाहिर है कि मोहब्बत लोगों को उस रफ्तार से नहीं जोड़ पाती जिस रफ्तार से नफरत जोड़ लेती है। किसी नेक काम के लिए श्रमदान करने कहा जाए, तो कुआं खोदने के लिए सौ लोग मुश्किल से जुटें, लेकिन अगर किसी दूसरे धर्म या जाति के खिलाफ, या फिर अपने खुद के धर्म, और अपनी जाति से जुड़ी हुई किसी फिल्म के खिलाफ भीड़ जुटनी हो, तो लोग अपना घर-बार बंद करके भी उस नफरती हिंसा में एकजुट हो जाते हैं। आज लोगों को मीडिया और सोशल मीडिया, दोनों जगह यह अहसास कराने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी समाज में अधिकतर लोग ऐसे हैं जो हर किसी का लहू एक बराबर मानते हैं, और एक-दूसरे को देने को तैयार खड़े रहते हैं, न कि लेने को। यह भी समझने की जरूरत है कि समाज में नफरत और हिंसा जितना दिखते हैं, उतना रहते नहीं हैं। इसलिए अमन-पसंद लोगों को इस बात को खुलकर कहना भी चाहिए कि नफरत की तमाम कोशिशों के बीच भी इंसानी मोहब्बत जिंदा रहेगी।  (Daily Chhattisgarh)

औरत पर लादी गई ऊंची एड़ी

28 मई 2018

इस पखवाड़े फ्रांस के, और दुनिया के सबसे बड़े फिल्म समारोह, कान, में एक बात तस्वीरों और खबरों में आई और चली गई। एक अमरीकी अभिनेत्री जिसकी एक फिल्म वहां दिखाई जानी थी उसने वहां ग्लैमर के लिए मशहूर रेड कार्पेट पर ऊंची एड़ी के अपने सैन्डल उतार दिए, और वहां से आगे वह नंगे पैर गई, और उसी तरह बैठकर उसने समारोह में हिस्सा लिया। उसने इस समारोह की इस नीति, और इस नियम का विरोध करने के लिए ऐसा किया कि इस रेड कार्पेट पर जो भी महिलाएं आएं, उन्हें ऊंची एड़ी के सैन्डल पहनना ही होगा। लोगों को यह अच्छी तरह याद होगा कि भारतीय फिल्म अभिनेत्री और विश्व सुंदरी रही हुई ऐश्वर्या राय एक कॉस्मेटिक कंपनी का प्रचार करते हुए हर बरस इस समारोह में चकाचौंध कपड़े पहनकर रेड कार्पेट पर आती हैं, और कैमरों पर छा जाती हैं। फैशन और ग्लैमर की दुनिया में यह बात बहुत बड़ी खबर रहती है कि कौन सी फिल्म अभिनेत्री या मॉडल किस डिजाईनर के बनाए हुए कपड़े पहनकर इस लाल कालीन पर चलती हैं।
कान फिल्म समारोह की महिलाओं की पोशाक पर लगाई गई बंदिशों का विरोध दो-तीन बरस पहले भी हुआ था जब बहुत सी अभिनेत्रियों ने इसका विरोध किया था, और ऐसी पचास महिलाओं को वहां रोक दिया गया था। इसके बाद एक अभियान चला था जिसमें ऐसी प्रमुख महिलाओं ने उन जूतों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट की थीं जिनमें वे सबसे अधिक आराम महसूस करती हैं। महिलाओं की पोशाक पर यह बंदिश उस समारोह में है जो कि बुनियादी तौर पर फिल्म कला का एक जलसा है, और जहां दुनिया के सबसे नामी-गिरामी फिल्मकार अपनी फिल्मों के साथ पहुंचते हैं। इसके साथ में ग्लैमर के लिए पोशाक का ऐसा कायदा बनाना एक निहायत ही बेहूदी बात है।
लेकिन महिलाओं की पोशाक को लेकर समाज से लेकर बाजार तक बंदिशों को बढ़ावा इसलिए दिया जाता है कि महिलाओं को खरीददारी और तैयार होने की बंदिशों में बांधकर रखा जाता, और उसे खुली सोच से आगे बढऩे से बिना कहे ही रोक दिया जाए, और एक निहायत ही फिजूल के ग्लैमर में उलझाकर रख दिया जाए। ऐसा करने में बाजार की तो कमाई की एक बहुत जाहिर सी बदनीयत है ही, हजारों बरस से मर्दों की चली आ रही वह बदनीयत भी इसके पीछे है जिसे औरत को आगे बढऩे से रोकने के लिए उसे साज-सज्जा और कपड़ों में उलझाने की साजिश चली आ रही है।
एक अंतरराष्ट्रीय समारोह में नामी-गिरामी और मशहूर औरतों का ऐसा प्रतीकात्मक विरोध तो ठीक है, लेकिन क्या इससे बाजार को कोई फर्क पड़ेगा? कई लोगों का यह मानना है कि जब से भारत फैशन और कॉस्मेटिक का एक बड़ा बाजार बना, यहां के लोगों की खरीदी की ताकत बढ़ी, तब से भारत की सुंदरियां विश्व सुंदरी के खिताब जीतने लगीं। इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो ऐसी प्रतियोगिताओं के आयोजक जानें, लेकिन हिन्दुस्तान में अभी कल कोबरापोस्ट नाम के एक भांडाफोड़ समाचार पोर्टल ने भारत में सौंदर्य स्पर्धा करवाने वाली एक प्रकाशन कंपनी के मुखिया का जैसा स्टिंग ऑपरेशन किया है, उससे यह उजागर हुआ है कि भारत सुंदरी बनने के लिए जिन सवालों को पूछा जाता है, उनमें हिंदुत्व के सवालों को भरा जा सकता है, भुगतान करके। कोबरापोस्ट का यह भांडाफोड़ एक अलग और बड़ा मुद्दा है, लेकिन यह बात जगजाहिर है कि जिन मुकाबलों से कारोबार का नफा-नुकसान जुड़ा होता है, वहां पर  फैसलों को खरीदने के काम में कंपनियां तो लगी रहती हैं, अब फैसले बिकते हैं या नहीं, इस बारे में कुछ कहना मुमकिन नहीं है, और ठीक भी नहीं है।
लेकिन आज की बुनियादी बात पर अगर लौटें तो एक औरत को उसके बदन के भीतर ही कैद कर लेने की मर्द की साजिश किस्म-किस्म से चलती है। और फिर इस देह को इतनी खूबसूरत देह बनाने की कोशिश होती है कि वह जेल न लगे, जन्नत लगे। बाजार की साजिश भी इसमें हिस्सेदार रहती है जो कि किसी लड़की या औरत के मन को स्थायी रूप से अपने बारे में हीनभावना में डाले रखती है। अपने रंग को लेकर, अपने कद को लेकर, अपने बालों को लेकर, बदन के आकार को लेकर बाजार आम लड़कियों और महिलाओं के सामने कुछ खास चुनिंदा मिसालों को खरीदकर इस तरह पेश करता है कि हर आम लड़की या महिला अपनी पूरी जिंदगी उन मिसालों की तरह बनने के फेर में हीनभावना से गुजरती रहें, और बाजार की ग्राहक बनी रहें।
लोगों को याद होगा कि दुनिया की, खासकर संपन्न दुनिया की, अधिकतर लड़कियों के बीच बार्बी नाम की जो गुडिय़ा लोकप्रिय है, उसकी कद-काठी इस असंभव किस्म की बनाई गई है कि किसी आम लड़की के लिए वैसा बन पाना तकरीबन नामुमकिन रहता है, अगर वह सारे ही वक्त कसरत और मेकअप से, और हो सकता है कि सर्जरी से भी अपने आपको बार्बी की तरह ढालने में न लगी रहे। एक लड़की या औरत का ऐसा अनुत्पादक संघर्ष बाजार के लिए बड़ा ही उत्पादक होता है, और इस बाजार के लिए लड़कियों और महिलाओं में हीनभावना एक बड़ा ही उपजाऊ खेत होता है। इसलिए असल जिंदगी के खेत को जोत-जोतकर फैशन और सौंदर्य का बाजार हीनभावना की फसल को बढ़ावा देने में लगे रहता है।
औरतें अपनी देह का रख-रखाव कैसा करें, इसे ग्लैमर की दुनिया के गढ़े गए नकली और असंभव पैमाने सुझाते हैं, और तय करते हैं। नतीजा यह निकलता है कि दुनिया की चुनिंदा अभिनेत्रियों, गायिकाओं, और मॉडलों को देख-देखकर बाकी दुनिया की लड़कियां और औरतें अपने आपको उन्हीं पैमानों पर ऊपर ले जाने की लड़ाई में अपनी जिंदगी गंवा बैठती हैं। इस संघर्ष में असल जिंदगी की क्षमता, संभावना, कल्पनाशीलता, रचनाशीलता, ये तमाम बातें धरी रह जाती हैं, और चुनिंदा औरतों को बाजार साल भर ऐसे समारोहों के लिए तैयार करने में लग जाता है जहां उनकी एक झलक कई ब्रांडों का बाजार बढ़ाने का काम आसानी से कर जाती हैं।
ऐसे बाजारू जलसों में औरतों के ऊंची एड़ी पहनने की बंदिश के खिलाफ जो पहल हुई है, वह दुनिया में कोई क्रांति नहीं लाने वाली है, लेकिन वह लड़कियों के बीच अपने कद को लेकर हीनभावना को घटाने का काम कर सकती है। यह बात जगजाहिर है और सहज-समझ की है कि ऊंची एड़ी का मतलब औरत का कोई काम न करना, या क्षमता से कम करना भी होता है। वह आराम से आदमियों की तरह के जूते-चप्पल में रह सके, तो वह अधिक सेहतमंद भी रह सकेगी, और अधिक उत्पादक भी हो सकेगी। लेकिन उसे जिस तरह के दिखावे में झोंक दिया जाता है, उसके विरोध को ठीक से समझने की जरूरत है, और दुनिया की लड़कियों और औरतों को उन पर लादे गए खूबसूरती के पैमानों को उतार फेंकने की भी जरूरत है।
इसके लिए यह भी जरूरी है कि लड़कियां और महिलाएं अपने रूप-रंग, और अपनी कद-काठी को लेकर बेचैनी और हीनभावना में रहना बंद करें, और एक आत्मविश्वास के साथ जिएं, और आगे बढ़ें, और यह आगे बढऩा ऊंची एड़ी के सैन्डलों में तो हो नहीं सकता। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मई

आयरलैंड के जनमतसंग्रह से नफरतजीवी कुछ सीखें

संपादकीय
27 मई 2018


योरप में आयरलैंड को एक धर्मालु देश माना जाता है। वहां के लोगों में ईसाई कैथोलिक धर्म को मानने वाले लोगों की बहुतायत है। और 78 फीसदी से ज्यादा कैथोलिक लोग हैं, बाकी लोगों में भी गैरकैथोलिक ईसाई काफी हैं, लेकिन तकरीबन 10 फीसदी लोग बिना धर्म वाले भी हैं। ऐसे देश में गर्भपात एक बहुत बड़ा मुद्दा है क्योंकि धर्म गर्भपात के खिलाफ रहता है, और दशकों से आयरलैंड में इस मुद्दे पर बहस चल रही थी, लेकिन कोई सरकार इस पर से रोक हटा नहीं पाई थी। अभी छह बरस पहले वहां पर भारतीय मूल की एक महिला सविता हलप्पनवार का अनायास ही गर्भपात हुआ, लेकिन डॉक्टरों ने मेडिकल तरीके से भ्रूण को निकालने से मना कर दिया क्योंकि भ्रूण तब तक गर्भ के भीतर भी जिंदा था। नतीजा यह हुआ कि मेडिकल-गर्भपात के बिना इस महिला की ही मौत हो गई। तब से वहां पर वे महिलाएं और वे लोग बड़ा आंदोलन कर रहे थे, और कल इस मुद्दे पर देश में जनमत संग्रह हुआ। 
यह महज आयरलैंड में ही नहीं, अमरीका में भी हर चुनाव में एक बड़ा मुद्दा रहता है, और राष्ट्रपति पद के हर प्रत्याशी से, या राज्य के गवर्नर के उम्मीदवार से भी यह उम्मीद की जाती है कि वे गर्भपात के हक पर अपने विचार साफ करें। अमरीका की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के बीच भी इस मुद्दे पर साफ असहमति रहती है। और जाहिर है कि अमरीका भी ईसाई बहुतायत वाला देश है और वहां मतदाताओं के बहुमत की धार्मिक सोच चुनाव में मायने तो रखती ही है। ऐसे में आयरलैंड में इस मुद्दे पर कल के जनमतसंग्रह में 66 फीसदी से अधिक लोगों ने महिलाओं को गर्भपात का हक देने के लिए वोट दिया। इससे आधे से कम ही लोग गर्भपात पर रोक की जिद पर अड़े रहने वाले थे। 
भारत एक भारी धार्मिक देश है, यहां पर नास्तिक लोगों की गिनती बहुत कम है, लेकिन हिन्दू धर्म के भीतर गर्भपात कोई मुद्दा ही नहीं है। बल्कि यह पूरी तरह से अहिंसक जैन धर्म में भी कोई मुद्दा नहीं है, इसके खिलाफ वहां कोई फतवा या आंदोलन नहीं है। इसी तरह इस देश के दूसरे धर्मों में भी गर्भपात के खिलाफ कुछ नहीं है, और ईसाई धर्म अपनी बुनियादी सोच और परंपरा के मुताबिक इसके खिलाफ है। लेकिन भारत में कभी ऐसी कोई आवाज भी नहीं उठी कि गर्भपात पर रोक लगाई जाए। बल्कि भारत सरकार और राज्य सरकारों के अस्पतालों में मुफ्त गर्भपात की सहूलियत है। ऐसे में यह सोचना थोड़ा मुश्किल होता है कि पश्चिम का कोई बहुत ही विकसित देश अपनी धार्मिक परंपरा के चलते अपनी महिलाओं को ऐसा हक नहीं देता था। लेकिन आज यहां इस मुद्दे पर लिखने की एक दूसरी वजह है। 
आयरलैंड में भारत से गई हुई एक भारतवंशी महिला की इस तरह की मौत से विचलित होकर वहां के समाज ने गर्भपात के फैसले को महिला का हक साबित करने और उसका कानून बनवाने के लिए ऐसा आंदोलन चलाया कि जनमतसंग्रह करवाना पड़ा, और अब शायद वहां कानून में फेरबदल भी हो जाएगा। इस मामले को बारीकी से देखें तो दूसरे धर्म, दूसरी नस्ल, दूसरे रंग, दूसरे देश से आई हुई महिला वहां पर इतना बड़ा मुद्दा बनी। क्या हिन्दुस्तान में दूसरे देशों से आए हुए लोग, उनका हक, ऐसा मुद्दा बन सकते हैं? क्या यहां पर शरण लेने वाले लोगों के हक को लेकर स्थानीय लोगों में ऐसी संवेदनशीलता आ सकती है? क्या इस देश के भीतर भी कश्मीर या उत्तर-पूर्व जैसे सरहदी प्रांतों से बाकी हिस्से में आने वाले लोगों के लिए इस बाकी हिस्से के लोगों  में संवेदनशीलता आ सकती है? यह याद रखने की जरूरत है कि किस तरह दिल्ली और बेंगलुरू जैसे महानगरों में भी उत्तर-पूर्व और कश्मीर से आए हुए लोगों के साथ हिंसा होती है। जयपुर जैसी राज्य की राजधानी से कश्मीरियों को हॉस्टल से मारकर भगाया जाता है। यह देश अपने ही कई इलाकों के लोगों को बराबरी का इंसान नहीं मानता। ऐसे में ऐसे अलगाव और ऐसी नफरत-हिकारत के साथ आयरलैंड की इस हमदर्दी को रखकर तुलना करने की जरूरत है, सोचने और समझने की जरूरत है। 
इसी सिलसिले में दो दिन पहले भाजपा सांसद आलोक कटियार के उस बयान को देखने की जरूरत है जो उन्होंने फिल्म अभिनेत्री और यूनिसेफ की राजदूत, प्रियंका चोपड़ा के बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में जाने के बाद दिया है। प्रियंका वहां पर यूनिसेफ की सद्भावना-राजदूत की हैसियत से गई थीं, और ऐसे प्रचार से यूनिसेफ को दुनिया भर में ऐसी मानवीय त्रासदी की तरफ लोगों का ध्यान खींचने में मदद मिलती है। और ऐसी मदद से ही आर्थिक मदद भी जुटती है। प्रियंका के इस शरणार्थी शिविर जाने को लेकर इस भाजपा सांसद ने कहा कि जिन लोगों को रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों से हमदर्दी है, उनको हिन्दुस्तान में रहने का हक नहीं दिया जाना चाहिए। 
किसी धर्म का सम्मान और अपमान उस धर्म को मानने वाले लोगों की कथनी और करनी से होता है। आलोक कटियार सरीखे नफरतजीवी और हिंसक-फतवेबाज लोग दुनिया भर में हिन्दुस्तान के हिन्दुओं की साख पर कालिख पोतने के अलावा कुछ नहीं करते। ऐसे लोगों को आयरलैंड से कुछ सीखना चाहिए जहां एक पूरे का पूरा जनमतसंग्रह एक भारतवंशी के हक की बात से शुरू हुआ, और आज इस नतीजे पर पहुंचा। (Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मई

बिजली कंपनी की दिखाई राह पूरे देश में सोचने की जरूरत

संपादकीय
26 मई 2018


दिल्ली में एक निजी कंपनी बिजली सप्लाई करती है। उसने ग्राहकों के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि वे अपने पुराने एसी देकर नए एसी आधे दाम पर ले सकते हैं। पहली नजर में खबर अटपटी लगती है, लेकिन है सही। ऐसा लगता है कि बिजली बेचने वाली कंपनी की दिलचस्पी अधिक बिजली बेचने में होनी चाहिए जो कि पुराने एयरकंडीशनरों के चलते हुए अधिक आसान है। नए एयरकंडीशनर ऊंची ग्रीन-रेटिंग वाले आते हैं, जो कि बिजली कम खाते हैं। वे महंगे जरूर रहते हैं, लेकिन कुछ बरसों में अपना दाम चुका देते हैं। ऐसे में अगर एसी बनाने वाली कंपनियों के साथ मिलकर बिजली सप्लाई कंपनी ग्राहकों को कम खपत वाले उपकरणों की तरफ ले जाने की कोशिश कर रही है तो यह एक दिलचस्प बात है। कुछ राज्यों की सरकारें पहले भी ऐसा करते आई हैं कि वे बल्ब, ट्यूबलाईट, और पंखे कम दामों पर ग्राहकों को देकर पुराने अधिक खपत वाले सामान हटवा रही हैं। 
अब बाजार और सरकार, इन दोनों को मिलकर भी ऐसी पहल करनी चाहिए कि लोग अधिक खपत के बल्ब-पंखे, फ्रिज-एसी बदलने की सोच सकें। इससे दो किस्म के फायदे हो सकते हैं। पहला फायदा तो देश की अर्थव्यवस्था को हो सकता है कि कंपनियों को सामान बनाने का एक नया मौका मिलेगा, और बाजार को बढ़ावा मिलेगा। दूसरा फायदा इससे बिजली ग्राहकों को होगा जो कि कम खपत के सामान पाएंगे, बिजली बिल बचाएंगे। और तीसरा फायदा देश का और धरती का होगा कि इससे बिजलीघरों पर बोझ घटेगा, या जहां अंधेरा छाया है वहां के लिए बिजली बच सकेगी, और कोयले का प्रदूषण भी बच सकेगा। बिजली की खपत घटने के साथ ही देश में कार्बन उत्सर्जन घटता है, और उससे पूरी धरती का फायदा होता है। 
आज जब लोगों को नए उपकरण खरीदना भारी पड़ता है, तब सरकार और बाजार को दखल देकर ऐसा अनुदान या ऐसी रियायत या ऐसा कर्ज देना चाहिए जिससे ग्राहकों का उत्साह बढ़े। संपन्न तबके के बहुत से लोग फैशन के तहत भी नए-नए सामान ले लेते हैं, और इस बहाने भी उनके घर के एसी या फ्रिज बदल जाते हैं, और बिजली की खपत कम से कम उन कुछ उपकरणों पर तो घटती ही है। इसे बड़े पैमाने पर फैलाने की जरूरत है क्योंकि भारत की अधिकतर आबादी आज ऐसी आर्थिक स्थिति में नहीं है कि वह अपने पुराने उपकरण बदलने का खर्च कर सके, बल्कि हकीकत तो यह है कि लोग अभी तक बाजार में पुराने उपकरणों को खरीदते घूमते रहते हैं। जिस तरह प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक ने दखल देकर भारत के बड़े शहरों से पुरानी गाडिय़ों को हटाने का एक रास्ता दिल्ली की मिसाल से बनाया है, और जिसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे शहर में भी लागू किया जा रहा है, उसी तरह बिजली की खपत को कम करने का काम भी हो सकता है। 
दरअसल भारत में पुराने उपकरणों की मरम्मत करने वाले लोग बहुत हैं, और यहां की जुगाड़-तकनीक पूरी दुनिया में मशहूर है कि किस तरह एक मैकेनिक सामान जुटा-जुटाकर किसी भी मशीन या उपकरण की जिंदगी बहुत लंबी खींच देते हैं। ऐसे में लोग नए सामानों की तरफ बढऩे का नहीं सोचते जो कि कम बिजली खाते हैं, या कम ईंधन खाते हैं। ऐसे में धरती को बचाने के लिए, प्रदूषण से लोगों को बचाने के लिए कम खपत की ओर बढऩा जरूरी है। आज लोगों ने अपनी जो जरूरतें बना ली हैं, वे जरूरतें तो किसी गांधीवादी अंदाज में कम हो नहीं सकतीं। यही हो सकता है कि उन जरूरतों पर बिजली-ईंधन का खर्च कम हो, और नई टेक्नालॉजी ने यह मुमकिन भी कर दिया है। 
दिल्ली में बिजली कंपनी की यह पहल अच्छी है, और इसे सरकार को बड़े पैमाने पर ले जाना चाहिए, इससे देश में छाई हुई आर्थिक मंदी भी कुछ हद तक दूर हो सकती है, और सरकार नई तकनीक से बने सामानों पर या तो कुछ टैक्स-रियायत दे सकती है, या फिर ब्याज में छूट दे सकती है, ताकि ग्राहकों से लेकर देश और धरती तक सबका दीर्घकालीन भला हो सके। इसे एक पर्यावरणशास्त्री, एक अर्थशास्त्री, और एक गृहिणी, इन सबके नजरिए से देखने की जरूरत है, और यह सबके भले का एक काम हो सकता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मई

...सार्वजनिक चुनौतियों का सिलसिला एक अच्छी बात

संपादकीय
25 मई 2018


सार्वजनिक जीवन में किसी बात की शुरूआत चाहे किसी एक सीमित मकसद से हो, लेकिन वह आगे बढ़ती है तो फिर नए-नए मकसद तलाश लेती है। अब जैसे चार दिन पहले केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री और ओलंपिक विजेता राज्यवर्धन राठौर ने सोशल मीडिया पर अपने एक फिटनेस वीडियो के साथ एक चुनौती डाली, और दूसरे लोगों से कहा कि वे भी अपने वीडियो पोस्ट करें। उन्होंने जिन लोगों को यह चुनौती दी थी, उनमें से एक विराट कोहली ने अपनी फिटनेस-तस्वीरें डालकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना वीडियो पोस्ट करने कहा है। दुनिया में जगह-जगह समय-समय पर ऐसा होता है और लोगों को याद होगा कि समाजसेवा के लिए पैसे जुटाने को पश्चिम के देशों में एक वक्त आईस-बकेट चैलेंज भी चला था जिसमें दान जुटाने के लिए लोग दूसरों पर बर्फ और पानी की बाल्टी पलटते थे, और दूसरों को इसकी चुनौती भी देते थे। इस तरह से जुटा हुआ दान समाज के काम आता था। अब राज्यवर्धन राठौर से होते हुए विराट कोहली के बाद अब यह नरेन्द्र मोदी तक पहुंच आया। 
लेकिन राहुल गांधी ने इसके मजे लेते हुए नरेन्द्र मोदी के लिए पोस्ट किया है कि वे उन्हें पेट्रोल-डीजल सस्ता करने की चुनौती देते हैं। अब अगर सोचा जाए तो ऐसी चुनौती हर सार्वजनिक व्यक्ति को दी जा सकती है जिससे उनकी कोई कमजोरी या मजबूरी उजागर होने लगे। कल के दिन हो सकता है कोई राहुल गांधी को यह चुनौती दे कि वे अपने कुनबे से परे किसी को अध्यक्ष बनाकर दिखाएं। कोई और किसी दूसरे नेता को गाडिय़ों का काफिला छोटा करने की चुनौती दे सकते हैं, कोई यह चुनौती दे सकते हैं कि लोग अपने सरकारी बंगलों में लगे हुए एयरकंडीशनों की गिनती घटाएं। अरबपति सांसदों को लोग चुनौती दे सकते हैं कि वे संसद से मिलने वाले वेतन और भत्ते छोड़ें। जिसको जरूरत न हो, वे सरकारी खजाने पर बोझ न बनें। अब जैसे छत्तीसगढ़ में ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव की अपने राजघराने की दौलत सैकड़ों करोड़ रूपए उन्हीं की घोषित की हुई है। ऐसे में उन्हें कोई भी सरकारी सहूलियत क्यों लेना चाहिए? तो हो सकता है कल के दिन सोशल मीडिया पर देश के ऐसे संपन्न सांसद-विधायकों के बारे में ऐसा कोई अभियान छिड़ जाए। 
लोकतंत्र में शिष्टाचार की सीमा में ऐसे कई अभियान छिडऩे भी चाहिए। जो नेता अंग्रेजी भाषा के खिलाफ हैं, उनसे पूछना चाहिए कि उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल-कॉलेज में तो नहीं जाते? जो जनता के पैसों पर इलाज कराते हैं, उनके लिए सवालों का अभियान छिडऩा चाहिए कि वे सरकारी अस्पताल के बजाय निजी अस्पताल क्यों जाते हैं? यह सार्वजनिक जीवन में एक नए किस्म की जवाबदेही का सिलसिला है। विराट कोहली की चुनौती के जवाब में मोदी ने जब यह लिखा कि वे जल्द ही अपना फिटनेस-वीडियो पोस्ट करेंगे, तो लोगों ने मजा लेते हुए यह लिखा कि लोगों को अपनी डिग्री के साथ अपनी फोटो पोस्ट करना चाहिए, और दूसरों से भी ऐसी मांग करनी चाहिए, और उससे शायद नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी जैसे लोगों का डिग्री का विवाद खत्म भी हो जाएगा। 
फिटनेस की चुनौती तो इसलिए भी ठीक है कि लोग अपने आसपास के लोगों को देखकर भी अपनी सेहत का ख्याल रखना शुरू करते हैं। एक के देखादेखी दूसरे भी सैर पर निकलते हैं, कसरत करते हैं। आसपास के लोगों से महज बुरी आदतें नहीं सीखी जातीं, कई अच्छी बातें भी सीखी जाती हैं। इसलिए फिटनेस की चुनौती का यह सिलसिला तो अच्छा है, लेकिन इसका विस्तार बाकी दायरों तक भी होना चाहिए। आज ही किसी ने सोशल मीडिया पर मोदी की एक ट्वीट दुबारा पोस्ट की है जिसमेें उन्होंने अमरीका की एक स्कूल में गोलीबारी में हुई मौतों पर अफसोस जाहिर किया था। उन्हें चुनौती दी गई है कि वे तमिलनाडू में दो दिन पहले पुलिस गोली से मारे गए दर्जन भर से अधिक कारखाना-विरोधियों के लिए भी हमदर्दी की ट्वीट करें। अब सोशल मीडिया की वजह से लोगों की सार्वजनिक जवाबदेही पहले के मुकाबले अधिक है, और यह बढ़ती चली जानी चाहिए। ऐसा होने पर लोगों की चुप्पी भी सिर चढ़कर बोलने लगेगी।

25 मई दीवारों पर लिक्खा है


कर्नाटक का शपथग्रहण सत्ता का नहीं, विपक्ष का शपथग्रहण लग रहा था...

संपादकीय
24 मई 2018


कल कर्नाटक में कांगे्रस-जेडीएस गठबंधन सरकार के शपथग्रहण को देखें तो ऐसा लगता है कि मानो यह नई सत्ता का शपथग्रहण नहीं हो रहा है, नए विपक्ष का शपथग्रहण हो रहा है। जगह तो बेंगलुरू थी, लेकिन नजारा देश की राजधानी जैसा था। दर्जनभर विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने जिस तरह हाथ मिलाया, और जिस अंदाज में एक-दूसरे से शायद पहली बार ही इस तरह बात की, वह भारतीय चुनावी राजनीति में एक नया मोड़ है। हमने दो-चार दिन पहले ही इसी जगह पर लिखा था कि कर्नाटक में गैरभाजपाई एकता भाजपा और एनडीए के लिए महज एक राज्य का नुकसान नहीं है। जिस तरह बिल्ली किसी घर से दूध पीकर चली जाती है, तो वह नुकसान महज दूध का नहीं होता है, वह बिल्ली के घर देख लेने का अधिक बड़ा नुकसान होता है। कर्नाटक में भाजपा ने अपनी गलती या अपने गलत काम से बाकी विपक्ष को उसकी ताकत के एहसास का एक अभूतपूर्व मौका दिया है और यह मौका एक दूसरे मौके पर भी सामने आया है, मोदी सरकार के चार बरस पूरे होने के मौके पर। 
और फिर मानो भाजपा-विरोधी पार्टियों को खुदकर अपनी इस अभूतपूर्व लेकिन हमेशा से छिपी हुई ताकत का एहसास न रहा हो, मीडिया ने चुनावी नतीजों के आंकड़ों से यह विश्लेषण करके सामने रख दिया कि किस तरह ये विपक्षी पार्टियां अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग गठबंधन करके भी दर्जन भर राज्यों की सैकड़ों लोकसभा सीटों पर नतीजे बदल सकती हैं। ऐसे किसी एक विश्लेषण में तो शायद लोकसभा में बहुमत के लिए जरूरी गिनती से भी सौ-पचास अधिक सीटें शिनाख्त करके बताई गई हैं। कल कर्नाटक में जिस उत्साह के साथ एक ही मंच पर ममता और वामपंथी थे, अखिलेश यादव और मायावती थे, कांगे्रस और लालू के बेटे थे, खुद सोनिया और राहुल थे, और वे जिस तरह के उत्साह में थे, उससे ऐसा लग रहा था कि कहानियों में कोई सोया हुआ विशाल मानव जागकर करवट बदल रहा हो।
कई बार किसी छोटे मौके का बेजा इस्तेमाल भी जरूरत से अधिक बड़ा नुकसान दे जाता है। भाजपा के साथ कर्नाटक में यही हुआ है। यह बात सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट के भीतर तक हर जगह अच्छी तरह स्थापित हो गई कि एक पुराने भाजपाई राज्यपाल ने अपने अधिकारों का खुला बेजा इस्तेमाल करते हुए एक नाजायज न्यौता भाजपा को सरकार बनाने के लिए दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार के वकील को फटकार लगाने के साथ राज्यपाल के शक्तिपरीक्षण के वक्त को भी बदल दिया, और एक संवैधानिक बेईमानी खारिज कर दी। इससे एक लोकतांत्रिक बेइंसाफी तो टली ही, लेकिन उसके साथ-साथ गैरभाजपा, गैरएनडीए पार्टियां एक नए उत्साह में भी आग गईं। आज देश के आम चुनाव के साल भर पहले, और कई राज्यों के आमसभा चुनावों के बस कुछ ही महीने पहले कांगे्रस सहित देश की दर्जन भर पार्टियों को एका करने का एक ऐसा मौका कर्नाटक ने दे दिया है। लोगों को याद होगा कि आपातकाल के दौरान जब कांगे्रस ने तमाम विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया था, तो जेल में कृष्ण के जन्म की तरह जनता पार्टी का जन्म हुआ था, और इस नवजात ने पहली बार नेहरू की बेटी को हरा दिया था। सामान्य जीवन की एक सहज समझदारी यह कहती है कि बिना वजह लोगों को घेरकर मारते हुए किसी कोने में इस तरह नहीं लाना चाहिए कि वे एक होकर पलटवार करें। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मई

राष्ट्रपति की सादगी कुछ और आगे तक बढऩी चाहिए ताकि..

संपादकीय
23 मई 2018


राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पिछले कई मौकों पर अपनी सज्जनता दिखाई है जिससे देश के बाकी नेताओं को, और नौकरशाहों को, और शायद जजों को भी कुछ नसीहत लेने की जरूरत है। अभी उनके शिमला प्रवास के दौरान स्थानीय प्रशासन ने स्कूलों की आधे दिन की छुट्टी कर दी थी, और सड़कों पर गाडिय़ों को रोक दिया था। उन्होंने उसी दिन हुए एक समारोह में मंच से ही इस बात के लिए अफसोस जाहिर किया, और हिमाचल की जनता से माफी मांगी। वे अपनी तरफ से तो शिमला के बाजार में पैदल चलते हुए दुकानों पर गए, और परिवार सहित वहां के एक रेस्त्रां में बैठकर चाय-काफी भी पी। जो खरीददारी की, उसका भुगतान भी खुद ही किया। देश के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद ऐसी सादगी कुछ तो कम ही बच जाती है, और फिर कुछ आसपास के मुसाहिब अफसर सादगी रहने भी नहीं देते। नतीजा यह होता है कि राष्ट्रपति तो दूर, छोटे-छोटे से नेता भी अपनी ताकत की शान दिखाते हुए जनता को कुचलते हुए चलते हैं। और चूंकि तकरीबन तमाम राजनीतिक दलों में नेताओं का मिजाज ऐसा ही रहता है, इसलिए जनता यह बात भूल सी गई है कि नेताओं का सादगी या सज्जनता से कोई लेना-देना होता है। आम जनता तो चीखते सायरनों वाले सत्ता के काफिलों के लिए छिटककर किनारे होकर रास्ता देने के इतने आदी हो गए हैं कि अब उन्हें शायद इसका बुरा भी नहीं लगता। 
हम राष्ट्रपति की कुछ और बातों की वजह से भी यह लिख रहे हैं। अभी दो दिन हुए जब उन्होंने एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मानद उपाधि लेने से मना कर दिया। जबकि हालत यह है कि दीक्षांत समारोह में शामिल होने वाले तमाम किस्म के नेता उन्हें मिलने वाली मानद उपाधियों को तुरंत मंजूर कर लेते हैं। यह एक अच्छा सिलसिला है कि राष्ट्रपति ने मानद उपाधि के इस पाखंड को खत्म करने की कोशिश की है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने इसी जगह एक से अधिक बार पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की एक पहल को लिखा था कि उन्होंने अपने नाम के साथ महामहिम शब्द का इस्तेमाल बंद करवा दिया था। लोकतंत्र में ऐसे सामंती पाखंड की कोई जगह होनी भी नहीं चाहिए। उनके देखादेखी बाद में देश भर में राज्यपालों को भी उनके फैसले के मुताबिक अपने राजभवनों को महामहिम शब्दावली से मुक्त करना पड़ा था। 
राष्ट्रपति का जैसा रूख दिख रहा है, उन्हें खुद ही पहल करके एक ऐसी बैठक बुलानी चाहिए जिसमें सरकार, अदालत, और संसद से जुड़े हुए सभी निर्णायक तबके मौजूद रहें, और जिस बैठक में यह चर्चा हो सके कि सत्ता के कौन-कौन से सामंती प्रतीक खत्म किए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह लोकतंत्र में समानता की सोच के खिलाफ एक गैरबराबरी खड़ी करने वाली बात है। दूसरी बात यह भी है कि ऐसे सारे प्रतीक आम जनता के कंधों पर ही ढोए जाते हैं, और इनका खर्च जनता ही उठाती है। आज देश भर में न कोई अपने बंगले छोडऩा चाहते, न कोई शान-शौकत की जिंदगी छोडऩा चाहते, और यह सब जनता के खजाने को लुटाकर किया जाता है। इसलिए राष्ट्रपति को यह चाहिए कि वे सार्वजनिक जीवन में सादगी के लिए कोशिश करें, और खुद अपने इंतजाम में कटौती करते चलें, अपने खुद के निजी खर्च को सरकार पर न आने दें। रामनाथ कोविंद एक दलित और गरीब परिवार से आए हुए हैं, और वे भारत के गरीबों की हकीकत औरों के मुकाबले शायद कुछ अधिक समझते होंगे। इसलिए उनको ऐसे तमाम राजकीय और शासकीय इंतजाम खत्म करने का माहौल बनाना चाहिए जो कि जनता के पैसों पर ही किए जाते हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मई

डीजल-पेट्रोल पर टैक्स-ड्यूटी का ढांचा एकदम ही नाजायज

संपादकीय
22 मई 2018


भारत के ताजा इतिहास में पेट्रोल और डीजल में इस तरह की आग पहले कभी लगी हो यह याद नहीं पड़ता है। और दूसरी बात यह है कि मोदी सरकार आने के बाद से अब तक लगातार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल पिछली मनमोहन सरकार के दस बरसों के मुकाबले खासा सस्ता मिलते आया है। इसके बावजूद सरकार ने पेट्रोल, डीजल, और रसोई गैस पर लगातार तरह-तरह की ड्यूटी, टैक्स, और सेस लगाकर उसके दाम आसमान पर रखे। अंतरराष्ट्रीय बाजार के सस्ते रेट का फायदा भारत के ग्राहकों को मिलना तो दूर रहा, भारत के लोगों पर टैक्स इतना बढ़ाया गया कि अब उनका सब्र जवाब दे रहा है। केन्द्र सरकार के टैक्स, ड्यूटी, सेस के अलावा राज्य सरकार के टैक्स भी उसके ऊपर जुड़ जाते हैं, और पेट्रोलियम पर यह नकली महंगाई खड़ी करके केन्द्र और राज्य दोनों भरपूर कमाई कर रहे हैं। कल ही पेट्रोलियम मंत्री का यह बयान सामने आया है कि डीजल-पेट्रोल पर टैक्स कम नहीं किया जाएगा क्योंकि यह रकम ग्रामीण विकास के लिए खर्च की जा रही है। 
वैसे तो किसी देश की सरकार टैक्स देने की क्षमता वाले एक तबके से वसूली करके उसे दूसरे जरूरतमंद तबके पर खर्च करती है, और केन्द्र सरकार के बजट का एक मकसद यह भी रहता है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि आज डीजल-पेट्रोल की खपत बड़ी-बड़ी निजी गाडिय़ों तक सीमित नहीं है, इनकी महंगाई से सारा सार्वजनिक परिवहन भी महंगा हो रहा है, कारोबारी गाडिय़ां महंगी हो रही हैं, और शहरी मध्यम-निम्न वर्ग भी आज अपनी निजी दुपहिया पर चलते हैं, और उन पर भी इस अभूतपूर्व और अस्वाभाविक महंगाई की मार पड़ रही है। सरकार इस अंदाज में पेट्रोलियम पर ड्यूटी, टैक्स, और सेस लगाते और बढ़ाते जा रही है कि मानो उनकी खपत महज उच्च आय वर्ग में है। आज गांव के किसान, गांव के कारीगर, और गांव से शहर काम करने आने वाले लोग भी निजी या कारोबारी गाडिय़ों का इस्तेमाल करते हैं, और हर किस्म का सफर महंगा हो गया है। सामानों की आवाजाही महंगी हो गई है, और खेतों के डीजल पंप, ट्रैक्टर, खेती की और मशीनें, सब कुछ का इस्तेमाल महंगा हो गया है। 
केन्द्र सरकार को लोगों के सब्र का और इम्तिहान नहीं लेना चाहिए। शहरी फैशनेबुल लोगों से लेकर कारीगरों और मजदूरों तक, सबको डीजल-पेट्रोल की जरूरत पड़ती है। केन्द्र सरकार एक बार भी इस बारे में कोई सफाई नहीं दे पाई है कि सत्ता में आने के बाद पूरे चार बरस से वह सस्ती अंतरराष्ट्रीय खरीदी करके सबसे महंगी घरेलू बिक्री क्यों कर रही है। यह सिलसिला बेइंसाफी का है। आज जब हम यह लिख रहे हैं, तो उसी वक्त देश के कारोबारी तबकों से भी यह मांग उठ रही है कि पेट्रोलियम पर से वैट और एक्साईज ड्यूटी को कम किया जाए। सरकार की इस अंधाधुंध महंगाई से देश में पेट्रोलियम की कीमतों पर से सरकारी नियंत्रण खत्म होने की बात भी फर्जी साबित होती है। कहने के लिए पेट्रोलियम कंपनियां अपना दाम तय कर रही हैं, लेकिन उसके बाद केन्द्र सरकार उस पर टैक्स-ड्यूटी बढ़ाने का अपना काम बढ़ाते चल रही है, और इसका खुले बाजार से कुछ भी लेना-देना नहीं है। 
देश के गांवों के लिए अगर बजट की जरूरत है, तो सरकार को किसी सक्षम और संपन्न तबके से वसूली-उगाही करनी चाहिए। डीजल-पेट्रोल की छोटी गाडिय़ों को, और मुसाफिर गाडिय़ों को इस बढ़ोत्तरी से अलग रखना चाहिए। अगर सरकार सिर्फ बड़ी गाडिय़ों वाले लोगों से डीजल-पेट्रोल पर अधिक टैक्स लेना चाहती है, तो वह पेट्रोल पंपों पर नहीं लिया जा सकता। उसके लिए ऐसी गाडिय़ों की बिक्री के वक्त ही उन पर एक सालाना टैक्स इतना लगाया जा सकता है कि जिससे उनकी ईंधन की औसत खपत पर टैक्स वसूली हो जाए। आज पन्द्रह बरस का टैक्स सभी गाडिय़ों पर लिया जाता है, सरकार बड़ी और आलीशान गाडिय़ों, महंगे दुपहियों पर इस टैक्स को बढ़ा सकती है ताकि उनको पेट्रोल-डीजल एक किस्म से महंगा पड़े। चूंकि देश में पेट्रोल-डीजल के दो किस्म के रेट केवल चोरी बढ़ाएंगे, इसलिए ऐसी वसूली गाड़ी लेते वक्त ही हो सकती है। लेकिन आज छोटी गाडिय़ों वाले लोगों को और डीजल-पेट्रोल के छोटे ग्राहकों को जो भारी टैक्स देना पड़ रहा है, वह बिल्कुल ही नाजायज है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मई

ऐसे हिंसक और बेधड़क देश का भगवान मालिक

संपादकीय
21 मई 2018


गुजरात में साल दो साल पहले उना नाम की जगह पर दलितों को बुरी तरह से पीटने का वीडियो सामने आया था, और दुनिया का दिल दहल गया था कि सार्वजनिक जगह पर, सड़क पर दलितों को किस तरह से मारा जा रहा था। अभी एक दूसरा वीडियो सामने आया है जो गुजरात के राजकोट में एक कारखाने के अहाते में कचरा बीनने गए पति-पत्नी को पीटने का है। फैक्ट्री के लोगों ने मार-मारकर इस दलित नौजवान की जान ले ली, और इसमें फैक्ट्री के कर्मचारी भी शामिल थे, और मालिक भी। जिस तरह उसे बांधकर कोड़े की छड़ से उसको पीटा गया, वह देखते ही नहीं बनता। यह नौजवान मारा गया और उसकी बीवी बुरी तरह से जख्मी है। 
यह हालत देश के बहुत से राज्यों में दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गरीबों, और महिलाओं-बच्चों की है। ये तमाम वे तबके हैं जिनकी हिफाजत के लिए देश में अलग से कानून बना हुआ है। और ऐसे कानून के चलते हुए भी जब दलित-आदिवासी रात-दिन कहीं न कहीं हत्या-बलात्कार के शिकार होते हैं, किसी दलित दूल्हे के घोड़ी पर चढऩे पर दंगा होने लगता है, जहां पर कल ही मध्यप्रदेश में गोहत्या की आशंका में एक मुस्लिम को पीट-पीटकर मार डाला गया, और दूसरा बुरी तरह जख्मी है, वहां पर यह सोचना पड़ता है कि यह देश जा किधर रहा है? यह नौबत बहुत ही खराब है, और यह सुधरते दिख नहीं रही है। 
देश में कानून की किसी को परवाह नहीं रह गई है, और कानून लागू करने वाली एजेंसियां, मुजरिमों को पकडऩे वाली एजेंसियां, इन सब पर भारी राजनीतिक दबाव दिखता है, और सत्ता को जो नापसंद हैं, उन पर तो कार्रवाई दिखती है, लेकिन बाकी लोगों पर अधिक से अधिक वक्त तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। एक दूसरी दिक्कत यह है कि पुलिस और बाकी जांच एजेंसियां जब लगातार राजनीतिक दबावतले काम करती हैं, तो वे भ्रष्ट भी होने लगती हैं। पुलिस को लगता है कि जब भेदभाव ही करना है, चुनिंदा मुजरिमों के साथ रियायत ही करनी है, तो ऐसी रियायत करते हुए वे खुद भी अपने फायदे के लिए कुछ और लोगों से रियायत क्यों न कर लें? ऐसी सोच धीरे-धीरे काम करने की क्षमता को घटाते चलती है, और लोगों का भरोसा कानून के राज पर से उठने लगता है। 
कई बार एक लतीफा बाजार में आता है कि एक जज से खुश होकर एक बुजुर्ग उसे दुआ देता है कि बेटा अगले जनम में दारोगा बनना। जज हैरान होकर बताता है कि वह तो आज भी दारोगा से बहुत बड़ा है, और फिर ऐसी दुआ क्यों दी जा रही है? तो वह बुजुर्ग कहता है कि आपने इस फैसले में दस बरस लगा दिए, दारोगा तो कहता था कि लाख रूपए ले आओ, दस दिन में मामला निपटा देगा। जब ऐसे किस्से लोगों की असल तकलीफों का असल बखान हो, तो फिर यह सोचना पड़ता है कि इस बिगड़ी हुई व्यवस्था को आखिर कौन सुधारेंगे, और क्या यह सचमुच ही कभी सुधर भी पाएगी? आज जब सार्वजनिक जगहों पर लोग मार-मारकर, पीट-पीटकर दूसरों की जान ले लेते हैं, और उनको यह अहसास भी रहता है कि हो सकता है कि कोई इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे हों। इसके बावजूद लोगों को कत्ल करने में हिचक नहीं होती अगर जान किसी दलित-आदिवासी की हो, या किसी गरीब की हो। आज जब हम इस बात को लिख रहे हैं उसी वक्त दिल्ली की एक खबर है कि झारखंड से वहां घरेलू कामकाज के लिए ले जाई गई एक नाबालिग लड़की ने जब तनख्वाह मांगी, तो मालिक ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अब यह हाल जिस देश की राजधानी का हो, उस देश का फिर भगवान ही मालिक है। (Daily Chhattisgarh)

आस्तिक को तमाम किस्म की सहूलियतें

21 मई 2018

उत्तरप्रदेश में एक बलात्कार और फिर उसकी शिकार के पिता की पुलिस हिरासत में पिटाई, जेल में मौत के मामले में जब राज्य सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की, और पूरे देश के मीडिया में योगी सरकार की धिक्कार होने लगी, तब मामला सीबीआई को गया जिसने शायद दो दिनों के भीतर ही भाजपा के विधायक को बलात्कार के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया। इसके पहले से यह महिला अपने पिता और परिवार सहित लगातार इस विधायक पर, उसके भाई पर कार्रवाई की मांग कर रही थी। उन्नाव रेप केस नाम से कुख्यात हो गया यह हादसा ताकतवर सत्तारूढ़ लोगों की गुंडागर्दी का एक अव्वल दर्जे का नमूना था, और अगर पूरे देश में इसे लेकर हल्ला नहीं होता तो शायद यह गुंडागर्दी जारी भी रहती।
अभी दो दिन पहले इस विधायक की सीबीआई हिरासत की जो तस्वीर सामने आई है, वह बड़ी दिलचस्प है। उसके हाथ में पूजा की मौली बंधी हुई है, और ऊंगलियों में कम से कम तीन पर अंगूठियां चढ़ी हुई हैं। जाहिर है कि आदमी धर्मालु था, और कुछ ही समय पहले उसने पूजा-पाठ में हिस्सा भी लिया होगा जहां उसकी कलाई पर यह मौली बांधी गई होगी। जब हाथों में इतनी अंगूठियां हैं, तो जाहिर है कि विधायक का रत्नों पर और ग्रहों के प्रभाव पर भी भरोसा रहा होगा। इसके पहले की उसकी तस्वीरें भी पूजा के तिलक वाली छपती रही है जो कि उसे आस्थावान बताती हैं।
लेकिन उसकी आस्था ने, उसके धर्म ने, ग्रह-नक्षत्रों वाले रत्नों ने, और पूजा के धागे ने उसे बलात्कार से नहीं रोका, और बलात्कार के खिलाफ आवाज उठाने वाले लड़की के पिता को मौत तक पहुंचाने से नहीं रोका। विधायक के साथ-साथ उसका भाई भी इसमें शामिल था, इसलिए यह भी जाहिर है कि परिवार के और लोगों ने भी उसे नहीं रोका। कुल मिलाकर नतीजा यह है कि धर्म, आध्यात्म, समाज या परिवार, ग्रह-नक्षत्रों वाले पत्थर किसी काम के नहीं रहते, और जब जुर्म करना रहता है, तो ये सब मिलकर भी जुर्म को नहीं रोक पाते।
हकीकत तो यह है कि इस किस्म की तमाम अवैज्ञानिक बातें लोगों को जुर्म करने का एक हौसला देती हैं। मुजरिमों को लगता है कि वे पूजा-पाठ से, गंगा में नहाकर, गौदान करके, या अलग-अलग पत्थरों और धातुओं की अंगूठियां पहनकर अपने पापों से मुक्ति पा लेंगे। और ऐसा दिलासा या भरोसा बहुत बड़ी ताकत होता है। और यह सब महज हिन्दू धर्म के साथ हो, ऐसा भी नहीं है। ईसाईयों की चर्चों में प्रायश्चित करने को एक कमरा होता है जहां बैठकर अपनी शिनाख्त उजागर किए बिना बगल के चेम्बर में बैठे पादरी को अपने पाप गिनाकर लोग अपनी छाती पर से बोझ हटा लेते हैं, और धर्म यह कहता है कि ऐसे प्रायश्चित के बाद ईश्वर पापी को माफ कर देता है। मतलब यह कि गंगा या मंदिर की तरह चर्च का यह चेम्बर एक लॉंड्री की वॉशिंग मशीन है जिसमें आत्मा को डालकर सारे दाग-धब्बे निकालकर फिर आगे पाप करने का रास्ता खुल जाता है।
मुम्बई के तस्करों ने हाजी मस्तान से लेकर और कितने ही थे जो कि हाजी थे। हज करके आ चुके थे, और चूंकि हज के पहले की स्लेट साफ हो चुकी थी, इसलिए आगे वे फिर अपनी पुरानी इबारत उस पर लिखना जारी कर चुके थे। आज अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक, और यमन से लेकर निगर तक जाने कितने ही ऐसे देश हैं जहां पर ईश्वर के नाम पर इस्लामी आतंकी रोजाना सैकड़ों कत्ल कर रहे हैं, बलात्कार कर रहे हैं, और महिलाओं को गुलाम बनाकर सेक्स-बाजार में नीलाम कर रहे हैं।
लोगों को इंदिरा गांधी के वक्त का स्वर्ण मंदिर याद होगा जब वहां भीतर भिंडरावाले के आतंकी दस्ते खूंखार और जानलेवा हथियारों के जखीरे के साथ बसे हुए थे, और वहां से निकलकर बाहर जाकर दर्जनों कत्ल करके वापिस स्वर्ण मंदिर के भीतर डेरा डाल देते थे। लेकिन बेकसूरों के कत्ल के खिलाफ, स्वर्ण मंदिर के ऐसे बेजा इस्तेमाल के खिलाफ न उस वक्त के धर्म ने कुछ कहा था, और न आज का धर्म उसमें कोई खोट याद करता है।
उधर इजराईल और फिलीस्तीनी सरहद को देखें, तो दुनिया में सबसे अधिक धार्मिक नस्लों में से एक, इजराईल की यहूदी सरकार और फौज निहत्थे और बेकसूर फिलीस्तीनियों को थोक में मार रही हैं, और उनका धर्म कुछ नहीं कह रहा।
ईसाईयों के सबसे बड़े धर्मकेन्द्र, वेटिकन के तहत आने वाले अनगिनत चर्चों में पादरियों पर बच्चों से बलात्कार के मामले सही साबित होने के बावजूद वेटिकन के मुखिया पोप ने हमेशा ही अपने ऐसे पादरियों को बचाने में जान लगा दी, और उन्हें जेल नहीं जाने दिया।
उधर हिन्दुस्तान में देखें तो आसाराम से लेकर राम-रहीम तक, धर्म और आध्यात्म का चोला ओढ़े हुए लोगों में से किसी को धर्म ने बलात्कार से नहीं रोका, और दूसरे किस्म के जुर्मों से नहीं रोका।
आज एक सर्वे करने की जरूरत है कि जेलों में बंद सजायाफ्ता मुजरिमों में से नास्तिक कितने हैं, और आस्तिक कितने? मेरा ख्याल है कि आस्तिकों को जुर्म करने के पहले सौ बार सोचना होता है क्योंकि उसके जुर्म की ढाल बनकर ईश्वर आकर खड़े होंगे, और न ही ईश्वर के एजेंट। किसी प्रायश्चित से पापमुक्ति का उसे कोई भरोसा नहीं होगा, और उसे अपनी बाकी जिंदगी अपने जुर्मों का बोझ अपने सीने पर लेकर ही सोना होगा। इसलिए नास्तिक के मुजरिम होने का खतरा कम रहता है, लेकिन आस्तिक को तमाम किस्म की सहूलियतें रहती हैं। लोग अपने ईश्वर और अपने धर्मगुरू से यह सवाल जरूर करें कि वे मिलकर भी किसी को जुर्म से रोक क्यों नहीं पाते? (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मई

बेंगलुरू की विधानसभा से निकला हुआ संदेश

संपादकीय
20 मई 2018


कर्नाटक विधानसभा में कल बहुमत साबित करने के पहले ही भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने इस्तीफे की घोषणा कर दी, और इधर राष्ट्रगान बजते रहा, उधर वे अपने विधायकों के साथ राजभवन रवाना हो गए ताकि उस राज्यपाल को इस्तीफा दे सकें जिसने नाजायज तरीके से उन्हें न्यौता देकर शपथ दिलाई थी। यह इस्तीफा कई किस्म का था। यह भाजपा की तैयारी का इस्तीफा भी था, और सबसे बड़ा इस्तीफा तो यह राज्यपाल का अपनी जिम्मेदारियों से था। जिस राज्यपाल को असीमित अधिकार दिए गए हैं कि वह किसे सरकार बनाने न्यौता दे, उस राज्यपाल ने उसका असीमित बेजा इस्तेमाल करके एक ऐसी सरकार बनवाई जो बिना दल-बदल या खरीद-फरोख्त के बहुमत साबित नहीं कर सकती थी। इसलिए सामाजिक जीवन की मर्यादा यह मांगती है कि ऐसा राज्यपाल बिना देर किए इस्तीफा दे। 
कहने के लिए राज्यपाल और भाजपा के सामने कई किस्म की मिसालें जुट जाएंगी कि जब केन्द्र पर कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार था तब बहुत से राज्यपालों ने बहुत से राज्यों में कैसा-कैसा बर्ताव किया था, और तब किसने इस्तीफा दिया था। वैसी तमाम बातें इतिहास की किताबों में अच्छी तरह दर्ज होंगी, लेकिन हमारे सरीखे रोजाना के अखबारनवीसों की नसीहत या मांग उस दिन की जरूरत पर रहती है जिस दिन वह अखबार छपना है। इसलिए इतिहास को देखने की एक सीमा रहती है, और वर्तमान की यह मांग रहती है कि भविष्य को और अधिक तबाह होने से बचाया जाए। इसलिए भाजपा एक पार्टी के रूप में चाहे जैसा बर्ताव करे, जिस राज्यपाल को संविधान की रक्षा की शपथ दिलाई गई थी, और जिसका दर्जा निर्वाचित राज्य सरकार से ऊपर रहता है, उसे अपने ऐसे बेईमान बर्ताव के बाद तुरंत कुर्सी छोड़ देना चाहिए। और यह पैमाना बाकी राज्यपालों पर भी, बाकी मामलों में भी लागू होना चाहिए। लोगों को याद होगा कि बीच-बीच में कुछ लोग राज्यपाल के ओहदे को ही बेईमानी के खतरों से भरा हुआ, और निहायत गैरजरूरी बताते आए हैं। हम खुद इस अखबार मे इसी जगह पर बरसों से यह लिखते आए हैं कि ऐसी सामंती व्यवस्था खत्म होनी चाहिए जो कि एक निर्वाचित सरकार और मुख्यमंत्री के ऊपर एक अनैतिक नियंत्रण के लिए अंग्रेजी राज की बनाई हुई दिखती है। भारत में राज्यपालों की व्यवस्था में लोकतंत्र के साथ बेईमानी ही अधिक की है, न कि कोई संवैधानिक योगदान दिया है। 
जहां तक कल की भाजपा की शिकस्त का सवाल है तो वह कर्नाटक से अधिक है, और कर्नाटक से दूर-दूर तक है। कल का नुकसान बेंगलुरू शहर तक सीमित नहीं रहने वाला है, यह देश भर में भाजपा के खिलाफ गैरएनडीए पार्टियों की एक नई एकजुटता की संभावना की शुरुआत हो सकता है। जब बिल्ली किसी घर में घुसकर दूध पी जाती है, तो वह नुकसान महज दूध का नहीं होता, बड़ा और असल नुकसान यह होता है कि बिल्ली ने घर देख लिया, और दूध का बर्तन पहचान लिया। इसी तरह आज गैरएनडीए पार्टियों ने एक नई संभावना की शिनाख्त कर ली है जो कि देश के दर्जन भर राज्यों में जगह-जगह आगे बढ़ सकती है जहां पर कि कांग्रेस या दूसरी पार्टियां चुनाव के पहले या चुनाव के बाद एक गठबंधन या तालमेल बना सकती हैं, और भाजपा-एनडीए के सामने एक सचमुच की चुनौती बन सकती हैं। जैसा कि कर्नाटक को लेकर कुछ लोगों का यह मानना है कि भाजपा के भीतर कुछ लोग ऐसे भी थे जो सरकार बनाने का ऐसा दुस्साहसी दावा करने के खिलाफ थे, और चाहते थे कि कांग्रेस-जेडीएस मिलकर सरकार बनाएं, एक-दूसरे को गिराएं, और तब भाजपा के लिए एक बेहतर मौका सामने आएगा। लेकिन वैसा हुआ नहीं, और सुप्रीम कोर्ट की दखल के अंदाज के बिना भाजपा ने एक पखवाड़े के वक्त को जुगाड़ के लिए काफी मान लिया। अपनी मर्जी का राज्यपाल होने का भी यह नुकसान हुआ कि अपनी ताकत और संभावना तौलने की जरूरत सूझी ही नहीं। अब देश में जगह-जगह कांग्रेस हो सकता है कि क्षेत्रीय पार्टियों के साथ एक बेहतर तालमेल को अच्छा समझे, और अपनी सीमित रह गई औकात की हकीकत जानकर, मानकर, छोटी-छोटी भागीदारियों को इज्जत का मुद्दा न बनाकर जिंदा रहना सीखे। कर्नाटक से भारत की क्षेत्रीय पार्टियों को भी कांग्रेस के साथ मिलकर बात करने की एक संभावना दिखेगी, और यही बेंगलुरू की विधानसभा से निकला हुआ संदेश है। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 20 मई

भारत में लोकतंत्र को फिर साख दिलाई जा सकती है?

संपादकीय
19 मई 2018


कर्नाटक में इस वक्त विधानसभा में जो नाटक चल रहा है, उसे देखकर देश भर के लोगों के मन में भारतीय संसदीय राजनीति के लिए हिकारत बढ़ती जा रही है। यह पहला मौका नहीं है कि लोगों के मन में राजनीति के लिए नफरत हुई हो, इसके पहले भी कई ऐसे मौके आए, कई ऐसी पार्टियां आईं जिन्होंने खरीद-बिक्री का काम किया। कई बार पार्टियों ने खरीद-बिक्री नहीं की, तो सांसदों ने खुद ही अपने स्तर पर संसद में सवाल पूछने के लिए अपनी आत्मा को बेचने का काम किया, कैमरे पर कैद हुए, और संसद की सदस्यता गई, जेल शायद बाकी है। ऐसे में जब पिछले दो-चार दिनों से यह चर्चा चल रही है कि किस तरह कर्नाटक में एक-एक विधायक की खरीदी के लिए सौ-सौ करोड़ रूपए की बोली लग रही है, तो लोगों को लग रहा है कि क्या ऐसे चुनावों में वोट देने जाने का कोई मतलब है जिसमें बेईमान ही चुने जाएं, और वे अपने से बड़े बेईमान के हाथ बिककर पांच बरस तक राज्य को लूटने का ठेका दे दें? 
ऐसे मौके पर जब देश की अदालत को देखें, तो लगता है कि वह महज तकनीकी आधार पर छोटे-छोटे आदेश कर रही है, और अपनी छवि बचाने में कामयाब हो रही है। लेकिन जो बड़ी बेइंसाफी, बड़ी बेईमानी सामने दिख रही है, उस पर या तो सुप्रीम कोर्ट का कोई काबू नहीं है, या फिर सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी से कतरा रही है, और राजनीतिक भ्रष्टाचार की परंपरा में दखल देने से बच रही है। इन दोनों में से चाहे जो बात हो, देश की आम जनता बहुत ही निराश है कि जब संसदीय संस्थाएं इस किस्म की मंडी बन गई दिख रही हैं, जब अदालतें बेबस हैं, जब सरकार का कोई रोल ऐसी नौबत में रह नहीं गया है, जब मीडिया भरोसेमंद नहीं रह गया है, तो अकेली जनता ही भला किस भरोसे पर, और भला किस उम्मीद में वोट देने जाती रहे? 
हमने छत्तीसगढ़ की पहली सरकार के वक्त भाजपा के दर्जन भर विधायकों को मुख्यमंत्री अजीत जोगी की जेब में जाते देखा था। उसके बाद जब राज्य के पहले चुनाव हुए, तो बहुमत से आई भाजपा से सरकार बनाने का मौका लूटने की कोशिश करते फिर जोगी को देखा था, और छत्तीसगढ़ के लोगों को अच्छी तरह याद है कि इस तमाम खरीद-बिक्री की रिकॉर्डिंग किस तरह नोटोंभरे बैग के साथ अरूण जेटली ने रायपुर में प्रेस कांफ्रेंस में सुनाई थी। वह शायद भारतीय राजनीति का पहला मौका था जब कोई मुख्यमंत्री अपनी ही कांग्रेस पार्टी से निलंबित किया गया था। इसलिए आज जब भाजपा पर खरीद-बिक्री की तोहमत लगती है, तो छत्तीसगढ़ में इस तोहमत को दोहराते हुए राहुल गांधी या कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि अपने संपन्न दिनों में कांग्रेस ने ऐसी बहुत सी खरीदी की हुई है। अब आज शायद विधायक-सांसद महंगे इतने अधिक हो गए हैं, और कांग्रेस इतनी कंगाल हो गई है कि वह थोक में खरीद-बिक्री कर नहीं पा रही है। 
भारतीय संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता इतनी बुरी तरह बर्बाद होने का एक नुकसान यह हुआ है कि लोग चुनाव के वक्त अपने वोट बेचने में कुछ भी बुरा नहीं मानते क्योंकि उनको मालूम है कि उनके वोट पाकर जो सांसद या विधायक बनेंगे वो बाद में हो सकता है कि अपनी आत्मा ऊंचे दाम पर बेचने को मंडी में एक पैर पर खड़े रहें। इसका दूसरा नुकसान यह है कि देश में नेता और राजनीति सबके भ्रष्ट हो जाने की तस्वीर ऐसी बन गई है कि लोग अब सरकार को कोई भी टैक्स देना नहीं चाहते कि चोरों के हाथ क्यों कुछ दिया जाए। यह नौबत लोकतंत्र में आस्था की कमी का एक ऐसा बड़ा खतरा है जो कि जल्द दूर नहीं होने वाला है। अगर देश में कोई ईमानदार नेता, ईमानदार पार्टी आ भी जाए, तो भी उसकी ईमानदारी की साख बनते कई बरस लगेंगे। जनता दूध की जली हुई है, और वह छांछ भी फूंक-फूंककर पिएगी। 
अब से कुछ घंटों में कर्नाटक का फैसला आ जाएगा। अभी उसके बारे में हम कोई अटकल लगाना नहीं चाहते लेकिन इस चुनाव में बड़े-बड़े दिग्गज और प्रामाणिक भ्रष्ट लोगों का जैसा बोलबाला देखने मिला है, उससे ही देश में लोकतंत्र की साख कमजोर हुई है। अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को एक खुली सुनवाई करके इस बारे में विचार करना चाहिए कि क्या देश में लोकतंत्र को एक बार फिर साख दिलवाई जा सकती है? (Daily Chhattisgarh)