..यह गठबंधन है तो कारोबारी, लेकिन हमलावर फौजी सरीखा

संपादकीय
11 मई 2018


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोगी स्वदेशी जागरण मंच ने आरोप लगाया है कि खुदरा व्यापार क्षेत्र की अमरीकी कंपनी वॉलमार्ट, फ्लिपकार्ट कंपनी को लगभग खरीदकर भारत के खुदरा बाजार में पिछले दरवाजे से प्रवेश का प्रयास कर रही है।  मंच ने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है। मंच ने प्रधानमंत्री से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि समाज के निचले पायदान के लोगों के हितों के साथ देश के कृषि क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। मंच ने आरोप लगाया है कि इससे छोटे और मझोले कारोबारी और छोटे दुकानदारों पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और उनके समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा होगा। वहीं, व्यापारियों के संगठन कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने वॉलमार्ट-फ्लिपकार्ट सौदे के ऊपर कहा है कि यह भारत के खुदरा बाजार पर कब्जा जमाने की वॉलमार्ट की कोशिशों का ही एक हिस्सा है। कैट ने कहा है कि डिजिटल रूप से सशक्त ई-वॉलमार्ट निश्चित रूप से ई-कॉमर्स और खुदरा बाजार को विकृत करेगी। इसमें सभी को समान अवसर सुनिश्चित नहीं होंगे और खुदरा कारोबारियों को निश्चित रूप से नुकसान होगा। कहा है कि इससे सिर्फ उद्यम पूंजी निवेशकों, निवेशकों और प्रवर्तकों को फायदा होगा, देश को नहीं।
कल जब इस सौदे की खबरें चारों तरफ फैली थीं, तो लोगों को लग रहा था कि हजार करोड़ का यह सौदा भारत में बनी एक कंपनी के हाथों कारोबारी इतिहास बन रहा है। लेकिन इसके साथ जुड़ी हुई दूसरी बातों को भी सोचना जरूरी है। पहली बात तो यह कि वॉलमार्ट जैसी कंपनी दुनिया में जहां-जहां गई है, उसने स्थानीय कारोबार को पूरी तरह तबाह करके छोटे दुकानदारों को बेरोजगार कर दिया, और फिर उनको धंधे से बाहर करने के बाद सामानों पर रियायत हटा भी दी। खुदरा व्यापार के मामले में वॉलमार्ट एक ऐसा बुलडोजर है जो कि फुटपाथ पर बैठे हुए छोटे-छोटे व्यापारियों को रौंदते हुए निकल जा रहा है, और किसी देश के कानून उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहा है। और कल का यह सौदा इस कंपनी की मनमानी का कोई नया मामला नहीं है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि कई बरस पहले जब छत्तीसगढ़ में वॉलमार्ट का थोक बाजार खुला, और हमने एक नमूने की तरह उसमें जाकर खुदरा खरीददारी की, सैकड़ों सामान सिर्फ एक-एक लिए, तो भी वॉलमार्ट ने उसे थोक बिक्री के लाइसेंस के तहत बेचा, और नियमों को तोड़-मरोड़कर रख दिया कि पांच सौ रूपए से ऊपर की खरीददारी थोक खरीददारी है। जबकि सामान्य समझबूझ यह कहती है कि थोक खरीददारी का मतलब एक ही सामान को अधिक संख्या में खरीदने वाले व्यापारियों से है, न कि घरेलू ग्राहकों से। हमने उस वक्त अपनी छापी रिपोर्ट को सारे सुबूतों के साथ सैकड़ों सांसदों को भेजा था, देश के बड़े-बड़े आर्थिक अखबारों को भी भेजा था, लेकिन किसी ने उस पर कुछ किया नहीं, क्योंकि सांसदों को चुनावी राजनीति के लिए चंदा भी बड़ी कंपनियों से बेहतर मिल सकता है, और बड़े अखबारों को इश्तहार भी वॉलमार्ट या फ्लिपकार्ट जैसी बड़ी कंपनियों से मिल सकता है, मुहल्ले के किराना व्यापारी से नहीं। 
हम नहीं जानते कि भारत का आर्थिक उदारीकरण एक बुलडोजर और एक फौजी टैंक के इस मेल की ताकत को किसी तरह कम कर सकता है या नहीं, लेकिन यह एक खतरनाक नौबत है। ऑनलाईन बिक्री जिस रफ्तार से बढ़ रही है, वह हर दिन हजारों हिन्दुस्तानी दुकानदारों को बेरोजगार भी कर रही है। छोटी-छोटी दुकानों से बहुत से कर्मचारियों की रोजी-रोटी भी जुड़ी रहती है। आर्थिक उदारीकरण के कानून लोगों को एकमुश्त बड़ी संख्या में बेरोजगार करने की इजाजत बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को देते हैं, लेकिन अभी भारत के सामने यह चुनौती भी है कि ऐसे बड़े फौजी गठबंधन सरीखे कारोबारी गठबंधन के हमले से देश के छोटे लोगों को कैसे बचाया जा सकेगा। इससे न केवल खुदरा दुकानदारों को फर्क पड़ेगा, बल्कि ऐसी बड़ी ऑनलाईन या सुपरमार्केट वाली कंपनियां उत्पादकों को भी अपने चाकू की नोंक पर रखेंगी, और उनसे मनमाने रेट पर सौदा करेंगी। कब वे किस उत्पादक को बाजार से बाहर कर देंगी, उसका भी ठिकाना नहीं रहेगा। अब नरेन्द्र मोदी की भाजपा अगुवाई वाली इस सरकार के सामने यह एक बड़ी राजनीतिक चुनौती भी रहेगी कि परंपरागत रूप से जनसंघ और भाजपा का साथ देते दिखने वाले खुदरा व्यापारियों और उद्योगपतियों को वह कैसे बचा सकती है। (Daily Chhattisgarh)

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