फैज की बेटी की बैरंग वापिसी और दूसरी तरफ चर्चों पर हमला

संपादकीय
14 मई 2018


भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बिगाडऩे के लिए तो बहुत सी ताकतें लगी रहती हैं, लेकिन जो ताकतें सरहद पर अमन बनाए रखने के लिए दोनों तरफ के लोगों की गालियां सुनती हैं, जब उन पर सरकार भी वार करती है, तो नौबत बहुत तकलीफदेह रहती है। यह लिखने की ताजा वजह एक खबर है जिसके मुताबिक भारत में होने जा रहे पन्द्रहवें एशिया मीडिया समिट में आईं एक पाकिस्तानी को दिल्ली से बैरंग लौटा देना है। पाकिस्तान के एक सबसे मशहूर शायर, फैज अहमद फैज, की बेटी मोनीजा हाशमी जो कि एक प्रमुख मीडियाकर्मी हैं, इस समिट में एक वक्ता थीं, और उन्हें निमंत्रण भेजकर बुलाया गया था, और इस कार्यक्रम में भारत सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी भागीदार था। जब वे दिल्ली पहुंचीं तो भारत सरकार के अफसरों ने आयोजकों को कहा कि न तो उन्हें होटल में ठहराया जाए, और न ही कार्यक्रम में कुछ बोलने दिया जाए। कार्यक्रम में शामिल न करने की चेतावनी के साथ उन्हें तुरंत वापिस रवाना भी कर दिया गया। लोगों को यह याद दिलाया जा सकता है कि फैज ने पाकिस्तान में फौजी हुकूमत का जमकर विरोध किया था, और वे अमन के शायर थे। उनकी बेटी ने भारत सरकार के इस सुलूक के खिलाफ कुछ कहने से इंकार कर दिया है, और महज इतना कहा है कि उनका कहा हुआ रिश्तों को और बिगाड़ेगा, इसलिए वे कुछ कहना नहीं चाहतीं। मोनीजा हाशमी के बेटे ने यह वाक्या ट्विटर पर भारत के प्रधानमंत्री और विदेशमंत्री के लिए लिखा है, और अब तक सरकार का कोई जवाब इस पर नहीं आया है। 
जाहिर तौर पर इसकी एक वजह दिखती है कि दो ही दिन पहले नवाज शरीफ ने यह मंजूर किया कि मुंबई हमला करने वाले आतंकी पाकिस्तान की जमीन से हिन्दुस्तान आए थे। उनके यह कहने के बाद हिन्दुस्तान में भाजपा से लेकर कांग्रेस तक बहुत से तबके पाकिस्तान के खिलाफ जमकर जंग की बातें करने लगे हैं। हो सकता है कि भारत सरकार ने पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद यह बेहतर माना हो कि वहां से आई एक मीडियाकर्मी को इस तरह वापिस किया जाए, लेकिन ऐसी कोई बात सरकार की ओर से औपचारिक रूप से कही नहीं गई है। दूसरी बात यह कि भारत और पाकिस्तान में अखबारनवीस, कलाकार, संगीतकार, और खिलाड़ी, ये तो ऐसे तबके हैं जिनकी वजह से दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर बनते हैं, दोस्ती बढ़ती है, और तनाव घटता है। अगर दोनों देशों के बीच तनातनी रखना जरूरी ही हो, तो भी इन तबकों को तो इस तनाव से दूर रखना चाहिए। ये तबके सरकार से परे के हैं, और अपने-अपने देश के खरे प्रतिनिधि रहते हैं। लेकिन इस सिलसिले को तोड़ते हुए जिस तरह फैज की बेटी को दिल्ली से बैरंग लौटाया गया, उससे भारत सरकार की छवि भी खराब हुई है, और लोगों का हौसला भी पस्त हुआ है। फिर इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी उठता है कि एशिया-स्तर का कोई अंतरराष्ट्रीय आयोजन अगर किसी देश में हो रहा है, और वहां पर कोई विवादहीन प्रतिनिधि आमंत्रित किए गए हैं, तो उन्हें कैसे लौटाया जा सकता है? इससे भारत की लोकतांत्रिक छवि को भी धक्का लगा है।
फैज पूरी जिंदगी पाकिस्तान में फौज और कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ते रहे। वे मजहब पर भरोसा नहीं करते थे, और वे एक वामपंथी नेता थे, वे मजदूरों के शायर थे, वे जम्हूरियत के शायर थे। उनकी परंपरा उनकी बेटी अपने दम पर आगे बढ़ा रही हैं, और उनको इस तरह बेइज्जत करके लौटाने की कोशिश से उनकी कोई बेइज्जती नहीं हुई, भारत की ही एक तौहीन हुई है। इस पूरे सिलसिले में दो दिन पहले की ही इस वारदात को याद करने की जरूरत है कि किस तरह इंडोनेशिया में एक कट्टरपंथी परिवार के आधा दर्जन लोगों ने अपने बच्चों तक को साथ लेकर तीन ईसाई चर्चों पर हमला किया, और दर्जन भर लोगों को मार डाला। धार्मिक उन्मादी और कट्टरपंथी लोग जिस तरह की हिंसा कर रहे हैं, उनके बीच इस उन्माद के खिलाफ लडऩे वाले अखबारनवीस और शायर, कलाकार और लेखक पूरी दुनिया के काम आ सकते हैं, लेकिन ऐसी अंतरराष्ट्रीय समझदारी को दरकिनार करते हुए भारत सरकार ने जो किया है, उससे दुनिया भर की अमन-पसंद ताकतों को चोट लगी है। फिर यह भी दिखता है कि भारत के प्रधानमंत्री और खासकर भारत की विदेश मंत्री जिस तरह चौबीसों घंटे ट्विटर पर लोगों को जवाब देती हैं, वे अपने नाम पर पोस्ट इस मामले कुछ क्यों नहीं बोल रहे हैं? जब चुप रहने के लिए और कम बोलने के लिए बदनाम लोग चुप्पी रखें, तब तो समझ आता है। लेकिन जब पल-पल बोलने वाले, और खासा अधिक बोलने वाले लोग भी अपने फैसलों पर कुछ न कहें, तो वह चुप्पी और चीख-चीखकर बोलती है। यह बहुत खराब बात हुई है, और इससे अमन-पसंद लोगों को अपना हौसला पस्त नहीं करना चाहिए। सरकारें इस किस्म के बहुत से गलत और खराब फैसले लेती हैं, यह तो समझदार जनता होती है जो एक-दूसरे के साथ होती है। इस मामले से निराश हुए बिना भारत और पाकिस्तान के समझदार आम लोगों को अपने रिश्ते बेहतर रखने के लिए कोशिशें जारी रखनी चाहिए, फिर चाहे फौजें, सरकारें, और आतंकी, ये तमाम लोग अपनी-अपनी तरफ से तबाही की कोशिशें क्यों न करते रहें। (Daily Chhattisgarh)

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