चुनाव जीतना और सरकार बनाना तो ठीक है, लेकिन..

संपादकीय
16 मई 2018


कर्नाटक में कल चुनावी नतीजे साफ हो जाने के बाद दो बातें खुलकर स्थापित हो गई हैं। पहली बात यह कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद अपने दम पर सरकार नहीं बना सकती, और न ही बाकी कहीं से उसे ईमानदारी से कोई विधायक मिल सकते। बाकी दोनों पार्टियां मिलकर जरूरी वोटों से ज्यादा विधायकों वाली हैं, और उन्होंने मिलकर सरकार बनाने की घोषणा भी कर दी है, राज्यपाल को लिखकर दे भी दिया है। अब राज्यपाल के नाम पर केन्द्र सरकार जो फैसले लेती है, उन अघोषित फैसलों में आज एक बड़ी दुविधा की नौबत मोदी सरकार के सामने है। पिछले एक बरस में गोवा और मणिपुर जैसे तीन राज्य रहे, जहां पर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन राज्यपालों ने भाजपा को दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने का न्यौता दिया, और एक बार सरकार बन जाने पर विधानसभा में बहुमत साबित करना अधिक मुश्किल नहीं रह गया। नतीजा यह है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस इन तीनों राज्यों में सरकार बनाने का मौका भी नहीं पा सकी। अब अगर उसी पैमाने और परंपरा को कर्नाटक पर लागू किया जाए, तो यहां एक स्पष्ट गठबंधन सरकार बनाने के लिए सामने है, और वही एक विकल्प है जिससे विधायकों की खरीद-फरोख्त के बिना, दल-बदल और अनैतिक कहे जाने वाले तौर-तरीकों के बिना एक सरकार बन सकती है। लेकिन ऐसा लगता है कि बेंगलुरू में कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों में से कुछ का शिकार हो जाएगा, और कुछ बाजार में खड़े होकर अपनी अंतरात्मा बेचने के लिए तैयार होंगे। 
सरकार बनाना किसी भी राजनीतिक दल की एक और शायद पहली प्राथमिकता हो सकती है, लेकिन इसके लिए कितने किस्म के और किस दर्जे के कितने समझौते किए जाएं, इस बारे में भी सोचना चाहिए। लोकतंत्र के भीतर खरीद-फरोख्त की काफी गुंजाइश कानून में रखी गई है, लेकिन लोकतंत्र जिन और जैसी परंपराओं से विकसित होता है, वे भी इतिहास में नेताओं और पार्टियों के नाम के साथ अच्छी तरह दर्ज होती हैं। भारत जैसे मजबूत और विशाल लोकतंत्र को एक विशाल हृदय की जरूरत भी है जिससे कि तात्कालिक नफा-नुकसान छोड़कर दीर्घकालीन गौरवशाली परंपराएं कायम हो सकें। एक तो चुनावों के ठीक पहले होने वाले दल-बदल की दलदल से देश वैसे भी बदनाम होता है, और फिर चुनाव प्रचार के दौरान जो जहरीली गंदगी फैलती है, वह भी देश को बड़ी शर्मिंदगी दिलाती है। इसके बाद अब अगर मतदाताओं के फैसले को अनदेखा करके खरीद-बिक्री से सरकार बनाई जाए, तो वह जनतंत्र के नाम पर धनतंत्र की हिंसा के अलावा और कुछ नहीं होगा। आज की नौबत देखकर एक कार्टून सही लगता है जो कि आज ही आया है। इसमें मतदाता के लिए कहा जा रहा है कि वह इस खुशफहमी में रहता है कि सरकार वह बनाता है। 
कर्नाटक सभी किस्म की राजनीतिक खरीद-फरोख्त के लिए एक बड़ा बदनाम राज्य है। यहां पर इस चुनाव में भी जिस किस्म के माफिया लोगों को राजनीति में जगह मिली है, उससे भी भारतीय लोकतंत्र नाकामयाब लगता है, और ऐसा लगता है कि महज चुनावतंत्र को लोकतंत्र मान लिया गया है। तमाम राजनीतिक दलों को ऐसी गंदगी से ऊपर उठने की जरूरत है। चुनाव जीतना और राज्यों में सरकार बनाना तो ठीक है, लेकिन इतनी अनैतिक जोड़तोड़ ठीक नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

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