डीजल-पेट्रोल पर टैक्स-ड्यूटी का ढांचा एकदम ही नाजायज

संपादकीय
22 मई 2018


भारत के ताजा इतिहास में पेट्रोल और डीजल में इस तरह की आग पहले कभी लगी हो यह याद नहीं पड़ता है। और दूसरी बात यह है कि मोदी सरकार आने के बाद से अब तक लगातार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल पिछली मनमोहन सरकार के दस बरसों के मुकाबले खासा सस्ता मिलते आया है। इसके बावजूद सरकार ने पेट्रोल, डीजल, और रसोई गैस पर लगातार तरह-तरह की ड्यूटी, टैक्स, और सेस लगाकर उसके दाम आसमान पर रखे। अंतरराष्ट्रीय बाजार के सस्ते रेट का फायदा भारत के ग्राहकों को मिलना तो दूर रहा, भारत के लोगों पर टैक्स इतना बढ़ाया गया कि अब उनका सब्र जवाब दे रहा है। केन्द्र सरकार के टैक्स, ड्यूटी, सेस के अलावा राज्य सरकार के टैक्स भी उसके ऊपर जुड़ जाते हैं, और पेट्रोलियम पर यह नकली महंगाई खड़ी करके केन्द्र और राज्य दोनों भरपूर कमाई कर रहे हैं। कल ही पेट्रोलियम मंत्री का यह बयान सामने आया है कि डीजल-पेट्रोल पर टैक्स कम नहीं किया जाएगा क्योंकि यह रकम ग्रामीण विकास के लिए खर्च की जा रही है। 
वैसे तो किसी देश की सरकार टैक्स देने की क्षमता वाले एक तबके से वसूली करके उसे दूसरे जरूरतमंद तबके पर खर्च करती है, और केन्द्र सरकार के बजट का एक मकसद यह भी रहता है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि आज डीजल-पेट्रोल की खपत बड़ी-बड़ी निजी गाडिय़ों तक सीमित नहीं है, इनकी महंगाई से सारा सार्वजनिक परिवहन भी महंगा हो रहा है, कारोबारी गाडिय़ां महंगी हो रही हैं, और शहरी मध्यम-निम्न वर्ग भी आज अपनी निजी दुपहिया पर चलते हैं, और उन पर भी इस अभूतपूर्व और अस्वाभाविक महंगाई की मार पड़ रही है। सरकार इस अंदाज में पेट्रोलियम पर ड्यूटी, टैक्स, और सेस लगाते और बढ़ाते जा रही है कि मानो उनकी खपत महज उच्च आय वर्ग में है। आज गांव के किसान, गांव के कारीगर, और गांव से शहर काम करने आने वाले लोग भी निजी या कारोबारी गाडिय़ों का इस्तेमाल करते हैं, और हर किस्म का सफर महंगा हो गया है। सामानों की आवाजाही महंगी हो गई है, और खेतों के डीजल पंप, ट्रैक्टर, खेती की और मशीनें, सब कुछ का इस्तेमाल महंगा हो गया है। 
केन्द्र सरकार को लोगों के सब्र का और इम्तिहान नहीं लेना चाहिए। शहरी फैशनेबुल लोगों से लेकर कारीगरों और मजदूरों तक, सबको डीजल-पेट्रोल की जरूरत पड़ती है। केन्द्र सरकार एक बार भी इस बारे में कोई सफाई नहीं दे पाई है कि सत्ता में आने के बाद पूरे चार बरस से वह सस्ती अंतरराष्ट्रीय खरीदी करके सबसे महंगी घरेलू बिक्री क्यों कर रही है। यह सिलसिला बेइंसाफी का है। आज जब हम यह लिख रहे हैं, तो उसी वक्त देश के कारोबारी तबकों से भी यह मांग उठ रही है कि पेट्रोलियम पर से वैट और एक्साईज ड्यूटी को कम किया जाए। सरकार की इस अंधाधुंध महंगाई से देश में पेट्रोलियम की कीमतों पर से सरकारी नियंत्रण खत्म होने की बात भी फर्जी साबित होती है। कहने के लिए पेट्रोलियम कंपनियां अपना दाम तय कर रही हैं, लेकिन उसके बाद केन्द्र सरकार उस पर टैक्स-ड्यूटी बढ़ाने का अपना काम बढ़ाते चल रही है, और इसका खुले बाजार से कुछ भी लेना-देना नहीं है। 
देश के गांवों के लिए अगर बजट की जरूरत है, तो सरकार को किसी सक्षम और संपन्न तबके से वसूली-उगाही करनी चाहिए। डीजल-पेट्रोल की छोटी गाडिय़ों को, और मुसाफिर गाडिय़ों को इस बढ़ोत्तरी से अलग रखना चाहिए। अगर सरकार सिर्फ बड़ी गाडिय़ों वाले लोगों से डीजल-पेट्रोल पर अधिक टैक्स लेना चाहती है, तो वह पेट्रोल पंपों पर नहीं लिया जा सकता। उसके लिए ऐसी गाडिय़ों की बिक्री के वक्त ही उन पर एक सालाना टैक्स इतना लगाया जा सकता है कि जिससे उनकी ईंधन की औसत खपत पर टैक्स वसूली हो जाए। आज पन्द्रह बरस का टैक्स सभी गाडिय़ों पर लिया जाता है, सरकार बड़ी और आलीशान गाडिय़ों, महंगे दुपहियों पर इस टैक्स को बढ़ा सकती है ताकि उनको पेट्रोल-डीजल एक किस्म से महंगा पड़े। चूंकि देश में पेट्रोल-डीजल के दो किस्म के रेट केवल चोरी बढ़ाएंगे, इसलिए ऐसी वसूली गाड़ी लेते वक्त ही हो सकती है। लेकिन आज छोटी गाडिय़ों वाले लोगों को और डीजल-पेट्रोल के छोटे ग्राहकों को जो भारी टैक्स देना पड़ रहा है, वह बिल्कुल ही नाजायज है। (Daily Chhattisgarh)

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