राष्ट्रपति की सादगी कुछ और आगे तक बढऩी चाहिए ताकि..

संपादकीय
23 मई 2018


राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पिछले कई मौकों पर अपनी सज्जनता दिखाई है जिससे देश के बाकी नेताओं को, और नौकरशाहों को, और शायद जजों को भी कुछ नसीहत लेने की जरूरत है। अभी उनके शिमला प्रवास के दौरान स्थानीय प्रशासन ने स्कूलों की आधे दिन की छुट्टी कर दी थी, और सड़कों पर गाडिय़ों को रोक दिया था। उन्होंने उसी दिन हुए एक समारोह में मंच से ही इस बात के लिए अफसोस जाहिर किया, और हिमाचल की जनता से माफी मांगी। वे अपनी तरफ से तो शिमला के बाजार में पैदल चलते हुए दुकानों पर गए, और परिवार सहित वहां के एक रेस्त्रां में बैठकर चाय-काफी भी पी। जो खरीददारी की, उसका भुगतान भी खुद ही किया। देश के सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद ऐसी सादगी कुछ तो कम ही बच जाती है, और फिर कुछ आसपास के मुसाहिब अफसर सादगी रहने भी नहीं देते। नतीजा यह होता है कि राष्ट्रपति तो दूर, छोटे-छोटे से नेता भी अपनी ताकत की शान दिखाते हुए जनता को कुचलते हुए चलते हैं। और चूंकि तकरीबन तमाम राजनीतिक दलों में नेताओं का मिजाज ऐसा ही रहता है, इसलिए जनता यह बात भूल सी गई है कि नेताओं का सादगी या सज्जनता से कोई लेना-देना होता है। आम जनता तो चीखते सायरनों वाले सत्ता के काफिलों के लिए छिटककर किनारे होकर रास्ता देने के इतने आदी हो गए हैं कि अब उन्हें शायद इसका बुरा भी नहीं लगता। 
हम राष्ट्रपति की कुछ और बातों की वजह से भी यह लिख रहे हैं। अभी दो दिन हुए जब उन्होंने एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मानद उपाधि लेने से मना कर दिया। जबकि हालत यह है कि दीक्षांत समारोह में शामिल होने वाले तमाम किस्म के नेता उन्हें मिलने वाली मानद उपाधियों को तुरंत मंजूर कर लेते हैं। यह एक अच्छा सिलसिला है कि राष्ट्रपति ने मानद उपाधि के इस पाखंड को खत्म करने की कोशिश की है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने इसी जगह एक से अधिक बार पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की एक पहल को लिखा था कि उन्होंने अपने नाम के साथ महामहिम शब्द का इस्तेमाल बंद करवा दिया था। लोकतंत्र में ऐसे सामंती पाखंड की कोई जगह होनी भी नहीं चाहिए। उनके देखादेखी बाद में देश भर में राज्यपालों को भी उनके फैसले के मुताबिक अपने राजभवनों को महामहिम शब्दावली से मुक्त करना पड़ा था। 
राष्ट्रपति का जैसा रूख दिख रहा है, उन्हें खुद ही पहल करके एक ऐसी बैठक बुलानी चाहिए जिसमें सरकार, अदालत, और संसद से जुड़े हुए सभी निर्णायक तबके मौजूद रहें, और जिस बैठक में यह चर्चा हो सके कि सत्ता के कौन-कौन से सामंती प्रतीक खत्म किए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह लोकतंत्र में समानता की सोच के खिलाफ एक गैरबराबरी खड़ी करने वाली बात है। दूसरी बात यह भी है कि ऐसे सारे प्रतीक आम जनता के कंधों पर ही ढोए जाते हैं, और इनका खर्च जनता ही उठाती है। आज देश भर में न कोई अपने बंगले छोडऩा चाहते, न कोई शान-शौकत की जिंदगी छोडऩा चाहते, और यह सब जनता के खजाने को लुटाकर किया जाता है। इसलिए राष्ट्रपति को यह चाहिए कि वे सार्वजनिक जीवन में सादगी के लिए कोशिश करें, और खुद अपने इंतजाम में कटौती करते चलें, अपने खुद के निजी खर्च को सरकार पर न आने दें। रामनाथ कोविंद एक दलित और गरीब परिवार से आए हुए हैं, और वे भारत के गरीबों की हकीकत औरों के मुकाबले शायद कुछ अधिक समझते होंगे। इसलिए उनको ऐसे तमाम राजकीय और शासकीय इंतजाम खत्म करने का माहौल बनाना चाहिए जो कि जनता के पैसों पर ही किए जाते हैं। (Daily Chhattisgarh)

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 23 मई - विश्व कछुआ दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. वो देश के प्रथम नागरिक हैं वो जिस राह पर चलेंगे काफ़िला उनके पीछे हो लेगा।
    हमें राष्ट्रपति पर गर्व है।
    वो इस पद की गरिमा और सम्मान की रक्षा कर रहें है।

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