कर्नाटक का शपथग्रहण सत्ता का नहीं, विपक्ष का शपथग्रहण लग रहा था...

संपादकीय
24 मई 2018


कल कर्नाटक में कांगे्रस-जेडीएस गठबंधन सरकार के शपथग्रहण को देखें तो ऐसा लगता है कि मानो यह नई सत्ता का शपथग्रहण नहीं हो रहा है, नए विपक्ष का शपथग्रहण हो रहा है। जगह तो बेंगलुरू थी, लेकिन नजारा देश की राजधानी जैसा था। दर्जनभर विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने जिस तरह हाथ मिलाया, और जिस अंदाज में एक-दूसरे से शायद पहली बार ही इस तरह बात की, वह भारतीय चुनावी राजनीति में एक नया मोड़ है। हमने दो-चार दिन पहले ही इसी जगह पर लिखा था कि कर्नाटक में गैरभाजपाई एकता भाजपा और एनडीए के लिए महज एक राज्य का नुकसान नहीं है। जिस तरह बिल्ली किसी घर से दूध पीकर चली जाती है, तो वह नुकसान महज दूध का नहीं होता है, वह बिल्ली के घर देख लेने का अधिक बड़ा नुकसान होता है। कर्नाटक में भाजपा ने अपनी गलती या अपने गलत काम से बाकी विपक्ष को उसकी ताकत के एहसास का एक अभूतपूर्व मौका दिया है और यह मौका एक दूसरे मौके पर भी सामने आया है, मोदी सरकार के चार बरस पूरे होने के मौके पर। 
और फिर मानो भाजपा-विरोधी पार्टियों को खुदकर अपनी इस अभूतपूर्व लेकिन हमेशा से छिपी हुई ताकत का एहसास न रहा हो, मीडिया ने चुनावी नतीजों के आंकड़ों से यह विश्लेषण करके सामने रख दिया कि किस तरह ये विपक्षी पार्टियां अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग गठबंधन करके भी दर्जन भर राज्यों की सैकड़ों लोकसभा सीटों पर नतीजे बदल सकती हैं। ऐसे किसी एक विश्लेषण में तो शायद लोकसभा में बहुमत के लिए जरूरी गिनती से भी सौ-पचास अधिक सीटें शिनाख्त करके बताई गई हैं। कल कर्नाटक में जिस उत्साह के साथ एक ही मंच पर ममता और वामपंथी थे, अखिलेश यादव और मायावती थे, कांगे्रस और लालू के बेटे थे, खुद सोनिया और राहुल थे, और वे जिस तरह के उत्साह में थे, उससे ऐसा लग रहा था कि कहानियों में कोई सोया हुआ विशाल मानव जागकर करवट बदल रहा हो।
कई बार किसी छोटे मौके का बेजा इस्तेमाल भी जरूरत से अधिक बड़ा नुकसान दे जाता है। भाजपा के साथ कर्नाटक में यही हुआ है। यह बात सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट के भीतर तक हर जगह अच्छी तरह स्थापित हो गई कि एक पुराने भाजपाई राज्यपाल ने अपने अधिकारों का खुला बेजा इस्तेमाल करते हुए एक नाजायज न्यौता भाजपा को सरकार बनाने के लिए दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार के वकील को फटकार लगाने के साथ राज्यपाल के शक्तिपरीक्षण के वक्त को भी बदल दिया, और एक संवैधानिक बेईमानी खारिज कर दी। इससे एक लोकतांत्रिक बेइंसाफी तो टली ही, लेकिन उसके साथ-साथ गैरभाजपा, गैरएनडीए पार्टियां एक नए उत्साह में भी आग गईं। आज देश के आम चुनाव के साल भर पहले, और कई राज्यों के आमसभा चुनावों के बस कुछ ही महीने पहले कांगे्रस सहित देश की दर्जन भर पार्टियों को एका करने का एक ऐसा मौका कर्नाटक ने दे दिया है। लोगों को याद होगा कि आपातकाल के दौरान जब कांगे्रस ने तमाम विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया था, तो जेल में कृष्ण के जन्म की तरह जनता पार्टी का जन्म हुआ था, और इस नवजात ने पहली बार नेहरू की बेटी को हरा दिया था। सामान्य जीवन की एक सहज समझदारी यह कहती है कि बिना वजह लोगों को घेरकर मारते हुए किसी कोने में इस तरह नहीं लाना चाहिए कि वे एक होकर पलटवार करें। (Daily Chhattisgarh)

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