...सार्वजनिक चुनौतियों का सिलसिला एक अच्छी बात

संपादकीय
25 मई 2018


सार्वजनिक जीवन में किसी बात की शुरूआत चाहे किसी एक सीमित मकसद से हो, लेकिन वह आगे बढ़ती है तो फिर नए-नए मकसद तलाश लेती है। अब जैसे चार दिन पहले केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री और ओलंपिक विजेता राज्यवर्धन राठौर ने सोशल मीडिया पर अपने एक फिटनेस वीडियो के साथ एक चुनौती डाली, और दूसरे लोगों से कहा कि वे भी अपने वीडियो पोस्ट करें। उन्होंने जिन लोगों को यह चुनौती दी थी, उनमें से एक विराट कोहली ने अपनी फिटनेस-तस्वीरें डालकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपना वीडियो पोस्ट करने कहा है। दुनिया में जगह-जगह समय-समय पर ऐसा होता है और लोगों को याद होगा कि समाजसेवा के लिए पैसे जुटाने को पश्चिम के देशों में एक वक्त आईस-बकेट चैलेंज भी चला था जिसमें दान जुटाने के लिए लोग दूसरों पर बर्फ और पानी की बाल्टी पलटते थे, और दूसरों को इसकी चुनौती भी देते थे। इस तरह से जुटा हुआ दान समाज के काम आता था। अब राज्यवर्धन राठौर से होते हुए विराट कोहली के बाद अब यह नरेन्द्र मोदी तक पहुंच आया। 
लेकिन राहुल गांधी ने इसके मजे लेते हुए नरेन्द्र मोदी के लिए पोस्ट किया है कि वे उन्हें पेट्रोल-डीजल सस्ता करने की चुनौती देते हैं। अब अगर सोचा जाए तो ऐसी चुनौती हर सार्वजनिक व्यक्ति को दी जा सकती है जिससे उनकी कोई कमजोरी या मजबूरी उजागर होने लगे। कल के दिन हो सकता है कोई राहुल गांधी को यह चुनौती दे कि वे अपने कुनबे से परे किसी को अध्यक्ष बनाकर दिखाएं। कोई और किसी दूसरे नेता को गाडिय़ों का काफिला छोटा करने की चुनौती दे सकते हैं, कोई यह चुनौती दे सकते हैं कि लोग अपने सरकारी बंगलों में लगे हुए एयरकंडीशनों की गिनती घटाएं। अरबपति सांसदों को लोग चुनौती दे सकते हैं कि वे संसद से मिलने वाले वेतन और भत्ते छोड़ें। जिसको जरूरत न हो, वे सरकारी खजाने पर बोझ न बनें। अब जैसे छत्तीसगढ़ में ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव की अपने राजघराने की दौलत सैकड़ों करोड़ रूपए उन्हीं की घोषित की हुई है। ऐसे में उन्हें कोई भी सरकारी सहूलियत क्यों लेना चाहिए? तो हो सकता है कल के दिन सोशल मीडिया पर देश के ऐसे संपन्न सांसद-विधायकों के बारे में ऐसा कोई अभियान छिड़ जाए। 
लोकतंत्र में शिष्टाचार की सीमा में ऐसे कई अभियान छिडऩे भी चाहिए। जो नेता अंग्रेजी भाषा के खिलाफ हैं, उनसे पूछना चाहिए कि उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल-कॉलेज में तो नहीं जाते? जो जनता के पैसों पर इलाज कराते हैं, उनके लिए सवालों का अभियान छिडऩा चाहिए कि वे सरकारी अस्पताल के बजाय निजी अस्पताल क्यों जाते हैं? यह सार्वजनिक जीवन में एक नए किस्म की जवाबदेही का सिलसिला है। विराट कोहली की चुनौती के जवाब में मोदी ने जब यह लिखा कि वे जल्द ही अपना फिटनेस-वीडियो पोस्ट करेंगे, तो लोगों ने मजा लेते हुए यह लिखा कि लोगों को अपनी डिग्री के साथ अपनी फोटो पोस्ट करना चाहिए, और दूसरों से भी ऐसी मांग करनी चाहिए, और उससे शायद नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी जैसे लोगों का डिग्री का विवाद खत्म भी हो जाएगा। 
फिटनेस की चुनौती तो इसलिए भी ठीक है कि लोग अपने आसपास के लोगों को देखकर भी अपनी सेहत का ख्याल रखना शुरू करते हैं। एक के देखादेखी दूसरे भी सैर पर निकलते हैं, कसरत करते हैं। आसपास के लोगों से महज बुरी आदतें नहीं सीखी जातीं, कई अच्छी बातें भी सीखी जाती हैं। इसलिए फिटनेस की चुनौती का यह सिलसिला तो अच्छा है, लेकिन इसका विस्तार बाकी दायरों तक भी होना चाहिए। आज ही किसी ने सोशल मीडिया पर मोदी की एक ट्वीट दुबारा पोस्ट की है जिसमेें उन्होंने अमरीका की एक स्कूल में गोलीबारी में हुई मौतों पर अफसोस जाहिर किया था। उन्हें चुनौती दी गई है कि वे तमिलनाडू में दो दिन पहले पुलिस गोली से मारे गए दर्जन भर से अधिक कारखाना-विरोधियों के लिए भी हमदर्दी की ट्वीट करें। अब सोशल मीडिया की वजह से लोगों की सार्वजनिक जवाबदेही पहले के मुकाबले अधिक है, और यह बढ़ती चली जानी चाहिए। ऐसा होने पर लोगों की चुप्पी भी सिर चढ़कर बोलने लगेगी।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन रास बिहारी बोस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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