मोहब्बत जिंदाबाद...

संपादकीय
28 मई 2018


आज एक खबर है कि एक बहुत छोटी हिन्दू बच्ची को खून की जरूरत थी तो एक मुस्लिम नौजवान खून देने पहुंचा। वह रोजे पर था और भूखे पेट खून दिया नहीं जा सकता इसलिए डॉक्टरों ने उसे कुछ खाने कहा। उसने बच्ची की जान बचाने को रोजे से ऊपर माना और कुछ खाकर खून दिया। दो-चार दिन पहले एक और जगह ऐसी ही एक घटना सामने आई थी। उसमें भी एक मुस्लिम नौजवान ने एक हिन्दू जिंदगी बचाने के लिए रोजा तोड़कर खून दिया था। आज ही एक दूसरी खबर है कि पंजाब के एक गांव में एक बहुत पुरानी मस्जिद है और बगल के गुरुद्वारे का ग्रंथी ही मस्जिद की देखरेख करता है। जबकि यह मस्जिद भारत पर हमला करने वाले मुगलों के वक्त की है, और पंजाब के सिखों ने भारत-पाक विभाजन के वक्त बड़े पैमाने पर सिख-मुस्लिम हिंसा देखी हुई है। इसके बावजूद आज भी पंजाब और दूसरी जगहों पर से ऐसी तस्वीरें आती हैं कि कहीं गुरुद्वारों को बारिश के वक्त नमाज के लिए खोल दिया गया तो कहीं पंजाब के सिख समाजसेवी जम्मू के रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी शिविरों में लोगों का ख्याल रख रहे हैं।
आज देश में बड़े-बड़े लोग जिस बड़े पैमाने पर नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि हिन्दुस्तान आज अगर बाकी है तो वह आम लोगों की वजह से, खास लोगों की वजह से नहीं है। खास लोगों के खास मकसद होते हैं, उनकी खास रणनीति होती है, खास मंजिलें होती हैं। लेकिन आम लोग जब तक खास लोगों के झांसे में न आ जाएं, वे इंसान बने रहते हैं। वे न भक्त बनते हैं, न आतंकी बनते हैं, न हिंसक बनते हैं। आज अगर कुछ दिनों के लिए मीडिया और सोशल मीडिया बंद हो जाए, तो आम लोगों के बीच नफरत का फैलना और उनका नफरत की गिरफ्त में आना स्थगित हो जाएगा, और धीरे-धीरे घट जाएगा। आज जाने-माने चेहरे, तरह-तरह के ओहदों पर बैठे हुए लोग, अपनी सारी ताकत लगा रहे हैं कि कहीं कोई हिन्दू इफ्तार की दावत न कर ले, कहीं कोई मुस्लिम महिला अपने बुर्के के साथ चलती हुई अपने बच्चे को फैंसी ड्रेस में कृष्ण न बना ले, कहीं ईसाई और हिन्दू मिलकर साथ न रह लें, और तो और जिन दलितों को हिन्दू धर्म के भीतर गिनकर हिन्दुओं की आबादी को अधिक बताया जाता है, उन दलितों को भी ऊंची कही और समझी जाने वाली हिन्दू जातियों के हाथों मारने का इंतजाम करवाया जाता है, उसे बचाया जाता है, उसे बढ़ाया जाता है। 
लेकिन हम बार-बार गली-मोहल्लों में ऐसी मिसालें देखते हैं कि लोग किस तरह एक-दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं, कहीं कोई मुस्लिम नौजवान गणेशोत्सव समिति का अध्यक्ष रहता है, और रोज प्रसाद का इंतजाम करता है, रोज आरती करता है, और घर-घर घूमकर पंडाल सजाने के लिए सामान भी मांगता है। बंगाल अगर देखें, तो वहां दुर्गा पूजा में अनगिनत मुस्लिम जुड़े रहते हैं, और शायद ही किसी के दिल-दिमाग में धर्म का भेदभाव आड़े आता हो। ऐसे में आज मीडिया और सोशल मीडिया इन दोनों में जो भी जिम्मेदार लोग बचे हैं, उनकी यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वे सकारात्मक खबरों को भी नफरत के बीच सांस लेने की थोड़ी सी जगह दे दें। सकारात्मक खबरें कम लुभावनी होती हैं, कम आकर्षक होती हैं, और लोगों का ध्यान कम खींचती हैं। यह बात जाहिर है कि मोहब्बत लोगों को उस रफ्तार से नहीं जोड़ पाती जिस रफ्तार से नफरत जोड़ लेती है। किसी नेक काम के लिए श्रमदान करने कहा जाए, तो कुआं खोदने के लिए सौ लोग मुश्किल से जुटें, लेकिन अगर किसी दूसरे धर्म या जाति के खिलाफ, या फिर अपने खुद के धर्म, और अपनी जाति से जुड़ी हुई किसी फिल्म के खिलाफ भीड़ जुटनी हो, तो लोग अपना घर-बार बंद करके भी उस नफरती हिंसा में एकजुट हो जाते हैं। आज लोगों को मीडिया और सोशल मीडिया, दोनों जगह यह अहसास कराने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी समाज में अधिकतर लोग ऐसे हैं जो हर किसी का लहू एक बराबर मानते हैं, और एक-दूसरे को देने को तैयार खड़े रहते हैं, न कि लेने को। यह भी समझने की जरूरत है कि समाज में नफरत और हिंसा जितना दिखते हैं, उतना रहते नहीं हैं। इसलिए अमन-पसंद लोगों को इस बात को खुलकर कहना भी चाहिए कि नफरत की तमाम कोशिशों के बीच भी इंसानी मोहब्बत जिंदा रहेगी।  (Daily Chhattisgarh)

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