प्रतिभा को सलाम और लोकतंत्र को चुनौती...

संपादकीय
29 मई 2018


हर बड़े इम्तिहान के बाद कोई न कोई ऐसी दिल छू लेने वाली खबर आती है कि जिसे स्कूल-कॉलेज के हर बच्चों के मां-बाप जरूर ही पढ़ते होंगे। आज की खबर है कि गुजरात में दसवीं बोर्ड में एक ऑटो रिक्शा चालक की बेटी ने 98 फीसदी से भी अधिक नंबर पाए हैं। इस मुस्लिम ऑटो ड्राइवर के साथ बेटी की तस्वीर देखने लायक है। एक तो गरीब परिवार, ऊपर से मुस्लिम परिवार जहां कि लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई कुछ पिछड़ी हुई भी रहती है। ऐसे में विपरीत परिस्थितियों में एक बच्ची ऐसी कामयाबी पाती है, तो पूरे देश का सीना खुशी से फूल उठता है। इसी तरह देश की सबसे बड़ी परीक्षाएं जब नौकरियां तय करती हैं, तब भी कहीं मजदूर की बेटी तो कहीं किसी रिक्शेवाले का बेटा आईएएस बनते दिखते हैं। 
इस बात पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि जैसे
वंचित तबकों के बच्चे ऐसी कामयाबी पाते हैं, उन्हें देखकर लगता है कि अगर इन्हें इम्तिहान की तैयारी के बराबरी के अवसर मिलते, तो ये बच्चे जाने कहां पहुंचते। आज देश में हालात यह है कि हर किस्म के मुकाबले में ताकतवर तबका अपने बच्चों को कामयाबी तक पहुंचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर देता है। राजस्थान के कोटा में परीक्षा की तैयारी के कारखाने चलते हैं, और एक-एक बरस पर मां-बाप 5-10 लाख रुपए खर्च करते हैं, और बच्चे आईआईटी या ऐसे दूसरे संस्थानों में पहुंचते हैं। दूसरी तरफ जो बच्चे गरीब परिवारों के रहते हैं, उन्हें बिजली भी नसीब नहीं होती, कोई कहीं मुफ्त के इंटरनेट का इस्तेमाल करके केरल के कुली की तरह कामयाब होते हैं, तो कोई बिना किताबें खरीदे किसी और परीक्षा में चुने जाते हैं। इससे एक बात साफ लगती है कि प्रतिभा किसी जाति या सम्पन्नता, शहर या शिक्षित परिवार की मोहताज नहीं होती है। ऐसी प्रतिभा को अगर बराबरी का मौका मिले, थोड़ी सी और अधिक सहूलियतें मिल जाएं, तो देश की तस्वीर बदल सकती है। 
हम इम्तिहानों से अलग हटकर बात करें, तो संसद और विधानसभा के चुनावों से लेकर म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनावों तक पैसों का जो बोलबाला रहता है, उसमें किसी गरीब की जीत की संभावना लगभग शून्य रहती है। ऐसे में अगर बराबरी के हालात पैदा न किए जा सकें, तो उसका मतलब लोकतंत्र की बहुत बुरी नाकामयाबी ही होता है। आज यह बात जगह-जगह साफ होती है कि चुनावी मुकाबले दौलतमंद पार्टियों के दौलतमंद लोगों के बीच होते हैं। इनमें वोटर के पास महज किसी एक दौलत को चुनने की पूरी आजादी रहती है। अब जब संसद और विधानसभाएं करोड़पतियों से भर जाने के बाद अरबपतियों से भर रही हैं, तब लोकतंत्र की शक्ल और उसकी आत्मा दोनों का बदलना तो तय है ही।
स्कूल-कॉलेज की परीक्षाओं से लेकर नौकरियों तक अगर गरीब और वंचित, दबे-कुचले तबकों के लोगों का आना बढ़ेगा नहीं, तो जिस संपन्न तबके के बच्चे महंगी तैयारी के बाद सरकारी नौकरियों तक पहुंचते हैं, उनकी हिंदुस्तानी जमीनी हकीकत की समझ तो बड़ी ही सीमित और कमजोर रहना तय रहता है। हमारा मानना है कि भारत के स्कूल-कॉलेज और यहां की हर किस्म की सरकारी नौकरियों के तमाम मुकाबले ऐसे ही होने चाहिए जिसमें हर बच्चे को तैयारी का बराबरी का हक मिल सके। हो सकता है कि ऐसा करने के लिए कोचिंग कारखानों को बंद भी करना पड़े, या फिर गरीबों के लिए भी बराबरी की कोचिंग शुरू करना पड़े। छत्तीसगढ़ में कुछ जिलों में ऐसा शुरू हुआ भी है। गरीबी के बीच से उठ खड़ी होती हुई प्रतिभा को सलाम, और लोकतंत्र को चुनौती कि वह बराबरी के मौके देकर दिखाए। (Daily Chhattisgarh)

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