दिल्ली के इस बाईपास से पूरा देश सबक ले सकता है

संपादकीय
30 मई 2018


दिल्ली से मेरठ के लिए देश का सबसे चौड़ा एक्सप्रेस हाईवे अभी पूरा बना नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसके एक हिस्से का उद्घाटन किया है। हो सकता है कि इस उद्घाटन का उत्तरप्रदेश सहित कुछ और जगहों पर हो रहे उपचुनावों से लेना-देना रहा हो, लेकिन उससे परे एक दूसरी दिलचस्प बात भी सामने आई है। इस एक एक्सप्रेस हाईवे की वजह से दिल्ली शहर में घुसने वाली ट्रकों में इतनी कमी आ गई है कि सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि पहले ही दिन पचास हजार ट्रकें कम घुसीं। ये ट्रकें दिल्ली शहर के बाहर से ही मेरठ की तरफ मुड़ गईं, और दिल्ली की भयानक जहरीली हो चुकी प्रदूषित हवा के प्रदूषण स्तर में इससे बड़ी गिरावट दर्ज हुई। 
सड़कों का जो ढांचा पिछले दशकों में देश में बढ़ा है उससे अपार फायदा हुआ है। लोगों का सफर का वक्त घटा, कारखानों से निकलकर बाजार तक पहुंचने वाले सामानों का वक्त कम हुआ, इससे आर्थिक गतिविधि तेज हुई। इसके अलावा जो गाडिय़ां देश के ट्रांसपोर्ट ढांचे का हिस्सा हैं, उन गाडिय़ों का इस्तेमाल तेज हुआ जिससे उनके मालिकों का नफा बढ़ा। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और बातें भी हुईं। गांव-गांव से होकर गुजरने वाली भारी गाडिय़ों को अब बड़े-बड़े फ्लाईओवर और ओवरब्रिज मिल गए, जिससे इन गांवों के इंसानों और जानवरों का मरना भी घटा। और अभी जैसा कि दिल्ली के इस मामले से सामने आया है, प्रदूषण भी घटा। जब रास्ता जाम रहता है, तो खड़े-खड़े धुआं छोडऩे वाली गाडिय़ां पूरे इलाके को प्रदूषित करती हैं। इसलिए सड़कों का ढांचा चाहे वह महानगरों के बीच में हो, चाहे वह गांव-गांव तक बिखरा हुआ हो, वह देश की आर्थिक बेहतरी के लिए एक बड़ा योगदान रहता है, और भारत में पिछले दशकों में इस मोर्चे पर बड़ी कामयाबी हासिल की है। 
चाहे यूपीए सरकार रही हो, या उसके पहले की अटल सरकार, सभी सरकारों ने सड़कों के ढांचे को बढ़ाने के महत्व को समझा, और जैसा कि किसी भी सरकारी निर्माण में होता है, नेता-अफसर-ठेकेदार, सभी की खासी कमाई भी होती है, इसलिए ऐसे बड़े निर्माण कार्य करवाने में सभी की दिलचस्पी रहती है। लेकिन भ्रष्टाचार की संभावना को हम काम न करवाने का तर्क नहीं मानते। अगर भ्रष्टाचार होना तय है तो सारे काम ही रोक दिए जाएं यह बात भी ठीक नहीं है। छत्तीसगढ़ में एक-दो ऐसे वक्त देखे हैं जब हजारों करोड़ के सड़कों के काम को कुछ अफसरों ने इसलिए रोक दिया था कि उनके पीछे भारी भ्रष्टाचार की साजिश का उनको पता लग गया था। भ्रष्टाचार से निपटने के कुछ और तरीके हो सकते हैं, लेकिन सड़कों का जाल जितना बढ़ सके, उतना ही देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। 
इस मुद्दे पर लिखते हुए छत्तीसगढ़ की राजधानी का खास जिक्र जरूरी है। इस शहर के आरपार एक मुर्दा नहर रह गई थी जिससे कोई पानी कहीं आता-जाता नहीं था। और ऐसी बंजर नहर पर पूरी तरह से अवैध झोपड़पट्टियां बस गई थीं। कुछ बरस पहले इस नहर की जगह एक सड़क बनाने की सोची गई, और इससे शहर के आरपार एक इतनी बड़ी और इतनी प्रमुख सड़क बन गई है जो कम से कम दो दर्जन सड़कों को चीरते हुए जाती है, और इसने लोगों की जिंदगी आसान कर दी है। शहरों के बाहर तो रिंग रोड या बाईपास सभी जगह बन जाते हैं, लेकिन यह रायपुर शहर के भीतर इतना बड़ा बाईपास बन गया है जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकते थे। अब शहर के बीच से एक दर्जन सड़कों को क्रास करते हुए जाने वाली छोटी लाईन रेल पटरी की जगह सड़क बन रही है। जिन लोगों को अंदाज नहीं है, उन्हें भी यह दूसरी सड़क चालू हो जाने के बाद समझ आएगा कि किस तरह इस शहर को अगले सौ बरस के लिए मानो लहू दौड़ाने वाली धमनियां मिल गई हैं जिनसे एक नई जिंदगी ही इस शहर के ढांचे को मिल रही है। 
दिल्ली के एक बाईपास का फायदा देखकर देश के बाकी सभी प्रदूषित शहरों को तेजी से यह सोचना चाहिए कि वे बड़ी गाडिय़ों को अपने शहर के भीतर आने देने से कैसा रोकें और कैसे इसके लिए बाहर-बाहर रास्ते बनाएं। इंसानों को बचाने के लिए यही एक जरिया है, और इसी से प्रदूषण घटेगा।  (Daily Chhattisgarh)

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