बच्चों को भीड़ बनाना जुर्म के दर्जे में आए

संपादकीय
5 मई 2018


 उत्तरप्रदेश में एक-एक सरकारी स्कूल में अफसरों ने बच्चों को मंत्री के इंतजार में सुबह से शाम तक रोककर रखा। भूखे बच्चों की बुरी हालत पर एक समाचार चैनल की रिपोर्ट सामने आई है, और वहां की महिला शिक्षा मंत्री इसमें कुछ भी गलत नहीं पा रही हैं। ऐसी खबर हर कुछ हफ्तों में देश के अलग-अलग हिस्सों से आती हैं, और ऐसे अधिकतर मामले तो इसलिए खबर नहीं बन पाते हैं क्योंकि स्कूल छोटी सी जगह होती है, और वहां पर मीडिया के कैमरे आमतौर पर वारदात के बाद ही पहुंचते हैं, भूखे-प्यासे बच्चों की खबर भी बाहर नहीं निकल पातीं। 
देश में अलग-अलग प्रदेशों में और राष्ट्रीय स्तर पर भी मानवाधिकार आयोग सहित अदालतें और सरकारों के ऐसे आदेश लंबे समय से चले आ रहे हैं कि किसी भी मंत्री के कार्यक्रम के लिए बच्चों को इंतजार न करवाया जाए। बहुत से मामलों में भूख में खड़े कर दिए गए बच्चे बेहोश होकर गिरते रहते हैं, और मंत्रियों को अपने चापलूसों से घिरे हुए इतनी फुर्सत तो रहती नहीं है कि वे वक्त रहते किसी कार्यक्रम में पहुंचें। हमारा ख्याल है कि अदालतों को एक बार फिर ऐसे मामलों में दखल देना होगा और यह साफ करना होगा कि किसी भी नेता या अफसर के लिए, या किसी मुख्य अतिथि के लिए बच्चों से ऐसा नाजायज इंतजार न करवाया जाए। बच्चों के कार्यक्रम अगर होने हैं तो वे समय पर शुरू हो जाएं, और उनके खत्म होने का समय भी तय रहना चाहिए। 
आज भारत में किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में उसके शुरू होने का एक समय तो तय किया जाता है, लेकिन घंटों लेट पहुंचने वाले मंत्रियों के चलते ऐसे कार्यक्रम घंटों लेट खत्म होते हैं, और चूंकि खत्म होने का कोई समय तय नहीं किया जाता है, इसलिए उसमें शामिल स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे भी खड़े या बैठे रह जाते हैं। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म करना चाहिए। आज ही एक दूसरी खबर यह है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने दर्जन भर लोगों को ही पुरस्कार दिए, क्योंकि राष्ट्रपति भवन की तरफ से कार्यक्रम के लिए उतना ही समय रखा गया था। इसके बाद जब सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने बाकी लोगों को पुरस्कार देना शुरू किया, तो दर्जनों लोगों ने इसका बहिष्कार कर दिया। वे राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार पाने की परंपरा टूटने से खफा थे। हम तो चूंकि सरकारी सम्मानों के ही खिलाफ रहते हैं, इसलिए ऐसे सम्मान देते हुए किसका सम्मान हो रहा है, और किसका अपमान हो रहा है, उस पर कुछ कहना जरूरी नहीं समझते। लेकिन इस बात की चर्चा यहां पर इसलिए जरूरी है कि जिस तरह राष्ट्रपति के कार्यक्रम समय पर शुरू होकर समय पर खत्म हो जाते हैं, ठीक वैसी ही पाबंदी बच्चों के तमाम कार्यक्रमों पर रहनी चाहिए, और किसी भी बच्चे को किसी भी नेता या मुख्य अतिथि का इंतजार नहीं करना चाहिए। 
यह मामला भले ही उत्तरप्रदेश में हुआ है, लेकिन बाकी प्रदेशों को भी इससे नसीहत लेनी चाहिए, और अपने-अपने प्रदेश में अफसरों के लिए यह सख्त आदेश निकलने चाहिए कि बच्चों को किसी कार्यक्रम के लिए न जुटाया जाए, बच्चों के कार्यक्रम लेट न हो, उनके लिए पानी और खाने का पर्याप्त इंतजाम हों, उन्हें किसी भी हालत में धूप, बारिश, या ठंड में खड़ा न रखा जाए। अगर ऐसा इंतजाम नहीं हो सकता है, तो किसी भी बच्चे को किसी कार्यक्रम में न लाया जाए। इसके साथ-साथ आज जिस तरह से बच्चों के साथ सेक्स-अपराध हो रहे हैं, तो ऐसे कार्यक्रम करने वाले स्कूलों और अफसरों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर बच्चे का आना और जाना सुरक्षित हो। अगर भारत के नागरिकों को अपने बचपन से ही नेताओं से चिढ़ होनी शुरू हो जाए, तो इससे आगे का नुकसान लोकतंत्र का ही होगा। बच्चों को भीड़ बनाना जुर्म के दर्जे में लाना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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