असहमति और कीर्तन

23 अप्रैल 2018

पिछले कुछ समय से रोज सुबह घंटा भर पैदल चलते हुए संगीत सुनने की आदत सी हो गई थी। लेकिन फोन पर जितना संगीत जुटाने का वक्त मिला था, वह संगीत सुनते-सुनते तकरीबन याद सा हो चला था, और उसे सुनना अब कुछ वैसा ही हो गया था जैसा कि किसी एक दायरे में रोज एक ही वक्त एक ही तरफ से एक ही रफ्तार से घूमना होता है। मतलब यह कि वह संगीत सुनाई पडऩा बंद सा हो गया था, जैसे कि अपनी सांस का एहसास होना बंद हो जाता है। ऐसे में संगीत से परे मार्टिन लूथरकिंग सरीखे कुछ महान लोगों के कुछ ऐतिहासिक भाषण फोन पर डाउनलोड किए, जे.कृष्णमूर्ति जैसे कुछ दार्शनिक-विचारकों की बातों को डाउनलोड किया, और अमरीकी चिंतक-विचारक नोम चॉम्स्की के कुछ भाषण भी डाउनलोड किए। और उनको सुनना एक ही किस्म के संगीत को सुनने के बाद एक राहत सरीखा था।
अमरीका में नोम चॉम्स्की अमरीकी फौजी साजिशों से लेकर तमाम अलोकतांत्रिक चीजों के कटु आलोचक हैं। भारत में वे होते तो अब तक लाखों बार उन्हें देशद्रोही करार दिया जा चुका होता, और उनके मुंह पर जाने कितनी बार कालिख पोती जा चुकी होती। देशभक्ति के नारे लगाने से इंकार करने पर, राष्ट्रगीत गाने से इंकार करने पर उनकी किताबों के बहिष्कार की घोषणा भी हो जाती, और जिन विश्वविद्यालयों में उनके भाषण होते वहां पहले तो उनके खिलाफ प्रदर्शन होते, और फिर विश्वविद्यालयों में उन्हें बुलाना अघोषित रूप से बंद हो चुका होता।
दुनिया की बहुत से हिस्सों पर हमलों के बावजूद अमरीका अपने भीतर जिंदगी के अलग-अलग हिस्सों में एक जिंदा लोकतंत्र में जीता है, और जिस तरह बंदर से इंसान बने, उसी तरह अमरीकी लोकतंत्र भी अपनी शक्ल और अक्ल को लगातार बदलते चल रहा है। और इस लोकतंत्र, कम से कम देश के भीतर का आंतरिक लोकतंत्र जिंदा रहने के पीछे की कई वजहों में से एक वजह असहमति को भी जिंदा रहने देने की इजाजत रही है।
जब किसी सोच से असहमति को राष्ट्रद्रोह मान लिया जाए, या कि पाकिस्तान की तरह उसे ईशनिंदा नाम लिया जाए, उसे विदेशी संस्कृति का प्रभाव मान लिया जाए, तो फिर वह बुनियादी सोच कमजोर और खोखली होने लगती है। जिस तरह किसी पौधे के गमले की मिट्टी को अगर बीच-बीच में हटाकर जड़ों को छांटा न जाए, मिट्टी को ऊपर-नीचे न किया जाए, तो धीरे-धीरे उस पौधे का बढऩा धीमा होने लगता है, ठीक उसी तरह का हाल सोच का होता। अगर सोच को भीतर और बाहर से चुनौतियां न मिलें, तो फिर उस सोच पर वक्त काई जमाना शुरू कर देता है। फिर जब यह सोच एक मौजूदा हकीकत का सामना न करते हुए, एक नामौजूद और महज सोचे हुए इतिहास की ठंडी छांह में राहत पाने लगती है, तो फिर उसका तपकर सोना होने की संभावना भी खत्म हो जाती है।
आज हिन्दुस्तान में आम सोच के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। वह असहमति की आंच को बर्दाश्त करने लायक भी हो, तो भी वह उसे झेलना नहीं चाहती। नतीजा यह हो रहा है कि उस सोच ने वर्तमान के सवालों के कटघरे से निकलकर, भागकर, भूतकाल के एक अपने ही गढ़े हुए घने पेड़ की छांह में बैठना तय कर लिया है, और सवालिया लोगों को देश का गद्दार करार देना शुरू कर दिया है।
अमरीका में नोम चॉम्स्की जैसे विचारक देश की नीतियों, खासकर हमलावर नीतियों के खिलाफ हमलावर तेवरों के साथ बोलने का हौसला रखते हैं, क्योंकि हवा में बर्दाश्त है। उस हवा में नफरत के लिए भी बर्दाश्त है, और मोहब्बत के लिए भी। फिर यह नफरत अपने देश की कुछ नीतियों, और कुछ तौर-तरीकों से भी हो सकती है, और यह मोहब्बत कुछ ऐसे देशों और उनके ऐसे लोगों से भी हो सकती है जो कि बेगुनाह होते हुए भी अमरीकी साजिशों और हमलों से लहूलुहान हैं। इसे गद्दारी नहीं कहा जाता क्योंकि हवा में असहमति के लिए बर्दाश्त बाकी है, बर्दाश्त बढ़ते चल रहा है। और जहां-जहां पर असहमति के लिए सहनशीलता हो, वहीं-वहीं पर लोकतांत्रिक मूल्यों और लोकतंत्र में विकास होता है। जहां पर असहमति को आम सोच में बदलकर उससे कीर्तन करवाने की कोशिश होती है, वहां पर कट्टरता के शोरगुल में जीने वाली सोच की जीत होती तो दिखती है, लेकिन होती नहीं है।
लोकतंत्र बहुमत का नाम नहीं है। बहुमत तो एक किस्म का बाहुबल है, और महज बाहुबल से किसी मत का तय होना तो जंगल के कानून सरीखी बात है जहां पर सबसे ताकतवर के जिंदा रहने की सबसे अधिक संभावना होती है। लोकतंत्र बहुमत के बाहुबल से परे विचारों की विविधता का नाम है, असहमति के लिए भी सहमत होने का नाम है, जहां पर लोग डिसएग्रीमेंट के साथ भी साथ रहने के लिए एग्रीमेंट को बेहतर समझते हैं, वही लोकतंत्र का विकास है, वही सभ्यता का विकास है।
किसी भी सोच और उस सोच के साथ जीने वाले लोग, इन सबका आगे बढऩा दूसरी सोच, और उस दूसरी सोच के साथ जीने वाले लोगों के साथ एक निरंतर अंतरसंबंध रखकर ही हो सकता है। कीर्तन में सिर तो बहुत हिलते हैं, सुर और ताल के साथ एक साथ हिलते हैं, ईश्वरों की स्तुति में जयकारों के साथ भी हिलते हैं, लेकिन हिलते हुए ऐसे सिरों में खोपड़ी के बाहर ही तालमेल होता है, क्योंकि खोपड़ी के भीतर तो कुछ होता नहीं है।
जो लोग समझदार और कामयाब दोनों ही होते हैं, उनमें से अधिकतर अपनी जिंदगी के दायरे में आने वाली असहमति का सामना करके अपनी ताकत बढ़ाते चलते हैं। यह कुछ उसी किस्म का होता है कि जिस तरह कसरत करने वाले लोग वजन उठाकर या कोई दबाव झेलकर अपने ही बाहुबल को बढ़ा पाते हैं, ऐसा करते हुए उनकी कुछ ताकत खर्च होते तो दिखती है, लेकिन ऐसा करके वे हकीकत में अधिक ताकत पाते ही हैं, खर्चते नहीं हैं। इसी तरह असहमति को सुनना, समझना, उस पर सोचना, और अपनी सोच को उस कसौटी पर कसना, इन सबसे लोग अपनी सोच को बेहतर बना सकते हैं, और उसे आगे भी बढ़ा सकते हैं।
दुनिया में किस सोच, किस समाज, और किस लोकतंत्र के आगे बढऩे की कितनी संभावना है, इसे परखने का एक बड़ा आसान तरीका है कि उनमें असहमति के लिए कितना बर्दाश्त है। यह समझ लेने की जरूरत है कि कीर्तन से सिवाय शोरगुल के, सिवाय ध्वनि प्रदूषण के और कुछ भी नहीं बढ़ता। और कीर्तन सिर्फ धार्मिक नहीं होता, वह सामाजिक और राजनीतिक भी हो सकता है, और कारोबारी भी हो सकता है। लेकिन कीर्तन से कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती, जिसे विचार-मंथन कहा जाता है, उसी से कमसमझ लोग भी समझदार हो सकते हैं, और कोई सोच भी परिपक्व हो सकती है। (Daily Chhattisgarh)

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