नौजवानों के योरप दर्शन की तरह भारत दर्शन क्यों नहीं?

संपादकीय
6 मई 2018


योरप से एक अच्छी खबर आई है कि यूरोपीय संघ अपनी नौजवान पीढ़ी को बाकी देश देखने के लिए मुफ्त में ट्रेन टिकट देने जा रही है। योरप के देशों के बारे में सामान्य ज्ञान का एक मुकाबला होगा, और ऐसे ऑनलाईन मुकाबले में जीतने वाले तीस हजार नौजवानों को यूरोपीय रेल की मुफ्त टिकटें दी जाएंगी ताकि वे अड़ोस-पड़ोस के दूसरे देशों को देख सकें। अठारह साल के नौजवानों को एक महीने मुफ्त सफर का पास मिलेगा, और वे इससे चार देश घूम सकेंगे। इसे ईयू ने सांस्कृतिक पहचान में किया गया निवेश कहा है, और कहा है कि योरप लोगों के आपसी जुड़ाव और साझा भावनाओं पर टिका हुआ है, ऐसी पर्यटन-मदद से नौजवानों को अलग-अलग संस्कृतियों को देखने मिलेगा, और दूसरे इलाके के नौजवानों से मिलने का मौका भी मिलेगा। आज जब दुनिया के कुछ देशों में राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथी भावनाएं उभर रही हैं, तो इस अभियान को उससे मुकाबला करने वाला बताया जा रहा है। 
हम हिन्दुस्तान के संदर्भ में इस सोच को देखें तो याद पड़ता है कि बहुत से लोग इस देश को एक देश के भीतर बसा हुआ योरप कहते हैं। भारत के बहुत से प्रदेश योरप के देशों से बड़े हैं, और आबादी के मुताबिक कई लोगों ने भारत के प्रादेशिक नक्शे पर योरप के देश बिठाकर नक्शा बनाया भी है कि किस-किस प्रदेश की आबादी वहां के किस-किस देश के बराबर है। दूसरी तरफ अनेकता में एकता भारत की एक पुरानी पहचान भी रही है, और इसकी विविधता देखकर विदेशी सैलानी हैरान भी होते हैं। उत्तर-पूर्व से लेकर पश्चिम के गुजरात-राजस्थान तक, और उधर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक इस देश की विविधता देखते ही बनती है। रंग-रूप, पोशाक, बोली, खानपान, कला और रीति-रिवाज की ऐसी अपार विविधता शायद योरप में भी न हो। 
इस मुद्दे पर चर्चा का मकसद यह है कि सभ्य दुनिया एक-दूसरे की अच्छी बातों से खुद भी कई बातें सीखती है। योरप की इस पहल को देखकर लगता है कि क्या भारत में भी नौजवान पीढ़ी को ऐसा मौका सरकार की तरफ से मिल सकता है जिससे कि वे दूसरे प्रदेशों में जाकर वहां की संस्कृति देख सकें, वहां के लोगों से मिल सकें? आजादी के बाद से भारत में ऐसे सांस्कृतिक अंतरसंबंधों का महत्व बड़ी अच्छी तरह माना गया था। छत्तीसगढ़ के भिलाई इस्पात संयंत्र को देश का औद्योगिक तीर्थ कहने के पीछे महज वहां बनने वाले फौलाद की चर्चा नहीं थी, बल्कि भिलाई में देश के हर हिस्से से आकर काम करने वाले लोगों के बीच जो राष्ट्रीय एकता विकसित हुई थी, वह भी एक बड़ा योगदान था। आज छत्तीसगढ़ जैसे कुछ और भी राज्य देश में हैं जो कि अपनी बुजुर्गों को सरकारी खर्च पर तीर्थयात्रा पर भेजते हैं। अपने-अपने धर्म के तीर्थों से लोगों की धार्मिक भावना तो संतुष्ट हो सकती है, लेकिन उससे कोई सामाजिक योगदान नहीं मिल सकता। इस योजना की जगह, या इससे परे, एक ऐसी योजना बननी चाहिए जिसके तहत केन्द्र या राज्य सरकारें चुनिंदा नौजवानों को भारतीय रेल में मुफ्त सफर की सहूलियत देकर उनके प्रदेशों से दूर सैर पर भेजे। 
भारत में आबादी का पांच फीसदी हिस्सा भी शायद ऐसा न हो जो कि देश के पांच फीसदी हिस्से को भी देख पाता हो। अधिकतर लोग तो दो-तीन राज्यों से अधिक कुछ भी नहीं देख पाते, और इन दो-तीन राज्यों में भी बहुत सारा हिस्सा अनदेखा रह जाता है। छत्तीसगढ़ में सरकार ने पिछले करीब दो बरस से गांव-गांव से पंच-सरपंच को लाकर राजधानी रायपुर के महत्वपूर्ण ठिकानों को दिखाने और उनके बारे में समझाने की एक अनोखी योजना, 'हमर छत्तीसगढ़Ó, चला रखी है। अब तक शायद डेढ़ लाख लोग इसमें आ चुके हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा जैसे राजधानी से दूर बसे हुए इलाकों के नौजवानों को राजधानी देखने का मौका शायद ही मिलता हो, और फिर राजधानी के प्रदेश स्तर के असली विकास को देखने का मौका और भी नहीं मिलता। इसलिए राज्य सरकार को ऐसे आदिवासी इलाकों के कॉलेज छात्र-छात्राओं को इस योजना में शामिल करना चाहिए। अब किसी नई और बड़ी महत्वाकांक्षी योजना को शुरू करने का वक्त इस सरकार के पास मौजूदा कार्यकाल में नहीं रह गया है, लेकिन केन्द्र सरकार या दूसरी राज्य सरकारें भी ऐसा कर सकती हैं कि अपने नौजवानों को किसी पैमाने के तहत छांटकर उन्हें भारत भ्रमण पर भेजे। इससे लोगों में क्षेत्रीयता की उग्र भावना घटेगी, दूसरे धर्मों, दूसरी संस्कृतियों, और दूसरे लोगों के प्रति समझ और सहनशीलता बढ़ेगी। यह खर्च राष्ट्रीय एकता के लिए किया गया एक बहुत ही छोटा पूंजीनिवेश होगा, और उससे होने वाले फायदे असीमित रहेंगे। केन्द्र सरकार भी ऐसी कोई पहल कर सकती है, और राज्य सरकार भी अपने स्तर पर ऐसी योजना बना सकती हैं। छत्तीसगढ़ की 'हमर छत्तीसगढ़' योजना की तरह भारत की 'हमर भारत' योजना। और छत्तीसगढ़ में चुनाव कुछ महीने दूर हैं, और यहां के राजनीतिक दल भी अगर चाहें तो राष्ट्रीय एकता की ऐसी सोच को अपने घोषणा पत्र में शामिल कर सकते हैं।  (Daily Chhattisgarh)

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