...अपने को बेहतर बताने की कोशिश एक बहुत बड़ी हिंसा

संपादकीय
30 जून 2018


भारत में पिछले दस-बीस बरस की अखबारी कतरनों का विश्लेषण किया जाए तो यह समझ ही नहीं पड़ेगा कि जो नेता अभी कुछ बरस पहले तक विपक्ष में रहने पर कुछ और सोचते थे, कुछ और कहते थे, वे अब उसकी ठीक उल्टी बात क्यों कहने लगे हैं? फर्क महज इतना रहता है कि कल वे सत्ता में थे, और आज विपक्ष में है, या फिर इसके ठीक उल्टे, कल तक वे विपक्ष में थे, और आज सत्ता में है। अखबारी कतरनों में तलाश आसान नहीं होती थी, लेकिन आज इंटरनेट पर जो बात स्थाई रूप से ऑनलाईन बनी रहती है, उस पर तलाश भी पल भर का काम रहता है, और उसके सुबूत भी तुरंत सम्हाले जा सकते हैं। ऐसे हैरानी तब अधिक होती है जब स्विस बैंकों के कालेधन, या डीजल-पेट्रोल की महंगाई, या पाकिस्तान के साथ फौजी टकराव जैसे मुद्दों पर किसी एक नेता या पार्टी के बयानों में कुछ बरसों में आने वाले विरोधाभास के अलावा देश के भीतर बच्चियों या महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार को लेकर भी बयानों में विरोधाभास आ जाता है। इससे ऐसा लगता है कि क्या इंसानियत विपक्ष में रहते हुए रहती है, और सत्ता में आने पर वह कथित हैवानियत में तब्दील हो जाती है? हालांकि इस हैवानियत शब्द को इंसानियत से परे देखने का हमारा कोई इरादा नहीं है क्योंकि यह इंसानियत के भीतर का ही एक हिस्सा है, जिसे इंसान अपने आपको बेहतर बताने के लिए बाहर निकालकर रावण के पुतले की तरह खड़ा कर देते हैं, उसे कोसते हैं, पीटते हैं, और जलाते हैं। इंसानियत के भीतर ही हैवानियत बसी रहती है, और कभी इंसान उस पर काबू कर पाते हैं, और कभी वह बेकाबू होकर बलात्कार करने लगती है, शरीर से, या फिर महज जुबान से भी। 
आज जब एक प्रतिष्ठित और गंभीर, थॉमसन फाऊंडेशन की रिपोर्ट हिन्दुस्तान को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक देश करार दे रहा है, तो उसके विश्लेषण के तरीकों से लेकर उसकी नीयत तक, हर चीज का शक किया जा रहा है, और उसके निष्कर्षों को खारिज किया जा रहा है। हो सकता है कि ये नतीजे एकदम ही सही न हो, क्योंकि किसी भी शोध या सर्वे के नतीजे में कुछ चूक हो सकती है। लेकिन इसे खारिज करने के बजाय क्या हिन्दुस्तान को कुछ आत्ममंथन नहीं करना चाहिए? और इस आत्ममंथन में यह भी जरूरी नहीं है कि लोग अपने और अपने विरोधियों के विचारों के बीच मंथन करके किसी नतीजे तक पहुंचने की कोशिश करें, सच तो यह है कि लोग अपने खुद के भीतर भी आत्ममंथन कर सकते हैं कि अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने महिलाओं पर हो रहे जुल्म के बारे में सत्ता में रहते  हुए क्या कहा था, और जब वे विपक्ष में रहे, तब उन्होंने क्या कहा था। यह आत्ममंथन दो विचारधाराओं या दो सोच के बीच करने की जरूरत नहीं है, अधिकतर बड़े नेताओं के सत्ता और विपक्ष के दो वक्तों के वक्त के बयानों के बीच आत्ममंथन हो सकता है। 
हिन्दुस्तान में दिक्कत यह है कि किसी विदेशी संस्था ने अगर इस देश को आईना दिखाया है, तो उसके आंकड़ों पर सोचने-विचारने के बजाय लोग तेजी से फर्जी आंकड़े गढ़कर, उसके पोस्टर बनाकर तेजी से सोशल मीडिया में फैलाने में जुट जाते हैं, जैसे कि आज जुटे हुए हैं। ऐसे लोग शायद किसी अंधविश्वास, किसी अंधभक्ति, या ऐसा ही करने के पेशे वाले हैं। और उनको शायद इस बात की जरा भी फिक्र नहीं है कि हकीकत को नकारने से वे उन लड़कियों-महिलाओं की जिंदगी पर भी खतरा बढ़ाते चल रहे हैं, जो कि उनके अपने परिवारों की हो सकती हैं। राजनीति ठीक है, उसके बारे में तो बोलचाल की गंदी जुबान में कहा जाता है कि राजनीति बहुत कुत्ती चीज होती है। ऐसा कहने वाले यह भी नहीं सोचते हैं कि क्या दुनिया की कोई भी कुतिया राजनीति जितनी गंदी हो सकती है कि उसका नाम ऐसी गाली गढऩे के लिए इस्तेमाल किया जाए? फिर भी हम राजनीति को गंदी चीज मानकर भी सोचते हैं, तो लगता है कि क्या यह इतनी गंदी भी हो सकती है कि देश में मासूम बच्चियों के साथ हो रहे बलात्कारों को लेकर राजनीति करे? आज ही सोशल मीडिया पर मध्यप्रदेश के एक भाजपा सांसद की एक तस्वीर तैर रही है जिसमें वे मंदसौर में एक बच्ची के साथ हुए बलात्कार के बाद वहां पहुंचे हैं, और बच्ची के गरीब मां-बाप के साथ, अपने तीन विधायकों के साथ अस्पताल में तस्वीर खिंचवाकर उसे फेसबुक पर पोस्ट भी कर रहे हैं। इस तरह सांसद बलात्कार की शिकार बच्ची के मां-बाप के चेहरे और उनकी शिनाख्त उजागर भी कर रहे हैं। ऐसा कई प्रदेशों में कई पार्टियों के नेता करते हुए दिखते हैं। लेकिन मंदसौर में इस बच्ची के मां-बाप की खबर के साथ एक टीवी चैनल का वीडियो भी दिख रहा है जिसमें भाजपा के स्थानीय विधायक सुदर्शन गुप्ता उस बच्ची के मां-बाप से कह रहे हैं कि उन्हें अस्पताल आने के लिए सांसद साहब का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि वे खासतौर पर उनसे मिलने यहां आए हैं। इस दौरान सांसद-विधायक बच्ची के मां-बाप के साथ तस्वीरें खिंचवाने में लगे हुए थे। 
लोग जब कहते हैं कि हिन्दुस्तान में बलात्कार की रिपोर्ट करने की हिम्मत किसी परिवार में इसलिए नहीं होती कि ऐसी रिपोर्ट के बाद फिर पुलिस जुबान या बदन से बलात्कार करने लगती है, पूरी अदालती कार्रवाई के दौरान अदालती गलियारों में लोग आंखों से बलात्कार करने लगते हैं, समाज बलात्कार की शिकार को बलात्कार के लायक एक फिट मामला मानने लगता है, और नेता ऐसी जख्मी बच्ची या महिला को फोटो खिंचवाने का मौका मान लेते हैं। हम नहीं जानते कि थॉमसन फाऊंडेशन की रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक हिंसक देश बताना सही है या गलत, लेकिन यह देश जिस तरह अपने हाल पर अफसोस के बजाय अपने से अधिक दिखते या लगते देशों की मिसाल गिनाकर अपने को बेहतर साबित करने में जुट जाता है, वह कोशिश अपने आपमें अपनी बच्चियों और महिलाओं के खिलाफ एक बहुत बड़ी हिंसा है। जब लोगों की जुबान बलात्कारी के धर्म और बलात्कार की शिकार लड़की के धर्म को देखकर खुले, या सिल जाए, जब लोगों की जुबान बलात्कार के प्रदेश की सरकार की पार्टी को देखकर खुले, या न खुले, तब ऐसी जुबानों को विदेशियों के किसी सर्वे पर कुछ कहने का हक है? (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जून

अमरीकी अखबार पर एक शिकायतकर्ता का हमला...

संपादकीय
29 जून 2018


सुबह-सुबह अमरीका से फिर एक शूटिंग की खबर आई, और इस बार यह किसी स्कूल-कॉलेज या रेस्त्रां में न होकर एक अखबार के दफ्तर से निकली। एक बंदूकबाज हथगोले सहित वहां पहुंचा, और उसने धुएं का हथगोला फेंककर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, और अखबार के पांच लोगों को मार डाला। इस हमलावर का अखबार से पहले का एक लेना-देना था, उसने 2012 में इस अखबार पर मानहानि का मुकदमा किया था, और वह केस हार गया था। इस बार का हमलावर गिरफ्तार भी हो गया है, और उसके सोशल मीडिया पेज पर अखबार के लिए धमकियां भी दिखी हैं। अमरीका में चूंकि हर किसी के लिए कितने ही हथियार खरीद लेने को कानूनी मंजूरी है, और इन हथियारों में भयानक, हमलावर फौजी हथियार भी रहते हैं जो कि किसी आत्मसुरक्षा के लिए नहीं रहते, और जिनसे एकमुश्त दर्जनों लोगों को मारा जा सकता है। अमरीका में हर कुछ हफ्तों में ऐसी गोलीबारी सामने आती है जिसके बाद वहां के समझदार लोग गनकंट्रोल की पुरानी मांग दुहराते हैं, और हथियारों के कारखानेदार सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ के चलते ऐसी अपील खारिज करवा देते हैं। 
यहां पर दो-तीन अलग-अलग मुद्दों के बारे में सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि अमरीका जैसा देश जहां पर अदालतों की कार्रवाई हिन्दुस्तान जैसे देश के मुकाबले बहुत तेज रहती है, और जहां अदालतों में पैसेवालों का या ताकतवर लोगों का ऐसा बोलबाला नहीं रहता जैसा कि हिन्दुस्तान में रहता है। ऐसे देश में मानहानि का एक मुकदमा हार जाने के बाद किसी को आमतौर पर इतना निराश नहीं होना था जैसा कि यह हमलावर हुआ। अमरीका में मीडिया की आजादी कोई अनोखी बात नहीं है, और वहां लोगों के बीच भी यह समझ है कि वहां के संविधान में ही मीडिया को अलग से आजादी दी गई है। फिर भी एक अखबार से शिकायत को लेकर एक नौजवान इस तरह विचलित हुआ कि उसने ऐसा जानलेवा हमला किया जैसा कि इसके पहले किसी ने कहीं देखा-सुना नहीं था। किसी आतंकी संगठन के लोग तो दुनिया में जगह-जगह मीडिया पर ऐसा हमला कर चुके हैं, लेकिन किसी अकेले खफा इंसान ने शायद ही ऐसा किया हो। 
लोकतंत्र में मीडिया की आजादी कुछ खतरों के साथ आती है, और वे खतरे दूसरे अलग-अलग पेशों में अलग-अलग किस्म के हो सकते हैं। हिन्दुस्तान में कश्मीर से लेकर बस्तर तक, और मध्यप्रदेश के खनिज माफिया लोगों के बीच भी, मीडिया के लोग तरह-तरह के खतरे झेलते हैं, लेकिन अपना काम जारी रखते हैं। अमरीका के जिस अखबार पर ऐसा हमला हुआ, उसने इसके बीच भी आज का अखबार निकाला, पहले पन्ने पर अपने खोए हुए पांच साथियों की तस्वीरों सहित। अब मीडिया के काम से हर जगह कुछ न कुछ लोग तो नाखुश होंगे ही, इसलिए हिफाजत के लिए मीडिया तो हाथ पर हाथ धरकर बैठ नहीं सकता, और न ही हर अखबार या चैनल के दफ्तर पर हथियारबंद पुलिस तैनात हो सकती है। लेकिन अमरीका के आम हाल को देखते हुए यह बात साफ है कि वहां अपने नागरिकों की व्यक्तिगत आजादी इतनी अधिक है कि वह दूसरे नागरिकों की व्यक्तिगत हिफाजत को पूरी तरह खत्म कर देती है। आत्मसुरक्षा की जरूरत से परे लोगों को ऐसे ऑटोमेटिक हथियारों का जखीरा खरीदकर रखने की छूट है जिससे अनगिनत लोगों को मारा जा सकता है। कहने को अमरीका एक बड़ा लोकतंत्र बनता है, और उसकी अपनी जमीन पर अपने लोगों को दूसरे देशों के मुकाबले अधिक आजादी भी है, लेकिन यह अधिक आजादी आत्मघाती हो रही है। ऐसा खतरा समाज की तरफ से नहीं आ रहा है, यह हथियार बनाने वाली कंपनियों की तरफ से थोपा हुआ खतरा है, महज मुनाफे के लिए। अमरीकी फिल्मों से लेकर अमरीकी टीवी सीरियलों तक, हथियारों को ऐसे ग्लैमर के साथ दिखाया और पेश किया जाता है कि लोग उन्हें पाने के लिए बेचैन हो जाएं। यह सब कुछ एक मिलीजुली साजिश है कि कारोबार बढ़े। इस सिलसिले में यह भी सोचने का एक पहलू है कि कारोबार किस तरह लोगों की जिंदगी को कुचलते हुए महज अपने मुनाफे की फिक्र करते हैं। यह हमला भारत से दूर हुआ है, लेकिन इस तरह के दूसरे हमले, शायद बिना हथियारों के, बाजार भारत पर भी कर रहा है, और भारत चौकन्ना रहना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जून

सालाना जलसों के मौकों पर विसंगतियां और विरोधाभास, दिखते हैं, और उभरकर...

संपादकीय
28 जून 2018


आज कबीर जयंती पर देश भर में जगह-जगह जहां भी कबीर की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं, और जहां भी कबीरपंथी बसे हुए हैं, उन तमाम जगहों पर तरह-तरह के कार्यक्रम हो रहे हैं, और सुबह से कुछ घंटे तो टीवी पर लगातार कबीर की समाधि पर चल रहे कार्यक्रम को दिखाया जा रहा है जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मौजूद हैं। उत्तरप्रदेश में मगहर नाम की इस जगह पर अगल-बगल कबीर की समाधि और उनकी मजार दोनों ही मौजूद हैं, और हिन्दू और मुस्लिम अपनी-अपनी आस्था के मुताबिक कबीर की उपासना करते हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही शिर्डी में सांईबाबा को लेकर है, और उनके भी मानने वाले हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही हैं। राजस्थान में रामदेवरा नाम की जगह पर रामदेव की समाधि है जिन्हें हिन्दू बाबा रामदेव कहते हैं, और मुस्लिम उन्हें रामसा पीर कहते हैं। आजादी के पहले तक इस सरहदी गांव में भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ के लोग आते थे, लेकिन अब वह मुमकिन नहीं रह गया है। लेकिन हिन्दू और मुस्लिम दोनों के बीच उनकी मान्यता है। ऐसा ही कुछ कबीर का भी रहा। लेकिन आज कबीर की समाधि पर चांदी जड़ दी गई है, उनके मानने वालों के बीच रिवाज और धार्मिक तौर-तरीके इतने प्रचलित हो गए हैं कि जिन धार्मिक पाखंडों के खिलाफ कबीर पूरी जिंदगी दुनिया के, संभवत:, सबसे हौसलामंद सुधारवादी बने रहे, आज उनकी तस्वीरें भी धार्मिक साज-सज्जा के बिना नहीं दिखती हैं। जबकि कबीर ने पूरी जिंदगी एक हाथकरघा कारीगर के रूप में काम किया, और उनकी तमाम नसीहतें धार्मिक पाखंडों के खिलाफ हैं। 
लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह है जब कभी कबीर जयंती पर कबीर को याद करके लोग उनके बारे में बड़ी-बड़ी, लंबी-लंबी बातें करते हैं, तो कबीर के ही इस हिन्दुस्तान में कबीर की नसीहतों, और आज लोगों की की जा रही बातों के ठीक खिलाफ मौजूद माहौल अधिक खटकने लगता है। कई सौ बरस पहले कबीर ने जो हौसलामंद बातें कही थीं, क्या आज कोई उतनी कड़ी जुबान में उतनी खरी-खरी बातें कहकर जिंदा रह सकते हैं? क्या आज लोग कबीर की बातों को किसी जिंदा के मुंह से सुनना बर्दाश्त कर सकते हैं? यह तो कबीर की बानी एक इतिहास की तरह लोगों के सामने है जिसे खारिज करना आसान नहीं है, इसलिए लोग चुपचाप उसे बर्दाश्त कर लेते हैं। और कबीर के कई अलग-अलग पहलुओं में से लोग उसी पहलू को सामने पेश करते हैं जो कि उन्हें धर्म के करीब लगता है। क्योंकि अगर कबीर के सुधार की बात करेंगे, तो आज के भाषण पाखंड लगने लगेंगे। लोग सवाल पूछेंगे कि कबीर अगर इतने ही पसंद हैं, तो फिर देश का माहौल आज ऐसा क्यों है? क्या साल के बाकी 364 दिन कबीर की नसीहतों पर अमल की जरूरत नहीं है? 
जब जिस बात की सालगिरह मनाई जाती है, अगर हालात उसके ठीक खिलाफ रहें तो फिर लोगों को वह विरोधाभास अधिक खटकने लगता है। अभी दो दिन पहले आपातकाल की सालगिरह मनाई गई, तो बहुत से लोगों ने इस बात से उसकी तुलना की कि देश में आज कौन-कौन सी बातें आपातकाल सरीखी हैं। आज कबीर जयंती पर लोगों को लगता है कि कबीर की कौन-कौन सी महान नसीहतों के ठीक खिलाफ जाकर आज देश का माहौल बनाया जा रहा है, बनाया जा चुका है। ऐसे सालाना जलसे विसंगतियों और विरोधाभासों को और अधिक तल्खी के साथ सामने रखते हैं। कबीर आसान नहीं है, कबीर बहुत मुश्किल हैं, और जो लोग बड़े-बड़े तबकों की गिनती के हिसाब से सबसे बड़े तबकों को संतुष्ट रखने में लगे रहते हैं, उन लोगों को कबीर की कड़वी, और खरी नसीहत पर अमल करना न सुहा सकता, न उनके लिए आसान है, और शायद उनकी ऐसी नीयत भी नहीं हो सकती। फिर भी आज के दिन, या ऐसे बहुत से दूसरे सालाना जलसों के दिन लोग कबीर की महानता का गुणगान करते हुए उस महानता की थोड़ी सी चमक अपने पर भी मलने की कोशिश करते हैं। पता नहीं लोगों को ऐसी चमक का राज दिखता है या नहीं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जून

विश्वकप फुटबॉल से चुनाव और इम्तिहानों तक सीखा जा सकता है

संपादकीय
27 जून 2018


जब लोग अपने दायरे से परे किसी दूसरे दायरे के तजुर्बे और उसकी मिसालों से कुछ सबक लेना जानते हैं, तो वे कई तरह की चूक करने से बचते हैं। अब जैसे इन दिनों चल रहे विश्वकप फुटबॉल को ही लें, तो उसमें दुनिया के एक बड़े फुटबॉल सितारे, अर्जेंटीना के मेसी अब तक के खराब और निराशाजनक खेल को देखकर उसके प्रशंसक स्टेडियम में ही रोते हुए दिखे हैं। इसी खिलाड़ी का एक भारतीय प्रशंसक दक्षिण भारत में निराश होकर घर छोड़कर चले गया था, और पुलिस उसकी तलाश कर रही थी कि कहीं वह कोई खतरनाक कदम न उठा ले। दूसरी तरफ मेसी का देश अर्जेंटीना दुनिया की बाकी टीमों के मुकाबले नीचे खिसक गया है, और लोग इस पर हैरान हैं। हालांकि अभी मैच आधे ही हुए हैं, और बाकी नजारा सामने आना बाकी है। 
लेकिन दुनिया की सबसे अच्छी टीमों, और सबसे अच्छे खिलाडिय़ों के सामने भी यह एक चुनौती रहती है कि किस मुकाबले में उनके सामने कौन हैं। कई बार कोई खिलाड़ी या कोई टीम अपने खुद के पिछले प्रदर्शन के मुकाबले खुद को बहुत बेहतर कर लेते हैं, और अपने ही पिछले बरसों के मुकाबले अपनी तुलना करके खुश और संतुष्ट रहते हैं। लेकिन किसी भी मुकाबले में कोई चौंकाने वाले नए खिलाड़ी या नई टीमें आ सकती हैं, या कि जैसे दुनिया के बड़े-बड़े मुकाबलों के बीच में भी संभावित विजेता के जख्मी हो जाने से मुकाबला एकदम ही बदल जाता है, ऐसे में नतीजे उम्मीदों से बिल्कुल अलग भी हो जाते हैं। इसे चिकित्सा विज्ञान के साथ जोड़कर देखें, तो कहीं-कहीं मुर्दा घोषित किए जा चुके लोग चीरघर पहुंचकर उठकर जिंदा बैठ जाते हैं, या कि मरघट की लकडिय़ों पर सज जाने के बाद भी उनमें जान लौट आती है। 
अब राजनीति की अगर बात करें, तो हर चुनाव खेल के किसी फाइनल मुकाबले जैसा भी होता है, जिसमें उम्मीदवार या पार्टी अपने आपको पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर बनाकर अधिक कामयाबी की उम्मीद करते हैं। लेकिन हर चुनाव में लोगों या पार्टियों के सामने प्रतिद्वंद्वी बदल भी जाते हैं, और स्थितियां तो ऐसी होती हैं कि वे आखिरी पल तक बदल जाती हैं। अब जैसे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के रहते हुए जब चुनाव हुए तो पूरे देश में ऐसा लगता था कि एनडीए का नारा, इंडिया शाइनिंग, एक हकीकत है, और अटल सरकार को दुबारा आने से भला कौन रोक सकते थे। लेकिन एनडीए की उम्मीदों पर पानी फिर गया, और यूपीए को मानो छप्पर फाड़कर नतीजे मिले। ऐसे में मनमोहन सिंह की सरकार का पहला कार्यकाल देश के अधिकतर लोगों की उम्मीद से परे का था। 
चाहे विश्वकप हो, चाहे विंबलडन, और चाहे अमरीका या हिन्दुस्तान के चुनाव। इन सबकी पिछली मिसालों से तुलना की एक सीमा रहती है, और उससे परे जाकर नतीजों की भविष्यवाणी करना न मुमकिन होता है, और न ही जायज होता है। लोगों को अपनी तैयारी से परे भी इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि मुकाबले में जो लोग रहेंगे उनकी आस्तीन में तुरुप के कुछ ऐसे पत्ते हो सकते हैं जो आज दिख न रहे हों, और कुछ ऐसी नौबतें आ सकती हैं जो कि किसी की भी कल्पना से परे की हों। अब जैसे हिन्दुस्तान के 1984 के आम चुनाव देखें तो उस नौबत के पहले किसने यह सोचा था कि इंदिरा गांधी की इस तरह उन्हीं के अंगरक्षक हत्या कर देंगे, और देश पर एक ऐसा चुनाव आ जाएगा जिसमें राजीव गांधी एक ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता में आएंगे। इस चुनाव में कांग्रेस को 404 सीटें मिली थीं, और भाजपा उस वक्त दो सीटों पर थी। 
जिस तरह देश के बड़े कॉलेजों में दाखिले के लिए, या कि देश की सबसे बड़ी नौकरियों के लिए लोग अपनी तैयारी को पिछले मुकाबलों के मुकाबले अगर अच्छा मान लेते हैं, और अपनी कामयाबी की गारंटी मान लेते हैं, तो फिर हो सकता है कि वे दूसरों की तैयारी को और अप्रत्याशित पर्चों की आशंका को अनदेखा कर रहे हैं। असल जिंदगी की हकीकत यह कहती है कि लोगों को दूसरे दायरों से कुछ सीखना चाहिए, अपने खुद के पिछले रिकॉर्ड से परे भी कुछ सोचना चाहिए, अपने आपमें किए गए सुधार को सब कुछ नहीं मान लेना चाहिए, और आने वाले किसी मुकाबले के लिए किसी अप्रत्याशित बात की संभावना या आशंका को नकारना नहीं चाहिए। अब इससे जो लोग सबक लें, वे ले लें, और जो न लें, उनके लिए तो हार के पहले तक इंडिया को शाईन करता हुआ माना ही जा सकता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जून

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जून

सुषमा पर नफरती हमले से सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
26 जून 2018


केन्द्र सरकार में सुषमा स्वराज एक ऐसी मंत्री हैं जो कि मोदी सरकार बनने के पहले लोकसभा में भाजपा की सबसे बड़ी नेता मानी जाती थीं, और अब भाजपा की अगुवाई वाली सरकार आने के बाद सरकार में उनका महत्व खासा कम हो गया है। लेकिन फिर भी वे विदेश मंत्रालय की सकारात्मक दखल को लेकर ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर बनी रहती हैं, और उनकी वजह से सरकार को एक अच्छी छवि हासिल होती है। अब अभी उन्होंने सोशल मीडिया पर ही आए एक मामले में दखल दिया, और एक अंतरधर्मीय जोड़े के साथ लखनऊ के पासपोर्ट अफसर द्वारा की गई बदसलूकी की भरपाई करते हुए तुरंत ही इस जोड़े को पासपोर्ट जारी करवाया। लेकिन हिन्दुस्तान के बहुत से लोग ऐसे अंतरधर्मीय जोड़ों के सख्त खिलाफ हैं और उन्हें लवजिहाद का मामला मानते हैं। उन्हें यह बात बहुत नागवार गुजरी कि भाजपा की एक मंत्री एक ऐसे अफसर का तबादला कर रही हैं जिसने एक मुस्लिम से शादी करने वाली एक हिन्दू महिला के पासपोर्ट में अड़ंगा लगाया था। इसके एवज में सुषमा स्वराज को ऐसे सैकड़ों लोगों ने गालियां लिखना शुरू किया जो कि आमतौर पर रात-दिन भाजपा और मोदी सरकार की तारीफ के कसीदे पढ़ते रहते हैं। लेकिन सुषमा ने बड़े सब्र से काम लिया और गालियों वाले ऐसे ट्वीट भी अपने ट्विटर पेज पर पोस्ट किए। 
यह सुषमा स्वराज की एक ऐसी भलमनसाहत की बात रही जो कि देश के भीतर हिन्दू-मुस्लिम विभाजन को घटाने का काम भी करती है, और देश के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान भी करती है। आज अगर कोई साम्प्रदायिक नेता अपनी सरकार के अफसरों से साम्प्रदायिक नीयत से काम की उम्मीद करते हैं, तो वे सरकारी अफसरों के मुंह एक ऐसा खून लगाते हैं जो कि आगे चलकर किसी दूसरे समुदाय को खाकर पेट भरना सिखाएगा। और सोशल मीडिया पर सुषमा स्वराज जैसी महिला को जिस तरह की गालियां दी जा रही हैं, उन्हें जिस तरह पाकिस्तान का दलाल या पाकिस्तानी करार दिया जा रहा है, जिस तरह उन्हें मुस्लिम बताया जा रहा है, वह धिक्कार के लायक बर्ताव है। देश में जो लोग सोशल मीडिया पर ऐसे पेशेवर और भाड़े के कटखने लोगों को बढ़ावा देते हों, वे लोकतंत्र का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि भाजपा के भीतर बहुत से ऐसे मुस्लिम नेता हैं जिन्होंने हिन्दू लड़कियों से शादी की हैं। और ऐसे हिन्दू नेता भी होंगे जिन्होंने मुस्लिम लड़कियों से शादी की होगी। लेकिन जब आम जनता के बीच के लोग ऐसे अलग-अलग धर्मों के बीच शादी करते हैं, तो उनके पीछे लोग खूंखार अंदाज में काटने को दौड़ पड़ते हैं। उत्तरप्रदेश में पिछले बरसों में जिस तरह लवजिहाद नाम से एक नफरत और हिंसा फैलाई गई है, उसी का असर था कि पासपोर्ट दफ्तर का एक अफसर भारत सरकार की तनख्वाह पाकर साम्प्रदायिक बर्ताव करते मिला, और अब साम्प्रदायिक लोगों की फौज उस अफसर को बचाने के लिए, और ऐसे हिन्दू-मुस्लिम जोड़े के खिलाफ तरह-तरह की जांच करने के लिए जुट गई है। 
इस देश में साम्प्रदायिक सद्भाव की परंपरा धीरे-धीरे करके कई सदियों में विकसित हुई है, और लोकतंत्र आने के बाद उसे एक संवैधानिक दर्जा भी दिया गया है। कानून के खिलाफ जाकर हिंसक, नफरती, और साम्प्रदायिक बर्ताव इस देश की हवा में जहर घोल रहा है। देश का आईटी कानून इस मामले में बड़ा साफ है, लेकिन साम्प्रदायिक सोच के साथ लोग अगर हत्या और बलात्कार की खुली धमकी दे रहे हैं, तो भी उन पर कोई कार्रवाई न होना हैरानी की बात है। दूसरी तरफ अगर एक कार्टून को किसी ने दुबारा पोस्ट कर दिया है, तो सरकार की आलोचना वाली ऐसी सामग्री के लिए लोगों पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। राजद्रोह क्या वे लोग नहीं कर रहे जो कि हिन्दू और मुस्लिम के आधार पर इस देश में कत्लेआम के फतवे दे रहे हैं? लेकिन उनकी धमकियों के, उनकी हिंसा के, साइबर-सुबूत होते हुए भी अगर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है, तो यह बहुत ही फिक्र की बात है। सुषमा स्वराज को जिस तरह से अपमान झेलना पड़ा है, उसे लेकर तो कम से कम अब भारत सरकार को और प्रदेशों की सरकारों को यह सोचना चाहिए कि नफरत को खत्म करने, उसे जेल भेजने का वक्त अब आ चुका है, अब और अधिक देर नहीं की जानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

सम्माननिधि और सहूलियतें पाते हैं, आखिर किस भूखे का पेट काटकर?

25 जून 2018

मराठी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता विनय हार्डिकर की 1978 की पुस्तक 'जनाचा प्रवाहो चालिला' आपातकाल पर प्रामाणिक टिप्पणी समझी जाती है। अभी इसी हफ्ते एक खबर आई है कि उन्होंने आपातकाल के दौरान जेल में गए लोगों के लिए भाजपा की महाराष्ट्र सरकार की पेंशन पेशकश न लेने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि सरकार का (पेंशन का) फैसला विभिन्न कारणों से अनैतिक है।
एक खबर के मुताबिक-उन्होंने कहा, मैंने पेंशन नहीं लेने का फैसला किया है। मैं मानता हूं कि इस फैसले का राजनीतिक पक्ष है जो भाजपा अध्यक्ष के संपर्क फॉर समर्थन अभियान का हिस्सा जान पड़ता है। मैं उसमें फंसना नहीं चाहता। लेखक ने कहा कि आपातकाल लगाने के इंदिरा गांधी के फैसले का समर्थन करने वाली शिवसेना अब राज्य सरकार में घटक है अतएव पेंशन की यह पेशकश अनैतिक है।
हार्डिकर ने कहा, सरकार को कुछ मुद्दों पर सफाई देनी चाहिए। पहला, जेल में गुजारे गए समय के अनुसार लोगों के बीच भेदभाव क्यों? उन्होंने कहा, जो जेल में डाले गए थे, वे दो प्रकार के लोग थे। ऐसे लोग, जिन्होंने सत्याग्रह किया (और जिन्होंने गिरफ्तारी दी थी) तथा ऐसे लोग जिन्हें किसी विरोध-प्रदर्शन से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था। इसमें मुस्लिम लीग और आनंद मार्ग जैसे सांप्रदायिक संगठनों के कार्यकर्ता भी थे। कुछ नक्सली भी हिरासत में लिए गए थे। क्या वे भी इस उदार पेंशन के हकदार हैं? उन्होंने सवाल किया, आपातकाल में जेल में डाल दिए गए अन्य लोगों की तुलना में आरएसएस के कार्यकर्ता अधिक थे। क्या सरकार उन्हें नकद पुरस्कार देना चाहती है। क्या यह नैतिक है क्योंकि आरएसएस को गैर-राजनीतिक संगठन होने का दावा करता है।
हार्डिकर ने कहा- मैं आपातकाल खत्म और लोकतंत्र की बहाली चाहता था। मैं चाहता था कि इंदिरा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र के साथ जो ज्यादती की, उसके लिए उन्हें दंडित किया जाए। मेरे दोनों ही लक्ष्य मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव के साथ हासिल हो गए।
इस हफ्ते की शुरुआत में महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़णवीस की भाजपा सरकार ने आपातकाल के दौरान एक महीने से ज्यादा समय तक जेल में बंद रहे लोगों के लिए 10 हजार रुपये महीने की पेंशन योजना शुरू करने की घोषणा की है। योजना के तहत जो लोग एक महीने से कम वक्त तक जेल में रहे उन्हें पांच हजार रुपये का पेंशन दिया जाएगा। मुख्यमंत्री फड़णवीस ने कहा था कि मौजूदा वक्त में लगभग 7-8 राज्यों में आपातकाल के दौरान जेल गए लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा है, जिसमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी शामिल हैं।
हालांकि महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले के पहले ही इस पर विवाद शुरू हो गया। इस फैसले का विरोध कर रहे लोग का कहना है कि इसके जरिये आपातकाल के दौरान जेल गए आरएसएस के लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देने का विचार किया जा रहा है।
दूसरी तरफ कल ही छत्तीसगढ़ में यहां के एक पुराने भाजपा-परिवार के नेता सच्चिदानंद उपासने ने अपने बनाए एक संगठन, लोकतंत्र सेनानी संघ, की ओर से एक प्रेस कांफ्रेंस में आपातकाल की सालगिरह पर, उसकी याद में, उसके खिलाफ एक कार्यक्रम की घोषणा की है। और इसी मौके पर उन्होंने यह जानकारी दी है कि छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेश के मीसाबंदियों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के समान सुविधाएं देने की घोषणा करके 2008 से ही सम्माननिधि दे रही है। उपासने आपातकाल में मीसाबंदी हुए लोगों के वारिसों में आते हैं, और वे खुद भी मीसाबंदी रहे हैं, और अपने तबके को वे स्वतंत्रता सेनानियों के बराबर स्थापित करने के अभियान में लंबे समय से लगे हुए हैं।
मीसाबंदियों को लेकर दो तरह की सोच सामने आई है, जिसमें से पहली सोच महाराष्ट्र के एक मीसाबंदी लेखक की है जो कि मीसाबंदियों की पेंशन के खिलाफ हैं। दूसरी तरफ मीसाबंदियों को स्वतंत्रता सेनानियों की तरह पेंशन दिलवाने का अभियान छत्तीसगढ़ में चल रहा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या एक राजनीतिक आंदोलन में, या आपातकाल जैसे काले दौर के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले लोगों को किसी पेंशन की उम्मीद करनी चाहिए, या पेंशन का हक रहना चाहिए? क्या लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए जिन लोगों ने एक नागरिक आंदोलन में हिस्सा लिया, या जिन्हें उस वक्त की इंदिरा-संजय की सरकार ने गिरफ्तार किया, क्या उन्हें अलग से ऐसा दर्जा और अलग से ऐसी पेंशन दी जानी चाहिए?
यह सवाल जरूरी इसलिए है कि किसी भी किस्म की सरकारी पेंशन आखिर जनता के पैसों से ही जाती है। और छत्तीसगढ़ वह प्रदेश है जहां पर रमन सरकार जब से एक रूपए किलो चावल दे रही है, तब से गरीबी की रेखा के नीचे का तबका दो वक्त पेट भर खा पा रहा है। क्या ऐसी गरीब जनता के पैसों से किसी को पेंशन लेनी चाहिए? खासकर ऐसे लोगों को जो कि आपातकाल के बाद किसी आर्थिक खतरे से नहीं गुजरे, जिन्होंने जेल में वक्त गुजारा, और उनका परिवार चल गया। इसमें ऐसे लोग भी आपातकाल में जेल में रहे होंगे जिनके परिवार की कमाई उस दौर की वजह से खत्म हो गई। ऐसे गिने-चुने लोगों को तो आर्थिक मदद देना ठीक है, लेकिन बाकी लोगों को सम्मान का एक दर्जा देना काफी नहीं है? और जो आपातकाल से उबरकर आज खाते-पीते हैं, उन्हें कोई भी आर्थिक सम्मान निधि क्यों लेनी चाहिए?
यह सोच कुछ उसी किस्म की है जिसके तहत हम लगातार आरक्षित तबकों के भीतर से फायदे के हक के मामले में मलाईदार तबके को हटाने की बात करते हैं। दलित-आदिवासी या ओबीसी, जो भी आरक्षित तबके हैं, उनके भीतर के अधिकतर फायदे उन तबकों के अपने, लेकिन सबसे ताकतवर, संपन्न, शिक्षित, सरकारी या दूसरे बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोग, सांसद या विधायक, इन्हीं के बच्चे ले जाते हैं क्योंकि वे किसी भी मुकाबले के इम्तिहान में अपनी जाति के बाकी बच्चों के मुकाबले बेहतर तैयारी कर पाते हैं। इसलिए हम बार-बार मलाईदार तबके को आरक्षण के फायदों से बाहर करने की बात लिखते हैं। लेकिन ऐसा हो इसलिए नहीं पाता कि जिन अफसरों को ऐसी नीति का खाका बनाना है, जिन सांसदों या विधायकों को सदन में ऐसा कानून पास करना है, और जिन जजों को ऐसे कानून के पहले या बाद इसे कानूनी कसौटी पर कसना है, उन सबके अपने बच्चों के हित इसी बात में है कि मलाईदार तबका आरक्षण का हकदार बने रहे।
कुछ-कुछ इसी से मिलता-जुलता एक मामला है जिसमें लोग अपने आपको मीसाबंदियों के लिए सम्माननिधि का हकदार बताते हैं, और आपातकाल की कैद के एवज में नगद भी पा रहे हैं। चूंकि आपातकाल में जेल जाने वाले तकरीबन सारे ही लोग गैरकांग्रेसी थे, इसलिए गैरकांग्रेसी सरकारों ने, खासकर भाजपा की सरकारों ने जगह-जगह यह सम्माननिधि चालू की है जो कि आज के अतिसंपन्न लोग भी पा रहे हैं। हमारा मानना है कि ऐसी कोई भी सम्माननिधि उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जिन्हें कि आर्थिक मदद की जरूरत हो। बाकी लोगों के लिए सम्मान काफी होना चाहिए। सरकार, यानी जनता के पैसों से जो भी रकम दी जाती है, वह उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जो कि उसके लिए जरूरतमंद हों। हमारा तो यह भी ख्याल है कि केन्द्र और राज्य सरकारें जितने किस्म के सम्मान देती हैं, उनके साथ सम्माननिधि तभी दी जानी चाहिए जब लोग उसके लिए जरूरतमंद हों।
जिस देश-प्रदेश में लोग एक रूपए किलो के चावल के बिना भुखमरी में जीते थे, उस देश-प्रदेश में सरकारी धन किसी को भी देने के पहले एक न्यायसंगत तर्क का इस्तेमाल अनिवार्य होना चाहिए। यह तो सरकारों की अपनी राजनीतिक सोच है कि वे किसे लोकतंत्र का कैसा सेनानी मानती हैं, लेकिन जब जनता के खजाने से खर्च की बारी आती है, तो महज सम्मान से सम्मान किया जाना चाहिए, और सम्माननिधि को जरूरतमंदों को ही देना चाहिए।
अभी पिछले हफ्ते एक खबर आई कि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल बलरामजी दास टंडन ने बढ़ी हुई तनख्वाह लेने से मना कर दिया, और पहले से चलती आ रही तनख्वाह को अपने लिए काफी माना। हमारा ख्याल है कि सरकार, राजनीति, और दूसरे कई दायरों में जहां-जहां जनता के पैसों से भुगतान होता है, तमाम किस्म के लोगों से वेतन, भत्ते, सहूलियतें, और दूसरे खर्चों को छोडऩे की अपील उसी तरह की जानी चाहिए जिस तरह कि सरकार ने रसोई गैस सब्सिडी छोडऩे के लिए की थी। जब लोग खुद होकर सरकारी खर्च छोडऩा नहीं चाहते, तब सरकार को ऐसे लोगों को एक आईना तो दिखाना ही चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि दो दिन पहले ही कर्नाटक से एक खबर आई है कि वहां एक मंत्री ने 20 लाख रूपए की एक कार को अपने लायक आरामदेह न बताते हुए 35 लाख रूपए की कार की मांग की है। साथ में यह कहा है कि वे बचपन से ही बड़ी गाडिय़ों में बैठते आए हैं, और 20 लाख की यह कार उनके लिए कम अच्छी हैं। अब ऐसे अरबपतियों को सरकारी ओहदों के साथ मिले हुए खर्च क्यों नहीं छोडऩे चाहिए?
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने जो पहल की है, वह पहल इस राज्य के बाकी लोगों तक भी बढऩी चाहिए कि अगर जरूरत न हो तो सरकारी सहूलियतें न लें। लोग बिना जरूरत बड़े-बड़े सरकारी बंगले लेते हैं, और उन्हें दर्जनों एसी लगाकर लाखों रूपए महीने का खर्च जनता पर डालते हैं। ऐसे बहुत से नेता हैं, हमारे आसपास हैं, और उनकी यह सोच कागजों पर दर्ज भी है। ऐसे लोगों से जनता को चुनाव में भी हिसाब लेना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

पुलिस-परिवारों से बात न करना सरकार की चूक

संपादकीय
25 जून 2018


छत्तीसगढ़ में रमन सरकार बहुत सा अच्छा काम करने के बाद भी अलग-अलग लोगों की चूक से एक के बाद दूसरी परेशानी में फंस रही है। महासमुंद में निर्दलीय विधायक डॉ. विमल चोपड़ा को पुलिस ने जिस तरह लाठियों से पीटा है, और उनके अलावा वहां के खिलाड़ी बच्चों को भी मारा है, उससे पूरे राज्य में सरकार के खिलाफ नाराजगी है। खिलाड़ी स्कूल और कॉलेज के छात्र-छात्राएं ही होते हैं, और जब उनकी हड्डियां तोड़ी जा रही हैं, तो फिर उनकी बिरादरी के बाकी बच्चों के बीच, खिलाडिय़ों के बीच, और शिक्षकों के बीच एक नाराजगी जायज है। और यह पूरा मामला छेडख़ानी की शिकायत को लेकर शुरू हुआ, बददिमागी के लिए पहले से बदनाम एक नौजवान आईपीएस अफसर की चलवाई लाठियों पर जाकर खत्म हुआ। यह हैरानी की बात है कि एक प्रशिक्षु अफसर पहले बिलासपुर अब महासमुंद में इस तरह की हिंसा करने की छूट पाता है, और उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती। महासमुंद से बहुत दूर, सरगुजा के भाजपा नेता और राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम ने इस पर साफ-साफ कहा है कि लोकतंत्र में ऐसे अफसरों की कोई जगह नहीं है। 
सरकार की गलती या उसके गलत कामों की एक दूसरी मिसाल भी पुलिस से ही जुड़ी हुई है। पुलिस कर्मचारियों के काम की बेहतर स्थितियों को लेकर उनके परिवार आंदोलन कर रहे हैं, और इसे राजद्रोह करार दिया जा रहा है। गृहमंत्री अपने मातहत इस विभाग की बुनियादी दिक्कतों को दूर करने के बजाय एक लापरवाह बयान दे रहे हैं कि न मांगें पूरी होंगी, न आंदोलन करने दिया जाएगा। जबकि मुख्यमंत्री के तेवर इस आंदोलन को लेकर समझदारी के हैं, गृहमंत्री और कुछ अफसर इसे संवेदनाशून्य तरीके से निपटा रहे हैं। सरकार पूरी ताकत लगाकर पुलिस-परिवारों को आंदोलन तक पहुंचने से तो रोक सकती है, लेकिन क्या इन परिवारों को चुनाव के दिन मतदान केंद्र तक पहुंचने से भी रोक सकेगी?
अधिक वक्त नहीं हुआ है जब सरगुजा के पत्थरगड़ी आंदोलन को लेकर भी छत्तीसगढ़ के अकेले केंद्रीय मंत्री सहित राज्य के कुछ मंत्रियों और कुछ नेताओं ने इसकी तोहमत चर्च पर डालने की कोशिश की, कुछ ने इसे नक्सलियों से जोडऩे की कोशिश की, और कुछ ने इसे राजद्रोह करार दिया। अब अगर बात-बात में राजद्रोह का कानून इस्तेमाल होने लगेगा, तो लोगों को यह भी लगेगा कि अगर वे देश के गद्दार ही करार दिए जा रहे हैं, तो फिर वे सचमुच ही इस राष्ट्र से द्रोह न सही, कम से कम इस राज से द्रोह तो कर ही दें। हमने इसी जगह कुछ दिन पहले ही पुलिस-परिवारों के आंदोलन के पीछे की वजहों पर लिखा है, इसलिए उन तमाम बातों को आज फिर दुहराना ठीक नहीं है। लेकिन सरकार अगर महज पुलिस की लाठियों से पुलिस-परिवारों को, औरतों और बच्चों को काबू करना चाह रही है, उनकी मांगों पर बातचीत तक मुनासिब नहीं समझ रही है, तो यह सरकार का जनकल्याणकारी रूख नहीं है। सरकार को अपनी जनता से हर हाल में बातचीत के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में बातचीत से अधिक लोकतांत्रिक और कोई जरिया नहीं है। अभी तक तो छत्तीसगढ़ में पुलिस वर्दीवाले किसी ने कोई बगावत नहीं की है जैसा कि उत्तरप्रदेश या बिहार में अलग-अलग वक्त पर हो चुका है। लेकिन सरकार को इस रूख को समझना चाहिए, और इसे एक खराब मौसम के आसार मानकर पुलिस-परिवारों से बात करनी चाहिए। इसी प्रदेश में कांगे्रस पार्टी आमजनता से, अलग-अलग तबकों से राय मांग रही है कि वह अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किन मुद्दों को शामिल करे, ऐसे में भाजपा अगर एक सरकार के रूप में न सही, एक पार्टी के रूप में भी तकलीफ से गुजर रहे पुलिस-परिवारों से बात नहीं करेगी, तो इसमें उसका ही नुकसान है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जून

प्रेमी जोड़ों को मौत के लिए मजबूर करने वाला हिन्दुस्तान

संपादकीय
24 जून 2018


उत्तरप्रदेश की एक खबर है कि वहां एक परिवार में बारात पहुंचने वाली थी, और कुछ घंटे पहले ही दुल्हन ने अपने प्रेमी के साथ फांसी लगाकर जान दे दी। उन्हें लड़की के घरवालों ने शादी की इजाजत नहीं दी थी, और लड़की का रिश्ता कहीं और तय कर दिया था। इधर मानो इसी घटना की कार्बन कॉपी करते हुए छत्तीसगढ़ के मैनपुर में एक प्रेमी जोड़े ने एक साथ फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली क्योंकि परिवार उन्हें शादी नहीं करने दे रहे थे। भारत में होने वाली आत्महत्याओं में निराश प्रेमियों की आत्महत्या का एक बड़ा हिस्सा रहता होगा। लेकिन फिर भी खुदकुशी के आंकड़े तो पुलिस के रिकॉर्ड में आते हैं, और देश भर में गिने जाते हैं, पर आत्महत्या न करके घुट-घुटकर जीने वाले निराश प्रेमियों की निराशा की कोई गिनती नहीं हो सकती। 
एक तरफ तो भारत में सरकार ने आधी-पौन सदी पहले आर्य समाज नाम की संस्था को शादी करवाने का अधिकार दिया गया, और इस संस्था द्वारा करवाई शादियों में से बड़ी संख्या में ऐसी शादियां होती हैं जो कि अंतरजातीय होती हैं, या दूसरे धर्म के लोगों में होती है। इसलिए एक तरफ तो कानून बनाकर बालिग जोड़ों को मर्जी से शादी करने की ऐसी छूट दी गई जिसमें परिवार के लोगों की अनुमति, सहमति, या मौजूदगी कुछ भी जरूरी नहीं है। सामाजिक रूप से भेदभाव और छुआछूत के शिकार दलित तबके के लोगों से गैरदलितों की शादी पर सरकार ने नगद पुरस्कार भी रखा हुआ है जो कि जाहिर तौर पर अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए है। लेकिन ऐसी तमाम बातों को शुरू हुए लंबा समय हो चुका है, और समाज है कि सुधरने का नाम भी नहीं लेता। आज भी हरियाणा और उसके आसपास के इलाकों में खाप पंचायतें गोत्र के भीतर या जाति के बाहर शादियों पर हिंसक फैसले देती हैं, उत्तर भारत में जगह-जगह प्रेम विवाहों की सजा देने के लिए एक परिवार दूसरे परिवार की महिलाओं से बलात्कार पर भी उतर आता है। कुल मिलाकर देश का माहौल प्रेम के लिए नफरत का है। 
देश में कानून में बालिग लड़के-लड़कियों को साथ रहने की इजाजत दी है, लेकिन हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि किस तरह पुलिस जाकर छात्र-छात्राओं की नुमाइश लगा देती है, और उनकी तस्वीरों के साथ यह जानकारी फैलाती है कि वे लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते हैं, मानो यह कोई जुर्म हो। बाग-बगीचों में बैठे हुए लड़के-लड़कियों को पुलिस पीटती है, मानो मोहब्बत कोई खतरा हो, और नफरत एक बहुत बड़ी हिफाजत हो। यह सिलसिला इस देश को कई किस्म से गड्ढे में ले जा रहा है। दुनिया में वही देश आगे बढ़ते हैं जहां की नौजवान पीढ़ी को एक स्वस्थ वातावरण में आजादी के साथ जीने मिलता है। हिन्दुस्तान में सरकार के नुमाइंदे अपनी ही सरकार के कानूनों के खिलाफ जाकर बालिग प्रेमियों को अलग करने में हिंसा में जुट जाते हैं। मां-बाप धर्म और जाति को लेकर हिंसा करने लगते हैं। कई परिवार लड़के-लड़कियों को खुद की मर्जी से कुछ करने के खिलाफ उनको मार डालना बेहतर समझते हैं, और इसे ऑनर-किलिंग (सम्मान हत्या) कहा जाता है। 
कृष्ण के श्रंृगार रस के इतिहास से भरे हुए इस देश में आज प्रेम से लोगों को दहशत होने लगी है। आज अगर कृष्ण होते भी, तो भी वे न रास रचा पाते, न गोपियों के साथ तालाब किनारे या पेड़ों पर बैठ पाते, वे कुछ भी नहीं कर पाते। इस देश ने अपने ही एक रसभरे पुराण और इतिहास को भूलकर एक ऐसा पाखंड बढ़ाना शुरू कर दिया है जिसमें प्रेम को हिंसा से भी बुरा करार दिया जाता है, और प्रेम को कुचलने के लिए कत्ल को गौरव मान लिया जाता है। ऐसे देश के नौजवान अपनी हसरतों के जख्मों के साथ भला किस तरह आगे बढ़ सकते हैं? ऐसी हिंसा ने देश की नौजवान पीढ़ी की मानसिकता को कुंठा और भड़ास से भरकर रखा है, और ऐसे में किसी तरह की कोई उत्पादकता देश को नहीं मिल सकती। इस देश के पाखंड का यह हाल है कि धर्म और आध्यात्म के नाम पर, बाबा और गुरू नाबालिग बच्चियों से बलात्कार करते हैं, और सजा पाने के बाद भी पूजे जाते हैं। ऐसे देश में एक स्वाभाविक प्रेम के लिए, जायज और बालिग प्रेम के लिए जो सालाना पर्व फैशन में हैं, वैसे वेलेंटाइन डे को पश्चिमी करार देते हुए बलात्कारी बापू उसे मातृ-पितृ दिवस में बदलने का फतवा देते हैं, और उनके भक्तों के साथ-साथ सरकारें भी इस फतवे को मान लेती हैं। अब तो कम से कम इस बलात्कारी के सजा पाने के बाद इस पाखंड को खत्म करना चाहिए, और सरकार को ऐसी हरकत से अपने हाथ खींचने चाहिए कि बालिग प्रेमी जोड़ों को प्रेम से रोके, और उस दिन को मां-बाप को समर्पित करे। जिंदगी में मां-बाप की अपनी जगह है, लेकिन उसका मतलब यह नहीं है कि बालिगों को अपनी पसंद के जीवनसाथी चुनने के लिए उनके साथ प्रेम करने की कोई जरूरत ही नहीं है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और प्रेमियों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाला यह हिंसक समाज न सिर्फ बेकसूर जिंदगियां खो रहा है, बल्कि उस पीढ़ी की राष्ट्रीय उत्पादकता की संभावनाओं को भी खो रहा है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जून

नवबर्बरतावाद जिन्हें सामान्य लग रहा है, उनके कुनबों का कल...

संपादकीय
23 जून 2018


दुनिया के इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हुए जिनका नाम किसी पुराने आंदोलन के नाम के साथ नव शब्द जोड़कर बनाया गया। एक वक्त नाजी सोच योरप में लाखों लोगों को कत्ल कर रही थी, आज भी उसी सोच के लोग जहां पर सड़कों पर उतरते हैं, अपनी विचारधारा सामने रखते हैं, उसे नवनाजीवाद कहा जाता है। ऐसी नई बातों के लिए नए नाम कहीं कला में इस्तेमाल होते हैं, कहीं साहित्य में, और कहीं संस्कृति में भी। हिन्दुस्तान में इन दिनों एक ऐसी सार्वजनिक सोच सामने आ रही है जिसे नवबर्बरता कहा जाना ठीक होगा। लोकतंत्र आने के बाद में कानून का राज चलना चाहिए था, लेकिन हाल के बरसों में लोगों की भीड़ जिस तरह सड़कों पर हिसाब चुकता कर रही है, या बिना किसी हिसाब के भी कत्ल कर रही है, भीड़ न महज खुद इंसाफ कर रही है, बल्कि जानते-समझते हुए बेइंसाफी भी कर रही है, और कत्ल को हक मान रही है। ऐसे में यह दुनिया की सभ्यता शुरू होने के और पहले की बर्बरता का एक नया आंदोलन है जो कि बहुमत की बुनियाद पर, या कि भीड़ की ताकत की बुनियाद पर खड़ा हो रहा है। 
इस नवबर्बरतावाद की मिसालें उन दर्जनों वारदातों में सामने आई हैं जिनमें भीड़ ने कहीं गाय मारने की तोहमत लगाने, कहीं गोमांस घर में रखने की तोहमत लगाकर, तो कहीं बच्चे उठाने की तोहमत लगाकर किसी बेकसूर को, अमूमन अकेले, अल्पसंख्यक, कमजोर, या विचलित को सड़कों पर मार डाला। और यह सिलसिला बेलगाम बढ़ते चल रहा है, और अब शायद हर कुछ हफ्तों में हिन्दुस्तान में नवबर्बर भीड़ किसी न किसी का कत्ल कर रही है। बात यहीं तक होती तो भी ठीक रहता, तो भी इस शब्द को उछालने की जरूरत नहीं पड़ती। अभी चार दिन पहले उत्तरप्रदेश में जो हुआ, वह और भी भयानक था। दो मुस्लिमों को भीड़ ने इतना पीटा कि एक की मौत हो गई और दूसरे को जख्मी हाल में अस्पताल में रखा गया है। जब पुलिस मौके पर पहुंची तो तीन-तीन पुलिस अफसरों के साथ यह भीड़ उस जख्मी को हाथ-पैर से टांगकर ले जा रही थी, और पुलिस के चेहरे पर शिकन भी नहीं थी। ऐसी हिंसा और ऐसा बर्ताव अगर इस हद तक बर्दाश्त के लायक हो गया है, अगर यह एक सामान्य बात मान ली गई है, तो यह नवबर्बरता थमने वाली नहीं है। एक वक्त यह कहा जाता था कि अदालतों में देर की वजह से भीड़ ने सड़क पर ही सजा दे दी। ऐसी सजा किसी संदिग्ध को दी जाती थी। लेकिन अब भीड़ बिना किसी शक के भी किसी को छांटकर पीटती है, मारती है, और इसके वीडियो बनाकर फैलाती है, और इसके बाद अगर जेल भी जाना पड़े तो ऐसे लोग जेल से भी वीडियो बनाकर अपने जुर्म को जायज ठहराते हैं, उस वीडियो को खुलकर फैलाते हैं। ऐसी हिंसा बर्बरता है, लेकिन ऐसी हिंसा से गौरव हासिल करना और उसका महिमामंडन करना यह एक नवबर्बरता है जो कि लोकतंत्र के आधी या एक सदी पीछे चले जाने का मामला लगता है। 
आज समाज के एक बड़े तबके में अगर दूसरे धर्म के लोग, दूसरी जाति के लोग, दूसरे प्रदेश के लोग, या कि दूसरी सोच के लोग मारे जाने के खिलाफ बर्दाश्त इतना बढ़ गया है कि कहीं से कोई आवाज भी नहीं उठती, तो यह लोकतंत्र से पहले की एक पुरानी ऐसी हिंसा के पैदा हो जाने और पनपने का सुबूत है जो कि लोकतंत्र की नाकामयाबी है। यह नवबर्बरतावाद आज इस देश में धर्म, जाति, और क्षेत्रीयता के मुद्दों को लेकर बढ़ाई जा रही है, और दूसरी तरफ खानपान, पोशाक, संस्कृति, तहजीब, इन तमाम बातों को लेकर भी हिंसा को न्यायोचित ठहराया जा रहा है। यह सिलसिला जिन लोगों को आज ठीक लग रहा है, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि किसी दिन वे खुद, या उनके परिवार के लोग किसी ऐसी भीड़ के बीच फंस सकते हैं जिसकी सोच अलग हो, जिसकी जात अलग हो, जिसका धर्म अलग हो, और जिसे खानपान-पोशाक के कुछ दूसरे तरीके पसंद हों। हिंसा और बर्बरता का सिलसिला इस तरह अगर बढ़ते चलेगा तो यह थमने वाला नहीं है। इसे बढ़ावा देना आज अगर किसी समाज को अच्छा लग रहा है तो उन्हें याद रखना चाहिए कि वे अपनी मौजूदा पीढिय़ों और आने वाली पीढिय़ों के लिए एक बहुत खतरनाक कल छोड़कर जाएंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जून

हिंदुस्तानी राजनेताओं को लातविया भेजने की जरूरत

संपादकीय
22 जून 2018


योरप की एक खबर है कि वहां के एक देश लातविया के लोग बहुत कम बोलना पसंद करते हैं। और ऐसा किसी एक-दो लोगों की आदत नहीं है, वहां की अधिकतर आबादी कम बोलने वाली है। वहां लोग बड़े रचनात्मक होते हैं, लेकिन कम बोलते हैं। यह बात भारत को देखें तो बड़ी अटपटी लगती है जहां पर लोग बिन मौके भी इस अंदाज में बोलते हैं कि अगर न बोलें तो लोग इस गलतफहमी न रह जाएं कि उनके मुंह में जुबान ही नहीं है। हिंदुस्तान में नेताओं और फिल्मी सितारों में ऐसे लोगों की भरमार है जो कि जब तक कुछ उटपटांग बोलकर अपने लिए मुसीबत खड़ी न कर लें, उन्हें खाना ही नहीं पचता।

खासकर राजनीति में हिंदुस्तानी शायद इसीलिए अधिक आते हैं कि यहां अधिक बकवास की खासी गुंजाइश रहती है। राजनीति में वे खूब हिंसा की बात करते हैं, खूब नफरत की बात करते हैं, खुलकर झूठ बोलते हैं, और खासा बोलते हैं। लंबा-लंबा बोलते हैं जिसे लोग लंबी-लंबी छोडऩा भी कहते हैं। लेकिन लोगों का भारतीय राजनीति में आत्मविश्वास इतना अधिक है कि वे दमखम के साथ झूठ बोलते हैं, लगातार बोलते हैं, बार-बार बोलते हैं, और सुनने वाली जनता से वाहवाही, तालियों, और हामी, इन सबकी उम्मीद करते हैं। भारत के बहुत से नेता यह मानकर चलते हैं कि किसी झूठ को अगर बहुत अधिक बार बोला जाए, तो लोग उसे सच ही मान लेते हैं। अब ऐसे हिंदुस्तानियों को अगर लातविया जैसे किसी देश में रहकर काम करना पड़े, तो मुंह बंद रखने की सांस्कृतिक मजबूरी की वजह से ही हो सकता है उनका दम घुट जाए, और वे चल बसें। दूसरी तरफ लातविया से अगर कोई हिंदुस्तान आकर टीवी पर राजनेताओं को सुने, तो यह समझ ही न पाए कि वे नेता हैं या किसी धर्म और सम्प्रदाय के प्रवचनकर्ता। 
यहां पर एक दिक्कत मीडिया के साथ भी है जिसे आज लोगों की कही हुई बातों की वीडियो रिकॉर्डिंग भी हासिल है, और डिजिटल कतरनें भी। लेकिन इसके बाद भी मीडिया लोगों की कही हुई अलग-अलग बातों को साथ रखकर उनसे सवाल करने से कतराता है, और अब मानो धीरे-धीरे यह जिम्मा सोशल मीडिया को देकर मेनस्ट्रीम कहे जाने वाले मीडिया ने अपना जिम्मा छोड़ ही दिया है। मेनस्ट्रीम का मेन काम अब कारोबार रह गया है, और जब सोशल मीडिया पर कोई खबर बहुत ही ज्यादा फैल जाती है, तो मुख्य मीडिया उसे फैली हुई खबर की तरह ले लेता है। 
हिंदुस्तान के नेताओं को कुछ दिनों के लिए लातविया भेजना चाहिए ताकि उनका बोलना कम हो सके, और उनकी रचनात्मकता बढ़ सके। (dailychhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जून

ऐसी हरकत से धर्म का भला तो हो सकता है, योग का नहीं

संपादकीय
21 जून 2018


अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर संयुक्त राष्ट्र से लेकर चीन तक, दुनिया भर में योग किया गया, और भारत में भी अधिकतर राज्यों में सरकारों ने ही इसका आयोजन किया। लेकिन बिहार की खबर है कि वहां सरकारी आयोजन में भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या उनकी पार्टी जदयू के मंत्री-नेता शामिल नहीं हुए। पार्टी की तरफ से अनौपचारिक रूप से यह कहा गया कि योग एक निजी काम है, जो कि घर में किया जाता है, और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राजनीति जनधारणा की चीज होती है, और राजनीतिक विश्लेषक इसे प्रधानमंत्री मोदी के बढ़ाए हुए एक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अभियान से अपने को अलग करने के नीतीश कुमार के फैसले को एक किस्म की शुरुआत मान रहे हैं। ऐसी चर्चाएं खबरों में हैं कि दलितों, महादलितों, और पिछड़ों के बीच अपना जनाधार कमजोर होता देखकर जदयू ऐसा फैसला ले सकता है कि वह अगला चुनाव भाजपा के साथ मिलकर न लड़े। जदयू के कुछ नेताओं की तरफ से यह बात सामने आई है कि भाजपा ने योग को एक धर्मविशेष से इस तरह जोड़ दिया है कि दूसरे धर्मों के लोग इससे कतराने लगे हैं, और ऐसे योग-प्रदर्शन से जुडऩे का मतलब, उन तबकों का साथ खोना भी हो सकता है। और जैसा कि हमने कुछ दिन पहले इसी जगह लिखा था कांग्रेस ने नीतीश पर डोरे डालना शुरू भी कर दिया है। 
लेकिन राजनीति पर लिखना आज का मकसद नहीं है। आज हम योग के बारे में लिखने जा रहे हैं जो कि निर्विवाद रूप से तन और मन को सेहतमंद रखने में मददगार है, और भारत की एक बहुत पुरानी विद्या या जीवनशैली है। यह न तो हिन्दू धर्म तक सिमटी हुई है, और न ही इसका रंग भगवा है। देश में बहुत से ऐसे योग गुरू हुए जिन्होंने फुटपाथी मदारियों की तरह ताबीज बेचने के अंदाज में कभी काम नहीं किया, न ही उन्होंने योग का नाम लेकर कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया, और जिन्होंने बहुत गंभीरता से इसे एक गंभीर निजी जीवनशैली बनाया। लेकिन आज ब्रांड और मार्केटिंग का जमाना है, इसलिए आज योग को हिन्दुत्व के भगवे-केसरिया रंग की पैकिंग में बाजार में पेश किया गया है, और इस छाते तले रामदेव जैसे कारोबारियों ने दसियों हजार करोड़ का धंधा खड़ा कर लिया। इससे परे जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने, और उनके दूसरे नेताओं या प्रदेश की सरकारों ने योग को एक धर्म के साथ, एक रंग के साथ जोड़कर पेश किया, तो बहुत से दूसरे लोग इससे कतरा गए। योग का फायदा अगर दुनिया के लोगों तक पहुंचाने की बहुत साफ नीति हो, तो उसे धर्म से अलग रखना होगा, चाहे उसे शुरू करने वाले व्यक्ति किसी धर्म के ही क्यों न हो। आज जब धर्म को एक आक्रामक हथियार बनाकर दुनिया भर में बहुत से धर्मों के लोग हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे हैं, या बिना हथियारों के भी हिंसा कर रहे हैं, साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं, कट्टरता कर रहे हैं, तब जरूरत इस बात की है कि योग को स्वास्थ्य विज्ञान की तरह ही पेश किया जाए, और उससे धार्मिक रंग को हटाया जाए। 
कई बार किसी एक लोकप्रिय चीज का फायदा उठाने के लिए कोई पार्टी, कोई संगठन, कोई धर्म या कोई सम्प्रदाय अपने आपको उस चीज का वारिस बताते हुए उस पर एकाधिकार जताने लगते हैं। और ऐसे में ही उस चीज, बात, या तकनीक का सामाजिक योगदान सीमित हो जाता है। आज भारत में योग को अगर एक धर्म के एक हिस्से की तरह दूसरों पर थोपा जाएगा, तो बहुत से लोग इसकी प्रतिक्रिया में इससे दूर रहेंगे। जिस तरह लोगों पर वंदे मातरम को थोपा जाता है, तो लोग इस थोपने का विरोध करते हैं, न कि वंदे मातरम का। जब लोगों पर राष्ट्रगान के दौरान खड़ा होना थोपा जाता है, तो लोग इस खड़े रहने का विरोध करते हैं, न कि राष्ट्रगान का। दूसरी तरफ ऐसे ही विरोध को देशद्रोह का रंग देकर पेश कर दिया जाता है, और एक हमले की बुनियाद बना दिया जाता है। यह समझने की जरूरत है कि जो लोग योग को एक थोपे हुए धार्मिक रंग के साथ पसंद नहीं करते, वे न तो योग विरोधी हैं, न ही उस धर्म के विरोधी हैं, और न ही वे देशद्रोही हैं। आज भारत में जरूरत इस बात की है कि योग को धर्म से परे ही रखा जाए। वरना ऐसी हरकत से किसी धर्म का तो भला हो सकता है, योग का नहीं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जून

कश्मीर पर भाजपा लीक से परे के अपने फैसले से वापिस लौटी

संपादकीय
20 जून 2018


जम्मू-कश्मीर की सरकार चल बसी। भाजपा ने यह तय किया कि उसे वहां के सत्तारूढ़ गठबंधन से बाहर जाना है, और उसके बाद पीडीपी की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के सामने इस्तीफा देने के अलावा और कोई चारा नहीं था। जिस वक्त भाजपा-पीडीपी की सरकार बनी थी, उस वक्त भी यह एक बड़ा ही अप्राकृतिक गठबंधन था, और भाजपा ने पूरे देश में अपने विस्तार के एक व्यापक एजेंडे के तहत कश्मीर में अपनी भागीदारी की सरकार का फैसला लिया था। लेकिन लगातार तनाव के बीच चल रही इस सरकार ने अगले आम चुनाव के एक बरस पहले दम तोड़ दिया। इसकी बहुत सी वजहें हैं, जिनमें से कुछ के बारे में ही यहां पर चर्चा हो सकती है। 
कश्मीर में उस पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के भाजपा के फैसले को हम गलत नहीं मानते जिसे चुनावी सभाओं में मोदी ने वंशवाद से लेकर अलगाववाद तक के लिए कोसा था। जो राज्य अशांति और अहिंसा के लंबे दौर से गुजर रहे हैं, वहां पर लोकतांत्रिक ताकतों को कई किस्म के अस्वाभाविक और अप्राकृतिक समझौते और गठबंधन देश-प्रदेश के व्यापक हित में करने पड़ते हैं, और करने भी चाहिए। किसी भी प्रदेश में राष्ट्रपति या राज्यपाल शासन से बेहतर एक निर्वाचित सरकार होती है क्योंकि निर्वाचित सरकार का न होना एक निलंबित-लोकतंत्र होता है। कश्मीर न सिर्फ हिंसाग्रस्त और अशांत राज्य है, बल्कि वह अलगाववाद का शिकार भी है, वहां की घटनाओं को लेकर देश में एक साम्प्रदायिक तनाव भी बने रहता है, और वह एक ऐसा सरहदी राज्य है जो कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से से लगा हुआ है। कश्मीर में आज भी ऐसे लोगों की गिनती कम नहीं है जो कि भारत से अलग होना चाहते हैं, पाकिस्तान में मिलना चाहते हैं, या कि वे एक आजाद कश्मीर अलग से चाहते हैं जो कि दोनों देशों के बीच रहे। ऐसी जटिल स्थितियों वाला यह प्रदेश जब भारत में शामिल हुआ उसी वक्त कई ऐतिहासिक शर्तों के साथ ही यह विलय हो पाया था। उन शर्तों को पूरी तरह खारिज करना मुमकिन नहीं है, और भाजपा ने धारा 370 जैसी शर्तों को बिना छुए हुए कश्मीर में गठबंधन सरकार में रहना मंजूर किया था, जो कि हमारे हिसाब से अडऩे के बजाय एक अधिक लोकतांत्रिक फैसला था। वह कामयाब प्रयोग चाहे न हो सका, लेकिन इन बरसों में जब भाजपा ने धारा 370 जैसे मुद्दों को अलग रख दिया था, तो वह कश्मीर के हित में था। यह एक अलग बात है कि कश्मीर में यह नर्मी बाकी देश में भाजपा के समर्थकों की गर्मी की शक्ल में सामने आ रही थी, और ऐसा माना जा रहा था कि कश्मीरी जनता के एक तबके की पत्थरबाजी से, दूसरे आतंकी हमलों से, अलगाववादियों के प्रति कश्मीर सरकार के रूख से, और सरहद पर लगातार हिन्दुस्तानी फौजियों की मौत से भाजपा के परंपरागत समर्थक बाकी देश में बहुत ही असुविधा महसूस कर रहे थे, असंतुष्ट थे। अपने वोटर समुदाय को अगले आम चुनाव के पहले नाराजगी से बाहर लाने के लिए भी भाजपा का यह फैसला उसके अपने हित का है, और यह कहना अतिसरलीकरण होगा कि यह फैसला कश्मीर के हितों के खिलाफ है। राज्य में सरकार से बाहर होने का फैसला देश में अपने किस्म का अकेला फैसला नहीं है, कई राज्यों में कई पार्टियां गठबंधन के बाहर जाती हैं, और वहां सरकारें नए गठबंधनों के साथ बचती हैं, या गिर जाती हैं। इसलिए भाजपा ने लीक से हटकर यह काम नहीं किया है, बल्कि गठबंधन सरकार में रहना उसके लिए लीक से हटकर एक काम था जो कि उसने अब अपनी परंपराओं के हिसाब से ठीक कर लिया है। यह बात जाहिर है कि महज कश्मीर तक सीमित एक प्रादेशिक पार्टी पीडीपी, और एक राष्ट्रीय पार्टी भाजपा की कश्मीर नीतियां एक सरीखी हो नहीं सकती थीं, और इनके बीच टकराव, मतभेद या विरोधाभास अंतरनिहित ही चले आ रहे थे। 
कश्मीर में फिलहाल कोई राजनीतिक समीकरण किसी स्थाई और असरदार सरकार के आसार नहीं बताते। वहां पर भाजपा से परे की तीन पार्टियां हैं, पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, और कांग्रेस। इनके बीच कोई तालमेल आसान नहीं दिखता, और ऐसा भी नहीं लगता कि राज्य में आज दुबारा चुनाव कराने पर कोई पार्टी स्थाई सरकार बनाने की नौबत में आ जाएगी। ऐसे में यह राज्य एक बार फिर निर्वाचित सरकार खो रहा है, और आने वाला वक्त बताएगा कि आज के वहां के बहुत ही तजुर्बेकार गवर्नर एन.एन.वोहरा किस तरह सरकार चला पाते हैं। वे 2008 से वहां राज्यपाल हैं, और उनको मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया था। वे शायद ऐसे अकेले ही राज्यपाल हैं जो उस समय से और उस सरकार के बनाए हुए, आज तक चल रहे हैं, और जारी रहेंगे ऐसे आसार है। उनके अलावा ईएमएस नरसिम्हन भी एक पूर्व अफसर रहे हैं जिन्हें यूपीए सरकार ने छत्तीसगढ़ का राज्यपाल बनाया था और जो बाद में आन्ध्र के विभाजन के दौर से अब तक आन्ध्र-तेलंगाना दोनों के राज्यपाल बने हुए हैं। कश्मीर के बारे में आने वाले दिनों में लिखने के लिए और बहुत सी बातें रहेंगी, लेकिन आज की आखिरी बात यह कि अगले आम चुनाव के एक बरस पहले भाजपा ने एक और क्षेत्रीय पार्टी का साथ खो दिया है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जून

पुलिस-परिवारों का आंदोलन सरकार आनन-फानन नतीजे न निकाले, मुद्दों पर गौर करे

संपादकीय
19 जून 2018


छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव को बस कुछ ही महीने बाकी हैं, और कर्मचारियों के तमाम किस्म के संगठन अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर हैं क्योंकि यह किसी दूर की जगह जाने वाली रात की आखिरी बस जैसा हाल है, अभी नहीं, तो (इस सरकार में) कभी नहीं। मुख्यमंत्री ने भी कुछ दिन पहले यह कहा है कि चुनाव का साल है इसलिए सभी लोग आंदोलन तो करेंगे ही। लेकिन बाकी कर्मचारी-आंदोलनों से परे एक नए किस्म का आंदोलन एकदम से सुलग रहा है जो कि कुछ हैरान करने वाला है। पुलिस कर्मचारी चूंकि नियम-कानून के मुताबिक कर्मचारी संघ नहीं बना सकते, और आंदोलन नहीं कर सकते, इसलिए उनके परिवारों के लोग उनके हक की मांग करते हुए आंदोलन कर रहे हैं, और प्रदेश के कई शहरों में पुलिस कर्मियों की पत्नियों को धरना देते, मांग पत्र देते, नारे लगाते देखा गया है। राजधानी रायपुर में भी पुलिस-परिवारों ने धरने की इजाजत मांगी है। 
अब यह स्थिति कुछ जटिल है क्योंकि परिवारों के ऊपर तो कोई शासकीय सेवा नियम लागू होते नहीं हैं। और कल इस बारे में राज्य सरकार की एक सर्वोच्च स्तरीय बैठक के बाद गृहमंत्री ने यह बयान दिया है कि इस आंदोलन को कुछ बर्खास्त और कुछ निलंबित पुलिस वाले हवा दे रहे हैं। इतनी जल्दी गृहमंत्री का किसी नतीजे पर पहुंचकर, और ऐसा बयान देना कुछ अटपटा भी है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि इसी गृहमंत्री ने कुछ हफ्तों पहले सरगुजा के इलाके में शुरू हुए आदिवासियों के पत्थलगड़ी आंदोलन को लेकर भी आनन-फानन यह बयान दिया था कि यह धर्मांतरण करने वाले लोगों का शुरू किया हुआ आंदोलन है। लेकिन अब इन कुछ हफ्तों में ही आदिवासियों की एक व्यापक भागीदारी इस आंदोलन में सामने आई है जो कि ईसाई बने हुए आदिवासियों से परे की भी है। और इसे महज ईसाई-आदिवासियों का आंदोलन करार देना सही साबित नहीं हुआ है। आज पत्थलगड़ी आंदोलन को खुलकर ऐसे आदिवासी नेता सम्हाल रहे हैं जो कि गैरईसाई हैं। इसलिए राज्य सरकार में बैठे लोगों को इस बात से थोड़ा सा सबक लेना चाहिए कि बंद कमरे में उनके निष्कर्ष चाहे जो हों, उन्हें सार्वजनिक बयान देते हुए जटिल मुद्दों के अतिसरलीकरण से बचना चाहिए, और जहां पर कोई व्यापक समुदाय जुड़ा हुआ हो, वहां पर किसी छोटे से तबके को निशाना बनाते हुए सब पर तोहमत नहीं लगानी चाहिए। 
हो सकता है कि पुलिस के कुछ निलंबित और बर्खास्त कर्मचारी इस आंदोलन के पीछे हों, लेकिन राज्य सरकार को इस आंदोलन के मुद्दे देखना चाहिए, और पुलिस परिवारों की तकलीफों के बारे में भी देखना चाहिए। मुद्दों पर किसी चर्चा के बिना उनके पीछे के लोगों और उनकी नीयत भर की बात करना न तो राजनीतिक समझदारी है, और न ही किसी जिम्मेदार और जनकल्याणकारी सरकार को ऐसा करना चाहिए। यह बात जाहिर है कि देश के और बहुत से राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी पुलिस कर्मचारियों के काम की स्थितियां मुश्किल हैं, और अमानवीय हैं। वे अपने परिवारों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं, और बाकी देश की तरह यहां भी पुलिस परिवारों के बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं, और बहुत से मामलों में बिगड़ भी जाते हैं। काम के घंटे असीमित रहते हैं, काम की स्थितियां खतरनाक रहती हैं, सड़कों पर धूल, धुआं, और धूप झेलते हुए काम करने से लेकर बस्तर में नक्सल-मोर्चे पर शहादत तक, अनगिनत ऐसी दिक्कतें और खतरे पुलिस कर्मचारी ही झेलते हैं, जो कि सरकार के किसी और दूसरे विभाग के लोग नहीं झेलते। इसलिए सरकार को पुलिस-परिवारों की मांगों पर आक्रामक होने के बजाय यह सोचना चाहिए कि राज्य शासन का गृहविभाग समय रहते इन दिक्कतों को अब तक सुलझा क्यों नहीं पाया, और आज जब ये मांगें सामने हैं, तो इनको न्यायसंगत और तर्कसंगत पैमाने पर तौलना चाहिए। 
यह एक अभूतपूर्व स्थिति है कि किसी कर्मचारी-तबके के परिवारों ने आंदोलन किया है। और जिन शहरों से यह शुरू हुआ है, उनमें मुख्यमंत्री का अपना चुनाव क्षेत्र राजनांदगांव भी शामिल है। हमारा ख्याल है कि सरकार को जवाबी बयान देने से बचना चाहिए, और आंदोलन के मुद्दों पर गौर करने के लिए तुरंत एक कमेटी बनानी चाहिए जो कि आंदोलनकारियों और उनके परिवार के पुलिसकर्मियों, दोनों को ही राहत दे सके। आज जनता से लेकर नक्सलियों तक, जिस किसी का पहला वार सरकार पर होता है, उसे झेलने के लिए पुलिस ही सामने रहती है। अभी कुछ समय पहले हमने इसी जगह पर पुलिस कर्मचारियों के बेजा इस्तेमाल के बारे में लिखा था कि किस तरह उन्हें नेताओं और अफसरों की निजी चाकरी में लगा दिया जाता है। जिस वक्त हमने यह बात लिखी थी, उस वक्त तो पुलिस-परिवारों की न कोई मांग थी, और न ही ऐसे आंदोलन के कोई संकेत थे। फिर भी हमने पुलिस की सामान्य स्थितियों को लेकर उनके साथ हो रही बेइंसाफी पर लिखा था। सरकारी बंगलों पर पुलिसकर्मियों से निजी नौकरों की तरह काम लेना एक बड़ी ही आम बात है। ऐसे अपमानजनक काम से उनका आत्मविश्वास भी खत्म होता है, और वर्दी का गौरव भी जाते रहता है। इसलिए सरकार को आंदोलनकारियों के मुद्दों से परे भी खुद होकर पुलिस की हालत सुधारनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

खुदकुशी के जिम्मेदार ये भी...

18 जून 2018

ऑस्ट्रेलिया की खबर है कि दुनिया भर में किसी समुदाय में नौजवानों की आत्महत्या सबसे अधिक है, तो यह वहां के एक आदिवासी समाज में है। वहां के मूल निवासी, एबओरिजिन, ऑस्ट्रेलिया के गैरमूल निवासियों के मुकाबले चार गुना अधिक आत्महत्या करते हैं। अब यह हैरानी की बात है क्योंकि आदिवासियों के बारे में यह माना जाता है कि वे कुदरत के करीब रहते हैं, और कम सहूलियतों के बीच भी वे अधिक संतुष्ट रहते हैं। ऐसे में लोग कुछ हैरान हैं, कुछ परेशान हैं कि इस समुदाय के नौजवान इतनी आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? आदिवासी बुजुर्गों का मानना है कि वे अपनी जमीन और अपनी परंपरागत संस्कृति से कटने की वजह से ऐसा कर रहे हैं।
खैर, यह तो हिन्दुस्तान से कुछ दूरी का मुद्दा है, लेकिन अपने करीब अगर देखें तो छत्तीसगढ़ में कल एक दिन में दो नौजवान मीडियाकर्मियों ने खुदकुशी की है। एक युवक जो सरगुजा में एक समाचार चैनल में काम करता था, उसने आत्महत्या की, और एक युवती जो बस्तर के एक अखबार में काम करती थी, उसने भी फांसी लगाकर आत्महत्या की।
कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने अभी कुछ देर पहले ट्वीट किया है कि पंजाब में दो और किसानों ने 16 जून को आत्महत्या कर ली। दो और किसान राजस्थान में मर गए, और एक मध्यप्रदेश में।
अमरीका के न्यूयॉर्क में अभी एक फैशन डिजाइनर केट स्पेड की आत्महत्या से भी बहुत से लोग सदमे में हैं क्योंकि वे एक बड़ी कामयाब फैशन डिजाइनर थीं, लेकिन लंबे समय से बेचैनी और निराशा की शिकार हुई थी। लोगों ने इस खबर के साथ अमरीका के राष्ट्रीय आत्महत्या निरोधक हॉटलाईन का नंबर भी पोस्ट किया है।
अब एक सवाल उठता है कि कहीं कामकाजी नौजवान, तो कहीं कर्ज में लदे बुजुर्ग किसान, तो कहीं प्रकृति के बीच रहते आदिवासी, तो कहीं न्यूयॉर्क की एक बड़ी फैशन डिजाइनर, हर किस्म के लोग आत्महत्या करते दिखते हैं, तो आखिर इस मर्ज की दवा क्या है?
एक तो इस मोर्चे पर अच्छी बात यह हुई है कि भारत की सुप्रीम कोर्ट और संसद, सरकार, इन सबने देश में यह कानून सुधार दिया है जिसमें आत्महत्या की कोशिश को या आत्महत्या को जुर्म करार दिया जाता था। आत्महत्या कोई शौक से तो करते नहीं, और जब कोई ऐसी कोशिश में कामयाब हो जाएं, तो उन्हें सजा देने की ताकत किसी कानून में है नहीं। ऐसे में जो लोग आत्महत्या की कोशिश करते बच जाते थे, वे उसके बाद मुकदमा भी झेलते थे। अब वह सिलसिला खत्म हुआ, और देश को यह अक्ल आई कि आत्महत्या जुर्म नहीं है। लेकिन बेवक्त खत्म होने वाली जिंदगियों का आखिर क्या होगा? कैसे इन्हें बचाया जा सकता है?
आत्महत्या के साथ एक दिक्कत यह भी है कि बहुत से लोग इन्हें बीमारी, गरीबी, मानसिक रोग, या इस किस्म की कुछ गिनी-चुनी बातों से जोड़कर देखते हैं, और इनके पीछे की बाकी वजहें धरी रह जाती हैं। ऐसे में जरूरत आत्महत्या को रोकने पर फोकस करने के बजाय जिंदगी जीने की वजहें बढ़ाने की है। और यह काम कुछ अधिक मुश्किल है क्योंकि यह सरकार या देश और समाज, इन सबसे बहुत बड़ी मशक्कत मांगता है। आज निराशा की वजहें बहुत हैं, आसान है, गली-गली हर घूरे पर बिखरी हुई हैं, लेकिन जीने की वजहें हैं तो उससे अधिक, लेकिन दिखती कम है। ठीक उसी तरह जैसे कि तालाब में पानी बहुत रहता है, लेकिन पहली नजर में उस पर तैरता चाहे थोड़ा सा ही क्यों न हो, कचरा सबसे पहले दिखता है। इसी तरह जिंदगी में जिंदा रहने की वजहें, खुश रहने की वजहें काफी रहती हैं, लेकिन लोग अपने दुख-तकलीफ को ही सब कुछ मानकर उससे परे देखना बंद कर चुके रहते हैं।
हमारे सरीखे कुछ लोगों को यह भी लगता है कि अगर अपने से अधिक तकलीफदेह जिंदगी को देखा जाए तो अपनी तकलीफ का एहसास घटने लगता है, और जिंदगी से निराशा भी उतनी अधिक नहीं रह जाती। कई बार लगता है कि जिनको अपनी जिंदगी से बड़ी शिकायतें हों, उन्हें एक बार किसी बड़े सरकारी अस्पताल में, वहां के जनरल वार्ड में, वहां के बरामदों और अहातों में जीते लोगों को देखना चाहिए, मरीजों को देखना चाहिए, तो अपनी दर्दभरी जिंदगी अनायास ही चमकीली सुनहरी लगने लगेगी। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें दूसरों का उतना अधिक दुख-दर्द देखकर निराशा और अधिक बढ़ जाए। इसलिए कोई एक नुस्खा सभी लोगों को रामबाण दवा की तरह असरदार नहीं हो सकता।
दूसरी बात यह भी समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान जैसे गरीब देश में मनोचिकित्सक बहुत ही कम लोगों को नसीब होते हैं। उनके पास भीड़ इतनी अधिक होती है कि वे मन का इलाज करने के बजाय तगड़ा असर करने वाली दवाओं को देकर मरीजों की भीड़ से एक किस्म से फारिग होते हैं। और चिकित्सा से परामर्श वाला हिस्सा गायब हो जाता है, क्योंकि परामर्श जितने समय में मनोचिकित्सक चार और मरीज देख सकते हैं।
सरकार से जिंदगी में खुशहाली की जो उम्मीद की जाती है, वह खासी बड़ी है, और उसका पूरा होना लगभग असंभव रहता है। इसलिए बात घूमफिरकर समाज और परिवार पर, दोस्तों और करीबियों पर आ जाती है अपने बीच के किसी को आत्महत्या से कैसे रोका जाए? ऐसा रोक पाना हो सकता है कि अधिकतर मामलों में मुमकिन न हो, लेकिन फिर भी जितने लोगों को बचाया जा सके, उतने लोगों की जिंदगी कम कीमती तो होती नहीं। इसलिए लोगों को अपने आसपास की निराशा को, तनाव को भांपकर उसे कम करने की कोशिश करनी चाहिए।
लेकिन एक दूसरा बड़ा जिम्मा समाज और मीडिया पर आता है जो कि चारों तरफ नकारात्मकता को बढ़ाने के जिम्मेदार हैं। भारत जैसे चुनावी-लोकतंत्र में अब नेताओं और पार्टियों के बीच, धर्मान्धों और कट्टर पाखंडियों में नकारात्मकता जिंदा रहने के लिए चारा-पानी सरीखी हो गई है, और यह जहर हवा में चारों तरफ फैल रहा है। जिस तरह दिल्ली की हवा में अब हर बरस कई बार कई किस्म का जहर जिंदगी को थाम रहा है, उसी तरह पूरे वक्त, चारों तरफ हिंसा और निराशा की बातें जिंदगी में लोगों के भरोसे को थका दे रही हैं। भारतीय लोकतंत्र में बहुत लोगों को जिंदा रहने की बहुत सी वजहें दिखना अब कम हो चला है। लोग अपनी निजी दिक्कतों से परे भी, सामाजिक और सामुदायिक दिक्कतें देखकर एक निरंतर-निराशा में जीते हैं, और जब वे आत्महत्या की सोचते हैं, तो निजी वजहों के साथ-साथ, ऐसी सामुदायिक या सामाजिक वजहें भी रहती हैं, अपने देश की वजहें भी रहती हैं।
इसलिए जिन लोगों के मुंह के सामने माईक अधिक रहता है, जिनके चेहरों पर कैमरे अधिक टिके होते हैं, जिनका लिखा हुआ अधिक छपता है, अधिक दिखता है, अधिक बिकता है, उन सब पर यह एक अधिक बड़ी सामुदायिक जिम्मेदारी भी आती है कि महज अपने जिंदा रहने के लिए, अपना अस्तित्व बनाए और बचाए रखने के लिए वे इतनी निराशा-हिंसा न फैलाएं कि लोगों में उसकी वजह से जिंदा रहने की हसरत ही घटती चले। ये लोग किसी खुदकुशी के सीधे-सीधे जिम्मेदार कभी नहीं ठहराए जा सकेंगे, लेकिन ये जिम्मेदार रहते जरूर हैं। (Daily Chhattisgarh)