किसानों की बेचैनी किसी भी सरकार को भारी पड़ेगी...

संपादकीय
1 जून 2018


देश के आधा दर्जन राज्यों में किसान सड़कों पर हैं। कहीं सब्जी फेंकी जा रही है, तो कहीं दूध बहाया जा रहा है। मोदी सरकार ने आने के बाद यह कहा था कि किसानों को लागत का दोगुना दाम दिया जाएगा, लेकिन बात कुछ बनते नहीं दिख रही है। देश के किसान और बाकी राजनीतिक दल सभी भाजपा को याद दिला रहे हैं कि उसने स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का चुनावी वायदा किया था, और अब केन्द्र सरकार उससे पूरी तरह मुकर गई है। मोदी सरकार के नीति निर्धारकों का यह मानना है कि स्वामिनाथन आयोग ने जमीन की लागत को भी फसल के खर्च में जोड़ा है, और उसके मुताबिक अगर समर्थन मूल्य रखा जाएगा, तो पूरी केन्द्र सरकार ही दीवालिया हो जाएगी। इन आंकड़ों पर गए बिना भी जो दिख रहा है, वह यह है कि किसान अब तक तो आत्महत्या करते आ रहे थे, अब अपनी उपज के दाम पाने के लिए मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में खुले में पड़े-पड़े मर गए। ऐसी एक मौत उत्तरप्रदेश में लोकसभा उपचुनाव के ठीक पहले कैराना के पास मोदी की एक आमसभा के कुछ घंटों पहले ही हुई, और उसका भी चुनाव पर कुछ असर हुआ होगा। नतीजे आने के बाद वहां जीती हुई पार्टी के मुखिया और दूसरी पीढ़ी के किसान नेता अजीत सिंह ने कहा कि लोगों ने जिन्ना पर वोट नहीं दिया, गन्ना पर वोट दिया। उत्तरप्रदेश के गन्ना किसानों के हजारों करोड़ रूपए कारखानों से मिलना बकाया है, और वे इस तरह से मर रहे हैं। 
पूरे देश में किसानों की बदहाली देखते ही बनती है, या ऐसा कहें कि देखते नहीं बनती है। फिर मोदी सरकार के आने के बाद से किसानों की कुछ और मुद्दों को लेकर जिस तरह से कट्टरता और धर्मान्धता से भरे हुए कानून बनाए गए, जानवरों की खरीद-बिक्री पर रोकटोक लगाई गई, जिस तरह से बूढ़े जानवरों को काटने पर नए कानून लगाए गए, उनके चलते भी किसानों की हालत खराब हुई है। पहले चार बूढ़े जानवर बेचकर किसान एक-दो नए जानवर ले लेते थे। लेकिन अब पुराने जानवरों को बेचना भी कई किस्म से जुर्म हो गया है, और उनको खरीदकर ले जाना भी जुर्म हो गया है, और कानून से परे सड़कों पर जानवरों के मुद्दों पर खुलेआम कत्ल होने लगे हैं जो कि उन राज्यों की सरकारों की अघोषित सहमति-अनुमति से हो रहे हैं। ऐसे में जानवरों से जुड़ी हुई अर्थव्यवस्था किसान के हाथों से निकल गई है। आज किसान अगर दूध का कारोबार करने के लिए जानवर पालें, तो दूध बंद होने के बाद उनको बेचें कहां? 
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कुछ भी जोड़े बिना केन्द्र और राज्य सरकारें लगातार गांवों के कारोबार घटाते चल रही हैं। शहरीकरण बढ़ रहा है, कारखानों में बने हुए सामान की खपत बढ़ रही है, और पूरा माहौल कारखानों और कारखानेदारों का हिमायती हो गया है। पिछले बरसों में देश में जगह-जगह किसान आंदोलनों में लोग भी मारे गए, और इस बार का यह किसान आंदोलन मध्यप्रदेश में पिछले बरस इसी हफ्ते मारे गए आधा दर्जन किसानों की याद में ही शुरू हो रहा है। किसानों के मुद्दे को कानून व्यवस्था या चुनावी नफा-नुकसान से परे देखने की जरूरत है। आज शहरी नजरों से किसान इतनी दूर हैं कि उनकी मौत या खुदकुशी भी शहरों को नहीं दिखती। गांवों की उपज के बिना शहरों में न अनाज आएगा, न सब्जी आएगी, न तेल आएगा, न दूध और न फल। लेकिन लोग इनमें से किसी भी सामान के इतने दाम देना नहीं चाहते जितने कि किसान को जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं। धीरे-धीरे किसानी का काम इतने घाटे का होते चल रहा है कि देश में रकबा लगातार घटते भी जा रहा है। किसानों की नई पीढ़ी इस काम को बिल्कुल भी करना नहीं चाहती। 
केन्द्र सरकार को किसानों को जिंदा रखने के लिए खेती को तो पूरी मदद करना ही चाहिए, साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दूसरे कामों को बढ़ावा देना चाहिए। पिछले बरसों में जानवरों को लेकर जितने किस्म की बंदिशें लगाई गई हैं, उनको खत्म करना राजनीतिक रूप से आसान काम नहीं होगा, लेकिन उससे देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो रही है, खासकर गांवों की। और चूंकि बाकी देश में शहरी कारोबार अर्थव्यवस्था के आंकड़े कुल मिलाकर ठीक बता देते हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि किसान की हालत ठीक ही है, यह सिलसिला टूटना चाहिए, वरना किसानों की बेचैनी किसी भी सरकार को बहुत भारी पड़ सकती है। (Daily Chhattisgarh)

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