चौथाई सदी बाद एक बेकसूर अश्वेत अमरीकी जेल से रिहा, भारत भी नसीहत ले...

संपादकीय
10 जून 2018


अमरीका से दिल को छू लेने वाली एक खबर है कि 1993 में बलात्कार और हत्या के आरोप में 22 बरस के एक अश्वेत नौजवान को गिरफ्तार किया गया था, और फिर उसे अदालत से बिना पेरोल के उम्रकैद सुनाई गई थी। डीएनए जांच से बाद में साबित हुआ कि राइट बेकसूर है। जेल में 25 साल बिताने के बाद वह अब छूटा और बतौर मुआवजा उसे एक करोड़ डॉलर दिए गए। आपराधिक जांच में डीएनए साक्ष्य को बढ़ावा देने वाले एक जनसंगठन इनोसेंस प्रोजेक्ट ने अमरीकी जेलों में बंद सजायाफ्ता लोगों के हक के लिए लडऩे का काम शुरू किया है, और इस रिहाई के बाद उसने कहा कि राइट पुलिस की खराब जांच प्रक्रिया के शिकार रहे। पुलिस ने कथित रूप से राइट को पुलिस द्वारा तैयार लिखित अपराध-स्वीकरण पर हस्ताक्षर नहीं करने पर पीटने की धमकी दी थी। इनोसेंस प्रोजेक्ट ने कहा कि राइट देश में 344वें ऐसे व्यक्ति हैं जो डीएनए जांच में निर्दोष पाए गए।
अब अगर ऐसी नौबत को भारत में देखा जाए तो यहां जेलों में बंद लोगों में अनुपातहीन अधिक गिनती दलितों और आदिवासियों की है, और दूसरे गरीब तबकों की है। अमीरों को गिने-चुने चर्चित मामलों में ही कभी-कभार सजा होती है, लेकिन कमजोर तबकों का हाल यह रहता है कि सजा पूरी हो जाने के बाद भी वे कई मामलों में बरसों तक जेल के भीतर पड़े रहते हैं क्योंकि उनके कागज लेकर उनके हक की बात करने वाले कोई जनसंगठन नहीं हैं। छोटे-छोटे से मामलों में भारत की जेलों में ऐसे गरीब बंद रहते हैं, महीनों और बरसों तक बंद रहते हैं, जिनमें उनकी विचाराधीन-कैद के मुकाबले उन्हें आरोपों पर सजा उससे बहुत कम ही हो सकती है। न उनकी जमानत लेने वाले लोग रहते, और न ही पुलिस या जेल के कर्मचारियों को खुश करने वाले लोग रहते कि ऐसे गरीबों को पेशी पर समय पर अदालत पहुंचा दिया जाए। जेल, पुलिस, और अदालत, इन तीनों का रूख गरीबों के लिए, और जाहिर तौर पर बेकसूर दिखने वाले गरीबों के लिए भी ऐसी बेरहमी का रहता है, इतना भ्रष्ट रहता है कि आरोपों में जेल पहुंचने वाले गरीब भी मानो सजा पा ही चुके रहते हैं। 
यह बात समय-समय पर सामने आती है कि किस तरह जमानत का इंतजाम न  कर पाने पर गरीब जेल में पड़े रहते हैं, वे न वकील का इंतजाम कर पाते, न उन्हें आसानी से गवाह जुट पाते, और न ही वे अदालत के बाबुओं को रिश्वत देने की रिवाज निभा पाते। अमरीका के इस ताजा मामले को लेकर भारत में यह सोचने की जरूरत है कि क्या यहां ऐसे जनसंगठन नहीं होने चाहिए जो कि लगातार जेल और अदालत पर फोकस करके बेकसूरों को बचाने की कोशिश करें? इससे बेगुनाह लोगों के मन में, उनके परिवार के मन में लोकतंत्र से होने वाली हिकारत भी टलेगी, और जेलों पर बोझ भी कम होगा। बेकसूर लोगों के परिवारों पर ऐसी कैद एक जुल्म की तरह रहती है, और पूरे परिवार तबाह हो जाते हैं, यह सिलसिला भी खत्म होना चाहिए। कहने के लिए तो भारत में और इसके हर प्रदेश में मानवाधिकार आयोग हैं, महिला आयोग है, लेकिन इनके लोग जेलों का आम दौरा करने से अधिक कुछ नहीं करते, जबकि जेल में बंद हर विचाराधीन कैदी के हक के लिए किसी को कोशिश करनी चाहिए, उसके बिना उनका कोई भला नहीं हो सकता। अमरीका का यह संगठन वहां पर सजा पा चुके कमजोर तबके के लोगों की बेकसूरी स्थापित करने के काम में लगा है, और जाहिर है कि ऐसे एक-एक मामले में बरसों की कोशिश लगती होगी। अमरीका में बेकसूर साबित हुए ऐसे सैकड़ों लोगों में से तकरीबन सारे ही उस अश्वेत समुदाय के हैं जो कि अमरीका में भारत के दलित समुदाय जैसा कमजोर तबका है। भारत में जेलों में बंद कैदियों में बहुतायत ऐसे ही दलित, आदिवासी, और मुस्लिम लोगों की है। इसलिए उनके हक के लिए काम करने वाले किसी संगठन की ऐसी ही जरूरत भारत में भी है। 
(Daily Chhattisgarh)

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