भिलाई की मिसाल बाकी देश में भी याद रखने की जिम्मेदारी

संपादकीय
14 जून 2018


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस वक्त छत्तीसगढ़ के भिलाई में इस्पात संयंत्र देख रहे हैं, और यह कारखाना देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सपनों पर बना हुआ देश के सबसे पहले सार्वजनिक कारखानों में से एक था। इसने भारत को फौलाद के मामले में आत्मनिर्भर भी बनाया, दुनिया भर में एक कारोबार भी खड़ा किया, लाखों लोगों को सीधे नौकरी और स्वरोजगार दिए, और कई गुना लोगों को जुड़े हुए उद्योगों में काम का मौका दिया। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात भी मोदी के आने के मौके पर कही जा रही है कि वे एक मिनी भारत में आ रहे हैं। भिलाई सचमुच ही अपने पहले दिन से एक मिनी भारत रहा जहां पर देश के हर हिस्से से आए हुए लोगों ने कंधे से कंधा भिड़ाकर काम किया, और साथ-साथ रहना सीखा। सोवियत मदद से बना हुआ यह कारखाना, और इसकी आबादी के रहने का शहर, देश के लिए आज भी एक आदर्श मिसाल हैं। कारखाने के कामगारों के रहने के लिए भी किस किस्म की खुली और हरी-भरी कॉलोनियां होनी चाहिए, अच्छे स्कूल और अस्पताल कैसे होने चाहिए, इन सबका एक बहुत अच्छा उदाहरण भिलाई ने पेश किया। 
लेकिन देश में भिलाई का सबसे बड़ा योगदान एक सांस्कृतिक संगम की शक्ल में रहा जहां रहने से लेकर खाने तक, और हर त्यौहार साथ-साथ मनाने पर लोगों ने न सिर्फ सीखा, बल्कि जारी भी रखा। यह भी याद रखने की जरूरत है कि भिलाई की टाऊनशिप उस वक्त बनी और बसी जब देश में जगह-जगह साम्प्रदायिक दंगे होते थे, देश आजाद हुआ ही था, और लोगों ने लोकतंत्र की बहुत सी बातों को ठीक से सीखा-समझा नहीं था। वैसे वक्त देश के हर प्रदेश से आए हुए लोगों का साथ रहना, अलग-अलग धर्म और खानपान के लोगों का बिना किसी विवाद साथ उठना-बैठना, अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों का आदान-प्रदान जिस तरह भिलाई में हुआ, उसका एक असर बाकी छत्तीसगढ़ पर भी पड़ा, और देश पर भी। भिलाई ने न सिर्फ फौलाद बनाया, बल्कि देश में सद्भावना की फौलादी परंपरा भी शुरू की, आगे बढ़ाई। 
जिन जानकार शोधकर्ताओं ने भिलाई के कामगारों के बीच समाजशास्त्रीय शोध किया है, उन्होंने इस बात को अच्छी तरह दर्ज किया है कि भिलाई इस्पात कारखाने के भीतर अलग-अलग जाति और धर्म के लोग एक साथ बैठकर खाते हैं, और ऐसा नजारा भिलाई के बाहर के निजी कारखानों में देखने नहीं मिलता। और यह कोई एक मिसाल पर टिका हुआ निष्कर्ष नहीं है, यह भिलाई की एक नियमित और निरंतर संस्कृति रही है जो जारी है। भिलाई एक ऐसी मिसाल भी रहा जो कि मजदूर-कामगारों के बच्चों को आगे बढऩे के लिए बराबरी के मौके देते रहा, और वहां इस्पात संयंत्र की अपनी स्कूलें भी देश के मुकाबलों में शानदार प्रदर्शन करते आई हैं। हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में बाकी छत्तीसगढ़ में जितनी कामयाबी हासिल नहीं होती, उससे अधिक कामयाबी अकेले भिलाई से सामने आती है। इसलिए आज जब प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की छत्तीसगढ़ सरकार भिलाई में आईआईटी का शिलान्यास करने का जलसा मना रही है, तो अनेकता में एकता और सद्भावना की यह अनोखी राष्ट्रीय मिसाल अपनी सामाजिक सफलता की वजह से भी सबको खुश होने और गौरव करने का मौका दे रही है। हम यह चाहेंगे कि भिलाई को फौलाद के उत्पादन के रिकॉर्ड के लिए तो जाना ही जाए, लेकिन साथ-साथ देश में सद्भावना का जो फौलादी ढांचा भिलाई के समाज ने पेश किया है, वह भी तमाम लोगों को याद रहे, यह न सिर्फ एक मिसाल है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी भी है कि बाकी देश में इस बात को याद रखा जाए।  (Daily Chhattisgarh)

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