पिछले चुनाव में मोदी को जिताने वाली कांग्रेस इस बार भी लगी हुई है..

संपादकीय
17 जून 2018


कांग्रेस पार्टी के साथ दो दिक्कतें दिखती हैं। एक तो यह कि देश की लीडरशिप उसके पास रहे, इससे परे वह कुछ सोच नहीं पाती है। हालत उसकी ऐसी है कि घर में नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने। उसका अतीत चाहे कितना ही गौरवशाली रहा हो, उसका वर्तमान मटियामेट है, और ऐसे में भी उसकी जो बददिमागी जारी है, उसके चलते उसका भविष्य भी कोई बेहतर नहीं लगता। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात भी है कि कांग्रेस ने हाल के बरसों में बेमौके की बकवास करने की कला में महारथ हासिल कर ली है। जब कभी देश में ऐसा माहौल बनता है कि कांग्रेस कुछ विपक्षी दलों के साथ मिलकर अगले आम चुनाव के लिए मोदी के खिलाफ एक बेहतर तालमेल बना सकती है, कांग्रेस के कोई न कोई नेता उस माहौल को खराब करने में जुट जाते हैं। 
अब आज जब दिल्ली में वहां के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मोदी सरकार के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा खोलकर लड़ रहे हैं, तो कांग्रेस पार्टी ने मानो इस नाजुक मोड़ पर अपना फैसला दिल्ली के उन स्थानीय कांग्रेस नेताओं पर छोड़ दिया है जिनका अपना अस्तित्व केजरीवाल की वजह से खत्म हो चुका है। ऐसे नेता कांग्रेस की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और संभावित राष्ट्रीय भूमिका को अनदेखा करके अपने शहर का हिसाब चुकता करने में लगे हुए हैं। यह उस वक्त हो रहा है जब देश के चार प्रमुख गैरभाजपाई मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंचकर केजरीवाल का साथ देना घोषित कर चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस मोदी से निपटने के एक मौके की संभावना तलाश करने के बजाय केजरीवाल को नुकसान पहुंचाने की संभावना तलाश रही है। इससे कांग्रेस की इज्जत देश के बाकी गैरकांग्रेसी-गैरभाजपाई लोगों के बीच चौपट हो रही है। 
दूसरी तरफ आज ही यह खबर है कि कांग्रेस के बिहार राज्य के संगठन प्रभारी ने नीतीश कुमार को न्यौता दिया है कि वे अगर भाजपा का साथ छोड़ते हैं, तो उन्हें महागठबंधन में वापस लेने के लिए वह सहयोगी दलों के साथ विचार-विमर्श करेगी। कांग्रेस के इस बिहार प्रभारी ने कहा है कि पिछड़ों और अतिपिछड़ों की राजनीति करने वालों के पास भाजपा का साथ छोडऩे के सिवाय कोई विकल्प नहीं है, और अगले चुनाव में भाजपा के खिलाफ गठबंधन की अगुवाई कांग्रेस के पास रहेगी, और देश की जनता राहुल गांधी के नेतृत्व में नरेन्द्र मोदी को हराएगी। अब कांग्रेस के कमअक्ल नेताओं को यह समझ भी नहीं है कि अभी तो नीतीश कुमार और भाजपा के बीच तनातनी शुरू भी नहीं हुई है, और कांग्रेस एक तरफ नीतीश पर डोरे भी डाल रही है, और उन्हें यह भी बता रही है कि आकर राहुल की लीडरशिप में काम करना होगा। यह नौबत कुछ वैसी है कि अभी किसी आदमी की जिंदगी की उम्मीद डॉक्टरों ने छोड़ी भी नहीं है, और कांग्रेस उसकी बीवी पर डोरे डाल रही है, साथ-साथ यह भी कह रही है कि आकर घर में झाड़ू-पोंछा करना होगा। 
नरेन्द्र मोदी की लीडरशिप में अगर अगला चुनाव एनडीए और भाजपा जीतते हैं, तो उसमें ठीक पिछले आम चुनाव की तरह एक बड़ा योगदान कांग्रेस का भी रहेगा, जो कि वक्त-जरूरत पर मुंह खोलने का मौका लगातार चूकती है, और बेवक्त बकवास में पीछे नहीं रहती है। आज जब उत्तर-पूर्व की बाढ़ को लेकर लोग देश के बड़े नेताओं से बयान या किसी काम की उम्मीद कर रहे हैं, तब राहुल गांधी मोदी की कसरत पर बयान दे रहे हैं। गूगल पर अगर उत्तर-पूर्व की बाढ़ के साथ राहुल गांधी का नाम ढूंढें, तो 3 अगस्त 2017 की खबरें ही सबसे ताजा दिखती हैं। कांग्रेस को लोगों की संवेदनशीलता से इस लापरवाही से खेलना बंद करना होगा, वरना वह इतिहास में दर्ज एक पार्टी रह जाएगी। पिछले महीनों और बरसों में जब-जब कुछ दूसरी पार्टियां देश के लोगों की भावनाओं को उकसाने और भड़काने में लगी रहती हैं, तब उसी माहौल के बीच कांग्रेस पार्टी के कोई न कोई बड़बोले नेता ऐसी गैरजरूरी और गैरवाजिब बात करते हैं कि जिससे पूरी पार्टी की इज्जत चौपट होती है। ऐसा लगता है कि इस पार्टी में औपचारिक प्रवक्ताओं को छोड़कर बाकी तमाम प्रवक्ताओं का राज है, और उन्हें उनके बयान कांग्रेस विरोधी बनाकर देते हैं, और बताते हैं कि इन्हें कब जारी करना है। ऐसे तौर-तरीकों के साथ कांग्रेस अगले चुनाव में भी मोदी को जिताने का काम करने जा रही है। (Daily Chhattisgarh)

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