सेक्स-शोषण पर न खास कानून की जरूरत, न विशेष अदालत की, बस मुजरिमों को बचाना बंद हो..

संपादकीय
2 जून 2018


पाकिस्तान की एक खबर है कि वहां की एक नामी स्कूल में पढऩे वाली एक छात्रा ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि किस तरह एक प्रैक्टिकल परीक्षा के दौरान इम्तिहान लेने वाले आदमी ने कई छात्राओं के साथ यौन दुव्र्यवहार किया। एक लड़की के मुंह खोलने के बाद अब इस शिक्षक के हाथों सेक्स-शिकार हुई बहुत सी लड़कियों ने भी अपने साथ हुई बदसलूकी की बात लिखी है, और लिखा है कि किस तरह इस आदमी ने उन्हें छुआ और उनके बारे में गलत बातें कहीं। यह एक ऐसे बड़े स्कूल की बात है जहां पाकिस्तानी नौसैनिकों के बच्चे पढ़ते हैं। 
इस एक मामले में अगर देखें तो सरहद के दोनों तरफ कोई खास फर्क नहीं है, और इन दोनों देशों से परे भी पश्चिम के देशों में भी लड़कियों और महिलाओं के साथ ऐसा सुलूक आम है। कहीं शिक्षक, तो कहीं खेल प्रशिक्षक, तो कहीं रिसर्च गाईड, तो कहीं दफ्तर में काम करने वाले सीनियर लोग, लड़कियों और महिलाओं का सेक्स-शोषण दुनिया में उतना ही फैला हुआ है जितने कि आदमी फैले हुए हैं। जहां-जहां आदमी हैं, वहां-वहां ऐसा शोषण है। और अपवाद के रूप में इक्का-दुक्का मामले ऐसे भी आ रहे हैं जिनमें अधिक उम्र की महिला शिक्षिका ने अपने नाबालिग छात्रों से शारीरिक संबंध बनाए, और उनका जीना हराम कर दिया। लेकिन मोटेतौर पर सेक्स-शोषण का मामला आदमियों के हाथों होता है, और लड़कियां-महिलाएं उनका शिकार होती हैं। भारत जैसे लोकतंत्र में इसके खिलाफ कानून बहुत कड़ा है, लेकिन उस पर ईमानदारी से अमल एक लगभग दुर्लभ बात है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से अभी-अभी एक प्रेस कांफ्रेंस में यह सवाल किया गया कि प्रदेश के एक सबसे बड़े पुलिस अफसर पर अपनी महिला सिपाही का सेक्स-शोषण करने का आरोप जांच में साबित हो गया है, लेकिन इसके बावजूद उस पर कोई कार्रवाई तो दूर, उसका प्रमोशन कर दिया गया है। 
हॉलीवुड की अभिनेत्रियों से लेकर बॉलीवुड तक लगातार अब महिलाएं खुलकर सामने आ रही हैं कि काम के सिलसिले में उनका किस तरह देहशोषण करने की कोशिश की गई, या कि किया गया। हॉलीवुड में बहुत बड़े-बड़े लोग ऐसे दर्जनों आरोपों के बाद अदालत के कटघरे में पहुंच गए हैं, और बहुत से नामी-गिरामी लोग सार्वजनिक रूप से माफी भी मांग रहे हैं। हिन्दुस्तान में चूंकि कानून मुजरिमों के लिए चुइँग-गम जैसा लचीला है, इसलिए यहां पर कानूनी कार्रवाई नहीं हो पा रही है, और यह बात अभी महज चर्चा के स्तर पर है। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को देश के ऐसे तमाम मामलों का खुद होकर संज्ञान लेना चाहिए जिसमें सेक्स-शोषण करने वाले लोगों पर सरकारों ने कार्रवाई नहीं की है, और बाकी सेक्स-मुजरिमों का हौसला बढ़ाने का काम किया है। ऐसे तमाम गैरजिम्मेदार, या जिम्मेदार लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए जिन्होंने अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की, और मुजरिमों को खुला छोड़ दिया। छत्तीसगढ़ ऐसा एक राज्य हो सकता है जहां पर किसी विभाग की सबसे निचले पद की, पिछड़ी जाति की एक सिपाही ने अकेले इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी, एक मिसाल पेश की, और फिर भी सरकार ने दोषी पाए गए अफसर पर कुछ भी नहीं किया। ऐसे मामले में जिम्मेदारी तय करने का काम अदालत को करना चाहिए। 
देश में मौजूदा कानून तब तक महज कचरे की टोकरी के लायक रहते हैं, जब तक उन पर अमल न होता हो, और मुजरिमों को सजा दिलाने में कामयाबी न मिलती हो। जब सरकारें अपना जिम्मा पूरा नहीं कर पाती हैं, तो वे अपनी नाकामी छुपाने के लिए कानूनों को और कड़ा करने का नाटक करती हैं। कानून कड़ा करने से उन पर अमल कड़ा नहीं हो जाता, अमल करने के लिए दिल कड़ा करने की जरूरत होती है, कानून को और अधिक कड़ा करने की नहीं। दिक्कत यह है कि महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, या बाल संरक्षण आयोग जैसी संस्थाएं सत्तारूढ़ पार्टी के मनोनीत लोगों से भरी रहती हैं, और वे अपने को नियुक्त करने वाली सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी के लिए कोई असुविधा खड़ी करना नहीं चाहतीं। नतीजा यह होता है कि बच्चों और महिलाओं के शोषण के सारे ही मामले अदालतों तक जाते हैं जो कि पहले से चल रहे मामलों के बोझतले वैसे भी बेअसर साबित हो रही हैं। न तो किसी विशेष कानून की जरूरत है, और न ही किसी विशेष अदालत की, जरूरत तो केवल एक आम हौसले की है, और राजनीतिक इच्छाशक्ति की है कि सत्ता पर बैठे लोग मुजरिमों को न बचाएं। अगर यह सिलसिला खत्म हो जाएगा तो मुजरिम रातोंरात जेल में रहेंगे, और कुछ महीनों में ही कैद शुरू हो जाएगी। (Daily Chhattisgarh)

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