ऐसी हरकत से धर्म का भला तो हो सकता है, योग का नहीं

संपादकीय
21 जून 2018


अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर संयुक्त राष्ट्र से लेकर चीन तक, दुनिया भर में योग किया गया, और भारत में भी अधिकतर राज्यों में सरकारों ने ही इसका आयोजन किया। लेकिन बिहार की खबर है कि वहां सरकारी आयोजन में भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या उनकी पार्टी जदयू के मंत्री-नेता शामिल नहीं हुए। पार्टी की तरफ से अनौपचारिक रूप से यह कहा गया कि योग एक निजी काम है, जो कि घर में किया जाता है, और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राजनीति जनधारणा की चीज होती है, और राजनीतिक विश्लेषक इसे प्रधानमंत्री मोदी के बढ़ाए हुए एक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अभियान से अपने को अलग करने के नीतीश कुमार के फैसले को एक किस्म की शुरुआत मान रहे हैं। ऐसी चर्चाएं खबरों में हैं कि दलितों, महादलितों, और पिछड़ों के बीच अपना जनाधार कमजोर होता देखकर जदयू ऐसा फैसला ले सकता है कि वह अगला चुनाव भाजपा के साथ मिलकर न लड़े। जदयू के कुछ नेताओं की तरफ से यह बात सामने आई है कि भाजपा ने योग को एक धर्मविशेष से इस तरह जोड़ दिया है कि दूसरे धर्मों के लोग इससे कतराने लगे हैं, और ऐसे योग-प्रदर्शन से जुडऩे का मतलब, उन तबकों का साथ खोना भी हो सकता है। और जैसा कि हमने कुछ दिन पहले इसी जगह लिखा था कांग्रेस ने नीतीश पर डोरे डालना शुरू भी कर दिया है। 
लेकिन राजनीति पर लिखना आज का मकसद नहीं है। आज हम योग के बारे में लिखने जा रहे हैं जो कि निर्विवाद रूप से तन और मन को सेहतमंद रखने में मददगार है, और भारत की एक बहुत पुरानी विद्या या जीवनशैली है। यह न तो हिन्दू धर्म तक सिमटी हुई है, और न ही इसका रंग भगवा है। देश में बहुत से ऐसे योग गुरू हुए जिन्होंने फुटपाथी मदारियों की तरह ताबीज बेचने के अंदाज में कभी काम नहीं किया, न ही उन्होंने योग का नाम लेकर कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया, और जिन्होंने बहुत गंभीरता से इसे एक गंभीर निजी जीवनशैली बनाया। लेकिन आज ब्रांड और मार्केटिंग का जमाना है, इसलिए आज योग को हिन्दुत्व के भगवे-केसरिया रंग की पैकिंग में बाजार में पेश किया गया है, और इस छाते तले रामदेव जैसे कारोबारियों ने दसियों हजार करोड़ का धंधा खड़ा कर लिया। इससे परे जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने, और उनके दूसरे नेताओं या प्रदेश की सरकारों ने योग को एक धर्म के साथ, एक रंग के साथ जोड़कर पेश किया, तो बहुत से दूसरे लोग इससे कतरा गए। योग का फायदा अगर दुनिया के लोगों तक पहुंचाने की बहुत साफ नीति हो, तो उसे धर्म से अलग रखना होगा, चाहे उसे शुरू करने वाले व्यक्ति किसी धर्म के ही क्यों न हो। आज जब धर्म को एक आक्रामक हथियार बनाकर दुनिया भर में बहुत से धर्मों के लोग हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे हैं, या बिना हथियारों के भी हिंसा कर रहे हैं, साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं, कट्टरता कर रहे हैं, तब जरूरत इस बात की है कि योग को स्वास्थ्य विज्ञान की तरह ही पेश किया जाए, और उससे धार्मिक रंग को हटाया जाए। 
कई बार किसी एक लोकप्रिय चीज का फायदा उठाने के लिए कोई पार्टी, कोई संगठन, कोई धर्म या कोई सम्प्रदाय अपने आपको उस चीज का वारिस बताते हुए उस पर एकाधिकार जताने लगते हैं। और ऐसे में ही उस चीज, बात, या तकनीक का सामाजिक योगदान सीमित हो जाता है। आज भारत में योग को अगर एक धर्म के एक हिस्से की तरह दूसरों पर थोपा जाएगा, तो बहुत से लोग इसकी प्रतिक्रिया में इससे दूर रहेंगे। जिस तरह लोगों पर वंदे मातरम को थोपा जाता है, तो लोग इस थोपने का विरोध करते हैं, न कि वंदे मातरम का। जब लोगों पर राष्ट्रगान के दौरान खड़ा होना थोपा जाता है, तो लोग इस खड़े रहने का विरोध करते हैं, न कि राष्ट्रगान का। दूसरी तरफ ऐसे ही विरोध को देशद्रोह का रंग देकर पेश कर दिया जाता है, और एक हमले की बुनियाद बना दिया जाता है। यह समझने की जरूरत है कि जो लोग योग को एक थोपे हुए धार्मिक रंग के साथ पसंद नहीं करते, वे न तो योग विरोधी हैं, न ही उस धर्म के विरोधी हैं, और न ही वे देशद्रोही हैं। आज भारत में जरूरत इस बात की है कि योग को धर्म से परे ही रखा जाए। वरना ऐसी हरकत से किसी धर्म का तो भला हो सकता है, योग का नहीं। (Daily Chhattisgarh)

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