हिंदुस्तानी राजनेताओं को लातविया भेजने की जरूरत

संपादकीय
22 जून 2018


योरप की एक खबर है कि वहां के एक देश लातविया के लोग बहुत कम बोलना पसंद करते हैं। और ऐसा किसी एक-दो लोगों की आदत नहीं है, वहां की अधिकतर आबादी कम बोलने वाली है। वहां लोग बड़े रचनात्मक होते हैं, लेकिन कम बोलते हैं। यह बात भारत को देखें तो बड़ी अटपटी लगती है जहां पर लोग बिन मौके भी इस अंदाज में बोलते हैं कि अगर न बोलें तो लोग इस गलतफहमी न रह जाएं कि उनके मुंह में जुबान ही नहीं है। हिंदुस्तान में नेताओं और फिल्मी सितारों में ऐसे लोगों की भरमार है जो कि जब तक कुछ उटपटांग बोलकर अपने लिए मुसीबत खड़ी न कर लें, उन्हें खाना ही नहीं पचता।

खासकर राजनीति में हिंदुस्तानी शायद इसीलिए अधिक आते हैं कि यहां अधिक बकवास की खासी गुंजाइश रहती है। राजनीति में वे खूब हिंसा की बात करते हैं, खूब नफरत की बात करते हैं, खुलकर झूठ बोलते हैं, और खासा बोलते हैं। लंबा-लंबा बोलते हैं जिसे लोग लंबी-लंबी छोडऩा भी कहते हैं। लेकिन लोगों का भारतीय राजनीति में आत्मविश्वास इतना अधिक है कि वे दमखम के साथ झूठ बोलते हैं, लगातार बोलते हैं, बार-बार बोलते हैं, और सुनने वाली जनता से वाहवाही, तालियों, और हामी, इन सबकी उम्मीद करते हैं। भारत के बहुत से नेता यह मानकर चलते हैं कि किसी झूठ को अगर बहुत अधिक बार बोला जाए, तो लोग उसे सच ही मान लेते हैं। अब ऐसे हिंदुस्तानियों को अगर लातविया जैसे किसी देश में रहकर काम करना पड़े, तो मुंह बंद रखने की सांस्कृतिक मजबूरी की वजह से ही हो सकता है उनका दम घुट जाए, और वे चल बसें। दूसरी तरफ लातविया से अगर कोई हिंदुस्तान आकर टीवी पर राजनेताओं को सुने, तो यह समझ ही न पाए कि वे नेता हैं या किसी धर्म और सम्प्रदाय के प्रवचनकर्ता। 
यहां पर एक दिक्कत मीडिया के साथ भी है जिसे आज लोगों की कही हुई बातों की वीडियो रिकॉर्डिंग भी हासिल है, और डिजिटल कतरनें भी। लेकिन इसके बाद भी मीडिया लोगों की कही हुई अलग-अलग बातों को साथ रखकर उनसे सवाल करने से कतराता है, और अब मानो धीरे-धीरे यह जिम्मा सोशल मीडिया को देकर मेनस्ट्रीम कहे जाने वाले मीडिया ने अपना जिम्मा छोड़ ही दिया है। मेनस्ट्रीम का मेन काम अब कारोबार रह गया है, और जब सोशल मीडिया पर कोई खबर बहुत ही ज्यादा फैल जाती है, तो मुख्य मीडिया उसे फैली हुई खबर की तरह ले लेता है। 
हिंदुस्तान के नेताओं को कुछ दिनों के लिए लातविया भेजना चाहिए ताकि उनका बोलना कम हो सके, और उनकी रचनात्मकता बढ़ सके। (dailychhattisgarh)

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