खुदकुशी के जिम्मेदार ये भी...

18 जून 2018

ऑस्ट्रेलिया की खबर है कि दुनिया भर में किसी समुदाय में नौजवानों की आत्महत्या सबसे अधिक है, तो यह वहां के एक आदिवासी समाज में है। वहां के मूल निवासी, एबओरिजिन, ऑस्ट्रेलिया के गैरमूल निवासियों के मुकाबले चार गुना अधिक आत्महत्या करते हैं। अब यह हैरानी की बात है क्योंकि आदिवासियों के बारे में यह माना जाता है कि वे कुदरत के करीब रहते हैं, और कम सहूलियतों के बीच भी वे अधिक संतुष्ट रहते हैं। ऐसे में लोग कुछ हैरान हैं, कुछ परेशान हैं कि इस समुदाय के नौजवान इतनी आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? आदिवासी बुजुर्गों का मानना है कि वे अपनी जमीन और अपनी परंपरागत संस्कृति से कटने की वजह से ऐसा कर रहे हैं।
खैर, यह तो हिन्दुस्तान से कुछ दूरी का मुद्दा है, लेकिन अपने करीब अगर देखें तो छत्तीसगढ़ में कल एक दिन में दो नौजवान मीडियाकर्मियों ने खुदकुशी की है। एक युवक जो सरगुजा में एक समाचार चैनल में काम करता था, उसने आत्महत्या की, और एक युवती जो बस्तर के एक अखबार में काम करती थी, उसने भी फांसी लगाकर आत्महत्या की।
कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने अभी कुछ देर पहले ट्वीट किया है कि पंजाब में दो और किसानों ने 16 जून को आत्महत्या कर ली। दो और किसान राजस्थान में मर गए, और एक मध्यप्रदेश में।
अमरीका के न्यूयॉर्क में अभी एक फैशन डिजाइनर केट स्पेड की आत्महत्या से भी बहुत से लोग सदमे में हैं क्योंकि वे एक बड़ी कामयाब फैशन डिजाइनर थीं, लेकिन लंबे समय से बेचैनी और निराशा की शिकार हुई थी। लोगों ने इस खबर के साथ अमरीका के राष्ट्रीय आत्महत्या निरोधक हॉटलाईन का नंबर भी पोस्ट किया है।
अब एक सवाल उठता है कि कहीं कामकाजी नौजवान, तो कहीं कर्ज में लदे बुजुर्ग किसान, तो कहीं प्रकृति के बीच रहते आदिवासी, तो कहीं न्यूयॉर्क की एक बड़ी फैशन डिजाइनर, हर किस्म के लोग आत्महत्या करते दिखते हैं, तो आखिर इस मर्ज की दवा क्या है?
एक तो इस मोर्चे पर अच्छी बात यह हुई है कि भारत की सुप्रीम कोर्ट और संसद, सरकार, इन सबने देश में यह कानून सुधार दिया है जिसमें आत्महत्या की कोशिश को या आत्महत्या को जुर्म करार दिया जाता था। आत्महत्या कोई शौक से तो करते नहीं, और जब कोई ऐसी कोशिश में कामयाब हो जाएं, तो उन्हें सजा देने की ताकत किसी कानून में है नहीं। ऐसे में जो लोग आत्महत्या की कोशिश करते बच जाते थे, वे उसके बाद मुकदमा भी झेलते थे। अब वह सिलसिला खत्म हुआ, और देश को यह अक्ल आई कि आत्महत्या जुर्म नहीं है। लेकिन बेवक्त खत्म होने वाली जिंदगियों का आखिर क्या होगा? कैसे इन्हें बचाया जा सकता है?
आत्महत्या के साथ एक दिक्कत यह भी है कि बहुत से लोग इन्हें बीमारी, गरीबी, मानसिक रोग, या इस किस्म की कुछ गिनी-चुनी बातों से जोड़कर देखते हैं, और इनके पीछे की बाकी वजहें धरी रह जाती हैं। ऐसे में जरूरत आत्महत्या को रोकने पर फोकस करने के बजाय जिंदगी जीने की वजहें बढ़ाने की है। और यह काम कुछ अधिक मुश्किल है क्योंकि यह सरकार या देश और समाज, इन सबसे बहुत बड़ी मशक्कत मांगता है। आज निराशा की वजहें बहुत हैं, आसान है, गली-गली हर घूरे पर बिखरी हुई हैं, लेकिन जीने की वजहें हैं तो उससे अधिक, लेकिन दिखती कम है। ठीक उसी तरह जैसे कि तालाब में पानी बहुत रहता है, लेकिन पहली नजर में उस पर तैरता चाहे थोड़ा सा ही क्यों न हो, कचरा सबसे पहले दिखता है। इसी तरह जिंदगी में जिंदा रहने की वजहें, खुश रहने की वजहें काफी रहती हैं, लेकिन लोग अपने दुख-तकलीफ को ही सब कुछ मानकर उससे परे देखना बंद कर चुके रहते हैं।
हमारे सरीखे कुछ लोगों को यह भी लगता है कि अगर अपने से अधिक तकलीफदेह जिंदगी को देखा जाए तो अपनी तकलीफ का एहसास घटने लगता है, और जिंदगी से निराशा भी उतनी अधिक नहीं रह जाती। कई बार लगता है कि जिनको अपनी जिंदगी से बड़ी शिकायतें हों, उन्हें एक बार किसी बड़े सरकारी अस्पताल में, वहां के जनरल वार्ड में, वहां के बरामदों और अहातों में जीते लोगों को देखना चाहिए, मरीजों को देखना चाहिए, तो अपनी दर्दभरी जिंदगी अनायास ही चमकीली सुनहरी लगने लगेगी। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें दूसरों का उतना अधिक दुख-दर्द देखकर निराशा और अधिक बढ़ जाए। इसलिए कोई एक नुस्खा सभी लोगों को रामबाण दवा की तरह असरदार नहीं हो सकता।
दूसरी बात यह भी समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान जैसे गरीब देश में मनोचिकित्सक बहुत ही कम लोगों को नसीब होते हैं। उनके पास भीड़ इतनी अधिक होती है कि वे मन का इलाज करने के बजाय तगड़ा असर करने वाली दवाओं को देकर मरीजों की भीड़ से एक किस्म से फारिग होते हैं। और चिकित्सा से परामर्श वाला हिस्सा गायब हो जाता है, क्योंकि परामर्श जितने समय में मनोचिकित्सक चार और मरीज देख सकते हैं।
सरकार से जिंदगी में खुशहाली की जो उम्मीद की जाती है, वह खासी बड़ी है, और उसका पूरा होना लगभग असंभव रहता है। इसलिए बात घूमफिरकर समाज और परिवार पर, दोस्तों और करीबियों पर आ जाती है अपने बीच के किसी को आत्महत्या से कैसे रोका जाए? ऐसा रोक पाना हो सकता है कि अधिकतर मामलों में मुमकिन न हो, लेकिन फिर भी जितने लोगों को बचाया जा सके, उतने लोगों की जिंदगी कम कीमती तो होती नहीं। इसलिए लोगों को अपने आसपास की निराशा को, तनाव को भांपकर उसे कम करने की कोशिश करनी चाहिए।
लेकिन एक दूसरा बड़ा जिम्मा समाज और मीडिया पर आता है जो कि चारों तरफ नकारात्मकता को बढ़ाने के जिम्मेदार हैं। भारत जैसे चुनावी-लोकतंत्र में अब नेताओं और पार्टियों के बीच, धर्मान्धों और कट्टर पाखंडियों में नकारात्मकता जिंदा रहने के लिए चारा-पानी सरीखी हो गई है, और यह जहर हवा में चारों तरफ फैल रहा है। जिस तरह दिल्ली की हवा में अब हर बरस कई बार कई किस्म का जहर जिंदगी को थाम रहा है, उसी तरह पूरे वक्त, चारों तरफ हिंसा और निराशा की बातें जिंदगी में लोगों के भरोसे को थका दे रही हैं। भारतीय लोकतंत्र में बहुत लोगों को जिंदा रहने की बहुत सी वजहें दिखना अब कम हो चला है। लोग अपनी निजी दिक्कतों से परे भी, सामाजिक और सामुदायिक दिक्कतें देखकर एक निरंतर-निराशा में जीते हैं, और जब वे आत्महत्या की सोचते हैं, तो निजी वजहों के साथ-साथ, ऐसी सामुदायिक या सामाजिक वजहें भी रहती हैं, अपने देश की वजहें भी रहती हैं।
इसलिए जिन लोगों के मुंह के सामने माईक अधिक रहता है, जिनके चेहरों पर कैमरे अधिक टिके होते हैं, जिनका लिखा हुआ अधिक छपता है, अधिक दिखता है, अधिक बिकता है, उन सब पर यह एक अधिक बड़ी सामुदायिक जिम्मेदारी भी आती है कि महज अपने जिंदा रहने के लिए, अपना अस्तित्व बनाए और बचाए रखने के लिए वे इतनी निराशा-हिंसा न फैलाएं कि लोगों में उसकी वजह से जिंदा रहने की हसरत ही घटती चले। ये लोग किसी खुदकुशी के सीधे-सीधे जिम्मेदार कभी नहीं ठहराए जा सकेंगे, लेकिन ये जिम्मेदार रहते जरूर हैं। (Daily Chhattisgarh)

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