राष्ट्रपति भवन में इफ्तार बंद तो बहुत अच्छा है, लेकिन..

संपादकीय
6 जून 2018


राष्ट्रपति भवन में इस बरस से इफ्तार पार्टी न होने का फैसला सामने आया है। इसके पहले एनडीए सरकार के ही बनाए हुए एक राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने भी यही फैसला लिया था, और इफ्तार पार्टी पर होने वाले खर्च को गरीबों में बांट देना तय किया था। यह एक बहुत अच्छा फैसला है, और मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का यह तर्क सही है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, और यहां सरकार को किसी भी किस्म के धार्मिक आयोजन पर जनता का पैसा खर्च नहीं करना चाहिए। सरकार के पास तो पैसा जनता का ही होता है, उसका खजाना न और कहीं से आता है, और न किसी का उस पर हक होता है। भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, और इसलिए उनके उपवास के महीने रमजान में बहुत सी सरकारें, बहुत से नेता ऐसा आयोजन करते आए हैं, और अभी तो दिल को छू लेने वाली इफ्तार दावत हुई है जिसमें एक ऐसे हिन्दू नौजवान के पिता ने इफ्तार दावत की जिसके नौजवान बेटे को मुस्लिमों ने मार डाला था। आज ही जेएनयू की तस्वीर आई है कि वहां सभी धर्मों के लोग एक साथ बैठकर इफ्तार दावत कर रहे हैं। देश में जगह-जगह कहीं मंदिरों में तो कहीं गुरुद्वारों में मुस्लिमों को इफ्तार दावत दी जाती है, या किसी बारिश जैसी परेशानी के वक्त उन्हें वहां नमाज पढऩे का न्यौता दिया जाता है। 
भारत बहुत ही गौरवशाली परंपराओं वाला एक देश रहा है जिसमें धार्मिक विविधता के बीच एकता बनी आई है। और आज जब राष्ट्रपति ने यह सिलसिला शुरू किया है कि किसी धार्मिक आयोजन पर सरकार का पैसा खर्च न हो, तो फिर केन्द्र की सरकार और राज्यों की सरकारों को भी यह सोचना होगा कि क्या वे किसी धर्म पर सरकार का पैसा खर्च कर रहे हंै? उत्तरप्रदेश एक बड़ी मिसाल है जहां पर योगी सरकार आने के बाद प्रदेश को शाब्दिक अर्थों में भगवा किया गया, और सरकारी पैसे पर किया गया। तमाम सरकारी इमारतों पर सरकारी खर्च से, यानी जनता के पैसों से, दुबारा रंग-पेंट किया गया। इसी तरह उत्तरप्रदेश की सरकारी बसों को भगवा रंगा गया। हद तो तब हो गई जब मुस्लिम समाज के लिए बने हुए हज हाऊस को भी भगवा रंगवा दिया गया। और अभी दो दिन पहले की खबर है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहीं दौरे पर पहुंचने वाले थे तो वहां सरकारी विश्रामगृह के शौचालय में टाईल्स को बदलकर भगवे रंग की टाईल्स लगवाई गईं। जनता का पैसा शौचालय के रंग को बदलने पर बर्बाद करना धर्मान्धता और सरकारी आपराधिक फिजूलखर्ची की पराकाष्ठा है। लेकिन योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से इस तरह के फिजूलखर्ची के खिलाफ मुख्यमंत्री या सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से एक शब्द भी ऐसा कहीं नहीं गया जिससे ऐसा लगे कि ऐसी फिजूलखर्ची से सत्ता-संगठन असहमत है। 
यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। लेकिन यह सिलसिला भारतीय लोकतंत्र में न तो महज धर्म से शुरू हुआ, और न ही महज भाजपा से। धर्म से परे भी गुजरात में साढ़े तीन हजार करोड़ रूपए की लागत से सरदार पटेल की प्रतिमा को बनाकर एक विश्व रिकॉर्ड कायम करने का काम चल रहा है। फिर मानो इसी के मुकाबले मुंबई में शिवसेना-भाजपा की सरकार ने समंदर में छत्रपति शिवाजी का स्मारक लगभग इतनी ही लागत से बनाना शुरू किया है। लेकिन उत्तरप्रदेश में मायावती ने खुद के मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी, अपने नेता कांशीराम, और डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमाओं सहित अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की दानवाकार प्रतिमाएं हजारों करोड़ खर्च करके बनवाईं, और यह काम कुपोषण और भूख से दबे हुए इस प्रदेश में सरकार खर्च से हुआ। इसी उत्तरप्रदेश में इसी योगी सरकार का एक फैसला अभी सामने आया है जिसमें भगवान राम की प्रतिमा को एक रिकॉर्ड ऊंचाई का बनाने की घोषणा की गई है, और उसमें भी शायद सैकड़ों करोड़ रूपए जनता की जेब से जाने वाले हैं।
हमारा ख्याल है कि राष्ट्रपति की दिखाई राह पर केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को खुद होकर धर्म पर खर्च से हाथ खींचना चाहिए, और इसके अलावा कुछ जनसंगठनों को सुप्रीम कोर्ट भी जाना चाहिए कि सरकारों को ऐसी बर्बादी से कैसे रोका जाए जिससे जनता की जेब पर बोझ पड़ रहा है, गरीब बच्चों के मुंह से कौर छिन रहा है, और धार्मिक भेदभाव बढ़ रहा है। धर्मनिरपेक्षता का मतलब किसी भी धर्म का सरकारी खर्च को गैरकानूनी मानना भी होना चाहिए। इस बारे में राजनीतिक दल और उनकी सरकारें तो कुछ नहीं करेंगी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट जरूर कुछ कर सकती है। (Daily Chhattisgarh)

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