कॉफी साफ करता एक सम्पन्न देश का पीएम और विपन्न भारत के नेता

संपादकीय
7 जून 2018


हॉलैंड के प्रधानमंत्री का एक वीडियो चारों तरफ तैर रहा है जिसमें वे अपने हाथ से गिरकर फर्श पर बिखर गई कॉफी को पोंछा लगाकर साफ कर रहे हैं। और यह किसी स्वच्छ हॉलैंड अभियान के लिए शूट करवाया गया वीडियो नहीं है, यह असल जिंदगी में अनायास हुई घटना पर आसपास खड़े किसी का बनाया गया शौकिया वीडियो है। यह हाल योरप के बहुत से देशों में देखने मिलता है कि शासन प्रमुख या राष्ट्रप्रमुख कहीं साइकिल से आते-जाते दिखते हैं, कहीं बस में। ओहदे की शान दिखाने की बददिमागी वहां लोगों को सार्वजनिक जीवन से बाहर धकेल सकती है। इसके लिए नेता का सरल और सहज होना जरूरी नहीं होता है इसके लिए आम जनता में अपने हक के लिए चौकन्नापन जरूरी होता है।
हिंदुस्तान में हाल इसका ठीक उल्टा है। यहां पर मंत्री और मुख्यमंत्री कहीं सुरक्षा कर्मचारियों से जूते बंधवाते दिखते हैं तो कहीं जिले के अफसर भी पानी पार करते हुए सिपाही को जूते थमा देते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को तो पानी पार करवाने के लिए पुलिस वाले बच्चे की तरह ढोकर ले गए थे। बहुत से मंत्री और अफसर कचरे की टोकरी को पीकदान की तरह इस्तेमाल करते हैं जिन्हें उनके कर्मचारी रोज साफ करते हैं। एक तरफ हॉलैंड का प्रधानमंत्री सफाईकर्मी से पोंछा लेकर खुद फर्श साफ करता है, दूसरी तरफ भारत में मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर अघोषित रूप से तैनात सिपाही बच्चों की टट्टी धुलाते हैं, कुत्ता नहलाते हैं और परिवार के भीतरी कपड़े तक धोते-सुखाते हैं।
इस हिंदुस्तान को अपने कभी भी मौजूद न रहे जिस कथित गौरवशाली अतीत पर गर्व करने से फुरसत नहीं है, उसके वर्तमान में घोड़ी चढऩे पर दलित दूल्हे का कत्ल हो जाता है, कोई दलित नाम के आखिर में सिंह लिख दे तो उसे मार दिया जाता है। ऐसे हिंदुस्तान में आज जो करोड़ों शौचालय बनाए जा रहे हैं, उनका टैंक भर जाने पर उसे खाली करने का जिम्मा शायद बाईसवीं सदी तक दलितों का ही रहेगा। दलित सफाई के लिए तो चाहिए, लेकिन आंखों के सामने नहीं पडऩा चाहिए, घोड़े पर नहीं चढऩा चाहिए, सवर्ण बस्ती में नहीं रहना चाहिए। सत्तारूढ़ या सवर्ण या सम्पन्न या शिक्षित का अहंकार हिंदुस्तानी जिंदगी में जगह-जगह दिखता है। और यही अहंकार लोगों को खुद को इतना बददिमाग कर देता है कि वह दूसरों को शूद्र मानने देता है, अछूत। काम के लिए वांछित लेकिन इंसानी जिंदगी के लिए अवांछित।
हिंदुस्तान में सरकारी बंगलों पर सिपाहियों और दूसरे कर्मचारियों की तैनाती तुरंत खत्म होनी चाहिए। ताकत का प्रतीक बने पुलिस-अंगरक्षक तुरंत हटने चाहिए। जिनकी जिंदगी को सचमुच खतरा हो, उनको भी भुगतान पर ही गार्ड मिलने चाहिए अगर उनकी हैसियत भुगतान की हो। छोटे ओहदों पर काम करने वालों को इंसानी दर्जा तभी मिल सकेगा जब बड़े ओहदों पर बैठे लोगों का उनके हक का बेजा इस्तेमाल रोका जाएगा। जब ऐसा होगा, तभी लोगों के मन में सफाई जैसे काम के लिए हिकारत खत्म होगी, और लोग खुद भी बिना कैमरों के सफाई कर सकेंगे।
भारत एक गरीब लोकतंत्र है। यहां योरप जैसी रईसी नहीं है। लेकिन यहां के नेता-अफसर अठारहवीं सदी के योरप के राजाओं जैसी रईसी से जीते हैं। जनता को इसके खिलाफ लगातार आवाज उठानी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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