ऐसा संगठित सरकारी भ्रष्टाचार कार्रवाई न होने से बढ़ता है

संपादकीय
8 जून 2018


छत्तीसगढ़ में जोगी कांगे्रस के लोगों ने वन विभाग से सूचना के अधिकार में हासिल किए गए कागजात दिखाते हुए आरोप लगाया है कि करोड़ों रुपये की मुरुम खरीदी बिना टेंडर करने की बात विभाग ने मानी है, और इस मुरुम की ढुलाई की गाडिय़ों के जो नंबर दिए गए हैं, उनमें से बहुत सी गाडिय़ां तो दुपहिया हैं। अब यह जाहिर है कि यह पूरा सिलसिला मासूम तो हो नहीं सकता, इसके पीछे वह संगठित भ्रष्टाचार होगा जो कि इस विभाग में एक आम बात है। लेकिन छत्तीसगढ़ में इस विभाग से परे भी दूसरे कई ऐसे विभाग पिछले बरसों में पकड़ाए हैं जिन्होंने सरकारी ढुलाई दुपहिया पर करवाई थी। लोगों को याद होगा कि बिहार में जो चारा घोटाला हुआ, और जिसमें लालू यादव को कई अलग-अलग कैद हो चुकी हैं, उसमें भी चारा की ढुलाई दुपहिया पर बताई गई थी।
सरकार के भ्रष्टाचार को देखें तो यह जाहिर है कि वह संगठित होता है, साजिश के तहत होता है, और उसमें नेता-अफसर दोनों तबकों के लोग शामिल होते हैं। और जब ऐसे मामलों में किसी पर बरसों तक कोई कार्रवाई नहीं होती है, तब दूसरे लोगों का भी हौसला ऐेसे काम के लिए बढ़ता है। छत्तीसगढ़ में पिछले कई बरस लोगों ने तरह-तरह के संगठित भ्रष्टाचार तो देखें हैं, कई मामले तो ऐेसे रहे जिन्हें सरकार की एजेंसियों ने ही बड़े-बड़े दावों के साथ दर्ज किया, बड़े-बड़े पे्रस नोट जारी किए, सैकड़ों करोड़ के भ्रष्टाचार का अनुमान सामने रखा, और फिर ऐसे मामले या तो अदालत में ही नहीं पहुंचे, या फिर किसी बड़े नेता-अफसर को कटघरे में ले जाया ही नहीं गया। ऐसे में राज्य में एक लंबे-चौड़े बजट का एक लंबा-चौड़ा हिस्सा अगर भ्रष्टाचार में जा रहा है, तो उसमें कोई हैरानी नहीं है।
हमने पहले भी कई बार यह सलाह दी है कि सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार पर निगाह रखने के लिए जांच एजेंसियों से परे एक खुफिया एजेंसी बनानी चाहिए जो कि जानकारी जुटाकर जांच एजेंसियों को देती रहे। आज जब तक कोई भ्रष्टाचार पकड़ में आता है, तब तक सरकार का खासा बड़ा नुकसान हो चुका रहता है। और भ्रष्टाचार में गई रकम कभी लौटती नहीं है। ऐसी खुफिया एजेंसी प्रदेश में हो रहे गैरसरकारी आर्थिक अपराधों के लिए भी रहनी चाहिए जो कि चिटफंड, बैंक घोटाले, जमीन और मकानों की खरीद-बिक्री के संगठित घोटाले जैसे मामलों पर नजर रखे, और समय रहते लोगों को सावधान करे, मुजरिमों को पकड़े। जब चिडिय़ा चुग गई खेत, तब सिर पीटने से क्या होता है? और इस मिसाल में चिडिय़ा का इस्तेमाल गलत भी है क्योंकि धरती पर उगी फसल को खाने का उसका तो हक है। लेकिन सरकार का पैसा हो, या जनता की जेब का पैसा, जब वह भ्रष्टाचार और जुर्म में लुट जाता है, तो वह वापिस कभी नहीं आता। 
केंद्र सरकार हो, या राज्य सरकारें, या पंचायत और म्युनिसिपल जैसी स्थानीय संस्थाएं, इनमें से किसी भी में भी किसी अपराध के मुकदमे के लिए सरकार से मंजूरी लेने का सिलसिला खत्म हो जाना चाहिए, उसके बिना भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकेगी, और इसी तरह बिना टेंडर करोड़ों की मुरुम दुपहियों पर आती-जाती रहेगी। चारा घोटाले को पकडऩे का बिहार में यह भी एक मुद्दा था, अब देखें कि छत्तीसगढ़ में उसी अंदाज में ट्रांसपोर्ट पर क्या कार्रवाई होती है? (Daily Chhattisgarh)

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