अमरीकी अखबार पर एक शिकायतकर्ता का हमला...

संपादकीय
29 जून 2018


सुबह-सुबह अमरीका से फिर एक शूटिंग की खबर आई, और इस बार यह किसी स्कूल-कॉलेज या रेस्त्रां में न होकर एक अखबार के दफ्तर से निकली। एक बंदूकबाज हथगोले सहित वहां पहुंचा, और उसने धुएं का हथगोला फेंककर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, और अखबार के पांच लोगों को मार डाला। इस हमलावर का अखबार से पहले का एक लेना-देना था, उसने 2012 में इस अखबार पर मानहानि का मुकदमा किया था, और वह केस हार गया था। इस बार का हमलावर गिरफ्तार भी हो गया है, और उसके सोशल मीडिया पेज पर अखबार के लिए धमकियां भी दिखी हैं। अमरीका में चूंकि हर किसी के लिए कितने ही हथियार खरीद लेने को कानूनी मंजूरी है, और इन हथियारों में भयानक, हमलावर फौजी हथियार भी रहते हैं जो कि किसी आत्मसुरक्षा के लिए नहीं रहते, और जिनसे एकमुश्त दर्जनों लोगों को मारा जा सकता है। अमरीका में हर कुछ हफ्तों में ऐसी गोलीबारी सामने आती है जिसके बाद वहां के समझदार लोग गनकंट्रोल की पुरानी मांग दुहराते हैं, और हथियारों के कारखानेदार सरकार पर अपनी मजबूत पकड़ के चलते ऐसी अपील खारिज करवा देते हैं। 
यहां पर दो-तीन अलग-अलग मुद्दों के बारे में सोचने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि अमरीका जैसा देश जहां पर अदालतों की कार्रवाई हिन्दुस्तान जैसे देश के मुकाबले बहुत तेज रहती है, और जहां अदालतों में पैसेवालों का या ताकतवर लोगों का ऐसा बोलबाला नहीं रहता जैसा कि हिन्दुस्तान में रहता है। ऐसे देश में मानहानि का एक मुकदमा हार जाने के बाद किसी को आमतौर पर इतना निराश नहीं होना था जैसा कि यह हमलावर हुआ। अमरीका में मीडिया की आजादी कोई अनोखी बात नहीं है, और वहां लोगों के बीच भी यह समझ है कि वहां के संविधान में ही मीडिया को अलग से आजादी दी गई है। फिर भी एक अखबार से शिकायत को लेकर एक नौजवान इस तरह विचलित हुआ कि उसने ऐसा जानलेवा हमला किया जैसा कि इसके पहले किसी ने कहीं देखा-सुना नहीं था। किसी आतंकी संगठन के लोग तो दुनिया में जगह-जगह मीडिया पर ऐसा हमला कर चुके हैं, लेकिन किसी अकेले खफा इंसान ने शायद ही ऐसा किया हो। 
लोकतंत्र में मीडिया की आजादी कुछ खतरों के साथ आती है, और वे खतरे दूसरे अलग-अलग पेशों में अलग-अलग किस्म के हो सकते हैं। हिन्दुस्तान में कश्मीर से लेकर बस्तर तक, और मध्यप्रदेश के खनिज माफिया लोगों के बीच भी, मीडिया के लोग तरह-तरह के खतरे झेलते हैं, लेकिन अपना काम जारी रखते हैं। अमरीका के जिस अखबार पर ऐसा हमला हुआ, उसने इसके बीच भी आज का अखबार निकाला, पहले पन्ने पर अपने खोए हुए पांच साथियों की तस्वीरों सहित। अब मीडिया के काम से हर जगह कुछ न कुछ लोग तो नाखुश होंगे ही, इसलिए हिफाजत के लिए मीडिया तो हाथ पर हाथ धरकर बैठ नहीं सकता, और न ही हर अखबार या चैनल के दफ्तर पर हथियारबंद पुलिस तैनात हो सकती है। लेकिन अमरीका के आम हाल को देखते हुए यह बात साफ है कि वहां अपने नागरिकों की व्यक्तिगत आजादी इतनी अधिक है कि वह दूसरे नागरिकों की व्यक्तिगत हिफाजत को पूरी तरह खत्म कर देती है। आत्मसुरक्षा की जरूरत से परे लोगों को ऐसे ऑटोमेटिक हथियारों का जखीरा खरीदकर रखने की छूट है जिससे अनगिनत लोगों को मारा जा सकता है। कहने को अमरीका एक बड़ा लोकतंत्र बनता है, और उसकी अपनी जमीन पर अपने लोगों को दूसरे देशों के मुकाबले अधिक आजादी भी है, लेकिन यह अधिक आजादी आत्मघाती हो रही है। ऐसा खतरा समाज की तरफ से नहीं आ रहा है, यह हथियार बनाने वाली कंपनियों की तरफ से थोपा हुआ खतरा है, महज मुनाफे के लिए। अमरीकी फिल्मों से लेकर अमरीकी टीवी सीरियलों तक, हथियारों को ऐसे ग्लैमर के साथ दिखाया और पेश किया जाता है कि लोग उन्हें पाने के लिए बेचैन हो जाएं। यह सब कुछ एक मिलीजुली साजिश है कि कारोबार बढ़े। इस सिलसिले में यह भी सोचने का एक पहलू है कि कारोबार किस तरह लोगों की जिंदगी को कुचलते हुए महज अपने मुनाफे की फिक्र करते हैं। यह हमला भारत से दूर हुआ है, लेकिन इस तरह के दूसरे हमले, शायद बिना हथियारों के, बाजार भारत पर भी कर रहा है, और भारत चौकन्ना रहना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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