सालाना जलसों के मौकों पर विसंगतियां और विरोधाभास, दिखते हैं, और उभरकर...

संपादकीय
28 जून 2018


आज कबीर जयंती पर देश भर में जगह-जगह जहां भी कबीर की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं, और जहां भी कबीरपंथी बसे हुए हैं, उन तमाम जगहों पर तरह-तरह के कार्यक्रम हो रहे हैं, और सुबह से कुछ घंटे तो टीवी पर लगातार कबीर की समाधि पर चल रहे कार्यक्रम को दिखाया जा रहा है जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मौजूद हैं। उत्तरप्रदेश में मगहर नाम की इस जगह पर अगल-बगल कबीर की समाधि और उनकी मजार दोनों ही मौजूद हैं, और हिन्दू और मुस्लिम अपनी-अपनी आस्था के मुताबिक कबीर की उपासना करते हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही शिर्डी में सांईबाबा को लेकर है, और उनके भी मानने वाले हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही हैं। राजस्थान में रामदेवरा नाम की जगह पर रामदेव की समाधि है जिन्हें हिन्दू बाबा रामदेव कहते हैं, और मुस्लिम उन्हें रामसा पीर कहते हैं। आजादी के पहले तक इस सरहदी गांव में भारत और पाकिस्तान दोनों तरफ के लोग आते थे, लेकिन अब वह मुमकिन नहीं रह गया है। लेकिन हिन्दू और मुस्लिम दोनों के बीच उनकी मान्यता है। ऐसा ही कुछ कबीर का भी रहा। लेकिन आज कबीर की समाधि पर चांदी जड़ दी गई है, उनके मानने वालों के बीच रिवाज और धार्मिक तौर-तरीके इतने प्रचलित हो गए हैं कि जिन धार्मिक पाखंडों के खिलाफ कबीर पूरी जिंदगी दुनिया के, संभवत:, सबसे हौसलामंद सुधारवादी बने रहे, आज उनकी तस्वीरें भी धार्मिक साज-सज्जा के बिना नहीं दिखती हैं। जबकि कबीर ने पूरी जिंदगी एक हाथकरघा कारीगर के रूप में काम किया, और उनकी तमाम नसीहतें धार्मिक पाखंडों के खिलाफ हैं। 
लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह है जब कभी कबीर जयंती पर कबीर को याद करके लोग उनके बारे में बड़ी-बड़ी, लंबी-लंबी बातें करते हैं, तो कबीर के ही इस हिन्दुस्तान में कबीर की नसीहतों, और आज लोगों की की जा रही बातों के ठीक खिलाफ मौजूद माहौल अधिक खटकने लगता है। कई सौ बरस पहले कबीर ने जो हौसलामंद बातें कही थीं, क्या आज कोई उतनी कड़ी जुबान में उतनी खरी-खरी बातें कहकर जिंदा रह सकते हैं? क्या आज लोग कबीर की बातों को किसी जिंदा के मुंह से सुनना बर्दाश्त कर सकते हैं? यह तो कबीर की बानी एक इतिहास की तरह लोगों के सामने है जिसे खारिज करना आसान नहीं है, इसलिए लोग चुपचाप उसे बर्दाश्त कर लेते हैं। और कबीर के कई अलग-अलग पहलुओं में से लोग उसी पहलू को सामने पेश करते हैं जो कि उन्हें धर्म के करीब लगता है। क्योंकि अगर कबीर के सुधार की बात करेंगे, तो आज के भाषण पाखंड लगने लगेंगे। लोग सवाल पूछेंगे कि कबीर अगर इतने ही पसंद हैं, तो फिर देश का माहौल आज ऐसा क्यों है? क्या साल के बाकी 364 दिन कबीर की नसीहतों पर अमल की जरूरत नहीं है? 
जब जिस बात की सालगिरह मनाई जाती है, अगर हालात उसके ठीक खिलाफ रहें तो फिर लोगों को वह विरोधाभास अधिक खटकने लगता है। अभी दो दिन पहले आपातकाल की सालगिरह मनाई गई, तो बहुत से लोगों ने इस बात से उसकी तुलना की कि देश में आज कौन-कौन सी बातें आपातकाल सरीखी हैं। आज कबीर जयंती पर लोगों को लगता है कि कबीर की कौन-कौन सी महान नसीहतों के ठीक खिलाफ जाकर आज देश का माहौल बनाया जा रहा है, बनाया जा चुका है। ऐसे सालाना जलसे विसंगतियों और विरोधाभासों को और अधिक तल्खी के साथ सामने रखते हैं। कबीर आसान नहीं है, कबीर बहुत मुश्किल हैं, और जो लोग बड़े-बड़े तबकों की गिनती के हिसाब से सबसे बड़े तबकों को संतुष्ट रखने में लगे रहते हैं, उन लोगों को कबीर की कड़वी, और खरी नसीहत पर अमल करना न सुहा सकता, न उनके लिए आसान है, और शायद उनकी ऐसी नीयत भी नहीं हो सकती। फिर भी आज के दिन, या ऐसे बहुत से दूसरे सालाना जलसों के दिन लोग कबीर की महानता का गुणगान करते हुए उस महानता की थोड़ी सी चमक अपने पर भी मलने की कोशिश करते हैं। पता नहीं लोगों को ऐसी चमक का राज दिखता है या नहीं। (Daily Chhattisgarh)

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