छत्तीसगढ़ी जनता को मिला इक्कीसवीं सदी का एक बुनियादी हक

संपादकीय
31 जुलाई 2018


छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य बन गया है जहां हर हाथ में मोबाइल फोन होगा, और वह भी महज कॉल करने के लिए नहीं, सभी तरह के इंटरनेट-डिजिटल कामों के लिए भी। सवा दो करोड़ आबादी के इस राज्य में पचास लाख लोगों को मुफ्त डेटा के साथ स्मार्टफोन देना शुरू हो गया है। कल के एक जलसे में छत्तीसगढ़ के इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के प्रमुख सचिव अमन कुमार सिंह ने इस मुफ्त फोन के बारे में अपनी और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सोच बताई कि कैसे इससे गांव-गांव में महिलाओं का सशक्तिकरण भी होगा। यह योजना रमन सरकार के तीसरे कार्यकाल की आखिरी योजना है, और एक सबसे बड़ी योजना भी। मोबाइल फोन, खासकर स्मार्टफोन शहरों में तो हर हाथों में दिखता है लेकिन गांवों में, और खासकर महिलाओं में इस तक पहुंच कम है।
अब यह समझने की जरूरत है कि सरकार की तरफ से एक चौथाई आबादी को ऐसे तोहफे की क्या जरूरत थी। इस शब्द, तोहफे, के पीछे ही पूरी कहानी छिपी हुई है। इस प्रदेश में रमन सरकार ने पिछले तीन कार्यकाल में हर इंसान के पेट भर खाने का पुख्ता इंतजाम करके एक बड़ा काम किया जिसकी दुनिया भर में वाहवाही हुई और छत्तीसगढ़ में कुपोषण घटा, भूख से मौतें अब इतिहास बन गईं। इसके बाद केन्द्र सरकार की कई योजनाओं के चलते, और राज्य की अपनी योजनाओं से भी गरीबों को मकान मिलना शुरू हुआ जो कि जारी है। इन दो बड़ी बुनियादी जरूरतों के बाद यह इक्कीसवीं सदी की बुनियादी जरूरत है, फोन-इंटरनेट। आटा के बाद अब डाटा।
योरप के कुछ सबसे जिम्मेदार लोकतंत्रों ने इंटरनेट के इस्तेमाल को नागरिकों का मूल अधिकार मान लिया है। इसे संवैधानिक दर्जा भी दे दिया है। योरप से दूर, कल तक का पिछड़ा, गरीब राज्य आज उसी दिशा में आगे बढ़ा है। अब यहां के सबसे विपन्न लोग भी डाटा-सम्पन्न हो रहे हैं। इंटरनेट तक पहुंच लोगों की जागरूकता, सम्पन्नता और आत्मनिर्भरता, इन सबको बढ़ाने का काम है। जो शहरी संपन्न और शिक्षित लोग हैं, उन्हें यह गरीबों को दिया जा रहा एक तोहफा लगेगा, वे इस बात को नहीं समझ पाएंगे कि यह तोहफा नहीं, हक है। यह इस जमीन के हर इंसान का इक्कीसवीं सदी का हक है जिसकी जल, जंगल, जमीन, और खदानों से शहरी लोग संपन्न हुए हैं, हो रहे हैं। यह राज्य के प्राकृतिक साधनों से उपजी संपन्नता के एक बड़े-छोटे हिस्से का सामाजिक बंटवारा है। जिन लोगों के घर-दफ्तर वाई-फाई से लैस हैं, वे आम लोगों के लिए इस बात का महत्व नहीं समझ पाएंगे, ठीक वैसे ही जैसे कि उन्होंने कई बरस पहले रमन सिंह के लागू किए एक रूपये किलो चावल का महत्व नहीं समझा था?
अब छत्तीसगढ़ सरकार को इस फोन के रास्ते महिलाओं की जागरूकता, बच्चों की पढ़ाई जैसे कामों को आगे बढ़ाना चाहिए। इस मोड़ पर सरकार को कुछ ऐसे कल्पनाशील लोगों को साथ लेना चाहिए जो गरीब तबकों की इस नई डिजिटल संपन्नता से उनका ज्ञान समृद्ध भी कर सके। फिलहाल इस बहुत बड़ी पहल के लिए रमन सिंह-अमन सिंह को बधाई। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 जुलाई

अन्ना हजारे, भाड़े के गांधीवादी ने एक बार फिर सुपारी ले ली

संपादकीय
30 जुलाई 2018


अपने-आपको गांधीवादी कार्यकर्ता कहने वाले अन्ना हजारे की ताजा मुनादी सामने आई है कि केंद्र सरकार द्वारा लोकपाल की नियुक्ति में देर करने के खिलाफ वे दो अक्टूबर, गांधी जयंती से आमरण अनशन करेंगे। अभी कुछ हफ्ते पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर खासी नाराजगी जाहिर की थी कि मोदी सरकार कई बरस से लोकपाल नियुक्ति की जिम्मेदारी से बचती चली आ रही है। यह बहुत ताजा इतिहास है और भारत के लोगों को अच्छी तरह याद है कि मनमोहन सिंह सरकार के वक्त अन्ना हजारे ने दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, जस्टिस हेगड़े जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर लोकपाल कानून बनाने के लिए इस किस्म का आंदोलन छेड़ा था, और लोकपाल की एक ऐसी तस्वीर पेश की थी जो कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ रामबाण दवा हो, और जिसके अस्तित्व में आते ही देश से भ्रष्टाचार पूरी तरह मिट ही जाएगा। अन्ना हजारे साल 2011 में दिल्ली में 12 दिनों की भूख हड़ताल के बाद देश में लोकपाल आंदोलन का चेहरा बन गए थे। उनके आमरण अनशन के बाद ही तत्कालीन यूपीए सरकार ने सदन में लोकपाल विधेयक पारित कराया था। लेकिन कई बरस गुजर जाने के बाद भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई है, और सुप्रीम कोर्ट इन बरसों में कई बार मोदी सरकार को छिड़क भी चुका है। 
अब सवाल यह है कि 2011 में अन्ना हजारे ने जिस अंदाज में एक आंदोलन शुरू किया था, उसे मोदी सरकार आने के बाद किनारे रखकर वे अपने गांव रालेगान सिद्धि जाकर सो गए थे। अब जब सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से सीधे-सीधे समय मांग चुका है कि वह बताए कि वह कब तक लोकपाल नियुक्त होगा, और अब केंद्र के हलफनामे का दिन भी आ गया है, तब एक बहुत ही धूर्त इंसान की तरह अन्ना हजारे एक बार फिर आंदोलन की बात कर रहे हैं। गांधी के नाम पर आज वे देश में सबसे बड़े पाखंडी हैं और खादी की टोपी, खादी के कपड़े, सत्याग्रह, अनशन, आमरण अनशन, किस्म के गांधी के औजारों को वे एक राजनीतिक साजिश में हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। जब यूपीए सरकार ने लोकपाल कानून बना दिया था, और मोदी सरकार को आए भी चार बरस से अधिक हो गए हैं, तो गांधी की जयंती और पुण्यतिथि  आठ-दस बार आई-गईं, लेकिन अन्ना हजारे को कोई आंदोलन नहीं सूझा। अब उन्हें किसी रहस्यमय वजह से फिर लग रहा है कि वे ऐसा आंदोलन छेड़ें, फिर आमरण अनशन पर बैठें, और शायद हाशिए से खबरों में आ जाएं। इसके अलावा ऐसा भी लगता है कि अब मोदी सरकार खुद होकर भी सुप्रीम कोर्ट के कड़े रूख को देखकर लोकपाल नियुक्त करने जा रही है, तो अन्ना हजारे मानो बहती गंगा में हाथ धोकर पुण्य कमाने का यह नाटक कर रहे हैं। 
अन्ना हजारे और उनके साथ के बहुत से आंदोलनकारियों का रूख बड़ा साफ है, वे किसी चुनाव के मौके पर, किसी पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए, किसी दूसरी पार्टी को बदनाम करने की सुपारी भी उठाते आए हैं, और किसी पार्टी को वाहवाही दिलवाने के लिए, उसकी छवि सुधारने के लिए भी अपनी टोपी दांव पर लगाने की सुपारी उठाते आए हैं। उन्हीं के आंदोलन का एक समय साथ देने वाले श्रीश्री (स्वघोषित) रविशंकर ने भी समय-समय पर इसी किस्म की चतुराई दिखाई है कि किस पार्टी की सरकार का भ्रष्टाचार देखना है, और किस पार्टी का अपनी आंखों के सामने भ्रष्टाचार अनदेखा करना है। ऐसे पाखंड का खुलकर भांडाफोड़ करना चाहिए, लेकिन हिंदुस्तानी समाज को धर्म, आध्यात्म, योग, गांधीवाद, राष्ट्रवाद, जैसी कई किस्म की खालों को ओढ़कर आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है, और बनाया जा रहा है। अन्ना हजारे का यह नाटक बरसों से चले आ रहा है। लोकपाल बनाने की मांग को लेकर उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार का जीना हराम कर दिया था, और अपनी जिंदगी की नोंक पर सरकार को धमकाकर उसे खलनायक की तरह दिखाया था। लेकिन इसके बाद से सरकार बदली और अन्ना हजारे का गांधीवाद चादर ओढ़कर सो गया था। अब जाकर उसकी नींद टूटी है, और वह किसी नए चुनावी मकसद से एक बार फिर भाड़े के गांधीवादी की तरह सुपारी उठाकर निकल पड़ा है। (Daily Chhattisgarh)

विज्ञान कथाएं, और हकीकत...

30 जुलाई  2018

चौथाई सदी पहले एक साईंस फिक्शन फिल्म आई थी, जुरासिक पार्क। मशहूर फिल्म डायरेक्टर स्टीवन स्पीलबर्ग की इस फिल्म ने दर्शकों को अपने डायनॉसॉर से हिलाकर रख दिया था। फिल्म की कहानी एक ऐसे खरबपति की थी जिसमें एक टापू पर वैज्ञानिकों की मदद से क्लोनिंग तकनीक से फिर डायनॉसॉर बना लिए थे, और वे जिंदा डायनॉसॉर पर्यटकों के लिए पेश भी किए गए थे। बाद में इस विषय पर बहुत सी और फिल्में बनी और खूब चलीं। लोगों को सच्चे इतिहास के एक पन्ने को आगे बढ़ाकर उस पर भविष्य की कल्पनाओं को देखने में खूब मजा आता है। और जब ऐसी कल्पनाएं विज्ञान की असली संभावनाओं की बुनियाद पर खड़ी होती हैं, तो लोगों को अधिक हिलाकर रख देती हैं। क्लोनिंग की तकनीक एक हकीकत है, और डायनॉसॉर का इतिहास, या इतिहास में डायनॉसॉर भी हकीकत हैं। इन दोनों को मिलाकर जब एक विज्ञान कथा तैयार होती है, तो वह अधिक रोमांचक रहती है।
अब दो अलग-अलग खबरें हैं जिनको मिलाकर भी देखने की जरूरत है। दो दिन पहले विज्ञान की एक खबर आई कि साइबेरिया के बर्फ में करीब 42 हजार बरस पहले दब गए कुछ कृमि (राऊंडवाम्र्स) बर्फ पिघलने से एक बार फिर हरकत में आए, और उन्होंने तुरंत ही खाना तलाश करना शुरू कर दिया। वे धरती के हिमयुग के वक्त से बर्फ में दबे हुए थे, और उनके भीतर जिंदगी 42-45 हजार बरस बनी रही। वे हिले-डुले भी नहीं, न कुछ खाना मिला, और न ही वे मरे। लेकिन जैसे ही उनकी यह बर्फीली नींद पूरी हुई, वे खाना तलाश करते घू्मने-फिरने लगे, और तुरंत ही खाना भी शुरू कर दिया। अब विज्ञान के हाथ इतने लंबे हो गए हैं कि वे बर्फ के इस टुकड़े पर ऐसे तीन सौ कृमियों की शिनाख्त कर चुके हैं जिनमें से दो मादा भी हैं, और ये जिंदगी में लौट रहे हैं, या ऐसा कहें कि इनमें जिंदगी लौट रही है। मास्को के इस वैज्ञानिक संस्थान ने यह तथ्य सामने रखा है कि कृमियों के अलावा कई किस्म के वैक्टीरिया भी ऐसी लंबी बर्फीली नींद में सोए हुए हैं जो कि ऐसे लंबे क्रायोप्रिजरवेशन के बाद फिर से सामान्य जिंदगी शुरू कर देते हैं।
यह मामला इंसान की जिंदगी में पहली मोहब्बत सा लगता है, जो कि पूरी जिंदगी सुला भी दी जाए, तो बाद में पहला मौका मिलते ही जागकर उठ बैठती है।
अब दूसरी खबर यह है बहुत से देशों के वैज्ञानिक धरती में इतना गहरा छेद करने की कोशिश कर रहे हैं कि वह दस किलोमीटर से अधिक की गहराई तक चले जाए, और उससे कई किस्म की वैज्ञानिक जांच हो सके। यह भी पता लग सके कि यह धरती बनी कैसे, उसके भीतर की सतह किस गहराई पर कैसी है, उसमें कौन-कौन सी चीजें हैं, और क्या भीतर इतनी गहराई में भी जिंदगी के कोई निशान हैं। इसमें जापान की सरकार सबसे बड़ी मदद कर रही है, और इस रिसर्च की कामयाबी से ऐसी जानकारी मिलने की उम्मीद है जिससे कि भूकंप की बेहतर भविष्यवाणी की जा सके। जापान भूकंप से बहुत बार नुकसान झेल चुका देश है, और वह ज्वालामुखी और सुनामी भी झेल चुका है। इसलिए मौसम की मार के लिए भविष्यवाणी उसके लिए बहुत से और देशों के मुकाबले अधिक मायने रखती है।
अब अमरीका में बनी जुरासिक पार्क फिल्म के साथ रूस में 42 हजार बरस बाद जिंदगी में लौटे कृमि से होते हुए अगर जापान की धरती की खुदाई को एक साथ देखें, तो लगता है कि धरती की ऐसी गहराई से जाने कैसी जिंदगी या जाने कैसी चीजें निकलकर सामने आ सकती हैं जो कि लाखों बरस पहले की जिंदगी को सामने रखे, जिंदा कर दे, और आज की इस पीढ़ी की जिंदगी के मुकाबले उसे खड़ा कर दे। धरती के लाखों बरस पहले के बाशिंदे आज जिंदा होकर सामने खड़े हो जाएं तो आज की जिंदगी उसके साथ कैसे जिएगी, उसके सामने कौन सी चुनौतियां आएंगी, और उनमें से कितनी चुनौतियों या खतरों की कल्पना करके आज का विज्ञान और आज का इंसान उसके मुकाबले तैयारी कर सकते हैं?
विज्ञान और सामाजिक सोच इन दोनों का आपस में गहरा रिश्ता कई बार नहीं भी हो पाता। लोगों को अगर सामाजिक सरोकार की फिक्र रहे, तो वे पता नहीं कौन से शोध कर सकें, कौन सी खोज कर सकें, और कौन सी तकनीक का इस्तेमाल कर सकें। सामाजिक खतरों की फिक्र करते हुए विज्ञान अपने आपको बर्फ के भीतर जिंदा दफन तो कर सकता है, लेकिन ऐसी फिक्र के साथ वह नई खोज और आविष्कार का काम नहीं कर सकता। विज्ञान की नैतिकता बहस का एक बड़ा जटिल मुद्दा हमेशा से रहा है, और जब विज्ञान दसियों हजार या लाखों बरस पहले की जिंदगी के साथ तकनीक का एक खेल खेलता है, तो शायद वह अपनी उस पल की कामयाबी पर आत्ममुग्ध रहता है, और उससे परे उसे दुनिया के लंबे अरसे के भले और बुरे की फिक्र कुछ देर के लिए तो नहीं रह जाती।
एक तरफ तो धरती के सीने तक खुदाई करने का काम चल रहा है ताकि धरती को बेहतर समझा जा सके, लेकिन एक सवाल यह भी उठता है कि ऐसी खुदाई से सामने आने वाले तमाम खतरे क्या आज विज्ञान की कल्पना की सीमा के भीतर हैं? या कोई ऐसी अनहोनी भी हो सकती है जिससे कि निपटना आज के मौजूदा विज्ञान के लिए नामुमकिन होगा। ऐसी अनगिनत विज्ञान कथाएं हैं जो कि विज्ञान की कोशिशों को तबाही का सामान बनाकर रख देती हैं। अब 42 हजार बरस पुराना कोई कृमि आकर धरती की जिंदगी पर कोई ऐसी दिक्कत खड़ी कर दे जिसका इलाज पिछली कुछ सदियों के विज्ञान ने जाना ही न हो, तो क्या होगा? और अगर धरती की इस तरह बेतहाशा गहरी खुदाई से धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति में कोई बड़ा बदलाव आ जाए, तो क्या होगा? ऐसी खुदाई से धरती के भीतर कोई ऐसा फेरबदल हो जाए जिससे भूकंप या ज्वालामुखी के कुछ नए बेकाबू नमूने सामने आ जाएं, तो क्या होगा? (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जुलाई

आधार-सुरक्षा का दावा घंटों में औंधेमुंह गिरा..

संपादकीय
29 जुलाई 2018


भारत में दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के अध्यक्ष ने आधार कार्ड की पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था का दावा करते हुए अपने आधार कार्ड का 12 अंकों का नंबर जारी कर दिया था, और लोगों को चुनौती दी थी कि वे इस नंबर से उनकी निजी जानकारी निकालकर तो दिखाएं। महज कुछ घंटे के भीतर ही ट्राई के अध्यक्ष का दावा खोखला साबित हुआ। आनन-फानन फ्रांस के एक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ ने इस नंबर के आधार पर घर बैठे बहुत सी निजी जानकारी निकाली, और उसे ट्विटर पर पोस्ट भी कर दिया। उन्होंने ट्वीट्स पर ट्राई के अध्यक्ष आरएस शर्मा के निजी जीवन के कई आंकड़े, उनके आधार संख्या के माध्यम से जुटाकर जारी कर दिए, जिनमें शर्मा का निजी पता, जन्मतिथि, वैकल्पिक फोन नंबर आदि शामिल है। उन्होंने बताया कि आधार संख्या को सार्वजनिक करने के क्या खतरे हो सकते हैं। उसने लिखा कि आधार संख्या असुरक्षित है। लोग आपका निजी पता, वैकल्पिक फोन नंबर से लेकर काफी कुछ जान सकते हैं। 'मैं यही रुकता हूं। मैं उम्मीद करता हूं कि आप समझ गए होंगे कि अपना आधार संख्या सार्वजनिक करना एक अच्छा विचार नहीं है।Ó
जब देश के साइबर मामलों से जुड़ा हुआ एक सबसे बड़ा और प्रमुख व्यक्ति अपनी चुनौती पर इस तरह और इस कदर औंधेमुंह गिरता है, तो फिर यह समझ लेना चाहिए कि साइबर सुरक्षा को लेकर सरकार के अपने दावे किस कदर खोखले हैं, और ऐसा आत्मविश्वास किसी भी सरकार को, किसी भी कारोबार को पल भर में गड्ढे में डाल सकता है। दूसरी बात इससे जुड़ी हुई यह है कि आधार कार्ड की सारी जानकारी सरकार की अपनी दौलत नहीं है कि वह जहां चाहे उसे रखे, और जिस तरह चाहे उस तरह बांटे। यह जनता की जानकारी है, और यह सरकार को जिम्मेदार मानते हुए उसे दी जाती है कि सरकारी कामकाज में, सरकार की योजनाओं का फायदा लेने के लिए अर्जी दी जा सके। आधार कार्ड की अनिवार्यता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में अदालत ने बार-बार सरकार को, केन्द्र और तमाम राज्य सरकारों को यह हुक्म दिया है कि आधार की अनिवार्यता न की जाए। लेकिन आज भी हकीकत यह है कि लोगों को किसी भी सरकारी दफ्तर में पहुंचने पर सबसे पहले अपना आधार कार्ड निकालना होता है, तभी सरकारी अमला उन्हें इंसान मानने को तैयार होता है। सरकार की रियायतों के लिए, बैंक और दीगर कामकाज के लिए आधार कार्ड उतना ही जरूरी कर दिया गया है जितना कि इंसान की धड़कन चलना। नतीजा यह हुआ है कि सरकार और बाजार इन दोनों के सामने लोग अपनी जानकारियों सहित तकरीबन नंगे खड़े हैं, और दुनिया के तमाम मुजरिम, धोखेबाज और जालसाज लोगों की अनगिनत जानकारियों तक पहुंच बना चुके हैं। 
ट्राई के अध्यक्ष का यह हादसा सरकार की आंखें खोलने के लिए काफी होना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में यह तय है कि आधार-अनिवार्यता के विरोधी इस तजुर्बे को अदालत के सामने रखेंगे। इस मामले की सुनवाई कर रहे जजों को भी चाहिए कि वे सोशल मीडिया पर अपने आधार कार्ड नंबर पोस्ट करें, और देखें कि हैकर कितने घंटों में उनकी सारी निजी जानकारी निकालकर पेश कर देते हैं। अदालत को यह भी चाहिए कि सरकार के संबंधित मंत्रियों, आधार कार्ड योजना के मुखिया, और सरकारी वकील से भी कहे कि वे भी सुरक्षा साबित करने के लिए अपने आधार कार्ड नंबर सोशल मीडिया पर डालें, और अपने आत्मविश्वास की अग्निपरीक्षा करें। 
आज देश में हालत यह है कि गरीबों और आम इंसानों की निजी जिंदगी की जानकारी की कोई अहमियत मानी ही नहीं जाती है। यह मान लिया जाता है कि किसी को दस किलो रियायती चावल भी मिलना है, तो उसे अपनी निजी जानकारियों को उजागर करने में हिचकना नहीं चाहिए। और गरीब जनता की बेबसी रहती है कि वह सरकारी दफ्तर की मनमानी को माने और जिंदा रहने का हक पाए। सुप्रीम कोर्ट को आधार कार्ड की अनिवार्यता पूरी तरह से खत्म करनी चाहिए, और लोगों को यह हक भी देना चाहिए कि वे आधार योजना के कम्प्यूटरों से अपनी सारी जानकारी को मिटवा सकें। आम लोगों को भी अपनी निजी जिंदगी को निजी रखने का हक रखना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जुलाई

गरीब, बेघर, परेशानहाल बच्चों से संगठित रेप पर फांसी जायज

संपादकीय
28 जुलाई 2018


बिहार के एक बालिकागृह से छोटी-छोटी बच्चियों के साथ ताकतवर लोगों के जिस तरह के संगठित और लंबे समय से चले आ रहे बलात्कार की कहानियां आ रही हैं, वे दिल दहलाने वाली हैं। वहां के बड़े नेताओं के नाम बलात्कारियों में आ रहे हैं, और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसकी जांच सीबीआई को देने की घोषणा की है। पहली जांच में दर्जनों बच्चियों से बलात्कार की मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद अब कुछ लोगों का यह भी मानना है कि देश के अधिकतर बालक-बालिकागृहों में हाल ऐसा हो सकता है। इस बात पर आज लिखने की जरूरत इसलिए भी है कि पुणे से एक दूसरी खबर आई है कि वहां एक मदरसे में एक मौलवी बच्चों के साथ बलात्कार करता था, और उसकी गिरफ्तारी के बाद 36 बच्चों को उस मदरसे से हटा दिया गया है। बलात्कार से डरे-सहमे बच्चे मदरसा छोड़कर भाग निकले थे, और वे बिहार से आए हुए गरीब मुस्लिम बच्चे थे, जो स्टेशन पर अपने घर लौटने की कोशिश करते मिले। 
बच्चों का यौन शोषण पूरी दुनिया में आम बात है, और उसे छुपाकर रखना अधिकतर समाजों का आम मिजाज है। जहां कहीं गरीब या बेबस बच्चे रहते हैं, उन जगहों को बाल यौन शोषण के आदी लोग अपने शिकार की जगह बना लेते हैं। दुनिया में ऐसे बहुत से मामले दर्ज हैं जिसमें परेशान बच्चों की मदद करने वाली संस्थाओं में ऐसे बाल यौन शोषक काम करने लगते हैं क्योंकि वहां पर परेशानहाल बच्चे पहुंचते हैं जिन्हें बरगलाना आसान होता है। एक तरफ तो समाज सेवा के नाम पर बहुत से लोग या संगठन बच्चों के लिए ऐसे अनाथाश्रम या बालिकागृह खोल लेते हैं जो कि गरीब, बेबस, बेघर बच्चों से जल्द ही भर जाते हैं। अभी बिहार का जो मामला सामने आया है वह भी बाहर से वहां पहुंची एक अध्ययन-टीम की पूछताछ में पकड़ में आया और आगे की जांच और मेडिकल रिपोर्ट से स्थापित हुआ कि दर्जनों बच्चियों से लंबे समय से बलात्कार चल रहा था। 
जब कमउम्र बच्चों को ऐसी यातना से गुजरना होता है, तो उसके बाद उनकी जिंदगी का रूख बदल जाता है। समाज से लेकर लोकतंत्र तक, सरकार से लेकर अदालतों तक उनके मन में हिकारत ही हिकारत रह जाती है। इसलिए ऐसे बच्चे आगे चलकर कई किस्म के जुर्म में भी फंस जाते हैं। इस देश को बच्चों की हिफाजत के लिए ऐसे सारे आश्रमों या हॉस्टलों, सुधारगृहों या मदरसों पर लगातार निगरानी रखनी चाहिए। और यह काम सरकार में बैठे हुए लोग बिल्कुल नहीं कर सकते। इसके लिए समाजसेवी समर्पित लोगों को लगाना होगा और यह सावधानी भी बरतनी होगी कि इस निगरानी में लगे हुए लोग ही बच्चों से सेक्स के आदी न हों। अगर बाड़ ही खेत खाने लगेगी, चौकीदार ही चोरी करने लगेंगे, तो फिर बचेगा क्या? अखबारों में भी खबरें तब आती हैं जब ऐसे यौन शोषण के मामले बहुत बड़े-बड़े होते हैं, वरना छोटे-मोटे मामले आए-गए हो जाते हैं। 
इस मुद्दे पर हम बहुत बार लिखते हैं और यह जरूरत भी बताते हैं कि छोटे बच्चों को यह सिखाने और समझाने की जरूरत है कि बड़े लोगों का कौन सा बर्ताव यौन शोषण का खतरा होता है। खासकर ऐसी नाजुक जगहों पर रहने वाले, रखे गए, परेशानहाल बच्चों को तो ऐसी सावधानी की नसीहत बारीकी से देेने की जरूरत है ताकि वे सावधान रहें, और ऐसे तमाम केन्द्रों को लगातार निगरानी में रखना चाहिए। अगर देश में मौत की सजा को जारी रखना ही है, और उसे खत्म नहीं किया जाना है, तो छोटे बच्चों से ऐसे संगठित बलात्कार करने वाले लोगों को फांसी देनी चाहिए। हालांकि हम फांसी की सजा के भी खिलाफ हैं, और हमारा यह भी मानना है कि बलात्कार पर फांसी की सजा से बलात्कार के शिकार बच्चों की हत्या की गारंटी भी हो जाएगी क्योंकि जब ऐसे बलात्कार पर फांसी मिलनी है, तो फिर साथ-साथ उनका कत्ल कर देने पर भी दो बार तो फांसी लग नहीं सकती। फिर भी अगर संसद देश में ऐसी फांसी का कानून बनाने जा रही है, तो उसका इस्तेमाल बच्चों के साथ इस तरह के संगठित बलात्कार करने वालों पर होना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जुलाई

नाउम्मीदी के बीच भी इमरान की संभावनाएं

संपादकीय
27 जुलाई 2018


इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने के करीब हैं, तो हिन्दुस्तान के साथ जुड़ी उनकी कई किस्म की यादें सामने आ रही हैं। उनके साथ क्रिकेट खेलने वाले लोगों की यादें तो सबसे अधिक हैं, लेकिन उससे परे भी फिल्म इंडस्ट्री और मीडिया से जुड़े हुए लोग भी उनके बारे में लिख रहे हैं। उनकी एक पुरानी तस्वीर भी सामने आई है जिसमें चौथाई सदी से भी पहले जब वे भारत में क्रिकेट खेलने पाकिस्तानी टीम की तरफ से आए थे और उस वक्त भारत की एक बड़ी साबुन कंपनी, गोदरेज के एक इश्तहार में वे मॉडल थे। अपने चेहरे और दस्तखत के साथ वे हिन्दुस्तान की इस कंपनी का साबुन हिन्दुस्तान में बेच रहे थे। अब इस बात को देखकर याद पड़ता है कि एक वक्त ऐसा था। और आज का वक्त इन्हीं दोनों देशों के बीच एक ऐसे गैरजरूरी और नाजायज तनाव से भरा हुआ है जिसमें दोनों देशों के बीच क्रिकेट भी बंद हो चुका है, एक-दूसरे की फिल्में, एक-दूसरे के टीवी सीरियल, रियलिटी शो में काम करना बंद हो गया है, और हिन्दुस्तान में पाकिस्तान के मशहूर गायकों के कार्यक्रम भी बंद हो गए हैं। 
दोनों देशों की राजनीति और फौज से जुड़े हुए लोगों ने आपसी बातचीत में नाकामयाबी से ऐसी नौबत लाकर खड़ी की है कि आज एक-दूसरे देश में खिलाड़ी और कलाकार कुछ कर भी नहीं सकते। अगर दूसरे देश में जाकर दोस्ती की बात करके आते हैं, तो ऐसे बहुत से लोगों को हिन्दुस्तान में गद्दार कहना एक आम बात हो गई है, और कांग्रेस के लोगों से लेकर भाजपा के लालकृष्ण अडवानी तक ऐसे हमलों का शिकार हुए हैं। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह है कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच इन दोनों देशों की सबसे बड़ी संख्या की रिश्तेदारियां एक-दूसरे देश में ही हैं। इन दोनों की सरहद एक-दूसरे से ऐसी मिली हुई है कि दोनों तरफ की आबादी में आपस में रिश्तेदारियां हैं, जुबान एक है, खानपान, लोककला, और कपड़ों के परंपरागत फैशन भी एक ही हैं। लोक संगीत सुनें, तो वह भी सरहद के दोनों तरफ के गांवों में एक सरीखा ही है। दोनों के कारोबारी हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, और तनातनी से परे की हकीकत यह है कि दोनों के बीच सामानों की खरीदी-बिक्री खासी होती है। शक्कर से लेकर प्याज तक की आवाजाही चलती ही रहती है। हिन्दुस्तान में जो लोग पाकिस्तान के बारे में कड़वी बातें कहते हैं, उनकी चाय को भी पाकिस्तानी शक्कर मीठा करती है। 
ऐसे में इमरान खान अगर प्रधानमंत्री बनते हैं, तो उनको भारत के बारे में ऐसी तमाम बातों को याद रखना चाहिए, और क्रिकेट से लेकर संगीत तक, फिल्म और साहित्य तक, कारोबार और इलाज तक, इन तमाम चीजों में सरहद को धुंधला करने की कोशिश करनी चाहिए, दोस्ताना रिश्ते बढ़ाने चाहिए। उनके साथ आज यह तोहमत जुड़ी हुई है कि वे फौज के जिताए जीतकर आए हैं, और वे फौज की जेब में रहेंगे। हो सकता है कि यह बात सच भी है, लेकिन दुनिया का इतिहास बताता है कि बहुत से लोग सत्ता में चाहे किन्हीं हालात में आते हों, उसके बाद उन्हें अपना एक नया रूख तय करने का हक तो रहता ही है। इमरान खान प्रधानमंत्री की हैसियत से भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखेंगे, इसमें बहुत से लोगों को शक है। हमने भी इसी जगह कल इसी आशंका को लिखा भी है। लेकिन फिर भी एक इश्तहार की पुरानी तस्वीर ने आज एक उम्मीद जगाई है कि उस वक्त भी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच 1965 और 1971 की दो बड़ी जंग हो चुकी थीं, लेकिन उसके बाद के बरसों में पाकिस्तानी चेहरा हिन्दुस्तान में सामान बेचने के लायक माना गया था, और बरसों तक इमरान का वह इश्तहार चलते रहा। तमाम आशंकाओं के बीच भी उम्मीदों को जगाए रखना चाहिए, और तमाम तनाव के बीच भी दोस्ती की कोशिश जारी रखनी चाहिए। इमरान खान का आज पाकिस्तान के भीतर दांव पर कुछ नहीं लगा है। वे आज जिस ओहदे तक पहुंच रहे हैं, उससे अधिक उन्हें और कुछ हासिल नहीं हो सकता, सिवाय इतिहास में एक महान नेता की जगह पाने की संभावना के। पाकिस्तान और हिन्दुस्तान इन दोनों के सबसे गरीब, सबसे जरूरतमंद लोगों को देखते हुए दोनों ही देशों के हुक्मरानों को तनाव खत्म करना चाहिए जिससे सिर्फ और सिर्फ एक का भला होता है, जंग के हथियार बनाने वाले कारखानेदारों का। इमरान खान को एक क्लीन स्लेट के साथ एक सकारात्मक पारी खेलना शुरू करना चाहिए, यही एक बात उन्हें और आगे ले जा सकती है। और यही तमाम बात हम हिन्दुस्तान के हुक्मरानों से भी कहना चाहते हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जुलाई

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 जुलाई : इमरान के मायने

संपादकीय
26 जुलाई 2018


पाकिस्तान के चुनावी नतीजे अभी सामने आ रही हैं, लेकिन वहां उस देश के बाहर के पर्यवेक्षक और विश्लेषक यह मान रहे हैं कि इमरान खान और उनकी पार्टी की अब तक चल रही सीटों की लीड किसी मासूम चुनाव का नतीजा नहीं है, उन्हें इस चुनाव में जीतने के लिए पर्दे के पीछे से फौज की मदद मिल रही थी। इस चुनाव एक दिलचस्प बात यह भी रही कि हाफिज सईद समेत दूसरे आतंक-समर्थक लोग नकार दिए गए हैं। लेकिन जो बात आज सोचने की है वह यह कि फौज ने पर्दे के पीछे से इस चुनाव को इस तरह काबू किया है कि उनकी पसंद का उम्मीदवार और उसकी पार्टी सत्ता में आ सके। भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों के इतिहास को जानने वाले यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि पाकिस्तान में फौज अपनी हस्ती बनाए रखने के लिए भारत के साथ तनाव को बेहतर नौबत समझती है, और वैसे भी दुनिया के किसी भी देश में फौजी अफसर रहें, जंग उनकी पसंद रहता है, और उन्हें हर समस्या, हर दिक्कत का फौजी निपटारा बेहतर लगता है। ऐसे में फौज की पसंद के इमरान अगर प्रधानमंत्री बनते हैं, तो भारत के साथ सरहद पर और राजधानियों में एक गैरजरूरी तनाव खड़ा रहेगा, बढ़ता रहेगा। अपने चुनाव अभियान के पहले भी इमरान खान ने हिन्दुस्तान के खिलाफ कई किस्म की बातें कही थीं, जो कि फौज की पसंद की थीं, और शायद उनके इस रूख की वजह से वे फौज की पसंद के थे। लोगों को याद होगा कि अभी-अभी पाकिस्तान हाईकोर्ट के एक जज ने वकीलों के एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि किस तरह पाकिस्तानी मीडिया और पाकिस्तानी अदालतें फौज के काबू में हैं। और यह चुनाव शायद अब तक के पाकिस्तान के तमाम चुनावों में सबसे अधिक फौजी दखल वाला चुनाव रहा। 
यह एक फिक्र की बात है कि भारत का सबसे करीब का एक लोकतंत्र अब अपना चरित्र खोकर एक फौजतंत्र बन रहा है। हालांकि पाकिस्तान में बीच के बरसों में कई बार फौजी हुकूमत भी आई है, लेकिन वे खुली हुई फौजी हुकूमतें थीं। अब फौज ने पर्दे के पीछे से मीडिया और अदालत पर काबू करके, नवाज शरीफ को जेल भेजकर, इमरान का साथ देकर पाकिस्तान के चुनावों को एक तरफ मोड़ दिया है, और अपना पसंदीदा प्रधानमंत्री बनवाने के करीब फौज पहुंच चुकी है। ऐसे में भारत के साथ रिश्ते पाकिस्तानी फौज के लिए सबसे अधिक मायने इसलिए रखते हैं कि अब तक के तमाम जंग पाकिस्तानी फौज ने महज हिन्दुस्तान के खिलाफ ही लड़े हैं। और किसी भी देश की फौज को यह फिक्र नहीं होती कि उस पर होने वाला खर्च देश के किन गरीबों के पेट काटकर लाया जाता है, और किस तरह सरहद पर एक गैरजरूरी और नाजायज तनाव दोनों देशों को बहुत महंगा पड़ता है। इमरान खान अगर प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनके सामने एक बड़ी दिक्कत यह भी रहेगी कि जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ नारा लगाकर वे सत्ता तक पहुंचे हैं, उस भ्रष्टाचार में पाकिस्तानी फौज का बड़ा हिस्सा बताया जाता है। फौज के गैरजरूरी खर्च को अगर इमरान कम करना चाहेंगे, तो फौज उनके खिलाफ बगावत कर देगी। और भ्रष्टाचार का एक बड़ा हिस्सा फौज के मामलों को लेकर होता है। 
हिन्द महासागर के इस क्षेत्र में यह एक फिक्र की नौबत है कि पाकिस्तान में एक कमजोर प्रधानमंत्री बनने जा रहा है, जिसके पीछे फौज की पकड़ रहेगी। इस प्रधानमंत्री के नाम से भारत के खिलाफ कही हुई बहुत सारी बातें दर्ज भी हैं, और आने वाले दिन इस रूख को और खतरनाक बना सकते हैं। दूसरी तरफ भारत की एक घरेलू दिक्कत आने वाले महीनों में यह भी रहेगी कि 2019 में उसे आम चुनाव देखने हैं। और केन्द्र की मोदी सरकार इस चुनाव के वक्त पाकिस्तान के साथ किसी बढ़े हुए तनाव को चुनावी सहूलियत भी मान सकती है। पाकिस्तान के भीतर फौजी हुकूमत के बजाय लगातार चुनाव होते रहें, यह एक अच्छी बात है, वहां आतंकी हारते रहें यह भी एक अच्छी बात है, लेकिन भारत और पाकिस्तान दोनों जगहों पर एक-दूसरे के खिलाफ हमलावर तेवर रखने वाले प्रधानमंत्री होना कभी अच्छी बात नहीं हो सकती, इससे दोनों देशों में गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर सरहद पर फौजियों पर खर्च होना बढ़ते रहेगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जुलाई

रिटायर्ड तंगदिल, तंगनजरिया पार्टी बनकर न रहे कांग्रेस..

संपादकीय
25 जुलाई 2018


कल ही कांग्रेस पार्टी का यह रूख सामने आया था कि 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी ही कांग्रेस की अगुवाई वाले किसी भी विपक्षी गठबंधन के नेता रहेंगे, और इस नाते वे ही कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी रहेंगे। लेकिन दिल्ली की महिला पत्रकारों के बीच कल शाम एक कार्यक्रम में जब राहुल गांधी से यह पूछा गया कि क्या वे प्रधानमंत्री के लिए मायावती या ममता बैनर्जी के नाम का समर्थन करेंगे, तो उन्होंने कहा कि वे किसी भी ऐसे प्रत्याशी का समर्थन करेंगे जो बीजेपी और आरएसएस को हराएगा। उन्होंने अपने पीएम बनने की संभावनाओं के बारे में कहा कि यह काफी हद तक तात्कालिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। कांग्रेस के कुछ और सूत्रों ने मीडिया से अलग-अलग यह भी कहा है कि पार्टी को आरएसएस समर्थित किसी व्यक्ति को छोड़कर बाकी किसी को भी प्रधानमंत्री के रूप में देखने में आपत्ति नहीं है। 
पिछले दो दिनों में कांग्रेस के रूख की यह गर्मी और नर्मी ध्यान देने लायक है। यह बात तय है कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी-भाजपा-एनडीए के मुकाबले कोई ऐसा असरदार गठबंधन नहीं बन सकता जो कि कांग्रेस के खिलाफ हो। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी की हालत देश के कुछ क्षेत्रीय दलों से भी गई गुजरी हो गई दिखती है, और उसके पास एक संपन्न इतिहास, विपन्न वर्तमान, और रहस्यमय भविष्य है। पिछले दिनों कर्नाटक में चुनाव के बाद कांग्रेस ने जिस तरह जेडीएस से समझौता किया और गठबंधन सरकार में अपने से छोटी इस पार्टी को मुख्यमंत्री का पद दिया, वह कांग्रेस की एक जमीनी हकीकत की समझदारी का फैसला था। इसका नतीजा कल इस शक्ल में सामने आया कि कर्नाटक के अपने सीएम-बेटे वाले भूतपूर्व प्रधानमंत्री एच.डी.देवेगौड़ा ने राहुल के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं के पक्ष में बयान दिया। लेकिन ऐसी तमाम बाकी संभावनाओं को देखते हुए भी कांग्रेस को आज एक अक्लमंदी की चुप्पी से काम लेना चाहिए। आज मोदी के मुकाबले किसी गठबंधन के भीतर किसी मुकाबले का वक्त नहीं है, आज तो कांग्रेस को मोदी के मुकाबले बाकी पार्टियों में से हमख्याल पार्टियों को छांटकर उनसे एक व्यापक और लचीला तालमेल बनाने की जरूरत है। आज जब देश में गैरभाजपा, गैरसंघ कोई मजबूत और संभावनाओं वाला गठबंधन दिख नहीं रहा है, तब अगर कुछ कांग्रेसी किराए की घोड़ी लाकर राहुल को दूल्हा बनाकर बारात निकालना चाहते हैं, तो वह एक चापलूस-कमअक्ली होगी। आज जरूरत है कि पहले एक बारात जुटाई जाए, और फिर वक्त आने पर देखा जाए कि किसे दूल्हा बनाने पर सहमति होती है। आज के हालात एक ऐसे स्वयंवर जैसे हैं जिसमें कोई संभावित दुल्हन का वर छांटना बाकी हो। ऐसे में स्वयंवर में जुटे नौजवानों को घोड़े पर चढ़कर बैठना ठीक नहीं है। 
वैसे भी अगर कांग्रेस भारतीय लोकतंत्र की आज की ऐतिहासिक जिम्मेदारी के मौके पर अपनी ऐतिहासिक भूमिका दर्ज कराना चाहती है, तो उसकी प्राथमिकता में प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं रहना चाहिए, बल्कि मोदी जैसी सुनामी के मुकाबले लोगों को एकजुट करना रहना चाहिए। भारत के इतिहास को देखें तो कई ऐसे प्रधानमंत्री बने हैं जो राहुल से डेढ़ गुना उम्र के भी रहे होंगे। इसलिए प्रधानमंत्री के ओहदे की ट्रेन छूट नहीं रही है, पहले कांग्रेस को अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। यह मौका बददिमागी और घमंड दिखाने का नहीं है, आज की हकीकत यह है कि कांग्रेस को उसका कोई हक भी नहीं है, कांग्रेस को एक ऐसी मजबूत स्थिति के लिए कोशिश करना चाहिए जिससे एक ऐसी संभावना खड़ी हो सके कि मोदी का विकल्प देश का प्रधानमंत्री बन सके, और फिर वैसी नौबत में अगर कांग्रेस का बहुमत होगा, तो वैसे भी उसे मौका मिल जाएगा, वरना कांग्रेस को कर्नाटक की तरह पीछे की कतार में बैठना जारी रखना चाहिए, और आगे अपनी बारी की राह देखना चाहिए। कांग्रेस को एक तंगदिल, और तंगनजरिया रिटायर्ड पार्टी के बजाय खुले दिल-दिमाग वाली एक नौजवान पार्टी जैसा बर्ताव करना चाहिए जिसके सामने अभी नहीं तो कभी नहीं जैसी नौबत नहीं है, और जिसके राजकुमार के सामने एक बड़ा लंबा भविष्य बाकी है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जुलाई

जनभागीदारी से आसान और मुमकिन सरकार और समाज के काम

संपादकीय
24 जुलाई 2018


तंबाखू, गुटखा, पान मसाला पर प्रतिबंध के बाद भी खुलेआम बिक्री पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को विस्तृत जवाब पेश करने कहा है। एक कैंसर पीडि़त और नशामुक्ति अभियान चलाने वाले युवक ने याचिका में कहा है कि  प्रतिबंध के बाद भी  सार्वजनिक जगहों पर इसकी बिक्री जारी है और प्रतिदिन करोड़ों का कारोबार हो रहा है। फूड सेफ्टी एंड स्टेंडर्ड एक्ट 2006 में खाद्य पदार्थों की जांच और मिलावट को लेकर तय प्रावधान  का पालन नहीं होने से प्रदेश में कैंसर के मरीज बढ़ रहे हैं। 
सेहत के लिए जाहिर तौर पर नुकसानदेह गुटखा को राज्य सरकार ने काफी समय पहले से प्रतिबंधित कर रखा है, लेकिन लोगों के बीच इसका चलन खत्म नहीं हुआ, और सरकारी काबू न रहने से यह खुलेआम हर शहर, हर मुहल्ले-बस्ती में आसानी से मिल जाता है। कानूनी रोक रहने से अब बेचने वालों को इसके दाम बढ़ाने का बहाना और मिल गया है, और ऐसी बाकी बेअसर सरकारी रोक की तरह गुटखा का कारोबार भी रोक के बावजूद फल-फूल रहा है, और छत्तीसगढ़ के लोगों को कैंसर के हवाले कर रहा है। 
बाकी लोगों सहित हमारा भी यह मानना है कि सरकारी अनदेखी के बिना, या सरकार के कुछ विभागों की अघोषित भागीदारी के बिना इस तरह के सार्वजनिक जुर्म नहीं हो सकते। पूरे प्रदेश में हर सड़क के किनारे अनगिनत होटल-ढाबे, ठेले और दुकानों पर केंद्र सरकार के रियायती घरेलू गैस सिलेंडरों से चूल्हे जलते दिखते हैं, और कारखानों में सरकार की इस रियायत का बेजा इस्तेमाल भी दर्जनों बार पकड़ाया जा चुका है। इसके बावजूद इनमें से किसी के खिलाफ ऐसी कड़ी कार्रवाई नहीं हुई कि लोग केंद्र सरकार की दी हुई इस रियायत की ऐसी डकैती से बाज आएं। ऐसी ही अनदेखी राज्य सरकार की बिजली की सार्वजनिक चोरी की होती है। धार्मिक और सामाजिक आयोजनों के लिए खुलकर चोरी की बिजली से दूर-दूर तक रौशनी बिखेर दी जाती है, और सरकारी अमला इसे आमतौर पर अनदेखा करते चलता है।
सरकार के नियमों पर अगर अमल नहीं हो सकता, तो ऐसे नियमों के खिलाफ लोगों के मन में हिकारत भी हो जाती है, और ऐसी बेअसर रोक के खिलाफ लोग और अधिक उत्साह और हौसले से जुर्म करने लगते हैं। यह बात सही है कि सरकार के पास इतना अमला नहीं है कि हर पानठेले पर जाकर गुटखा की जांच कर सके, लेकिन जब कड़ी कार्रवाई होने लगती है, तो अपने-आप जुर्म घटने लगते हैं। और जब सरकार लापरवाही से अनदेखी करने लगती है, तो लोग रियायती रसोई गैस को कारों में भी भरने के लिए पंप लगाकर कारोबार करने लगते हैं। 
राज्य सरकार को जनता से भी जानकारी की मदद मांगनी चाहिए। रायपुर में पिछले महीनों में जितनी भी बार गुटखा पकड़ाया है, हर बार गैरसरकारी नौजवानों की मदद से यह हुआ है। जनता से अधिक जानकारी और कहीं से नहीं मिल सकती है। अब तो हर किसी के जेब में फोन का कैमरा रहता है, और सरकार को लोगों का उत्साह बढ़ाना चाहिए। जनभागीदारी एक बड़ा शब्द होता है, सरकार और समाज के तमाम काम जनभागीदारी से आसान और मुमकिन हो सकते हैं। जब लोग जिम्मेदार बनते हैं, तो वे न सिर्फ जुर्म रोकने की जिम्मेदारी निभाते हैं, बल्कि कई तरह के सामाजिक योगदान में भी हिस्सेदार होते हैं। प्रदेश की जनता की सोच को बढ़ावा देकर सरकार अपने काम को आसान भी कर सकती है, और वाहवाही भी पा सकती है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जुलाई

डिजाइनर बेबी का सपना तो अच्छा है लेकिन हकीकत भयानक है...

23 जुलाई  2018

ब्रिटेन में बायोटेक्नालॉजी से जुड़े हुए नीति-सिद्धांत तय करने वाली एक कमेटी ने अभी यह निष्कर्ष निकाला है कि पैदा होने के पहले ही बच्चों के जींस मेें एम्ब्रियो के स्तर पर ऐसी एडिटिंग की जा सकती है जिससे होने वाले बच्चे के गुण-दोष को बदला जा सके, उसके रूप-रंग को पसंद से तय किया जा सके। हालांकि इस कमेटी ने अभी इस बारे में खुलासे से कुछ तय नहीं किया है, लेकिन उसने सैद्धांतिक रूप से यह माना है कि ऐसी इजाजत देने में उसे कोई आपत्ति नहीं दिखती है। इसे इस देश की इस बारे में तय होने वाली नीति के लिए एक बड़ा बयान माना जा रहा है, और इससे चिकित्सा विज्ञान में जेनेटिक संपादन से बच्चों में एम्ब्रियो के स्तर पर ही मनचाहा फेरबदल करने का रास्ता खुल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी जेनेटिक तकनीक से बच्चों की कद-काठी, उनका रूप-रंग, उनके बालों का रंग तय किया जा सकता है, और उनका इंटेलिजेंस भी बढ़ाया जा सकता है। आम बोलचाल की जुबान में कहें तो यह डिजाइनर बेबी पाने का एक रास्ता हो सकता है जिससे भविष्य के इंसानों में से चुनिंदा लोगों को कुछ खास खूबियां हासिल हो सकें।
दरअसल विज्ञान कथाओं में आधी सदी से भी अधिक वक्त से इस किस्म की कल्पनाएं लिखी जाती रही हैं, और ऐसी तकनीक से इंसान के दानव बन जाने की भी बहुत सी फिल्में आ चुकी हैं। अभी भी लोगों का यह मानना है कि ऐसी जेनेटिक एडिटिंग से जब इंसानी जींस से कुछ हिस्सों को निकालकर अलग किया जाएगा, और कुछ दूसरे हिस्सों को डाला जाएगा तो उनमें बहुत विनाशकारी हादसे भी हो सकते हैं। कहने का मतलब यह कि किसी एक बात को बदलने के लिए ऐसी एडिटिंग की जाए, और कोई दूसरी अनचाही बात अपने आप हो जाए। लेकिन इंसान की कुदरत पर फतह पाने की चाह कहीं कम होती नहीं है, और जो विज्ञान के हथियार-औजार लिए बैठे हैं, उन्हें यह लगता है कि देशों के कानून या समाज की नैतिकता से परे उन्हें अपने अविष्कार और अपने खोज पर काम करने का मौका मिलना चाहिए। कहने के लिए तो ऐसी तकनीक की शुरुआत बच्चों में जन्म से आने वाली कई तरह की खामियों को रोकने के लिए की गई थी, और आज भी वैज्ञानिकों का मोटे तौर पर तर्क यही है, लेकिन जब कोई तकनीक बाजार के हाथ लगती है, तो औजार रातों-रात हथियार में तब्दील कर दिया जाता है। जिस परमाणु तकनीक का इस्तेमाल ऊर्जा पैदा करने में किया जाना था, वह आज बम बनाने के काम आ रही है।
ब्रिटेन के जिस कमेटी ने यह रास्ता खोलने जैसा संकेत दिया है, उसने कहने के लिए तो कहा है कि यह भविष्य के इंसानों के कल्याण के लिए संभावनाएं बनाने के लिए तय किया जा रहा है, और यह भी कहा है कि इससे समाज में भेदभाव को बढ़ाने का काम नहीं होगा, लेकिन यह तो जुबानी जमाखर्च की बातें हैं। चिकित्सा बाजार की हकीकत यह है कि जब अस्पतालों को बीमा कंपनियों से भुगतान मिलने की उम्मीद होती है, तो हमने हिन्दुस्तान में जगह-जगह जवान और कमउम्र महिलाओं के गर्भाशय निकलते देखे हैं ताकि अस्पताल का बिल बन जाए और बीमा कंपनी से मिल जाए। बाजार की बुनियाद ही बेरहमी पर टिकी होती है, और यह बात अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि दुनिया के तमाम नीति-सिद्धांत पेशों पर लागू होते हैं, जैसे डॉक्टरी या वकालत, लेकिन अस्पताल या किसी कंपनी पर ऐसे कोई नीति-सिद्धांत लागू नहीं होते।
इस सिलसिले में इस बात को थोड़े से दूर तक समझ लेना ठीक है। हिन्दुस्तान में पेशे की शपथ से डॉक्टर बंधे होते हैं, लेकिन अस्पताल नहीं। पेशे की शपथ से वकील बंधे होते हैं, लेकिन लॉ-फर्म नहीं। पत्रकारिता के सिद्धांत पत्रकारों पर लागू होते हैं, मीडिया-मालिकों पर नहीं। इसलिए जब हाथ गंदे करने की बारी आती है तो डॉक्टर अपने हाथ साफ रखते हैं, और अपने अस्पतालों के गैर-डॉक्टर हिस्से से कागजों पर गंदगी करवाते हैं। इसलिए जिस किस्म की भी जेनेटिक एडिटिंग की बात की जा रही है, या ब्रिटेन में जो इजाजत पाने जा रही है, वह डॉक्टरों के हाथ से निकलकर मशीनों और तकनीशियनों के हाथों में पहुंच जाएगी, और वह कारोबार का हिस्सा हो जाएगी।
यह याद रखने की जरूरत है कि जब लोगों के हाथ सोनोग्राफी की मशीनें लग जाती हैं, तो हिन्दुस्तान में यह देखने में आया है कि किस तरह पेशेवर डॉक्टर भी एक चलती हुई वैन में मरीज की सोनोग्राफी करते हुए यह बता देते हैं कि उसकी कोख में बेटा है, या बेटी, ताकि गर्भपात का फैसला आसान हो जाए। देश के बड़े-बड़े अस्पतालों के बड़े-बड़े डॉक्टर किडनी की खरीदी-बिक्री के कारोबार में तो पकड़ाए ही हैं, अनगिनत ऐसे मरीज हैं जिनको धोखा देकर किडनी निकाल ली गई, और किसी दूसरे मरीज को बेच दिए। इसलिए अस्पताल या डॉक्टर इन दोनों के कारोबार में हर किस्म के जुर्म मुमकिन है, किसी भी दूसरे कारोबार या पेशे की तरह। इसलिए एक बार जेनेटिक एडिटिंग को कुछ किस्म के कामों के लिए इजाजत मिली, तो फिर वह कहां जाकर रूकेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है।
हिन्दुस्तान जैसे समाज में जहां आज भी बच्चों का रंग बहुत बड़ा मुद्दा है, और जहां पर चेहरे को गोरा करने के लिए तरह-तरह की क्रीम अरबों-खरबों का कारोबार है, वहां पर पैसे वाले लोग केवल गोरे बच्चे पैदा करने में जुट जाएंगे, केवल ऊंचे कद के बच्चे पैदा करने लगेंगे, केवल घने या घुंघराले बालों वाले बच्चे पैदा करने में लग जाएंगे और इससे समाज में अपने आपमें एक रूपभेद पैदा हो जाएगा, रंगभेद बढ़ जाएगा। इसी तरह एक दूसरी स्थिति की कल्पना करें कि अगर कुछ लोग अपनी संपन्नता से होने वाले बच्चों की जेनेटिक एडिटिंग करवाकर उनका कद बढ़ा सकेंगे, तो कई किस्म के खेलों में उनकी संभावना कई गुना बढ़ जाएगी। ऐसे में आने वाले दिनों के खेल उन्हीं संपन्न बच्चों के हवाले हो जाएंगे। आज भी दुनिया में अधिक कद के लोगों को अधिक कारोबारी कामयाबी हासिल होती है, उन्हें अधिक तनख्वाह मिलती है, कई किस्म के कामों में उन्हें प्राथमिकता मिलती है। ऐसे में समाज में भेदभाव तो कद के साथ बढ़ेगा ही।
इससे एक दूसरी चीज यह भी होगी कि होने वाले बच्चे की कई बातों को लेकर उसके मां-बाप के फैसले उन बच्चों को उनकी पूरी जिंदगी ढोने पड़ेंगे, और आगे-पीछे एक ऐसी नौबत आ सकती है जब अजन्मे बच्चों के हक को लेकर कोई कानूनी मुद्दा उठे कि मां-बाप को उस बच्चे का रूप-रंग, उसकी कद-काठी, उसके बाल बदलवाने का क्या हक है? किसी बीमारी से बचाने की बात अलग है, लेकिन व्यक्ति पसंद और नापसंद से जुड़े ऐसे पहलुओं को छांट-छांटकर डिजाइनर बेबी बनवाने का हक मां-बाप का हो सकता है? या कि यह पैदा होने वाली बेबी के हक को छीनने के बराबर होगा?
विज्ञान की क्षमता और नैतिकता या बुनियादी हक की सीमा के बीच ऐसा टकराव न सिर्फ इसी मामले में है, और न सिर्फ पहली बार हो रहा है। ऐसा चलते रहता है, लेकिन लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या ऐसी तकनीक को बढ़ावा दिया जाए जिससे लोग अपने कपड़े-जूतों की तरह अपने होने वाले बच्चों की बातों को तय कर सकें! (Daily Chhattisgarh)

जो सिर्फ खाता है, वह तो राजकीय दर्जा पाता है...

संपादकीय
23 जुलाई 2018


गुजरात में एक चरवाहे पर तीन शेरों ने हमला कर दिया तो उसके कुत्ते ने तीनों शेरों से मुकाबला किया, मालिक को तो बचाया ही, मालिक की भेड़ों को भी बचाया। उसने भागकर अपनी जान बचाने के बजाय जोर-जोर से भोंककर आसपास के लोगों का ध्यान खींचा और लोगों ने पहुंचकर शेरों को भगाया। इस घटना में हैरानी की बात इसलिए नहीं है कि यह जिम्मेदारी कुत्ते पर थी, और उससे तो ऐसी ही वफादारी की उम्मीद की जा सकती थी। यह एक अलग बात है कि कुत्ते के नाम का इस्तेमाल महज गालियां बनाने के लिए होता है, और हिन्दुस्तानी सहित दुनिया की अनगिनत जुबानों में कुत्ते को लेकर ऐसी कहावतें, और ऐसे मुहावरे भी चलते हैं जो लोगों को कुत्ते की मौत मारना बताते हैं, या एक इंसान दूसरे को कुतिया के पिल्ले कहकर गाली देते हैं। 
पूरी दुनिया में इंसानों की ऐसी कहानियां नहीं मिलतीं जिनमें अपने किसी गुजर चुके करीबी की कब्र पर इंसान महीनों गुजार दें, या उसके चले जाने के बाद उसके इंतजार में रेलवे स्टेशन पर ही डेरा डाल दें। लेकिन दर्जनों देशों में ऐसे वफादार कुत्तों की प्रतिमाएं भी लगी हैं, स्मारक भी बने हैं, और उनकी असल जिंदगी की कहानियां भी अच्छी तरह दर्ज हैं। दिक्कत यह है कि जब इंसान अपने किए हुए सबसे बुरे कामों के लिए कोई मिसाल, कोई विशेषण तलाशने की कोशिश करते हैं, तो ऐसी मिसालें उन जानवरों की ही मिलती है जो कि कभी इंसानों जितने खराब नहीं रहते, कभी वैसे दगाबाज नहीं रहते। लेकिन इंसान होशियार हैं, वे एक-दूसरे के लिए ऐसी ही सुरक्षित मिसालें ढूंढते हैं कि जो लोग अदालत तक जाकर मानहानि का मुकदमा न कर सकें, इसीलिए कहीं आस्तीन का सांप कहा जाता है, कहीं पर उल्लू के प_े कहा जाता है। 
लेकिन इंसान भी बहुत ही दिलचस्प हैं। जो शेर हिन्दुस्तान में हर बरस दर्जनों इंसानों को मार डालते हैं, या हजारों शहरी पालतू जानवरों को मार डालते हैं, उसे भारत का राष्ट्रीय पशु बनाया गया है, राजचिन्ह में उसे जगह दी गई है। दूसरी तरफ जो जानवर इंसान की सेवा करते मर जाते हैं, उन कुत्तों को, गायों को, भैंसों को किसी राजचिन्ह में, किसी राजकीय पशु के दर्जे में कोई जगह नहीं है। जिस शेर से इंसान को कुछ भी हासिल नहीं होता, सिवाय मौत के, वह राजकीय पशु है। और जो हाथी इंसान की सेवा करते हैं, कहीं लकड़ी ढोते हैं, तो कहीं मंदिरों के सामने सजे खड़े रहते हैं, कहीं शहरों में घूम-घूमकर बच्चों को सवारी करवाते हैं, उनको राजकीय पशु का दर्जा नहीं है। गाय पूरी जिंदगी लोगों को दूध पिलाती है, और सींग भी नहीं मारती है, लेकिन वह राजकीय पशु नहीं है, भैंस भी नहीं है। बल्कि भैंस का इस्तेमाल लोगों को अनपढ़ साबित करने के लिए किया जाता है, काला अक्षर भैंस बराबर। 
हर भाषा अपने समाज की सोच को बताती है। सदियों पहले बनाए हुए कहावत और मुहावरे भी बताते हैं कि समाज के भीतर किन लोगों की ज्यादती किन लोगों के लिए रहती है। ऐसे में लोगों को अपनी बोलचाल में छुपी हुई बेइंसाफी की शिनाख्त करने की कोशिश करनी चाहिए, या कि सार्वजनिक मंचों पर, सोशल मीडिया में भाषा के खिलाफ लिखना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जुलाई

पाक चुनाव में फौजी दखल देखकर भारत भी कुछ सीखे

संपादकीय
22 जुलाई 2018


भारत के पड़ोस का पाकिस्तान चुनाव से गुजर रहा है। राजनीतिक दल तो अपने नेताओं के जेल के बाहर या जेल के भीतर रहते हुए मुकाबले में हैं ही, उनसे परे आतंकी संगठन भी चुनाव लड़ रहे हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि इस चुनाव में फौज का बड़ा दखल माना जा रहा है। पाकिस्तान में जम्हूरियत की जड़ें कभी मजबूत नहीं हो पाईं और कई बार चुनाव हुए, उनके बीच कई बार फौजी हुकूमत भी कायम हुई और कम से कम एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री को वहां फौजी तानाशाह ने फांसी पर भी चढ़ा दिया। एक और भूतपूर्व प्रधानमंत्री को घरेलू आतंकी हमले में उड़ा दिया गया, जिसके पीछे उसके अपने कुनबे से लेकर फौज तक की दखल का अंदेशा जाहिर किया गया, और अच्छी बात यही रही कि किसी ने इस हमले और कत्ल के पीछे हिंदुस्तान या किसी विदेशी हुकूमत पर तोहमत नहीं लगाई। इस बार तो पाकिस्तान के चुनावों में सुर्खियां बताती हैं कि किस तरह इमरान खान की पार्टी इमामों के रहमो-करम पर चल रही है, नवाज शरीफ की पार्टी उनके जेल में रहते हुए भी मजबूती से मैदान में डटी हुई है। और इस पूरी राजनीति में फौजी दखल सिर चढ़कर बोल रही है। 
यह कहने के लिए हमारे पास पाकिस्तान के हाईकोर्ट के एक जज का ताजा बयान है जो कि उन्होंने रावलपिंडी बार एसोसिएशन में कल ही अपने भाषण में दिया है। उन्होंने खुलकर कहा कि देश की ताकतवर फौजी खुफिया एजेंसी आईएसआई अदालतों से अपनी मर्जी के फैसले पाने के लिए चीफ जस्टिस और बाकी जजों पर दबाव डाल रही है। इस जज, शौकत सिद्दीकी ने यह भी कहा कि आईएसआई ने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के मामले में भी चीफ जस्टिस और बाकी जजों पर दबाव बनाया था। यहां यह जिक्र जरूरी है कि पिछले दिनों नवाज शरीफ और उनकी बेटी को भ्रष्टाचार के आरोपों में कैद सुनाई गई है, और यह जानते हुए भी वे देश लौटे और जेल गए। 
जज शौकत सिद्दीकी ने कहा कि आईएसआई न्याय प्रक्रिया और मीडिया दोनों पर काबू रख रही है। उन्होंने कहा कि आज के दिन कोर्ट आजाद नहीं है, और मीडिया को भी सेना से हुक्म मिल रहे हैं। मीडिया सच बयां नहीं कर रहा है, और वह भी फौज के दबाव में है। उन्होंने यह भी कहा कि आईएसआई ने अपने पक्ष में फैसले के लिए पसंदीदा बेंच बनवाई और जज से कहा कि चुनाव से पहले नवाज शरीफ और उनकी बेटी जेल के बाहर नहीं आने चाहिए।
पाकिस्तान की हुकूमत में फौज का ऐसा दखल अनसुना नहीं है। वहां हमेशा से सरकार को फौज के साथ तालमेल करके चलना पड़ा है, और कई मौकों पर फौज के फैसलों को मानना भी पड़ा है। ऐसा न होने पर फौज ने चुनी हुई सरकार को हटाकर अपनी हुकूमत भी बना डाली है। लेकिन फौज के ऐसे हाल को देखते हुए पाकिस्तान के आसपास के दूसरे देशों को कुछ सोचना चाहिए, अपनी कुछ फिक्र करनी चाहिए। हिंदुस्तान के हालात वैसे तो बहुत अलग हैं, लेकिन हाल के बरसों में फौज और फौज के मामलों को जिस तरह चुनाव का मुद्दा बनाया गया, जिस तरह रिटायर्ड फौजियों को राजनीति में लाया गया, जिस तरह फौज को राष्ट्रवादी उन्माद को बढ़ाने के लिए लोकतंत्र से ऊपर बताने की कोशिश की गई, जिस तरह राजनीतिक बयानबाजियों में फौज को गौरवान्वित करके दूसरी पार्टियों को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है, उससे एक खतरनाक नौबत की तरफ यह लोकतंत्र बढ़ रहा है। जिस तरह पिछले बरसों में पड़ोसी देशों खासकर पाकिस्तान और चीन के बारे में बयान देने के लिए मौजूदा फौजी अफसरों का इस्तेमाल हिंदुस्तान में किया गया है, जिस तरह उनसे जंग के फतवे दिलवाए गए हैं, वह लोकतंत्र में फौज के एक गैरफौजी किरदार की जगह देने जैसा गलत काम हुआ है। भारत का लोकतंत्र बहुत मजबूत है और यहां पर फौज को सरकार के मातहत काम करने की लंबी आदत है। ऐसे में सियासती मामलों में न तो फौज के जिक्र का हथियार इस्तेमाल करना चाहिए, और न ही फौज को खुद होकर अपनी बैरकों से बाहर बयानबाजी में झोंकना चाहिए। 
पता नहीं भारत के आज के संवैधानिक ढांचे में रिटायर्ड फौजी अफसरों के चुनाव लडऩे पर कोई रोक क्यों नहीं है, लेकिन हमारा मानना है कि अगर फौज को इस लोकतंत्र में राजनीति से परे रखना है, तो रिटायर होने के बाद भी फौजी अफसरों के चुनावी राजनीति में आने पर रोक लगनी चाहिए। ऐसा न होने पर फौज में रहते-रहते अफसरों में एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा आ सकती है जो कि किसी दिन लोकतंत्र को कमजोर करेगी। अपने-आपको ठोकर लगने के बाद तो संभलने की कोशिश हर कोई करते हैं, लेकिन पड़ोस के हाल को देखकर अगर हिंदुस्तान समय रहते नसीहत ले सके, तो उसे लेना चाहिए और फौज का राजनीतिक जिक्र करना बंद करना चाहिए, फौज से राजनीतिक बयान दिलवाना बंद करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जुलाई

विपक्षी प्यार की झप्पी के बाद इस एक मुद्दे पर एक साथ हों..

संपादकीय
21 जुलाई 2018


संसद में कल कांग्रेस के सांसद और पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने एक जोशीले भाषण के बाद पता नहीं क्या सोचकर जाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्यार की झप्पी देने के अंदाज में गले लगाया, और आकर खुद ही उसका मजा लेते हुए बैठ गए। इसके बाद लोकसभा के भीतर के कैमरों ने यह भी दर्ज किया कि किस तरह खुद ही मुस्कुराते हुए राहुल गांधी अपनी पार्टी के किसी सांसद की तरफ देखकर आंख मार रहे हैं, मानो यह कह रहे हों कि कैसी रही? 
सत्ता और विपक्ष के बीच संसद में पिछले कुछ बरसों से जिस कदर की तनातनी चल रही है, उसे देखते हुए प्यार की यह झप्पी एक बड़ी अनोखी बात रही, और अटपटी बात भी रही। इसके कई मतलब निकाले जा सकते हैं, और राहुल गांधी ने खुद इसका एक मतलब बताया भी है कि वे मोदी के मन से नफरत हटाकर मोहब्बत भर देंगे, उन्होंने कहा कि आपके मन में मेरे लिए नफरत है, लेकिन मेरे मन में आपके लिए नफरत नहीं है। जो भी हो, संसद को छोड़कर जाने से बेहतर है गले लगना। और फिर मोदी तो गले लगने के ऐसे काम के भारी शौकीन हैं, और अब तक दुनिया के दर्जनों राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मोदी को अपने गले लगते पा चुके हैं। हमारा ऐसा ख्याल है कि मोदी दुनिया के सबसे अधिक गले मिलने वाले प्रधानमंत्री कबके बन चुके हैं यह एक अलग बात है कि देश के भीतर उनका आलिंगन लोगों को कम ही नसीब होता है। 
संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बहुत से दूसरे नेताओं के अलावा राहुल गांधी ने भी बहुत सी बातें कहीं, और उनके जवाब में मोदी और भाजपा के कई लोगों को कई गुना अधिक बोलने का मौका इसलिए भी मिला क्योंकि संसद में सदस्य संख्या के अनुपात में पार्टियों को वक्त मिलता है। इसलिए कांग्रेस के मुकाबले करीब दस गुना समय भाजपा को मिला होगा, और पार्टियों ने अपनी घोषित रीति-नीति के मुताबिक बहुत सी बातें कहीं। लेकिन बाकी बातों से परे जिस एक बात को हम देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण मान रहे हैं, वह है महिला आरक्षण। संसद सत्र शुरू होने के पहले राहुल गांधी ने बाहर ही कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री से कहा था कि वे महिला आरक्षण विधेयक लेकर आएं, उस पर मतदान करवाएं, और कांग्रेस उस पर साथ देगी। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि अभी पिछले पखवाड़े ही हमने इसी जगह इस मुद्दे पर लिखा था कि हिंदुस्तान में महिला आरक्षण विधेयक अब खबरों के भी बाहर हो गया है। अब इसे संसद में गुजरे भी दस बरस हो गए हैं। राज्यसभा ने इसे 2010 में पास कर दिया था लेकिन लोकसभा ने इस पर कभी वोट नहीं किया। जबकि इसी संसद ने देश की पंचायतों और म्युनिसिपलों के लिए महिला आरक्षण कानून 1993 में ही बना दिया। अब उसे पच्चीस बरस हो गए हैं। जिस देश की संसद जानती और मानती है कि देश के हर गांव में महिला पंच, दलित महिला पंच, आदिवासी महिला पंच ओबीसी महिला पंच मिल सकती है, उस संसद को विधानसभा सीट और लोकसभा सीट पर महिला प्रतिनिधि मिलने की उम्मीद नहीं है। यह संसद का एक मर्दाना पाखंड है। जिस संसद में इसी दौर में सोनिया गांधी, मायावती, ममता बैनर्जी जैसी महिला मुखिया रही हों, उस संसद ने महिला आरक्षण की चर्चा ही छोड़ दी। आज अगर ये तीन महिलाएं एक साथ उठ खड़ी हों, तो बाकी पार्टियों को भी महिला आरक्षण, मजबूरी में ही सही, मानना पड़ेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि सत्ता की ताकत पाने के बाद भारत की महिला नेताओं के भीतर भी मर्दाना मिजाज कब्जा कर लेता है,और महिलाओं की चर्चा बंद हो जाती है।
इस देश ने समय-समय पर तरह-तरह के गैर राजनीतिक या बहुदलीय आंदोलन देखे हैं। आज जब अगला आम चुनाव एक बरस दूर है, तो ऐसे ही एक आंदोलन की जरूरत है जिसे 2018 का कोई जेपी, कोई अन्ना, कोई केजरीवाल, कोई भी शुरू करे। यह आंदोलन ऐसी जागरूकता खड़ी करे कि मतदाता सिर्फ महिला उम्मीदवार को वोट करें। अगर किसी सीट पर दो महिलाएं हैं तो वे मर्जी से छांटें, अगर कोई अकेली महिला है, तो सिर्फ उसे वोट दें। एक बार अगर ऐसा आंदोलन जोर पकड़ लेगा तो अगले चुनाव के पहले महिला आरक्षण लागू हो चुका रहेगा। देश भर में लोग आज से सांसदों को घेरें, पार्टियों के नेताओं को घेरें और महिला आरक्षण पर सवाल पूछें, उन्हें मजबूर करें।
अपने इस तर्क को एक पखवाड़े के भीतर ही यहां पर दुहराते हुए हम यह कहना चाहते हैं कि कांग्रेस सहित वे तमाम पार्टियां जो महिला आरक्षण की हिमायती हैं, उन्हें संसद के इसी सत्र में इस विधेयक पर जोर देना चाहिए, और इस बार यह खुलकर साबित हो जाए कि कौन महिला आरक्षण के पक्ष में है, और कौन उसके खिलाफ। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जुलाई

जरूरत पर चुप्पी और बिना जरूरत बयान...

संपादकीय
20 जुलाई 2018


कई बार लोगों की चुप्पी उनकी कही बातों से अधिक सिर चढ़कर बोलती है। पिछले दिनों ऐसे दो मामले सामने आए। असम की बेटी हिमा दास ने एक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में देश के लिए पहला एथलेटिक गोल्ड मैडल हासिल किया तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिमा के वीडियो के साथ ट्वीट किया। उन्होंने खेल में प्रदर्शन या गोल्ड मैडल पाने, इस कामयाबी को हासिल करने पर तो कुछ नहीं कहा, उनकी ट्वीट में महज यही था कि किस तरह यह खिलाड़ी जीतने के बाद राष्ट्रीय ध्वज ढूंढती-मांगती रही, और राष्ट्रगान के समय उसका उत्साह कैसा था। प्रधानमंत्री से यह उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे मौके पर खिलाड़ी के प्रदर्शन पर कुछ कहें, अगर ऐसी खिलाड़ी एक गरीब परिवार से आई है तो वहां से ऊपर उठने के बारे में कुछ कहें। लेकिन मोदी की ट्वीट महज राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय भावना के प्रतीक राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के गौरव तक सीमित रह गई। इन बातों के लिए तारीफ अच्छी लगती अगर वे इसके साथ-साथ खेल के बारे में भी कुछ कहते। खेल के बारे में चुप्पी खटकने की तरह दिखती रही। ऐसा ही दूसरा मामला ट्विटर पर ही सामने आया जिसमें एक वरिष्ठ पत्रकार ने स्वामी अग्निवेश पर हमले की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा कि वे एक वक्त हरियाणा में मंत्री भी थे, और सुषमा स्वराज उस वक्त उनकी डिप्टी मिनिस्टर थीं। इसके जवाब में सुषमा ने तुरंत ही लिखा कि वे कैबिनेट मंत्री थीं, और कभी किसी की डिप्टी नहीं रहीं। लेकिन अपने ही पुराने मंत्रिमंडलीय साथी और एक हिन्दू पर हुए ऐसे शर्मनाक हमले के बारे में सुषमा ने एक लाईन भी नहीं कही, और हमले पर उनकी चुप्पी सिर चढ़कर बोलने लगी, ट्विटर पर कुछ जिम्मेदार लोगों ने तुरंत इसके बारे में लिखा। 
जब देश में जुल्म हो रहा हो, तब लोग, इस देश के प्रमुख लोग अगर दूसरे देशों के मामलों पर तो हमदर्दी ट्वीट करें, लेकिन देश के मामलों पर चुप रहें, तो वह चुप्पी चीख-चीखकर बोलती हुई सुनाई देती है। भारत में इन दिनों ऐसा बहुत हो रहा है। एक बड़े नेता से जब प्रधानमंत्री की चुप्पी के बारे में एक अनौपचारिक चर्चा में पूछा गया तो उनका जवाब था कि अगर हमारी ही पार्टी के राज में कोई ऐसा मामला होता है, तो प्रधानमंत्री बोल भी क्या सकते हैं? क्या अपनी पार्टी की सरकार के खिलाफ बोलें? आखिर पार्टी भी तो चलानी है। 
यह सोच प्रधानमंत्री के ओहदे को, या किसी केन्द्रीय मंत्री, किसी मुख्यमंत्री के ओहदे को घटाकर महज एक पार्टी का छोटा सा तंगदिल नेता बनाकर रख देती है। लोगों को सार्वजनिक जीवन में आने के बाद बहुत तुरत नफा और नुकसान से परे भी सोचना चाहिए क्योंकि सार्वजनिक जीवन का यह तकाजा रहता है, और जब किसी ओहदे की संवैधानिक शपथ ली जाती है, तो लोगों को अपने पार्टी के स्वार्थ से ऊपर भी कुछ सोचने की जरूरत रहती है। ऐसा भी नहीं है कि आज के सोशल मीडिया के अतिसक्रियता के युग में किसी की चुप्पी दबी-छुपी रह जाए। आज कोई बात छुपती नहीं है, लोग किसी गलती को करके बच नहीं सकते हैं। फिर यह भी है कि अब लोगों के कामकाज और चाल-चलन पर कुछ कहने का हक महज परंपरागत मीडिया का एकाधिकार नहीं रह गया है, और अब हिन्दुस्तान के हर नागरिक को खुलकर बोलने का मौका मिल चुका है अगर उन्हें कुछ शब्द टाईप करना आता है, और उनके पास एक साधारण सा फोन भी है।
हिन्दुस्तान के इतिहास में ऐसे नेताओं को भी अच्छी तरह दर्ज किया गया है जिन्होंने अपनी पार्टी के हितों से परे जाकर भी देशहित या जनहित के काम किए। दूसरी तरफ ऐसे नेताओं को भी इतिहास अच्छी तरह दर्ज करता है जो कि देशहित और जनहित से ऊपर अपने पार्टी हित को मानते हुए कभी जरूरत के मौके पर चुप्पी साध लेते हैं, तो कभी गैरजरूरी मौके पर बोलने लगते हैं। इतिहास में नाम दर्ज कराने की हसरत जिस किसी में हो, उसे तंगदिली और तंगनजरिए से ऊपर उठना ही होता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जुलाई

जुर्म होने के पहले रोकना ही अकेला रास्ता, और कुछ नहीं

संपादकीय
19 जुलाई 2018


उत्तरप्रदेश के देवरिया की एक खबर है कि एक स्कूल में 7वीं की एक छात्रा ने पूरे स्कूल के दोपहर के भोजन में जहर मिला दिया, क्योंकि वह उसी स्कूल में कुछ समय पहले अपने भाई की हुई हत्या का बदला लेना चाहती थी। इस बच्ची को पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया, उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, और उसे बाल सुधार गृह भेजा जा रहा है। स्कूल में पढऩे वाली एक छोटी सी बच्ची के दिमाग में ऐसा भयानक ख्याल कैसे आया, यह अधिक फिक्र की बात है। दूसरी तरफ कल ही छत्तीसगढ़ में एक दूसरी भयानक खबर आई है जिसमें एक पति ने अपनी पत्नी के चाल-चलन पर शक करते हुए उसके गुप्तांग में बिजली का तार डालकर उसे करंट से जलाकर मार डाला। इन दोनों हत्याओं को देखने पर एक बात एक सरीखी है कि ये किसी तैश में पल भर में की गई हत्याएं नहीं हैं, बल्कि सोच-समझकर की गई हैं, और इसीलिए इनके पीछे की कू्ररता अधिक भयानक है, अधिक फिक्र का सामान है। 
दुनिया में कई जगहों पर बड़ी संख्या में कत्ल इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन ऐसे कत्ल जो कि पूरी तरह सोच-समझकर और पूरी क्रूरता से किए जाएं, वे एक जुर्म से अधिक भी होते हैं, और वे समाज के लोगों की संवेदनाशून्य सोच का सुबूत भी होते हैं। फिक्र इस बात की नहीं कि कुछ कत्ल हुए, फिक्र इस बात की कि कातिल इस कदर बेपरवाह हो गए हैं। और धीरे-धीरे यह क्रूरता बढ़ती चल रही है। बड़ों से अब यह बच्चों तक पहुंच रही है, और आदमियों से औरतों तक में, जो कि कम हिंसक मानी जाती हैं। ये हत्याएं और इस किस्म के कुछ दूसरे कत्ल और बलात्कार के मामले समाज में खूंखार जुर्म के लिए लोगों के बीच बढ़ते हुए बर्दाश्त को बताते हैं कि कैसे लोग परिवार की, या पड़ोस की, या अपने स्कूल की कुछ बरस या कुछ महीने की बच्ची के साथ बलात्कार कर लेते हैं, या किस तरह कुछ नाबालिग लड़के किसी नाबालिग लड़की को पकड़कर गैंगरेप करते हैं। 
दुनिया में कई किस्म के जुर्म ऐसे हैं जिनको होते हुए रोकना मुमकिन नहीं रहता, जब तक कि पुलिस ईश्वर न हो जाए। और जैसा कि पूरी दुनिया में चारों तरफ हो रहा बताता है, कि ईश्वर कहीं है नहीं, या है तो वह बेरहमी को खासा पसंद करता है। यह बात साफ रहनी चाहिए कि किसी की कत्ल की नीयत, या बलात्कार का इरादा उनके चेहरे पर लिखा नहीं होता, और ऐसे जुर्म अमूमन जब हो चुके रहते हैं, तब पुलिस के हाथ में अधिक से अधिक इतना ही रहता है कि वह ठीक से जांच करे, और सही मुजरिम को पकड़कर सजा दिलवाए। ऐसे में समाज को अपने भीतर चौकन्ना रहना होगा, और अपनी अगली-पिछली पीढिय़ों को भी हिंसा से दूर रखना होगा। समाज का ढांचा परिवारों से मिलकर बनता है, और लोगों को अपने परिवार के भीतर जुर्म और हिंसा से परहेज की सोच मजबूत करनी होगी। कोई भी मुजरिम एक मजबूत इरादों वाले और कानूनपसंद परिवार के बीच रहते हुए जुर्म के खतरे में कम ही पड़ते हैं। अगर पूरा परिवार आपसी बातचीत में जुर्म को बुरा मानकर, कानून की राह पर चलने पर अड़ा रहता है, तो परिवार के किसी सदस्य का मुजरिम बनने का खतरा खासा घट जाता है। फिर यह भी है कि हत्या या बलात्कार जैसा बड़ा और खूंखार जुर्म करने के पहले लोग आमतौर पर कई छोटे-मोटे जुर्म कर चुके रहते हैं, और जब परिवार उन मौकों पर अपने सदस्य पर काबू नहीं कर पाता, तब बात बेकाबू होती है। 
सरकार और समाज इन दोनों को मिलकर तमाम लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि एक जुर्म से मुजरिम तो जेल जाते ही हैं, लेकिन उनका पूरा परिवार भी जेल के बाहर बहुत किस्म की तकलीफें झेलता है, सामाजिक अपमान और प्रताडऩा झेलता है। बहुत से परिवार घर के किसी एक मुजरिम की वजह से तबाह भी हो जाते हैं। हमने हर महीने ऐसी खबरें देखी हैं जिनमें पति-पत्नी में से एक ने दूसरे का कत्ल किया, और खुद जेल चले गए। ऐसे में बच्चे बुजुर्ग दादा-दादी या नाना-नानी के हवाले रह जाते हैं, और उनकी हालत कई मामलों में अनाथ बच्चों जैसी रहती है। समाज के लोगों के बीच जुर्म के बाद के ऐसे हाल की गंभीरता बड़ी तल्खी के साथ पेश की जानी चाहिए। जुर्म के पहले लोगों को रोकना जरूरी है, जुर्म के बाद तो महज सजा की गुंजाइश बचती है, किसी किस्म की भरपाई नहीं हो पाती, न मुजरिम के परिवार की भरपाई हो पाती, और न ही जुर्म के शिकार, या उसके परिवार की भरपाई हो पाती। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जुलाई

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 जुलाई : स्वामी अग्निवेश पर हमले की महज जांच काफी नहीं

संपादकीय
18 जुलाई 2018


झारखंड में आदिवासियों के एक कार्यक्रम में पहुंचे स्वामी अग्निवेश को सत्तारूढ़ भाजपा के युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने खुली सड़क पर दिनदहाड़े पीटा, उनके कपड़े फाड़ दिए, और उनके साथ की गई मारपीट का एक हिंसक वीडियो भी बनाया गया। जिसे फैलाया भी गया। यह सब कुछ उस वक्त हुआ जब हिन्दुस्तान का सुप्रीम कोर्ट भीड़ द्वारा हत्या के खिलाफ एक कड़ा दिखने वाला फैसला दे रहा था, जो कि हकीकत में एक दिखावे का फैसला है, सुप्रीम कोर्ट की अपनी इज्जत को बचाने के लिए। स्वामी अग्निवेश एक सक्रिय हिन्दू हैं जो कि सुधारवादी आर्य समाज से जुड़े रहे, और फिर उससे भी अलग होकर वे राजनीति में, सामाजिक आंदोलनों में, बंधुआ मजदूरों की मुक्ति में काम करते-करते देश-विदेश में मशहूर हुए। वे नक्सलियों से भी लोकतांत्रिक बातचीत के हिमायती हैं, और इसीलिए बहुत से लोग उन पर नक्सल-समर्थक होने की तोहमत लगाते हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा की मौजूदा सरकार के चलते हुए ही जब वे 2011 में बस्तर गए थे, तब वहां पुलिस अफसरों के भड़कावे पर कुछ स्थानीय हिंसक शहरियों ने अग्निवेश पर हमला किया था, और उनका मुंह काला किया था। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी अग्निवेश का विरोध हुआ था, और उसमें खुलकर सत्तारूढ़ भाजपा के आक्रामक नौजवान शामिल थे। यह याद रखने की बात है कि स्वामी अग्निवेश खालिस छत्तीसगढ़ी हैं, जो बहुत बचपन में ही आन्ध्र से छत्तीसगढ़ आए थे, और यहीं के होकर रह गए थे। बाद में वे आर्य समाज आंदोलन में शामिल हुए, और फिर उससे अलग राजनीतिक दल हरियाणा में बनाया, चुनाव लड़ा,  और मंत्री भी बने। लेकिन छत्तीसगढ़ आना-जाना लगे रहा, और बस्तर में पुलिस हिंसा के शिकार आदिवासियों की मदद करने जब वे आए, तो उन पर पत्थर से हमला करवाया गया। 
सुप्रीम कोर्ट का जिक्र हम इस सिलसिले में इसलिए कर रहे हैं कि भीड़ द्वारा हत्या को लेकर वह केन्द्र सरकार से संसद में एक कानून बनाने की बात कर रहा है। इससे बोगस और क्या बात हो सकती है कि जब मौजूदा कानूनों के तहत हत्यारी भीड़ को सजा दिलाने के लिए ढेरों वीडियो सुबूत रहते हुए भी जब सरकारें कार्रवाई न करे, और केन्द्र और राज्य के मंत्री हत्यारों को माला पहनाकर उनका सम्मान करे, तो नया कानून कौन सा तीर चला लेगा? सुप्रीम कोर्ट को नए कानून की चर्चा तो तब करने का हक रहता जब वह हत्यारों का सम्मान करने वाले मंत्रियों को नोटिस देकर कटघरे में खड़ा करता। जब वह राज्य सरकारों के अफसरों को कटघरे में खड़ा करता, और हत्यारी भीड़ पर कड़ी कार्रवाई न करने पर सवाल करता। अपने आपकी महानता साबित करने का यह एक राजनीतिक नुस्खा है जिसका इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट भी कर रहा है। जब मौजूदा कानून पर अमल की राजनीतिक शक्ति न बचे, तो सरकारें आमतौर पर नए कानून बनाकर अपनी इज्जत बचाती हैं। आज जब देश का माहौल खुलकर ऐसा लग रहा है कि सरकारों में बैठे लोग भीड़-हत्याओं के लिए लोगों को उकसा रहे हैं, तो सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय केन्द्र सरकार को एक फिजूल की नसीहत दे रहा है कि वह नया कानून बनाए। ऐसी भीड़ को तो आज के कानून के तहत भी उम्रकैद दी जा सकती है। 
जहां तक स्वामी अग्निवेश पर हमले का सवाल है, तो वे हमेशा से धर्मान्ध और कट्टर हिन्दू हमलावरों की आंखों की किरकिरी बने रहे हैं। वे धर्म के भीतर एक विनम्रता के हिमायती हैं, वे भारत की संस्कृति के मुताबिक धर्मनिरपेक्षता के हिमायती हैं, और वे हिन्दू धर्म के भीतर पाखंड के खिलाफ और सुधार के हिमायती हैं। आज देश में गोमांस पर चल रही बहस पर उन्होंने लोगों के गोमांस खाने के हक पर बयान दिया था, और उसे लेकर वहां भाजपा के संगठनों के नौजवान बिखरे हुए थे। वे लोकतंत्र के भीतर सभी तबकों के साथ बातचीत के हिमायती भी हैं, और ऐसे तबकों में नक्सलियों से लेकर दूसरे ऐसे तबके भी शामिल हैं जो कि लोकतंत्र पर भरोसा नहीं रखते। अपनी इसी प्रगतिशील और उदार सोच की वजह से, पाखंड के खिलाफ सक्रियता की वजह से वे अलोकतांत्रिक और हिंसक धर्मान्ध लोगों के निशाने पर रहते हैं। लेकिन जिस राज्य में जिस पार्टी की सरकार है उस पार्टी के लोग अगर सड़कों पर ऐसी हिंसा करते हैं, तो यह उस पार्टी के लिए भी धिक्कार की बात है, और उसे राष्ट्रीय स्तर पर अपने लोगों की ऐसी हरकत पर जवाब देना चाहिए। झारखंड की भाजपा सरकार ने इस हमले की जांच के आदेश दिए हैं, और डेढ़-दो दर्जन लोग गिरफ्तार भी किए गए हैं, लेकिन इस हमले का वीडियो भाजपा को पूरी दुनिया में जैसी बदनामी दिला रहा है उसके चलते उसे एक राष्ट्रीय पार्टी होने का जिम्मा भी निभाना चाहिए, और इस पर बयान देना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)