सड़क हादसों को रोकने के लिए कड़ी-कड़वी कार्रवाई जरूरी

संपादकीय
2 जुलाई 2018


कल एक ही दिन बहुत से ऐसे सड़क हादसे हुए जिसमें से एक, उत्तराखंड की एक बस खाई में गिरी, और करीब पचास लोग मारे गए। छत्तीसगढ़ से लगे महाराष्ट्र में एक ही हादसे में पांच लोग जान खो बैठे। इसके अलावा छोटे-छोटे हादसे तो खबरों में इस तरह आते-जाते हैं कि जब तक कोई अधिक चर्चित मौत उसमें न हो, लोग शायद खबर की सुर्खी के नीचे का समाचार पढ़ते भी नहीं हैं। हिन्दुस्तानी लोग सड़क हादसों को लेकर ठीक उसी तरह संवेदनाशून्य हो गए हैं जिस तरह गंदगी को लेकर हो गए हैं। इस देश में लोग गंदगी, सड़क हादसे, भ्रष्टाचार, ऐसी कई चीजों को अपनी नियति मानकर चलते हैं, और उन्हें इनसे कोई खास शिकायत भी नहीं रहती। हादसों में होने वाली मौतों को कम करने की आधी-अधूरी कोशिशें ऐसी बेदिली से होती हैं कि उनका कोई असर होता नहीं है। 
देश के कुछ महानगरों को अगर छोड़ दें जहां कि बड़ी संख्या में पुलिस तैनात रहती है, और कैमरे भी लगे हुए हैं, तो देश के बाकी तमाम शहरों में सड़क हादसों को रोकने लायक कोई चौकसी नहीं होती। आम गाडिय़ों की बात तो छोड़ ही दें, स्कूल की बसें तक कहीं ड्राइवर नशे में चला रहे हैं, तो कहीं बिना ड्राइविंग लाईसेंस वाले कोई क्लीनर भी स्कूल बस चला लेते हैं। केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक से अधिक बार देश में राज्य सरकारों के आरटीओ विभाग के भ्रष्टाचार के बारे में सार्वजनिक बयान दिया है, और यह भ्रष्टाचार ऐसे हादसों के पीछे की एक बड़ी वजह है। न तो गाडिय़ों पर कोई काबू है, न ही चलाने वालों पर। नतीजा यह होता है कि हादसों के बाद सत्ता के आंसू जारी होते हैं, और उसके अगले पल से ही वही ढर्रा चल निकलता है जो कि जगह-जगह जान लेता है। जब लोग खुद अपनी हिफाजत के लिए न जागरूक हैं, न चौकन्ने हैं, तो सरकार को ही यह कड़वा काम करना पड़ता है। 
छत्तीसगढ़ में हम लगातार देखते हैं कि हेलमेट के लिए भूले-भटके किसी शहर में कुछ हफ्तों के लिए पुलिस की कड़ी जांच होती है, और अचानक शहर के लोगों को यह लगने लगता है कि उनका सिर भी कीमती है, और उनका दिमाग भी कीमती है, इसलिए वे कुछ सौ रूपए का चालान पटाने के बजाय कुछ सौ रूपए का हेलमेट पहन लेते हैं। लेकिन जैसे ही पुलिस की कड़ाई खत्म होती है, लोगों को लगता है कि उनका सिर आजाद भारत में आजाद ही रहना चाहिए, और हेलमेट की सुरक्षा का कैदी नहीं रहना चाहिए। ऐसी ही जांच बड़ी गाडिय़ों की रफ्तार, उनमें सीटबेल्ट के इस्तेमाल, और गाड़ी चलाने वालों के नशे की हालत को लेकर है। न कोई जांच हो पाती है, और न ही कार्रवाई ऐसी होती है कि लोग इससे डरें। जो विकसित और समझदार देश हैं उनमें बिना लाईसेंस गाड़ी चलाने पर भारी जुर्माना और कैद भी होती है, और एक से अधिक बार ट्रैफिक-गलती करने पर लाईसेंस निलंबित भी हो जाता है, और लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है। जिस प्रदेश को अपनी सड़कों पर अराजकता को खत्म करना हो, उसे कुछ कड़ाई तो बरतनी ही होगी, जो कि जनता के भले के लिए होगी, और यह भी तय है कि वह शुरू में कोई लोकप्रिय कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन सरकारों को जनता के हित में कभी-कभी कड़ी और कड़वी कार्रवाई भी करनी पड़ती है जो कि आगे जाकर जनता की जिंदगी बचाने वाली साबित होती है। 
छत्तीसगढ़ में रोजाना इतने सड़क हादसे हो रहे हैं कि उनसे सबक लेकर सरकार को कड़ाई से कार्रवाई करनी चाहिए और नियमों में जो सबसे कड़े प्रावधान है, उनके मुताबिक जुर्माना और सजा देना चाहिए, गाडिय़ां जब्त करनी चाहिए। एक गैरजिम्मेदार और लापरवाह की वजह से बाकी लोगों की जिंदगी खतरे में डालना सरकार की गैरजिम्मेदारी के सिवाय और कुछ नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

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