पूरे देश में चुनाव एक साथ होने से सरकारों पर चुनावी दबाव घटने से फायदा होगा

संपादकीय
10 जुलाई 2018


छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों से रोज सड़कों पर होने वाले प्रदर्शन बढ़ गए हैं। राजनीतिक दलों के नेताओं को मालूम है कि कुछ महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं, तो बहुत से नेताओं की नजरों में कोई न कोई सीट है, और पार्टियों के तो अपने मुद्दे हैं ही। ऐसे में दूरगामी प्रभाव वाले, या कि दीर्घकालीन हित वाले काम छेडऩे की कोई सोच भी नहीं रहे हैं। छत्तीसगढ़ सहित बाकी जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वे सभी इसी तरह के चुनावी मोड में आ गए हैं, और लंबी सोच को फिलहाल ताक पर धर दिया गया है। लोगों को याद होगा कि मोदी सरकार ने आने के बाद यह चर्चा शुरू की थी कि क्या देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाने चाहिए? हम यह भी सोचते हैं कि इसके साथ-साथ म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनाव भी क्यों न करवाए जाएं? दरअसल मोदी की पिछले आम चुनाव में लोकप्रियता और कामयाबी साबित होने के बाद भाजपा और एनडीए का ऐसा सोचना जायज है कि विधानसभाओं के चुनाव भी साथ-साथ निपट जाएं। अगर ऐसा हुआ रहता तो पंजाब या गोवा या मणिपुर में भी भाजपा-एनडीए को शायद जीत मिल सकती थी। इसके साथ-साथ देश में चुनावी खर्च भी कम हो सकता था, और सरकारों के काम करने के तरीके में भी ऐसा फर्क आ सकता था कि बिना चुनावी दबाव के सरकारें बाद में पांच बरस काम कर सकतीं।
हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में देखते हैं कि छह-छह महीने में तीन चुनाव होते हैं, और सबसे पहले होने वाले विधानसभा चुनाव के साल भर पहले से सत्तारूढ़ पार्टी फूंक-फूंककर कदम रखने लगती है जो कि तीसरे चुनाव तक जारी रहता है। ऐसे में करीब ढाई बरस का समय सरकार चुनावी-दबाव में निकालती है, और उसके फैसले बहुत उत्पादक नहीं रह जाते। कुछ दूसरे राज्यों में ये चुनाव पांच बरसों में और अधिक बिखरे हो सकते हैं, और वहां पर राज्य सरकार अपना पूरा ही कार्यकाल चुनावी मोड में निकालती हो सकती है। इसलिए लोकतंत्र में यह एक अच्छी बात हो सकती है कि संसद, विधानसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं। अब यह देखें कि ऐसी सोच में दिक्कत क्या-क्या है।
पहली बात तो यह कि देश भर में जब एक तारीख तय की जाएगी तो कई राज्य ऐसे होंगे जहां की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ रहेगा। लेकिन ऐसे में चुनाव आयोग पर यह फैसला छोड़ा जा सकता है कि कौन सी ऐसी तारीख छांटी जाए जिसमें अधिकतर राज्यों के चुनाव एक साथ करवाए जा सकें, और फिर हो सकता है कि उसके लिए संसद का कार्यकाल कुछ कम करना पड़े। ऐसा एक ही बार करना पड़ेगा, और उसके बाद जब तक कोई विधानसभा भंग न हो, राज्य के चुनाव संसद के साथ ही होते रहेंगे। हमारा मानना है कि देश-प्रदेश को चुनावी दबावों से मुक्त होकर पांच बरस काम करने का मौका मिलना चाहिए, और वह देश-प्रदेश सभी के लिए अधिक उत्पादक स्थिति रहेगी। अब राज्यों में सरकारों को भंग करना करीब-करीब खत्म हो चुका है, और राज्यों में मध्यावधि चुनाव की नौबत भी नहीं आती है। ऐसे में एक साथ चुनाव करवाने के बारे में जरूर सोचना चाहिए, ताकि सरकारें लुभावनी राजनीति से परे एक लंबा कार्यकाल गुजार सकें। 
अभी इस पर छिड़ी हुई ताजा बहस में एनडीए और मोदी के साथ जो पार्टियां नहीं हैं, उनमें से भी समाजवादी पार्टी और टीआरएस ने खुलकर पूरे देश में सारे चुनाव एक साथ करवाने से सहमति जाहिर की है। कांगे्रस और भाजपा जैसी दोनों सबसे बड़ी, या फैली हुई पार्टियों ने अभी इस मुद्दे पर जुबान नहीं खोली है। और यह मामला इतना आसान भी नहीं है कि रातों-रात केंद्र सरकार इसे तय कर सके। लेकिन फिर भी बहस के लिए यह मुद्दा सार्वजनिक मंच पर आ गया है, मीडिया भी अलग-अलग राय सामने रख रहा है, आम आदमी पार्टी इसके खिलाफ है, और हमारा ख्याल है कि एक लंबे राजनीतिक विचार-विमर्श के बाद  इस मुद्दे पर बनी व्यापक सहमति संसद और विधानसभाओं के रास्ते होते हुए लागू हो सकती है। लोकतंत्र में जनमत का रूख देखने के लिए ऐसी बहस बहुत मायने रखती है। और फिलहाल हमें इस सोच में कोई सैद्धांतिक खामी नजर नहीं आ रही है। (Daily Chhattisgarh)

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