कचरा-निपटारे पर इस राज्य पर सुप्रीम कोर्ट का जुर्माना...

संपादकीय
11 जुलाई 2018


सुप्रीम कोर्ट ने शहरों के ठोस कचरे के निपटारे को लेकर केन्द्र सरकार और राज्यों को नोटिस जारी किया है और दर्जन भर राज्यों पर इस बात के लिए जुर्माना भी लगाया है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद इस बारे में हलफनामा दाखिल नहीं किया है। इन राज्यों में छत्तीसगढ़ भी है जो कि कचरे से लदा हुआ राज्य है, और यहां पर कचरा उठाने के लिए बड़े-बड़े ठेके देने से परे और किसी काम में अधिकतर बड़े शहरों की दिलचस्पी नहीं दिखती है, यह एक अलग बात है कि पिछले दिनों दिल्ली में हुए एक किसी कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के कई म्युनिसिपल कई बातों के लिए पुरस्कार लेकर लौटे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि शहर कचरे से पटे हुए हैं, नाले-नालियां चोक हो चुके हैं, और पानी के लिए मानो सड़कें ही बच गई हैं। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई से परे एक दिलचस्प बात यह है कि इसी छत्तीसगढ़ में एक छोटे से जिला मुख्यालय अंबिकापुर में ठोस कचरे के निपटारे के लिए एक बड़ा कामयाब मॉडल पेश किया है जिसकी देश भर में जगह-जगह तारीफ हुई है, लेकिन इसी प्रदेश में उस मॉडल पर अमल होते नहीं दिख रहा है। ऐसा शायद इसलिए भी हो रहा है कि यह मॉडल केवल स्थानीय महिलाओं को लेकर उन्हें काम पर लगाकर बिना किसी ठेके के कचरा-निपटारे का है, और बड़े ठेके के बिना सरकार में बड़ी दिलचस्पी जाग नहीं पाती है। 
हमने पिछले दिनों इसी जगह दिल्ली में देश की सबसे बड़ी पर्यावरण-संस्था सेंटर फॉर साईंस एंड एनवायरनमेंट के एक आयोजन का जिक्र किया था जिसमें देश के ऐसे कामयाब म्युनिसिपलों का सम्मान किया गया था जिन्होंने घरों से ही कचरे को अलग-अलग किस्म के आधार पर अलग-अलग इक_ा करने का काम किया, और उसके निपटारे की ठोस योजना बनाकर उस पर अमल भी किया। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में म्युनिसिपल कचरे को किसी भी तरह उठाने में अपने आपको झोंक दे रही है, लेकिन इसके बाद उस कचरे के किसी निपटारे के बजाय उसे कहीं खदानों में, तो कहीं मैदानों पर पाटा जा रहा है, और उसका कोई निपटारा नहीं हो रहा। जिस कचरे के बहुत बड़े हिस्से को दुबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है, उस कचरे को धरती पर एक स्थायी बोझ की तरह डाल दिया जा रहा है। अगर बदशक्ल घूरों को ध्यान से देखें तो यह समझ आता है कि उसका कुछ हिस्सा जानवर निपटाते हैं, और कुछ हिस्सा कचरा बीनने वाले लोग उठाते हैं, और उसे दुबारा कारखानों तक भेजने का काम करते हैं। अगर यह न हो तो म्युनिसिपल का काम दुगुना तो हो ही जाएगा। ऐसे में कचरे को उठाकर बाहर पहाड़ बनाना एक खतरनाक नासमझी है। इससे उबरकर यह देखना होगा कि कचरे को कैसे इक_ा करते समय ही अलग-अलग किया जाए, और फिर उसके सबसे अच्छे इस्तेमाल के तरीके काम में लाए जाएं। इसी देश में ऐसे म्युनिसिपल हैं जो कि कचरे से कमाई कर रहे हैं, बहुत से म्युनिसिपल ऐसे हैं जिन्होंने कचरे की कमाई से अपने करोड़ों के खर्च को घटाकर लाखों पर लाने में कामयाबी पाई है। जब देश में, और प्रदेश में भी ऐसे मॉडल हैं, तो फिर उनको अनदेखा करके दसियों करोड़ के कचरा-ठेका देना, कचरे का निपटारा न करना, जनता और धरती दोनों के खिलाफ एक जुर्म है। 
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को चाहिए कि देश में जगह-जगह कामयाब हो चुके मॉडल देखने के लिए अपने प्रदेश के म्युनिसिपलों के लोगों को भेजे, अपने ही प्रदेश के अंबिकापुर जैसे मॉडल को बाकी शहरों में लागू करे, और कचरा उठाने के काम में परंपरागत रूप से लगे हुए लाखों लोगों से रोजगार भी न छीने। कचरे से बड़े पैमाने पर खाद बनाई जा रही है, प्लास्टिक के कचरे को सड़क बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है, कचरे से धातु अलग करके कारखानों में भेजी जा रही है, कागज, कांच, इन सबको वापिस कारखानों में भेजा जा रहा है, लेकिन इसके लिए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और अफसरों के बीच ठेका-प्रेम से परे कल्पनाशीलता की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट को और अधिक सख्ती बरतनी चाहिए क्योंकि किसी पीढ़ी को यह हक नहीं है कि वह आने वाली तमाम पीढिय़ों के लिए कचरे के खतरनाक पहाड़ छोड़कर जाए। (Daily Chhattisgarh)

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