डिजाइनर बेबी का सपना तो अच्छा है लेकिन हकीकत भयानक है...

23 जुलाई  2018

ब्रिटेन में बायोटेक्नालॉजी से जुड़े हुए नीति-सिद्धांत तय करने वाली एक कमेटी ने अभी यह निष्कर्ष निकाला है कि पैदा होने के पहले ही बच्चों के जींस मेें एम्ब्रियो के स्तर पर ऐसी एडिटिंग की जा सकती है जिससे होने वाले बच्चे के गुण-दोष को बदला जा सके, उसके रूप-रंग को पसंद से तय किया जा सके। हालांकि इस कमेटी ने अभी इस बारे में खुलासे से कुछ तय नहीं किया है, लेकिन उसने सैद्धांतिक रूप से यह माना है कि ऐसी इजाजत देने में उसे कोई आपत्ति नहीं दिखती है। इसे इस देश की इस बारे में तय होने वाली नीति के लिए एक बड़ा बयान माना जा रहा है, और इससे चिकित्सा विज्ञान में जेनेटिक संपादन से बच्चों में एम्ब्रियो के स्तर पर ही मनचाहा फेरबदल करने का रास्ता खुल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी जेनेटिक तकनीक से बच्चों की कद-काठी, उनका रूप-रंग, उनके बालों का रंग तय किया जा सकता है, और उनका इंटेलिजेंस भी बढ़ाया जा सकता है। आम बोलचाल की जुबान में कहें तो यह डिजाइनर बेबी पाने का एक रास्ता हो सकता है जिससे भविष्य के इंसानों में से चुनिंदा लोगों को कुछ खास खूबियां हासिल हो सकें।
दरअसल विज्ञान कथाओं में आधी सदी से भी अधिक वक्त से इस किस्म की कल्पनाएं लिखी जाती रही हैं, और ऐसी तकनीक से इंसान के दानव बन जाने की भी बहुत सी फिल्में आ चुकी हैं। अभी भी लोगों का यह मानना है कि ऐसी जेनेटिक एडिटिंग से जब इंसानी जींस से कुछ हिस्सों को निकालकर अलग किया जाएगा, और कुछ दूसरे हिस्सों को डाला जाएगा तो उनमें बहुत विनाशकारी हादसे भी हो सकते हैं। कहने का मतलब यह कि किसी एक बात को बदलने के लिए ऐसी एडिटिंग की जाए, और कोई दूसरी अनचाही बात अपने आप हो जाए। लेकिन इंसान की कुदरत पर फतह पाने की चाह कहीं कम होती नहीं है, और जो विज्ञान के हथियार-औजार लिए बैठे हैं, उन्हें यह लगता है कि देशों के कानून या समाज की नैतिकता से परे उन्हें अपने अविष्कार और अपने खोज पर काम करने का मौका मिलना चाहिए। कहने के लिए तो ऐसी तकनीक की शुरुआत बच्चों में जन्म से आने वाली कई तरह की खामियों को रोकने के लिए की गई थी, और आज भी वैज्ञानिकों का मोटे तौर पर तर्क यही है, लेकिन जब कोई तकनीक बाजार के हाथ लगती है, तो औजार रातों-रात हथियार में तब्दील कर दिया जाता है। जिस परमाणु तकनीक का इस्तेमाल ऊर्जा पैदा करने में किया जाना था, वह आज बम बनाने के काम आ रही है।
ब्रिटेन के जिस कमेटी ने यह रास्ता खोलने जैसा संकेत दिया है, उसने कहने के लिए तो कहा है कि यह भविष्य के इंसानों के कल्याण के लिए संभावनाएं बनाने के लिए तय किया जा रहा है, और यह भी कहा है कि इससे समाज में भेदभाव को बढ़ाने का काम नहीं होगा, लेकिन यह तो जुबानी जमाखर्च की बातें हैं। चिकित्सा बाजार की हकीकत यह है कि जब अस्पतालों को बीमा कंपनियों से भुगतान मिलने की उम्मीद होती है, तो हमने हिन्दुस्तान में जगह-जगह जवान और कमउम्र महिलाओं के गर्भाशय निकलते देखे हैं ताकि अस्पताल का बिल बन जाए और बीमा कंपनी से मिल जाए। बाजार की बुनियाद ही बेरहमी पर टिकी होती है, और यह बात अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि दुनिया के तमाम नीति-सिद्धांत पेशों पर लागू होते हैं, जैसे डॉक्टरी या वकालत, लेकिन अस्पताल या किसी कंपनी पर ऐसे कोई नीति-सिद्धांत लागू नहीं होते।
इस सिलसिले में इस बात को थोड़े से दूर तक समझ लेना ठीक है। हिन्दुस्तान में पेशे की शपथ से डॉक्टर बंधे होते हैं, लेकिन अस्पताल नहीं। पेशे की शपथ से वकील बंधे होते हैं, लेकिन लॉ-फर्म नहीं। पत्रकारिता के सिद्धांत पत्रकारों पर लागू होते हैं, मीडिया-मालिकों पर नहीं। इसलिए जब हाथ गंदे करने की बारी आती है तो डॉक्टर अपने हाथ साफ रखते हैं, और अपने अस्पतालों के गैर-डॉक्टर हिस्से से कागजों पर गंदगी करवाते हैं। इसलिए जिस किस्म की भी जेनेटिक एडिटिंग की बात की जा रही है, या ब्रिटेन में जो इजाजत पाने जा रही है, वह डॉक्टरों के हाथ से निकलकर मशीनों और तकनीशियनों के हाथों में पहुंच जाएगी, और वह कारोबार का हिस्सा हो जाएगी।
यह याद रखने की जरूरत है कि जब लोगों के हाथ सोनोग्राफी की मशीनें लग जाती हैं, तो हिन्दुस्तान में यह देखने में आया है कि किस तरह पेशेवर डॉक्टर भी एक चलती हुई वैन में मरीज की सोनोग्राफी करते हुए यह बता देते हैं कि उसकी कोख में बेटा है, या बेटी, ताकि गर्भपात का फैसला आसान हो जाए। देश के बड़े-बड़े अस्पतालों के बड़े-बड़े डॉक्टर किडनी की खरीदी-बिक्री के कारोबार में तो पकड़ाए ही हैं, अनगिनत ऐसे मरीज हैं जिनको धोखा देकर किडनी निकाल ली गई, और किसी दूसरे मरीज को बेच दिए। इसलिए अस्पताल या डॉक्टर इन दोनों के कारोबार में हर किस्म के जुर्म मुमकिन है, किसी भी दूसरे कारोबार या पेशे की तरह। इसलिए एक बार जेनेटिक एडिटिंग को कुछ किस्म के कामों के लिए इजाजत मिली, तो फिर वह कहां जाकर रूकेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है।
हिन्दुस्तान जैसे समाज में जहां आज भी बच्चों का रंग बहुत बड़ा मुद्दा है, और जहां पर चेहरे को गोरा करने के लिए तरह-तरह की क्रीम अरबों-खरबों का कारोबार है, वहां पर पैसे वाले लोग केवल गोरे बच्चे पैदा करने में जुट जाएंगे, केवल ऊंचे कद के बच्चे पैदा करने लगेंगे, केवल घने या घुंघराले बालों वाले बच्चे पैदा करने में लग जाएंगे और इससे समाज में अपने आपमें एक रूपभेद पैदा हो जाएगा, रंगभेद बढ़ जाएगा। इसी तरह एक दूसरी स्थिति की कल्पना करें कि अगर कुछ लोग अपनी संपन्नता से होने वाले बच्चों की जेनेटिक एडिटिंग करवाकर उनका कद बढ़ा सकेंगे, तो कई किस्म के खेलों में उनकी संभावना कई गुना बढ़ जाएगी। ऐसे में आने वाले दिनों के खेल उन्हीं संपन्न बच्चों के हवाले हो जाएंगे। आज भी दुनिया में अधिक कद के लोगों को अधिक कारोबारी कामयाबी हासिल होती है, उन्हें अधिक तनख्वाह मिलती है, कई किस्म के कामों में उन्हें प्राथमिकता मिलती है। ऐसे में समाज में भेदभाव तो कद के साथ बढ़ेगा ही।
इससे एक दूसरी चीज यह भी होगी कि होने वाले बच्चे की कई बातों को लेकर उसके मां-बाप के फैसले उन बच्चों को उनकी पूरी जिंदगी ढोने पड़ेंगे, और आगे-पीछे एक ऐसी नौबत आ सकती है जब अजन्मे बच्चों के हक को लेकर कोई कानूनी मुद्दा उठे कि मां-बाप को उस बच्चे का रूप-रंग, उसकी कद-काठी, उसके बाल बदलवाने का क्या हक है? किसी बीमारी से बचाने की बात अलग है, लेकिन व्यक्ति पसंद और नापसंद से जुड़े ऐसे पहलुओं को छांट-छांटकर डिजाइनर बेबी बनवाने का हक मां-बाप का हो सकता है? या कि यह पैदा होने वाली बेबी के हक को छीनने के बराबर होगा?
विज्ञान की क्षमता और नैतिकता या बुनियादी हक की सीमा के बीच ऐसा टकराव न सिर्फ इसी मामले में है, और न सिर्फ पहली बार हो रहा है। ऐसा चलते रहता है, लेकिन लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या ऐसी तकनीक को बढ़ावा दिया जाए जिससे लोग अपने कपड़े-जूतों की तरह अपने होने वाले बच्चों की बातों को तय कर सकें! (Daily Chhattisgarh)

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