गरीब, बेघर, परेशानहाल बच्चों से संगठित रेप पर फांसी जायज

संपादकीय
28 जुलाई 2018


बिहार के एक बालिकागृह से छोटी-छोटी बच्चियों के साथ ताकतवर लोगों के जिस तरह के संगठित और लंबे समय से चले आ रहे बलात्कार की कहानियां आ रही हैं, वे दिल दहलाने वाली हैं। वहां के बड़े नेताओं के नाम बलात्कारियों में आ रहे हैं, और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसकी जांच सीबीआई को देने की घोषणा की है। पहली जांच में दर्जनों बच्चियों से बलात्कार की मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद अब कुछ लोगों का यह भी मानना है कि देश के अधिकतर बालक-बालिकागृहों में हाल ऐसा हो सकता है। इस बात पर आज लिखने की जरूरत इसलिए भी है कि पुणे से एक दूसरी खबर आई है कि वहां एक मदरसे में एक मौलवी बच्चों के साथ बलात्कार करता था, और उसकी गिरफ्तारी के बाद 36 बच्चों को उस मदरसे से हटा दिया गया है। बलात्कार से डरे-सहमे बच्चे मदरसा छोड़कर भाग निकले थे, और वे बिहार से आए हुए गरीब मुस्लिम बच्चे थे, जो स्टेशन पर अपने घर लौटने की कोशिश करते मिले। 
बच्चों का यौन शोषण पूरी दुनिया में आम बात है, और उसे छुपाकर रखना अधिकतर समाजों का आम मिजाज है। जहां कहीं गरीब या बेबस बच्चे रहते हैं, उन जगहों को बाल यौन शोषण के आदी लोग अपने शिकार की जगह बना लेते हैं। दुनिया में ऐसे बहुत से मामले दर्ज हैं जिसमें परेशान बच्चों की मदद करने वाली संस्थाओं में ऐसे बाल यौन शोषक काम करने लगते हैं क्योंकि वहां पर परेशानहाल बच्चे पहुंचते हैं जिन्हें बरगलाना आसान होता है। एक तरफ तो समाज सेवा के नाम पर बहुत से लोग या संगठन बच्चों के लिए ऐसे अनाथाश्रम या बालिकागृह खोल लेते हैं जो कि गरीब, बेबस, बेघर बच्चों से जल्द ही भर जाते हैं। अभी बिहार का जो मामला सामने आया है वह भी बाहर से वहां पहुंची एक अध्ययन-टीम की पूछताछ में पकड़ में आया और आगे की जांच और मेडिकल रिपोर्ट से स्थापित हुआ कि दर्जनों बच्चियों से लंबे समय से बलात्कार चल रहा था। 
जब कमउम्र बच्चों को ऐसी यातना से गुजरना होता है, तो उसके बाद उनकी जिंदगी का रूख बदल जाता है। समाज से लेकर लोकतंत्र तक, सरकार से लेकर अदालतों तक उनके मन में हिकारत ही हिकारत रह जाती है। इसलिए ऐसे बच्चे आगे चलकर कई किस्म के जुर्म में भी फंस जाते हैं। इस देश को बच्चों की हिफाजत के लिए ऐसे सारे आश्रमों या हॉस्टलों, सुधारगृहों या मदरसों पर लगातार निगरानी रखनी चाहिए। और यह काम सरकार में बैठे हुए लोग बिल्कुल नहीं कर सकते। इसके लिए समाजसेवी समर्पित लोगों को लगाना होगा और यह सावधानी भी बरतनी होगी कि इस निगरानी में लगे हुए लोग ही बच्चों से सेक्स के आदी न हों। अगर बाड़ ही खेत खाने लगेगी, चौकीदार ही चोरी करने लगेंगे, तो फिर बचेगा क्या? अखबारों में भी खबरें तब आती हैं जब ऐसे यौन शोषण के मामले बहुत बड़े-बड़े होते हैं, वरना छोटे-मोटे मामले आए-गए हो जाते हैं। 
इस मुद्दे पर हम बहुत बार लिखते हैं और यह जरूरत भी बताते हैं कि छोटे बच्चों को यह सिखाने और समझाने की जरूरत है कि बड़े लोगों का कौन सा बर्ताव यौन शोषण का खतरा होता है। खासकर ऐसी नाजुक जगहों पर रहने वाले, रखे गए, परेशानहाल बच्चों को तो ऐसी सावधानी की नसीहत बारीकी से देेने की जरूरत है ताकि वे सावधान रहें, और ऐसे तमाम केन्द्रों को लगातार निगरानी में रखना चाहिए। अगर देश में मौत की सजा को जारी रखना ही है, और उसे खत्म नहीं किया जाना है, तो छोटे बच्चों से ऐसे संगठित बलात्कार करने वाले लोगों को फांसी देनी चाहिए। हालांकि हम फांसी की सजा के भी खिलाफ हैं, और हमारा यह भी मानना है कि बलात्कार पर फांसी की सजा से बलात्कार के शिकार बच्चों की हत्या की गारंटी भी हो जाएगी क्योंकि जब ऐसे बलात्कार पर फांसी मिलनी है, तो फिर साथ-साथ उनका कत्ल कर देने पर भी दो बार तो फांसी लग नहीं सकती। फिर भी अगर संसद देश में ऐसी फांसी का कानून बनाने जा रही है, तो उसका इस्तेमाल बच्चों के साथ इस तरह के संगठित बलात्कार करने वालों पर होना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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