साथ रहते गैरशादीशुदा जोड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पहल एक अच्छा कदम ...

संपादकीय
3 जुलाई 2018


सुप्रीम कोर्ट अभी एक दिलचस्प मामले की सुनवाई कर रहा है कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के बीच अधिकारों को कोई कानूनी दर्जा दिया जा सकता है? अभी मामले की सुनवाई चल रही है, और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस पर उसकी राय भी मांगी है। इसके साथ-साथ एक प्रमुख वकील अभिषेक मनुसिंघवी को अदालत ने इस मामले में अपनी मदद करने के लिए न्याय-मित्र नियुक्त किया है। यह मामला एक ऐसी महिला की याचिका से शुरू हुआ है, जिसमें उसका आरोप है कि एक व्यक्ति ने उसकी बेटी के साथ 6 साल के लिव-इन रिश्ते के बाद शादी के बाद शादी से इंकार कर दिया। इस मामले में इस आदमी पर बलात्कार का आरोप भी लगाया गया है। अदालत अब इस मामले को लेकर यह समझना चाहती है कि क्या ऐसे रिश्तों में शामिल महिला या लड़की के अधिकार उसी तरह स्पष्ट किए जा सकते हैं जिस तरह किसी शादी के बाद पत्नी के अधिकारों को लेकर कानून बने हुए हैं। 
यह बड़ी दिलचस्प नौबत है कि समाज की एक ऐसी हकीकत को लेकर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है, और कानूनी स्थिति स्पष्ट करना चाह रहा है, जिसे सरकार और संसद अनदेखा करते हैं। समाज में ऐसे रिश्ते वाले दसियों लाख लोग हैं, लेकिन न कोई इन्हें औपचारिक रूप से मानना चाहते और न ही इन्हें लेकर कोई कानून बनाना चाहते। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल इस मायने में भी अच्छी है कि समाज की हकीकत को अनदेखा करना ठीक नहीं है, और सरकार या संसद, समाज या अदालत, इन सबको सच्चाई का सामना करना आना चाहिए। आज साथ रहने वाले जोड़ों को लेकर किसी तरह का कानून न होने से उसमें शामिल महिला, या कि  हम तो यह भी कहना चाहेंगे कि दोनों में से कमजोर भागीदार, को किसी तरह की सुरक्षा नहीं मिल पाती है। ऐसे में एक स्पष्ट कानून लोगों की मदद करेगा और विवाद को टालेगा। ऐसे मामले में सहायता की हकदार हमेशा ही महिला को मानना ठीक नहीं होगा, और अगर ऐसे जोड़ों में महिला आर्थिक रूप से अधिक सक्षम और सम्पन्न हो, तो वैसे में पुरूष-जोड़ीदार के भी हित सुरक्षित होने चाहिए। 
आज हालत यह है कि बिना शादी साथ रहने वाले जोड़ों के बीच विवाद होने पर बलात्कार की शिकायत सामने आती है, जो कि हर बार बलात्कार नहीं रहती। ऐसे में यह कानून बनना चाहिए कि बरसों तक साथ रहने के बाद अगर कोई भागीदार शादी के लिए राजी न हो, तो उसे बलात्कार की तोहमत न झेलनी पड़े। हम इंसानी मिजाज के बारे में सोचे तो यह बात साफ है कि बहुत बरस साथ में रहने के बाद भी लोगों का एक-दूसरे के बारे में इरादा और फैसला बदल सकता है, और उन्हें यह भी लग सकता है कि उनकी शादी ठीक नहीं होगी, कामयाब नहीं होगा। ऐसे में एक अनचाहे रिश्ते में जिंदगीभर के लिए उलझने से बेहतर यही होगा कि बिना किसी कानूनी तोहमत के लोगों को एक-दूसरे से अलग होने का कानूनी हक मिले। ऐसे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट जब इस मामले को सुन रहा है, और सरकार से भी उसका रूख पूछा गया है तो यह बात किसी किनारे पहुंचेगी। 
आज देश के महिला संगठनों को, और अलग-अलग सामाजिक संगठनों को भी चाहिए कि वे केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना नजरिया रखें। यह मामला केवल अदालती आदेश पर खत्म नहीं होगा, इसके लिए एक कानून भी बनाना पड़ेगा और जैसा कि केंद्र सरकार किसी भी नए कानून को बनाने से पहले सार्वजनिक रूप से लोगों से राय मांगती है, जनता को आज भी सार्वजनिक रूप से इस मामले में अपनी राय रखनी चाहिए, ताकि सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी समाज का रूख पता चल सके। (Daily Chhattisgarh)

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