तंत्र विद्या से विधानसभा को बांधने की हरकत अवमानना

संपादकीय
6 जुलाई 2018


छत्तीसगढ़ विधानसभा के इस आखिरी सत्र के आखिरी दिन खबरों में बाकी बातें तो कम छाई हुई हैं, एक ऐसे तांत्रिक की खबरें भरी पड़ी हैं जो कि एक भयानक और विचित्र हुलिए में, मालाओं का जखीरा गले में टांगे हुए, पूरे सिर पर लहू सा लाल रंग पोते हुए विधानसभा में घूम रहा है, इंटरव्यू दे रहा है। उसका खुद का दावा है कि वह विधानसभा को तंत्र-मंत्र से बांध रहा है, ताकि चौथी बार भी इसमें भाजपा ही जीतकर घुस सके। इस पर सदन के भीतर भी चर्चा हुई, और बाहर भी। विधानसभाध्यक्ष के सामने भी यह बात उठी तो उन्होंने कहा कि उन्हें भी इस तांत्रिक की जानकारी है और उन्होंने उसके साथ फोटो भी खिंचवाई है। कुछ लोगों ने इस बात को हंसी-मजाक में उड़ाने की कोशिश की, कुछ ने गंभीरता से लिया, कुछ ने याद दिलाया कि यह बाबा भाजपा का एक मंडल अध्यक्ष भी है। लेकिन इन सबसे परे एक बात अपनी जगह कायम है कि विधानसभा को तंत्र विद्या से बांधने का एक दावा इस आदमी ने किया, और वहां की मिट्टी भी लेकर गया। 
अब जिस छत्तीसगढ़ में हर बरस अनगिनत महिलाओं को टोनही साबित करने के लिए समाज के अंधविश्वासी या बदनीयत मर्द एकजुट हो जाते हैं, जहां पर लोग तंत्र-साधना के नाम पर सैकड़ों-हजारों लोगों को हर बरस बेवकूफ भी बनाते हैं, वहां की विधानसभा यह कैसा नजारा बर्दाश्त कर रही है? आज जब देश का कानून जादू-टोने को सजा के लायक मानता है, उस वक्त इस तरह के पाखंड को अगर ऐसी सरकारी, राजनीतिक, या संसदीय मंजूरी मिलती है, तो फिर आम जनता अगर अंधविश्वासी है तो फिर उसमें हैरानी की क्या बात है? विधानसभा का यह बहुत छोटा सा सत्र था, और इसमें अगर विधायकों से लेकर मीडिया का ध्यान ऐसी बेहूदी हरकत पर भटका है, तो यह प्रदेश की जनता के हितों का नुकसान है। इसके साथ-साथ यह भाजपा के लिए नुकसानदेह बात भी है क्योंकि जिस पार्टी की सरकार तीन बार सत्ता में रही, और लगातार विकास और जनकल्याण के नारे के साथ जीतती रही, आज अगर उस पार्टी के लोग ऐसे पाखंड को बढ़ावा देते मिलते हैं, तो उससे पार्टी के अगला चुनाव भी जीतने के आत्मविश्वास पर सवाल उठता है। 
यह बात मजाक में उड़ाने लायक बिल्कुल ही नहीं है। हमारा ख्याल है कि छत्तीसगढ़ और झारखंड में कहीं डायन और कहीं टोनही बताकर बेकसूर महिलाओं को प्रताडि़त करने का एक पुराना सिलसिला चले आ रहा है, और ऐसे राज्यों को अंधविश्वास खत्म करने के लिए खास कोशिशें करने की जरूरत है। अभी अधिक वक्त नहीं हुआ है जब छत्तीसगढ़ के एक लगभग पूरी तरह आदिवासी इलाके सरगुजा में राज्य के गृहमंत्री एक कम्बल वाले बाबा से इलाज करवाते देखे गए हैं, और जो इस बाबा के इलाज को सर्टिफिकेट भी देते हुए मीडिया में आए हैं। ऐसा बाबा जो महज कम्बल ओढ़ाकर उसके भीतर मरीज और खुद को ढांककर इलाज करता है, उसे राज्य का स्वास्थ्य मंत्री क्यों नहीं बना दिया जाता, अगर राज्य सरकार के मंत्रियों को भी उस पर भरोसा है। ऐसा करने पर राज्य का सारा सरकारी इलाज का ढांचा हटाया भी जा सकता है, और हर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में महज एक-एक कम्बल के साथ इलाज हो सकता है, बाकी मशीनों और दवाईयों की जरूरत क्या है? दूसरी बात यह कि अगर एक तांत्रिक विधानसभा को घेरकर कांग्रेस को उसके भीतर बहुमत के साथ घुसने से रोक सकता है, तो फिर ऐसे तांत्रिक की सेवा राज्य के गृहमंत्री बस्तर में भी ले सकते हैं जहां वह तांत्रिक नक्सलियों से छत्तीसगढ़ को बचा सके। उससे पूरे बस्तर की सरहद को बंधवा देना चाहिए कि वहां पर कोई नक्सली न आ सकें। 
विधानसभा में विधायकों ने चाहे इसे हंसी-मजाक में उड़ा दिया हो, लेकिन ऐसे अंधविश्वास को अगर विधानसभा बर्दाश्त भी करती है, तो उसे भी राज्य की कमसमझ जनता के बीच तंत्र और जादू-टोने पर अंधविश्वास बढ़ता है। एक तरफ तो राज्य में डॉ. दिनेश मिश्रा जैसे लोग रात-दिन कोशिश करके अंधविश्वास के खिलाफ खतरा उठाकर भी लड़ाई लड़ रहे हैं, और दूसरी ओर प्रदेश के विधायक अगर ऐसे अंधविश्वास को अपनी विधानसभा और अपने बीच अनदेखा भी करते हैं, तो भी वह ऐसे पाखंड को बढ़ावा देने के अलावा और कुछ नहीं है। विधानसभा में कम से कम कोई तो ऐसा विधायक होता जो कि इस तांत्रिक की इस हरकत को विधानसभा की अवमानना का मामला बनाता। (Daily Chhattisgarh)

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