औरत की पोशाक पर आदमी की मनमर्जी..

संपादकीय
31 अगस्त 2018


दुनिया की एक सबसे महान टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स ने एक बच्ची को जन्म देने के बाद अपनी मेडिकल जरूरतों के मुताबिक पूरे बदन को ढांकने वाली एक ऐसी पोशाक पहनना शुरू किया जिससे उनके बदन में रक्त संचार ठीक से हो सकता था, और खून में थक्के जमने का खतरा घटता था। काले रंग की पूरे बदन की इस पोशाक को फ्रांस में दुनिया के एक सबसे बड़े टूर्नामेंट, फ्रेंच ओपन, करवाने वाले अधिकारियों ने खेल के खिलाफ माना, और सेरेना पर यह बंदिश लगा दी कि वह ऐसी पोशाक पहनकर मैच नहीं खेल सकती। नतीजा यह हुआ कि उसे आखिरी वक्त में दूसरे किस्म की पोशाक पहननी पड़ी। और टेनिस के नियमों में मर्दानगी के राज के आलोचक इसे एक बुरा फैसला मान रहे हैं, और उनका कहना है कि पोशाक की ऐसी रोक-टोक महिलाओं पर ही लादी जाती है। दूसरी तरफ पूरी दुनिया के टेनिस में महिलाओं के ऐसे छोटे कपड़े पहनने पर कोई रोक नहीं है जिससे उनका बदन उघड़ा रहता है, और उनकी तस्वीरें आमतौर पर वैसे ही पल की छपती हैं जब उनके कपड़े उठे रहते हैं, या उड़ते रहते हैं। 
सेरेना विलियम्स एक अश्वेत खिलाड़ी हैं, और उन्हें अपने से हारने वाली बहुत सी गोरी खिलाडिय़ों से तरह-तरह की बुरी बातें सुनने की आदत भी पड़ी हुई है। इनमें से कुछ ने उन्हें जानवरों की तरह भी कहा है, क्योंकि वे सेरेना की ताकत का मुकाबला नहीं कर पातीं। किसी खेल में दुनिया की सबसे महान खिलाड़ी बन जाने के बाद भी, मां बनने के बाद की मेडिकल-मजबूरी को अनदेखा करके जब टेनिस के ठेकेदार इस तरह का हुक्म लादते हैं, तो उससे औरत की मर्जी के खिलाफ कुछ करने की मर्द की हसरत भी दिखती है, और एक अश्वेत के लिए हिकारत भी दिखती है। यह अलग बात है कि सेरेना ने इसके खिलाफ कोई मुद्दा बनाने से मना कर दिया है, और उनके समर्थन में ट्विटर पर किसी ने फ्रेंच ओपन के आयोजकों के लिए बड़ी खूब बात लिखी है, और कहा है कि सेरेना टेनिस खिलाड़ी नहीं हैं, वे खुद टेनिस हैं। फ्रांस की एक दूसरी टेनिस खिलाड़ी को अभी अमरीका में यूएस ओपन टूर्नामेंट के दौरान आयोजकों की ओर से एक नोटिस दिया गया क्योंकि उन्होंने गर्मी और पसीने से परेशान होकर एक ब्रेक में खुले में ही अपना टी-शर्ट ठीक करने की कोशिश की थी। लेकिन इस खिलाड़ी ने भी इस नोटिस का बुरा नहीं माना, और कहा कि फ्रांसीसी अधिकारियों ने सेरेना से जो किया है, वह इससे दस हजार गुना अधिक बुरा बर्ताव है। इस फ्रेंच खिलाड़ी ने कहा कि फ्रांसीसी टेनिस अधिकारी किसी और युग में जी रहे हैं, और वे सेरेना के कपड़ों के बारे में ऐसी बेहूदी बातें कर सकते हैं। 
आज खेलों से लेकर हॉस्टलों तक लड़के और लड़कियों के अधिकार बराबर करने को लेकर पूरी दुनिया में संघर्ष चल रहा है। फ्रांस और अमरीका से दूर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में छात्राएं हड़ताल पर हैं क्योंकि वहां हॉस्टल में छात्रों को देर रात तक बाहर रहने की छूट है, और छात्राओं को उनसे घंटों पहले पहुंचने की बंदिश है। औरत और मर्द की गैरबराबरी का यह सिलसिला सदियों पुराना है, और वह आसानी से खत्म नहीं होने वाला है। अभी दो दिन पहले ही एक जैन संत ने लड़कियों को सामान बताते हुए उन्हें ही तमाम सेक्स-हमलों के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया था। दुनिया में बराबर के हक की लड़ाई जल्द खत्म होने वाली नहीं है। खेलों में भी लड़कियों की पोशाक पर जिस तरह की पुरूषवादी सोच हावी है उसके खिलाफ जगह-जगह आवाज उठनी चाहिए। सेरेना विलियम्स ने अपने लगातार चल रहे मैचों के बीच, एक देश से दूसरे देश भागते हुए, फ्रेंच टेनिस अधिकारियों के खिलाफ कुछ कहा नहीं है, लेकिन इस फैसले ने दुनिया भर से उनके लिए हमदर्दी और समर्थन जुटा दिया है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अगस्त

सत्ता की चोटी पर किफायत बरतने का यह आखिरी मौका

संपादकीय
30 अगस्त 2018


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नए सरकारी हिस्से, नया रायपुर का नाम बदलकर अटल नगर कर दिया गया है, और सरकार उसे आबाद करने के लिए हर कोशिश कर रही है। कुछ सरकार के भीतर इस नई राजधानी में काम करने जाने, और वहां रहने दोनों को लेकर बड़ा प्रतिरोध चल रहा है, और न वहां मंत्री रहने जाना चाहते, और न ही बड़े अफसर। शहर से 25 किमी दूर मंत्रालय पहुंचते हुए 10-15 किमी का सुनसान रास्ता तय करना पड़ता है, और नया रायपुर में बनी हुई कॉलोनियों में पहुंचने के लिए शायद इससे भी कुछ अधिक। नतीजा यह है कि पुराने रायपुर और नए रायपुर के बीच का फासला इस डेढ़ दशक में भी पट नहीं पाया है, और पिछले पांच बरस से सरकार की तमाम कोशिशें भी सरकारी कर्मचारियों तक को इस नए शहर में नहीं भेज पाई हैं। गरीबी की रेखा के नीचे की आधी आबादी वाले इस राज्य में दसियों हजार करोड़ की इस नई राजधानी का रख-रखाव करना, और वहां पर लोगों को बसाने की कोशिश करना इस गरीब राज्य के साथ एक बड़ी बेइंसाफी की तरह जारी है। 
लेकिन विधानसभा को अटल नगर ले जाना, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, और मंत्री-अफसरों के बंगलों को नए रायपुर में बनाना अब और सैकड़ों करोड़ के खर्च का काम है, और सरकार इस पर आमादा है। अब सवाल यह है कि इतनी गरीबी वाले राज्य में  सरकार को अपने ऊपर कितना खर्च करना चाहिए? देश की विशालतम नई राजधानी बनाने की जिद ने जोगी सरकार से लेकर रमन सरकार तक के दसियों हजार करोड़ रूपए लगवा दिए। इस लागत और इसके आगे के खर्च को देखें तो यह देश की शायद सबसे महंगी राजधानी भी होगी। और ऐसे विकराल खर्च के बीच अब जब बड़े लोगों के बड़े बंगले बनाने का वक्त आया है तो राज्य सरकार को इस बारे में यह याद रखना चाहिए कि यह किफायत की जिंदगी जीने वाले गांधी का देश है, और उस नेहरू का देश भी है जिसने अपनी निजी जायदाद, तीन मूर्ति भवन सरीखी इमारत देश को दे दी थी, देश का खर्च अपने ऊपर नहीं करवाया था। यह तो बाद के बरसों में हुआ कि सत्ता पर आने वाले लोग जनता की जरूरत के सीमित पैसों पर अपनी असीमित सहूलियतें जुटाते चले गए। 
छत्तीसगढ़ की नई राजधानी में बड़े बंगलों पर निर्माण की लागत तय करते हुए राज्य सरकार को एक भारी किफायत का नजरिया इसलिए भी रखना चाहिए कि बड़े बंगलों का घोषित और अघोषित रख-रखाव जनता के मत्थे ही पड़ता है। आज भी पुरानी राजधानी में ऐसे सरकारी बंगले हैं जिनमें पौन-पौन सौ एयर कंडीशनर लगे हैं, और जिनको लगाने की लागत के बाद उससे भी भयानक लागत उनको चलाने की होती है। बड़े बंगलों के रख-रखाव के लिए सरकारी कर्मचारियों की फौज लगती है, और यह सब कुछ घोषित रूप से नहीं होता, इसका बहुत कुछ हिस्सा अघोषित रूप से भी खर्च होता है जो कि सरकार के अलग-अलग मद से चुपचाप जुटाया जाता है। इसलिए मंत्रियों और अफसरों के ऐसे बड़े बंगले बनाना एक गरीब राज्य में अलोकतांत्रिक है, फिर चाहे उस राज्य का एक हिस्सा संपन्न ही क्यों न हो। इस राज्य का एक बड़ा हिस्सा एक रूपए किलो चावल की वजह से भरे पेट सोता है, ऐसी आधी आबादी वाले राज्य में किसी को भी अपने पर अंधाधुंध खर्च नहीं करना चाहिए। 
फिर एक दूसरी बात यह भी है कि जब छत्तीसगढ़ राज्य में हाईकोर्ट की इमारत बनने की बात आई, तो मौजूदा जजों ने उसे अधिक से अधिक आलीशान बनाने के लिए राज्य सरकार से अधिक से अधिक खर्च करवाया। ऐसा ही कुछ नई विधानसभा के साथ हो सकता है, और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के साथ हो भी रहा है जिनमें से हरेक के लिए बड़ी-बड़ी इमारतें बन रही हैं, और जाहिर है कि इनका आगे का जिंदगी भर का खर्च भी सरकार के ही मत्थे पड़ेगा। लोकतंत्र के नाम पर बनी ऐसी संस्थाओं को भी किफायत छू नहीं जाती है, और नतीजा यह होता है कि सत्ता के तमाम सरकारी और संवैधानिक हाथ-पांव अपने-अपने लिए महंगे से महंगे ऐशोआराम जुटाते चल रहे हैं। इस राज्य में गरीबी की वजह से इलाज का इंतजाम नहीं है, पढ़ाई का इंतजाम नहीं है, पीने को साफ पानी नहीं है, और पुलिस जरूरत से कम है, अदालतों में देर जरूरत से अधिक है। ऐसे में आखिर किसको हक बनता है कि वे अपने ऊपर अंधाधुंध खर्च करें? राज्य सरकार के सामने यह आखिरी मौका है कि वह सत्ता के सबसे ऊपर के दायरे में किफायत बरतकर एक मिसाल पेश करे, एक बार इस विकराल राजधानी के अनुपात में विकराल आकार के बंगले बन गए, तो फिर वे जिंदगी भर इसी गरीब छत्तीसगढ़ी जनता की छाती पर मूंग दलकर चलेंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अगस्त

मेनस्ट्रीम मीडिया को बेबस करता हुआ सोशल मीडिया

संपादकीय
29 अगस्त 2018


सोशल मीडिया पिछले करीब एक दशक में हिन्दुस्तान में एक वैकल्पिक मीडिया के रूप में जिस तरह सामने आया है, वह एक बड़ा दिलचस्प मामला है जो कि मीडिया पर शोध करने वाले लोगों के काम का तो है ही, लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर शोध करने वाले लोगों के लिए शायद और अधिक काम का है। परंपरागत मीडिया एक मालिकाना ढांचे के तहत, बाजार और सरकार के इश्तहारों पर जिंदा रहने वाला एक ऐसा कारोबार हो चुका था, जिस पर चुनावों के वक्त आत्मा बेच देने की तोहमत साबित होते जा रही थी, और जिसने बड़े कारोबार के हिमायती बनकर बेजुबान लोगों के हितों के खिलाफ काम करने की मिसालें भी पेश की थीं। ऐसे में सोशल मीडिया अपने पूरे अराजक तेवरों के साथ आज जब लोगों की सोच के एक बड़े हिस्से पर काबिज है, उस पर असर डाल रहा है, तो लोगों को इसका यह बेकाबू और अराजक पहलू बड़ा परेशान कर रहा है। 
दरअसल इंटरनेट एक ऐसी तकनीक है जो कि बुनियादी तौर पर बेकाबू है, सस्ती है, और तकरीबन हर किसी की उस तक पहुंच है। इसलिए सदियों से चली आ रही सत्ता की बंदिशों से वह बाहर है, और जिस तरह परंपरागत, पेशेवर, और मूलधारा का कहा जाने वाला मेनस्ट्रीम मीडिया काबू में किया जा सकता है, वैसा सोशल मीडिया के साथ नहीं हो सकता। इसलिए जब किसी देश-प्रदेश या किसी इलाके का परंपरागत मीडिया किसी बात की तरफ से आंखें बंद भी कर लेना चाहता है, तब भी सोशल मीडिया उन बातों को जिंदा रखने, आगे बढ़ाने, और चर्चा में लाने की ताकत रखता है। नतीजा यह हो रहा है कि आज का मेनस्ट्रीम मीडिया सोशल मीडिया को अनदेखा करके एक पल भी नहीं चल पा रहा है। अब सवाल पूछने और चुप्पी रखने पर, देखने और अनदेखा करने पर उसका सदियों का परंपरागत एकाधिकार टूट चुका है, और उसकी परवाह किए बिना सोशल मीडिया बेबाक बोल पा रहा है, और लोगों तक उस हकीकत को पहुंचा पा रहा है जिसे कि कारोबार और सरकार का गठजोड़, या ये दोनों अलग-अलग भी, रोकना चाहते हैं। ऐसी हकीकत अब छपे हुए शब्दों, या कि टीवी तक किसी बात को पहुंचाने की ताकत रखने वाले महंगे चैनलों की मोहताज नहीं रह गई है, और आज इन दो किस्मों का मीडिया कुछ भी अनदेखा करने के पहले कनखियों से सोशल मीडिया में झांक लेता है कि क्या-क्या अनदेखा करना मुमकिन नहीं है। 
लोगों को याद होगा कि इस देश में पिछली मनमोहन सिंह सरकार के दो हिस्से थे। उसका पहला कार्यकाल वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन का मोहताज था, और वह सरकार वामपंथियों के प्रति अपनी बहुत सी बातों के लिए जवाबदेह थी। नतीजा यह हुआ था कि यूपीए सरकार के चेहरे पर जितने घोटालों की कालिख लगी, वह तकरीबन सारी की सारी दूसरे कार्यकाल में लगी, जब वह सरकार वामपंथियों के बाहरी समर्थन की मोहताज नहीं थी। आज अगर सोशल मीडिया न होता, तो हिन्दुस्तान का प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यूपीए-2 की तरह का हो जाता, जिसे कि किसी के प्रति जवाबदेह न रहना हो। लेकिन आज सोशल मीडिया पर बेबाक और बेकाबू लोग अपनी पूरी अराजक जम्हूरियत के साथ लगे रहते हैं, और उन्होंने ही बिना कहे हुए यह नौबत ला दी है कि मेनस्ट्रीम मीडिया को न सिर्फ उनका नोटिस लेना पड़ता है, बल्कि सोशल मीडिया पर तैरने वाली बातों को उठाकर खबर भी बनाना पड़ता है क्योंकि अखबार और टीवी चाहे कितने ही दबकर चलना चाहें, उन्हें पाठक और दर्शक की जरूरत तो रहती ही है, और अगर ये तबके सोशल मीडिया पर और अधिक आश्रित हो गए, तो विज्ञापनदाता भी उस तरफ और अधिक मुड़ जाएंगे। इसलिए अपनी खुद की हस्ती बचाए रखने के लिए मेनस्ट्रीम मीडिया सोशल मीडिया के असर को अनदेखा करके नहीं चल सकता, और आज कम से कम भारत के लोकतांत्रिक नजारे में यह साफ दिखता है कि कोई भी समझौता करने के पहले, किसी भी बात को अनदेखा करने के पहले, किसी भी झूठ को गढऩे और आगे बढ़ाने के पहले परंपरागत मीडिया को इस नए सोशल मीडिया को देखना पड़ता है, उसे तौलना पड़ता है, और फिर उसके मुताबिक अपने समझौतों को दुबारा से तय करना पड़ता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त

गबरू वोटर की असली पसंद!

संपादकीय
28 अगस्त 2018


देश के चार राज्यों में चुनाव के साथ-साथ अब संसद के चुनावों की भी या तो साथ-साथ होने की बात हो रही है, या फिर यह चर्चा चल रही है कि आने वाले वक्त में केन्द्र और राज्यों के चुनाव एक साथ हो जाने चाहिए ताकि पूरे पांच बरस सरकारें बिना चुनावी-राजनीतिक दबाव के, बिना लुभावने-लोकप्रिय फैसलों की कोशिश करने के, खुलकर सरकार चला सकें। ऐसा होना कुछ लोगों को जायज और मुमकिन लग रहा है, कुछ लोगों को यह नाजायज और नामुमकिन लग रहा है। जो भी हो, यह सोच, खासकर इस सोच का यह पहलू अच्छा है कि सरकारें पांच बरस बिना कहीं पर चुनाव की फिक्र किए हुए जरूरी कड़वे फैसले भी ले सकें। लेकिन यह तो एक पहलू हुआ। साथ-साथ होने वाले किसी भी संभावित चुनाव के वक्त जनता के पास भी यह दोहरा बोझ रहेगा कि वह किसे चुने? एक पार्टी जो राज्य में खराब है, लेकिन केन्द्र में अच्छी है उसे चुने? या फिर जो राज्य में तो अच्छी है, लेकिन केन्द्र में बोगस है उसे चुने? आज वैसे भी भारतीय राजनीति में लोगों के सामने दुविधा छोटी नहीं रहती है। आज भी लोगों को दो चीजों का एक जोड़ा ही चुनना होता है। पार्टी और प्रत्याशी, इनको साथ-साथ चुनना होता है, या साथ-साथ इनको छोड़ देना होता है। आज जिस तरह किसी भी प्रत्याशी को वोट न देने के लिए वोटरों के पास नोटा नाम का एक विकल्प आ गया है, क्या उसी तरह का कोई एक ऐसा विकल्प कभी आएगा कि लोग पार्टी को अलग वोट दें, और उम्मीदवार को अलग? ऐसा होने पर पार्टियों को अपने उम्मीदवारों के बारे में जनता की सोच का पता भी लगेगा। वैसे यह सोच बहुत असंभव नहीं है। ऐसा इंतजाम करके यह भी किया जा सकता है कि विधानसभा या संसद की कुछ सीटें पार्टियों को मिलने वाले वोटों के अनुपात में मनोनयन के लिए अलग से रखी जा सकें, और विधायक या सांसद सीधे निर्वाचित हो जाने के बाद पार्टियां अपने को मिले लोकप्रिय वोटों के अनुपात में कुछ गिने-चुने लोगों को और सदन में भेज सकें। 
लेकिन वोटर की जिस दोहरी जिम्मेदारी से यह बात शुरू की गई है, उसे देखें तो यह बात आसान नहीं रहती कि वह एक अच्छे प्रत्याशी को बुरी पार्टी के निशान पर वोट दे, या फिर बुरे प्रत्याशी को अच्छी पार्टी के निशान पर वोट दे। ऐसी एक काल्पनिक स्थिति अगर सच में ही सामने आ जाए कि हर वोटर दो वोट अलग-अलग डाले, एक वोट स्थानीय उम्मीदवार को, और दूसरा वोट पार्टी को, तो भी मतदाता की असली पसंद सामने आ पाएगी। हालांकि आज तक भारतीय चुनावों के संदर्भ में ऐसी कोई बात सोचने में भी नहीं आई है, लेकिन अगर हम मतदाताओं की असली और खरी पसंद की बात करें, तो यह एक बेहतर चुनाव का जरिया होगा। आज भी राजनीतिक दल अपने सांसदों और विधायकों की कुल गिनती के अनुपात में राज्यसभा में अपने कुछ उम्मीदवार भेजते हैं। यह तरीका सीधे जनता से चुनकर आए हुए मनोनीत सदस्यों का होगा, जिनकी गिनती तो जनता के वोटों से निकलेगी, लेकिन उन पर चेहरे तय करने का हक पार्टी का होगा। 
आज जब देश में एक साथ चुनाव पर चर्चा चल रही है, और लोग इस सोच के मुरीद भी हो रहे हैं, और इसे खारिज भी कर रहे हैं, तब ऐसी सैद्धांतिक चर्चा भी होनी चाहिए जो कि संसद और विधानसभाओं में जनता के वोट के अधिक से अधिक ईमानदार प्रतिनिधित्व का रास्ता निकाल सके। आज जिस तरह देश में होने वाले बहुत से चुनावी सर्वे नेता और पार्टी दोनों पर जनता की अलग-अलग सोच पूछते हैं, भारत का चुनाव ऐसा कुछ नहीं पूछता है। होना तो यही चाहिए कि वोटिंग मशीन पर हर चुनाव क्षेत्र में वोटर दो बटनों को दबाए, एक तो पसंद के उम्मीदवार के नाम वाली, और दूसरी पसंद की पार्टी वाली। ऐसा होने पर ही पार्टी को यह समझ आएगा कि कौन सा उम्मीदवार उससे कम या अधिक लोकप्रिय है। 
फिलहाल जब तक ऐसा कोई क्रांतिकारी फेरबदल भारत की चुनाव प्रणाली में नहीं होता, तब तक के लिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनके सामने आज जोड़े से जो विकल्प आते हैं, उनमें से वे किसको चुनें? अगर उम्मीदवार और पार्टी दोनों उनकी पसंद के हैं, तब तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अगर दोनों में से कोई एक गड़बड़ है, तो उन्हें बहुत ध्यान से वोट डालना चाहिए। हमारा यह कहना अधिक आसान है, लेकिन ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि जब लोग विधानसभा चुनाव में विधायक चुनने के लिए भी वोट डालते हैं, तो उस पल उनके ध्यान में संभावित मुख्यमंत्री का चेहरा भी रहता है कि उनका वोट आखिर किसे मुख्यमंत्री बनाएगा? तो क्या एक ऐसी चुनाव प्रणाली हो सकती है जो कि एक वोटिंग मशीन पर तीन बटनें रखे, जिससे लोग अपने स्थानीय विधायक या सांसद चुने, दूसरी बटन से पसंदीदा पार्टी को वोट दें, और तीसरी बटन से वे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुनें? एक चुनाव में ऐसी तीन बटनें क्या जनता की असली पसंद साबित करेंगी? 
-सुनील कुमार 

(Daily Chhattisgarh)

दानवी हंसी हरा सकती है

संपादकीय
27 अगस्त 2018


कुछ और राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ चुनाव में जा रहा है, और अब सत्तारूढ़ भाजपा का पार्टी संगठन, सरकार में बैठे नेता और कांग्रेस पार्टी के लोग सभी एक-एक मुद्दे के चुनावी इस्तेमाल में लगे हुए हैं। सरकार है कि लाखों मोबाइल बांट रही है, और कांग्रेस है कि उनमें से कुछ मोबाइल फटने और फूटने के मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रही है। दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं, और ऐसे चौकन्नेपन से जनता का कुछ भला हो भी सकता है। अभी चार दिन पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियां आईं, तो स्टेज पर प्रदेश के दो बड़े ताकतवर मंत्री, बृजमोहन अग्रवाल और अजय चंद्राकर जिस तरह से हंसी-ठिठोली करते हुए कैमरों पर कैद हुए, उससे भाजपा की पेट भरकर किरकिरी हुई। आज हालत यह है कि ये दो मंत्री चुनाव प्रचार करते हुए अटलजी का नाम लेने की हालत में नहीं हैं क्योंकि इनके विरोधी इनकी हंसी के वीडियो तब तक इतनी बार पेश कर चुके होंगे कि लोगों को यह विकराल और अमानवीय हंसी याद रहेगी, और इनकी कही अटल-स्तुति उनके कानों में नहीं जा पाएगी। 
लोकतंत्र में जनधारणा रातोंरात अच्छी तो नहीं हो सकती है, लेकिन बुरी जरूर हो सकती है। आज डेंगू से होने वाली मौतों को लेकर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर के जिस तरह के बयान टीवी पर देखने मिलते हैं, और अखबारों में पढऩे मिलते हैं वे हक्का-बक्का करते हैं कि क्या अपने विभाग की नाकामयाबी को कोई इस तरह छिटक सकते हैं, और उससे हाथ धो सकते हैं? छत्तीसगढ़ में यह सिलसिला अमर अग्रवाल के स्वास्थ्य मंत्री रहने के वक्त से चले आ रहा है जब वे अपने विधानसभा क्षेत्र बिलासपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में नसबंदी मौतों के बाद पहुंचे मुख्यमंत्री की मौजूदगी में जोर-जोर से हंसते हुए कैमरों में कैद हुए थे, और बाद में उस विकराल हंसी को लेकर उनके खिलाफ जनधारणा ऐसी हुई थी कि उन्हें वह विभाग छोडऩा ही बेहतर लगा। 
लोकतंत्र में वैसे तो चुनाव सामने न रहे तब भी लोगों को अपनी जुबान पर काबू रखना चाहिए, अपने हावभाव ठीक रखने चाहिए, और सार्वजनिक जीवन में जनभावनाओं का सम्मान करना चाहिए। कहीं लाशों पर हंसी, तो कहीं अस्थि कलश पर हंसी, इन सबमें भाजपा सरकार के लोगों के खिलाफ जनता के मन में नाराजगी और बढ़ा दी है। और ऐसा लगता है कि सत्ता के प्रतीक बन गए कम से कम कुछ लोगों को तो जनता इस चुनाव में निपटाएगी। यह बात बड़ी सुनाई पड़ती है कि भाजपा इस बार चेहरे बहुत बदलने वाली है, और चेहरों से जुड़ी नाराजगी भाजपा सरकार के खिलाफ नाराजगी में नहीं बदल पाएगी। लेकिन सच तो यह है कि सत्ता के जो चेहरे तुरंत ही बदल देने लायक हैं, वे चेहरे ऐसी अरबों की कमाई कर चुके हैं कि उनको हटाया गया तो वे अपनी कमाई का कुछ हिस्सा खर्च करके अपनी पार्टी के नए उम्मीदवार को हराने की ताकत रखते हैं। ऐसे में कई बार सत्तारूढ़ पार्टी एक समझौता करके चलती है, और कभी ऐसे बड़े भ्रष्ट लोगों से पार्टी फंड में मोटी रकम जमा करवाने के बाद उन्हें टिकट देती है, या फिर इस उम्मीद में देती है कि वे अपने अरबों का कुछ हिस्सा खर्च करके किसी तरह भी चुनाव जीत जाएंगे, और विधानसभा में विधायक दल की गिनती बढ़ाएंगे, ताकि सरकार चलाई जा सके। 
किसी भी पार्टी को यह चाहिए कि वह अपने मंत्रियों और नेताओं को इतना संपन्न न होने दे कि वे लोग बददिमागी को अपना बुनियादी हक मान लें, और आम जनता को लात खाने के लायक समझने लगें। कहने के लिए तो भाजपा का संगठन बड़ा ताकतवर और सक्रिय बताया जाता है, लेकिन जिस भ्रष्टाचार की जानकारी, जिस बददिमागी और बदमिजाजी की जानकारी पूरे प्रदेश को रहती है, क्या वह पार्टी को ही नहीं रहती? यह बात तो ठीक है कि चुनाव इतने खर्चीले हो गए हैं कि सत्तारूढ़ पार्टी की खर्च करने की अपार ताकत विपक्ष को रौंदकर रख सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा को यह भी याद रखना चाहिए कि उसकी दस बरस की सरकार के बाद के चुनाव में कांग्रेस उससे महज पौन फीसदी पीछे थी, एक फीसदी से भी कम! ऐसे में दानवी हंसी वाले एक वीडियो का असर भी इस पौन फीसदी को कुचल देने वाला हो सकता है। भाजपा को अपने नेताओं और अपने अफसरों के तौर-तरीकों, उनकी जुबान, इन सब पर काबू रखना चाहिए, वरना कांग्रेस के खिलाफ पिछले पन्द्रह बरस से किसी नाराजगी का तो कोई काम जनता को पड़ा नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

ऐतिहासिक रामलीला मैदान के इतिहास को तो बख्श देना चाहिए

संपादकीय
26 अगस्त 2018


कुछ समय पहले भारत में यह चर्चा शुरू हुई थी कि देश के अलग-अलग विमानतलों के नाम फिर से उनके शहरों के नाम पर रख दिए जाएं। ऐसा इसलिए सोचा गया कि देश-विदेश से आने वाले लोग महान लोगों के लंबे-लंबे नामों को याद नहीं रख पाते, ऐसे नामों की घोषणा में भी दिक्कत होती है, और इंटरनेट पर उन्हें ढूंढने के लिए हिज्जे भी आसानी से नहीं मिलते हैं। अब आज भारत के अलग-अलग समाजों और इलाकों में अपने महान लोगों के लिए जिस तरह का एक उन्माद छाया हुआ है, उसे देखते हुए यह समझना मुश्किल नहीं है कि फिर से शहरों का नाम रखना आसान नहीं होगा। लेकिन इससे परे नामों को लेकर एक दूसरा मुद्दा यह है कि एक सरकार के जाने और दूसरी के आने के साथ बहुत सी योजनाओं या जगहों का नाम जिस तरह बदला जाता है, वह एक बहुत ही तंगदिली की बात है। 
अब आज एक अलग मुद्दा सामने है कि दिल्ली में ऐतिहासिक रामलीला मैदान का नाम बदलकर अटल बिहारी वाजपेयी पर रखने की तैयारी चल रही है, और दो-चार दिनों में इस प्रस्ताव पर फैसला भी होना है। रामलीला मैदान एक ऐतिहासिक जगह रही है, जहां से देश की कुछ सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाएं शुरू हुई हैं, जहां पर देश के कुछ सबसे ऐतिहासिक भाषण दिए गए हैं, ऐतिहासिक धरना और आंदोलन हुए हैं। इसके साथ-साथ इस मैदान पर हर बरस दशहरे पर रावण के पुतले जलाने का काम होता है जिसमें परंपरागत रूप से प्रधानमंत्री पहुंचते हैं, और देश के कुछ दूसरे सबसे बड़े नेता भी मौजूद रहते हैं। टेलीविजन के साथ-साथ अब रामलीला का चलन देश भर में घट गया है, लेकिन फिर भी रामलीला मैदान ऐतिहासिक रामलीलाओं का मंच रहा है, और राम के नाम से जुड़े हुए इस मैदान के नाम को बदलना एक नासमझी की हड़बड़ी है। जो भाजपा राम-राम कहते हुए राजनीति करती है, और राम का नाम लेकर सत्ता पर आई भी है, उससे तो कम से कम यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह ऐतिहासिक रामलीला मैदान का यह ऐतिहासिक नाम बदलने की सोचेगी। 
आज देश के करीब दो दर्जन राज्यों में भाजपा और उसके गठबंधन की सरकारें हैं। केन्द्र सरकार के गठबंधन में भी भाजपा मुखिया है, और केन्द्र सरकार के सारे संस्थानों, और योजनाओं को अटल बिहारी का नाम देने की उसे आज आजादी है, और उसके पास सारे अधिकार हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में एकमुश्त दर्जन भर से ज्यादा जगहों और संस्थानों का नाम अटलजी पर रख ही दिया है, और भाजपा के दूसरे राज्यों में भी ऐसा ही सिलसिला चल रहा है। इसे देखते हुए ऐतिहासिक जगहों के नाम भी बदलकर अटल बिहारी वाजपेयी पर रखना न तो भाजपा के लिए फायदेमंद है, और न ही यह जायज है। वैसे भी देश में आज रेलवे स्टेशनों से लेकर शहरों तक के नाम सत्तारूढ़ पार्टियों की राजनीतिक प्राथमिकताओं के मुताबिक रखे और बदले जा रहे हैं। ऐसे में राम के नाम पर चले आ रहे एक मैदान का इतिहास बख्श देना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त

भले लोगों का राजनीति में आना, राजनीति का भला..

संपादकीय
25 अगस्त 2018


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कलेक्टर ओ पी चौधरी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया है, और उनके भाजपा में शामिल होकर चुनाव लडऩे की खबरें हैं। वे छत्तीसगढ़ी माटीपुत्र हैं, गांव के गरीब परिवार से, अकेली मां के बढ़ावे से पढ़ते हुए आगे बढ़े, और बिना अंग्रेजी के भी वे आईएएस तक पहुंचे। राजधानी में उन्होंने ऐसे बहुत से काम किए जो कि किसी भी एक कलेक्टर की कामयाबी के सुबूत हो सकते हैं, लेकिन इसके पहले उन्होंने बस्तर में आदिवासी इलाके के बीच एक बड़ा शैक्षणिक केन्द्र विकसित करके वाहवाही पाई थी। वे एकदम नौजवान हैं, और आगे की लंबी नौकरी को छोड़कर वे जिस तरह राजनीति में आ रहे हैं, उससे नौकरशाही का नुकसान है, और राजनीति का फायदा। राजनीति में भले लोगों के आने से राजनीति भली हो सकती है, और बुरे लोगों की भीड़ राजनीति को एक गाली तो बना ही चुकी है। 
आज भारत में राजनीति के साथ कई ऐसी बातें जुड़ी हुई हैं कि बहुत भले और काबिल लोग, कामयाब लोग इसमें आना नहीं चाहते। कुनबापरस्ती से परे राजनीति में गुंजाइश घट जाती है, हालांकि रहती तो है। इसके बाद अलग-अलग पार्टियों की अपनी-अपनी खामियां रहती हैं, कोई पार्टी धर्म की राजनीति करती है, कोई पार्टी जाति की राजनीति करती है, और अधिकतर पार्टियां भ्रष्टाचार की राजनीति करती हैं। ऐसे में जो लोग ईमानदार हैं, वे राजनीति में कब तक और कहां तक जिंदा रह पाएंगे, यह अंदाज लगाना थोड़ा सा मुश्किल होता है। हालांकि राजनीतिक दल भी चतुर होते हैं, और वे हाथी दांत की तरह कुछ ईमानदारों को दिखावे के लिए जरूर साथ रखते हैं, और गंदगी के अपने काम अपने पसंदीदा भ्रष्ट लोगों से करवाते रहते हैं। छत्तीसगढ़ में ही जोगी सरकार में दारू के धंधे में जितना भ्रष्टाचार करना था, वह पूरी तरह जारी रहा, और दूसरी तरफ निर्विवाद रूप से ईमानदार एक नेता, रामचन्द्र सिंहदेव, को आबकारी मंत्री बनाकर रखा गया, ठीक उसी तरह जिस तरह कि दुकानों के शोकेस में खूबसूरत पुतले खड़े रखे जाते हैं। 
लेकिन समय-समय पर भारतीय राजनीति में कई अफसर नौकरी छोड़कर भी आए हैं, और वे अपने-अपने किस्म से कामयाब भी रहे हैं। दिल्ली में ही अरविंद केजरीवाल आयकर विभाग की नौकरी छोड़कर आए, और एक नई पार्टी बनाकर, नए किस्म की राजनीति करके उन्होंने कांग्रेस और भाजपा के मिलेजुले गढ़ दिल्ली को जीतकर दिखा दिया। उन्हें लेकर सोशल मीडिया पर मजाक अधिक चलते हैं, लेकिन कई खामियों के बावजूद उन्होंने खूबियों वाली एक राजनीति की है, और यह भी साबित किया है कि राजनीति कांग्रेस और भाजपा के एकाधिकार का कारोबार नहीं है।  ऐसे में सरकारी कुर्सी पर बैठकर राजनीतिक काम करने के बजाय कुर्सी छोड़कर राजनीति में आने, और जनता के बीच जाने की चुनौती मानने का काम बेहतर है। आज भारत के राजनीतिक दलों में या तो कुनबे की विरासत की शक्ल में लोग आते हैं, या फिर औसत दर्जे के लोग पहुंचते हैं। बहुत काबिल, बहुत होनहार, और तजुर्बेकार लोग राजनीति में कम ही आते हैं। नतीजा यह होता है कि ऐसे लोग जब सत्ता में पहुंचते हैं, तो सरकार में मंत्रियों का कामकाज बहुत औसत दर्जे का हो जाता है, या फिर वह अफसरों की मेहरबानी से चलता है। दूसरी तरफ अगर वे विपक्ष में रहते हैं, तो सरकार को घेरने और जनहित के मुद्दों को उठाने का काम वे मजबूती से नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें सरकारी कामकाज का तजुर्बा कम रहता है। इसलिए अगर कोई नौजवान और होनहार अफसर, जमीन से जुड़े रहने के अपने तजुर्बे के साथ राजनीति में आए, तो उससे राजनीति का भला हो सकता है। न सिर्फ सरकारी नौकरी से निकले हुए, बल्कि समाजसेवा के क्षेत्र से निकले हुए कुछ पेशेवर लोग भी अगर चुनाव लड़ते हैं, तो वे अपने लंबे अनुभव का फायदा राजनीति को दे सकते हैं। एक एनजीओ में बरसों काम करने के बाद संदीप दीक्षित ने पूर्वी दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ा था, और वे संसद पहुंचे थे। 
सभी राजनीतिक दलों को यह चाहिए कि वे समाज के अलग-अलग दायरों के अनुभव संपन्न लोगों को, कामयाब और भले लोगों को अपनी पार्टी में लेकर आएं, और अपनी पार्टी को बेहतर बनाएं। ऐसे दुस्साहस से गैरराजनीतिक और कामयाब नौजवानों का सुरक्षित भविष्य जरूर कुछ खतरे में पड़ सकता है, लेकिन कहा गया है कि गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में...। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त

हिन्दुस्तानी नेताओं की विदेशों में बातों में अटपटा क्या है?

संपादकीय
24 अगस्त 2018


राहुल गांधी जर्मनी सहित कुछ और देशों की यात्रा पर हैं, और वहां अलग-अलग समूहों या कार्यक्रमों में वे भारत के बारे में काफी कुछ बोल रहे हैं। समाचारों से कई बार यह पता नहीं लगता कि किसी ने खुद होकर कौन सी बात कही, और कौन सी बात किसी सवाल के जवाब में कही, लेकिन बात तो बात रहती है, और कई बार ऐसी बातों पर विवाद खड़ा होता है। यह सवाल उठता है कि देश के बाहर जाकर देश के बारे में बुरी बातों को गिनाकर आलोचना करना कितना सही है? कल से भाजपा के प्रवक्ता राहुल गांधी की बातों को लेकर उनके खिलाफ काफी कुछ बोल रहे हैं, लेकिन ऐसे में भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री, भूतपूर्व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने जो कहा है उस पर गौर किया जाना चाहिए। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है कि देश के बाहर जाकर देश के बारे में नकारात्मक बातें करना ठीक नहीं है, और नेताओं को इससे बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सिलसिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुरू किया है, लेकिन बाकी नेताओं को उसके जवाब में वैसा ही काम नहीं करना चाहिए। 
अब यह देखा जाए कि देश के बारे में आलोचनात्मक बातें देश के बाहर करना क्या इतना नाजायज है कि उन्हें सवालों के जवाब के रूप में भी न कहा जाए? लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी के अमरीका में जो बड़े-बड़े कार्यक्रम हुए, उनमें न्यूयार्क का मेडिसन स्क्वेयर का कार्यक्रम हजारों की भीड़ वाला था, और उसका जीवंत प्रसारण दुनिया भर में हुआ था। ऐसे बहुत से कार्यक्रमों में मोदी ने कहीं पिछले 70 बरस तो कहीं पिछले 50 बरस की सरकारों को कोसा था, और भारत की बदहाली के लिए पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहराया था। इसलिए देश के बाहर जाकर देश के लोगों के बारे में, देश की पिछली सरकारों के बारे में, या देश के हाल के बारे में नकारात्मक या आलोचनात्मक बातें कहना न तो नया है, और न ही यह अकेले कांग्रेस की फितरत है। फिर सवाल यह भी है कि आज जब विदेशों में बसे हुए भारतवंशियों के बीच चुनाव प्रचार से लेकर चंदा इक_ा करने तक का अभियान चलता है, जब संयुक्त राष्ट्र से लेकर कई देशों की संसदों तक में भारत के घरेलू मुद्दों के बारे में खुलकर चर्चा होती है, संसदों में प्रस्ताव पास होता है, तो यह बात जाहिर और जायज है कि दूसरे देशों में जाकर हिन्दुस्तानी नेता भी भारत के बारे में अपनी सोच को सामने रखें। इसलिए अगर उस सोच में कोई गलत बात है, तो वह भारत के भीतर भी गलत है, और भारत के बाहर भी। और अगर किसी नेता की ऐसी बातें हकीकत पर खड़ी हैं, और खरी हैं, तो वे देश के भीतर भी जायज है, और देश के बाहर भी। 
अब भारतीय लोकतंत्र में अलग-अलग पार्टियों के बीच शिष्टाचार ऐसा तो रह भी नहीं गया है कि लोग एक-दूसरे के बारे में गंदी या गैरजरूरी-कड़वी बातें न कहें। अब यह आम हो चुका है, और भारत की संसदीय राजनीति की हवा गंदी और जहरीली हो चुकी है। इसलिए नेताओं और पार्टियों के बीच एक न्यूनतम-बुनियादी शिष्टाचार भी खत्म हो चुका है, और लोग बिना किसी काबू के एक-दूसरे के बारे में बोलते हैं। देश के भीतर बोलना, या देश के बाहर बोलना, आज के इंटरनेट और सोशल मीडिया के जमाने में अलग-अलग बातें नहीं हैं। और देश और विदेश का ऐसा कोई फर्क भी नहीं रह गया है। क्योंकि कहीं भी कही गई बातों पर दुनिया भर से लोग बहस में शामिल हो ही जाते हैं। मुद्दा यह है कि जब तक भारतीय राजनीति की हवा जहरीली बनी रहेगी, उस जहर के जवाब में और जहर पैदा होते रहेगा, फिर चाहे नेताओं की सांसें देश में निकलती रहें, या विदेश में। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अगस्त

भ्रष्ट बैंकों की साजिश पर समय रहते कार्रवाई जरूरी

संपादकीय
23 अगस्त 2018


केन्द्र सरकार की तरफ से बैंकों को यह निर्देश आया है कि बैंक से कर्ज लेकर धोखाधड़ी करने वाले लोगों के खिलाफ अगर बैंक अफसर जानकारी रखते हुए भी समय पर रिपोर्ट नहीं करेंगे, तो उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी के तहत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। आईपीसी का यह प्रावधान उन लोगों पर लागू होता है जो कि आपराधिक साजिश में शामिल होते हैं, और इसमें दो साल की कैद से लेकर मौत की सजा तक का प्रावधान है। सरकार ने बैंकों को एक चेतावनी के रूप में यह निर्देश दिया है क्योंकि आज देश भर में कई बैंक ऐसे कर्ज डुबाकर दीवालिया होने की कगार पर हैं जिन कर्जों को मंजूर करने में बैंकों के अफसर शामिल रहे हैं। बैंक के नियमों और पैमानों के खिलाफ जाकर भ्रष्टाचार के रास्ते ऐसे कर्ज मंजूर किए गए जिनकी वसूली मुमकिन ही नहीं थी। इसी सिलसिले में अभी दो दिन पहले एक दूसरी खबर आई थी कि संसद की एक समिति ने पिछले एक आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन को अपनी सुनवाई में आने के लिए लिखा है ताकि समिति के सदस्य-सांसद उनसे यह समझ सकें कि भारतीय बैंकों में ऐसे डूबे हुए कर्ज, एनपीए, की नौबत क्यों आई, और उसका क्या समाधान निकाला जा सकता है। इस सिलसिले में यह बात दिलचस्प है कि संसदीय समिति को मनमोहन सरकार द्वारा बनाए गए आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन का नाम मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने सुझाया था। उन्होंने एनपीए संकट को पहचानने और इसका हल निकालने का प्रयास करने के लिए बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी की अगुवाई वाली संसद की प्राक्कलन समिति के सामने राजन की प्रशंसा की थी। 
भारत के बैंकों के डुबाए गए कर्ज के बारे में कारोबार की दुनिया के लोगों को यह अच्छी तरह मालूम है कि बहुत सारे कर्ज देते समय ही बैंक अफसरों को मालूम रहता है कि उनसे कोई वसूली होने वाली नहीं है। ऐसे में सिर्फ राजनीतिक दबाव के चलते बैंक ऐसे कर्ज दें, यह मुमकिन नहीं लगता। और जाहिर तौर पर बैंकों के बड़े-बड़े अफसर बड़े-बड़े कर्ज किसी भ्रष्टाचार और साजिश के तहत ही मंजूर करते हैं। आज आए समाचार के मुताबिक इन मामलों में कोष के दूसरे जगह उपयोग समेत धोखाधड़ी गतिविधियों का पता लगाने के लिये बैंक तथा जांच एजेंसियां इसकी जांच कर रही हैं। बैंकों खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर फंसे कर्ज (एनपीए) को लेकर खासा दबाव है। इन बैंकों का एनपीए आठ लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है। इसके अलावा बैंकों में कई तरह की धोखाधड़ी का भी पता चला है। इसमें पीएनबी में 14,000 करोड़ रुपये का घोटाला प्रमुख है, जिसे कथित रूप से हीरा कारोबारी नीरव मोदी और उसके सहयोगियों ने कुछ बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर अंजाम दिया।
सरकार को बैंक अफसरों की साजिश के खिलाफ जांच में तेजी का इंतजाम करना चाहिए। आज हालत यह है कि बैंकों के साथ धोखाधड़ी हो गई, साजिश के तहत उनसे करोड़ों रूपए निकाल लिए गए, और बैंकों में रहन रखे गए सामान गायब हो गए, और बैंक अफसरों को बरसों तक इसकी रिपोर्ट लिखाने की जरूरत भी नहीं लगी। इन्हीं अफसरों के घर से अगर कुछ हजार रूपए का भी कोई सामान गायब होता, तो वे आधी रात को थाने पहुंचकर रिपोर्ट लिखाते। लेकिन गायब सामान या स्टॉक के खिलाफ जब बैंक बरसों तक रिपोर्ट नहीं लिखाता है, और ऐसी साजिश में शामिल भ्रष्ट अफसर तरक्की पाते जाते हैं, तो यह बात जाहिर रहती है कि आरबीआई या सरकार का कोई काबू ऐसे भ्रष्ट बैंकों पर नहीं है। इसका दूसरा तरीका यह हो सकता है कि बैंकों के ग्राहकों के जो संघ देश में हैं, वे भ्रष्ट बैंकों से आम ग्राहकों के खाते हटवाने का एक आंदोलन चलाएं। यह याद रखने की जरूरत है कि अभी कुछ महीने पहले तक केन्द्र सरकार इस बात पर आमादा थी कि कानून में फेरबदल करके संसद से ऐसा कानून बनवा दिया जाए जिससे कि किसी बैंक का दीवाला निकलने पर वहां लोगों की जमा रकम पूरी न निकल सके, और उसका एक हिस्सा ही जमाकर्ता को मिले, और बाकी से बैंक अपने भ्रष्ट-घाटे की भरपाई करे। यह तो बैंक कर्मचारियों के संगठन ने समय रहते इस साजिश का भांडाफोड़ किया, और फिर देश भर में जब इस प्रस्तावित फेरबदल के खिलाफ माहौल बना, तो पीएनबी घोटाले से घेरे में आई हुई केन्द्र सरकार को यह प्रस्तावित कानून वापिस लेना पड़ा। आज भी देश के जमाकर्ताओं को चाहिए कि वे उन्हीं बैंकों मेंं अपनी रकम जमा करें जो कि अभी तक भ्रष्टाचार और घोटाले की साजिशों के घेरे में नहीं आए हैं। 
मनमोहन सरकार के आरबीआई गवर्नर रहे रघुराम राजन का भी यह नैतिक दायित्व है कि वे संसदीय समिति के सामने पेश होकर बैंक भ्रष्टाचार से उबरने के लिए उनकी जो भी सोच है, उसे सामने रखें। ऐसा अधिक मौकों पर होता नहीं है, कि मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार पिछली मनमोहन सरकार के आरबीआई गवर्नर की ऐसी तारीफ करें, और बैंक घोटालों से उबरने के लिए उनका नाम सुझाएं। आज देश में बैंकों के भ्रष्टाचार पर बरसों तक कोई कार्रवाई नहीं होती है, और इससे ही भ्रष्ट अफसर बैंकों को डुबाना जारी रखते हैं। ऐसा कड़ा कानून भी बनाना चाहिए कि जाहिर तौर पर जो अफसर भ्रष्ट हैं, उनको कैद हो, और वह लोगों को दिखे भी। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अगस्त

औलाद के साथ जापान जैसे ईश्वर-दर्शन पर न जाना पड़े

संपादकीय
22 अगस्त 2018


एक तस्वीर पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर घूम रही है जो है तो सच, लेकिन कुछ बरस पुरानी है। इस तस्वीर के साथ की जानकारी बताती है कि एक स्कूल की बच्चियों को वृद्धाश्रम दिखाने ले जाया गया, तो वहां उस बच्ची को अपनी दादी देखने मिली जो कि वहीं बसी हुई थी। दादी और पोती के बीच आंसू बह निकले, और जब लोगों को पता लगा कि बच्ची के मां-बाप उसे अब तक यह बताते आए थे कि दादी रिश्तेदारों के घर गई हुई है, तो बाकी बच्चियां और बाकी वृद्धाएं भी रोने लगीं। इंटरनेट की वजह से गलत जानकारी तेजी से फैलती भी है, और मीडिया का चौकन्ना हिस्सा तुरंत ही गलत जानकारी को गलत साबित भी कर देता है। इस तस्वीर की कहानी सच थी, लेकिन वह ताजा न होकर कुछ बरस पहले की थी।
आज देश में जगह-जगह अदालतों में यह बात सामने आ रही है कि बूढ़े मां-बाप का जमकर तिरस्कार हो रहा है, और उन्हें बेटा-बहू जमकर प्रताडि़त करते हैं, उनकी दौलत ले लेते हैं, और उसके बाद उन्हें दाने-दाने के लिए मोहताज कर देते हैं। कुछ महीने ही हुए हैं जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक संपन्न कारोबारी के बंद घर से पड़ोसियों ने दरवाजे खोलकर उसकी लकवाग्रस्त बूढ़ी मां को बिस्तर पर से बचाया था जिसे छोड़कर कारोबारी अपने परिवार को लेकर, मतलब, बाकी परिवार को लेकर, नए मकान में रहने चला गया था, और मां को मरने के लिए छोड़ दिया था। अभी कई जगहों पर अदालतों ने ये फैसले दिए हैं कि बूढ़े मां-बाप को गुजारा भत्ता देना या उनका ख्याल रखना उनके बच्चों की कानूनी जिम्मेदारी है। कई जगहों पर अदालती आदेश से परे ऐसे कानून भी बनाए जा रहे हैं जिनके तहत ऐसी नालायक और गैरजिम्मेदार औलाद को सजा देने का भी इंतजाम है। 
हम कई बरस पहले भी इसी जगह इस बात को लिख चुके हैं कि लोगों को अपने बुढ़ापे का ख्याल खुद रखना चाहिए। अपनी जमीन-जायदाद सम्हालकर रखनी चाहिए, और अपनी जिंदगी के आखिरी दिन तक का इंतजाम कर लेने के बाद ही उन्हें आल-औलाद को कुछ देना चाहिए। अपनी संतानों के लिए लोगों के मन में दुख-दर्द तो रहता है, लेकिन अपने बुढ़ापे की भुखमरी की कीमत पर उनको ऐसा दुख-दर्द नहीं पालना चाहिए। लोगों को अपने हाथ-पैर चलते हुए ही यह इंतजाम कर लेना चाहिए कि उनके बच्चों को उनके मर जाने के बाद ही उनसे सब कुछ हासिल हो। ऐसा न करके वे अपने बच्चों को भी गलत रास्ते धकेल देते हैं क्योंकि बेटे-बहू को जब यह समझ आ जाता है कि बूढ़े मां-बाप से अब और कुछ मिलना बाकी नहीं है, तो फिर उनमें से कुछ की नीयत तो बदल ही जाती है, और बूढ़ों की जिंदगी नर्क हो जाती है। 
बरसों पहले जापान की एक फिल्म आई थी जिसमें बहुत बुरी भुखमरी और अकाल से गुजरते हुए जापान में जब परिवारों के पास खाने को कुछ नहीं बचता है, तो बेटे बूढ़े मां-बाप को बारी-बारी से ईश्वर के दर्शन के नाम पर एक पहाड़ी पर ले जाते हैं, और वहां से उन्हें धकेलकर नीचे गिरा देते हैं, जहां का खड्ड ऐसे कंकालों से पटा हुआ रहता है। गांव के बुजुर्गों को कुछ तो एहसास हो चुका रहता है क्योंकि ऐसे ईश्वर-दर्शन को गए हुए कोई भी बुजुर्ग कभी वापिस नहीं लौटते थे। यह फिल्म कुछ अधिक क्रूर हो सकती है, लेकिन जब हकीकत को समझाना हो तो मिसालों का कुछ क्रूर होना जरूरी होता है, उससे कम में बात लोगों को समझ आती नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त

बिहार की ताजा भीड़-हिंसा सीधे सुप्रीम कोर्ट को चुनौती

संपादकीय
21 अगस्त 2018


बिहार के भोजपुर में एक किसी की लाश मिलने के बाद नाराज लोगों ने आगजनी की, और हत्या का आरोप लगाते हुए एक महिला को उसके घर से निकाला, और उसके सारे कपड़े उतारकर उसे मारते हुए उसका जुलूस निकाला। इस दौरान पुलिस वहां मौजूद रही, और उसने कुछ किया नहीं। बाद में इस सिलसिले में छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिसमें से एक लालू यादव की पार्टी का नेता भी बताया गया है। यह सब उस वक्त हो रहा है जब सुप्रीम कोर्ट मॉबलिचिंग को लेकर फिक्रमंद है, केन्द्र और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा कर रखा है। केन्द्र सरकार भीड़ की हिंसा को लेकर एक नया कानून बनाने की बात कर रही है, और जानकार लोगों का यह मानना है कि देश के मौजूदा कानूनों में भीड़ द्वारा हिंसा पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए वैसे भी काफी कड़े कानून मौजूद हैं, और उनका इस्तेमाल न करके अब और कड़े कानून की बात करना महज दिखावा है क्योंकि कागजों पर कड़ाई से असल जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता। 
आज जब बिहार की यह ताजा हिंसा सामने आई, तो लोगों को तुरंत सूझा कि इसी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सुशासन बाबू कहा जाता है, और यह कैसा सुशासन है? इसी बिहार के बालिकागृह में भयानक बलात्कार के लंबे सिलसिले को लेकर गिरफ्तारियां, मंत्री का इस्तीफा तो हुआ ही है, एक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान टिस की रिपोर्ट यह कहती है कि बिहार के तकरीबन सभी बालक-बालिकागृह यौन शोषण के शिकार हैं। ऐसे में सुशासन की बात खोखली रह जाती है क्योंकि बलात्कारियों के सरगना और भांडाफोड़ हुए ऐसे एक बालिकागृह के संचालक के साथ राज्य के मंत्रियों और बड़े नेताओं का घरोबा सामने आया है, और सरकार की बड़ी-लंबी चौड़ी मेहरबानी भी उस पर साबित हुई है। 
हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को बिहार की इस ताजा भीड़-हिंसा और महिला के साथ ऐसी भयानक बदसलूकी को लेकर एक मिसाल कायम करनी चाहिए, और वहां मौजूद तमाम पुलिस को कैद और बर्खास्त तो करना ही चाहिए, जिन लोगों की तस्वीरें और वीडियो इस महिला के साथ हिंसा करते हुए सामने आए हैं, उन तमाम लोगों को गिरफ्तार करके उनकी किसी भी जमानत पर सुप्रीम कोर्ट को ही सीधे रोक लगा देनी चाहिए। जब तक भीड़ की हिंसा पर भीड़ के हर चेहरे पर कार्रवाई नहीं होगी, कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, और जमानत की संभावना खत्म नहीं की जाएगी, तब तक भीड़ की हिंसा जारी रहेगी। हिन्दुस्तान का आज जो चेहरा पूरी दुनिया में सामने आ रहा है, वह हिंसा, खासकर यौन हिंसा से भरे हुए समाज का है, और इस तस्वीर को बदलने के लिए ही नहीं, बेकसूर लोगों को बचाने के लिए भी यह जरूरी है कि मौजूदा कानूनों के तहत ही सुप्रीम कोर्ट असाधारण कार्रवाई करे, और इसमें कुछ भी अटपटा नहीं होगा। 
दूसरी तरफ अभी-अभी मध्यप्रदेश का एक वीडियो सामने आया है उसमें बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार लोगों को कुछ लड़कियां या महिलाएं खुलेआम जूतों से पीट रही हैं, इनके साथ-साथ महिला पुलिस भी उन्हें वहीं पर मार रही है। यह बात समझना चाहिए कि जब सार्वजनिक और सामूहिक हिंसा को पुलिस की तरफ से ऐसा बढ़ावा दिया जाता है, तो आज तो वह किसी आरोपी के खिलाफ है, पुलिस के द्वारा है, कल के दिन वही हिंसा, वैसी ही हिंसा बेकसूर के खिलाफ भी होती है, और वह किसी भी हद तक बढ़ती चली जाती है। किसी समाज में कानून का राज ऐसे लागू नहीं हो सकता कि पुलिस हिंसा करे, और बाकी समाज हिंसा न करे। इसलिए पुलिस को भी एक मिसाल कायम करनी होगी, सार्वजनिक हिंसा से बचकर। वरना उसके देखादेखी, उससे चार कदम आगे बढ़कर भी लोग हिंसा करते रहेेंगे। फिलहाल बिहार की इस भीड़-हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई का इंतजार है क्योंकि यह हिंसा न सिर्फ एक अकेली महिला के खिलाफ है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान ही सामने आकर अदालत को चुनौती भी है।  (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 21 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अगस्त

सिद्धू, और नफरतजीवी

20 अगस्त  2018

पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री और वहां के पुराने क्रिकेट कप्तान इमरान खान के शपथग्रहण में पहुंचकर भारत के पंजाब के एक मंत्री, पुराने क्रिकेटर, और मशहूर टीवी कलाकार नवजोत सिंह सिद्धू ने हिन्दुस्तान में नफरतजीवियों की जिंदगी थोड़ी सी बढ़ा दी। ढेर से लोगों को उन्हें गद्दार कहने का मौका मिला जिनको कि पिछले कुछ दिनों में हिन्दुस्तान में किसी को गद्दार करार देने का मौका न मिलने पर बड़ी बेचैनी थी। बहुत से हिन्दुस्तानियों को यह लगा कि किसी हिन्दुस्तानी को ऐसे पाकिस्तानी के शपथग्रहण पर क्यों जाना चाहिए था जिसका मुल्क सरहद पर भारत के खिलाफ हमले करते ही रहता है। बहुत से लोगों को यह शिकायत हुई कि सिद्धू को आजाद कश्मीर नाम के पाक अधिकृत कश्मीर के मुखिया के बगल में बिठाया गया, और सिद्धू को इसमें कुछ बुरा नहीं लगा। बहुत से लोगों को यह बात खली कि सिद्धू ने वहां के फौजी जनरल कमर बाजवा को गले लगाया।
काफी अरसे से नफरतजीवी निराश और हताश थे कि किसी खास इंसान को देश का गद्दार करार देने का मौका आया नहीं था। ऐसे में दो-तीन छोटी-छोटी बातों में इनको निराशा की गहराई से निकालकर नफरत की सांस लेने का मौका दिया। बिहार के मोतिहारी में एक कॉलेज प्रोफेसर ने फेसबुक पर किसी और की लिखी एक बात को दुबारा पोस्ट किया या पसंद किया कि अटल बिहारी वाजपेयी के साथ फासीवाद के एक युग की समाप्ति। अटलजी अनंत यात्रा पर निकले।
इस एक लाईन पोस्ट करने के बाद इस प्रोफेसर को शहर के मवालियों ने उन्हें फोन पर धमकी दी, और शायद इसी वजह से उनके घर घुसकर उन्हें घर से निकालकर बुरी तरह से मारा, और उन पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगाने की भी कोशिश की। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि उनके विश्वविद्यालय में वे कुलपति के खिलाफ एक आंदोलन में शामिल थे, और हमले की एक वजह यह भी हो सकती है। दिलचस्प बात यह है कि देश के एक सबसे बड़े अखबार का मोतिहारी का ब्यूरोचीफ अपने फेसबुक पेज पर इस प्रोफेसर को आतंकवादी लिखते आ रहा था, और इस हमले और हिंसा में भी वह शामिल था, और उसे भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है।
उधर महाराष्ट्र के औरंगाबाद में म्युनिसिपल कार्पोरेशन में जब अटलजी को श्रद्धांजलि देने का प्रस्ताव कुछ पार्षदों ने रखा, तो एक मुस्लिम पार्टी के एक पार्षद ने इसका विरोध किया। इस पर प्रस्ताव रखने वाले पार्षदों ने एकजुट होकर जिस तरह सदन के भीतर ही उस मुस्लिम पार्षद को घेरकर मारा, टेबिलों पर चढ़कर लातों से मारा, जमीन पर गिराकर मारा, उसका वीडियो दिल दहलाने वाला है।
अब नवजोत सिंह सिद्धू को गद्दार कहकर उस पर हमला करने वाले लोगों को, और अटल बिहारी वाजपेयी के हिमायती बनकर उनके आलोचकों पर या उनसे असहमति रखने वालों पर हमला करने वाले लोगों को कुछ पढ़ाई-लिखाई की जरूरत है। अटलजी ने अपने प्रधानमंत्री रहते हुए देश के करोड़ों नफरतजीवियों की मर्जी के खिलाफ, अपनी पार्टी के बहुत से लोगों के मर्जी के खिलाफ बस लेकर पाकिस्तान तक जाना तय किया था, और वे गए थे। उनकी बस में बैठी हुई तस्वीरें ऐतिहासिक हैं, और बाद का इतिहास भी सरल हिन्दी भाषा में भी दर्ज है ताकि नफरतजीवी उसे ठीक से पढ़ सकें। इस दिल्ली-लाहौर बस को सदा-ए-सरहद नाम दिया गया था, और ऐसी पहली बस लेकर 19 फरवरी 1999 को अटलजी पाकिस्तान गए थे, और जब कारगिल की जंग चल रही थी तब भी यह बस जारी रखी गई थी। लोगों को यह भी याद रखने की जरूरत है कि पाकिस्तान के एक फौजी तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ ने बाद में खुलासे से यह मंजूर किया था कि किस तरह उन्होंने हिन्दुस्तान के कारगिल पर हमला किया था, कब्जा किया था, और इस जंग की शुरुआत की थी। और ऐसी जंग के चलते हुए भी अटलजी ने आम हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों के आने-जाने की इस बस को बंद करने का सोचा नहीं था।
जिन लोगों के लिए आज नफरत को उगलना रोजाना का एक जरूरी शगल है, उन लोगों को कुछ ताजा बातें भी याद रखनी चाहिए कि पिछले आम चुनाव में पूरे वक्त पाकिस्तान के खिलाफ बड़े-बड़े फतवे जारी करने वाले, और एक के बदले दस सिर काटकर लाने की मुनादी करने वाले नरेन्द्र मोदी ने भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को अपने शपथग्रहण में बुलाया था। और इतना ही नहीं, दूसरे देश से हिन्दुस्तान लौटते हुए मोदी ने अचानक यह तय किया था कि वे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के जन्मदिन पर उनके घर जाकर उन्हें मुबारकबाद देंगे, और वे अचानक पाकिस्तान में उतरे, नवाज शरीफ के घर गए, उनके परिवार से मिले, परिवार में होने जा रही एक शादी की मिठाई खाई, परिवार को तोहफे दिए, और सबको हक्का-बक्का छोड़कर हिन्दुस्तान लौटे।
दिलचस्प बात यह है कि नवाज शरीफ का जन्मदिन 25 दिसंबर को था, और उसी दिन अटल बिहारी वाजपेयी का भी जन्मदिन था, और उसी दिन पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का भी जन्मदिन था जो कि पाकिस्तान में राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। और उस दिन जिन्ना की 140वीं सालगिरह थी, और पूरे पाकिस्तान में वह दिन बड़ा खास मनाया जा रहा था। इसके बाद भी मोदी और शरीफ परिवारों के बीच तोहफों और मिठाईयों का लेन-देन हुआ, एक-दूसरे की मां के लिए शॉल भेजी गईं, और दूसरे तोहफे भी। यह सब उस वक्त हुआ जब कुछ महीने पहले तक मोदी एक शहीद हिन्दुस्तानी सैनिक के बदले दस पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काटकर लाने की कसम मंच और माईक से खा रहे थे।
आज नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ जहर उगलने वाले और उन्हें गद्दार कहने वाले लोगों को पिछले कुछ बरसों का अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री रहते हुए किए गए इन कामों को याद रखना चाहिए। नफरतजीवियों को यह भी याद रखना चाहिए कि चाहे पाकिस्तान हो, या कि कोई और पड़ोसी देश, उससे नफरत और दुश्मनी रखने का मतलब जंग की तैयारियों पर इतना फिजूलखर्च करना होता है कि अपने देश के सबसे गरीब बच्चों के मुंह का निवाला छिनता है, और अपने मरीजों से दवाईयां छिनती हैं, और अपनी स्कूलों से दोपहर का खाना छिनता है।
इस कीमत पर नफरत को पालना और बढ़ाना जिन लोगों को ठीक लगता है, उनको यह भी नहीं दिखता कि पाकिस्तान में पहली बार एक ऐसा फौजी जनरल, कमर बाजवा, आया है जो खुलकर भारत के साथ अमन की वकालत करता है। एक अखबारनवीस ने आज ही फेसबुक पर एक पोस्ट में यह याद दिलाया है कि अफ्रीका के कांगो में भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष मेजर जनरल विक्रम सिंह के मातहत 2012 से 2014 के बीच यूएन शांति सेना में कमर बाजवा ने काम किया था, और उन दोनों के बीच अच्छे रिश्ते थे, उनकी काबिलीयत को देखकर विक्रम सिंह ने सार्वजनिक रूप से उनकी तारीफ की थी। कांगो मिशन के बाद 2016 में कमर बाजवा को पाकिस्तानी सेना का चीफ ऑफ स्टाफ बना दिया गया था।
आज पाकिस्तान में सेना का सबसे बड़ा अफसर अगर पाकिस्तानी सेना की पुरानी साख को तोड़ते हुए एक से अधिक बार सार्वजनिक रूप से हिन्दुस्तान के साथ अमन के रिश्तों की वकालत करता है, तो हिन्दुस्तान को भी इस बात को समझना चाहिए, खासकर हिन्दुस्तान के उन नफरतजीवियों को जिनको अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी की असाधारण पहल को अनदेखा करने में मजा आता है। कहने के लिए तो ये लोग, ऐसे लोग, वाजपेयी और मोदी के नाम पर मरने-मारने की बात करते हैं, हिंसा पर उतर आते हैं, लेकिन जिनको भारत के इन दोनों प्रधानमंत्रियों की पहल भी याद नहीं है, या इसे वे कोशिश करके भुलाकर रखते हैं।  (Daily Chhattisgarh)

हिंदुस्तान इमरान से कुछ सीख भी तो सकता है...

संपादकीय
20 अगस्त 2018


पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार में यह पहली पारी है और ऐसे में नए आए लोग कई तरह से नई शुरूआत कर सकते हैं। परंपरागत नेता, चाहे भारत में हो, या पाकिस्तान में, वे सरकारी खर्च पर रईसी से जीने के लिए जाने जाते हैं। भारत में ही वामपंथियों और ममता बैनर्जी जैसे गिनेचुने नेताओं को छोड़ दें, तो बाकी किसी पार्टी के कोई नेता सादगी का स भी नहीं जानते। और यह सब कुछ वे तब तक करते हैं जब तक जनता का पैसा अपने पर खर्च करने की ताकत उनके हाथ रहती है। और यह भी है कि इस ताकत के हाथ से जाने तक वे इतनी दौलत जुटा चुके रहते हैं कि उसके एक हिस्से को खर्च करके ही वे उसी दर्जे की सुख-सुविधा जारी रख सकते हैं। इमरान खान के पाकिस्तान में ही उनके पहले के एक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आज भ्रष्टाचार के जुर्म में बेटी सहित जेल में हैं, और इमरान के एक दूसरे प्रतिद्वंद्वी, बेनजीर भुट्टो के पति पर भी भ्रष्टाचार की अनगिनत तोहमतें लगी हुई हैं। 
खैर, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में भ्रष्टाचार की बात अधिक करना फिजूल है जब तक कि इनमें किसी नेता के भ्रष्टाचार के पुख्ता सुबूत अदालत में खड़े न हो सकें। ऐसे सुबूत डटे रहें, तो भारत में कुछ नेता अपने मरने के पहले शायद कुछ बरस कैद पा भी लेते हैं, जैसे लालू यादव। लेकिन अधिकतर लोगों का कुछ बिगड़ता नहीं है, इसलिए भ्रष्टाचार के बजाय किफायत पर चर्चा जरूरी है। छत्तीसगढ़ में ही हम देखते हैं कि जो लोग सरकारी खर्च पर अपने घर-दफ्तर सजाते हैं, उन्हें कितना भी खर्च करते हुए कोई दर्द नहीं होता। जो लोग कुछ बरस पहले दुपहियों पर चलते थे, और आज गाडिय़ों के काफिलों में सायरन बजाते जनता को रौंदते चलते हैं, उन्हें बंगलों में सौ-पचास एयरकंडीशनर लगवाते हुए भी कुछ नहीं लगता।
लेकिन यह जरूरी नहीं है कि छत्तीसगढ़ में ऐसी संपन्नता और ऐसी फिजूलखर्ची हमेशा बनी रहे, और किसी अदालत का इस पर कोई हुक्म न आए। हम पूरे भारत के संदर्भ में इमरान खान की बात कहना चाहते हैं जिन्होंने यह घोषणा की है कि उनका महल सरीखा मकान सुरक्षा एजेंसियों ने सुरक्षित नहीं पाया है, इसलिए वे सरकारी मकान में तो रहेंगे, लेकिन तीन बेडरूम के एक छोटे मकान में रहेंगे न कि प्रधानमंत्री निवास पर। प्रधानमंत्री के लिए अब तक चली आ रहीं अस्सी कारों में से वे सिर्फ दो रख रहे हैं, और बाकी नीलाम करवा दे रहे हैं। इसी तरह प्रधानमंत्री निवास पर अब तक तैनात सवा पाँच सौ कर्मचारियों में से वे सिर्फ दो कर्मचारी घर पर रख रहे हैं, और बाकी सरकारी विभागों को वापिस कर दे रहे हैं। अब तक एक सरकारी अफसर जिस मकान में रहता था, वे उसमें रहने चले गए हैं, और वहां से कल प्रधानमंत्री कार्यालय पैदल जाते हुए भी उनकी तस्वीर छपी है।
हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आम लोग, खास लोग, और नेता एक दूसरे की देखा-देखी बहुत सी बातें करते हैं, और बहुत से काम करते हैं इसलिए भारत के नेताओं को इमरान को देखते हुए किफायत में उनको शिकस्त देने की कोशिश करनी चाहिए। आज तो हालत यह है कि किसी राज्य सरकार में भी मंझले दर्जे के किसी अफसर के घर भी दो या अधिक गाडिय़ां तैनात दिखती हैं। यह सिलसिला टूटना चाहिए, और इसके लिए जरूरत हो तो जनता के बीच से किफायत की मांग उठनी चाहिए। 
(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अगस्त

केरल को लगी बुरी ठोकर से बाकी प्रदेश सबक लें...

संपादकीय
19 अगस्त 2018


केरल में अंधाधुंध असाधारण बारिश और उससे आई बाढ़ में सैकड़ों लोग मारे गए हैं, लाखों लोग बेघर हो गए हैं, और दसियों हजार करोड़ के नुकसान का अंदाज है। अब जिस तरह की विकराल बारिश हुई है, उसने सौ बरस रिकॉर्ड तोड़ दिया है, और उस पर सीधे-सीधे सरकार का कोई काबू नहीं दिखता है। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और ऐसी बातें हैं जो कि केरल सरकार को करनी चाहिए थीं, और उसने नहीं की। वहां से दूर हमारा यह लिखना न तो आज केरल सरकार को कोई मदद कर सकता है, न ही इस आलोचना को यह अहिन्दीभाषी प्रदेश पढऩे जा रहा है, लेकिन इसे लिखने का मकसद यह है कि दूसरे राज्य और उनको चलाने वाले लोग अपने-अपने इलाकों में हालात को काबू में रखने की कोशिशें करने में लग जाएं। जो तैयारी केरल नहीं कर पाया था, वह तैयारी बाकी राज्य कर सकें। 
अभी जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक केरल में नदियों के किनारे अंधाधुंध खुदाई हुई है, और इस तरह की बाढ़ आने की एक वजह इसको भी बताया जा रहा है। दूसरी तरफ हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बैठकर यह देख रहे हैं कि यहां भी तमाम नदियों के किनारे गैरकानूनी मशीनें लगाकर अंधाधुंध रेत खुदाई की जा रही है, और ईंट भ_ों के लिए मिट्टी भी खोदी जा रही है। इससे कुदरत की मार जिस दिन इस प्रदेश पर पड़ेगी, उस दिन नदियों में बाढ़ का क्या हाल होगा, इसका अंदाज लगाना अभी हमारे लिए मुमकिन नहीं है, लेकिन कोई अच्छा हाल नहीं होगा। दूसरी तरफ जहां-जहां बाढ़ के हालात होते हैं, वहां का एक आम तजुर्बा यह है कि नदियों के किनारे के इलाकों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई होती है, और उसकी वजह से जमीन में पानी को रोकने की क्षमता घट जाती है, और मिट्टी बह-बहकर नदियों में आती है, और उन्हें पाटकर गहराई घटाती है, पानी रोकने की क्षमता कम कर देती है। यह पूरा सिलसिला बहुत वैज्ञानिक तरीके से दर्ज हो चुका है, और इस पर हमारी अलग से कोई निजी सोच नहीं है, सिवाय इसके कि समय रहते राज्यों को यह समझ लेना चाहिए कि वे कुदरत पर जुल्म बंद करें।
केरल के बारे में एक बात यह भी सामने आई है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश, और केन्द्र सरकार के निर्देश के बावजूद केरल में एसडीआरएफ (राज्य आपदा निपटारा फोर्स) की एक भी बटालियन नहीं बनाई गई थी। इसलिए जब यह भयानक तबाही हुई तो राज्य को केन्द्रीय सुरक्षा बलों के साथ-साथ मिलिट्री का भी मोहताज होना पड़ा। एक तरफ तो सेना के हेलीकॉप्टरों और मोटरबोट ने लोगों की जिंदगी बचाई, दूसरी तरफ राज्य के हजारों मछुआरों ने अपनी नाव और बोट लेकर दसियों हजार लोगों को बचाया है। चारों तरफ पानी से घिरे हुए राज्य ने पिछली एक सदी में ऐसी तबाही नहीं देखी थी, और इसलिए उसने शायद यह मान लिया था कि उसे किसी तैयारी की जरूरत नहीं है। इस प्रदेश में या देश में किस पार्टी का राज्य है, इसे देखे और सोचे बिना शासन-प्रशासन के हिसाब से यह सोचना जरूरी है कि सरकार ने कहां-कहां चूक की है, और उसे लगी ठोकर से बाकी राज्य अपनी तैयारियों को एक बार कैसे कसौटी पर कस लें। 
दरअसल देश या दुनिया में जहां कहीं भी किसी भी तरह के प्राकृतिक या मानव निर्मित हादसे होते हैं, उन्हें देखकर बाकी दुनिया के शासन-प्रशासन को यह तौल लेना चाहिए कि अगर उनकी जिम्मेदारी के इलाके में अगर ऐसा कुछ होता है, तो क्या वे उससे निपटने के लिए तैयार हैं? कई राज्यों में लगातार स्कूल बसों के सड़क हादसे होते हैं, मुसाफिर बसों के बड़े बुरे एक्सीडेंट होते हैं, लेकिन दूसरे राज्य उनसे सबक लेकर अपने इलाकों में कोई जांच और सुधार करने का सरदर्द नहीं पालते। हर राज्य को आपदा नियंत्रण की अपनी तैयारी को ठीक से तौल लेना चाहिए क्योंकि जब तक केन्द्र सरकार या दूसरे राज्यों से कोई मदद पहुंचती है, तब तक तो जरूरतमंदों के शुरू के घंटे, शुरू के दिन खत्म हो चुके रहते हैं, और मौतों को टालने की संभावना भी खत्म हो चुकी रहती है। केरल आज बाकी देश की मदद से इस नुकसान से जल्द से जल्द उबरे, लेकिन हर प्रदेश को अपने आपदा प्रबंधन अफसर को अभी से तैनात करना चाहिए कि अभी वे दूर बैठकर, और कुछ हफ्तों या महीनों के बाद केरल जाकर यह सीखकर आएं कि उन्हें अपने प्रदेश में ऐसी नौबत, या किसी और नुकसान की नौबत कैसे टालना है।
-सुनील कुमार 

(Daily Chhattisgarh)