दो बालिकागृह बलात्कार और दो स्टिंग ऑपरेशन, अदालत करे कार्रवाई

संपादकीय
7 अगस्त 2018


हिंदुस्तान का हाल बड़ा बेहाल दिख रहा है। बिहार के बाद उत्तरप्रदेश में एक बालिकागृह की बच्चियों को संगठित तरीके से वेश्यावृत्ति में लगाने और उन पर बलात्कार करवाने में एक पूरा परिवार गिरफ्तार हो गया है। और बिहार के हाल पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है जहां पर एक मंत्री का पति बालिकागृह बलात्कार के आरोपों में घिरा हुआ है, और मंत्री को हटाया तक नहीं गया है। लेकिन ये खबरें तो पिछले कुछ दिनों से चली ही आ रही हैं, पिछले चौबीस घंटों में दो और खबरें आई हैं जो दिल को और दहलाती हैं। दो अलग-अलग टीवी समाचार चैनलों ने उत्तरप्रदेश में अलग-अलग स्टिंग ऑपरेशन किए हैं और इनसे राज्य के योगीराज का हाल पता लगता है। एक स्टिंग में वे हत्यारे खुलकर अपना गुनाह कुबूल कर रहे हैं, और बता रहे हैं कि किस तरह उन्होंने एक बुजुर्ग मुस्लिम को पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि उस पर उन्हें गो-हत्या का शक था। वे अपनी इस हत्या पर खूब गर्व जताते हुए खुफिया कैमरे पर ऐसी और भी हिंसा का दावा कर रहे हैं। दूसरी तरफ एक और चैनल के कैमरों पर ऐसे पुलिसवाले कैद हुए हैं जो कि किसी बेकसूर की मुठभेड़-हत्या करने के लिए कुछ लाख का सौदा कर रहे हैं। इस मामले में जाहिर तौर पर जो दिख रहा है उसे देखते हुए कुछ पुलिसवालों को निलंबित भी किया गया है।
अब सवाल यह उठता है कि देश के दो सबसे बड़े राज्य, उत्तर भारत के पहले से जुर्म और अराजकता के लिए चर्चित दो राज्य अगर लगातार ऐसे सुबूत सामने रख रहे हैं कि सत्ता बलात्कार में शामिल है, और ठेके पर कत्ल करने में भी, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या यही 21वीं सदी का लोकतंत्र है? आज इस वक्त संसद में इन तमाम घटनाओं पर लोग फिक्र जाहिर कर रहे हैं, और बिहार के बालिकागृह बलात्कार कांड पर सुप्रीम कोर्ट नाराजगी जाहिर कर रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब ऐसे दो-दो स्टिंग ऑपरेशन सामने आ गए हैं तो उत्तरप्रदेश का हाईकोर्ट या देश का सुप्रीम कोर्ट इन सुबूतों को बुलाकर इन राज्यों की पुलिस को कटघरे में खड़ा क्यों नहीं करते? ये दोनों ही मामले बताते हैं कि या तो मुजरिमों के सिर पर पुलिस का हाथ है, या फिर पुलिस खुद ही मुजरिम है। देश की जनता के सामने मीडिया के मार्फत खुलकर यह बात कई बार आई है कि योगीराज में जितने बड़े पैमाने पर लोगों को मुजरिम बताकर जिस तरह उनकी मुठभेड़-हत्या की जा रही है, वह जायज नहीं है, और उसमें बेकसूर लोग भी मारे जा रहे हैं। किसी ईमानदार और परिपक्व लोकतंत्र में मुजरिमों को डराने के लिए बेकसूरों का कत्ल नहीं किया जाता, जो कि उत्तरप्रदेश की पुलिस जाहिर तौर पर करते दिख रही है, और वह बाजार में भाड़े के हत्यारे की तरह उपलब्ध भी है। 
इन दोनों राज्यों का यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक इसलिए है कि इन दोनों राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं जो कि केंद्र में भी है, और केंद्र इन पर कोई कड़ी कार्रवाई तो कर नहीं सकता, इनके हाल पर कोई कड़ी बात भी नहीं कह सकता। ऐसे में अगर अदालत भी खुद होकर दखल नहीं देगी, तो इस देश की बच्चियों के कल्याण के नाम पर लगने वाले सारे राजनीतिक नारों की बेईमानी इसी तरह जारी रहेगी। जब सरकारों की नीयत मुजरिमों को बचाने की दिखती है, या कि सरकार से जुड़े लोग, सरकार से अनुदान पाने वाले लोग बच्चियों के ऐसे थोक के बलात्कार में लगे रहते हैं, और उसके सुबूत भी सामने आ जाते हैं, तो हमारा ख्याल है कि अदालत को सीधे दखल देना चाहिए, और ऐसी राज्य सरकारों के हाथों से सारी जांच ले लेनी चाहिए। जिन सरकारों को दर्जनों बच्चियों की देह बेचने के बाद भी आरोपियों पर कार्रवाई की जरूरत नहीं लगती है, उन सरकारों से किसी ईमानदार जांच की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। (Daily Chhattisgarh)

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