पुलिस को हत्यारा बनने से एकाएक नहीं रोक सकते..

संपादकीय
30 सितंबर 2018


उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में देर रात पुलिस ने एक कार रोकी, और कार चला रहे एक निजी कंपनी के अफसर के साथ एक महिला सहकर्मी थी जो कि कंपनी के कार्यक्रम से लौट रहे थे। सुनसान रात में कार रोकना ठीक नहीं लगा और कार आगे बढ़ा दी तो वहां तैनात पुलिस ने इस आदमी को गोली मार दी। अब इस हत्या के बाद पुलिस कार्रवाई कर रही है, सिपाही गिरफ्तार और बर्खास्त कर लिया गया है, और राज्य सरकार शर्मिंदगी जाहिर कर रही है। लेकिन पूरी की पूरी सरकार शर्मिंदा नहीं है, मारा गया आदमी ब्राम्हण था, और उत्तरप्रदेश के एक ब्राम्हण मंत्री ने बयान दिया है कि पिछली सपा सरकार के समय एक जाति के लोग भर्ती किए गए थे, और उसी का नतीजा है कि वैसे सिपाही ने यह हत्या की है। इस बयान से परे दर्ज हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश में योगी सरकार आने के बाद से पुलिस को अपराधों से जुड़े हुए या ऐसे मामलों में फंसे हुए लोगों की मुठभेड़-हत्या करने की जो खुली छूट दी गई है उसमें अब तक हजार लोग मारे जा चुके हैं। जाहिर है कि ऐसे माहौल में पुलिस के हाथ की बंदूक-पिस्तौल एक बड़ा ग्लैमर बन जाती है, और उस ताकत का मौके-बेमौके, जायज-नाजायज इस्तेमाल होता है। 
ऐसा अगर आतंकी हमलों से घिरे हुए कश्मीर में होता तो भी समझ आता,ऐसा अगर आतंक के दिनों में पंजाब में होता, तो भी समझ आता। लेकिन उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ जैसे आधुनिक शहर के बीच एक साधारण कार में एक महिला के साथ जाते हुए अकेले आदमी को जिस अंदाज में गोली मारी गई है, वह नौबत का तकाजा नहीं था, वह पुलिस में भर दी गई हिंसा का नतीजा था। इस खबर पर चल रही बहस में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि चूंकि यह आदमी एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का उच्च आयवर्ग का शहरी सवर्ण व्यक्ति है, इसलिए उसकी हत्या पर देश का मीडिया उबल पड़ा है, वरना किसी दलित, किसी अल्पसंख्यक, गरीब और ग्रामीण की ऐसी हत्या तो पुलिस के हाथों आए दिन कहीं न कहीं होती रहती है। कुछ लोगों ने योगी सरकार पर यह तंज भी कसा है कि यह आदमी तो एक हिन्दू और ब्राम्हण का, उसकी इस तरह मुठभेड़-हत्या क्यों करवाई गई है? 
दरअसल पुलिस का अपना मिजाज तो कानून के भीतर रहकर काम करने का रहता है क्योंकि उसे कानून तोडऩे के खतरे अच्छी तरह मालूम रहते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में जहां पर राज्य सरकारें पुलिस का इतना बुरा राजनीतिकरण कर चुकी हैं कि पुलिस अपने को सत्तारूढ़ पार्टी का एक हिस्सा मानकर एक वफादार ताबेदार की तरह काम करने लगती है, और अपनी कानूनी जिम्मेदारियों को तो भूल ही जाती है, कानून को भी भूल जाती है। जब पुलिस के जिम्मे नेताओं के जूते उठाकर चलना लगा दिया जाता है, जहां नेताओं को गोद में और पीठ पर, और कंधों पर ढोकर पानी पार कराना होने लगता है, जहां बंगलों में तैनात पुलिस बाबा साहब और बेबी साहिबा को गोद में घुमाने से लेकर पिल्लों को पखाने के लिए घुमाने तक का काम करने में लगा दी जाती है, वहां पुलिस अपनी जिम्मेदारी का एहसास खो बैठती है, और उसका अकेला मकसद बच जाता है, सत्ता को खुश रखना। और इसी अकेले मकसद को पूरा करके पुलिस को यह लगने लगता है कि वह महफूज है। सुरक्षा की यही भावना पुलिस से गलत काम करवाने लगती है जो कि बढ़ते-बढ़ते लखनऊ की इस तरह की शहरी-हत्या तक पहुंच जाती है। 
भारत में पुलिस के बेजा इस्तेमाल को अगर खत्म नहीं किया गया, और अगर उसे सत्ता का इसी तरह चापलूस बनाकर रखा गया, तो देश के लोगों को सुरक्षा और जांच की इस एजेंसी का नफा कम होगा, और नुकसान अधिक होगा, और ऐसा होने भी लगा है, हो भी रहा है। पुलिस का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्ट बना दिया गया है क्योंकि उसके तबादले में, किसी कमाऊ कुर्सी में उसकी पोस्टिंग में मोटा पैसा लिया जाने लगा है, और बाद में भी उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह राजनीतिक कामों में खर्च में भी हिस्सा बंटाए, और सत्तारूढ़ नेताओं-अफसरों को पैसा भी दे। देश में पुलिस सुधार के लिए बने आयोगों और कमेटियों की सिफारिशें खा-खाकर दीमकों की कई पीढिय़ां तंदुरूस्त हो चुकी हैं, बस पुलिस के कामकाज की सेहत चौपट हो चुकी है। इसे नेताओं के कब्जे से बाहर निकालना बहुत जरूरी है, और जिस तरह देश में चुनाव आयोग नाम की एक संवैधानिक संस्था सरकार के काबू से बाहर रहकर काम कर रही है, उसी तरह ही एक स्वायत्त संस्था पुलिस के तबादला-पोस्टिंग, नियुक्ति-पदोन्नति के लिए भी होनी चाहिए, और ऐसा बुनियादी सुधार हुए बिना बात बनने वाली नहीं है।
-सुनील कुमार

(Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 30 सितंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 30 सितंबर

दाल पकाने का जिम्मा महज लड़कियों का क्यों होना चाहिए?

संपादकीय
29 सितंबर 2018


मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल गुजरात की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, और अब वे मध्यप्रदेश में लड़कियों को संस्कृति की अपनी एक खास सोच के मुताबिक ढालने पर आमादा हैं। उनके मातहत आने वाले भोपाल के एक विश्वविद्यालय  ने अभी आदर्श बहू तैयार करने का एक कोर्स शुरू करने की घोषणा की है, और अब आनंदबेन ने एक हॉस्टल की लड़कियों के बीच कहा है कि वे बाल न कटवाएं क्योंकि लंबे बाल गर्व की बात है। इसके साथ-साथ उन्होंने कहा कि आप लोग दाल बनाना सीख लो, नहीं तो जब शादी होगी तो सास के साथ पहली लड़ाई खाने को लेकर ही होगी। इसके पहले भी आनंदीबेन विवादित बयान देती रही हैं, और उन्होंने दो महीने पहले यह कहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शादी नहीं हुई है, इसके अलावा एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से वे भाजपा के लोगों को चुनाव जीतने के तरीके सिखाते हुए वीडियो पर कैद हुई थीं, और एक राजनेता के रूप में काम करना जारी रखा था। 
अब एक ही दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने विवाहेत्तर संबंधों के मामले में महिला के बराबरी के हक को जायज माना है, और डेढ़ सौ साल का पुराना अंग्रेजों का कानून खारिज किया है, लेकिन देश में लड़कियों और महिलाओं को चूल्हे-चौके तक बांधकर रखने की मर्दाना सोच इस तरह हावी है कि राजनीति में सबसे ऊंचे ओहदों पर पहुंची हुई महिलाएं भी उसी सोच में बंधकर, उसी की गुलाम होकर रह जाती हैं। आनंदीबेन पटेल जिस गुजरात से आती हैं, वहां लड़कियां आधुनिक फैशन के लिए जानी जाती हैं। वहां के साल के सबसे बड़े धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन, नवरात्रि के गरबे में लड़कियों की फैशन देखते ही बनती है, और उनकी उन्मुक्त जीवनशैली उन्हें लड़कों की बराबरी का हक भी देती है। यह बात गुजरात में कोई नई नहीं है, खासी पुरानी है, और नवरात्रि के दिनों में वहां लड़के-लड़कियों के उन्मुक्त मेल को लेकर कई तरह की खबरें हमेशा से मीडिया में आती रही हैं, जो कि आनंदीबेन पटेल की सोच से जरा भी मेल नहीं खाती। 
आज वक्त आ गया है कि जिस गुजरात-मूल की सुनीता विलियम्स अमरीका की अंतरिक्ष यात्री होकर एक बार अंतरिक्ष हो आई है, वहां सबसे लंबे समय तक रहने का एक रिकॉर्ड भी उन्होंने बनाया है, और अब वे फिर अंतरिक्ष जाने वाली हैं। एक तरफ तो गुजराती मूल की लड़कियां, हिन्दुस्तान की बहुत सी लड़कियां आसमान को चीरकर अंतरिक्ष जा रही हैं, दूसरी तरफ चूल्हा-चौका सम्हालने का जिम्मा, और सास की प्रताडऩा सहने का जिम्मा अगर इक्कीसवीं सदी में भी महज लड़कियों पर थोपा जाएगा, तो यह देश की संवैधानिक सोच के भी खिलाफ है। सार्वजनिक पदों पर बैठे हुए लोगों को ऐसी तमाम सोच लड़कों और पुरूषों पर लादनी चाहिए कि वे महिलाओं का कैसे सम्मान करें, कैसे वे दाल बनाना सीखें ताकि गृहिणी अगर बाहर जाए तो वे काम सम्हाल सकें, घर सम्हाल सकें, बच्चों को सम्हाल सकें, चूल्हा-चौका देख सकें। आज भी अगर एक आदर्श लड़की या आदर्श नारी बनाने के लिए किसी लड़की को आदर्श बहू और आदर्श नौकरानी बनाना जारी रहेगा, तो समाज के भीतर लड़कियों के लिए एक नीची सोच आखिर कब खत्म होगी, कैसे खत्म होगी? 
भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह की जड़ें दिल-दिमाग में न सिर्फ गहरे तक गई हुई हैं, बल्कि उन्होंने सोच को इस तरह जकड़ लिया है जिस तरह की कैंसर की जड़ें शरीर के किसी हिस्से को जकड़ लेती हैं। संवैधानिक पदों पर, सार्वजनिक और सरकारी पदों पर बैठे हुए लोग अपनी खुद की पीढ़ी के वक्त प्रचलित सोच से बाहर आने को तैयार नहीं हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। आज जब आनंदीबेन पटेल के ही गुजरात से लाखों लोग दुनिया के दूसरे देशों में जाकर वहां की संस्कृति में घुल मिलकर रह रहे हैं, और वहां से वे गुजरात की अर्थव्यवस्था को मजबूत भी कर रहे हैं, तो गुजरात के नेताओं को बाकी दुनिया के आगे बढऩे के तरीकों को भी सोचना होगा, जिसमें सबसे पहली जरूरत इंसानों की आधी आबादी, महिलाओं को बराबरी का दर्जा देकर, उन्हें संभावनाओं के रास्ते पर बराबरी से आगे बढ़ाकर दुनिया का भला करने की है। गुजरात के लोगों को तो गरबा में डांडिया-नृत्य करते हुए युवक-युवतियों को देखकर यह भी समझना चाहिए कि वे बराबरी के हक से, बराबरी से ही ऐसा खूबसूरत नृत्य कर सकते हैं, किसी युवती को कमजोर और नीचा मानकर केवल युवक ऐसा नहीं कर सकते।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 सितंबर

सबरीमाला में महिलाओं की जीत मंजिल की ओर बस एक कदम...

संपादकीय
28 सितंबर 2018


केरल के सबरीमाला मंदिर में आठ सौ बरस से यह रोक चली आ रही है कि दस बरस से पचास बरस तक उम्र की महिलाएं वहां के भगवान अयप्पा के दर्शन करने नहीं जा सकतीं, क्योंकि अयप्पा ब्रम्हचारी थे। आज सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला देते हुए इस रोक को गैरकानूनी करार दिया, और यह फैसला अगर लागू होता है तो हर उम्र की महिलाएं मंदिर में प्रवेश करके देवदर्शन कर सकेंगी। इस मामले में केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा था कि वह मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की हिमायती है। कट्टर और धर्मांध लोगों ने मंदिर के मामले में अदालती दखल को गलत बताते हुए कुछ हफ्ते पहले केरल में आई विनाशकारी बाढ़ को मंदिर में महिलाओं के दाखिले से जोड़ते हुए बयान दिए थे कि ईश्वर की नाराजगी से ऐसी विनाशकारी बाढ़ आई है। 
दुनिया भर में अलग-अलग धर्मों में महिलाओं के साथ भेदभाव एक बहुत आम बात है। गुरुद्वारों में पुरूषों को ही ग्रंथी बनाया जाता है, और ईसाईयों में आदमी ही बिशप और पोप बनते हैं। हिन्दुओं में कोई महिला शंकराचार्य नहीं बनाई जाती, और यहूदियों के धार्मिक ढांचे में महिला की जगह नहीं है। कुछ ऐसा ही हाल बाकी धर्मों में भी है, और शायद ही कोई धर्म ऐसा हो जिसमें महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलता हो। लेकिन आस्थावान लोगों के बीच धर्म की एक जगह है, और उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे बेइंसाफी के लिए बनाए गए इस हथियार को पूरी तरह खारिज ही कर दें, और महिलाओं के लिए अलग ईश्वर गढ़ लें, या कि नास्तिक बन जाएं। आज दिलचस्प बात यह है कि हिन्दू धर्म के भीतर जो लोग देवियों की पूजा करते थकते नहीं हैं, उनको भी पत्थर और मिट्टी की प्रतिमा वाली देवी ही चाहिए, उनको भी जीती जागती और सांस लेती देवी से परहेज है। 
लोगों की आस्था हमारे सुझाव से बदलने वाली नहीं है, इसलिए धर्म के ढांचे के भीतर गैरबराबरी के रीति-रिवाज बदलने के लिए सामाजिक और कानूनी दोनों किस्म का संघर्ष जारी रखना पड़ेगा। अदालत की लड़ाई के बाद सबरीमाला में महिलाओं को दाखिले का जो हक मिल रहा है, वह महिलाओं के हक की कामयाबी तो है, लेकिन वह धर्म के बेइंसाफ ढांचे के भीतर ही है। यह धर्म ही है जिसके भीतर अभी आधी सदी पहले तक राजस्थान में पति को खोने वाली महिला को उसके साथ चिता में सती हो जाने का बढ़ावा दिया जाता था, और हाईकोर्ट के एक जज भी ऐसी सतीप्रथा के हिमायती थे। बहुत से मामलों में आज भी लोग अपने धर्म को कानून से ऊपर मानते हैं, और यह महज धार्मिक मुद्दा नहीं है, अयोध्या और तीन तलाक जैसे मुद्दों को लेकर राजनीतिक दल भी अपने वोटरों के बहुसंख्यक तबके के धार्मिक रीति-रिवाज को देश के संविधान से ऊपर मानते हैं, लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं। 
धार्मिक रीति-रिवाज के नाम पर ऐसे भक्त अपने ईश्वर को भी कमजोर साबित करने में पीछे नहीं रहते। अगर वे अपने ईश्वर को ब्रम्हचारी मानते हैं, तो किसी लड़की या महिला के वहां जाने से क्या उनके ईश्वर के इरादों की मजबूती कमजोर हो सकती है? अपने ईश्वर को ऐसा कमजोर साबित करते हुए लोगों की इस कोशिश का मतलब यही रहता है कि ईश्वर की धारणा की आड़ में महिला को बराबरी के हकों से दूर रखा जाए। फिर यह कब्रिस्तान हो, मस्जिद हो, या किसी मंदिर का गर्भगृह हो, महिला को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखना धर्म का एक अनिवार्य पहलू है जो कि धर्म के बेइंसाफ मिजाज की कई बातों में से एक है। जब तक महिलाओं के बीच धार्मिक आस्था बनी रहेगी, उन्हें इस गैरबराबरी के खिलाफ लडऩा होगा, और इसे महज महिलाओं की लड़ाई मानना ठीक नहीं होगा, यह समाज में इंसाफ चाहने वाले सभी लोगों की लड़ाई रहना चाहिए। 
(Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 28 सितंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 28 सितंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 27 सितंबर

सुप्रीम कोर्ट से इस रफ्तार से फैसले कि वह चुनाव में खड़े होने जा रहा है, और लागू होने जा रही है आचार-संहिता...

संपादकीय
27 सितंबर 2018


हिन्दुस्तान में अदालत की धीमी रफ्तार को लेकर दशकों पहले से एक लाईन कही जाती है, जस्टिस डिलेय्ड इज जस्टिस डिनाईड, मतलब यह कि वक्त पे जो न मिला, वह इंसाफ नहीं होता, बेइंसाफी होती है। लेकिन अभी पिछले कुछ दिनों से भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जिस रफ्तार से बड़े-बड़े मामलों में फैसले सुनाए हैं, वे देखने लायक हैं। और अदालत की बड़ी-बड़ी, पांच या सात जजों की बेंच ऐसे फैसले सुना रही है जो कि आधी-एक सदी पहले आ जाने चाहिए थे, लेकिन देर होते-होते, खुद अदालत के भीतर पुनर्विचार करते हुए ये फैसले अब जाकर आ रहे हैं। और यह बात भी सुनने में कुछ अजीब लग सकती है कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा अगले कुछ दिनों में रिटायर हो रहे हैं, और उनके जाने के पहले बहुत से ऐसे ऐतिहासिक फैसले होने जा रहे हैं जिनमें वे बेंच पर थे। 
लोगों की जिंदगी को बहुत व्यापक रूप से प्रभावित करने वाले इन फैसलों में भारतीय सुप्रीम कोर्ट का एक उदारवादी और प्रगतिशील चेहरा दिखाई पड़ रहा है। पहले उसने समलैंगिकता को जुर्म करार देने वाला अंग्रेजों के वक्त का कानून खत्म किया, और अब भारत के बालिगों को अपनी पसंद के सेक्स-संबंध रखने की आजादी है, और करोड़ों लोग अब अपराधबोध और जुर्म के दायरे से बाहर आ गए हैं। इसके कुछ बरस पहले ही इसी सुप्रीम कोर्ट की एक अलग बेंच ने समलैंगिकता-विरोधी कानून को जायज ठहराया था, और हमने उस वक्त भी उसके खिलाफ कड़ाई से लिखा था, और अभी यह फैसला आने के बाद फिर उसकी याद दिलाते हुए लिखा था। अब दूसरे तीन फैसले कल आए जिनमें एक तो सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी दर्जे के लोगों को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए इन तबकों के अधिकारों को स्थापित करने वाला फैसला रहा। दूसरा फैसला आधार कार्ड को लाठी के जोर पर आम हिन्दुस्तानी की जिंदगी के हर पहलू पर थोप देने के सरकारी इरादे के खिलाफ रहा, और सुप्रीम कोर्ट ने तीन बड़े मुद्दों पर आधार की अनिवार्यता खत्म की, और अब स्कूल-कॉलेज में दाखिले के लिए, बैंक खातों के लिए, और फोन कनेक्शन के लिए आधार की अनिवार्यता नहीं रह गई, और न ही किसी सफर के लिए यह जरूरी रह गया। इसके साथ-साथ इस फैसले की एक बहुत बड़ी बात यह भी रही कि कोई निजी कंपनी लोगों का आधार-डेटा रख भी नहीं सकती, और उसे हटाने-मिटाने का आदेश भी हो गया है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम आधार की ऐसी अनिवार्यता के खिलाफ लगातार लिखते आए थे, और इसे आम जनता की निजता को खत्म करने का सरकारी रूख बताया था। एक और फैसला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के जीवंत प्रसारण को लेकर आया है, और हम लंबे समय से इस बात की वकालत कर रहे थे। जब संसद और विधानसभाओं की कार्रवाई का सीधा प्रसारण हो सकता है, तो बड़ी अदालतों के ऐसे प्रसारण से जजों के उस रूख पर भी काबू लगेगा जिससे वे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर भी मुकदमों की सुनवाई में कई तरह की जुबानी जमाखर्च करते हैं। 
सुप्रीम कोर्ट ने कल एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर को लागू करने की बात भी कही है और सरकार को यह साफ कर दिया है कि संविधान पीठ क्रीमीलेयर को दिए गए आरक्षण को रद्द करने में सक्षम है। अदालत ने कहा है कि यह नहीं होने दिया जा सकता कि किसी वर्ग में क्रीमीलेयर ही सभी प्रमुख सरकारी नौकरियां ले जाए, और अपने बाकी तबके को वैसा ही पिछड़ा छोड़ दे, जैसा कि पिछड़ा वह हमेशा से रहते आया है। हम इस मुद्दे पर इसी जगह लगातार यह बात लिखते आ रहे थे कि एससी-एसटी तबकों के भीतर भी क्रीमीलेयर पर आरक्षण का फायदा पाने से रोक लगानी चाहिए, क्योंकि आरक्षण का सारा फायदा इस तबके के भीतर का यह मलाईदार तबका खा जाता है। 
अब आज सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला आया है, ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए डेढ़ सौ बरस से अधिक पुराने एडल्टरी कानून को असंवैधानिक करार दिया है। शादी से बाहर संबंध को अपराध बनाने वाली धारा 497 के खिलाफ लगी याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि विवाहेत्तर संबंधों को शादी से अलग होने, तलाक का आधार बनाया जा सकता है लेकिन इसे अपराध नहीं माना जा सकता।
धारा 497 केवल उस पुरुष को अपराधी मानती है, जिसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हैं, उस महिला को इसमें अपराधी नहीं माना जाता, जबकि आदमी को पांच साल तक जेल का सामना करना पड़ता है। कोई पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, लेकिन उसके पति की सहमति नहीं लेता है, तो उसे पांच साल तक के जेल की सजा हो सकती है। लेकिन जब पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाता है, तो उसे अपने पत्नी की सहमति की कोई जरूरत नहीं है। इस कानून को औरत-मर्द के बीच भेदभाव वाला माना गया, और इसे खत्म कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं की इच्छा, अधिकार, और सम्मान को सर्वोच्च माना जाना चाहिए, और उन्हें सेक्स की अपनी पसंद से रोका नहीं जा सकता। पिछले कुछ फैसलों से अलग, इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के सारे पांच जज एकमत थे। फैसले में कहा कि किसी महिला को भी शादी के बाद सेक्स की अपनी पसंद से रोका नहीं जा सकता, और उसके बाद उसका पति चाहे तो वह इसे तलाक का आधार बना सकता है। देश में अब तक चले आ रहा कानून महिला को ऐसी इजाजत नहीं देता था, और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अदालत से कहा था कि विवाहेत्तर संबंध से परिवार और विवाह तबाह होते हैं। मौजूदा कानून यह कहता था कि शादीशुदा औरत पति की इजाजत से किसी गैर मर्द से संबंध बना सकती है, जबकि पति पर पत्नी से ऐसी किसी इजाजत की शर्त थी। अब ऐसे सेक्स-संबंधों के मामले में पति और पत्नी दोनों को अधिकार बराबर मान लिए गए हैं। 
देश की तकरीबन पूरी आबादी को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाले ऐसे ऐतिहासिक फैसलों के इस एक महीने में आने से ऐसा लग रहा है कि मानो सुप्रीम कोर्ट किसी चुनाव में खड़ा होने जा रहा है, और इस महीने की आखिरी तारीख पर आचार संहिता लागू होने वाली है। देर आयद, दुरुस्त आयद। आधी-पौन सदी पहले अंग्रेजों का जो पखाना हिन्दुस्तानी सिरों से उतार दिया जाना चाहिए था, वह काम अब जाकर हो रहा है जब अंग्रेज अपने खुद के देश में ऐसे कानूनों को खत्म करने का शताब्दी वर्ष मना रहे हैं। फिलहाल हम सुप्रीम कोर्ट से लगातार आ रहे ऐसे उदारवादी और प्रगतिशील फैसलों को देश के और लोकतंत्र के भलाई का मानते हैं, और इनसे जनता को एक नई लोकतांत्रिक आजादी मिल रही है। इससे यह बात भी साबित हो रही है कि लोगों के चुने हुए सांसदों की चुनी हुई बहुमत की सरकार, और बाकी की संसद मिलकर भी अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह चुरा रहे थे, और उनके हिस्से का काम जजों को करना पड़ा। (Daily Chhattisgarh)

रास्ता चौड़ा करने के नाम पर हमला महज गरीबों पर क्यों?

संपादकीय
26 सितंबर 2018


एक बार फिर छत्तीसगढ़ के कई शहरों में जगह-जगह सड़कों के किनारे से अवैध कब्जे हटाने के नाम पर अभियान चल रहा है, उसका पहला और अकेला हमला उन ठेले-खोमचे वालों पर हो रहा है जिनका पूरा कारोबार महज एक ठेले जितनी जगह पर चल रहा था, और अब मशीनों से उन ठेलों को ले जाकर उनकी रोजी-रोटी खत्म कर दी गई है। दूसरी तरफ बाजार में सड़कों के किनारे बड़ी-बड़ी दुकानों का सामान दूर तक सजाकर रखा जाता है, और ऐसा करने वाले वे कारोबारी हैं जिनके पास खासी बड़ी जगह अपने धंधे के लिए है। इसके बावजूद वे बाहर इतनी जगह घेरकर रखते हैं जितने पर ठेले-खोमचे वाले अपना पूरा रोजगार चलाते हैं। दरअसल यह सोच एक ऐसी अफसरशाही है जो कि जमीन से बिल्कुल ही जुड़ी हुई नहीं है। और जो निर्वाचित नेता म्युनिसिपल में पार्षद हैं, या तो उनकी कुछ चलती नहीं है, या उन्हें भी अब धीरे-धीरे करके, महंगे चुनाव लड़कर, महंगी गाडिय़ों में चलकर बड़े दुकानदारों की ही फिक्र बाकी रह गई है।
एक तरफ तो देश में लोगों को स्वरोजगार के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है, और दूसरी तरफ जो गरीब जरा सी जगह पर बिना किसी कब्जे के रोज का कारोबार करते हैं, उनको बेदखल किया जा रहा है, बिना किसी दूसरे इंतजाम के। अफसरों की यह सोच भयानक है, और दुनिया के किसी भी सभ्य और विकसित देश में म्युनिसिपल अपने स्थानीय लोगों को इस तरह से कुचलते हुए नहीं चलती हैं। सड़कों के किनारे से कब्जे हटाने की शुरूआत जब करनी हो, तो सबसे पहले उनके कब्जे हटाने चाहिए जिनके पास खुद की बाकी जगह है, लेकिन जिनकी नीयत अपने शटर के भीतर तक सीमित नहीं रह पाती। शहर के हर बड़े बाजार, हर व्यस्त सड़क पर बड़ी दुकानों के ऐसे कब्जे आम बात हैं, और उन पर पिछले बरसों में कोई जुर्माना भी हुआ हो, ऐसा पढऩे में नहीं आता।
इसी शहर में बाजार में ऐसे बड़े-बड़े अवैध निर्माण धड़ल्ले से हुए हैं जिनमें सड़क किनारे की जमीन पर कई मंजिलों की इमारत खड़ी कर दी गई हैं। म्युनिसिपल इनको आखिरी नोटिस तक दे चुकी है, लेकिन इसके बाद कार्रवाई उन पर कुछ नहीं होती। ऐसे में रोज कमाकर खाने वाले करीब ठेले-खोमचे वालों पर म्युनिसिपल की मशीनों की ऐसी फौलादी कार्रवाई पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और जनविरोधी है। यह नौबत स्थानीय शासन में निर्वाचित लोगों की भूमिका खत्म हो जाने का एक बड़ा सुबूत भी है चाहे उसे अफसर खत्म कर रहे हों, चाहे उसे निर्वाचित प्रतिनिधि खुद ही छोड़कर फायदे के दूसरे कामों में लग रहे हों। जनकल्याणकारी सरकार में किसी कमाते-खाते मेहनतकश गरीब को बिना दूसरे इंतजाम के बेदखल नहीं करना चाहिए, और बेदखली का सिलसिला उन बड़े लोगों से शुरू होना चाहिए जिनकी दुकानों के पुतले और सामान सड़कों को दूर तक घेरकर रखते हैं।
ट्रैफिक को सुधारना या सड़कों को चौड़ा खाली रखना दोनों ही अच्छी बातें हैं, लेकिन यह काम बड़े लोगों से शुरू होना चाहिए, उन गरीब लोगों से नहीं जिनकी कमाई का पूरा जरिया ही सरकारी ट्रकों पर लादकर ले जाकर फेंक दिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि राज्य में प्रदेश स्तर के मंत्रियों या सांसद-विधायकों में भी गरीबों के लिए दर्द अब बाकी नहीं रह गया है, वरना ऐसी बेदखली की तस्वीरें देखकर सरकार लोगों का रोजगार छीनने से परहेज करती। जिस किसी शहर में महज गरीबों को निशाना बनाकर अवैध कब्जा हटाने की बात कही जा रही है, उसका जमकर विरोध होना चाहिए। लोगों को बेरोजगार बनाकर कोई शहर सुविधा-संपन्न या सुंदर नहीं हो सकता। शहर को स्मार्ट बनाने के लिए लोगों की रोजी-रोटी छीनना एक कमअक्ली का काम है, और गरीब जनता आने वाले किसी भी चुनाव में जनप्रतिनिधियों से इसका हिसाब चुकता जरूर करेगी।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 सितंबर

सेक्स-सीडी क्या महज राजनीति का सामान है, या इससे परे इसके दूसरे पहलुओं पर भी सोचा जाए?

संपादकीय
25 सितंबर 2018


पिछले करीब एक बरस से छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच तोहमतों की एक उपजाऊ जमीन बना हुआ सेक्स-सीडी कांड एक किनारे तो पहुंचा है, और सीबीआई ने कल अदालत में इस मामले में चार्जशीट पेश कर दी है। कल के नाटकीय अदालती घटनाक्रम के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल खुद होकर जेल चले गए हैं क्योंकि सीबीआई ने उन्हें आरोपी बनाया है, और अदालती सुझाव के बावजूद उन्होंने जमानत लेने से मना कर दिया, और जेल जाना पसंद किया। नतीजा यह है कि आज प्रदेश में भाजपा के हाथ महज बयान देने का मौका हाथ लगा है, और कांग्रेस पूरे प्रदेश में भूपेश बघेल को आरोपी बनाने के खिलाफ, उनके जेल जाने के मुद्दे पर जेल भरो आंदोलन चला रही है। इस राजनीति के बीच इस मामले का गुण-दोष दब गया है, और उस पर कोई चर्चा भी नहीं की जा रही है। 
सबसे पहले इस मामले में अब तक सीबीआई द्वारा जांची-परखी और सामने रखी बातों पर सोचना जरूरी है कि इस सेक्स-सीडी कांड के गुनहगार कौन है, और किसका क्या गुनाह है। अदालत में पेश घटनाक्रम के मुताबिक प्रदेश में भाजपा के एक कार्यकारिणी सदस्य, और कई पदों पर रहे हुए कैलाश मुरारका ने पौन करोड़ जैसी मोटी रकम खर्च करके यह सीडी बनवाई थी, और फिर इसे फैलाने के लिए वे भूपेश बघेल, और प्रदेश कांग्रेस के सलाहकार, भूतपूर्व पत्रकार विनोद वर्मा से मिलकर साजिश कर रहे थे। सीबीआई ने भूपेश और विनोद को इस सीडी की कापियां बनवाने और बांटने का दोषी पाया है, लेकिन एक साधारण सेक्स-फिल्म पर एक मंत्री का चेहरा लगाकर फर्जी फिल्म बनवाने की तोहमत मोटे तौर पर भाजपा नेता कैलाश मुरारका पर ही आई है। इसलिए कायदे की बात तो यह है कि इस पूरे सिलसिले की बुनियाद में जिस तरह भाजपा का एक मझले दर्जे का जाना पहचाना नेता शामिल पाया गया है, उसकी वजह से भाजपा के हाथ से यह राजनीतिक तुरूप का पत्ता छिन चुका है। लेकिन बयान देने से कौन किसे रोक सकता है। अखबार के एक पन्ने पर अगल-बगल छपी हुई दो सुर्खियां देखने लायक है जिनमेें से एक कहती है कि फर्जी-सेक्स फिल्म भाजपा नेता कैलाश मुरारका ने 75 लाख खर्च करके बनवाई, और दूसरी हैडिंग कहती है कि प्रदेश भाजपाध्यक्ष धरम कौशिक ने राहुल से कहा कि भूपेश को बर्खास्त करें। ये दोनों बातें हैं तो समाचार के पन्ने पर समाचार की तरह, लेकिन लगती हैं एक लतीफे की तरह। 
हम सीबीआई की जांच को लेकर कोई अटकलबाजी करना नहीं चाहते क्योंकि यह देश में सामान्य अपराधों की असामान्य गहराई से जांच करने वाली सबसे बड़ी एजेंसी है, और इस एजेंसी से जांच करवाने की मांग खुद भूपेश बघेल ने की थी। अगर सीबीआई केन्द्र पर सत्तारूढ़ भाजपा के दबाव में यह जांच करती होती, तो शायद भाजपा के एक नेता के इस फिल्म को बनवाने की बात को दबा सकती थी, या हल्का कर सकती थी। लेकिन अगर इस जांच में एक भाजपा नेता को कुसूरवार माना गया है, और कांग्रेस के नेता को इस कुसूर को आगे बढ़ाने का कुसूरवार बताया गया है, तो पहली नजर में यह जांच राजनीतिक पक्षपात करते नहीं दिखती, और यह जांच कितनी सही हुई है, इसका आखिरी फैसला तो अदालत ही करेगी, और अगला विधानसभा चुनाव निपट जाने के खासे बाद ही यह फैसला आएगा। फिलहाल दोनों पार्टियों के बीच छत्तीसगढ़ में एक बड़ा टकराव बन गया है, लेकिन इससे परे इस मामले को देखने और समझने की जरूरत है। इसके लिए हम ठीक ग्यारह महीने पहले, विनोद वर्मा की गिरफ्तारी के बाद लिखे गए अपने संपादकीय को निकालकर देख रहे हैं, तो उसका एक प्रासंगिक हिस्सा यहां देना जरूरी है, क्योंकि उस मुद्दे पर हमारी आज भी वही सोच कायम है। 
अक्टूबर 2017 में इस सेक्स-सीडी कांड का भांडा फूटते ही हमने लिखा था-'.... अब इस मामले का एक और पहलू समझना जरूरी है जिसके बारे में हमारी अपनी मजबूत राय है। हम ऐसी किसी सेक्स-रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल के सख्त खिलाफ हैं जिसमें दो वयस्क अपनी सहमति से कुछ करते दिख रहे हैं। इस रिकॉर्डिंग को देखकर ऐसा ही लगता है, और इसका कोई भी राजनीतिक इस्तेमाल, कोई भी सार्वजनिक इस्तेमाल अपने आपमें एक गंभीर अपराध होना चाहिए। हमें छत्तीसगढ़ के किसी मंत्री के इसमें होने या न होने से कोई लेना-देना नहीं है। इसमें चूंकि कोई जुर्म होते नहीं दिख रहा है, इसलिए किसी भी आदमी और किसी भी औरत की इज्जत को खराब करने वाली ऐसी रिकॉर्डिंग अपने आपमें किसी जुर्म से ही हासिल हो सकती है, और अगर इसके लोग सरकारी पदों पर हैं, या कि सार्वजनिक जीवन में हैं, तो भी वे कोई जुर्म नहीं कर रहे हैं। राजनीति या किसी और दायरे में ऐसी सेक्स-रिकॉर्डिंग की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, और ऐसी रिकॉर्डिंग पर किसी राजनीतिक जवाब के बजाय इस पर जवाब मांगना चाहिए कि ऐसी रिकॉर्डिंग का श्रोत क्या है...'
इसके अगले दिन जब भूपेश बघेल ने इस सीडी-कांड में विनोद वर्मा की गिरफ्तारी को प्रदेश कांग्रेस का एक मुद्दा बनाकर आंदोलन की घोषणा की थी, तब हमने लिखा था-  '...ऐसे में भाजपा की सत्ता के तेरहवें बरस के अंत में तमाम दूसरे मुद्दों को छोड़कर अगर भूपेश बघेल ऐसे एक वीडियो पर इतना बड़ा दांव लगा रहे हैं, तो यह हमारे हिसाब से विपक्ष का दीवालियापन है। राज्य में भाजपा की सरकार ने अपने तीन कार्यकाल में विरोध के लायक अनगिनत मुद्दे मीडिया और विपक्ष को जुटाकर दिए हैं। इनमें से बहुत से मुद्दों पर कांग्रेस लगातार सड़क और मीडिया पर लड़ाई लड़ते भी आई है। लेकिन इस लड़ाई में ऐसे किसी वीडियो की जगह हो सकती है, ऐसा सोचना भी मुश्किल था। ऐसा वीडियो सरकार में कुछ शर्मिंदगी ला सकता है, पार्टी संगठन के भीतर थोड़ी सी शर्मिंदगी आ सकती है, लेकिन उससे परे इसका क्या कानूनी दर्जा है? और फिर कांग्रेस पार्टी के सामने अपनी खुद की अनगिनत मिसालें हैं। उसने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को ऐसे ही एक सेक्स-वीडियो के बाद प्रवक्ता पद से हटा दिया था, लेकिन कुछ महीनों के बाद उन्हें फिर वही जिम्मा दे दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के एक कामयाब वकील सिंघवी को अगर इस सेक्स-वीडियो के पीछे किसी साजिश की गंध आती, तो वे अदालत में लोगों को घसीट सकते थे, लेकिन उन्होंने इसे गुजर जाने दिया, और आज वे रोज नेशनल टीवी पर कांग्रेस की वकालत करते दिखते हैं। छत्तीसगढ़ कांग्रेस को अपने खुद के भले के लिए मुद्दों की लड़ाई लडऩी चाहिए। जिस तरह से उसने एक बेनाम-गुमनाम सेक्स-वीडियो को लेकर उसे इतना बड़ा मुद्दा बनाया है कि वह पार्टी के व्यापक हितों के खिलाफ जाएगा, और राज्य के लोकतंत्र में विपक्ष इससे कमजोर होगा। ऐसे सेक्स-वीडियो से किसी सरकार या पार्टी के लिए शर्मिंदगी तभी होती है जब वे हवा में तैरते हुए फैल जाते हैं। जब लोग इन्हें पेश करते हैं, तो ये सवाल उठते हैं कि इसमें कुछ गैरकानूनी भी है, या कि ये सामाजिक मान्यताओं के पैमानों पर महज अनैतिक कहे जाने वाले हैं? यह सोचना पाखंड से परे नहीं होगा कि लोगों का इस किस्म का कोई सेक्स जीवन नहीं होता, बहुत से लोगों का बंद कमरे के भीतर ऐसा जीवन होता है, और जुर्म करते हुए, निजता भंग करते हुए ऐसी रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल किसी भी इज्जतदार पार्टी को तब तक नहीं करना चाहिए जब तक कि इस रिकॉर्डिंग के भीतर कोई जुर्म होते न दिख रहा हो। कांग्रेस पार्टी ने छत्तीसगढ़ में इस मुद्दे पर आंदोलन की घोषणा की है, लोकतंत्र में कोई भी पार्टी किसी भी मुद्दे पर, या कि बिना मुद्दे भी, सड़कों पर उतर सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस तैश और जिद में एक गलत काम करने जा रही है, इससे पार्टी प्रदेश अध्यक्ष का कम, और बाकी पार्टी का अधिक नुकसान होगा। आखिर में यह भी सोचने की जरूरत है कि ऐसी सेक्स-सीडी में जो महिला दिख रही है, उसकी इज्जत उछालने का हक किसको मिल सकता है? पहले तो उसके निजी पलों की वीडियो रिकॉर्डिंग किसी गुमनाम ने की, और अब नामी लोग उसके वीडियो का प्रचार कर रहे हैं क्योंकि उसमें का आदमी एक मंत्री सरीखा दिखने का आरोप है। इस राजनीतिक आरोपबाजी में उस महिला की क्या गलती है जो कि उसकी वीडियो इस तरह फैलाई जा रही है? क्या नेताओं से परे आम लोगों को कोई हक नहीं हैं? भूपेश बघेल को ठंडे दिल से, और अपनी पार्टी के हित में अपनी रणनीति पर फिर से सोचना चाहिए...'।
अब आज ग्यारह महीने बाद भी इस मुद्दे पर हमारे अधिकतर तर्क वही हैं, और सार्वजनिक जीवन में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को कांग्रेस और भाजपा की चुनावी संभावनाओं पर चर्चा से परे, सार्वजनिक जीवन के मूल्यों और पहलुओं पर भी कुछ चर्चा करनी चाहिए। जहां तक कांग्रेस पार्टी के लोगों पर सीबीआई की इस चार्जशीट पर लगे हुए आरोप हैं, तो वे कम ही हुए हैं, विनोद वर्मा पर से ब्लैकमेलिंग और उगाही का आरोप हटा दिया गया है, क्या इसे सीबीआई का भाजपाप्रेम कहा जा सकता है?  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 सितंबर

घर-समाज, सरकार और साइबर-जागरूकता...

संपादकीय
24 सितंबर 2018


एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब इंटरनेट या फोन, फेसबुक से कोई धोखा न खाते हों। इनका शिकार कोई आम जनता नहीं हो रही है, इसमें  प्रोफेसर, अफसर जैसा पढ़ा लिखा तबका भी है। फेसबुक पर दोस्ती करके अश्लील तस्वीरें जुटा लेना, ब्लैकमेल करना, और महंगे गिफ्ट भेजने का झांसा देकर उन्हें छुड़ाने के लिए बैंक खातों में पैसे जमा करवाना भी रोजाना कहीं न कहीं से पुलिस के पास पहुंच रहा है। बहुत सी अधेड़ महिलाएं भी अपने घरबार की फिक्र छोड़कर इंटरनेट की ऐसी दोस्ती के फेर में पड़ रही हैं कि वे लुट भी रही हैं, और ब्लैकमेलिंग का खतरा भी झेल रही हैं। दरअसल कम्प्यूटर, फोन, और इंटरनेट जैसी सहूलियतों से लोग सोशल मीडिया पर एक ऐसी जिंदगी जीने लगे हैं जिसके खतरे का उन्हें अंदाज नहीं है। मानो वे किसी अनजाने जंगल में पहुंच गए हैं, जहां पर खाने लायक फल कौन से हैं, और जहरीले कौन से हैं इसकी परख-पहचान नहीं है, लेकिन वहां लोग खूब दुस्साहस के साथ हर फल को चख रहे हैं, फेसबुक के खाते बना रहे हैं, वॉट्सऐप पर तस्वीरें और वीडियो भेज रहे हैं, और इनमें से जहां जहर साबित होगा, उसका असर दिखने तक उससे बाहर आने का वक्त निकल चुका होगा।
आज सरकार और समाज को, और सबसे अधिक, स्कूल-कॉलेज और परिवार को बच्चों-बड़ों सभी को कम्प्यूटर-फोन, नेट-सोशल मीडिया की संभावनाओं और उसके खतरों दोनों से वाकिफ कराना चाहिए। इस काम में कम्प्यूटर और फोन कंपनियां चाहे कोई मदद न करें, क्योंकि गैरजिम्मेदार ग्राहक इंटरनेट इस्तेमाल करके कंपनियों को अधिक मुनाफा देते हैं, और खतरे से डरे-सहमे ग्राहक इन तमाम सामानों और सेवाओं का कम इस्तेमाल करेंगे, लेकिन घर-समाज और सरकार को अपनी जिम्मेदारी तुरंत निभानी चाहिए। इसके लिए किसी साइबर-अपराध के विशेषज्ञों की जरूरत नहीं है, मामूली समझबूझ रखने वाले लोग भी स्कूल-कॉलेज जाकर या संगठनों-संस्थाओं की बैठक में जाकर लोगों को सूचना तकनीक के खतरों के बारे में बता सकते हैं। आज अधिकतर लोगों को इनमें से किसी बात के बारे में बड़ी कम जानकारी रहती है। लोग जिस तरह कहावत और मुहावरे में बंदर के हाथ उस्तरे की बात कहते हैं, वैसा बंदर के साथ होते तो किसी ने देखा नहीं है, इंसानों के हाथ मोबाइल फोन आने के बाद ऐसा जरूर देखने में आ रहा है।
पुलिस और अखबारों में जितने मामले पहुंच रहे हैं, उनसे हजार गुना अधिक मामले निजी ब्लैकमेलिंग तक पहुंचकर दब जाते हैं, और इससे न जाने कितने लोगों की जिंदगी तबाह होती है। जब मामला हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाता है, या परिवार के और लोगों की नजर में आ जाता है, तो उनमें से कुछ मामलों में लोग पुलिस तक जाने का हौसला दिखाते हैं। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को साइबर-जागरूकता नाम का एक ऐसा कार्यक्रम शुरू करना चाहिए जो कि कम्प्यूटर-मोबाइल इस्तेमाल करने की उम्र शुरू होते ही लागू किया जाए, और इस उम्र से ऊपर के तमाम लोगों को उपकरणों और संचार-प्रणाली के खतरों के बारे में जागरूक किया जाए। जिस तरह लापरवाह सेक्स से एड्स का खतरा रहता है, उसी तरह लापरवाह साइबर-सक्रियता से जुर्म का शिकार होने, या ब्लैकमेल होने का खतरा बढ़ता है।
सरकार को स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में साइबर-अपराधों से सावधान रहने पर कुछ पन्ने जरूर जोडऩे चाहिए, और पुलिस भी अपनी सामाजिक भूमिका की अच्छी छवि बनाने के लिए जगह-जगह जाकर ट्रैफिक-जागरूकता की तरह साइबर-जागरूकता पर भी लोगों को जानकारी दे सकती है। यह सब आज इसलिए भी जरूरी है कि दुनिया में हिन्दुस्तान स्मार्टफोन के मामले में सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था है। लोगों का डेबिट और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल बढ़ रहा है, नए-नए लोग इंटरनेट-बैंकिंग कर रहे हैं, स्मार्टफोन का इस्तेमाल बढ़ रहा है, इंटरनेट की उपलब्धता बढ़ रही है, स्पीड बढ़ रही है, लेकिन सावधानी, जागरूकता, और चौकन्नापन जरा भी नहीं बढ़ रहा है। यह नौबत लोगों को कई तरह के कानूनी खतरों में डाल सकती है, ठगी और जालसाजी के शिकार तो लोग आज भी हो रहे हैं।   (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 सितंबर

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान अपने-अपने जंगखोर लोगों की बकवास रोकने की कोशिश करें

संपादकीय
23 सितंबर 2018


भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम होने का नाम नहीं लेता। पाकिस्तान की सत्ता पर पहली बार आए कल के क्रिकेटर और आज के प्रधानमंत्री इमरान खान  ने भारत के विदेशमंत्रियों की संयुक्त राष्ट्र में होने जा रही एक बैठक के रद्द होने पर हिन्दुस्तानी लीडरशिप को घमंडी बताते हुए अफसोस जाहिर किया है कि यह बात नहीं होने जा रही है। दूसरी तरफ आज फिर पाकिस्तान की तरफ से भारत के घरेलू मामलों में दखल दिखता हुआ एक बयान जारी किया गया है जिसमें कहा गया है कि भारत सरकार राफेल डील में घिरती जा रही है, और इसलिए वह पाकिस्तान का नाम लेकर अपना बचाव करने की कोशिश कर रही है। पाक सूचना मंत्री ने ट्वीट करके कहा है कि पाकिस्तान भारत के सत्ताधारी लोगों की युद्ध भड़काने की कोशिश को नकारते हैं, भारत सरकार मोदी को बचाने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ नफरत फैला रही है। उन्होंने लिखा है कि मोदी पर राफेल डील में इस्तीफा देने का दबाव है, इसलिए भारत सरकार इस फौजी सौदे घोटाले से अपने लोगों का ध्यान बांटने की कोशिश कर रही है। 
अभी कुछ ही दिन पहले भारत के विदेश राज्यमंत्री और फौजी जनरल रहे हुए जनरल वी.के. सिंह ने यह बयान दिया था कि पाकिस्तान में अभी तक फौजी हुकूमत है और इस आदमी (इमरान खान) को पाकिस्तानी फौज ने ही बिठाया है। इसलिए यह आने वाले दिन ही बताएंगे कि यह फौज के काबू में रहता है या नहीं। वी.के. सिंह ने इमरान खान का नाम लिए बिना यह पूरी बात कही थी, और यह बात हफ्ते भर पहले तब कही थी जब सरहद पर हिन्दुस्तानी बीएसएफ के एक सिपाही के पाकिस्तानी फौज द्वारा बुरी तरह कत्ल करने का आरोप भी सामने नहीं आया था। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम पहले भी सरहद के दोनों तरफ के ऐसे लोगों के खिलाफ लिखते आए हैं जो कि बिना जरूरत, बिना मौके के भड़काऊ बयान देते हैं, और जंग की नौबत लाने की हसरत रखते हैं। पिछले बरस पाकिस्तानी फौज के मुखिया जनरल कमर बाजवा ने खुलकर यह कहा था कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत और अमन के हिमायती हैं, किसी फौजी टकराव के खिलाफ हैं, और उस वक्त भी हमने उनकी बात की तारीफ करते हुए लिखा था कि इसी रूख को दोनों तरफ से आगे बढ़ाना चाहिए। अब जब खासे अरसे बाद, और पाकिस्तान में इमरान सरकार आने के बाद पहली बार जब भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्री न्यूयॉर्क में मिलने वाले थे, तभी सरहद पर एक ऐसी हरकत होती है कि दोनों देशों के बीच तनाव खड़ा हो जाता है। यह कोई नई बात नहीं है, जब-जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच अमन की कोई राह बनते दिखती है, जंग के सौदागर, फौजी सामान बनाने वाले दुनिया के माफियानुमा कारोबारी जुट जाते हैं, और दोनों देशों के बिकाऊ टीवी चैनलों पर जंगखोर बूढ़े फौजियों को बिठवाकर एक-दूसरे देश के खिलाफ इतनी हिंसक बकवास करवाते हैं कि दोनों तरफ आबादी में से बेवकूफ लोगों को यह लगने लगता है कि वे अगर जंग की नहीं सोचेंगे तो वह देश के साथ गद्दारी होगी। जहां मीडिया और फतवेबाज नेता-अफसर, अखबारनवीस और सोशल मीडियाबाज लोग बिकने को तैयार रहते हैं, जंग के फतवे देने को वे नींद में भी तैयार रहते हैं, वहां पर हथियार बनाने वाली कंपनियां, फौजी खरीदी में खरबपति होने वाले नेता-अफसरों के लिए यह बड़ी बात तो रहती नहीं कि बातचीत के ठीक पहले सरहद पर एक लाश गिरा दी जाए। यह भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की संभावना को खत्म करने का एक बड़ा पुराना, आजमाया हुआ कामयाब नुस्खा है, और इस बार फिर इसी का इस्तेमाल हुआ है। दोनों देशों के बीच अगर तनाव किसी भी तरह घट पाता, तो दोनों तरफ के बहुत से चैनलों के पेट पर लात पड़ती, बहुत से रिटायर्ड फौजी जंगखोरों को कोई कैमरा नसीब नहीं होता, और लड़ाकू सामान बनाने वाली कंपनियों का मुनाफा घटकर जमीन पर आ जाता। 
अभी-अभी यह खबर भी आई है कि भारत में भाजपा और कांग्रेस के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि पाकिस्तान इन दोनों में से किसका साथ दे रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान में इमरान खान के सामने देश को बुरी कंगाली के बीच जिंदा रख पाना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है, और वहां के पिछले एक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की जेल से फिलहाल रिहाई की वजह से एक राजनीतिक दबाव भी इमरान खान पर रहेगा। इन दोनों देशों के बीच ऐसे बहुत से मौके आए हैं जब अपने देश के अंदरुनी तनावों को दबाने के लिए दूसरे देश पर तोहमतें लगाई गई हैं, या सरहद पर तनाव खड़ा किया गया है, या कि बताया गया है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। उकसाने और भड़काने वाली सारी हिंसक कोशिशों के बीच हिन्दुस्तान और पाकिस्तान जैसे कुपोषण के शिकार देशों में आम लोगों को अमन की आवाज उठाना जारी रखना चाहिए, और अपने-अपने देशों में बकवासी नेताओं, फौजियों, और मीडिया के भोंपुओं का खुलकर विरोध करना चाहिए कि उनकी नाजायज बकवास से गरीबों की थाली से रोटी छिन जा रही है, और उससे गोलियां खरीदी जा रही हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितंबर

इस निरंतर चुनावी मोड का कोई विकल्प निकले

संपादकीय
22 सितंबर 2018


आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी छत्तीसगढ़ पहुंच रहे हैं, और चूंकि उनका कार्यक्रम सरकारी है इसलिए राज्य सरकार और सत्तारूढ़ भाजपा ने अपनी पूरी ताकत स्वागत में झोंक दी है, दूसरी तरफ हाल ही में राज्य के बिलासपुर में कांग्रेस पर हुए पूरी तरह नाजायज और हिंसक लाठीचार्ज को लेकर कांग्रेस ने मोदी का विरोध करने के लिए काले कपड़ों में सजकर सभा के लिए रवानगी डाल दी है। आने वाले कम से कम दो महीने इसी तरह की तनातनी के रहेंगे, और पिछले कुछ महीने इसी में गुजरे हैं। विधानसभा चुनाव के छह महीने बाद देश के आम चुनाव होंगे, और उसके छह महीने बाद छत्तीसगढ़ के स्थानीय संस्थाओं के चुनाव। कुल मिलाकर चुनाव का यह एक-डेढ़ बरस छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ पार्टी, सरकार, और विपक्ष इन तीनों के लिए महज चुनावी प्राथमिकताओं का रह जाता है। नतीजा यह होता है कि दोनों तरफ की रस्साकशी में जनता पिस जाती है, और जो काम नियमित रूप से शासन-प्रशासन में होने चाहिए, वे धरे रह जाते हैं, पुलिस भी इसी में झोंक दी जाती है, आचार संहिता के चलते कई तरह के काम बंद भी हो जाते हैं। 
देश में भाजपा ने नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में एक साथ चुनाव करवाने की जो बात कही है, उसका बहुत सी पार्टियां इसलिए विरोध कर रही हैं कि उन्हें लगता है कि इससे जनता के बीच लोकतांत्रिक पसंद की विविधता खत्म हो जाएगी, और एक ही लहर से देश, प्रदेश, और स्थानीय संस्थाओं में कोई एक पार्टी काबिज हो जाएगी। हो सकता है कि यह आशंका सही हो, और यह भी हो सकता है कि यह आशंका मोदी को लेकर हो क्योंकि आज नरेन्द्र मोदी की देश भर में सबसे बड़े तबके पर पकड़ बेमिसाल है। ऐसे में विपक्ष की यह आशंका जायज है कि हाल-फिलहाल अगर ऐसा होता है तो इससे देश भर में मोदी काबिज हो जाएंगे, और भाजपा ने यह तो कहा ही है कि 2019 के आम चुनाव के बाद वह देश पर 50 बरस राज करेगी। लोकतंत्र में इतना लंबा राज किसी के भी मन में दहशत पैदा कर सकता है, हालांकि इसकी सबसे करीबी मिसाल पश्चिम बंगाल में 33 बरस का वामपंथी राज रहा है जिसके बाद भी वामपंथियों को सत्ता खोनी पड़ी थी, और उनकी धुर-विरोधी ममता बैनर्जी सत्ता पर आई। 
पूरे देश में तीनों स्तर के चुनाव एक साथ करवाना आसान बात नहीं है, लेकिन फिर भी आगे चलकर ऐसे किसी विकल्प के बारे में सोचना बंद नहीं करना चाहिए क्योंकि हम लंबे समय से यह देखते आ रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकार जब कभी चुनावी बरस में जनता के सामने जाने की तैयारी करती हैं, तो उनके फैसले लुभावने अधिक रहते हैं, तर्कसंगत या न्यायसंगत कम रहते हैं। भारत में हर पांच बरस में चुनाव की नौबत आती है, और हर राज्य में अमूमन तीन ऐसे चुनाव होते हैं। ऐसे में अगर ये तीनों अलग-अलग समय पर हैं तो सरकार चुनावी वायदों में उलझकर रह जाती है, विपक्ष चुनावी विरोध में उलझकर रह जाता है, और लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष की कामकाज की बुनियादी जरूरत पीछे की सीट पर बिठा दी जाती है। यह सिलसिला किसी न किसी तरह बदलना चाहिए। इसके लिए राज्य की विधानसभाओं के कार्यकाल को कम या अधिक करके कोई रास्ता निकल सकता हो तो उसे निकालना चाहिए, या फिर स्थानीय संस्थाओं के कार्यकाल विधानसभाओं के साथ जोड़े जा सकते हों, तो वह करना चाहिए। लेकिन किसी भी सरकार का या शासन-प्रशासन का लगातार चुनावी मोड में बने रहना देश के लिए उत्पादकता का नुकसान छोड़ कुछ नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितंबर

जोगी-मायावती के गठजोड़ के मायने सतह से कहीं गहरे

संपादकीय
21 सितंबर 2018


बहुजन समाज पार्टी की अकेली नेता मायावती ने छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन करके इस राज्य की चुनावी राजनीति में एक तात्कालिक तूफान सा ला दिया है। अब अजीत जोगी एक अलग ताकत के साथ चुनाव मैदान में रहेंगे, और वे कांग्रेस के वोटकटवा नहीं रहेंगे, बल्कि अपने आपमें एक ताकत रहेंगे, और इससे कांग्रेस को तो दिक्कत होगी ही होगी, सत्तारूढ़ भाजपा को भी दिक्कत होगी क्योंकि जिन दलित सीटों की वजह से पिछली बार रमन सिंह सरकार बनी थी, उन्हीं सीटों पर जोगी का प्रभामंडल है, और उन्हीं सीटों पर बसपा के वोट भी हैं। इससे चुनावी नतीजों का संतुलन एकदम बदल सकता है, लेकिन वह किस तरफ कितना झुकेगा, यह अभी अंदाज लगाना मुश्किल है। लेकिन जोगी इस राज्य मेें अब किंग न सही, किंगमेकर की तरह बनने की कोशिश जरूर करेंगे।
लेकिन छत्तीसगढ़ से परे अगर देखें तो यह गठबंधन भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक कामयाबी इसलिए है कि छत्तीसगढ़ के साथ-साथ मध्यप्रदेश में होने वाले चुनावों में भी बसपा का कांग्रेस के साथ कोई तालमेल नहीं हो पाया, और मायावती ने मप्र की हर सीट पर उम्मीदवार खड़े करने की घोषणा कर दी है। नतीजा यह है कि अगले आम चुनावों के पहले गैरभाजपा, गैरएनडीए पार्टियों के बीच तालमेल की संभावना को एक बड़ा नुकसान इससे हुआ है। दरअसल छत्तीसगढ़ या मध्यप्रदेश के कांग्रेस नेताओं की नजरों में बसपा की शायद वैसी अहमियत नहीं थी, जैसी कि सीटें बसपा चाह रही थी। इसलिए इन दोनों राज्यों के कांग्रेस नेताओं ने तालमेल की पहल नकार दी, और बसपा अपनी राह चल पड़ी। पिछले महीनों में जिस तरह अखिलेश यादव से लेकर राहुल गांधी तक के साथ मायावती का एक तालमेल होते दिख रहा था, वह वक्त के पहले ही अब बिखर गया दिखता है, और  भाजपा के लिए यह एक कामयाबी है, चाहे वह इसके पीछे जिम्मेदार हो, या कि न हो। दरअसल देश में राष्ट्रीय पार्टियों के सामने एक दिक्कत यह रहती है कि क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल करते हुए, या कि राष्ट्रीय दलों के साथ प्रदेश के चुनावों में तालमेल करते हुए उन्हें अपनी प्रदेश इकाईयों का भी ख्याल रखना पड़ता है, जिनकी चुनावी प्राथमिकताएं देश के विपक्ष की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से अलग रहती हैं। इसलिए बसपा और कांग्रेस का तालमेल हो नहीं पाया, और बहुत से लोगों को पहली नजर में यह भाजपा की पहली जीत लग रही है। 
लेकिन कांग्रेस और भाजपा से परे भी किसी-किसी राज्य में ऐसी नौबतें आती रही हैं जिनके चलते इन दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों को क्षेत्रीय पार्टियों से हाथ मिलाकर सरकार बनानी पड़ी, और यहां तक कि इनको बड़े होने के बावजूद सरकार में छोटे भागीदार की भूमिका माननी पड़ी। कर्नाटक चुनाव के बाद हमने ऐसा ही देखा है। दूसरी तरफ दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में एक नई पार्टी और एक नए नेता अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा के इस गढ़ को पूरा नेस्तनाबूद करके वहां अपना राज कायम कर लिया, और ये दोनों पार्टियां हाथ मलते रह गईं। इसलिए मध्यप्रदेश में बसपा से कांग्रेस या भाजपा को पता नहीं कितना फर्क पड़ेगा, लेकिन छत्तीसगढ़ में हाथी पर सवार जोगी की संभावना को लेकर अधिक भविष्यवाणी करना अभी समझदार लोगों के लिए शायद मुमकिन नहीें हो पाएगा। 
यह बात भी अपनी जगह जायज और जरूरी है कि जोगी और मायावती का गठबंधन न तो अस्वाभाविक है, और न ही अटपटा है। ये दोनों ही नेता मोटे तौर पर दलित वोटों की राजनीति करते हैं, और अपने आपको आदिवासी बताने वाले अजीत जोगी की छत्तीसगढ़ में पूरी ताकत महज दलित वोटों के बीच ही मानी जाती है। ऐसे में अगर 10 दलित-आरक्षित सीटों पर जोगी-मायावती का जोड़ कोई करिश्मा दिखा दे, तो उसमें हैरानी नहीं होगी। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि दलित सीटों से बाहर भी इन दोनों की मिलीजुली ताकत दर्जनों दूसरी सीटों पर जीत-हार के फासले से अधिक वोट पाने की ताकत रखती है। इसलिए अब छत्तीसगढ़ का चुनाव अधिक दिलचस्प होने जा रहा है, और ऐसे में जोगी अपने समर्थकों को यह सपना तो दिखा ही सकते हैं कि अगली सरकार उनके बिना नहीं बन सकती। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 सितंबर

विज्ञान की संभावनाओं के साथ-साथ उसके खतरों की संभावना भी देखी जाए

संपादकीय
20 सितंबर 2018


जिस पाकिस्तान से आमतौर पर हिंसा और आतंक की खबरें आती हैं वहां से एक वैज्ञानिक खबर आई है कि इस्लामाबाद के बाहर कचरे में वैज्ञानिकों को एक ऐसा प्लास्टिक खाने वाला फफूंद मिला है जो कि दुनिया के प्लास्टिक कचरे का एक समाधान हो सकता है। यह शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि यह फफूंद प्लास्टिक को खाकर उसी तरह जिंदा रहती है जिस तरह दुनिया के दूसरे प्राणी पेड़-पौधों को या जानवरों को खाकर जिंदा रहते हैं। इस फफूंद ने कचरे में से पॉलिएस्टर पॉलीयूरेथीन को नष्ट किया है। अब पाकिस्तानी वैज्ञानिक ऐसी स्थितियां पता लगा रहे हैं जिनमें इस फफूंध की बढ़ोत्तरी हो सके, और वह प्लास्टिक को अधिक तेजी से नष्ट कर सके। 
ऐसी वैज्ञानिक खोज एक तरफ धरती पर आने वाले कल के लिए एक सुहानी तस्वीर बनाती है, और दूसरी तरफ जो अधिक चौकन्ने लोग हैं, उनको इसके साथ जुड़े हुए खतरे भी दिखते हैं। किसी विज्ञान कथा में एक सदी पहले जिस किस्म की तबाही की कल्पना की गई थीं, अब आगे जाकर उनमें से बहुत सी कल्पनाएं, या कि दु:स्वप्न, सही साबित हो रहे हैं। हम आज ऐसी किसी फफूंद को धरती के प्लास्टिक-कचरे का इलाज मान रहे हैं। ऐसे दूसरे बैक्टीरिया पहचानने में भी वैज्ञानिक लगे हुए हैं जो कि प्लास्टिक की अलग-अलग किस्मों को खाकर खत्म कर सकें। लेकिन एक ऐसी नौबत की कल्पना करें कि ऐसे बैक्टीरिया या ऐसी फफूंद धरती के भीतर पहुंचकर वहां की बिजली, टेलीफोन, इंटरनेट की केबलों पर से प्लास्टिक को खाना शुरू कर दें, वे सड़क किनारे खड़ी हुई गाडिय़ों के टायर खाना शुरू कर दें, जमीन के नीचे या जमीन के ऊपर प्लास्टिक के पानी वाले पाईप खाना शुरू कर दें? क्या आज ऐसी कल्पना भी की जा सकती है कि तरह-तरह के प्लास्टिक को कोई खा ले, तो उसके बाद दुनिया कैसे चलेगी? कम्प्यूटरों से लेकर मोबाइल फोन तक, और अस्पताल की मशीनों से लेकर गाडिय़ों तक, चारों तरफ प्लास्टिक के कवर वाले तरह-तरह के केबल रहते हैं, ढांचे रहते हैं। 
और यह पूरी कल्पना महज कहानी नहीं है, आज चूंकि पूरी दुनिया में वैज्ञानिक प्लास्टिक को खाने वाले बैक्टीरिया ढूंढने में लगे हुए हैं, इसलिए ऐसे खतरे की कल्पना करना जरूरी है। वैज्ञानिक खोज करने वाले लोगों के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि वे एक बात में इतनी गहराई और बारीकी तक जाते हैं कि बाकी दुनिया के साथ उसके रिश्ते की कल्पना करना उनके लिए आसान और मुमकिन नहीं रह जाता। इसलिए जिन वैज्ञानिकों ने बम बनाया था, वे हिरोशिमा-नागासाकी पर उसे गिराने की तबाही का अंदाज आंकड़ों से परे नहीं लगा पाए थे। आज जब भी किसी फफूंद, बैक्टीरिया, या कीट-पतंग की बात होगी जो कि प्लास्टिक के कचरे को खाकर नष्ट कर सके, तो उस बारे में यह भी सोचना पड़ेगा कि प्लास्टिक खा लेने के बाद ये सब जाएंगे कहां? ये धरती के भीतर भी चले जाएंगे, पानी में भी घुस जाएंगे, और जिस तरह आज तरह-तरह के बैक्टीरिया और वायरस, मक्खी-मच्छर तक जेनेटिक बदलाव देख रहे हैं, उसे देखते हुए प्लास्टिक खाने वाले ऐसे जीवाणुओं, जीव-जन्तुओं, या बैक्टीरिया की संभावनाओं के साथ-साथ उनके खतरों को भी आंकना जरूरी है। 
जहां तक विज्ञान की बात है, तो उसकी क्षमता तो इतनी सीमित है कि वह दुनिया में दीमक मारने की कोई ऐसी दवा तक नहीं बना पाया है जिससे दीमक खत्म हो जाएं। हर कुछ बरस में कीड़ों को मारने की दवाओं को बदलना होता है क्योंकि कीड़े प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर लेते हैं। अब प्लास्टिक खाने वाले फफूंद और बैक्टीरिया कुछ बरसों में ऐसी प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर लेंगे जैसी कि दीमक कर चुकी है, तो उनके खाए हुए प्लास्टिक के बाद आधुनिक दुनिया का ढांचा कैसा बच जाएगा? दीमक तो महज लकड़ी और प्लाईवुड को खाकर एक भौतिक ढांचा खोखला कर देती है। लेकिन प्लास्टिक को चट कर जाने वाली नस्ल को ढूंढने के साथ-साथ उससे निपटना भी ढूंढना होगा, वरना दुनिया कहीं प्लास्टिक के पहले वाले युग में न पहुंच जाए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 सितंबर

मुख्यमंत्री की कुर्सी लंबे वक्त तक खाली रखना सही नहीं...

संपादकीय
19 सितंबर 2018


गोवा में कुछ महीने पहले जब विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा बहुमत में नहीं थी, और कांग्रेस की सरकार बनने का आसार दिख रहा था, लेकिन गठबंधन बनाने में कांग्रेस से शायद कुछ देर हो गई थी, और सरकार भाजपा ने बना ली थी। आंकड़ों के मुताबिक कुछ अस्थिर सा यह ढांचा चल रहा था, लेकिन मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर कैंसर के शिकार हो गए, और वे लंबे समय तक पहले तो अमरीका में इलाज कराते रहे, और फिर अब भारत में वे दिल्ली के एम्स में भर्ती हैं। भाजपा की यह मजबूरी हो सकती है कि ऐसी नाजुक सरकार में उसे ऐसे नाम पर बने रहने की मजबूरी है जो कि अधिक विधायकों को मंजूर हो, लेकिन इस राजनीतिक गणित से परे शासन-प्रशासन का गणित यह मांग करता है कि जिस तरह देश में एक कामकाजी प्रधानमंत्री होना चाहिए, उसी तरह प्रदेश में एक कामकाजी मुख्यमंत्री मौजूद होना चाहिए। गैरमौजूदगी के साथ सरकार चला पाना न तो मुमकिन है, और न ही जायज है। 
ऐसे में भारतीय लोकतंत्र में एक स्वस्थ परंपरा बननी चाहिए कि शासन प्रमुख चाहे वे म्युनिसिपल या जिला पंचायत में हों या फिर वे देश-प्रदेश में हों, उनकी लंबी नामौजूदगी की हालत में उनका विकल्प संवैधानिक ढांचे में ही तय कर दिया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था हो जाने पर राजनीतिक दल, और उनके भीतर के गुट विकल्प की सोचने के लिए तैयार भी रहेंगे। दूसरी तरफ सार्वजनिक जीवन में जो लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष चुनाव से जनता का विश्वास जीतकर सत्ता पर आते हैं, उनको खुद को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि जिस जिम्मेदारी के लिए उनको चुना गया है, उसे अगर वे पूरा समय नहीं दे पाते हैं, तो उन्हें किसी और के लिए कुर्सी खाली करनी चाहिए। ऐसे ही मौके पर पार्टियों के सामने अपने किसी दूसरे नेता को मौका देने और उनको अपनी काबिलियत साबित करने देने का वक्त भी आता है, और इसे बहुत बड़ा मुद्दा नहीं मानना चाहिए। जिस तरह किसी खेल की टीम में एक खिलाड़ी के घायल हो जाने पर उसकी जगह दूसरे को मौका मिलता है, और बहुत से नए खिलाड़ी ऐसी ही चुनौतियों के मौकों पर अपना हुनर दिखाकर आगे की टीम में जगह बना जाते हैं। 
राज्य हो या शासन-प्रशासन की कोई और इकाई, उसकी जिम्मेदारी को कम नहीं आंकना चाहिए। जब कभी ऐसी जिम्मेदारी को लेकर किसी कड़े फैसले का वक्त आए, तो फैसले की ताकत रखने वाले लोगों को, पार्टियों को, यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके पास जो अधिकार है, उससे कहीं अधिक उन पर जिम्मेदारी है, और उसे ध्यान में रखते हुए शासन-प्रशासन की सबसे अच्छी ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसमें निरंतरता भी बनी रहे। मनोहर पर्रिकर भारत में सबसे सज्जन और सबसे सादगी वाले, ईमानदार छवि वाले नेता माने जाते हैं। वे चाहे जिस पार्टी में हो, उनके व्यक्तित्व के इन पहलुओं की वजह से उनकी पार्टी का सम्मान बढ़ता ही है। ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़कर एक और मिसाल कायम करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 सितंबर

21वीं सदी की शिक्षा 19वीं सदी पहुंच गई..

संपादकीय
18 सितंबर 2018


भोपाल विश्वविद्यालय की खबर है कि वहां आदर्श बहू बनाने का एक कोर्स चलाया जाने वाला है। इसके बारे में कुलपति ने बताया कि वहां ऐसी बहुएं तैयार की जाएंगी जो पूरे परिवार को साथ लेकर चल सकें। इसके अलावा आदर्श बहू की कई ऐसी खूबियां भी गिनाई गई हैं जो कि भारतीय संस्कृति के लिए एक खास नजरिए के हिसाब से संस्कारी कही जा सकेगी। कुलपति का कहना है कि एक विश्वविद्यालय के तौर पर उनकी समाज के प्रति भी जिम्मेदारी है, और उनका मकसद ऐसी दुल्हनें तैयार करना है जो परिवारों को जोड़कर रख सकें। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के कुछ विश्वविद्यालय अपना मखौल उड़ाने का सामान खुद ही जुटाकर दे रहे हैं। कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के बारे में खबर आई और छपी थी कि वहां पर हनुमान पर दो दिन का एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ। अभी भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की खबर आई है कि वहां पर ज्योतिष, मीडिया, और विश्वसनीयता विषय पर एक व्याख्यान हुआ जिसमें एक चर्चित ज्योतिषी का भाषण हुआ। इस भाषण में ज्योतिष और आध्यात्मिकता के रिश्ते पर भी चर्चा हुई और इसी किस्म के कुछ दूसरे पहलुओं पर भी।
आज जब भारत के विश्वविद्यालयों का हाल पढ़ाई के स्तर को लेकर चौपट हो रहा है, तब विश्वविद्यालय अपना मकसद छोड़कर भारतीय संस्कृति की एक खास तस्वीर को आगे बढ़ाने में राष्ट्रवादी इरादों से जुट गए हैं। धीरे-धीरे विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पीछे की सीट पर जाकर बैठ गए हैं, और उनके बाद सामाजिक विज्ञान भी करीब-करीब क्लास के बाहर निकाल दिया गया है। जिस मकसद से पत्रकारिता विश्वविद्यालय बनाए गए हैं, वे मकसद भी टीसी देकर बाहर कर दिए गए हैं, और अब धर्म, आध्यात्म, राष्ट्रवाद, राष्ट्रभाषा, भारतीय संस्कृति जैसे पहलुओं ने पूरे  कैंपस पर राज शुरू कर दिया है। 
धर्मांधता और राष्ट्रवाद से किसी का भला नहीं होता है। कहने के लिए जिन शिक्षण संस्थाओं को विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है, उनके सोचने का दायरा विश्व छोड़, हिंदुस्तान छोड़, एक खास धर्म से जुड़ी संस्कृति तक सीमित कर दिया गया है, इससे खोखले होते इस धर्म को एक आक्रामक ताकत तो मिल सकती है, लेकिन इससे विश्वविद्यालय का लेबल लगी हुई पढ़ाई का कोई भला नहीं हो सकता। पत्रकारिता विश्वविद्यालय जैसे संस्थान एक पेशे के लिए लोगों को तैयार करने के लिए बनाए गए थे। अब वे हनुमान चालीसा पढ़ाकर उसे दुनिया का सबसे अच्छा संचार साबित कर रहे हैं। यह सोच उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वैज्ञानिक सोच के स्तर की तो है कि हमलावर बंदरों को भगाना हो तो हनुमान चालीसा पढ़ी जाए। कुछ इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ का पत्रकारिता विश्वविद्यालय हनुमान चालीसा पढ़ाता है कि पत्रकारिता का ज्ञान कहीं आसपास फटक भी रहा हो, तो वह दूर भाग जाए। 
आज की 21वीं सदी में यह देश एक आदर्श बहू बनाने का कोर्स तो चलाना चाह रहा है, लेकिन वह लड़कों और आदमियों के लिए ऐसा कोई कोर्स चलाने की नहीं सोचता कि वे बलात्कारी न बनें। इस देश की उच्च शिक्षा 21वीं सदी से रिवर्स गेयर में चलती हुई 19वीं सदी तक पहुंची हुई दिख रही है, और बहुत सी सदियां पीछे जाना अभी बाकी भी हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 सितंबर

जायज हक, या नाजायज काबू?

17 सितंबर  2018

इन दिनों ऐसे तमाम लोगों की जिंदगी बिना इंटरनेट नहीं गुजरती जिनके पास किसी तरह की डिजिटल तरकीब है, और जो मुफ्त या तकरीबन मुफ्त मिलने वाले इंटरनेट के ग्राहक हैं। शहरी आबादी में तो अब मजदूर तक इंटरनेट का इस्तेमाल करते दिखते हैं, और ऐसे में यह सोचना भी नामुमकिन है कि इंटरनेट पर लोगों की दौड़ अगर बंध जाएगी, तो उनकी जिंदगी ऐसी ही चलती रहेगी। खासकर उन लोगों की जिंदगी जो अपनी पढ़ाई, अपने रिसर्च, अपने कामकाज, इनके लिए इंटरनेट पर जरूरत की तलाश करते हैं।
इस बात पर चर्चा की जरूरत इसलिए आ गई है कि पिछले हफ्ते यूरोपीय संसद ने एक ऐसे नए डिजिटल कॉपीराइट कानून पर चर्चा की है जिसके आने से गूगल, फेसबुक, या यूट्यूब जैसे तमाम प्लेटफॉम्र्स को अपनी कमाई उन तमाम लोगों के साथ बांटनी होगी जहां की खबरें उनके प्लेटफॉर्म पर दिखती हैं, या जिनका लिखा हुआ, गढ़ा हुआ, गाया या बजाया हुआ इन पर सर्च करने पर दिखता है। यह नया कानून ऐसे तमाम सर्च इंजन और प्लेटफॉर्म को इस बात के लिए जवाबदेह बनाने जा रहा है कि उन पर ढूंढी हुई जो चीजें भी किसी की कॉपीराइट हैं, उन लोगों को भुगतान देना इनको वहां देखा नहीं जा सकेगा।
इस प्रस्तावित कानून के आलोचकों का यह कहना है कि कानून में सर्च इंजनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स की जिम्मेदारी इतनी बढ़ा दी गई है कि इससे इंटरनेट की एक किस्म से मौत भी हो सकती है, और हो सकता है कि ऐसे कॉपीराइट-फिल्टरों की वजह से आज के आजाद इंटरनेट पर एक सेंसरशिप लागू हो जाएगी।
अब इसके बारे में जरा ध्यान से सोचें, तो आज की इंटरनेट की हालत यह है कि वह एक तरफ तो सड़क किनारे रखे पीकदान जैसा हो गया है, जिसमें आते-जाते कोई भी थूककर चले जा सकते हैं, बिना किसी परेशानी के। दूसरी तरफ यह इंटरनेट गांव का एक ऐसा तालाब भी हो गया है जिसमें लोग अपना पखाना धोने से लेकर अपने जानवरों को नहलाने तक, और अपने ईश्वरों को विसर्जित करने तक का सारा काम बिना किसी जवाबदेही के कर सकते हैं, और उसके पानी का मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं, बिना किसी भुगतान के।
किसी सार्वजनिक संपत्ति का कैसा इस्तेमाल हो सकता है यह अगर देखना हो तो इंटरनेट को देखना ठीक होगा जिसे कम लोग नेक काम के लिए या अपने पेशे के कामकाज के लिए, पढ़ाई और शोध के लिए इस्तेमाल करते हैं, और अधिक लोग उसे फिजूल की बातों के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यूरोपीय संसद का यह नया प्रस्तावित कानून इन दो किस्म के इस्तेमाल की वजह से नहीं बन रहा है, यह बन रहा है कि जिन लोगों की मेहनत से कोई खबर बनती है, तस्वीर या कार्टून बनते हैं, उपन्यास या कहानी लिखी जाती है, कोई संगीत तैयार होता है, उसका इस्तेमाल होने पर इंटरनेट कंपनियों के मुनाफे में से उनको भी हिस्सा मिले। आज लोगों को नेट पर सर्च करना तो मुफ्त हासिल है, लेकिन जिन वेबसाइटों के मार्फत वे सर्च करते हैं, उन वेबसाइटों को तो बाजार से, इश्तहार से, ग्राहकों का डेटा बेचकर कमाई होती है। लेकिन इस कमाई का कोई हिस्सा उन लोगों तक नहीं जाता जिन लोगों की मेहनत से वह सामग्री तैयार होती है जिसे ढूंढकर लोग अपनी जरूरत पूरी करते हैं।
इस नजरिए से अगर देखें तो यह नया कानून सेंसरशिप तो नहीं सुझाता, यह महज मुफ्त की कमाई करने वाली इंटरनेट कंपनियों पर इतनी जिम्मेदारी ही लादता है कि ये कंपनियां लोगों के कॉपीराइट वाले कंटेंट के एवज में उनके साथ अपनी कमाई का एक हिस्सा बांटे।
अब चूंकि इंटरनेट और सोशल मीडिया, और तरह-तरह की वेबसाइटों से दुनिया का लोकतंत्र इस तरह जुड़ गया है, कि आज अगर कोई लोगों से यह उम्मीद करे कि वे किसी खबर का लिंक ट्विटर या फेसबुक पर पोस्ट करते हुए, या कहीं और वह लिंक आगे बढ़ाते हुए उसके लिए भुगतान करें, तो इसका एक मतलब यह निकलेगा कि जो लोग ऐसा भुगतान करने की ताकत रखते हैं, महज वही लोग अपनी पसंद के विचार को, अपनी पसंद की सामग्री को आगे बढ़ा सकेंगे, और इससे दुनिया में विचारों पर, सोच पर, एक किस्म का परोक्ष नियंत्रण लद जाएगा क्योंकि आज समाचार-विचार और सामग्री का जो उन्मुक्त आदान-प्रदान मुफ्त में चल रहा है, वह इस कानून के बाद हो सकता है कि भुगतान-आधारित हो जाए। इसे कुछ और खुलासे से समझें, तो हो सकता है कि गरीबों के बुनियादी मुद्दे आगे बढऩा घट जाए, और रईसों के गैरजरूरी मुद्दे आगे बढ़ते चले जाएं। इससे दुनिया मेें असल लोकतांत्रिक तस्वीर से परे एक ऐसी तस्वीर बन सकती है जिसके लिए रंग और ब्रश खरीदना अधिक संपन्न के लिए अधिक मुमकिन हो पाएगा।
यह तो एक आशंका की एक नाटकीय कल्पना है, लेकिन यह तय है कि जब टेक्नालॉजी और बाजार मिलकर कुछ करते हैं, तो लोकतंत्र उसका एक बड़ा शिकार हो जाता है, बड़ी रफ्तार से। पहली नजर में यूरोप का यह प्रस्तावित कानून इस मायने में ठीक लगता है कि इससे सामग्री तैयार करने वालों को मेहनताना और मुआवजा मिल सकेगा, लेकिन इसके कुछ दूसरे किस्म के असर भी होंगे, जिनका पूरा अंदाज अभी आसान और मुमकिन नहीं है। आज इसकी चर्चा जरूरी इसलिए है कि जिंदगी को प्रभावित करने वाली जो बातें कल होने जा रही हैं, उनके बारे में अगर आज सोचा नहीं जाएगा, तो सरकार और कारोबार जिंदगी को इतना बदल सकते हैं कि उसे पहचाना न जा सके।  (Daily Chhattisgarh)