राजन ने किस पीएम के दफ्तर को दी थी संदिग्ध कर्जदारों की लिस्ट?

संपादकीय
12 सितंबर 2018


भारत में बैंकों की कर्ज डूबत की भयानक हालत पर एक संसदीय कमेटी विचार कर रही है, और मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली इस कमेटी ने रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर रघुराम राजन को कमेटी के समक्ष इस मुद्दे पर अपनी राय रखने को बुलाया था। वे अभी अमरीका के एक विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं, और उन्होंने अपना एक लिखित विचार इस कमेटी को भेजा है जिसके कुछ हिस्से खबरों में सामने आए हैं। चूंकि यह संसद की एक कमेटी है, इसलिए यह कुछ विशेषाधिकारों से लैस भी है, और इससे वही बातें बाहर आ पाती हैं जिन्हें यह कमेटी बताना चाहती है। ऐसे में रघुराम राजन की यह बात सामने आ रही है कि उन्होंने अपने लिखित विचार में यह जानकारी दी है कि उन्होंने बैंकों के एनपीए की बुरी हालत के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को एक लिस्ट दी थी कि उनके हिसाब कौन-कौन से कर्जदार संदेहास्पद हैं। यहां पर सवाल यह उठता है कि उन्होंने यूपीए के प्रधानमंत्री कार्यालय को खबर दी थी, या कि एनडीए के प्रधानमंत्री कार्यालय को? क्योंकि वे इन दोनों के वक्त रिजर्व बैंक के गवर्नर थे, और मोदी सरकार आने के काफी बाद उनका कार्यकाल पूरा हुआ। 
जब कभी सार्वजनिक या सरकारी-संवैधानिक ओहदे पर बैठे हुए लोग कोई ऐसी बात करते हैं, जो कि किसी के खिलाफ आरोप जैसी भी होती है, तो उसमें पूरी साफगोई होना जरूरी रहता है। रघुराम राजन ने जब कभी ऐसी लिस्ट पीएमओ भेजी होगी, वह आरबीआई की फाईलों में भी होगी, और उसकी तारीख राजन को लिखना चाहिए था। आज भारत में परस्पर राजनीतिक विरोध इतना कड़ा और कड़वा है कि भाजपा और कांगे्रस, दोनों के खेमे यह साबित करने में लग गए हैं कि राजन ने उनके नहीं, दूसरे पक्ष के पीएमओ को लिखा था। खैर, इस तथ्य से परे एक दूसरी बात यह तो है ही कि चाहे यह लिस्ट कभी भी भेजी गई हो, बाद में तो मोदी सरकार ही आई, और यह उसका हक भी था, और जिम्मेदारी भी थी कि ऐसी लिस्ट की जांच करवाती, और उस पर कार्रवाई भी करती। 
यहां पर हमारा एक और सोचना है कि संसदीय समिति को राजन की चि_ी के हिस्से बाहर नहीं आने देना चाहिए, या तो पूरी चि_ी गोपनीय रखनी चाहिए, और अधिक बेहतर हो कि इस पूरी चिट्ठी को एक साथ जारी कर दिया जाए। खुद राजन का यह विशेषाधिकार है कि वे संसदीय समिति को भेजे गए जवाब को लोकतांत्रिक पारदर्शिता के मुताबिक जनता को जारी कर देते। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के लोगों को याद होगा कि राज्यों के विभाजन के बाद भोपाल में एक शराब कारोबारी पर आयकर छापा पड़ा था, और वहां नेताओं को भुगतान की जो डायरी जब्त हुई थी, उसमें सीएम के नाम से बड़ी-बड़ी रकमें लिखी गई थीं। उसके बाद छत्तीसगढ़ में तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तत्कालीन आबकारी मंत्री रामचंद्र सिंहदेव की पे्रस कांफे्रंस करवाई थी जिन्होंने अपनी साफ-सुथरी ईमानदारी छवि का इस्तेमाल करते हुए मीडिया को यह बताया था कि जिन तारीखों पर सीएम को भुगतान की बात लिखी गई है, उन तारीखों पर छत्तीसगढ़ राज्य ही नहीं बना था, इसलिए उसका जिक्र छत्तीसगढ़ के सिलसिले में नहीं किया गया होगा। सार्वजनिक जीवन मेें लोगों को अपने बयान संदेह से परे रखने चाहिए, ताकि उनकी बातों का इशारा किसी बेकसूर की तरफ न हो जाए। दूसरी तरफ कुल मिलाकर आज मोदी का पीएमओ ऐसी लिस्ट पर काबिज है, और अगर अब तक वह लिस्ट मनमोहन सिंह या नरेन्द्र मोदी किसी ने, या दोनों ने अनदेखी की होगी, तो कम से कम अब वे जनता के प्रति जवाबदेह हैं, और इस पर खुली जांच होनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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