मोदी के आखिरी साल में खतरे के निशान की तरफ बढ़ता हुआ बाढ़ का पानी

संपादकीय
31 अक्टूबर 2018


केन्द्र की मोदी सरकार जलसों से परे एकाएक दो-तीन मोर्चों पर घिर गई दिखती है। सीबीआई में सरकार की फजीहत जारी ही है, कि देश की बैंकिंग को नियंत्रित करने वाली एक स्वायत्त संस्था, आरबीआई के भीतर से सरकारी दखल के खिलाफ कड़ा विरोध सतह पर तैरने लगा है। हालात इतने खराब हैं कि वित्तमंत्री अरूण जेटली ने आरबीआई पर तोहमत लगाई है कि जब बैंक लोन डूब रहे थे, तब आरबीआई परे देख रहा था। आज की अटकलें यह हैं कि आरबीआई गवर्नर, उर्जित पटेल, जो कि मोदी के ही बनाए हुए हैं, इस्तीफा दे सकते हैं, और केन्द्र सरकार आरबीआई के पर कतरने के लिए संविधान से केन्द्र को मिली हुई एक ऐसी शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है जो कि आज तक कभी इस्तेमाल नहीं की गई है। इससे परे सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण, अरूण शौरी, और यशवंत सिन्हा की एक याचिका पर केन्द्र सरकार से राफेल लड़ाकू विमान खरीदी को लेकर बहुत सी जानकारियां मांगी हैं, जो कि केन्द्र सरकार के लिए परेशानी भी बन सकती है। इसी सुनवाई के दौरान जब प्रशांत भूषण ने अदालत से कहा कि राफेल मामले की सीबीआई जांच की जाए, और वह कोर्ट की निगरानी में हो तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इसमें वक्त लग सकता है, और पहले सीबीआई को अपना घर तो ठीक कर लेने दीजिए। जाहिर तौर पर मुख्य न्यायाधीश सीबीआई के भीतर चल रही खूनी मारकाट के बारे में बोल रहे थे जो कि सरकार के पसंदीदा कहे जा रहे अफसर और राफेल जांच में दिलचस्पी ले रहे अफसर के बीच की लड़ाई के दौरान चल रही है। 
आज एकाएक देश के बहुत सारे अखबारों में अलग-अलग अखबारनवीस यह लिख रहे हैं कि नारों और जुमलों से परे मोदी सरकार काबू खोते जा रही है, और देश की संवैधानिक संस्थाओं पर, स्वायत्त संस्थाओं पर केन्द्र सरकार गलत हद तक जाकर काबिज होकर इस खोए हुए काबू को वापिस पाने की कोशिश कर रही है। यह सिलसिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी पार्टी, और उनके सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए जितनी भी फिक्र का हो, यह देश के लोकतंत्र के लिए भी फिक्र की बात है कि आज सत्ता और विपक्ष के बीच बातचीत के लिए, सीबीआई और अदालत ही जगह बच गई हैं। सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर गालियों से परे शायद ही कोई बात हो पाती है, और अक्ल की बात की गुंजाइश इन पर कम ही दिखती है। हिंसा की धमकी, बलात्कार की धमकी, किसी को देशद्रोही करार देना, इतनी आम बात हो गई है कि ऐसे लोग न तो कानून से डरते हैं, और न ही इस बात का कोई असर उन पर होता कि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री खुद ऐसे हिंसक लोगों को फॉलो कर रहे हैं, और वे लोग अपनी न सही, देश के प्रधानमंत्री की इज्जत का ख्याल करके हिंसक धमकियां न दें। 
देश के कई अखबारों ने यह भी लिखा है कि सीबीआई के घरेलू मामलों को केन्द्र सरकार ठीक से नहीं देख पाई, और नतीजा यह निकला कि वह अदालती दखल के कटघरे में पहुंच गए, और अब सरकार के काबू से बाहर भी हो गए। अब हाल यह है कि सीबीआई के कई अफसर एक-एक करके अलग-अलग कोर्ट पहुंच रहे हैं कि जिस अफसर के भ्रष्टाचार की जांच चल रही थी, उसके खिलाफ उनके पास सुबूत है। यह नौबत सरकार के लिए शर्मिंदगी की हो सकती है, और ऐसी ही शर्मिंदगी की नौबत राफेल विमान खरीदी को लेकर हो सकती है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया और जानकारी सीलबंद लिफाफे में मांगी है। कुल मिलाकर मोदी के आलोचकों के हाथ इतनी कामयाबी तो लगी है कि वे कुछ मामलों में सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जवाबदेह बनने होने को मजबूर कर सके हैं। कई लोगों का यह मानना है कि यह देश के लिए मायने रखने वाले मुद्दों की अनदेखी करके महज भावनात्मक मुद्दों की राजनीति करने का नतीजा है। अब मोदी का कार्यकाल अपने आखिरी बरस में चल रहा है, और जैसे-जैसे आम चुनाव करीब आ रहा है, वैसे-वैसे इन कुछ जलते-सुलगते मुद्दों पर अदालत में कार्रवाई आगे भी बढ़ती जा रही है। किसी भी जिम्मेदार और समझदार सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह नौबत खतरे की निशान की तरफ बढ़ते हुए बाढ़ के पानी की तरह की है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अक्टूबर

अमरीका की तरह भारत में भी संसदीय सुनवाई के बाद ही कई कुर्सियों पर नियुक्तियां हों..

संपादकीय
30 अक्टूबर 2018


सीबीआई में छुट्टी पर भेजे गए दो सबसे बड़े अफसरों में से एक, राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे तमाम अफसरों का तबादला कर दिया गया है। इनमें से एक अफसर आज सुप्रीम कोर्ट पहुंचा कि उसके पास अस्थाना के खिलाफ सुबूत हैं, और इसलिए उसका तबादला किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इस मामले की अर्जेंट सुनवाई से मना कर दिया है, लेकिन इससे देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के भीतर के हालात और अधिक खुलकर सामने आ रहे हैं। और यह बात महज सीबीआई के भीतर हो, ऐसा भी नहीं है। भाजपा के एक सबसे अधिक सक्रिय सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि सीबीआई के छुट्टी पर भेजे गए डायरेक्टर आलोक वर्मा एक ईमानदार अफसर थे, और उनके साथ-साथ छुट्टी पर भेजे गए स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना एक भ्रष्ट अफसर हैं। उन्होंने सीबीआई की हालत पर फिक्र भी जाहिर की है, और डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी को इसलिए भी जाना जाता है कि वे अपनी बात पर अड़े रहकर सुप्रीम कोर्ट तक जाते हैं, और बहुत से मामलों में अपने पक्ष में अदालती राहत भी पाते हैं। दूसरी तरफ उनकी बात को इस रौशनी में भी देखना चाहिए कि वे वित्तमंत्री अरूण जेटली के खिलाफ सारे ही वक्त एक अभियान चलाते रहते हैं, और भाजपा के भीतर का यह घरेलू टकराव बहुत से लोगों की समझ में भी नहीं आता है। हाल ही में जो ताजा जानकारियां सामने आई हैं वे बताती हैं कि राकेश अस्थाना के खिलाफ चल रही जांच में एक मामला उनकी बेटी की शादी में करोड़ों के खर्च का भी दिखता है जिसे कारोबारियों ने मुफ्त में किया हुआ बताते हैं। एक सरकारी अधिकारी किस तरह संदिग्ध कारोबारियों के इतने उपकार ले सकता है यह अपने आपमें एक शक की बात है। और राकेश अस्थाना गुजरात में तैनात रहते हुए ऐसे आरोपों से घिरे थे, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जानकारी में इनमें से कोई भी बात न हो ऐसा हो नहीं सकता। 
अब इसे सीबीआई के भीतर महज आपसी लड़ाई या गुटबाजी कहना ठीक नहीं होगा। किसी भी संस्था के भीतर जब चीजें इतनी सड़ जाती हैं, जब भ्रष्ट लोग ऊंची कुर्सियों पर काबिज हो जाते हैं, तो वहां पर एक-दूसरे के जुर्म को छुपाकर संस्था का एक सजा-संवरा चेहरा दिखाना भी हो सकता है, और सड़े हुए हिस्से को काटकर अलग करना भी हो सकता है। हम हमेशा से ऐसे भ्रष्टाचार के भांडाफोड़ के हिमायती रहे हैं जिसे छुपाकर संस्था अपनी साख बचा सकती है। ऐसा स्थायित्व और ऐसी निरंतरता किसी संस्था से परे किसी सरकार को भी तबाह करने की ताकत रखते हैं। इसलिए बेहतर यही है कि देश की सबसे बड़ी संस्थाओं के भ्रष्टाचार पर निगरानी के लिए एक अलग से कारगर संस्था बननी चाहिए जो कि लोकपाल की शक्ल में शायद बन सकती थी, लेकिन बन नहीं पाई है। पिछले चुनावी नारों के बावजूद इस संस्था का बनना किसी किनारे नहीं पहुंच पाया है। 
अब सीबीआई का मामला सुप्रीम कोर्ट की नजरों में है, और उसकी निगरानी में एक जांच भी इसमें चल रही है, इसलिए अगले दस दिन उसके नतीजों का इंतजार करने के अलावा और कोई रास्ता है नहीं। लेकिन भारत में संस्थानों की अधिक पारदर्शिता के लिए जो कुछ हो सके उसकी कोशिश करनी चाहिए। यह मामला सिर्फ देश की किसी एक सरकार की साख का नहीं है, बल्कि पूरे देश की साख का है। हम अमरीका में सुप्रीम कोर्ट के किसी जज की नियुक्ति के पहले जिस तरह वहां पर संसदीय समिति के सामने उसकी लंबी सुनवाई देखते हैं, वैसी सुनवाई भारत में भी होनी चाहिए ताकि नियुक्त होने वाले लोगों के बारे में जो शक हों, उन सब पर उनसे जवाब मांग लिया जाए। आज बंद कमरे में तीन-चार लोग मिलकर देश का भविष्य तय करने लगते हैं, जिसमें पारदर्शिता की कमी है। देश में बहुत सी ऐसी अदालती नियुक्तियां हैं जिनमें समय रहते अगर संसद के लोगों को सवाल पूछने का मौका मिले, तो लोगों की खामियां और उनके गलत काम पहले ही सामने आ जाएं, और उन्हें नियुक्त करने की नौबत न आए। भारत के संविधान में संशोधन करके ऐसी संसदीय जनसुनवाई शुरू करनी चाहिए जिसका प्रसारण भी देश की आम जनता के सामने हो।
-सुनील कुमार 

(Daily Chhattisgarh)


बात की बात, 30 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर

महाकाल ने राहुल से पूछा होगा कि बिच्छू कहां है?

संपादकीय
29 अक्टूबर 2018


कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही पार्टियां अपने बड़बोले नेताओं की अटपटी, गंदी, और आक्रामक बातों को लेकर समय-समय पर परेशानी में फंसती हैं, और अब तो कुछ ऐसा हो गया है कि इनको अपनी बातों पर शर्म आना भी बंद हो गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को नीच आदमी कहने पर सार्वजनिक दबाव में कांग्रेस को अपने एक बड़े नेता मणिशंकर अय्यर को कुछ अरसे के लिए पार्टी से निलंबित भी करना पड़ा था, लेकिन उससे भी पार्टी की बाकी नेता कोई सबक लेते दिखते नहीं हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश के सबसे बड़े कांग्रेस नेता रहे दिग्विजय सिंह को आज पार्टी ने इन दोनों राज्यों में चुनाव अभियान से परे रखा है, और ऐसा परे रखा है कि आज जब मध्यप्रदेश में उज्जैन से राहुल गांधी प्रचार शुरू कर रहे हैं, तब भी दिग्विजय वहां मौजूद नहीं हैं। चुनाव आयोग को प्रचारकों की जो लिस्ट दी गई है उसमें भी दिग्विजय का नाम नहीं है। लेकिन बात इतने पर थमती नहीं है। एक तरफ तो आज राहुल गांधी महाकाल मंदिर में शिवलिंग पर पूजा करके आगे बढ़ रहे हैं, और दूसरी तरफ उनकी पार्टी के एक दूसरे बड़बोले नेता शशि थरूर की कही हुई एक बात पार्टी को शर्मिंदगी में डाल रही है। 
बेंगलुरू के एक साहित्य समारोह में अपनी किताब का प्रचार करते हुए शशि थरूर ने भाषण में कहा कि आरएसएस के एक व्यक्ति ने मोदी के बारे में यह कहा था कि वे शिवलिंग पर बैठे हुए बिच्छू की तरह हैं, जिसे न हाथ से हटाया जा सकता, और न चप्पल मारी जा सकती, क्योंकि वह शिवलिंग पर बैठा है। हो सकता है कि यह बात एक सामान्य समझबूझ के हिसाब से ठीक हो कि बिच्छू को न तो हाथ से पकड़ा जा सकता, और न ही शिवलिंग पर बैठे बिच्छू पर चप्पल चलाई जा सकती। लेकिन एक तरफ जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी रात-दिन अपने जनेऊ की नुमाइश करते हुए अपने को हिन्दू साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, उस बीच में शिवलिंग के जिक्र वाली बात में ऐसी अटपटी बात किसी को नहीं सुहा सकती है। शशि थरूर के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने हिन्दुस्तान के बाहर कितना वक्त गुजारा है कि भावनाओं की उनकी समझ पश्चिमी अधिक है, और हिन्दुस्तानी कम है। ऐसे में जब वे धर्म को लेकर अमरीका की अपनी समझ के आधार पर हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म को लेकर बात करते हैं, तो वह बात अटपटी हो जाती है। यह बात वैज्ञानिक रूप से सही हो सकती है, लेकिन चुनाव के मुहाने पर खड़ी पार्टी वैज्ञानिक तर्क के आधार पर वोट नहीं पाती, वोटरों को रिझाने के लिए लोगों को धर्म और जाति के लिए अपने मन का सच्चा या झूठा सम्मान दिखाना पड़ता है।
कांग्रेस और भाजपा के बीच तनातनी का हाल यह है कि एक-दूसरे की छोटी-छोटी बातों पर भी मोटे-मोटे विवाद खड़ा करना इन दोनों का हक सा बन गया है। ऐसे में कम से कम इन दोनों पार्टियों को तो यह चाहिए कि वे अपने लोगों को यह सिखाएं कि हमला करते हुए उन्हें कहां जाकर रूकना है। और फिर ऐसे विवाद कोई नई बात नहीं है। लोगों को याद होगा कि चुनाव प्रचार करते हुए नरेन्द्र मोदी ने शशि थरूर की उस वक्त की पत्नी के लिए सौ करोड़ की गर्लफ्रेंड जैसी बात कही थी, या खालिस हिन्दुस्तानी राहुल गांधी के लिए भाजपा के कई नेता इटैलियन जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। हो सकता है कोई वक्त ऐसा रहा हो जब लोगों के बीच बर्दाश्त कुछ अधिक रहा हो, लेकिन अब वैसी बात नहीं है। अब एक-दूसरे की बातों में जहर देखने का ही संबंध रह गया है। ऐसे में लोगों को धार्मिक मामलों पर, या जाति को लेकर किसी मुद्दे पर जुबान को लगाम देनी चाहिए। कांग्रेस पार्टी की छवि लंबे समय से एक गैरहिन्दू पार्टी की बनी हुई है, और अब हिन्दुत्व के प्रति उसका ताजा लगाव भी यह मांग करता है कि उसके नेता धर्म के मामले में बकवासी जुबान में बात न करें।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अक्टूबर

अमरीका की धार्मिक नफरत से सबक लेने की जरूरत...

संपादकीय
28 अक्टूबर 2018


अमरीका में कल एक यहूदी धर्मस्थल पर हमला हुआ, और एक गोरे अमरीकी ने गोलियों से ग्यारह लोगों को मार डाला। जब तक इस आदमी की शिनाख्त सामने नहीं आई थी, ऐसी आशंका थी कि यहूदियों के देश इजराइल के जिस किस्म के जानलेवा हमले फिलीस्तीन पर चल रहे हैं, उनके जवाब में किसी फिलीस्तीनी ने ऐसा हमला किया हो, लेकिन बाद में पता लगा कि यह एक स्वघोषित यहूदी-विरोधी का काम था जो कि सोशल मीडिया पर लगातार यहूदी-विरोधी फतवे पोस्ट करता था, और जिसके पास कई बंदूकें थीं, और जो गोली चलाने की ट्रेनिंग भी ले रहा था। अब अमरीका की ऐसी सोशल-मीडिया वेबसाईट को भी लग रहा है कि उसने समय रहते सरकारी एजेंसियों को ऐसी भड़काऊ बातों की जानकारी न देकर एक चूक की थी। दूसरी तरफ अमरीका में खुफिया और निगरानी एजेंसियां लगातार ऐसे लोगों पर नजर रखती हैं जो कि हिंसक फतवे जारी करते हैं, या हथियार रखते हैं, और धमकियां देते हैं। इस हमलावर के बारे में यह जानकारी आई है कि इसके नाम पहले कोई जुर्म दर्ज नहीं था, और यह बंदूकों का शौकीन गोरा, ईसाई होने के बावजूद ट्रंप का आलोचक भी था। 
अब इस हमलावर के बारे में सिर्फ यही बात दिखाई पड़ती है कि वह यहूदियों से नफरत करता था, और उसके चलते ऐसी हिंसा तक पहुंचा। दूसरी तरफ भारत मेें आज देखें तो देश भर में जगह-जगह धर्म को लेकर हिंसा चल रही है, कहीं मंदिरों में महिलाओं को बराबरी का हक देने के खिलाफ लोग हिंसा पर उतारू हैं, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी अनसुना कर रहे हैं, दूसरी तरफ लोग मंदिर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले को भी अदालत से परे कानून बनाकर निपटाना चाहते हैं। मतलब यह कि अपनी धर्मान्धता के लिए लोगों को जहां लगे वहां वे कानून बनाकर मंदिर बनाना चाहते हैं, और जहां उनकी धर्मान्धता को ठीक लगे वहां वे कानून के फैसले को कुचलकर भी मंदिरों से महिलाओं को दूर रखना चाहते हैं। आज देश में सत्ता से जुड़े नेताओं से लेकर, मोदी के धुर-विरोधी प्रवीण तोगडिय़ा जैसे लोग भी अयोध्या में मंदिर का काम शुरू करने पर आमादा हैं, और अगले लोकसभा चुनाव के पहले यह एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश चल रही है। कल ही केरल गए हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सार्वजनिक मंच से यह कहा है कि कोर्ट और सरकारों को ऐसे मामलों पर फैसला नहीं देना चाहिए, जिन्हें लागू नहीं किया जा सकता। वे खुलकर सबरीमाला मंदिर में अदालती फैसले के बावजूद महिलाओं को रोकने के हिमायती बने रहे। 
लोकतंत्र और धर्म, इन दोनों का मिजाज साथ-साथ चल नहीं सकता। लोकतंत्र संविधान को महत्व देता है, और दूसरी तरफ धर्म का मिजाज किसी भी कानून से परे का, हिंसक और हमलावर रहता है, और आमतौर पर धर्म नफरत पर जीता है। इस देश में धर्म ने पहले भी थोक में कत्ल करवाए हैं, और धार्मिक आस्था आज भी देश की तरक्की के खिलाफ आकर खड़ी हो जाती है। धार्मिक आस्था लोकतंत्र के खिलाफ भी खड़ी रहती है, और संविधान को हिकारत से देखती है। संविधान को हिकारत से देखने वाले लोग इसी संविधान के तहत उन्हें मिले हुए अधिकारों का बेजा इस्तेमाल करते हुए संसद तक पहुंचते हैं, अपनी जरूरत के लिए सरकार और अदालत तक दौड़ लगाते हैं, और जब उन्हें अपनी धर्मान्धता अधिक प्यारी होती है, तब वे लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों को कुचलते हुए किसी मस्जिद के गुम्बदों तक पहुंच जाते हैं। 
भारत एक धर्मालु देश तो है, लेकिन उसे धर्मान्ध देश बनाने पर आमादा ताकतें इस देश की तरक्की को रोक रही हैं, उसकी संभावना खत्म कर रही हैं। जनता का एक बड़ा तबका इसके खतरों को समझने की समझ नहीं रखता है, और उसे धार्मिक उन्माद के नारों के बीच बेसमझ बनाकर रखने की साजिश बड़ी कामयाब हुई है। अमरीका में किसी धर्म से नफरत का नतीजा कल सामने आया है, और हिन्दुस्तान भी धार्मिक-नफरत के साथ जीते हुए ऐसी हिंसा से बहुत दूर नहीं रहने वाला है।  

(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अक्टूबर

बलात्कार में इज्जत किसकी लुटती है, समझने की जरूरत

संपादकीय
27 अक्टूबर 2018


आए दिन हिन्दी के अखबारों में यह पढऩे मिलता है कि किसी एक आदमी ने, या कुछ लोगों ने मिलकर, किसी एक महिला या लड़की की इज्जत लूट ली। बड़े-बूढ़े समाज के भीतर यह नसीहत देते ही रहते हैं कि लड़की को अपनी इज्जत बचाने की खुद भी फिक्र करनी चाहिए। और अभी दो दिन पहले झारखंड की एक खबर आई कि एक लड़की के साथ उसके चाचा ने बलात्कार किया, और पंचायत ने फैसला दिया कि उन दोनों को जिंदा जला दिया जाए। 
समाज का यह मर्दाना रूख न तो नया है, और न ही इक्कीसवीं सदी में पहुंची हुई दुनिया में भी यह कम हिंसक हुआ है। बलात्कार करने वाले लोग अपनी इज्जत नहीं खोते, और जिस लड़की के साथ बलात्कार होता है, उसकी इज्जत चली जाती है! यह हिंसक नजरिया मर्दों को यह बलात्कारी मर्दानगी जारी रखने का हौसला देता है क्योंकि इससे मर्द की इज्जत तो जाती नहीं। लोग लड़कियों और महिलाओं को ही अकेले न निकलने, कपड़े सावधानी से पहनने, और मर्दों के बीच न उठने-बैठने की दर्जनों नसीहत देते दिख जाते हैं, लेकिन लड़कों को कैसा रहना चाहिए, उन्हें क्या-क्या नहीं करना चाहिए, ऐसी नसीहत देते कोई परिवार शायद ही दिखते हों। नतीजा यह होता है कि जब बलात्कारी अपने पूरे परिवार की इज्जत को मिट्टी में मिला देता है, तब भी इज्जत लुट जाने की बात लड़की के लिए ही लिखी जाती है। बोलचाल में कहा जाता है कि वह अब कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगी, मानो बलात्कारी का चेहरा दमक रहा हो, और वह अखबार के पहले पन्ने के लायक हो। 
जब से भारत में कुछ प्रमुख महिलाओं ने उनके साथ हुए यौन शोषण, या यौन प्रताडऩा की शिकायतें की हैं, तब से सोशल मीडिया पर महिलाओं के पूरे तबके के खिलाफ तरह-तरह के लतीफे बन रहे हैं, तरह-तरह के कार्टून बन रहे हैं, और मर्दों की सारी रचनात्मक कल्पनाशीलता जोरों से इस्तेमाल हो रही है। बलात्कार को लेकर मजाक के इस हद तक आम हो जाने का यह शायद पहला ही मौका है, और कुछ प्रमुख मर्दों पर लगी तोहमतों को लेकर मानो जवाब में बाकी तमाम मर्द-बिरादरी जवाबी हमले के तेवरों में आ गई है। दरअसल मर्दों के पूरे तबके को यह मालूम है कि यह सिलसिला महानगरों और प्रमुख महिलाओं से आगे बढ़कर छोटे शहरों और आम महिलाओं तक अगर आगे बढ़ेगा तो तकरीबन तमाम मर्द किसी न किसी किस्म की दिक्कत में आ जाएंगे। 
लेकिन जैसा कि हमने इस मुद्दे पर लिखते हुए पहले भी लिखा है कि ऐसे मौके समाज को आत्ममंथन का एक मौका भी देते हैं कि उसकी भाषा, उसके मुहावरे, उसकी कहावतें, और उसके शब्द किस तरह बेइंसाफी की बात करते हैं, किस तरह वे महिलाओं के खिलाफ हिंसक रहते हैं। यह सिलसिला लगातार जागरूकता पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल होना चाहिए, न सिर्फ महज भांडाफोड़ के लिए, बल्कि महिलाओं के लिए काम की जगहों पर, समाज में एक सुरक्षित माहौल बनाने के लिए, बल्कि समाज की भाषा को भी सुधारने के लिए। मीडिया जो कि आमतौर पर पढ़ा-लिखा माना जाता है, उसे भी यह समझने की जरूरत है कि इज्जत बलात्कारी की लुटती है, न कि बलात्कार की शिकार महिला की। अखबारी भाषा का यह मर्दाना रुझान बदलना चाहिए, और आज लोगों की जिंदगी में खासे हावी हो चुके मीडिया को अपने राजनीतिक-शिक्षण की फिक्र भी करनी चाहिए।
-सुनील कुमार

(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अक्टूबर

वोट मशीन पर एक की जगह तीन बटनें दबाना शुरू हो?

संपादकीय
26 अक्टूबर 2018


चुनाव के वक्त अकसर मन में एक बात उठती है कि अच्छी पार्टी के बुरे कैंडीडेट और बुरी पार्टी के अच्छे कैंडीडेट गर आमने-सामने हों तो किसे वोट दिया जाए? यह दुविधा तब भी कोई कम नहीं होती जब एक तरफ साम्प्रदायिक विचारधारा की पार्टी का कोई अच्छा जनसेवक उम्मीदवार हो और दूसरी तरफ घोषित रूप से अपने को धर्म निरपेक्ष पार्टी का कहने वाला, लेकिन भीतर से उतना ही साम्प्रदायिक, भू-माफिया या भ्रष्टï उम्मीदवार हो। जिन लोगों को विचारधारा की फिक्र होती है उनकी भावनाओं से भी जब पार्टी खिलवाड़ करते हुए बहुत ही लुच्चे को पार्टी प्रत्याशी बनाती है, तो वह मतदाताओं की संवेदनशीलता को चुनौती होती है।
आज भी लोगों को दो चीजों का एक जोड़ा ही चुनना होता है। पार्टी और प्रत्याशी, इनको साथ-साथ चुनना होता है, या साथ-साथ इनको छोड़ देना होता है। आज जिस तरह किसी भी प्रत्याशी को वोट न देने के लिए वोटरों के पास नोटा नाम का एक विकल्प आ गया है, क्या उसी तरह का कोई एक ऐसा विकल्प कभी आएगा कि लोग पार्टी को अलग वोट दें, और उम्मीदवार को अलग? ऐसा होने पर पार्टियों को अपने उम्मीदवारों के बारे में जनता की सोच का पता भी लगेगा। वैसे यह सोच बहुत असंभव नहीं है। ऐसा इंतजाम करके यह भी किया जा सकता है कि विधानसभा या संसद की कुछ सीटें पार्टियों को मिलने वाले वोटों के अनुपात में मनोनयन के लिए अलग से रखी जा सकें, और विधायक या सांसद सीधे निर्वाचित हो जाने के बाद पार्टियां अपने को मिले लोकप्रिय वोटों के अनुपात में कुछ गिने-चुने लोगों को और सदन में भेज सकें। 
लेकिन वोटर की जिस दोहरी जिम्मेदारी से यह बात शुरू की गई है, उसे देखें तो यह बात आसान नहीं रहती कि वह एक अच्छे प्रत्याशी को बुरी पार्टी के निशान पर वोट दे, या फिर बुरे प्रत्याशी को अच्छी पार्टी के निशान पर वोट दे। ऐसी एक काल्पनिक स्थिति अगर सच में ही सामने आ जाए कि हर वोटर दो वोट अलग-अलग डाले, एक वोट स्थानीय उम्मीदवार को, और दूसरा वोट पार्टी को, तो भी मतदाता की असली पसंद सामने आ पाएगी। हालांकि आज तक भारतीय चुनावों के संदर्भ में ऐसी कोई बात सोचने में भी नहीं आई है, लेकिन अगर हम मतदाताओं की असली और खरी पसंद की बात करें, तो यह एक बेहतर चुनाव का जरिया होगा। आज भी राजनीतिक दल अपने सांसदों और विधायकों की कुल गिनती के अनुपात में राज्यसभा में अपने कुछ उम्मीदवार भेजते हैं। यह तरीका सीधे जनता से चुनकर आए हुए मनोनीत सदस्यों का होगा, जिनकी गिनती तो जनता के वोटों से निकलेगी, लेकिन उन पर चेहरे तय करने का हक पार्टी का होगा। 
आज जब देश में एक साथ चुनाव पर चर्चा चल रही है, और लोग इस सोच के मुरीद भी हो रहे हैं, और इसे खारिज भी कर रहे हैं, तब ऐसी सैद्धांतिक चर्चा भी होनी चाहिए जो कि संसद और विधानसभाओं में जनता के वोट के अधिक से अधिक ईमानदार प्रतिनिधित्व का रास्ता निकाल सके। आज जिस तरह देश में होने वाले बहुत से चुनावी सर्वे नेता और पार्टी दोनों पर जनता की अलग-अलग सोच पूछते हैं, भारत का चुनाव ऐसा कुछ नहीं पूछता है। होना तो यही चाहिए कि वोटिंग मशीन पर हर चुनाव क्षेत्र में वोटर दो बटनों को दबाए, एक तो पसंद के उम्मीदवार के नाम वाली, और दूसरी पसंद की पार्टी वाली। ऐसा होने पर ही पार्टी को यह समझ आएगा कि कौन सा उम्मीदवार उससे कम या अधिक लोकप्रिय है। 
फिलहाल जब तक ऐसा कोई क्रांतिकारी फेरबदल भारत की चुनाव प्रणाली में नहीं होता, तब तक के लिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनके सामने आज जोड़े से जो विकल्प आते हैं, उनमें से वे किसको चुनें? अगर उम्मीदवार और पार्टी दोनों उनकी पसंद के हैं, तब तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अगर दोनों में से कोई एक गड़बड़ है, तो उन्हें बहुत ध्यान से वोट डालना चाहिए। हमारा यह कहना अधिक आसान है, लेकिन ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि जब लोग विधानसभा चुनाव में विधायक चुनने के लिए भी वोट डालते हैं, तो उस पल उनके ध्यान में संभावित मुख्यमंत्री का चेहरा भी रहता है कि उनका वोट आखिर किसे मुख्यमंत्री बनाएगा? तो क्या एक ऐसी चुनाव प्रणाली हो सकती है जो कि एक वोटिंग मशीन पर तीन बटनें रखे, जिससे लोग अपने स्थानीय विधायक या सांसद चुने, दूसरी बटन से पसंदीदा पार्टी को वोट दें, और तीसरी बटन से वे मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुनें? एक चुनाव में ऐसी तीन बटनें क्या जनता की असली पसंद साबित करेंगी?  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर


(Daily Chhattisgarh)

सीबीआई, अभूतपूर्व नौबत और मरम्मत की संभावना भी

संपादकीय
25 अक्टूबर 2018


सीबीआई में पिछले तीन दिनों से जो चल रहा है, उससे देश हक्का-बक्का है। इसके सबसे ऊपर के दो अफसर एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए सरकार तक दौड़ लगा रहे थे, और एक-दूसरे के खिलाफ कथित सुबूत भी पेश कर रहे थे। ऐसे में देश की इस सबसे बड़ी जांच एजेंसी की साख चौपट हो रही थी, और हमने दो दिन पहले इसी जगह लिखा था कि इन दोनों अफसरों को हटा दिया जाना चाहिए, तभी जांच की विश्वसनीयता बनी रहेगी। लेकिन इन्हें हटाने के तरीके कानून में लिखे हुए हैं, और जिस तरह से सीबीआई प्रमुख को सरकार ने छुट्टी पर भेजा है, उसे लेकर वे सुप्रीम कोर्ट गए हैं कि उन्हें गैरकानूनी तरीके से कुर्सी से हटाया गया है। देश में यह सनसनीखेज बात भी चल रही है कि पिछले दिनों प्रशांत भूषण और अरूण शौरी ने जिस तरह सीबीआई प्रमुख से मिलकर रफाल विमान खरीदी में भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए कागजात उन्हें दिए थे, वह बात भी सरकार को पसंद नहीं आई थी। और अब जब सीबीआई प्रमुख को छुट्टी पर भेज दिया गया है, तो ये आरोप सामने आ रहे हैं कि वे इस विमान खरीदी मामले की जांच की तरफ आगे बढ़ सकते थे, इसलिए उन्हें हटाया गया है। इसके साथ ही दूसरे आरोप ये भी हैं कि सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना, जिनके खिलाफ डायरेक्टर आलोक वर्मा ने जुर्म दर्ज करवाया था, वे गुजरात से आए हुए मोदी के पसंदीदा अफसर थे। ऐसे भी आरोप हैं कि आधी रात के बाद जिस अंदाज में सीबीआई के दफ्तर में इन दोनों बड़े अफसरों के कमरों को सील किया गया, वहां से जब्ती की गई, या उनके जांच अफसरों को ट्रांसफर करके बाहर भेजा गया, वह सब कुछ अभूतपूर्व है, और कानूनी तौर-तरीकों से परे है। 
यह पूरा मामला चूंकि सुप्रीम कोर्ट में है, इसलिए इसके पहलुओं की संवैधानिकता आने वाले दिनों में स्थापित हो जाएगी। पहली नजर में यह नौबत मोदी सरकार की छवि और उसकी साख को चौपट करने वाली है। देश में एक ऐसी तस्वीर बनी हुई है कि केन्द्र सरकार मोदी की मजबूत पकड़ के तहत ही काम करती है, और ऐसे में देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी, जो कि सरकार के प्रति जवाबदेह है, सरकार के काबू में है, और स्वायत्त नहीं है, उसमें ऐसा सब कुछ हो जाना, लोगों को हक्का-बक्का करता है। बहुत से लोगों ने सोशल मीडिया और दूसरी जगहों पर यह भी लिखा है कि मोदी लगातार उन मुद्दों पर बोल रहे हैं जो कि देश के असल मुद्दे नहीं हैं, और महत्व से परे के हैं। दूसरी तरफ लोग लंबे समय से यह भी कहते आए हैं कि मोदी ज्वलंत मुद्दों पर जरूरत रहते हुए भी चुप रहते हैं, और ऐसा समझ नहीं पड़ता है कि वे सचमुच ही तमाम चीजों पर काबू रख रहे हैं। कहने के लिए यह भी कहा जा सकता है कि सीबीआई पर काबू न रखना, और ऐसी खराब नौबत आने देने की छूट देना सरकार की साख की बात है कि वह इस जांच एजेंसी पर काबू नहीं रखती। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह भी है कि इस जांच एजेंसी सहित देश की तमाम दूसरी एजेंसियों और संवैधानिक संस्थाओं पर मोदी की मजबूत पकड़ बनी हुई है। 
आज यह नौबत भारतीय लोकतंत्र के लिए भारी फिक्र की है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी में परले दर्जे का भ्रष्टाचार है, और वहां से अफसरों को सरकार या तो इस तरह से हटा रही है, या उसे इस तरह से हटाना पड़ रहा है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि जब सरकार के फैसले बुरी तरह गलत होते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट को दखल देने का एक मौका मिलता है और उसकी दखल सरकारी गलतियों को, गलत कामों को सुधार भी पाती है। यह पूरा मामला बड़ा उलझा हुआ है, और उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जवाबदेही के रास्ते सरकार को भी अपनी बात कहने मिलेगी, कहनी पड़ेगी, और यह भी साबित हो सकेगा कि सीबीआई के अफसरों में सही कौन है, और गलत कौन है, या फिर दोनों ही गलत हैं, और पूरी संस्था में ही बड़ी मरम्मत की जरूरत है। अभी सतह पर तैरती हुई जानकारियों को लेकर हम किसी नतीजे पर पहुंचना बेहतर नहीं समझते क्योंकि दो-चार दिनों के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट में खुलासा होने जा रहा है।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अक्टूबर

कायर संसद और सरकार का काम कर रही है अदालत....

संपादकीय
24 अक्टूबर 2018


सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर जो रोक लगाई है, वह जजों के अपने घरों को बचाने के लिए नहीं है, वह देश की जनता की सेहत को बचाने के लिए है। यह रोक वैसी ही है जैसी कि नदियों में प्रतिमाओं के विसर्जन पर लगी है, या किसी भी तरह के तेज लाउडस्पीकर के शोर पर लगी है, या गाडिय़ों के प्रदूषण पर लगी है, या पेड़ों की कटाई पर लगी है। कुल मिलाकर जब लोग अपने धार्मिक, या संपन्नता के उन्माद में धरती को तबाह करने पर आमादा हो जाते हैं, और वोटों पर जिंदा संसद और सरकार  हौसला खो बैठती हैं, तब सुप्रीम कोर्ट को सामने आना पड़ता है। यह अकेला मामला नहीं है, बहुत से धर्मों के बहुत से नुकसानदेह रीति-रिवाज को लेकर ऐसी रोक लगी हैं, और इन्हें बेवकूफों ने अपनी धार्मिक आस्था पर चोट करार दिया है। 
जिन भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में हिन्दुस्तान में पटाखे फोड़े जाते हैं, उनका इतिहास खासा पुराना बताया जाता है। और पटाखों वाली बारूद का आविष्कार अभी कुछ सौ बरस पहले का ही है। इसलिए यह जाहिर है कि राम जब अयोध्या लौटे होंगे, तब पटाखे तो नहीं ही जले होंगे। आज हालत यह है कि पटाखों की वजह से देश की सवा सौ करोड़ की आबादी में से कई करोड़ लोग सांस की तकलीफ पाने लगते हैं, बच्चों और बुजुर्गों को अधिक तकलीफ होती है, जानवरों को खुले में और भी अधिक तकलीफ होती है। इसके साथ जुड़ी हुई एक दूसरी बात यह है कि बड़े-बड़े पटाखे आखिर कौन जलाते हैं, कौन फोड़ते हैं, वे ही लोग ऐसा करते हैं जिनके पास अंधाधुंध अधिक पैसा है। गरीब तो अपने घर के दीयों के लिए तेल भी मुश्किल से खरीद पाते हैं, और लक्ष्मी को भी लाई-बताशे से अधिक कुछ नहीं चढ़ा पाते हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पहली नजर में हिन्दू धर्म के रीति-रिवाज के उन्मादीकरण के खिलाफ लगता है, लेकिन यह धरती को बचाने वाला है। ऐसा प्रदूषण लोगों को इतनी तकलीफ दे जाता है, हवा इतनी जहरीली कर जाता है कि लंबे समय तक लोग धीमी मौत मरते हैं। 
देश में आज धर्मान्धता और धार्मिक उन्माद का बुरा हाल है। लोग एक-दूसरे के धर्म की अच्छी बातों से कुछ सीखने की बात तो नहीं करते, लेकिन एक-दूसरे की बुरी बातों के मुकाबले अपने धर्म में बुरी मिसालों को खड़ा करने, और उन्हें बढ़ाने में जरूर जुट जाते हैं। हिन्दुओं के पटाखों का सबसे बड़ा प्रदूषण हिन्दू बस्तियों में होता है, और उसे सबसे संपन्न तबका सबसे अधिक करता है, लेकिन इसे घटाने के लिए अदालत ने एक आदेश दिया, तो मध्यप्रदेश का एक भाजपा सांसद उस आदेश को तोडऩे की बयानबाजी करने लगा है। लोग अपनी आल-औलाद और अपनी अगली पीढ़ी को भी बारूद के जहर को देने के लिए आमादा हैं, इससे अगर उन्हें अपने धर्म की गुंडागर्दी कायम करने का मौका मिले। यह आत्मघाती सिलसिला खत्म करना चाहिए, और देश के नेताओं को भी कायरों की तरह चुप्पी बनाए रखना बंद करना चाहिए। किसी धर्म ने लाउडस्पीकर और बारूद की वकालत नहीं की है। बल्कि आज धर्म की हिंसा को कायम करने के लिए जितने किस्म के हथियार और औजार इस्तेमाल किए जा रहे हैं, उनमें से कोई भी उन धर्मों के शुरू होने के वक्त बने नहीं थे। आज से सैकड़ों बरस पहले कबीर ने जिस हौसले के साथ मस्जिद की मीनार पर चढ़कर अजान करते हुए मुल्ला को मुर्गा कहा था, वह हौसला आज किसी सरकार या किसी संसद में बाकी नहीं है। इसलिए जब सुप्रीम कोर्ट बेकसूर और मासूम आम और गरीब लोगों को बचाने के लिए आगे आता है, तो हम पूरी तरह से उसके साथ हैं। आज बहस इसी बात पर हो सकती है कि दीवाली की रात लक्ष्मी पूजा के महूरत के आसपास कुछ देर पटाखे फोडऩे की छूट कैसी दी जा सकती है जैसी कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्रिसमस और नए साल पर दी है। लेकिन इसकी सीमा कड़ाई से तय होनी चाहिए, और इसमें कोई रियायत नहीं मिलनी चाहिए। अपने धार्मिक आडंबर को लेकर अगर किसी धर्म के नेता आत्महत्या करना चाहते हैं, तो वे उसे अपने बंद घर के भीतर करें जिस पर अब कोई कानूनी रोक भी नहीं है। अपने धार्मिक आडंबर की हिंसा दूसरों पर लादने वालों को अदालत कड़ी से कड़ी सजा दे, और इसकी शुरूआत मध्यप्रदेश के उस भाजपा सांसद से हो सकती है जिसने अदालत के हुक्म को तोडऩे की खुली मुनादी कर दी है। 
-सुनील कुमार

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अक्टूबर

चुनावी मौका महज राजनीतिक तैयारी का नहीं है, बल्कि उससे अधिक वोटरों की तैयारी का है

संपादकीय
23 अक्टूबर 2018


छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में पहले दौर की दर्जन भर सीटों पर नामांकन आज खत्म हो रहा है। इसके साथ ही कांगे्रस और भाजपा के बीच, बाकी कुछ और पार्टियां की मौजूदगी में खींचतान शुरू हो जाएगी। कई उम्मीदवार पार्टी बदलकर मैदान में होंगे, कई उम्मीदवार पार्टी छोड़कर निर्दलीय लड़ेंगे, और इस बार सभी नब्बे सीटों पर राज्य बनने के बाद से पहली बार इस तरह का एक चौतरफा माहौल रहेगा जिसके चलते जीत की अटकल खासी मुश्किल भी हो सकती है। लेकिन जो भी हो, वोट के दिन तो वोटर को मशीन पर सारे नाम दिखेंगे, और सारे निशान दिखेंगे। उसे यह तय करना होगा कि वह किसे वोट दे।
आज यहां पर इस मुद्दे पर चर्चा का मकसद यह है कि अभी से लेकर वोट के दिन तक उम्मीदवार और बाकी पार्टियों के नेता, जो-जो लोगों के सामने पहुंचें, उनके लिए कुछ अच्छे तीखे सवाल तैयार करके रखना चाहिए। ये सवाल सरकार की नाकामयाबी पर भी हो सकते हैं, विपक्षी विधायकों या नेताओं के निकम्मेपन पर भी हो सकते हैं, उनके अपने चाल-चलन या उनके जुर्म को लेकर हो सकते हैं, उनके पास पिछले बरसों में राजनीति के चलते जुट गई दौलत को लेकर भी हो सकते हैं, उनके परिवार की गुंडागर्दी पर भी हो सकते हैं। जो जनता सवाल नहीं पूछ सकती, उसे फिर अगले पांच बरस तक किसी बात का जवाब भी नहीं मिलता। इसलिए वोटरों में जो जिंदा हैं, जिन्हें अपने वोट की फिक्र है, जनता के खजाने के नोट की फिक्र है, नेताओं की नीयत में खोट की फिक्र है, और लोकतंत्र में चुनाव के वक्त चोट की फिक्र है, उन्हें नेताओं के आने के पहले सवाल तय करके रखने चाहिए।
जनता को चुनाव के वक्त क्या-क्या करना चाहिए, इस मुद्दे पर हम आने वाले दिनों में भी इस जगह पर कई बार लिखेंगे, और बेतरतीब दिखेंगे क्योंकि चुनाव तक की जिंदगी कोई बहुत सिलसिलेवार रहने वाली नहीं है। लोगों को इस चुनाव को लेकर, पार्टियों को लेकर, केंद्र और राज्य की सरकारों को लेकर, पेट्रोल और डीजल को लेकर, अस्पतालों में कुछ होने, और बाकी सब कुछ न होने को लेकर, कलेक्ट्रेट से लेकर तहसील तक जारी लूट को लेकर अपने आसपास के लोगों से बात करनी चाहिए। और यह ध्यान रहे कि यह बात ऐसे लोगों से करने का कोई मतलब नहीं है जो किसी पार्टी के साथ हैं, जो किसी नेता के साथ हैं। जिनकी विचारधारा पहले से इतनी तय है कि उनकी आंखें और उनके दिमाग बंद हैं, उनसे बात करने का कोई मतलब नहीं है। जिनके मन में संदेह है, जिनके मन में असमंजस है, जो फैसले से खासे दूर हैं, ऐसे ही लोग चुनाव के नतीजे तय करते हैं, और ऐसे ही लोगों को आपस में एक-दूसरे से बात करनी चाहिए। ऐसे लोग तटस्थ होकर बात शुरू कर सकते हैं, और फिर बातों के नतीजे उन्हें किसी किनारे तक पहुंचा भी सकते हैं। इसलिए पार्टियों के प्रति समर्पित लोगों से कोई भी चर्चा नहीं करनी चाहिए, जब तक कि वे घर पर वोट मांगने न आ जाएं। और उस वक्त की तैयारी के लिए लोगों को एक-दूसरे से चर्चा करके, असहमति की बातें सुनकर अलग-अलग कई सवालों पर किसी सहमति तक पहुंचना चाहिए कि किस पार्टी और किस नेता से क्या-क्या पूछा जाएगा। जनता को नेताओं के आसपास सवालों के ऐसे घेरे खड़े करने चाहिए कि वे वहां से निकलने के बाद अगले दरवाजे तक पहुंचने के पहले आशंका से भरे रहें। चुनाव में आज महज पार्टियां और नेता तैयारी करते दिखते हैं। यह लोकतंत्र की भारी नाकामयाबी है। चुनाव में दरअसल जनता को तैयारी करनी चाहिए और सवाल लेकर खड़े रहना चाहिए कि वोट की बात बाद में करना, पहले इन बातों का जवाब दो। हर मुहल्ले में ऐसे लोग जरूर रहते हैं जो कि सोचते-समझते हैं, और आपस में राजनीतिक चर्चा भी करते हैं। उन्हें वजनदार और ठोस सवाल लेकर तैयार रहना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 23 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अक्टूबर

ऐसी सीबीआई की जांच पर आखिर किसका भरोसा होगा?

संपादकीय
22 अक्टूबर 2018


देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई के मत्थे अलग-अलग पार्टियों के राज वाली राज्य सरकारों से जुड़े मामले भी आते हैं, और देश के बड़े-बड़े आर्थिक अपराध भी। ऐसे में यह पहला मौका है जब इस जांच एजेंसी के दो सबसे सीनियर अफसरों के बीच भ्रष्टाचार की तोहमतों को लेकर एक-दूसरे पर गंभीर आरोप मढ़े जा रहे हैं, और सीबीआई डायरेक्टर की पहल पर उनके ठीक नीचे के स्पेशल डायरेक्टर के खिलाफ रिश्वत लेने का जुर्म दर्ज कर लिया गया है। पिछले कुछ महीनों में लगातार इस स्पेशल डायरेक्टर ने सीबीआई डायरेक्टर पर भ्रष्टाचार की औपचारिक शिकायतें केन्द्र सरकार को भेजी थीं, और अब उनका कहना है कि इसके जवाब में उनके खिलाफ यह जुर्म दर्ज किया गया है। यह पहला मौका नहीं है जब सीबीआई डायरेक्टर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों, अभी कुछ बरस पहले इस एजेंसी के डायरेक्टर रहे अफसर पर जांच से घिरे लोगों से घर पर मिलने के गंभीर आरोप लगे थे, और वे बाद में जांच में तब्दील भी किए गए थे, उनके खिलाफ भी जुर्म दर्ज है। और यह सब उस वक्त है जब सीबीआई में होने वाली किसी मामूली पोस्टिंग के पहले भी देश की खुफिया एजेंसियां उन लोगों के बारे में जांच-पड़ताल करके अपनी रिपोर्ट देती हैं, तब कहीं जाकर उन्हें इस प्रीमियम जांच एजेंसी में लिया जाता है। लेकिन हाल के बरसों में सबसे ऊपर की कुर्सी पर जिस तरह जुर्म दर्ज हो रहे हैं, उनको देखते हुए यह लगता है कि एजेंसी की साख का अब क्या होगा और इसकी जांच को किस हद तक खरीदा जा सकता है। 
दूसरी तरफ जिस लोकपाल को बनाने की मांग करते हुए अन्ना हजारे ने यूपीए सरकार के खिलाफ लंबा आंदोलन चलाया था, उस लोकपाल की आज मोदी सरकार के पांचवें बरस में भी कोई खबर नहीं है। और ताजा विवाद यह उठ खड़ा हुआ है कि लोकपाल चयन समिति में स्टेट बैंक की रिटायर्ड चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य को भी सदस्य बनाया गया था, और उन्होंने अब मुकेश अंबानी की रिलायंस में डायरेक्टर का पद मंजूर किया है। इसके साथ-साथ लोकपाल चयन समिति से उनके इस्तीफे की कोई खबर नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना जायज है कि केन्द्र सरकार की पसंदीदा कही जाने वाली अंबानी-कंपनी और लोकपाल चयन समिति, इन दोनों में वे साथ-साथ कैसे रह सकती हैं? 
सीबीआई को लेकर देश में हमेशा से यह बहस चलती रही है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी इस जांच-एजेंसी का अपने विरोधियों के खिलाफ, अपने को नापसंद कारोबारियों के खिलाफ मनचाहा इस्तेमाल करती है। यह इस्तेमाल जरूरी नहीं है कि जांच में किसी बेकसूर को कुसूरवार साबित कर दे, या किसी कुसूरवार को बेकसूर। जांच में कब कहां देर करनी है, किस मुजरिम को सरकारी गवाह बनाना है, किसका चालान पहले पेश करना है, ऐसे बहुत से मामले आए दिन खबरों में रहते हैं, और कोई नेता सीबीआई को प्रधानमंत्री का थाना कहता है, तो कोई नेता इसे प्रधानमंत्री का तोता। क्या ऐसे में लोकपाल जैसी कोई संस्था बनाकर सीबीआई जांच एजेंसी को उसके मातहत रखना ही ईमानदारी से जांच का अकेला जरिया हो सकता है? या फिर लोकतंत्र के तहत ऐसी अपार ताकत वाली किसी एजेंसी को बनाना लोकतंत्र के बाकी स्तंभों के खिलाफ एक खतरनाक फैसला हो सकता है, इस पर दुनिया में बहस चलती रहती है। अमरीका में भी वहां की ऐसी केन्द्रीय जांच एजेंसी एफबीआई को लेकर समय-समय पर ऐसी बात उठती रही है कि वह अपने आपमें एक संविधानेत्तर सत्ता बन जाती है जो कि संसद और सरकार, अदालत और अमरीकी लोकतंत्र, सबसे ऊपर हो जाती है। 
हमारे पास सीबीआई को लेकर आनन-फानन कोई सुझाव नहीं है, लेकिन इतना जरूर लगता है कि जिन बड़े या छोटे अफसरों पर इतने गंभीर आरोप लगते हैं, ऐसे जुर्म दर्ज होते हैं, उन्हें क्या कुर्सी से तुरंत ही हटा नहीं देना चाहिए? यह बात महज साख की नहीं है, यह बात एजेंसी के जिम्मे दी गई जांच की भी है कि अगर अफसर सच ही इतने भ्रष्ट हैं, सच ही इतना बिकाऊ हैं, तो फिर उनके मातहत की जा रही जांच कितनी ईमानदार रह सकेगी? हमारा यह भी ख्याल है कि सीबीआई के अफसरों को अपना सरकारी और निजी जीवन पारदर्शी रखने की शर्त माननी चाहिए, और उनके फोन, उनका मिलना-जुलना, इन सबको कम से कम खुफिया या निगरानी एजेंसी के लिए खुला रखना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

बात की बात,22 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अक्टूबर

चेहरों को लेकर भाजपा ने एक बड़ी संभावना खो दी..

संपादकीय
21 अक्टूबर 2018


छत्तीसगढ़ भाजपा की विधानसभा उम्मीद्वारों की लिस्ट हैरान करने वाली है। इसमें मंत्रिमंडल की एक सबसे दीन-हीन महिला मंत्री को छोड़कर तमाम मंत्रियों को फिर उम्मीदवार बनाया गया है, और दो कमजोर संसदीय सचिवों की टिकट काटी गई है, जिनमें से एक के पति को उम्मीदवार बना दिया गया है। करीब दर्जन भर विधायकों की टिकट काटी गई है लेकिन करीब दर्जन भर पिछली बार के परास्त भाजपा उम्मीदवारों को टिकटें दे दी गई हैं। कुल मिलाकर सत्ता के खिलाफ जनता की नाराजगी को दूर करने की जो उम्मीद उम्मीदवार बनाने के मौके पर थी, वह धरी की धरी रह गई, और भाजपा तकरीबन वही चेहरे लेकर जनता के सामने जा रही है जिनमें से सबसे अधिक नापसंद चेहरे सबसे लंबे समय से सत्ता पर बने हुए हैं, और जनता की नाराजगी से परे जो बदनामी के भी शिकार हैं। पहली नजर में ऐसा लगता है कि भाजपा अपने ही भीतर के जरूरत से अधिक ताकतवर हो चुके नेताओं के धन-बल से इतनी सहम गई है कि उनमें से किसी की टिकट काटना उसे ठीक नहीं लगा। ऐसा माना जाता है कि ये ताकतवर लोग अगर खुद टिकट नहीं पाते, तो अपनी सीटों पर किसी और को जीतने भी नहीं देते, और करोड़ों खर्च करके अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को हरा भी देते। पार्टी ने एक-दो नेताओं की टिकट काटी भी, तो उनके परिवार के लोगों को ही दे दी। कुल मिलाकर भाजपा पांच बरस पहले का चेहरा लेकर ही जनता के सामने जा रही है। 
यह एक खतरनाक नौबत है और कम से कम भाजपा तो राजनीतिक विश्लेषकों को कुछ हिम्मत की उम्मीद थी कि वह जीत-हार से परे का हौसला दिखाते हुए भी कुछ बदनाम चेहरों को हटाकर कुछ बेनाम चेहरों को सामने लाने का हौसला दिखाएगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है। हो सकता है कि पार्टी ने यह नतीजा निकाला हो कि अच्छे या बुरे जैसे भी हैं, उसके मौजूदा नेता जीत की संभावना रखते हैं, और चुनाव में तो किसी पार्टी की साख महज जीत के आंकड़ों तक सीमित रहती है, किसी नामी या बदनामी को उम्मीदवार बनाने से सदन में बहुमत साबित होने में फर्क नहीं पड़ता। लेकिन ऐसा करते हुए भाजपा एक बात को भूल गई है कि पन्द्रह बरस का समय किसी भी सरकार के लिए खासा लंबा होता है, और जनता के सामने इतने बरस की सत्ता से नाराजगी की कोई न कोई वजह पैदा हो ही जाती है। चुनावी जुबान में जिसे एंटीइन्कमबेंसी कहा जाता है, सत्ता से वह नाराजगी कम करने की एक आसान चुनावी तरकीब चेहरों को बदलने की रहती है। चेहरे हट जाते हैं तो नए लोगों से लोगों की नाराजगी उतनी अधिक नहीं रह जाती। लेकिन भाजपा ने इस बार इसकी जरूरत नहीं समझी। इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं, लेकिन मोटे तौर पर जो दो वजहें हैं, उनमें से एक तो हमने ऊपर गिना दी है, और दूसरी वजह यह है कि पार्टी शायद 65 सीटों के दावे पर खुद भी अधिक भरोसा नहीं करती है इसलिए उसने पुराने धनबलियों को नाराज करने का जरा भी खतरा नहीं उठाया है, और उन्हें ही अगले पांच बरस के लिए भी पूंजीनिवेश करके जीत आने का मौका दे दिया है। 
छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नाम आने अभी बाकी हैं। अभी कुल दर्जन भर उम्मीदवार तय हुए हैं, और ऐसे मौके पर भाजपा के कुछ बदनाम और दिग्गज नामों के मुकाबले अगर कांग्रेस कुछ नए और शरीफ लोगों को ढूंढ सकती है तो ऐसी सीटों पर हैरान करने वाले नतीजे भी आ सकते हैं। भाजपा ने पन्द्रहवें बरस में चुनाव की बुनियादी जरूरतों को चेहरे तय करते हुए अनदेखा किया है, और कांग्रेस इसका फायदा उठा सकती है। इसके पहले के चुनावों में भी टिकट पाने वाले मंत्रियों को जनता ने नकार दिया है, और इस बार भी अगर वैसा होगा, तो कोई हैरानी नहीं होगी। आज भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर अमित शाह जितने ताकतवर और हौसले वाले नेता कहे जाते हैं, वह हौसला छत्तीसगढ़ में बदनाम चेहरों को हटाने में इस्तेमाल नहीं हुआ दिखता है। इस बार का चुनाव राज्य का ऐसा पहला चुनाव है जिसमें कांग्रेस और भाजपा से परे के कम से कम तीन अलग-अलग दल या गठबंधन ही मैदान में आखिर तक मौजूद रहने वाले हैं, और जोगी-बसपा, गोंगपा-सपा, आम आदमी पार्टी और सीपीएम, इन सबके बीच बंटने वाले वोटों के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच वोट कितने-कितने बंटेंगे, इसके लिए शायद हर सीट की आधी गिनती तक तो सांसें रूकी ही रहेंगी। फिलहाल भाजपा ने नए चेहरों को लाकर सोलहवें बरस में दाखिल होने की संभावना को खुद ही कुछ कम कर दिया है। आगे फिर वोट और नोट का काम तो बाकी है ही। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अक्टूबर

धर्म के नाम पर अराजकता से थोक में मौतें कल दिखीं

संपादकीय
20 अक्टूबर 2018


पंजाब का कल का हादसा दिल दहला देने वाला है क्योंकि हिन्दुस्तान में कभी भी किसी रेल हादसे में इस अंदाज में इतनी मौतें नहीं हुई हैं। दशहरे के रावण-दहन को देखने के लिए पटरी के किनारे एक मैदान पर हजारों की भीड़ इक_ा थी, और कुछ ऊंचाई से इसे देखने के लिए सैकड़ों लोग रेलवे पटरियों पर भी थे। इससे बुरा कोई दुर्योग नहीं हो सकता था कि जिस वक्त रावण जलने के साथ के पटाखों के धमाके गूंज रहे थे, सारे लोगों की नजरें रावण पर थीं, उसी वक्त एक ट्रेन आ गई, और जब लोग उसे देखकर दूसरी पटरी की तरफ लपके, तो उसी वक्त दूसरी पटरी पर भी ट्रेन आ गई। अंधेरे और भगदड़ में वहीं पर कटकर 50 से अधिक लोग मारे गए, और अब तक मौतें खासी बढ़ चुकी हैं। पंजाब की कांग्रेस सरकार और केन्द्र की एनडीए सरकार के बीच संबंध सांप-नेवले जैसे हैं, और लाशों के बीच भी एक दूसरे पर इस हादसे की तोहमत थोपने का सिलसिला चल रहा है। 
लेकिन राजनीतिक बकवास से परे सोचने की बात यह है कि अमृतसर शहर के बीच से गुजरते हुए ट्रेन को यह सूझा क्यों नहीं कि दशहरे जैसे भीड़भरे मौके पर ड्राइवर पटरियों को देखते हुए शहर पार करता। कल जब पंजाब में यह चल रहा था, उसी वक्त छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सबसे बड़े रावण-दहन की भीड़ भी पटरियों पर थी, और हर बरस की तरह रेलवे के सुरक्षा कर्मचारी वहां से रेंगती हुई रेलगाडिय़ों को लोगों के बीच से धीरे-धीरे निकाल रहे थे। पंजाब की खबर कहती है कि वहां पर भी उस जगह बीस बरस से रावण जल रहा था, और जाहिर है कि रेलवे को इसकी जानकारी भी रही होगी। तोहमतों से यह बात भी निकलकर आ रही है कि इसके पहले भी जिला प्रशासन उस जगह पर रावण जलाने की इजाजत देते आया है। 
दरअसल हिन्दुस्तान में धर्म के नाम पर जितने किस्म की बदअमनी होती है, वह बाकी तमाम किस्म के जुर्मों को मिला दिया जाए, तो भी वह उससे अधिक ही रहती है। पंजाब से दूर हिन्दुस्तान के दूसरे सिरे, केरल में एक मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर देश का यह सबसे शिक्षित, और समय-समय पर वामपंथी-शासन वाला राज्य आज जिस अंदाज में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन देख रहा है, वह भी हैरान करने वाली बात है। जिस केरल में पुरूषों से अधिक कामकाजी महिलाएं हैं, वहां के एक बड़े ईश्वर के दरबार में महिलाओं को घुसने से रोकने के लिए वहां के मर्द, और औरतें भी सुप्रीम कोर्ट का विरोध करना भी ठीक समझ रहे हैं। यह हाल इक्कीसवीं सदी का है, और सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले के बाद का है। देश भर में दूसरी जगहों पर भी छोटे-छोटे त्योहार, या बड़े-बड़े धार्मिक जलसे जिस किस्म की अराजकता लोगों के सामने रखते हैं, वह हैरान कर देती है। धार्मिक अंधविश्वास, धर्मान्धता, और हिंसक साम्प्रदायिकता मिलकर देश के संविधान की किताब के छोटे-छोटे टुकड़े करके हवा में उड़ा देते हैं। यह सिलसिला शिक्षा और उच्च शिक्षा के बढऩे के साथ, शहरीकरण बढऩे के साथ घट नहीं रहा है, बल्कि बढ़ते ही चल रहा है। जिस राम मंदिर के नाम पर 1992 में देश ने हजारों जिंदगियां खोई थीं, आज एक बार फिर उसी राम मंदिर के नाम को लेकर कानून से ऊपर के फतवे दिए जा रहे हैं। एक तरफ कहा जा रहा है कि कानून केरल के सबरीमाला में महिलाओं के दाखिले के लिए दखल न दे, और दूसरी तरफ अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले को अनदेखा करके संसद में एक कानून बनाने का फतवा भी दिया जा रहा है। 
आज दुनिया के जो देश आगे बढ़ रहे हैं, वे ऐसी धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता को अनदेखा करके विज्ञान, तकनीक, और लोकतंत्र के रास्ते पर चलकर आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में इसी विज्ञान, तकनीक, और लोकतंत्र को कुचलकर एक झूठे और अवैज्ञानिक आत्मगौरव को हिंसक बढ़ावा दिया जा रहा है, उसे राष्ट्रवाद के नाम पर असल इतिहास की कीमत पर आक्रामक बनाया जा रहा है। ऐसे माहौल में किसी धार्मिक जलसे की भीड़ को काबू कर पाना बिल्कुल भी मुमकिन नहीं रह गया है, न सरकार के लिए, न अदालत के लिए, और संसद तो मानो वोटरों की किसी भी बड़ी और हिंसक गिरोहबंदी के सामने लेट ही जाती है। ऐसे में धर्म के नाम पर अराजकता कितनी जिंदगियां ले सकती है, यह कल पंजाब ने देखा है। छत्तीसगढ़ में इस नवरात्रि पर दो अलग-अलग सड़क हादसों में ओवरलोड गाडिय़ों की टक्कर में दस-दस लोग मारे गए। जाहिर तौर पर ये गाडिय़ां नियम-कानून तोड़कर चल रही थीं, और सरकार की यह पूरी जिम्मेदारी थी कि ऐसे भीड़भरे नाजुक मौके पर ड्राईवरों के नशे की जांच करती, ओवरलोड की जांच करती, रफ्तार की जांच करती। लेकिन तीर्थयात्रा पर आते-जाते लोगों को भला कौन खफा करे?  (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 20 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अक्टूबर

आधार-अनिवार्यता के चक्कर में सरकार से हुई अनदेखी...

संपादकीय
18 अक्टूबर 2018


आज खबर है कि भारत के पचास करोड़ मोबाइल फोन कनेक्शनों पर पहचान पत्र न होने का खतरा आ सकता है क्योंकि लोगों से कंपनियों ने आधार कार्ड मांगकर कनेक्शन दिए थे, और अब सुप्रीम कोर्ट ने तमाम निजी कंपनियों को आदेश दिया है कि वे आधार कार्ड से जुड़ी जानकारियां अपने रिकॉर्ड से खत्म करें। अदालत ने आधार कार्ड की अनिवार्यता कुछ चुनिंदा कामों के लिए ही जारी रखी है, और फोन कनेक्शन के लिए उसे खत्म कर दिया है। 
यह नौबत केन्द्र सरकार की एक चूक से आई हुई लगती है क्योंकि पिछले एक बरस से भी अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड के खिलाफ जनहित याचिका चल रही थी, और अदालत का रूख अनिवार्यता के खिलाफ दिख रहा था। उसी समय केन्द्र सरकार को मोबाइल फोन कनेक्शन के लिए आधार के अलावा किसी और पहचान पत्र को भी जरूरी कर देना था ताकि आज आधार की जानकारी हटा देने पर भी कंपनियों के पास फोन ग्राहक की एक जानकारी तो बची रहती। दरअसल इस देश में डिजिटलीकरण जिस रफ्तार से हो रहा है, उस रफ्तार से सोच नहीं चल रही है। टेक्नालॉजी को हर मर्ज का एक इलाज मान लिया गया है, और किसी अनचाही नौबत से निपटने की कोई तैयारी की नहीं जा रही है। नतीजा यह हो रहा है कि लोगों के बैंक खातों से बहुत संगठित तरीके से मुजरिम ऑनलाईन ठगी कर रहे हैं, और पुलिस उनमें से बहुत कम मामलों को ही पकड़ पा रही है। वैसे भी ऑनलाईन ठगी के बाद ठग चाहे पकड़े जाएं, उनसे बरामदगी होना तकरीबन नामुमकिन रहता है। 
आज देश में बैंक को लेकर, सरकारी रियायतों को लेकर, फोन कनेक्शन या ट्रेन-रिजर्वेशन को लेकर आधार की अनिवार्यता जहां अदालती आदेश से जारी भी रखी जा सकती है, उन जगहों पर सरकार को आधार-जानकारी की गोपनीयता के लिए कड़े इंतजाम करने चाहिए जो कि आज बिल्कुल नहीं दिख रहे हैं। आने वाले दिनों में संसद से जो डेटा-सुरक्षा कानून पास होने जा रहा है, उसमें सरकार या निजी एजेंसियां, जो भी लोगों से उनकी जानकारी लेंगी, उन पर उसकी सुरक्षा का एक बड़ा जिम्मा भी आ जाएगा, और उसके लीक होने पर उन पर खासे जुर्माने का भी इंतजाम कानून में किया जा रहा है। आज भारत में डिजिटलीकरण और पहचान-शिनाख्त को लेकर की गई कोशिशों से लोगों को तकलीफें अधिक हो रही हैं, उनकी निजता खतरे में अधिक पड़ रही है, उनका फायदा कम हो रहा है। ऐसे में सरकार को आधार कार्ड के लिए जुटाई गई अनगिनत निजी बातों का बोझ अपने पर से कम भी करना चाहिए, और लोगों की निजता पर मंडराते हुए खतरे को घटाना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अक्टूबर

कहने की नीयत जो भी हो दिग्विजय के शब्द सच हैं..

संपादकीय
17 अक्टूबर 2018


अविभाजित मध्यप्रदेश के आखिरी कांगे्रस मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने चाहे मजाक मेें, चाहे किसी पर तंज कसते हुए यह कहा कि वे चुनाव में भाषण नहीं देंगे, प्रचार नहीं करेंगे, क्योंकि उनके मुंह खोलने से कांगे्रस के वोट कट जाते हैं। यह बात कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि संघ परिवार से आमने-सामने की लड़ाई लडऩे वाले वे इक्का-दुक्का कांगे्रस नेताओं में से हैं, और इस लड़ाई के चलते वे कई बार कुछ इस तरह की बातें कह जाते हैं जो कि सैद्धांतिक रूप से चाहे सही हों, लेकिन वे जिस अंदाज में कही जाती हैं, वे कांगे्रस की एक हिंदू विरोधी छवि बनाने का सामान आसानी से बन जाती हैं। फिर चाहे इसके बाद दिग्विजय सिंह चारों तरफ अपने आपको हिन्दू और शंकराचार्य का शिष्य, या और कुछ भी कहते रहें, लेकिन उनका एक बार का कहा हुआ, ओसामाजी, बाकी सब पर पानी फेर देता है। और फिर राहुल गांधी को कहीं अपना जनेऊ दिखाते घूमना पड़ता है, तो कहीं कुछ और। 
दरअसल बात हिन्दू धर्मान्धता, या हिन्दू कट्टरता तक सीमित रहती, धर्मान्ध और नफरतजीवी संगठनों तक सीमित रहती, तो भी कांग्रेस पार्टी का इतना नुकसान नहीं हुआ रहता। लेकिन कांग्रेस के कुछ नेता, जिनमें दिग्विजय सिंह ने खुद होकर अपना नाम भी गिनाया है, लगातार एक लापरवाह अंदाज में एक ही सांस में हिन्दू कट्टरता का विरोध करते हैं, और बिना कॉमा, बिना फुलस्टॉप के मुस्लिमों के हिमायती होते हैं। जबकि इन दोनों बातों का एक-दूसरे से हर मुद्दे पर अनिवार्य रूप से कोई लेना-देना नहीं होता, लेकिन इन्हें एक सांस में कहने पर एक हिन्दूविरोधी छवि बनती है जिससे छुटकारा पाना कांग्रेस के लिए खासा मुश्किल साबित हो रहा है। दिग्विजय सिंह या उनकी तरह के और लोग जो कि हिन्दू साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक मुहिम चलाते हैं, वे अगर सामान्य समझबूझ को भी किनारे रखकर, टैक्टलेस तरीके से अपनी बात रखते हैं, तो सांप तो नहीं मरता, लाठी जरूर टूट जाती है। इसलिए आज अगर उन्हें इस बात का अहसास हो रहा है कि उनके मुंह खोलने से कांग्रेस के वोट कटते हैं, तो यह बात बहुत गलत भी नहीं है। 
दरअसल भारत जैसे धर्मालु देश में, जहां पर दिग्विजय जैसे लोग भी नर्मदा परिक्रमा जैसा धार्मिक परिश्रम करते हैं, जहां वे पूजा-पाठ करते हैं, वहां पर आम धर्मालु, आस्थावान, हिन्दुस्तानी अपने धर्म को लेकर, अपने मजहब को लेकर बहुत संवेदनशील है। उससे धर्म और आस्था के मुद्दों पर बात करते हुए एक अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है। फिर जब लोग राजनीति में हैं, तो आज हिन्दुस्तान में यह आम बात है कि हर नेता के शब्दों को तोड़-मरोड़कर उसके खिलाफ अभियान छेड़ा जाए। ऐसे में किसी भी पार्टी के किसी भी नेता को अपनी पार्टी की सोच और रीति-नीति से अलग तिरछे-तिरछे नहीं चलना चाहिए। ऐसे में नेताओं का कम, और उनकी पार्टियों का अधिक नुकसान होता है। मणिशंकर अय्यर ने नरेन्द्र मोदी को नीच आदमी कहकर मोदी का तो कोई नुकसान नहीं किया था, अपनी पार्टी की ही बड़ी फजीहत करवाई थी, और कांग्रेसविरोधियों को उस पर हमला करने का एक अभूतपूर्व मौका मिला था। नतीजा यह हुआ था कि कांग्रेस पार्टी अय्यर को निलंबित करने पर मजबूर हुई थी। संघ या साम्प्रदायिकता का विरोध करने का तरीका असरदार होना चाहिए, आत्मघाती नहीं। अभी दो दिन पहले राम मंदिर को लेकर कांग्रेस के एक और बड़बोले नेता शशि थरूर ने जिस तरह का बयान दिया, उससे भी कांग्रेस को नुकसान हुआ है। सभी राजनीतिक दलों को अपने लोगों की बातों पर यह साफ फैसला लेना चाहिए कि वे प्रवक्ता न रहते हुए जो कहते हैं, वे उनकी निजी बातें रहती हैं, या कि पार्टी की नीति? पार्टियों को हर दिन अपने लोगों की कही बातों को लेकर यह खुलासा कर देना चाहिए कि उनमें से किन बातों से वह सहमत है, और किनसे असहमत है। यह दिक्कत अकेली कांग्रेस पार्टी की नहीं है, भाजपा के तो बहुत से नेता रोजाना ऐसी बातें कहते हैं जो कि संविधान विरोधी हैं, अलोकतांत्रिक हैं, और साम्प्रदायिक हैं, इसलिए उन बातों पर भी भाजपा को खुलासा करना चाहिए। 
फिलहाल दिग्विजय सिंह ने एक ईमानदार स्वीकारोक्ति की है, या तंज कसा है, जो भी किया है, उनके शब्द एक सच बताते हैं।
(Daily Chhattisgarh)

दलबदल के तुरंत बाद नई पार्टी से चुनाव लडऩे पर रोक लगे

संपादकीय
16 अक्टूबर 2018


जिस रफ्तार से एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में लोग जा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि पार्टियों के भीतर इसके खिलाफ बगावत हो, या न हो, देश के लोकतंत्र में ऐसी बेशर्मी, या मौकापरस्ती, या धोखाधड़ी, के खिलाफ एक बगावत जरूर होनी चाहिए। लोगों के विचार बदल सकते हैं, उनकी नीतियां बदल सकती हैं, अपनी पार्टी से उनको चिढ़ हो सकती है, दूसरी पार्टी उनको अधिक पसंद आ सकती है, और ऐसे में दलबदल एक पूरी तरह से लोकतांत्रिक हक है, लेकिन इसके बाद नई पार्टी की टिकट पर चुनाव लडऩे के लिए कुछ समय की रोक जरूर रहनी चाहिए। ऐसा होने पर लोग पार्टी छोडऩे के पहले सोचेंगे, पार्टियां ऐसे लोगों को ऐन चुनाव के पहले, चुनाव लड़वाने के लिए लेने के पहले सोचेंगी, और राजनीति में गंदगी, खरीद-फरोख्त कुछ कम होगी। 
लोकतंत्र में दरअसल बहुत सी बातें परंपरा के आधार पर चलनी चाहिए, लेकिन हकीकत इससे ठीक उल्टे है, और भारतीय लोकतंत्र में तो परंपरा दूर रही, कानून को भी बेवकूफ बनाने के लिए नेता और पार्टियां आखिरी दम तक कोशिश करते हैं। यह उम्मीद अब किसी से नहीं की जा सकती कि भ्रष्ट को, संदिग्ध आरोपी को, बुरे इंसान को पार्टी टिकट न दे। अकाली दल जैसी पार्टियों ने तो कई टिकटें देकर संसद में कुछ लोगों को महज इसलिए भेजा कि उनके परिवार के लोगों ने इंदिरा की, या कुछ और लोगों की हत्या की थी। जिस लोकतंत्र में ऐसी गैरजिम्मेदारी को रोकने का न कानून है, न ऐसी कोई परंपरा है, उस लोकतंत्र में दलबदल को अगर घटाना है, तो दलबदल के बाद नई पार्टी, नए निशान पर चुनाव लडऩे के लिए कुछ बरस की रोक रहनी चाहिए।
हमने पहले भी इस मुद्दे को छेड़ा था, और हमारा यह भी मानना है कि जज रहे हुए लोग, सीएजी की कुर्सी पर बैठे हुए लोग, फौज से रिटायर हुए लोग, नौकरशाह रहे हुए लोग, ऐसे लोगों पर नौकरी छोडऩे या रिटायर होने के बाद कुछ बरस तक चुनाव न लडऩे की एक रोक रहनी चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि अभी-अभी भाजपा में गए भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह राजनीति में उतरते ही जिस अंदाज में सरकार के खिलाफ बोलना शुरू कर चुके थे, उससे लगता था कि यह देश की सुरक्षा के लिए, और फौज के माहौल के लिए ठीक बात नहीं है। अब अगर कल के दिन सीबीआई का मुखिया राजनीति में उतर आए, तो वह बहुत सी गोपनीय जानकारियों का राजनीतिक इस्तेमाल कर सकता है। कुछ महीने पहले ही भाजपा में शामिल हुए भूतपूर्व गृहसचिव ने जिस अंदाज में अपने गृहमंत्री रहे हुए कांग्रेसी नेता पर हमले किए, उससे भी सरकार के कामकाज, और उसकी जिम्मेदारियों की साख गिरी थी। 
हो सकता है कि देश के कानून के तहत सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तों में यह फेरबदल करना होगा कि कौन-कौन सी कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों के कितने बरस तक चुनाव लडऩे पर रोक रहेगी। कुछ लोगों को हमारी यह सलाह अलोकतांत्रिक लग सकती है, और यह लग सकता है कि यह उन अफसरों या जजों के बुनियादी अधिकारों के खिलाफ है, लेकिन हमारा यह मानना है कि नौकरी देते समय ही अगर ऐसी शर्त रख दी जाए, तो फिर लोग यह तय कर सकते हैं कि वे सरकारी नौकरी में जाएं, या राजनीति में जाने का अपना रास्ता खुला रखें। लोकतंत्र को आज जिस गैरजिम्मेदारी के साथ लिया जा रहा है, वह बिल्कुल भी ठीक नहीं है। सिर्फ जीत की संभावना को देखते हुए राजनीति की जा रही है, और उसी वजह से उसमें बेहिसाब समझौते हो रहे हैं। चुनाव सुधार के लिए बहुत मुद्दों पर कानून बनाने की बात हो रही है, और यह मुद्दा उसमें जोड़ा जाना चाहिए कि पार्टी छोडऩे के बाद कितने वक्त तक लोगों को दूसरे निशान से चुनाव लडऩे न मिले।  (Daily Chhattisgarh)