जनरल रावत की चुनौती पाकिस्तान को नहीं है हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को है..

संपादकीय
30 नवम्बर 2018

भारत में शायद ही पहले कोई ऐसा थलसेनाध्यक्ष रहा हो जिसके इतने बयान सुर्खियां बनते हों। भारत और पाकिस्तान के बीच पाकिस्तान ने एक ऐसा गलियारा खोला है जिसकी मांग भारत लंबे समय से करते आ रहा था। इससे भारत के सिख तीर्थयात्री पाकिस्तान स्थित एक खास गुरुद्वारे तक जा सकेंगे जहां गुरूनानक देव रहे थे। अगले बरस नानक की 550वीं जन्मतिथि आने वाली है, और उसके पहले वहां पर एक गुरूद्वारा भी बन रहा है। कुल मिलाकर सिखों की धार्मिक भावना सरहद से दो तरफ बंट गई थीं, और अब पाकिस्तान के इस गलियारे के बनाने से हिन्दुस्तानी तीर्थयात्री बिना पासपोर्ट या वीजा के वहां जा सकेंगे। इस महत्वपूर्ण मौके पर भारत का एक तबका पाकिस्तान पर इस तरह उबल पड़ा है कि मानो उसने कोई जुर्म कर दिया हो। केन्द्र सरकार ने इस मौके पर अपने दो जूनियर मंत्रियों को भेजा, लेकिन पंजाब के कांग्रेसी मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के वहां जाने पर भारत के ढेर से लोगों ने बवाल मचा दिया, उन्हें गद्दार कहा, इस मौके पर पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने बातचीत की जो पेशकश की, उसके खिलाफ भारत से बहुत से बयान दिए गए। कुल मिलाकर यह गलियारा खोलने वाले पाकिस्तान को आज यह लग रहा होगा कि मानो उसने कोई गलत काम कर दिया जिसकी वजह से बैठे-ठाले उसे इतने हमले झेलने पड़ रही हैं। 
लेकिन मानो यह भी काफी नहीं था तो भारत के थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने कल एक प्रेस कांफ्रेंस में बयान दिया है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान एक मुस्लिम देश बन चुका है, और अगर उसे भारत के साथ अच्छे रिश्ते बनाने हैं, तो उसे धर्मनिरपेक्ष बनना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत धर्मनिरपेक्ष है, और अगर पाकिस्तान की इच्छा हमारे जैसा बनने की है तो उन्हें संभावना ढूंढनी चाहिए। 
अब इस बयान को बारीकी से समझने की जरूरत है। दो देशों के बीच बातचीत सरकारों के बीच होती है, प्रधानमंत्रियों के बीच होती है, विदेश मंत्रियों के बीच होती है, या विदेश सचिवों के बीच होती है। भारत और पाकिस्तान के बीच फौजियों के स्तर पर कोई बातचीत नहीं होती, इसलिए भारत में निर्वाचित सरकार के रहते हुए एक फौजी का ऐसा बयान पूरी तरह अवांछित और अलोकतांत्रिक है। आज देश में प्रधानमंत्री से लेकर विदेश मंत्री तक सभी लोग मौजूद हैं, काम कर रहे हैं, और अच्छी सेहत में हैं, ऐसे में किसी फौजी जनरल की बारी ऐसे नीतिगत बयान के लिए आने की कोई गुंजाइश नहीं है। बेहतर यही होगा कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए जनरल रावत को वर्दी छोड़कर जनरल वी.के. सिंह की तरह राजनीति में आना चाहिए, और तब अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए। इस बयान के खतरे को देखें तो भारत का फौजी जनरल पाकिस्तान को यह नसीहत दे रहा है कि वह एक मुस्लिम देश है और अगर भारत से अच्छे रिश्ते बनाने हैं तो उसे धर्मनिरपेक्ष बनना होगा। भारत सरकार को यह साफ करना चाहिए कि क्या वह मुस्लिम देशों के साथ अच्छे रिश्ते रखने के खिलाफ है, और किसी को धर्मनिरपेक्ष बनाने के बाद ही वह उन देशों से बात करती है? आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया भर में घूमकर ऐसे तमाम मुस्लिम और इस्लामिक नेताओं को गले लगा रहे हैं, उनसे सौदे और समझौते कर रहे हैं जो कि पाकिस्तान के मुकाबले भी अधिक कट्टर मुस्लिम देश हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच जब सिखों के लिए एक ऐसा ऐतिहासिक तोहफा मिला है, तो उस रंग में भंग करने का काम हिन्दुस्तानी फौजी जनरल के हक के बाहर का काम है। 
तीसरी बात यह कि जनरल रावत ने पाकिस्तान को सुझाया है कि उसे धर्मनिरपेक्ष होने की संभावना तलाशनी चाहिए। क्या यह बेहतर नहीं होता कि अगर जनरल को राजनीतिक बयानबाजी करनी ही है, अपनी वर्दी की सीमाओं के बाहर जाकर बार-बार कुछ बोलना ही है, तो वे हिन्दुस्तान के उन लोगों के लिए कुछ बोलते जो कि रात-दिन कोशिश करके इस देश को एक हिन्दू राष्ट्र बनाने पर आमादा हैं। पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष बनाने की शर्त रखने वाले हिन्दुस्तानी फौजी जनरल को अपनी जमीन पर लगातार चलती कोशिशें नहीं दिख रही हैं, और अगर बाकी दुनिया हिन्दुस्तान के माहौल को देखकर उसके सामने यह शर्त रखे कि वह धर्मनिरपेक्ष बना रहे, तो ही उससे बातचीत होगी तो जनरल रावत का क्या जवाब होगा? और क्या एक फौजी जनरल को ऐसे जवाब देने का कोई हक भी होगा? 
गुरूनानक देव पर आस्था रखने वाले सिखों और गैरसिखों के लिए यह एक ऐतिहासिक मौका था और जो पूरी तरह पाकिस्तान की सद्भावना की वजह से मुमकिन हो पाया। ऐसे मौके पर केन्द्र सरकार में शामिल सिख मंत्रियों से लेकर एक गैरसिख फौजी जनरल बिपिन रावत तक ने माहौल खराब करने की जो कोशिश की है, उससे एक लोकतंत्र के रूप में हिन्दुस्तान की साख को चोट लगी है।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 नवम्बर

ऐसे ज्ञानी-योगी से भगवानों और भक्तों सबका भला...

संपादकीय
29 नवम्बर 2018


राजस्थान में भाजपा का चुनाव प्रचार करते हुए देश में हिन्दुत्व के सबसे आक्रामक नेता, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हनुमान को दलित करार दिया क्योंकि राजस्थान में दलितों की खासी आबादी है, और वे वहां की भाजपा मुख्यमंत्री से नाराज बताए जा रहे हैं। यह बात वैसे तो बेवकूफी की मानकर आई-गई हो सकती थी, लेकिन कांग्रेस और भाजपा के बीच रिश्ते ऐसी दुश्मनी के हैं, कि उनके मुकाबले सांप-नेवले भी गहरे दोस्त दिखाई पड़ते हैं। ऐसे में जाहिर है कि योगी का यह कहना मासूम नहीं था, और कांग्रेस से परे भी कई लोगों को यह गैरमासूम बात खटक गई। योगी ने अपने भाषण में साफ-साफ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करते हुए कह दिया कि रामभक्त लोग बीजेपी को वोट दें, और रावणभक्त लोग कांग्रेस को। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ही औरंगजेब जैसे लोगों से हिन्दुओं की रक्षा कर सकती है, राम राज्य लाने के लिए भाजपा उम्मीदवार को जिताएं। 
धर्म को एकाएक हिन्दुस्तान की राजनीति में इतना महत्वपूर्ण साबित किया जा रहा है कि लगता है कि देश की जनता का पेट मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे-चर्च के भंडारे, लंगर, या प्रसाद से ही भरता है, और उन्हें किसी और तरह के खाने की जरूरत नहीं है। कुछ नेताओं और कुछ पार्टियों की नजरों में धर्म की जगह देखने से लगता है कि देश को न लोकतंत्र की जरूरत है, न संविधान की, और न विज्ञान की। ऐसे लोगों को इतिहास और पुराण में पूरी इक्कीसवीं सदी की हर जरूरत पूरी होते दिखती है, और इसके साथ-साथ अब देवी-देवताओं के जातिकरण का जो सिलसिला चालू हुआ है, वह आगे बढ़कर कहां तक पहुंचेगा पता नहीं। लेकिन भाजपा जिस तरह से योगी आदित्यनाथ को अपना एक सबसे बड़ा प्रचारक मानकर चल रही है, उससे यह तो लगता है कि यह सिलसिला काफी आगे तक पहुंचेगा, और किसी ओबीसी बस्ती में हो सकता है कि कोई ओबीसी ईश्वर भी छांट लिया जाए, और पेश कर दिया जाए। 
लेकिन राजनीति से परे, राजस्थान ब्राम्हण सभा में हनुमान को जाति में बांटने का आरोप लगाते हुए योगी आदित्यनाथ को कानूनी नोटिस भेजा है। यह तो सबकी जानी-पहचानी बात है कि योगी को ऐसे नोटिसों से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि उनके खिलाफ तो उत्तरप्रदेश में ही इतने बड़े-बड़े जुर्म के मामले चल रहे हैं कि कोई और होता तो ऐसे मामलों के चलते प्रचार में न बुलाया जाता। लेकिन राजनीति में जुर्म से कोई परहेज तो है नहीं, इसलिए मुकदमे अलग चल रहे हैं, और आमसभाएं अलग चल रही हैं। अब लगे हाथों इस मामले को देखें कि राजस्थान ब्राम्हण सभा ने योगी को नोटिस क्यों भेजा, तो यह लगता है कि सदियों से जो ब्राम्हण हनुमान को पूजनीय मानकर उनकी पूजा करते आए हैं, आज अचानक एक योगी आकर उस हनुमान को दलित बता जाए, तो लोगों का हक्का-बक्का रह जाना जायज है कि क्या इतनी सदियों से वे एक दलित की पूजा करते आ रहे थे? हनुमान को तो योगी की बात से कोई खास फर्क पड़ते दिखता नहीं है, क्योंकि ऐसा होता तो अब तक योगी की पीठ पर दनाक से एक गदा पड़ गई होती। लेकिन ऐसा लग रहा है कि हनुमान की पूजा करने वाले लोगों में से बहुत से लोगों को इस बात से सदमा पहुंचा है कि एक ज्ञानी-योगी का कहना है कि हनुमान दलित थे। 
कुल मिलाकर यह एक नया दिलचस्प सिलसिला चालू हुआ है, और आगे चलकर हो सकता है कि शंकरजी की बारात का ब्यौरा जानने वाले लोगों को यह लगे कि वे पर्वत पर बसने वाले, तरह-तरह के जानवरों के बीच रहने वाले आखिर किस जाति के थे? ऐसे में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री खासे काम के साबित होंगे क्योंकि वे जिस तरह लगातार भगवा पहनकर रहते हैं, योगी कहलाते हैं, एक मठ के महंत हैं, तो उनको जरूर ही शंकरजी की जाति का भी पता होगा। ब्राम्हण समाज का नोटिस अपनी जगह ठीक है, लेकिन जातियों के बीच भगवानों का ऐसा बंटवारा हो जाए, तो हर भगवान को कुछ जातियों के भक्त नसीब हो जाएंगे। और फिर कई जातियों को यह भी समझ आने लगेगा कि किस-किस जाति वाले भगवान की पूजा अब तक गलती से हो रही थी, और उसे अब तुरंत बंद कर देना है।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 नवम्बर

जानवरों की बच्चियां चुराकर चकलाघर चलाते इंसानों की इंसानियत कैसी, कितनी?

संपादकीय
28 नवम्बर 2018


जिन लोगों को इंसान और इंसानियत शब्दों पर बड़ा भरोसा है, और जो लोग अपने बीच के बुरे लोगों को जंगली, या जानवरों जैसा करार देने पर उतारू रहते हैं, उनके लिए कुछ बहुत भयानक, और साथ ही सुनने में भी तकलीफदेह भी, मामला सामने आया है। इंडोनेशिया में एक गांव के लोगों ने जंगल से एक मादा ओरांगुटान को पकड़ लिया, उसे एक कमरे में बांधकर रखा, चेन से जकड़ दिया, पूरे बदन के बाल हजामत करके साफ कर दिया, और फिर उस कमरे को चकलाघर बना दिया। लोग आते थे, और सौ-दो सौ रूपए देकर उसके साथ बलात्कार करते थे। धीरे-धीरे उसके मालिकों ने उसे इंसानों के साथ तरह-तरह का सेक्स सिखाया। जब 2003 में इंडोनेशिया की पुलिस उसे छुड़ाने गई, तो उससे कमाई करने वाले गांव वालों के तेवर हिंसक हो गए, और 35 हथियारबंद पुलिस वाले जाकर उसे छुड़ा पाए। गांव के लोग बंदूकें और चाकू लेकर अपनी इस कमाऊ कैदी को रोकने पर उतारू थे। इसके बाद वन्य प्राणियों के जानकारों को बलात्कार की शिकार इस ओरांगुटान की दिमागी हालत सुधारने, उसका भरोसा जीतने, और उसे दुबारा जंगल में बसने के लायक बनाने में 15 बरस लगे, और अब वह जंगल में छोड़ी जा रही है। जब उसे छुड़ाया गया था तो वह लगातार बलात्कार की वजह से जख्मी थी, और बहुत तकलीफ में थी। जब उसे उसकी मां से चुराया गया था तब वह बच्ची थी, और बरसों के ऐसे बर्ताव के बाद जब उसे छुड़ाया गया तो वह मर्दों को देखकर भी डर जाती थी, और पुरूष कर्मचारियों को उससे दूर रखा गया था। दुनिया के इस इलाके में ओरांगुटान और इस तरह की प्रजातियों के प्राणियों को दस-दस लाख रूपए तक में बेचा जाता है, और फिर उन्हें सेक्स के धंधे में डालकर कमाई की जाती है। इस दौरान ऐसे कई प्राणी मर भी जाते हैं। 
जो इंसान किसी को जंगली, किसी को जानवर कहकर गाली देते हैं, उनके पास शायद इसके टक्कर की एक भी मिसाल न हो जिसमें कोई जानवर इंसानों के किसी बच्चे को उठा ले गए हों, और उससे जानवरों के बीच वेश्यावृत्ति करवाते हों। ऐसा करने की ताकत, और ऐसा करने का इंसानी हौसला केवल इंसानों में हो सकता है। इसकी और बहुत सी वजहों के अलावा एक वजह शायद यह भी है कि इंसान आज सामाजिक रूप से एक धार्मिक प्राणी बन गए हैं, और सभी धर्मों में ऐसे सभी कुकर्मों, ऐसी सभी हिंसा के बाद उसके पाप के बोझ से छुटकारा दिलाने के लिए ईश्वर, उसके दलाल, और धर्मस्थल सभी तैयार बैठे हैं। धरती पर ऐसा कोई बुरा काम नहीं है जिसके बोझ से धर्म छुटकारा न दिला दे, और लोगों की आत्मा को एक बार फिर अगले बुरे काम के लिए नई ऊर्जा से न भर दे। तमाम धर्मों में तमाम किस्म के बुरे कामों की पापमुक्ति पाने के लिए आसान नुस्खे बताए गए हैं। ईसाईयों के चर्चों में तो एक औपचारिक कन्फेशन चेम्बर रहता है जिसके एक हिस्से में बैठकर पाप के बोझ से लदे हुए पहुंचे इंसान बगल के हिस्से में बैठे पादरी को तमाम बातें बताकर पापमुक्त होकर हल्की और हंसती-खिलखिलाती आत्मा लेकर निकलते हैं, और फिर से अगले पाप में जुट जाते हैं। 
इंसानों को अपनी गालियों के बारे में फिर से सोचना चाहिए। और इंसानों को इंसानियत शब्द के मायने के बारे में भी फिर सोचना चाहिए। दरअसल इंसान के भीतर ही उसके दिल-दिमाग का एक हिस्सा वह हैवान है जिसे इंसान अपने से बाहर, अपने से अलग, अपने से बिल्कुल उल्टा खलनायक साबित करने में लगे रहते हैं। यह हैवान इंसान के भीतर उसका अपना एक अपरिहार्य हिस्सा है, जिस हिस्से के बिना इंसान पूरे नहीं हो सकते। जानवरों को जोतकर इंसान खेत जोतते हैं, उन पर सामान ढोते हैं, उन्हें मारकर खा जाते हैं, उनके बच्चों के हिस्से का दूध पी जाते हैं। गाय या भैंस के बच्चे मर जाएं तो उसका दूध निकालने के लिए उसे धोखा देने को उसके बच्चों की खाल में भूसा भरकर उसके पीछे टिका देते हैं ताकि उसे अपने बच्चे को दूध पिलाने का धोखा हो, और उसका दूध दुह लिया जाए। किसी पोल्ट्री फॉर्म में मशीनों की तरह मुर्गियों को बड़ा किया जाता है, और मशीनों से उसे काटकर कारखाने के प्रोडक्शन की तरह बेच दिया जाता है। लेकिन इन सबसे परे जिस तरह जानवरों से एक संगठित वेश्यावृत्ति करवाई जा रही है, वह असल इंसानियत बताती है। इंसान को अपने इंसान होने पर बस इतना ही गर्व करना चाहिए, जितना कि ऐसे चकलाघर के मालिक कर सकते हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 नवम्बर

बच्चों से बलात्कार पर बेपरवाह बिहार सरकार को सुप्रीम कोर्ट फटकार

संपादकीय
27 नवम्बर 2018


बिहार के एक आश्रय गृह में बच्चियों से बड़ी संख्या में हुए संगठित बलात्कार के पीछे जब बड़े-बड़े नेताओं और एक महिला मंत्री के पति का नाम सामने आया, सुबूत जुटे, तो बिहार सरकार ने इस मामले को रफा-दफा करने की जो कोशिशें की हैं, उनको लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज इस राज्य सरकार को ऐसी फटकार लगी है कि अगर जरा भी शर्म होती तो मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव दोनों ही इस्तीफा दे देते। लेकिन सत्ता की राजनीति और राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर बैठे लोगों की सेवा करने वाले नौकरशाहों की चमड़ी ऐसी मोटी हो जाती है कि सुप्रीम कोर्ट के चाबुक का दर्द भी उनको नहीं होगा। अदालत ने नीतीश कुमार सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि बच्चों के साथ हुए ऐसे बलात्कारों की जांच में भी राज्य का रवैया बेहद दुर्भाग्यपूर्ण, अमानवीय और लापरवाह है। अदालत ने वहां बुलाकर खड़े किए गए मुख्य सचिव से पूछा कि आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 377 और पॉक्सो एक्ट के तहत जुर्म दर्ज क्यों नहीं किया गया है? 
महीनों पहले इस मामले का भांडाफोड़ एक जांच रिपोर्ट में हुआ था और सरकार ने इसे छुपाने की भरसक कोशिश की थी। जब यह मामला अदालत का पहुंचा तो उसके बाद भी हालत यह है कि बिहार की यह महिला केबिनेट मंत्री महीनों तक फरार रही और सरकार उसे ढूंढ नहीं पाई, न ही उसके खिलाफ बलात्कारों में मदद का जुर्म दर्ज हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव को फटकराते हुए कहा कि राज्य सरकार जो कर रही है वह शर्मनाक है। अदालत ने कहा जब भी हम इस मामले की फाईल पढ़ते हैं दुख होता है कि क्या पीडि़त बच्चे इस देश के नागरिक नहीं हैं? अदालत ने चेतावनी दी कि अगर आपने एफआईआर दर्ज नहीं की तो वह सरकार के खिलाफ कार्रवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव को कल भी अदालत में मौजूद रहने को कहा है।
देश के एक सबसे बड़े राज्य में, जहां का मुख्यमंत्री अपने आपको सुशासन बाबू कहलाते हुए नहीं थकता, वहां पर बेसहारा अनाथ बच्चों के साथ इस तरह थोक में संगठित बलात्कार लंबे समय तक होते रहे, सत्ता की मेहरबानी से, उसके हौसले से, और उसकी हिफाजत से होते रहे, और यह सिलसिला उजागर होने के बाद भी राज्य का जो हाल है, वह भयानक है। लेकिन बिहार ऐसा अकेला राज्य नहीं है, हम छत्तीसगढ़ में ही ऐसे मामले देख चुके हैं, जहां पिछले कई बरस से एक महिला सिपाही पुलिस के एक सबसे बड़े अफसर के शोषण का शिकार होकर अदालत से लेकर महिला आयोग तक धक्के खा रही है, और सरकार की खुद की जांच रिपोर्ट में इस अफसर के कुसूर साबित होने के बाद भी राज्य सरकार ने किया यह कि उस पर कोई कार्रवाई तो नहीं की, उसका प्रमोशन कर दिया। यह नौबत और भी भयानक तक हो जाती है जब राज्य का प्रमुख विपक्षी दल भी इस मामले को नहीं उठा पाता, और राज्य का महिला आयोग बरसों से इस मामले को देखते हुए चुप बैठा है, और उसकी कामयाबी यही रही कि उसकी प्रदेश अध्यक्ष अपने लिए विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की एक टिकट जुटा ले गई। सुप्रीम कोर्ट अगर छत्तीसगढ़ के इस मामले पर गौर करेगा, तो इस राज्य को लेकर भी वह इसी तरह की कड़ी बातें कहेगा। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 27 नवंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 27 नवंबर

डिजाइनर बेबी तकनीक की हिंदुस्तान में संभावनाएं...

संपादकीय
26 नवम्बर 2018


चीन ने दावा किया है कि उसके वैज्ञानिकों ने ऐसा डिजाइनर बेबी बना लिया है जिसे कभी एचआईवी संक्रमण नहीं होगा। जीन्स की एडिटिंग से वैज्ञानिकों ने ऐसा कर दिखाया है। विज्ञान कथाओं में आधी सदी पहले से ऐसी कल्पना की जा रही थी और पिछले एक-दो दशक से जेनेटिक एडिटिंग की शुरूआत हो रही थी जो आज इस मुकाम तक पहुंची बताई जाती है। दूसरी तरफ विज्ञान कथाओं के कुछ विख्यात लेखकों के उपन्यास देखें तो उनमें ऐसी कल्पना भी दिखती है कि लोगों को ब्रेनवॉश करके उनकी सोच को किसी खास तरफ मोड़ा जा सकता है। ऐसे एक उपन्यास में डॉक्टरों को तफरीह के लिए एक दवा कंपनी एक सैलानी-जहाज पर ले जाती है, और वहां उनका बे्रनवॉश करके उन्हें इस कंपनी की दवाएं मरीजों को लिखने के लिए पेे्ररित किया जाता है। 
अब ऐसी तकनीक के हिंदुस्तान में भी कई तरह के उपयोग हो सकते हैं। किसी कमरे में बैठे हुए तमाम लोगों को अगर किसी किस्म की तरंगों से प्रभावित किया जा सके, तो राजनीतिक दल उन्हें अपनी तरफ करने के लिए बे्रनवॉश कर सकते हैं। दूसरी तरफ जिस मोबाइल कंपनी के फोन हिंदुस्तान में सबसे अधिक हाथों में पहुंच गए हैं, वह कंपनी मोबाइल कॉल पर आवाज के साथ-साथ ऐसे सिग्नल भी भेज सकती है जिससे आम वोटर किसी एक खास नेता के भक्त बनते चलें। ऐसे में मोबाइल पर मुफ्त कॉल की सुविधा बड़ी काम की होगी, और जो लोग जितने अधिक देर तक फोन पर बात करेंगे, वे उतने ही अधिक कट्टर भक्त होते चलेंगे। फिर इसी तरह आधार कार्ड के आधार पर हर इलाज का रिकॉर्ड निकाला जा सकेगा, और जब उस मरीज को अस्पताल में अगली बार बुलाया जाएगा, तब दवा के साथ-साथ ऐसी जींस-थेरेपी भी हो सकेगी जिससे उसकी आस्था मंदिर या मस्जिद में से किसी एक के लिए बढ़ाई जा सकेगी, अगले इलाज के दौरान उसकी आक्रामकता बढ़ाई जा सकेगी, और इलाज लंबा चला तो उसके दिल-दिमाग में ऐसा अहसास भी डाला जा सकेगा जिससे उसे हर दिन अच्छा दिन दिखने और लगने लगेगा।
जेनेटिक एडिटिंग और बे्रनवॉश की संभावनाएं अनंत हैं। बाजार तो लोगों में अपने ब्रांड और अपने सामान के लिए पसंद पैदा कर ही सकेगा, उसके अलावा राजनीतिक दल, साम्प्रदायिक संगठन भी लोगों को अपनी तरफ खींच सकेंगे। आज मुंबई में उत्तर भारतीयों को पीटने वाली शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे उत्तर भारत के सबसे जलते-सुलगते तीर्थ, अयोध्या हो आए, और वहां मुंबई में मार खाए हुए किसी ने उन्हें एक पोस्टर तक नहीं दिखाया। ऐसा लगता है कि उद्धव ठाकरे के पास लोगों को बे्रनवॉश करने की कोई तकनीक आ चुकी है। यह भी लगता है कि पाकिस्तान में नवाज शरीफ के पास ऐसी ही कोई तकनीक थी जिसका इस्तेमाल उन्होंने नरेन्द्र मोदी पर ऐसा किया था कि वे दूसरे देश से हिंदुस्तान लौटते हुए बिना बुलाए, बिना तय किए हुए सीधे पाकिस्तान में उतर गए थे, और नवाज शरीफ के घर उनकी सालगिरह पर पहुंच गए थे, जाकर अम्मा के पांव छू लिए थे, शादी के घर में दुल्हन को तोहफा दे दिया था, और फिर हक्का-बक्का भारत लौट आए थे। इस तरह चिकित्सा विज्ञान से दुनिया को मोडऩे का बहुत बड़ा औजार मिल सकता है। और आज चीन में जिस तरह ऐसा बच्चा तैयार कर लिया है जिसे कभी एचआईवी नहीं होगा, उसी तरह हिंदुस्तान में ऐसे बच्चे तैयार किए जा सकते हैं जो कभी सवाल न करें, महज कीर्तन करें। लोगों को बच्चों से ऐसी कल्पना पर निबंध लिखवाने चाहिए कि ऐसी तकनीक का क्या-क्या इस्तेमाल हो सकता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 नवम्बर

बात की बात, 26 नवम्बर

दीवारों पर लिक्खा है, 25 नवंबर

राम के नाम पर दे दे बाबा कहते हुए अगला चुनाव?

संपादकीय
25 नवम्बर 2018


केन्द्र की मोदी सरकार के सामने अयोध्या में आज जुटी रामभक्त भीड़ के दबाव के अलावा कुछ और किस्म के दबाव भी काम कर रहे हैं। इनमें से एक आरएसएस का है जिसके मुखिया मोहन भागवत ने एक से अधिक बार यह कहा है कि मोदी सरकार कानून बनाकर मंदिर बनाए। भाजपा की एक सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी, शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे अपने आज तक के सबसे आक्रामक तेवरों के साथ उत्तर भारत में पहली बार एक आंदोलन कर रहे हैं, और वे मोदी सरकार को मंदिर न बनाने के लिए तरह-तरह से कुसूरवार ठहरा रहे हैं। यह दबाव संसद के भीतर मंदिर बनाने को लेकर एक कानून बनाने में पता नहीं कितना कामयाब होगा, लेकिन केन्द्र के सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन की मुखिया भाजपा के लिए यह संसदीय बाहुबल के साथ मुमकिन हो पाएगा या नहीं, एक तो इसका भी ठिकाना नहीं है, दूसरी बात यह कि ऐसा कोई कानून सुप्रीम कोर्ट में एक अग्नि परीक्षा झेल पाएगा या नहीं यह भी नहीं पता। फिर ऐसे किसी कानून के लिए अगर संविधान में कोई ऐसा संशोधन करना पड़ा जिसके लिए राज्यों की विधानसभाओं से मंजूरी लेनी पड़े, तो वह भी हो पाएगी या नहीं, यह हिसाब भी अभी आसान नहीं है। एनडीए के जो दूसरे घटक दल हैं, उनमें से नीतीश कुमार के जेडीयू जैसे कुछ दल अपने खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए ऐसे किसी कानून का विरोध कर सकते हैं, और 2019 का चुनाव मतदाताओं के बीच राम के नाम पर, मंदिर के नाम पर जनमत संग्रह जैसा चाहे हो जाए, लेकिन हो सकता है कि ऐसी नौबत आने पर एनडीए की अपनी शक्ल बदल जाए। 
यह लोकतंत्र 15 अगस्त 1947 का दिन शुरू होने के पल से, संसद में आधी रात से शुरू हुआ था, और आज वह अयोध्या में जा पहुंचा है जहां उसे जलसमाधि देने की पूरी तैयारी कर ली गई है। देश के टीवी चैनलों पर पिछले कुछ दिनों से अखंड रामधुन सप्ताह जैसा माहौल बना हुआ है, और ढोल-मंजीरा, हारमोनियम लेकर दाढ़ी वाले जो लोग भगवे कपड़ों में अयोध्या में गाए-बजाए जा रहे हैं, वे टीवी चैनलों के पसंदीदा किरदार हो गए हैं। यह बात पूरी तरह कचरे की टोकरी में डाल दी गई है कि अयोध्या का जमीन का विवाद, एक मालिकाना हक का कानूनी झगड़ा है, और वह सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बाद ही किसी किनारे पर पहुंचने वाला है। लेकिन ऐसे मामले को एक अंधश्रद्धा, धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता, और हिंसक-अराजकता से जोड़कर देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि मानो यह लोकतंत्र न होकर बहुसंख्यक तबके का एक धर्मराज है, और इसमें दूसरे धर्मों के लोग दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। 
अयोध्या के आज जलते-सुलगते मुद्दे से अगले आम चुनाव में चाहे जिसको जो नफा-नुकसान हो, आज तो देश के मीडिया में, समझदार-बहसों में भाजपा और मोदी को लेकर यही हैरानी जाहिर की जा रही है कि चार बरस के कामकाज के बाद इस सरकार के पास गिनाने के लिए अपने काम न होकर नेहरू से लेकर सोनिया और राहुल तक की सरकार की नाकामयाबियां रह गई हैं, और एक बार फिर राम के नाम पर दे दे बाबा कहते हुए भाजपा देश की गली-गली घूम रही है। इस पूरे माहौल से मोदी सरकार की साख बहुत बुरी तरह चौपट हुई है, और यह कहा जा रहा है, माना जा रहा है कि अगर इसी मुद्दे को लेकर अगला चुनाव लड़ा जाना है, अगर कांग्रेस के 60 बरस के राज को ही कोसते हुए अगला चुनाव लड़ा जाना है, अगर नेहरू-गांधी परिवार को कोसते हुए ही अगला चुनाव लड़ा जाना है, तो फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इन चार बरसों में खुद क्या किया है? क्या उसके पास अपने खुद के किए हुए गिनाने को कुछ नहीं है जो वे हर जगह पिछली कांग्रेस सरकारों और नेहरू-गांधी परिवार की नाकामयाबी को गिनाने तक सीमित रह गए हैं? अयोध्या का यह पूरा सिलसिला ऐसा बताता है कि इन बरसों में मोदी सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसे गिनाते हुए वे अगले आम चुनाव में जनता से दुबारा वोट मांग सकें। यह बात सच है या नहीं इसे तो खुद मोदी ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन यह बात सच है कि आज आम जनधारणा कुछ इसी किस्म की बन रही है। देश को धर्मान्धता में झोंककर आज जो ताकतें संविधान को खारिज कर रही हैं, वे भी इतिहास में दर्ज हो रही हैं, और उनको देखते हुए जो चुप हैं, वे भी इतिहास में दर्ज हो रहे हैं।  

(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 24 नवंबर

यह धमकी बाबर को नहीं, सुप्रीम कोर्ट के गुम्बदों को

संपादकीय
24 नवम्बर 2018


अयोध्या एक बार फिर बेकाबू होते दिख रहा है। वहां बाबरी मस्जिद गिराने की चौथाई सदी पूरी हो चुकी है, और अब एनडीए-भाजपा के करीबी लोगों, संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की राह देखे बिना जिस आक्रामक, अराजक, अलोकतांत्रिक, और साम्प्रदायिक अंदाज में मंदिर वहीं बनाएंगे, और अभी बनाएंगे का आंदोलन शुरू किया है, उससे पूरा देश एक बार फिर 1992 की तरह हिंसा में डूब सकता है। और अब कुछ महीने बाद जिस तरह लोकसभा के चुनाव सामने खड़े हैं, उसे देखते हुए ऐसा लगता है यह अभियान राम केन्द्रित न होकर आम चुनाव केन्द्रित है, और इसलिए इससे निपटना मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती, एक बड़ा खतरा उस वक्त भी होंगे जब अगर सरकार की नीयत इससे निपटने की होगी। और यह भी हो सकता है कि सरकार की नीयत इससे निपटने की हो ही नहीं। 
इस बार मोदी के घोर विरोधी और विश्व हिन्दू परिषद से तड़ीपार किए गए डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा के पास मोदी से निपटने, उन्हें नीचा दिखाने, और अपने नए हिन्दू संगठन को खड़ा करने का यह एक सुनहरा अवसर है। ठीक इसी तरह का सुनहरा अवसर इस बार उद्धव ठाकरे के सामने है जो कि अपने पिता बाल ठाकरे का यह दावा दुहरा रहे हैं कि बाबरी मस्जिद को शिवसैनिकों ने गिराया था। हजारों शिवसैनिकों के साथ वे अयोध्या पहुंच रहे हैं, और यह शहर एक बार फिर अराजक हिंसा की लपटों में जाते दिख रहा है। लोगों को याद होगा कि 1992 में जब बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, तब भी उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार थी, जो कि आज भी है। उस समय के भाजपा मुख्यमंत्री के मुकाबले आज के भाजपा मुख्यमंत्री हजार गुना अधिक आक्रामक हिन्दू हैं और लोकतंत्र पर उनका धेले भर का भरोसा नहीं है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव की यह मांग नाजायज नहीं लगती है कि अयोध्या में सेना तैनात की जाए। योगी के उत्तरप्रदेश में पुलिस का ऐसा साम्प्रदायीकरण हो चुका है कि वहां तैनात पुलिस वाले वर्दी में ही मंदिर बनाने को ईंट-पत्थर ढोने लगें तो किसी को हैरानी नहीं होगी। 
दरअसल अगले आम चुनाव को लेकर देश के बहुत से लोगों के मन में कई किस्म की आशंकाएं पहले से चली आ रही हैं। कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि मोदी सरकार पाकिस्तान के साथ सरहद पर कोई बड़ा तनाव खड़ा कर सकती है, और देश एक बार राष्ट्रवाद के सैलाब में डुबाया जा सकता है। दूसरी बात लोगों को यह लगती है कि देश की अलग-अलग कई साम्प्रदायिक ताकतें अपने बूते ही, या अलग-अलग सरकारों की मदद से एक ऐसा तनाव खड़ा कर सकती हैं कि उसमें बहुसंख्यक तबके और अल्पसंख्यक तबकों के अलग-अलग ध्रुवीकरण किए जा सकें, और आम चुनाव लोकतंत्र का न होकर धर्मों की जनगणना का जलसा होकर रह जाए। ऐसी कई आशंकाएं लोगों के मन में हैं। और आज जिस तरह देश भर के स्वघोषित साधू-संत भगवे कपड़ों में अयोध्या में जुट रहे हैं, और अपनी तथाकथित धर्मसंसद में फैसले लेकर देश को धर्मान्धता में डुबाने पर आमादा हैं, मोदी सरकार उसके साथ है, या साथ नहीं है, अभी यह साफ नहीं है। जिस तरह बस्तर के नक्सल-कब्जे के इलाकों में नक्सली जनसुनवाई के नाम पर अपनी अराजकता की अदालत लगाते हैं, और वहां पर फैसले लेकर किसी को भी पुलिस का मुखबिर बताकर उसका गला काटते हैं, कुछ उसी किस्म का काम अयोध्या में धर्मसंसद नाम का एक पाखंड करने जा रहा है जिसका इस देश के सबसे बड़े धर्म, लोकतंत्र, से सीधा टकराव है, संविधान से जिसका सीधा टकराव है। 
यह पूरा सिलसिला भारत में सुप्रीम कोर्ट की सत्ता को कुचलकर रख देने का है, और यह अदालत के पिछले कुछ और फैसलों को लेकर भी तरह-तरह से सामने आया है। यह बात भी कही गई कि अदालत को वैसे ही फैसले देने चाहिए जो लागू किए जा सकें। कानून के राज में अदालत को ऐसी चुनौती लोकतंत्र के लिए खतरा है। आज अयोध्या में जो हो रहा है वह ताकत बाबर को नहीं दिखाई जा रही है, वह ताकत सुप्रीम कोर्ट को दिखाई जा रही है कि अयोध्या की जमीन पर मालिकाना हक के मुकदमे का फैसला करने के पहले वह इस ताकत को देख ले, वरना बाबरी मस्जिद के गुम्बदों की तरह सुप्रीम कोर्ट के गुम्बदों को भी गिरा देने की ताकत इस भीड़ में है। 

(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

मीडिया और नेता दोनों एक-दूसरे पर जिंदा हैं

संपादकीय
23 नवम्बर 2018


कांग्रेस पार्टी के एक बड़े नेता कहे जाने वाले, राजस्थान के सीपी जोशी ने ऐन चुनाव के वक्त अपनी बकवास से पार्टी, और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी दोनों के लिए शर्मिंदगी जुटा दी है। और यह पहला मौका नहीं है जब कांग्रेस का कोई बड़ा नेता किसी नाजुक मौके पर ऐसी हरकत करे। कम से कम आधा दर्जन नेता तो ऐसे हैं जो ऐसे मौके की तलाश में रहते हैं कि जब पार्टी के लिए सब कुछ अच्छा चल रहा हो, तो मानो उसे नजर लग जाती है, और ये लोग अपना मुंह खोलकर राहुल गांधी की पकाई खीर में चार चम्मच फिनाईल डाल देते हैं। कभी मंदिर के नाम पर, कभी शिवलिंग पर बिच्छू और चप्पल के नाम पर, कभी मोदी को नीच कहकर, तो कभी ओसामा को जी कहकर देश की बहस को सरकार की नाकामयाबी से दूर घसीटकर ले जाने का काम करने में कांग्रेस के नेताओं को महारथ हासिल है। दूसरी तरफ भाजपा और उससे जुड़े हुए संगठनों के लिए यह एक नियमित और आम बात है, और रेप से लेकर महिलाओं के कपड़ों तक, और अल्पसंख्यकों के संदर्भ में कुत्ता और पिल्ला कहने तक किस्म-किस्म की बातें भाजपा के नेता कुछ इस तरह कहते हैं कि ऐसा लगता है कि वे देश की जनता का बर्दाश्त टटोलते रहते हैं कि और कितनी हिंसक, और कितनी साम्प्रदायिक बात कहकर भी बचा जा सकता है। 
दिक्कत यह है कि भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मेहरबानी से कुछ सेकेंड में कही गई घटिया से घटिया बात का वीडियो, हिंसक से हिंसक धमकी की रिकॉर्डिंग देश के सबसे जरूरी मुद्दों को लात मारकर टीवी स्टूडियो के बाहर कर देती हैं, और गले में फंदा डालकर हौसला जुटाता हुआ किसान यह देखकर हैरान रह जाता है कि किस तरह टीवी चैनल की एंकर नापसंद पार्टी के नेता को जुबान से नंगा करने की धमकी देती है, और ऐसा वीडियो टीवी प्रसारण से परे भी चारों तरफ फैलने लगता है। दुनिया के कुछ सभ्य देशों के परिपक्व समाचार चैनलों को देखें, तो लगता है कि वे ईमानदारी से रिपोर्टिंग का काम करते हुए जिंदा कैसे रहते होंगे, और शायद तभी तक जिंदा रह सकेंगे जब तक हिन्दुस्तान के कुछ घटिया समाचार चैनल वहां पहुंचकर उनके मुंह का कौर न छीन लें। हालत यह है कि अलग-अलग धर्मों के नाम पर बदबूदार और तेजाबी बकवास करने वाले कुछ चेहरे, मस्जिद का नाम बदलकर हिन्दू देवता के नाम पर कर देने की धमकी देने वाले राष्ट्रीय प्रवक्ता, और समाचार चैनलों की प्रायोजित नूरा कुश्ती में अनायास दिखती झड़प, ये सब एक-दूसरे के साथ मिलकर जीते हैं, और एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं। अधिकतर समाचार चैनल इस फेर में रहते हैं कि वे दूसरे चैनल के मुकाबले कैसे अधिक घटिया हो सकें, ताकि उनकी दर्शक संख्या की टीआरपी बढ़ सके। 
हिन्दुस्तान के टीवी समाचार दर्शकों की जिंदगी का जितना हिस्सा वे इस बक्से के सामने गुजारते हैं, उतना ही वे देश की हकीकत से दूर भी होते जाते हैं। अधिकतर समाचार चैनल लोगों को सच और हकीकत से ठीक वैसे ही दूर ले जाते हैं, जिस तरह धर्म लोगों को अहिंसा से दूर ले जाते हैं। इन दोनों ही मामलों में लोगों को इन बातों का अहसास भी नहीं होता। आज की बाजार व्यवस्था में इश्तहार देने के पहले विज्ञापन एजेंसियां और विज्ञापनदाता यह तौलते हैं कि किस चैनल को कितने लोग देखते हैं, या किस वेबसाइट पर कितने लोग जाते हैं। वे यह नहीं देखते कि लोग इन जगहों पर किस तरह का कूड़ा देखते हैं, किस तरह की गंदगी देखते हैं। अभी दो दिन पहले एक किसी बड़ी समाचार वेबसाइट पर एक खबर की सुर्खी पेज पर दिख रही थी- अपने मंगेतर को छोड़ यह किसके साथ पेरिस में घूम रही है प्रियंका चोपड़ा, देखें तस्वीरें। अब इस हैडिंग को देखकर पहली नजर में लगेगा कि प्रियंका बेवफा हो गई है, और मंगेतर को घर बिठा किसी यार के साथ पेरिस में ऐश कर रही है। लेकिन जब इस हैडिंग पर क्लिक करके लोग प्रियंका की सनसनीखेज तस्वीरें देखते हैं, तो दिखता है कि वह अपनी मां के साथ पेरिस में खरीददारी कर रही है। सनसनी का यह अंदाज परले दर्जे की बेईमानी और धोखाधड़ी है, लेकिन आज बाजार उसी का है। इसी तरह बहुत से नेता इस्तेमाल किए गए कंडोम गिनने जैसे बयान देकर खबरों में बने रहते हैं, और जो लोग किसी मकसद से ऐसा नहीं करते, उनमें भी सीपी जोशी जैसे लोग हैं जो कि अपनी पार्टी की परवाह किए बिना बेवजह ऐसी बेतुकी बात करते हैं कि पार्टी की शर्मिंदगी हो, और उसे चुनाव में बड़ा नुकसान झेलना पड़े। आज का मीडिया और आज के नेता दोनों एक-दूसरे पर इस तरह जिंदा हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 नवंबर

..आपसी रिश्तों में ब्रेक्सिट का खतरा

संपादकीय
22 नवम्बर 2018


ब्रिटेन में एक जनमत संग्रह के रास्ते जब यह तय किया गया कि वह यूरोपीय यूनियन से अलग होगा, तो जनमत की गिनती के साथ ही देश का एक बड़ा तबका सदमे में चला गया था, और तुरंत यह मांग उठने लगी कि एक बार फिर जनमत संग्रह करवाया जाए क्योंकि लोग पहली बार इसके खतरों को समझ नहीं पाए, और उन्होंने वोट दे दिया था। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, और ब्रिटेन को यूरोपीय यूनियन के साथ अलग होने की बातचीत शुरू करनी पड़ी, और इसके साथ ही योरप में एक आर्थिक अनिश्चितता भी आई, खुद ब्रिटिश सरकार के भीतर अस्थिरता आई, और ब्रिटेन में पढऩे-पढ़ाने वाले लोगों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। बड़े-बड़े कारोबारी दफ्तरों से लेकर सब्जी-भाजी तक पर ऐसा बुरा असर पड़ा है कि इसके खिलाफ ब्रिटेन में बहुत बड़े-बड़े प्रदर्शन भी हो चुके हैं, और मौजूदा सरकार से कुछ मंत्रियों का इस्तीफा भी हो चुका है। 
किसी भी गठबंधन से अलग होना एक तैश में किया गया काम भी होता है, या किसी और किस्म की भावना उसके पीछे हो सकती है। लेकिन असल जिंदगी की हकीकत जब सामने आकर खड़ी हो जाती है, तब समझ आता है कि अलग होने का फैसला तो आसान था, लेकिन सरहदें खिंच जाने के नुकसान बाकी पूरी जिंदगी को मुश्किल बनाकर रख देते हैं। इस ब्रेक्सिट, ब्रिटेन के एक्जिट का, भारत पर कोई खास असर नहीं पडऩा है, लेकिन इससे भारत एक सबक जरूर ले सकता है। चाहे पड़ोस का पाकिस्तान हो, या किसी और देश के साथ कोई साझा गठबंधन, तैश में अलग होना, बातचीत तोडऩा, यह आसान होता है, लेकिन इससे आगे की चीजें बड़ी मुश्किल भी होती हैं। यह बात हमने राज्य सरकारों के शिक्षाकर्मियों से बातचीत को तोड़ लेने में भी देखी कि बात को तोडऩा आसान रहता है, बाद में जोडऩा बड़ा मुश्किल होता है। आज ब्रिटेन में हालत यह है कि बड़ी बेरोजगारी, बड़ी महंगाई, और बड़े आर्थिक खतरों को टाला नहीं जा सकता, और ऐसा लगता है कि मौजूदा प्रधानमंत्री की सरकार भी जा सकती है। 
भारत और पाकिस्तान अपनी परंपरागत दुश्मनी को निभाते हुए साझा कारोबार, दोस्ताना रिश्तों, आसान आवाजाही को अनदेखा करते आए हैं, और उसका नतीजा यह है कि सरहद के दोनों ओर की एक सरीखी बातें एक-दूसरे का फायदा नहीं कर पा रहीं, और ये दोनों देश बहुत सी बातों के लिए दूसरे देशों के मोहताज होकर अपना-अपना नुकसान कर रहे हैं। शायद इसीलिए किसी समझदार ने कभी लिखा था- दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों। यह बात छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा जैसी दो पार्टियों पर भी लागू होती हैं जिन्होंने आपस में कड़वाहट इतनी घोल रखी है कि नुकसान लोकतंत्र का हो रहा है। आपसी रिश्तों में ब्रेक्सिट का खतरा सोच-समझकर ही उठाना चाहिए, किसी आईने को तोड़ देना पल भर का काम है, और फिर जोडऩा पूरी जिंदगी नहीं हो पाता। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 22 नवम्बर

दीवारों पर लिक्खा है, 22 नवम्बर

तीन हफ्ते सबको जीत के दावे जारी रखने होंगे क्योंकि...

संपादकीय
21 नवम्बर 2018


आज जब पूरा छत्तीसगढ़ तूफान के बाद के सन्नाटे में डूबा हुआ है, तब क्या किसी और मुद्दे पर कुछ लिखा जा सकता है? शायद नहीं। इसलिए एक बार फिर चुनाव से थके हुए राज्य में कुछ चुनाव चर्चा और करने की मजबूरी लग रही है क्योंकि लोगों के बीच कल हुए मतदान और उसके संभावित नतीजों से परे और किसी बात को लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही है। लेकिन कल के मतदान के बाद जब 90 सीटों को देखें तो लगता है कि पचहत्तर फीसदी से अधिक वोटरों ने वोट तो डाला है, लेकिन राज्य के भीतर अलग-अलग सीटों पर जो उतार-चढ़ाव है, वह हैरान करता है। नक्सल धमाकों में जान खोने वाले चुनाव अभियान के बीच वहां के मतदाताओं ने सुरक्षित, सुविधा-संपन्न, शिक्षित और संपन्न शहरी इलाकों के मुकाबले कहीं अधिक वोट डाला। और जिस रायपुर शहर पर हजारों करोड़ रूपए अधिक खर्च करके सरकार ने इसे अधिक सुविधा का बनाया है, वहां पर वोट बहुत कम गिरे हैं। जिस बिलासपुर को प्रदेश की दूसरी स्मार्टसिटी बनाया जा रहा है, वहां भी वोट कम गिरे हैं, और गांव-जंगल के नक्सल-आदिवासी इलाकों से 20 फीसदी कम वोट गिरे हैं। पढ़े-लिखे लोगों को अपने शिक्षित होने का दंभ छोड़कर आत्मविश्लेषण करना चाहिए, और यह सोचना चाहिए कि उनकी गाडिय़ां किस काम की हैं जो वे आधे किलोमीटर के पोलिंग बूथ पर भी नहीं जा पाए, और नक्सल इलाकों के वोटर कई-कई किलोमीटर बमों के बीच से गुजरते हुए जाकर वोट डालकर आए हैं। वोटों की इस गिनती को देखने के बाद यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि क्या गांव के लोगों को गंवार कहने का शहरी अधिकार एक जुर्म नहीं है? 
लेकिन गांव और शहर, आदिवासी और गैरआदिवासी इलाकों के फर्क को छोड़ भी दें तो भी कुछ और बातें समझ नहीं आती हैं। कस्बों में पड़े वोटों को देखें, तो प्रदेश के एक सबसे ताकतवर मंत्री अजय चंद्राकर की कुरूद विधानसभा में 88.99 फीसदी वोट पडऩे की खबर है, और कुछ दूसरे कस्बाई इलाकों में वोट 60 फीसदी तक ही रह गए हैं। प्रदेश में कुल मिलाकर वोट पिछले बार के वोटों के आसपास ही हैं, इसलिए यह कहना जायज नहीं होगा कि इस बार जनता ने बड़ी संख्या में बाहर निकलकर सरकार को पलटने के लिए वोट डाला है, या किसी एक पार्टी को जिताने के लिए पूरे प्रदेश में जनता कसम खाकर बैठी थी। इतने ही वोट पिछली बार भी पड़े थे, और कांग्रेस और भाजपा के बीच का फासला महज पौन फीसदी का था। इसलिए उतने ही वोटों को लेकर दो बड़ी पार्टियों, और दो-तीन अन्य पार्टियों के बीच वोट किस तरह से बंटेगा, उसे लेकर आंकड़ों का अंदाज आसान नहीं है, लेकिन कुछ लोग अलग-अलग सीटों पर अपना अंदाज लगाकर किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए इस बार के चुनाव में पूरे तीन हफ्ते दिए हैं, और आज की 21 तारीख के ठीक बीस दिन बाद 11 दिसंबर को नतीजे आएंगे, और तब तक लोग आपस में शर्त भी लगा सकते हैं, और जिन्हें सट्टे से परहेज न हो वे सट्टा भी लगा सकते हैं, कानूनी खतरे झेलते हुए। 
लेकिन छत्तीसगढ़ के इस चुनाव को लेकर सभी पार्टियां, और सभी लोग सामने खड़े लोकसभा चुनाव को लेकर अपनी समझ सुधार सकते हैं, और उस चुनाव में वोटरों के बीच उनका भरोसा जीतने के लिए बेहतर तैयारी कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ में अगली सरकार चाहे जिस पार्टी की बने, यह तो तय है कि सभी लोग लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटेंगे, और इस बार के नतीजे उनके खासे काम के रहेंगे। शहरी वोटों को भी अभी से प्रायश्चित की तैयारी करनी चाहिए, क्योंकि राज्य सरकार से, केन्द्र सरकार से सबसे अधिक रकम पाकर शहर को खूबसूरत और सुविधाजनक बनाने के बाद भी उनको वोट डालने की फुर्सत नहीं है, अक्ल नहीं है, जिम्मेदारी का एहसास नहीं है। आने वाले दिन नेताओं के लिए लंबी बेचैनी के दिन हैं, और हर किसी को अपने दावे जारी रखने होंगे क्योंकि जिन लोगों को जिन लोगों से चुनाव के पहले चंदा नहीं मिल पाया है, उनको भी अपनी जीत का भरोसा दिलाकर अभी भी कुछ हासिल किया जा सकता है।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 नवम्बर

एक वोट, एक नोट की लॉटरी कैसी रहेगी?

संपादकीय
20 नवम्बर 2018


छत्तीसगढ़ की बाकी बहत्तर सीटों पर इस वक्त वोट चल रहा है। लोग ईवीएम की खराबी के बावजूद भी कतारों में डटे हुए हैं, और कहीं स्काउट बच्चे मतदाताओं की मदद कर रहे हैं, तो कहीं सुरक्षाकर्मी। तकरीबन हर इलाके से ऐसी तस्वीरें आ रही हैं कि सौ बरस से ऊपर की महिलाएं किस तरह वोट डालने आ रही हैं। यह बात भी एक दिलचस्प सामाजिक तथ्य दिख रहा है कि ऐसे सौ बरस से अधिक के लोगों में आदमी नहीं दिख रहे हैं, और औरतें ही हैं। ऐसा शायद इसलिए भी है कि हिंदुस्तान में महिला की औसत उम्र आदमी से कुछ बरस अधिक है। वोट बढ़ते हुए दिख रहे हैं, लेकिन अभी कई घंटे बाकी हैं तब जाकर आखिरी आंकड़े सामने आएंगे। पैंसठ से पचहत्तर फीसदी तक मतदान हो सकता है, और कई वोटर बाहर गए हुए भी हो सकते हैं, कुछ मर-खप गए होंगे, कुछ के नाम दो जगहों पर होंगे, और कुछ के जुड़े नहीं होंगे, लेकिन फिर भी कम से कम एक चौथाई ऐसे जिंदा, साबुत, और हिलते-डुलते वोटर ऐसे होंगे जो कि वोट नहीं डालेंगे। ये लोग सोच-समझकर या कि लापरवाही से अपनी इस जिम्मेदारी से दूर रहेंगे, और अपनी गैरमौजूदगी से किसी कम लोकप्रिय के चुन लिए जाने की नौबत भी ला खड़ी करेंगे।
अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि मतदान को बढ़ाने के लिए और क्या किया जा सकता है? मीडिया और सोशल मीडिया पर पिछले कई हफ्तों से लगातार मतदान बढ़ाने की कोशिशें चल रही थीं, और उससे अधिक कोई जागरूकता अभियान चल नहीं सकता। ऐसे में दुनिया में कुछ जगहों पर कुछ लोगों का यह भी मानना रहता है कि मतदान को अनिवार्य क्यों न कर दिया जाए? जब नागरिक अपने सारे अधिकार के लिए दावे कर सकते हैं, तो फिर वे वोट डालने की जिम्मेदारी क्यों न निभाएं? लेकिन कुछ दूसरे लोगों का मानना है कि वोट न डालने की भी आजादी होनी चाहिए। ऐसे लोगों को ध्यान में रखते हुए पिछले विधानसभा चुनाव के समय से मशीनों में एक नोटा का विकल्प रखा गया था, जिसका मतलब होता है, नन ऑफ द अबोव, यानी ऊपर दिए गए नामों में से कोई भी नहीं। यह ऐसे वोटरों के लिए रखा गया विकल्प था जो कि सारे ही उम्मीदवारों से नाराज हैं, और सारी ही पार्टियों को खारिज करते हैं, और उनकी नापसंदगी का अंदाज लगाने के लिए नोटा के वोटों कभी गिनती की गई थी। छत्तीसगढ़ में कुछ सीटों पर नोटा पर इतने वोट पड़े थे जितने की जीतने वाले की लीड में भी नहीं थे।
इसलिए अब वोट और बढ़ाने के लिए क्या किया जाए? क्या मतदान पर एक ऐसी लॉटरी रखी जाए जो कि हर विधानसभा क्षेत्र में वोट डालने वाले लोगों में से किसी एक को लखपति बना दे? क्या इससे वोट बढ़ेंगे? क्या इससे जनता का फैसला बेहतर तरीके से सामने आएगा? या फिर ऐसा कोई लालच देना लोकतांत्रिक नहीं होगा? भारत जैसी राजनीतिक-सामाजिक स्थिति में लोगों को कई किस्म के विकल्प और तरीके सोचने चाहिए क्योंकि अभी पिछले चुनाव तक तो नोटा भी नहीं था, और वह पहली बार आया ही। इसी तरह क्यों न एक वोट एक नोट जैसी एक लॉटरी शुरू की जाए, और जिस विधानसभा क्षेत्र में जितने वोट पड़ें, उतने नोट लॉटरी से किसी एक को दिए जाएं? या फिर यह भी हो सकता है कि हर मतदान केंद्र के स्तर पर छोटी रकम की लॉटरी निकाली जाए और लोगों की दिलचस्पी पैदा की जाए। आखिर चुनाव में सरकार से लेकर पार्टियों और उम्मीदवारों तक का बड़ा खर्च तो होता ही है, और ऐसी लॉटरी शायद नाजायज भी न हो। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 नवम्बर

बात की बात, 20 नवंबर

वोट का हक न चूकें

संपादकीय
19 नवम्बर 2018


अठारह बरस पहले राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ इस बार सबसे अधिक संघर्ष वाला चुनाव देख रहा है जिसमें पहली बार एक तीसरी शक्ति भी मैदान में है। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से कांग्रेस और भाजपा ही दो पार्टियां रही हैं, लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ के एक जुझारू नेता अजीत जोगी ने बसपा की मायावती के साथ हाथ मिलाकर एक अलग तस्वीर पेश कर दी है। बहुत सी सीटों पर वोटों की गिनती काफी कुछ हो जाने तक तस्वीर शायद साफ नहीं रहेगी। लेकिन दूसरी तरफ तकरीबन तमाम मीडिया ने, और राजनीतिक विश्लेषकों ने छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के इस पहले दाखिले को अनदेखा कर दिया है, और उसे महत्वहीन माना है। लेकिन हकीकत इससे काफी अलग भी हो सकती है, और यह हो सकता है कि कुछ सीटों पर आम आदमी पार्टी को मिलने वाले वोट जीत-हार का फैसला करने वाले वोटों से काफी अधिक भी हों। छत्तीसगढ़ में विद्याचरण शुक्ल ने एक वक्त कांग्रेस से नाराज होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बैनरतले चुनाव लड़ा था, और उन्हें प्रदेश में सात फीसदी वोट मिले थे जो कि जोगी को सरकार से बेदखल करने के लिए काफी था। लेकिन उसके बाद से हर चुनाव में प्रदेश स्तर पर पार्टियों की जीत-हार के वोटों का फासला घटते गया। आज हालत यह है कि इतने कम वोटों से कई सीटों पर फैसला हो सकता है कि बाद में वहां के वोटरों को यह मलाल है कि वे अगर सुस्ती छोड़कर चले गए होते तो शायद उनके चहेते उम्मीदवार जीत जाते। 
जब धुंध इतनी छाई हुई हो, और टक्कर कांटे की हो, तो लोगों को अपनी जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभानी चाहिए। हम इसी जगह पर मतदाताओं से पहले भी कई बार यह अपील कर चुके हैं कि उन्हें न केवल खुद वोट डालने जाना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने आसपास के कुछ और लोगों को भी साथ ले जाना चाहिए ताकि अगली सरकार चुनने के फैसले में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी हो। अभी छत्तीसगढ़ चुनाव के पहले दौर की जिन अठारह सीटों पर मतदान हुआ है, उनके आंकड़े देखें तो हैरानी होती है कि किस तरह वे पिछले चुनाव के आंकड़ों के एकदम आसपास रहे, जबकि हालात इस बार काफी कुछ अलग थे। पहले दौर में आदिवासी और नक्सल प्रभावित इलाकों की सीटें अधिक थीं, लेकिन अब होने वाले मतदान में शहर-कस्बों के इलाके अधिक हैं, और ऐसे में कोई नक्सली बम-धमाके का खतरा भी नहीं है, इसलिए अधिक से अधिक लोगों को वोट डालने निकलना चाहिए। 
दरअसल जब वोटर उतने के उतने बने रहते हैं, तो राजनीतिक दलों पर भी चर्बी चढ़ जाती है, और वे भी जनता के बीच एक सीमा तक मेहनत करके बैठ जाते हैं। जैसे ही छत्तीसगढ़ में दो पार्टियों से तीन पार्टियां हुईं, और चौथी आम आदमी पार्टी भी मैदान में उतरी, तो नजारा कुछ बदला है। दोनों बड़ी पार्टियों के लोगों को यह आशंका होने लगी है कि जोगी, बसपा, आप, सीपीआई, सीपीएम, और पार्टियों के बागी पता नहीं कितने वोट ले जाएंगे, और उससे हाथ आई हुई जीत किस तरह निकल जाएगी। ऐसे में सभी को अधिक से अधिक वोटरों के बीच जाने की मजबूरी समझ में आ रही है। वोटरों को भी अपने हक और अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए, और उन्हें खूब मेहनत करके खुद भी निकलना चाहिए, और आसपास के कुछ और लोगों को लेकर जाने की कोशिश करनी चाहिए। लोग वोट डालने न निकलें, और बाद में पांच बरस सरकार को कोसते रहें, वह लोकतंत्र में अच्छी नौबत नहीं है। यह मौका छत्तीसगढ़ की जनता को अगले पांच बरस के लिए अपने पसंद की सरकार चुनने का है, और इसे चूकना नहीं चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 नवंबर

चुनाव की तैयारी महज महीने भर का काम नहीं, 5 बरस का

संपादकीय
18 नवम्बर 2018


छत्तीसगढ़ में दो दिन बाद जनता के हाथ से सरकार चुनने का मौका निकल जाएगा। तीन कार्यकाल की रमन सरकार ने पिछले एक बरस में अपने तमाम कामों को जनता के सामने तरह-तरह से रखा है, और भूपेश बघेल की शक्ल में कांग्रेस को आक्रामक तेवर वाला एक ऐसा प्रदेश अध्यक्ष मिला है जिसने राज्य सरकार पर हमला बोलने का एक भी मौका नहीं चूका। सरकार ने खूब काम भी किए हैं, खूब गड़बडिय़ां भी हुई हैं। सीडी के मामले में भी दोनों तरफ का स्कोर बराबर हो गया है, और हैरानी की बात यह है कि मतदान के पहले के दो दिनों में सीडी का कोई जिक्र भी अब बाकी नहीं है क्योंकि लोग थक गए हैं। अब न कोई सेक्स-सीडी की असली या नकली शक्ल देखना चाहते, और न ही दबे-छुपे कैमरों से रिकॉर्ड की हुई बातों पर लोगों का अधिक भरोसा है। यह सब देखकर लोग अब गंभीरता से उन मुद्दों को देख रहे हैं जो कि राष्ट्रीय स्तर के नेता यहां आकर राज्य स्तर के चुनाव में उठा रहे हैं। 
ऐसी जानकारी है कि रमन सरकार ने संगठन के हिस्से का भी बहुत सा काम किया है, और सरकार के किए गए अच्छे कामों को मतदान केन्द्र स्तर पर दर्ज करके ऐसी वोटर लिस्ट तैयार की है जिसके घर-घर को मिला हुआ फायदा एक नजर में दिख जाता है। जाहिर है कि पन्द्रह बरस से विपक्ष में बैठी कांग्रेस को न तो ऐसी सहूलियत थी कि वह अपनी किसी कामयाबी को दर्ज कर सके, और न ही उसके पास ऐसी क्षमता ही थी। फिर भी विपक्ष में रहते हुए सरकार की खामियों को गिनाने का जो एक बेहतर मौका रहता है, कांग्रेस ने समय रहते उसका इस्तेमाल करके पूरी तैयारी की हो ऐसा लगता नहीं। नतीजा यह है कि दिल्ली से आए हुए भाजपा के नेता कुछ आधारहीन बातें भी छत्तीसगढ़ में कर जा रहे हैं, तो उसे पकडऩे की फुर्ती कांग्रेस के पास आज नहीं है। 
कुछ दिनों पहले इसी बात को छूते हुए हमने इसी जगह लिखा था कि विपक्ष का काम सरकार पर नजर रखने का जितना पैनेपन का होना चाहिए, उतना भारतीय राजनीति में दिखाई नहीं पड़ता है। आज अगर कोई पिछले पांच बरस की अखबारी कतरनों को लेकर भी बैठें तो भी सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की जीत को मुश्किल में डाल सकते हैं, लेकिन कांग्रेस की वैसी तैयारी है नहीं, और न ही राज्य में इस बार उतरी तीसरी पार्टी जोगी की है। आखिरी का पूरा हफ्ता ठोस मुद्दों से परे गंगाजल और गीता-कुरान की कसम जैसी बातों पर सरक गया है, और मतदाता को इस रफ्तार से भावनाओं के सैलाब में बहाना मुमकिन नहीं है क्योंकि लोग अब समझदार भी हो चुके हैं। सच पूछा जाए तो आज चुनाव के ठीक पहले का माहौल देखकर भी यह लगता है कि पांच बरस इस प्रदेश में मीडिया ही मुख्य विपक्ष था जिसने तमाम किस्म के मुद्दे उठाए थे। अब चुनाव के वक्त पर उसकी धार कुछ कम जरूर हो गई है, लेकिन इतने बरस के मीडिया के रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके विपक्ष एक शानदार तैयारी कर सकता था। लेकिन यह चर्चा दो दिन बाद गैरजरूरी नहीं हो जाएगी क्योंकि अगली सरकार प्रदेश में जो भी बने, उसका एक विपक्ष तो रहेगा ही, और वह चौकन्ना रहेगा, तो लोकतंत्र बेहतर तरीके से चल सकेगा। 
एक दूसरी जरूरत छत्तीसगढ़ में ऐसे जनसंगठनों की लगती है जो कि चुनाव के हिसाब से राज्य की सत्ता, और राज्य के विपक्ष से भी हिसाब मांग सकें, और जनता के मन के मुद्दों को उठा सकें। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव, सिर्फ विधानसभा या संसद, सिर्फ घोषणा पत्र नहीं होता है, लोकतंत्र इन सबसे बढ़कर तमाम जनता की जिंदगी तक फैला रहता है, और उसके मुद्दों को अगर राजनीतिक दल ठीक से नहीं उठा पाते, तो देश के और संगठनों को, और लोगों को इस काम में मदद करनी चाहिए। अगर छत्तीसगढ़ या किसी दूसरे प्रदेश का विपक्ष पांच बरस जमकर तैयारी करेगा, तो शायद कोई भी सत्ता लगातार दुबारा जीतकर न आ पाए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 नवम्बर

छत्तीसगढ़ की अगली सरकार को दिखानी होगी बाजीगरी...

संपादकीय
17 नवम्बर 2018


छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश और राजस्थान में अलग-अलग पार्टियों के चुनावी वायदों को देखें तो यह समझ पड़ता है कि मतदाताओं को सीधे तोहफा, फायदा, और रियायत देने की घोषणाओं में सभी पार्टियों का गलाकाट मुकाबला चल रहा है। ये सारी रियायतें सुनने में भली लगती हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद जब इन पार्टियों पर इन वायदों को पूरा करने की जिम्मेदारी आएगी, तो उसके बाद शायद प्रदेश के एक समझदार बजट की गुंजाइश खत्म ही हो जाएगी। पार्टियों के राजनीतिक-अकाऊंटेंट यह हिसाब लगाते हैं कि फायदा पाने के वायदे से कोई तबका छूट तो नहीं जा रहा है, और फिर उसी हिसाब से वायदे तैयार किए जाते हैं, उनका असली अर्थव्यवस्था से और असली संभावनाओं से कोई लेना-देना नहीं रहता है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ उन राज्यों में से है जो विधानसभा चुनाव के छह महीने बाद लोकसभा चुनाव झेलेगा, और उसके छह महीने बाद म्युनिसिपल-पंचायतों के चुनाव। इस तरह पांच में से करीब दो बरस इस राज्य में तोहफों और, और अधिक तोहफों के वायदों में गुजर जाते हैं, यह एक अलग बात है कि पिछले पन्द्रह बरस में डॉ. रमन सिंह अकेले ऐसे रहे हैं जिन्होंने तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तीन स्थानीय संस्था चुनाव में अपनी पार्टी को बहुमत दिलवाया, और वायदे भी शायद कुछ हद तक पूरे किए हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने किसी वायदे को पूरा करने की नौबत आई ही नहीं, और वही हाल पहली बार चुनाव में उतरने वाली जोगी कांग्रेस का है।
अब सवाल यह है कि राज्य की अर्थव्यवस्था की व्यापक समझदारी से परे हटकर जब आम जनता को सीधे मिलने वाले सरकारी फायदे से सत्तारूढ़ पार्टी का दुबारा सत्ता पर आना जुड़ जाता है, तो फिर किसी सरकार को लुभावने फैसले लेने से कैसे रोका जा सकता है? अब ऐसे में छत्तीसगढ़ में काफी हद तक एक संतुलन दिखाया है कि उसने इन पन्द्रह बरसों में लुभावनी योजनाओं, और वोटर-तोहफों के अलावा राज्य का मोटे तौर पर विकास भी किया है। लेकिन बात अकेले छत्तीसगढ़ की नहीं है, और न ही महज इस चुनाव की है। अगले एक बरस में यह राज्य दो चुनाव और देखेगा, उन दोनों के आने तक सरकार बनाने वाली पार्टी के सामने अपने अभी के वायदों को पूरा करना शुरू करने का दबाव भी रहेगा। मतलब यह कि अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगडऩे की शुरुआत सरकार बनते ही शुरू हो जाएगी, और अर्थव्यवस्था से परे भी जनता पर किसी कड़े अनुशासन को लागू करने जैसा अप्रिय काम भी सरकार नहीं कर पाएगी। एक बरस पूरा होने के बाद ही छत्तीसगढ़ की सरकार चुनावमुफ्त हो सकेगी, और एक संतुलित समझदारी का मौका आ सकेगा। 
सरकारों की सारी की सारी लुभावनी योजनाएं फिजूल नहीं होती हैं, उनमें से कुछ ऐसी भी रहती हैं जो कि जनता के सबसे गरीब, सबसे कमजोर, और सबसे जरूरतमंद तबके की जिंदगी बदल पाती हैं। लोगों को याद होगा कि अविभाजित मध्यप्रदेश में कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री, सामंती पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले अर्जुन सिंह ने व्यापक जनहित के, खासकर गरीब हित के चार ऐसे फैसले लिए थे जिन्हें उनके बाद का कोई मुख्यमंत्री भी नहीं बदल पाया। जो जहां बसा है, उसे उस जमीन पर रिहायशी पट्टा, एकबत्ती कनेक्शन, रिक्शे का मालिकाना हक, और आदिवासियों को तेंदूपत्ता का मालिकाना हक, इन चार फैसलों से मध्यप्रदेश में एकमुश्त करोड़ों गरीबों की जिंदगी में फर्क आया था, और छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यहां भी रमन सरकार ने जिस तरह सबसे गरीब के लिए तकरीबन मुफ्त चावल का जैसा इंतजाम किया, उससे भुखमरी झेलने वाले इस प्रदेश में जनता की जिंदगी बदली थी। लोग दो वक्त पेट भर खाने लगे हैं, कुपोषण घटा, और जिंदगी बेहतर हुई। इसलिए कुछ बुनियादी जरूरतों में सामाजिक न्याय लाने के लिए अगर चुनावी या गैरचुनावी तोहफे दिए जाते हैं, तो वे इंसाफ अधिक हैं, लुभावने तोहफे कम। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के बाद बनने वाली सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती का साल लेकर आने वाला है, और आने वाले दो चुनावों तक सरकार को अर्थव्यवस्था सम्हालने के साथ-साथ वायदों को पूरा करने की एक बाजीगरी दिखानी होगी।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 नवम्बर

दीवारों पर लिक्खा है, 16 नवंबर

छत्तीसगढ़ का नक्शा बताता है बड़े दिलचस्प रूझान...

संपादकीय
16 नवम्बर 2018


कई बार अपने इलाके या अपने मुद्दों को देखने के लिए बाहर के लोगों का नजरिया भी बड़े काम का होता है। छत्तीसगढ़ के चुनावी नजारे को देखने के लिए आए देश के एक सबसे बड़े टीवी पत्रकार, एनडीटीवी के प्रणब रॉय ने इस राज्य के नक्शे के साथ जो तस्वीर सामने रखी है, वह बड़ी दिलचस्प है और राज्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समझने में बड़ी मदद करती है। इसके हिसाब से प्रदेश का दक्षिणी आदिवासी इलाका करीब 60 फीसदी आदिवासी आबादी वाला बस्तर है, और उसके बाद नक्शे के बीच में एक ऐसा मध्य हिंदू बेल्ट है, जिसमें 11 फीसदी आदिवासी हैं। इसके बाद का एक हिस्सा अनुसूचित जाति का जिसमें 12 फीसदी आदिवासी हैं। और सबसे उत्तर-पूर्व का हिस्सा सरगुजा है, जिसमें 47 फीसदी आदिवासी हैं। इसी नक्शे में बस्तर को देखें तो उसमें दलित वोटर कुल 4 फीसदी हैं, बीच के हिन्दू बेल्ट में वे 16 फीसदी हैं, सरगुजा के पहले के दलित सीटों वाले एक हिस्से में 22 फीसदी हैं, और सरगुजा के आदिवासी इलाके में वे 8 फीसदी हैं। इस तरह यह नक्शा बतलाता है कि किस तरह राज्य के उत्तर और दक्षिण सिरों पर आदिवासी आबादी घनी है, और इनके बीच एक हिस्सा घनी हिन्दू आबादी का है, और उसके बाद का एक हिस्सा घनी दलित आबादी का है। 
कहने के लिए छत्तीसगढ़ एक छोटा राज्य बना और बड़े राज्य मध्यप्रदेश से उसे अलग किया गया था। लेकिन आज इस छोटे से राज्य के भीतर आबादी को जातियों के आधार पर देखें तो इसमें बड़े साफ-साफ चार हिस्से दिखाईं पड़ते हैं, और इनके बीच का फर्क चुनावों में भी साफ-साफ दिखाई पड़ता है। दक्षिण के आदिवासी और उत्तर के आदिवासी लोगों का जातियां अलग हैं, उनके इलाकों के मुद्दे भी अलग हैं, लेकिन फिर भी आदिवासियों के बीच कोई ऐसी लहर रहती है, जो कि इन दोनों इलाकों में मतदाताओं का फैसला एक सरीखा रखती है। इसी तरह दलित सीटों पर फैसला एक सरीखा रहता है और वह बताता है कि जाति के आधार पर बनी हुई समाज व्यवस्था में सामाजिक और आर्थिक हालात भी उन जातियों के आधार पर ढल जाते हैं। छत्तीसगढ़ जातीय विविधता का एक खूबसूरत नमूना है और चुनाव के वक्त जब इसे राजनीतिक दलों के साथ पसंद या नापसंद के नतीजों के मिलाकर देखा जाए, तो यह एक दिलचस्प सामाजिक अध्ययन का सामान भी रहता है। 
लेकिन राजनीतिक दलों को यह तमाम हकीकत मालूम रहते हुए भी वे किसी इलाके को एकमुश्त किस तरह पा या खो सकते हैं, वह देखना हक्का-बक्का करता है। खासकर छत्तीसगढ़ के उत्तर और दक्षिण के आदिवासी इलाकों में जिस तरह वोटरों का रूझान एक सा दिखता है, जिस तरह पिछले चुनाव में तमाम दलितों सीटों का रूझान एक सरीखा दिखा, वह देखने लायक था। और ऐसा भी लगता है कि कोई समझदार राजनीतिक दल अगर पांच बरस लगातार जातियों के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर मेहनत करे तो  उसके नतीजे उसे खुद को भी चौंका सकते हैं। यह नौबत बताती है कि छत्तीसगढ़ के मौजूदा राजनीतिक दल चुनाव के अपने परंपरागत पैमानों से परे किसी गंभीर अध्ययन में अपनी मेहनत नहीं लगाते, वरना वे वोटरों की नब्ज बेहतर समझ पाते। 
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM