जो उस दिन गांधी का लहू बहते देखने का मजा नहीं पा सके थे, उनके लिए...

संपादकीय
31 जनवरी 2019


उत्तरप्रदेश में कल गोडसे के समर्थकों ने गांधी के एक पोस्टर के पीछे खून जैसा कुछ भरकर एक गुब्बारा रखा, और उसके बाद भगवाधारी एक महिला सहित कुछ लोगों ने गोली मारकर गांधी का सीना चीरा, और लहू बहने का आनंद लिया। यह महिला भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं के साथ पहले दिखती आई है, और देश में आज सिर उठा रहे गोडसेवाद की एक नई झंडाबरदार है। जगह-जगह गोडसे की प्रतिमा, उसके मंदिर, उसके नाम के चौराहे बनाने की जिद चल रही है, और हिन्दू महासभा जैसे संगठन लगातार इस काम में लगे हैं कि गांधी को एक खलनायक की तरह, और मौत का ही हकदार साबित करते हुए उसकी मौत पर जश्न मनाएं, और गोडसे को महान देशभक्त साबित करें। आने वाले कुछ बरसों में अगर देश का यही रूख रहा, तो अगले बरस 26 जनवरी के मौके पर गोडसे को भारतरत्न देने की मांग भी सामने आ सकती है। 
लेकिन गांधी की यादों के साथ ऐसे सुलूक से न तो गांधी को फिक्र करने की जरूरत है, न ही उन लोगों को फिक्र करनी चाहिए जो कि गांधी को चाहते हैं। गांधी उस बीज की तरह थे जिसे दफन किया गया तो वह अंकुर बनकर निकला, और फिर विशाल वृक्ष में तब्दील हो गया। गांधी की ऐसी हत्या न हुई होती, तो दुनिया गांधी को महज जन्म के लिए याद रखती, लेकिन अब उनके कत्ल की हर सालगिरह यह याद दिलाती है कि इसी दुनिया में, इसी हिन्दुस्तान में, और इसी हिन्दू समाज में ऐसे लोग हैं जो कि गांधी के कत्ल पर गौरव करते हैं, उसका जलसा मनाते हैं, और गांधी को मौत का एक जायज हकदार मानते हैं। दूसरी तरफ गोडसे को महिमामंडित करने का काम दुनिया में कोई नया नहीं है। आज भी योरप के कई देशों में, और अमरीका में ऐसे संगठन काम करते हैं जो कि हिटलर की नस्लवादी, कत्लवादी नीतियों को एक बार फिर जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं। वे हिटलर की औलादों की तरह उसके निशानों को लेकर दुनिया की दूसरी तमाम नस्लों को खराब और कमजोर नस्ल साबित करते हुए हिंसा को बढ़ाने में, नफरत को फैलाने में लगे हुए हैं, और हिन्दुस्तान के गोडसेवादी लोग ठीक उन्हीं के रक्त संबंधी भाई-बहन हैं। 
और गांधी की सोच हिन्दुस्तान में किसी चुनावी इस्तेमाल की न रह गई होती, अगर आज उनके पोस्टर और पुतले को इस तरह की गोली मारकर, उनका लहू बहाने का मजा नहीं लिया गया होता। यह सोच देश के बाकी लोगों को सम्हलने का एक मौका दे रही है कि देश में किस तरह की विचारधारा को बढ़ाने का, किस तरह के माहौल को इजाजत देने का क्या नतीजा होता है। आज अगर यह हरकत न हुई होती, तो लोग गोडसे को याद भी नहीं करते, और उसकी हिंसा, उसके जुर्म किताबों में दफन रहते। लेकिन आज हिन्दुस्तान में लोगों के सामने एक साफ-साफ पसंद का मौका आकर खड़ा हो गया है कि उन्हें गांधीवादी छांटना है, या गोडसेवादी। हो सकता है कि कुछ लोगों को जिन्हें गांधी का लहू बहते देखने का मजा नहीं मिला था, उन्हें इस नाटकीय नजारे में लहू जैसा कुछ बहते देखने का मजा मिला हो, लेकिन हमारा भरोसा हिन्दुस्तान की बहुसंख्यक आबादी की अमन-पसंद पर है, जिन्हें इस नजारे से तकलीफ हुई होगी, और हम उम्मीद करते हैं कि इस तकलीफ को वे चुनाव तक याद भी रखेंगे। 

(Daily Chhattisgarh) 
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 31 जनवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जनवरी

बड़े आर्थिक अपराध सत्ता की सहमति या अनदेखी के बिना नहीं हो सकते

संपादकीय
30 जनवरी 2019


भारत में सनसनीखेज भांडाफोड़ करने वाले एक समाचार वेबसाईट कोबरापोस्ट ने एक ताजा मामला सामने रखा है जिसमें एक कंस्ट्रक्शन कंपनी डीएचएफएल को बैंकों द्वारा करीब एक लाख करोड़ रूपए का कर्ज देने, और कंपनी द्वारा उसका एक तिहाई हिस्सा दूसरी कंपनियों में अफरा-तफरी कर देने और कर्ज को पूरा डुबा देने की बात कही गई है। इसके दस्तावेज भी सामने रखे गए हैं जो बताते हैं कि किस तरह देश के निजी और राष्ट्रीयकृत बैंकों ने इस कंपनी को झूम-झूमकर लोन दिया था, और उसने किस संगठित जुर्म की तरह उस पैसे की अफरा-तफरी कर दी। यह मामला हो सकता है कि पहले से सरकार की जानकारी में हो, और यह भी हो सकता है कि इस भांडाफोड़ से कई नई बातें सरकार की जानकारी में आएं, लेकिन हैरानी इस बात की होती है कि केन्द्र सरकार और आरबीआई की कड़ी निगरानी में चलती भारत की बैंकिंग में इतने बड़े-बड़े घोटाले हो रहे हैं, और इनमें बड़े-बड़े बैंक अफसर शामिल मिल रहे हैं, और यह सिलसिला बरसों से चले आ रहा है। 
हम बैंकों के कर्ज के नाम पर हो रहे घोटालों को लेकर केन्द्र की किसी एक सरकार पर तोहमत लगाना नहीं चाहते, कि ये कर्ज यूपीए के समय के दिए हुए थे, या एनडीए के समय के, या बैंकों ने कर्ज देने के बाद डुबाने के लायक रियायतें कब की थीं, ऐसी बहुत सी बातें तो जांच में साबित होंगी, लेकिन जिस तरह दोनों सरकारों के करीबी रहे हुए लोग लाखों-करोड़ रूपए का कर्ज लेकर या तो देश छोड़कर भाग जाते हैं, या फिर देश के भीतर ही दीवालिया होकर बैठ जाते हैं, वह एक राष्ट्रीय नुकसान की फिक्र है, और उसे राजनीतिक तोहमतों से ऊपर भी देखना चाहिए। आज जब हिन्दुस्तान में संपन्न तबका गरीब किसानों की कर्जमाफी को लेकर बौखलाया हुआ है, तब यह भी समझने की जरूरत है कि गिने-चुने कुछ दर्जन लोगों के कर्ज क्या इतने बड़े नहीं हैं कि वे करोड़ों किसानों की कर्जमाफी से अधिक हैं? 
भारत में बैंकों का संगठित अपराध देखने लायक है। कुछ कारोबारी कर्ज को खा लेने की नीयत से कर्ज लेते हैं, और कुछ बैंक अफसर शुरू से ही इस साजिश में शामिल रहते हैं, या फिर वे बाद में इसे दबाने-छुपाने में जुट जाते हैं। दिक्कत यह है कि बैंकों के जुर्म वहां का मैनेजमेंट तब तक छुपाए रखता है जब तक कि वह खुद होकर उजागर न हो जाए। कर्ज की रिकवरी के नाम पर बैंक और कर्ज डुबाते जाते हैं, और सोचे-समझे बैंक डिफाल्टरों को और आगे बढ़ाते जाते हैं। भारत के बैंकिंग कानून में एक फेरबदल करके जिम्मेदार और साजिश में भागीदार बैंक अफसरों के लिए कड़ी सजा का इंतजाम जब तक नहीं होगा, तब तक बैंकों में जनता के पैसे ऐसे ही डूबते रहेंगे। भारत में एक के बाद एक वित्तमंत्री ऐसे आते जा रहे हैं जो बड़ी-बड़ी कंपनियों, शेयर बाजार, और बैंकिंग, इन तीनों के जुर्म से बड़ी अच्छी तरह वाकिफ हैं, और अदालतों में ऐसे मुजरिमों की वकालत करते भी आए हैं। इसके बावजूद अगर ऐसे बड़े आर्थिक अपराध इस देश में जारी हैं, तो वे सत्ता की सहमति या अनदेखी के बिना नहीं हो सकते। 

(Daily Chhattisgarh) 
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जनवरी

न्यूनतम आमदनी गारंटी, राहुल की नई सोच

संपादकीय
29 जनवरी 2019


कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी ने कल छत्तीसगढ़ में किसान आभार रैली में किसानों को कर्जमुक्ति प्रमाणपत्र देने के साथ-साथ उनका आभार भी माना कि उन्होंने कांग्रेस को ऐसा जमकर समर्थन दिया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी अपनी ऐतिहासिक चुनावी जीत को किसानों के योगदान से जोड़कर बताया। पिछले विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ ने कांग्रेस को जिस दर्जे की जीत दिलाई, उसमें घोषणापत्र के किसान कर्जमाफी का सबसे बड़ा असर कांग्रेस भी मानती है, और भाजपा भी मानती है। खैर, इस एक बात का असर रहा हो, या कई बातों का, खेती के कर्ज की माफी छत्तीसगढ़ में एक हकीकत बन चुकी है, और कल की आमसभा से राहुल गांधी ने देश में एक नई बहस छेड़ दी है जो कि पिछले कुछ समय से हिन्दुस्तान में भी चर्चा में थी, और कई सदियों से दुनिया के कई देशों में जिस पर चर्चा चल रही है, अमल और प्रयोग चल रहे हैं। राहुल ने हर नागरिक को एक न्यूनतम आमदनी देने का वायदा किया है, और कहा है कि 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनने पर इसे लागू किया जाएगा। 
पिछले कुछ समय से देश में यह चर्चा चल रही थी कि क्या ऐसी कोई योजना लागू करनी चाहिए, और अर्थशास्त्रियों से लेकर राजनीतिक लोग तक इसके नफे-नुकसान की बात कर रहे थे। अब राहुल गांधी ने एक लीड ली है, और वे देश में ऐसी घोषणा करने वाले पहले नेता हो गए हैं। इसलिए यह बात जाहिर है कि यह कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगी, और शायद मतदाताओं को प्रभावित करने वाली एक बड़ी बात भी रहेगी। लेकिन इसे समझने की जरूरत है कि यह न्यूनतम रोजगार गारंटी, या न्यूनतम मजदूरी गारंटी की योजना नहीं है, यह न्यूनतम आय की योजना है जिसका मतलब हर नागरिक या हर जरूरतमंद नागरिक के खाते में हर महीने सीधे सरकारी मदद पहुंचना है। जाहिर तौर पर यह मदद एक जरूरतमंद तबके के लिए ही रहेगी, और यह योरप के सामाजिक गुजारा-भत्ते जैसी आलीशान नहीं रहेगी जिसके चलते वहां कुछ देशों में लोग काम करके कमाई पर टैक्स देने के बजाय बेरोजगार रहकर ऐसी सामाजिक सुरक्षा पर जिंदा रहना बेहतर समझते हैं। हिन्दुस्तान में राहुल गांधी की यह घोषणा उन लोगों के लिए है जिनके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है, और शायद यह एक आय वर्ग से नीचे के परिवारों के लोगों के लिए ही लागू होगी। 
लेकिन हम इसकी बारीकियों पर गए बिना अभी इस सोच की बात करना चाहते हैं जो कि देश के हर नागरिक को सांस लेने के बुनियादी हक की तरह जिंदा रहने के लिए जरूरी दो वक्त खाने में मदद करने की है। देश के बहुत से संपन्न लोगों को गरीबों को घर बैठे कमाई मिलने की सोच से तकलीफ हो सकती है, और यह टैक्स देने वालों की एक जायज तकलीफ भी होगी। लेकिन यह न तो कमाई होगी, न ही आय होगी, यह महज एक किस्म का गुजारा-भत्ता होगा जो कि भूखे या बेरोजगार लोगों के जिंदा रहने के काम आएगा। राजनीतिक जुबान में गुजारा-भत्ता एक लुभावना शब्द नहीं हो सकता इसलिए इसे न्यूनतम कमाई का नाम दिया गया है, जो कि हकीकत में गुजारा-भत्ता ही होगी। देश में तब तक सामाजिक और राजनीतिक शांति नहीं हो सकती जब तक हर किसी को खाना न मिले, सिर छुपाने को छत न मिले, और जरूरत पर इलाज न मिले, पढ़ाई न मिले। ऐसे में देश के संपन्न तबके की सुरक्षा के लिए, सार्वजनिक सुविधाओं की सुरक्षा के लिए भी यह जरूरी है कि हर किसी का पेट भरा रहे। इस नजरिए से राहुल गांधी की यह घोषणा देश के सबसे गरीब तबके के लिए तो ठीक है, लेकिन इस बात का ध्यान रखना होगा कि इसका नफा उन लोगों को नहीं मिलना चाहिए जिनको इसकी जरूरत नहीं है, और जो जाहिर तौर पर इसके हकदार नहीं है। पूरी दुनिया में सरकारों का तजुर्बा यह रहा है कि रियायतों के फायदे ऐसे तबके तक पहुंचने लगते हैं जो कि उस आय वर्ग में आते नहीं हंै। अब जैसे छत्तीसगढ़ में ही कर्जमाफी का फायदा बड़े संपन्न किसानों को भी मिल गया है, अगर उन्होंने सहकारी बैंकों से कर्ज लिया हुआ था। भाजपा के विधायक ननकीराम कंवर का बयान अभी सामने आया था कि उन्हें कितने की कर्जमाफी मिली है। प्रदेश की जनता का पैसा केवल गरीब किसानों की कर्जमाफी के लिए इस्तेमाल होना था, और एक आय वर्ग से ऊपर के किसानों को मलाईदार तबका मानते हुए इस कर्जमाफी से बाहर रखना था।  एक नारे के रूप में हर किसान की कर्जमाफी की बात ठीक है, लेकिन किसी भी सरकार को संपन्न तबके को रियायतें नहीं देनी चाहिए। कांग्रेसाध्यक्ष की न्यूनतम आमदनी गारंटी पर पार्टी को इस वायदे की परिभाषा बनाते हुए इसका ध्यान रखना चाहिए। इसी तरह छत्तीसगढ़ में तमाम आबादी को मुफ्त सरकारी इलाज की जो चर्चा चल रही है, उसमें भी संपन्न तबके को किसी भी रियायत से बाहर रखना चाहिए क्योंकि किसी भी राज्य सरकार, या केन्द्र सरकार की आर्थिक क्षमता अंतहीन नहीं हो सकती। फिलहाल कल की आमसभा से राहुल गांधी ने देश में एक नई सोच की शुरुआत की है जो कि अर्थशास्त्रियों के हिसाब से आत्मघाती और खतरनाक भी हो सकती है, और आने वाला वक्त बताएगा कि देश की कितनी आबादी को किस कीमत पर यह राहत मिल पाएगी। 

(Daily Chhattisgarh) 
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दीवारों पर लिक्खा है, 28 जनवरी

ऐसे धार्मिक ध्रुवीकरण और धर्मान्धता के खिलाफ देश के लोगों को बोलना होगा..

संपादकीय
28 जनवरी 2019


उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने साधुओं को पेंशन देने का फैसला लिया है वह पहली नजर में ही संविधान के खिलाफ दिखता है। संविधान किसी एक धर्म को इस तरह बढ़ावा देने के खिलाफ है, और महज हिन्दू धर्म के साधू-संन्यासियों को सरकारी पैसा आखिर कैसे दिया जा सकता है? बाकी धर्मों के लोग भी इसकी मांग कर सकते हैं, और फिर नास्तिक लोग यह कह सकते हैं कि उनको कैसे इस फायदे से बाहर रखा जा सकता है? एक सवाल यह भी खड़ा होगा कि किसी के साधू-संन्यासी होने का आखिर पैमाना क्या है, सुबूत क्या है, और उसका सर्टिफिकेट कौन बनाएंगे? 
यह पूरा सिलसिला सरकार के घोर धर्मान्ध और साम्प्रदायिक रूख को साबित करने की एक ऐसी कोशिश है जिसमें कुछ भी लुकाव-छुपाव नहीं है, बल्कि सरकार अपनी ऐसी हिन्दुत्व की नीति को घोषित करके खुश ही हो रही होगी। इसके अलावा उत्तरप्रदेश में सरकारी खर्च पर सैकड़ों करोड़ से भगवान राम की रिकॉर्ड ऊंचाई की प्रतिमा बनाने की घोषणा भी हुई है। लोगों को याद होगा कि इसी योगी प्रदेश में सरकारी इमारतों और बसों को भाजपा सरकार आने के बाद भगवा रंग किया गया जो कि जनता के पैसों की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं था। फिर मानो इसी का मुकाबला करते हुए उत्तर-पूर्व के एक तकरीबन सौ फीसदी ईसाई राज्य का बताया जा रहा एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर घूम रहा है जिसमें वर्दी पहनी एक पुलिस कर्मचारी बाइबिल की प्रतियां बांट रही है। 
जब धर्म के आधार पर एक आक्रामक ध्रुवीकरण करके वोटरों को खेमों में बांटना ही नीयत हो, तो फिर सरकार को अपनी ऐसी असंवैधानिक नीयत पर शर्म नहीं आती, गर्व ही होता है। छत्तीसगढ़ में राजिम में होने वाले पुन्नी मेला को भाजपा सरकार ने सरकारी खर्च पर राजिम-कुंभ बना दिया था, और इस पर भी हमने उस समय लिखा था कि पर्यटन और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सरकारी खर्च पर हिन्दुत्व को बढ़ाने में कोई झिझक नहीं थी, बल्कि पार्टी के भीतर उनके नंबर बढ़ रहे थे। अभी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आने के बाद राजिम-कुंभ का नाम वापिस पुन्नी मेला किया गया है, लेकिन फिर भी साधू सप्लाई करने वाले ठेकेदार एक कोशिश करते हुए इस बरस भी यहां मंडरा रहे हैं। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री बनते ही लोगों को उमा भारती की वे तस्वीरें याद हैं जिनमें मुख्यमंत्री की मेज पर देवी-देवता की प्रतिमा और उस पर लदी हुई मालाएं दिखने लगी थीं, और सरकारी ओहदे के साथ जुड़ी हुई धर्मनिरपेक्षता की उम्मीद खत्म ही हो गई थी। 
यह पूरा सिलसिला बड़ा खतरनाक है, और इसे बढ़ावा देने के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ताओं को अदालत तक जाना चाहिए। देश भर में पुलिस थानों में मंदिर बना दिए जाते हैं, भोपाल में मुख्यमंत्री निवास के भीतर भी मंदिर बनवा दिया गया था। ऐसे धर्मान्ध बेजा इस्तेमाल से देश में वैज्ञानिक सोच भी खत्म हो रही है, और सत्ता एक खास धर्म की साबित हो रही है। ऐसे में राज्य में दूसरे धर्मों के लोग आशंका में भी जीते हैं, और खतरे में भी। ऐसे राज्यों में दूसरे धर्मों के लोग दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर जीने को मजबूर हो जाते हैं। भारत का संविधान न तो धर्म पर ऐसे सरकारी खर्च की इजाजत देता, और न ही ऐसे धार्मिक भेदभाव की। सरकारी खर्च से हज या मानसरोवर जाने के लिए सब्सिडी देना भी खत्म होना चाहिए, और सरकारी खर्च से इफ्तार-दावतें भी खत्म होनी चाहिए। देश के समझदार लोगों को मुंह खोलना होगा, जगह-जगह ऐसी धर्मान्धता और धार्मिक ध्रुवीकरण के खिलाफ बोलना होगा, वरना आने वाली पीढ़ी को एक जहरीली हवा वाला हिन्दुस्तान मिलेगा। 

(Daily Chhattisgarh) 
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ओछी बातों से हिकारत और नफरत ही पैदा होती है...

संपादकीय
27 जनवरी 2019


प्रियंका गांधी के राजनीति में आने से ऐसे आसार दिख ही रहे थे कि उन पर कई बातों को लेकर हमले होंगे, जिनमें सबसे बड़ा हमला कुनबापरस्ती को लेकर होगा, और इस बारे में अभी दो दिन पहले ही हमने लिखा है कि खुद भाजपा के भीतर आज कुनबापरस्ती कांगे्रस के टक्कर की ही है, और एनडीए में भाजपा के सहयोगी दलों का हाल तो यह है कि कई पार्टियों में परिवार से परे के कोई अध्यक्ष ही नहीं रहे हैं। कांगे्रस के साथ कम से कम ये बात तो रही है कि उसके कई अध्यक्ष और कई प्रधानमंत्री परिवार से बाहर के रहे हैं। एक वक्त तो पूरे बहुमत के साथ जब कांगे्रस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री चुना था, तब उन्होंने इस ओहदे पर मनमोहन सिंह को बिठाया था, वरना भाजपा की कम से कम दो महिला सांसदों के सिर मुंडाने की नौबत आ गई होती।
लेकिन कुनबापरस्ती की तोहमतों से परे भी कुछ आशंकाएं थीं जो अब एक-एक कर सामने आ रही हैं। भाजपा के एक बड़बोले बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय अपने बेटे के विधायक बन जाने के बाद कुनबापरस्ती पर तो कुछ नहीं बोल सकते, इसलिए उन्होंने प्रियंका को चॉकलेटी चेहरा कहकर अपनी भड़ास निकाल ली है। कुनैन जैसी जुबान के मुकाबले चॉकलेटी चेहरा बेहतर ही होता है, और उसमें कोई बुराई भी नहीं है। दूसरी तरफ भाजपा के एक बड़े नेता और भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रियंका को मानसिक रोगी कहा है और गांधी-नेहरू परिवार के लिए उनकी नफरत दशकों पुरानी भी है, और बड़ी हिंसक भी है। उनकी तीखी जुबान सोनिया-राहुल को लेकर, उनके परिवार को लेकर अक्सर हिंसक रहती है। भाजपा के कुछ और भगवाधारियों ने भी प्रियंका के आने पर ओछी बातें कही हैं, और जिस अखिलेश यादव को प्रियंका के आने से सबसे बड़ा फर्क पड़ सकता है उन्होंने सज्जनता के साथ प्रियंका का स्वागत किया है। 
भारतीय राजनीति में ओछी और गंदी जुबान अखबारों और टीवी पर सुर्खियां तो बटोर सकती है, लेकिन उससे चुनाव में भी किसी को फायदा हुआ हो ऐसा नहीं होता। आम जनता चाहे चुनावी सभा में किसी घटिया बात पर ताली बजा दे, या सोशल मीडिया पर ओछी बात को आगे बढ़ा दे, चुनाव में वोट साबित करते हैं कि गंदी जुबान से नुकसान ही होता है, फायदा किसी का नहीं होता। दिक्कत यह है कि बड़े तजुर्बेकार नेता भी सुर्खियों के बुलबुलों को कांच के मजबूत गोले मान बैठते हैं, और वे यह भूल जाते हैं कि किसी भी तरह के झाग और बुलबुलों की जिंदगी बड़ी छोटी होती है। बात महज भाजपा की नहीं है, और बात सिर्फ प्रियंका पर शुरू होकर प्रियंका पर खत्म होने नहीं जा रही। पहले भी भारतीय राजनीति में किसी महिला के पति खोने को लेकर उसके लिए विधवा जैसे शब्द को एक गाली की तरह इस्तेमाल किया गया है, और हमारा पूरा भरोसा है कि हिंदुस्तान की आम जनता के मन में ऐसी ओछी बातों से कहने वाले के लिए हिकारत या नफरत ही पैदा होती है। 

(Daily Chhattisgarh) 
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जनवरी

बात की बात, 25 जनवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जनवरी

प्रियंका पर पत्थर चलाने का हक आखिर है किसे?

संपादकीय
25 जनवरी 2019


कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में औपचारिक रूप से आने, और संगठन में एक ओहदा लेने के खिलाफ एक बवाल सा मच गया है। और तो और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को भी अपने पद की गरिमा के खिलाफ जाकर यह कहना पड़ा कि राहुल गांधी अकेले पार्टी नहीं सम्हाल पा रहे हैं इसलिए उनकी मदद को बहन आई है। उनके अलावा भाजपा के कई नेताओं के  ऐसे बयान आए हैं कि यह राहुल गांधी की नाकामयाबी का सुबूत है, और कुछ ने तो यह भी कहा कि वे महज एक खूबसूरत चेहरा हैं, उससे अधिक कुछ नहीं। 
भारतीय राजनीति में कुनबापरस्ती को लेकर हम पहले बहुत बार लिख चुके हैं, और अभी कुछ हफ्ते पहले इसी मुद्दे पर लिखते हुए हमने एक नजर भारत के अड़ोस-पड़ोस के देशों पर भी डाली थी कि किस तरह म्यांमार से लेकर पाकिस्तान तक, और बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका तक कुछ कुनबे राजनीति में हावी रहे हैं। इसी सिलसिले में यह लिखना भी बार-बार होता है कि कुनबापरस्ती पर सबसे बड़ा हमला करने वाली भाजपा को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने वाले एनडीए के जो भागीदार दल हैं, उनमें से कितने ही कुनबापरस्ती पर चलते आ रहे हैं। कश्मीर की मेहबूबा, पंजाब के बादल से लेकर महाराष्ट्र के ठाकरे, कभी चन्द्राबाबू, तो कभी और कोई, एनडीए की लिस्ट देखें तो पासवान सरीखे बहुत से लोग हैं जो महज एक कुनबा, और एक प्रदेश की पार्टी हैं। इन पार्टियों में इन कुनबे से परे के कोई भी व्यक्ति कभी अध्यक्ष नहीं रहे। दूसरी तरफ कांग्रेस के इतिहास की लिस्ट बताती है कि उसके प्रधानमंत्री, और उसके पार्टी अध्यक्ष, दोनों ही कुर्सियों पर कई-कई बार कुनबे से परे के लोग रहे। और बात महज भाजपा के सहयोगी दलों की नहीं है, खुद भाजपा के भीतर कुनबापरस्ती कोई नई बात नहीं है। विजयाराजे सिंधिया की दो बेटियां दो राज्यों में राज कर चुकी हैं, मुख्यमंत्री और मंत्री रह चुकी हैं। कुनबापरस्ती की चर्चा के चलते ही कल ही सोशल मीडिया पर एक लंबी लिस्ट आई है जिसमें भाजपा के नेताओं और उनकी औलादों के नाम हैं जिनमें कांग्रेस के गांधी कुनबे से भाजपा ने ली गई मेनका गांधी का नाम भी है, और उनके सांसद बेटे वरूण गांधी का नाम भी है। भाजपा इस बात का क्या जवाब देगी कि मेनका और वरूण कांग्रेस के कुनबे के जवाब के अलावा और किस वजह से पार्टी में लाए और बढ़ाए गए हैं? भाजपा के सबसे बड़े नेता रहे अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला भाजपा में सबसे ऊंचे ओहदों में से एक पर बिठाई गई थीं, और यह लिस्ट बहुत लंबी है। 
हमारा तो यह मानना है कि अघोषित रूप से बिना किसी ओहदे की जिम्मेदारी सम्हाले जब लोग पर्दे के पीछे से काम करते हैं, तो उनकी जवाबदेही जीरो होती है, और उनके हक अंधाधुंध होते हैं। आज भाजपा के एक सांसद मेनका के पति रहे, और दूसरे भाजपा सांसद वरूण के पिता रहे संजय गांधी का दर्जा एक वक्त कांग्रेस में बेताज तानाशाह का था। प्रियंका गांधी का घोषित रूप से राजनीति में आना एक बेहतर नौबत है बजाय इसके कि वे घर के भीतर से राजनीति करें। फिर आज देश भर में कौन सी पार्टी, सिवाय वामपंथियों के, ऐसी रह गई हैं जिनमें कुनबे के लोगों को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है। आज भाजपा तमिलनाडू में जिस पार्टी में डोरे डाल रही है, क्या वह पार्टी कुनबापरस्ती की तर्ज पर चलने वाली पार्टी नहीं रही है? इसलिए कुनबे की बात अब फिजूल है। लोगों ने कुनबों पर उसी तरह फैसला दे दिया है जिस तरह उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर फैसला दे दिया था। हां यह बात जरूर है कि हम चाहते हैं कि एक परिवार से एक ही व्यक्ति एक सदन में पहुंचे, या एक ही व्यक्ति संसद या विधानसभा में जाए ताकि पार्टी के बाकी लोगों को भी मौका मिले। लेकिन वामपंथियों, और शायद ममता बैनर्जी, के अलावा तमाम पार्टियां लगातार वंशवाद को बढ़ावा देते चल रही हैं, ऐसे में प्रियंका का राजनीति में आना कोई गुनाह नहीं है। प्रियंका पर हो रहे ओछे हमले जरूर गुनाह हैं, और कम से कम लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को तो ऐसे हमलों की जिम्मेदारी अपनी पार्टी के दूसरे लोगों को देनी चाहिए, क्योंकि अभी अगले कुछ महीने तक तो वे लोकसभा अध्यक्ष हैं ही। 
(Daily Chhattisgarh) 
5:00 PM

बात की बात, 24 जनवरी

बात की बात, 24 जनवरी

बात की बात, 24 जनवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जनवरी

...ब्रम्हांड से विश्व, और विश्व से जिलों तक पहुंचे विश्वविद्यालयों की कहानी

संपादकीय
24 जनवरी 2019


यूनिवर्सिटी नाम का शब्द सुनें, तो लगता है कि यूनिवर्स की बात हो रही है, यानी पूरे ब्रम्हांड की। इसका हिन्दी शब्द विश्वविद्यालय है, और इससे बात ब्रम्हांड से घटकर विश्व पर आ जाती है। खैर, हकीकत में तो आज धरती के इंसानों के पास विश्व ही है, और बाकी ब्रम्हांड पर जिंदगी के कोई सुबूत भी नहीं हैं, इसलिए यूनिवर्सिटी का यूनिवर्स भावनात्मक अधिक लगता है, हकीकत कम। ऐसे में जब विश्वविद्यालय की बात होती है, तो लोगों को याद पड़ता है कि एक समय छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश के सागर विश्वविद्यालय के तहत आता था, और यहां के कॉलेज सागर विवि के तहत इम्तिहान देते थे। बाद में रायपुर में रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय बना जिसमें आगे चलकर लगा कि शुक्लजी का सम्मान कुछ कम हुआ है, तो उसका नाम पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रखा गया। यह अकेला विश्वविद्यालय पूरे प्रदेश में कॉलेजों पर शासन करता था, उनके कोर्स तय करता था, इम्तिहान लेता था, और डिग्री देता था। आज करीब सवा दो करोड़ आबादी वाला छत्तीसगढ़ एक समय, और लंबे समय तक इसी एक विश्वविद्यालय के तहत चलते रहा। 
बाद में बिलासपुर में एक विश्वविद्यालय खोला गया, तो बिलासपुर और सरगुजा संभाग उसमें चले गए, और रायपुर-बस्तर संभाग रविशंकर विश्वविद्यालय में बच गए। कुछ और आगे चलकर सरगुजा में अलग विश्वविद्यालय खुल गया, बस्तर में अलग, और रविशंकर विश्वविद्यालय सिर्फ अविभाजित रायपुर संभाग का विश्वविद्यालय रह गया, जिसमें दुर्ग बाद में संभाग बना। पिछले उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय ने अपने विधानसभा क्षेत्र भिलाई-दुर्ग में एक नया विश्वविद्यालय खुलवा दिया, और रविशंकर विश्वविद्यालय का इलाका एक वक्त का अविभाजित रायपुर जिला रह गया, बित्ते भर के रूमाल जितना। एक समय रायपुर जिला देवभोग, सरायपाली, और बलौदाबाजार, कसडोल तक फैला हुआ था, और अब सिमटते-सिमटते रविशंकर विश्वविद्यालय उतना ही रह गया है। 
विश्वविद्यालय नाम से ऐसा लगता है कि यह विश्व स्तर का कोई शिक्षा संस्थान होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह अब संभाग और जिला स्तर का रह गया है, और जाहिर है कि भूगोल के स्तर के अनुपात में ही इनमें शिक्षा का स्तर हो सकता है। इस बीच छत्तीसगढ़ में तकनीकी शिक्षा का विश्वविद्यालय अलग बन गया, चिकित्सा का विश्वविद्यालय अलग, पत्रकारिता का अलग, एक ओपन यूनिवर्सिटी भी खुल गई, और कृषि विश्वविद्यालय तो काफी पहले से था ही, अब उससे अलग होकर पशुपालन पर एक कामधेनु विश्वविद्यालय भी खुल गया। आपका विश्वविद्यालय आपके द्वार। कुल मिलाकर नतीजा यह है कि छत्तीसगढ़ का एक विश्वविद्यालय उत्कृष्टता के किसी पैमाने पर पहुंच भी सकता था, तो अब उसके इतने टुकड़े हो गए हैं, इतने नए विश्वविद्यालय खुल गए हैं कि उत्कृष्टता की गुंजाइश खत्म ही हो गई है। अलग-अलग संभाग और जिलों की संतुष्टि तो हो गई है, लेकिन ज्ञान की संतुष्टि की संभावना अब नहीं रह गई। किसी भी विश्वविद्यालय के बुनियादी कामकाज का एक हिस्सा अलग-अलग विषयों पर होने वाला शोधकार्य भी रहता है, और नियमित पढ़ाई-लिखाई की उत्कृष्टता भी। जब छोटे-छोटे से विश्वविद्यालय और छोटे-छोटे से विभाग हो जाते हैं, तो उनके भीतर प्राध्यापकों के पद भी सीमित हो जाते हैं, साधन-सुविधाएं भी कम, और उत्कृष्टता की संभावना भी कम। 
दरअसल क्षेत्रीय भावनाओं को पहले भड़काकर, और फिर उन्हें संतुष्ट करने के नाम पर विश्वविद्यालयों को कॉलेजों की तरह हर जिले में पहुंचाने का काम किया गया है, और इससे नुकसान को छोड़कर और कुछ नहीं हुआ। छात्रों की जिन प्रशासनिक जरूरतों के लिए विश्वविद्यालय के दफ्तर के उपकेन्द्र बनाना काफी होता, उन जरूरतों को नए विश्वविद्यालयों के लिए तर्क की तरह इस्तेमाल किया गया। ऐसे रूमाली रोटी साईज के विश्वविद्यालय उत्कृष्टता की संभावना से और भी कोसों दूर हो गए हैं। अब छत्तीसगढ़ के बाकी जिले अपने-अपने लिए विश्वविद्यालयों का इंतजार कर रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh) 
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जनवरी

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 23 जनवरी : मजबूत पीएम या सरकार नहीं, लोकतंत्र मजबूत होना चाहिए

संपादकीय
23 जनवरी 2019


कोलकाता मेें विपक्ष के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद केन्द्र सरकार में मोदी के सबसे करीबी, वित्तमंत्री अरूण जेटली ने ट्विटर पर लिखा कि लोग उससे ज्यादा समझदार होते हैं जितना कि नेता उन्हें समझते हैं। वे बेकाबू और दिशाहीन विकल्प को नहीं चुनते, आकांक्षी समाज कभी सामूहिक हत्या नहीं करता, लोग पांच बरस की सरकार चाहते हैं, छह महीने की नहीं। यह बात उन्होंने सरकार की मजबूती, और स्थायित्व, निरंतरता को लेकर कही है, और जाहिर तौर पर उनका इशारा एक विपक्षी गठबंधन की तरफ था जो कि कोलकाता में उभरते हुए दिख रहा है। गठबंधन को लेकर हम कल-परसों ही इसी जगह पर काफी कुछ लिख चुके हैं कि किस तरह एनडीए का यह मोदी गठबंधन सबसे बड़ा गठबंधन हैं, और इसी वजह से उसे दूसरे गठबंधनों का मखौल उड़ाने का हक नहीं है। 

लेकिन आज एक दूसरा पहलू इसी बात का ऐसा छुआ जा रहा है जो कि लोग सोशल मीडिया पर उठा भी रहे हैं, और जो कि एक बड़ा जायज सवाल भी है। लोग मोदी के एनडीए गठबंधन के भविष्य के बारे में अब यह बात सोच रहे हैं कि इसके भीतर किसी भी पार्टी की डेढ़ सौ से अधिक सीटें नहीं होनी चाहिए। आज एनडीए में पौने तीन सौ से कुछ कम सीटें हैं, और जिस दिन एनडीए सरकार बनी उस दिन भी मोदी की भाजपा के पास अपने निशान पर इतनी सीटें थीं कि वह लोकसभा में किसी भी और पार्टी के समर्थन-सहयोग के बिना सरकार बना सकती थी। अब अगर लोग यह सोच रहे हैं कि डेढ़ सौ से अधिक सीटें किसी पार्टी की न रहें, न सिर्फ भाजपा की न रहें, बल्कि कांग्रेस की भी न रहें, तो इसके पीछे देश का ठोस तजुर्बा है। 

लोगों को याद होगा कि भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा बहुमत इंदिरा की हत्या के बाद राजीव गांधी को मिला था, और कांग्रेस को चार सौ से अधिक सीटें मिली थीं। लेकिन लोगों को यह भी याद है कि इस असामान्य बहुमत का, इस बाहुबल का इस्तेमाल शाहबानो का गला घोंटने के लिए किया गया था, और अगर उस दिन राजीव गांधी यूपीए-1 के मनमोहन सिंह की तरह वामपंथियों के बाहरी समर्थन के मोहताज न होते, तो शाहबानो बच गई होती। दूसरी तरफ यूपीए का तजुर्बा सामने है, जब यूपीए-1 वामपंथियों के बाहरी समर्थन पर टिकी हुई सरकार थी, तो उसके भीतर घपले और घोटाले नहीं हुए। लेकिन यूपीए-2 को जब वामपंथियों की कोई दरकार नहीं रही, कोई बाहरी समर्थन नहीं लगा, तो उस दौरान मनमोहन सिंह सरकार ने कई घपले किए, सरकार बेकाबू रही। इसलिए स्पष्ट बहुमत न होना कोई बहुत बुरी बात नहीं रहती है, अगर वह बहुमत गठबंधन का ऐसा बहुमत हो कि जिससे सरकार अस्थिर न हो, लेकिन बददिमाग भी न हों। 

लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि आज की केन्द्र की एनडीए सरकार में अगर मोदी का बहुमत इतना अधिक नहीं होता, तो क्या वे शाम को मंत्रिमंडल बुलाकर, उसमें नोटबंदी की घोषणा कर पाते, और मंत्रियों के कमरे से बाहर निकलने के पहले नोटबंदी लागू हो चुकी रहती? क्या वे बिना तैयारी के इस तरह का जीएसटी इस तरह संसद में आधी रात को देश की आजादी की तरह घोषित कर पाते? यह सब इसलिए हो पाया कि भाजपा या मोदी बहुमत इस एनडीए सरकार में इतना बड़ा है कि बाकी पार्टियां उनके सामने अप्रासंगिक हो गई हैं, हाशिए पर चली गई हैं। लोग आज कांग्रेस या भाजपा का नाम लिए बिना भी यह मना रहे हैं कि देश में किसी भी पार्टी को डेढ़ से अधिक सीटें न मिलें, ताकि उनकी ताकत उनके हाथों तक रहे, उनके सिर न चढ़ जाए। यह बात बहुत बुरी नहीं क्योंकि जब गठबंधन के बाकी साथियों की जरूरत सरकार चलाने के लिए हो, तो प्रधानमंत्री अपने मन की बात को नोटबंदी और जीएसटी के फैसलों की तरह मंत्रिमंडल के भीतर रेडियो पर नहीं सुनाएंगे, बल्कि सबकी राय लेकर काम करेंगे। जिन लोगों को यह लगता है कि भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में इस देश को अगर एक तानाशाह मिलता है, और वह इस देश को चलाने के लिए लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री के मुकाबले बेहतर होगा, तो ऐसे लोगों के लोकतांत्रिक-शिक्षण में बड़ी कमी है, और उनकी समझ में लोकतंत्र और तानाशाही में कोई फर्क नहीं है। जिन लोगों को स्थायित्व और निरंतरता के लिए लोकतंत्र इतना ही गैरजरूरी लगता है, वे लोग यह पढ़ लें कि इंदिरा और संजय के वक्त का आपातकाल मजबूत तो बहुत था लेकिन लोकतांत्रिक जरा भी नहीं था। उस वक्त भी देश की, हो सकता है कि, आधी आबादी आपातकाल की मार से बची रही हो, लेकिन जिन लोगों पर तानाशाही की मार पड़ी थी, वे जानते हैं कि अपने परिवार के नौजवान और गैरशादीशुदा लोगों की नसबंदी देखना कितना तकलीफदेह होता है, और बिना जमानत जेलों में रहना कितना तकलीफदेह होता है। इसलिए लोकतंत्र की मजबूती, प्रधानमंत्री या सरकार की मजबूती के मुकाबले बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है।  (Daily Chhattisgarh) 

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 जनवरी : ईवीएम पर अविश्वास एक बार खत्म कर ही दिया जाए...

संपादकीय
22 जनवरी 2019


दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हिन्दुस्तान में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर जितने सवाल उठते हैं, उनमें से तकरीबन तमाम सवाल आज इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर हैं। अभी लंदन में हैकरों के एक कार्यक्रम में एक हैकर ने दावा किया कि 2014 का भारतीय आम चुनाव ईवीएम की हैकिंग से जीता गया था। इसे लेकर भारत में राजनीतिक बयानबाजी फिर शुरू हो गई है क्योंकि लोग अपनी हार को इस मशीन पर थोपते हैं, और अपनी जीत का सेहरा अपने माथे बांधते हैं। हमने पहले भी इसी जगह इस मुद्दे पर लिखा था कि जिस एक चुनाव में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस का सफाया हुआ, उसकी तोहमत ईवीएम पर लगी, और दूसरी तरफ उसी चुनाव में पंजाब में भाजपा-अकाली हारे, और कांग्रेस की सरकार बनी, तो सेहरा पंजा निशान पर बंधा। ऐसे में यह लगता है कि क्या चुनाव आयोग को इस ईवीएम को लेकर किए जा रहे सवाल एक आखिरी बार पूरी तरह से निपटा नहीं देने चाहिए? खासकर तब जब भारत का चुनाव आयोग दुनिया के कई देशों में जाकर चुनाव करवाता है, और उसकी साख देश से ज्यादा अच्छी देश के बाहर है। ऐसे में ईवीएम को लेकर विवादों को निपटारा इसलिए भी हो जाना चाहिए कि दुनिया के एक सबसे बड़े और विकसित देश अमरीका में कम्प्यूटरों से जुड़े हुए तमाम कारोबार हिन्दुस्तानियों के हुनर से भी चलते हैं, और ऐसे में इस देश के भीतर इतने बड़े एक सार्वजनिक मुद्दे का निपटारा इस देश के आईआईटी जैसे संस्थान नहीं कर पा रहे हैं।

लोकतंत्र में जनता का भरोसा एक बड़ा मुद्दा रहता है। जब दुनिया के सबसे विकसित देशों में चुनाव कागज के वोट से होते हैं, तब हिन्दुस्तान कई चुनाव मशीनों से करवा चुका है, और सबसे कम पढ़े-लिखे लोग, पूरी तरह अनपढ़ लोग भी मशीनों पर वोट डालना सीख गए हैं। जब ईवीएम के खिलाफ देश की अलग-अलग कई अदालतों में कई कोशिशें हो चुकी हैं, तो चुनाव आयोग को खुद होकर देश की सबसे उत्कृष्ट कुछ आईआईटी के हवाले अपनी मशीनें करनी चाहिए ताकि वहां से यह खुलासा हो सके कि क्या इन मशीनों में कोई गड़बड़ी की जा सकती है? या फिर यह महज हारने के आसार वाले लोगों का एक आसरा है? 

देश में आज दसियों लाख ईवीएम साधारण निगरानी में पूरे पांच साल पड़ी रहती हैं, और महज चुनाव के वक्त उसकी हिफाजत की लोगों को याद आती है। देश में सरकारों में बैठे हुए लोग जितने तरह के जुर्म करते हैं, उसमें किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि इन मशीनों से छेडख़ानी करके देखी जाए, ऐसा असंभव है। यह बात तय लगती है कि किसी न किसी सरकार के तहत ऐसी मशीनों को कलेक्टरों की निगरानी से हासिल करके उनमें तकनीकी छेड़छाड़ करके देखा जा चुका होगा, और अगर छेड़छाड़ मुमकिन होती तो फिर कोई एक पार्टी पचास बरस के लिए लोकतंत्र पर काबिज हो जाती। ऐसे में जनता के बीच भरोसा कायम करने के लिए चुनाव आयोग को आईआईटी के सामने यह तकनीकी चुनौती रखनी चाहिए कि क्या इस मशीन में छेडख़ानी हो सकती है? राजनीतिक दलों का अफसरों और आयोग पर अविश्वास इतना है कि छत्तीसगढ़ में एक जिले में बंदूकों की निगरानी में सीलबंद कमरों में रखी ईवीएम की निगरानी करते हुए बाहर खुले में ठंड में ठिठुरते एक विपक्षी कार्यकर्ता की मौत भी हो गई। पूरे प्रदेश में हर जिले में विपक्ष के लोग निगरानी करते थक नहीं रहे हैं। और तो और भाजपा के एक बड़े नेता, और एक वक्त के प्रवक्ता जीवीएल नरसिंहराव ने एक पूरी की पूरी किताब, डेमोक्रेसी एट रिस्क, लिख डाली थी जिसमें उन्होंने ईवीएम को पूरी तरह अविश्वसनीय और लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था। आज उनकी पार्टी ईवीएम की सबसे बड़ी तरफदार हो गई है, ठीक वैसे ही जैसे कल तक भाजपा को आधार कार्ड में खामियां ही खामियां दिखती थीं, और अब खूबियां ही खूबियां दिखती हैं। इसलिए एक बार देश को इस विवाद से छुटकारा पा लेना चाहिए। हमारी आईआईटी से निकले हुए लोग आज अमरीका की सबसे बड़ी कंपनियों के मुखिया हैं, इसलिए इन शिक्षण संस्थानों की क्षमता कम आंकना ठीक नहीं है। जिस देश में ऐसे संस्थान हो वहां पर ऐसा अविश्वास और ऐसा असमंजस रहना देश की साख के भी खिलाफ है। इसलिए चुनाव आयोग को ईवीएम मशीनें एक सवाल और एक चुनौती के साथ आईआईटी को दे देना चाहिए, और अगर आयोग खुद होकर ऐसा न करे तो किसी याचिका पर, या उसके बिना भी सुप्रीम कोर्ट ऐसा कर सकता है, उसे ऐसा करना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जनवरी

दूसरों की कुनबापरस्ती, और गठबंधन पर तंज कसने वालों का कल और आज

संपादकीय
21 जनवरी 2019


कोलकाता में ममता बैनर्जी की पहल पर विपक्ष की कोई डेढ़ दर्जन पार्टियों ने जिस तरह भाजपा और मोदी के खिलाफ एकजुटता दिखाई, उस पर आनन-फानन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिक्रिया आई कि ये तमाम लोग अपने कुनबों को आगे बढ़ाने के लिए इकट्ठा हुए, और अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए भी। मानो विपक्ष के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन पर निशाना लगाना हो, इसके तुरंत बाद मोदी ने भारतीय फौज के लिए बन रहे एक टैंक की सवारी करते हुए उसकी तोप के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवाईं, और चारों तरफ पोस्ट कीं। भाजपा की ओर से इस गठबंधन को बहुत सारी पार्टियों का गठबंधन बताते हुए इसे अस्थिर और कमजोर कहा गया। और इसी से लोगों को याद पड़ा कि आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद जिस एनडीए गठबंधन के मुखिया हैं, उसमें कोलकाता रैली से ज्यादा पार्टियां शामिल हैं, और एनडीए-1 के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इससे भी बड़ा गठबंधन चलाया था। इसलिए गठबंधन को कोसते हुए भाजपा को अपना वर्तमान, और दस बरस पहले का इतिहास, दोनों ही देख लेना था। 

जहां तक भाजपा का सवाल है, वह एनडीए नाम के एक ऐसे गठबंधन की मुखिया है जिसके बहुत से भागीदार अपनी अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाते हुए कुनबापरस्ती पर चल रही पार्टियां हैं। महबूबा मुफ्ती से लेकर बादल तक, और उद्धव ठाकरे से लेकर पासवान तक अनगिनत और नेता दूसरी या तीसरी पीढ़ी के नेता हैं, और उनकी पार्टियां घरेलू संगठन हैं। इससे परे यह भी समझने की जरूरत है कि आज जो पार्टियां ममता के साथ खड़ी हैं, उसमें से भी कुछ पार्टियां वाजपेयी की लीडरशिप वाले एनडीए में शामिल थीं, वे तब भी कुनबापरस्त थीं, और आज भी कुनबापरस्त हैं। इसलिए अपनी, या अपने साथियों की कुनबापरस्ती को अनदेखा करके विरोधी कुनबापरस्ती पर हमला भी नाजायज और बेअसर है, और जब खुद गठबंधन की वजह से सत्ता पर हैं, तो विपक्षी गठबंधन के गठबंधन होने को कोसना भी नाजायज है। 

राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोगों को लगता है कि वे वक्त के साथ-साथ अपनी बात बदल सकते हैं, और अपने निशाने चुन सकते हैं। लेकिन सच तो यह है कि लोगों की याददाश्त पहले के मुकाबले कुछ बेहतर है, कुछ लोगों को गूगल की मदद भी हासिल है। इसलिए लोग गैस सिलेंडरों की महंगाई के साथ प्रदर्शन करने वाली सुषमा-स्मृति की तस्वीरें पोस्ट करते हैं, मोदी के तो दर्जनों ऐसे वीडियो पोस्ट करते हैं जिसमें वे चुनावी सभाओं में ऐसी बातें कह चुके हैं कि आज जिनके खिलाफ वे बोलते हैं। ऐसे वीडियो पोस्ट करके लोग पुरानी बातों को याद दिलाते हैं, और आज की बातों का खोखलापन साबित करते हैं। दरअसल बहुत अधिक बोलने की एक दिक्कत यह भी रहती है कि आप इतने अधिक पैरों के निशान और सुबूत छोड़ते जाते हैं कि वे सामने आकर आपका मुंह चिढ़ाने लगते हैं। यह बात महज बीजेपी पर लागू नहीं होती है, और न ही अकेले मोदी पर। बहुत सी पार्टियों के बहुत से नेताओं का बीता कल आज सामने आकर उन्हें चुनौती देता है, और उनके आने वाले कल पर असर डालता है। 

जिन लोगों को क्षेत्रीय दल नापसंद हैं, जिनको गठबंधन नापसंद है, उनको यह भी याद रखना चाहिए कि भाजपा के नेता देश में तीन बार मंत्री-प्रधानमंत्री बने। आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी तो अटल-अडवानी सहित कई भाजपा नेताओं को पहली बार केन्द्रीय मंत्री बनने मिला। दूसरी और तीसरी बार अटल सरकार बनने पर पहली बार भाजपा को पीएम की कुर्सी मिली, और बहुत से भाजपा नेता एनडीए मंत्रिमंडल में मंत्री रहे। अब नरेन्द्र मोदी कई किस्म के अस्वाभाविक दिखते समीकरणों के चलते प्रधानमंत्री बने हैं। इसलिए गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय दलों को कोसना ठीक नहीं है। अगर क्षेत्रीय दल न होते तो भाजपा संसद में एक वक्त एक छोटे से क्षेत्रीय दल से भी छोटी पार्टी थी, और उसके कुल दो सांसद थे। दो सांसदों से लेकर आज संसद में करीब पौने तीन सौ सांसद तक पहुंचने वाली भाजपा का यह सफर कदम-कदम पर क्षेत्रीय दलों की पीठ पर सवार होकर ही पूरा हुआ है। इसलिए सार्वजनिक रूप से आलोचना करते हुए लोगों को अपने सार्वजनिक इतिहास को याद रखना चाहिए। अटल बिहारी के एनडीए में भाजपा के तेरह सहयोगी दल थे, और आज इसमें, और इसे समर्थन देने वालों में बयालीस दल शामिल हैं। गठबंधन के तेरह दलों को छोड़ दें, तो बाकी पार्टियों के लोग न लोकसभा में हैं न राज्यसभा में हैं। ऐसे में दूसरों के गठबंधन हर हंसने का हक पता नहीं भाजपा को कैसे मिला हुआ लगता है?  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जनवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जनवरी

जिला खनिज न्यास किसी का पॉकेट मनी नहीं है...

संपादकीय
20 जनवरी 2019


छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जिला खनिज निधि से निर्माण कार्य करने पर रोक लगाई है, और जो निर्माण चल रहे हैं उनकी समीक्षा की बात कही है। डीएमएफ के नाम से चर्चित जिला खनिज न्यास कलेक्टरों के कब्जे में रहने वाला एक ऐसा फंड है जो कि खनन कार्यों से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए बनाया गया है, और खदानों वाले जिलों को मिलने वाले ऐसे फंड जब इस राज्य में कोरबा जैसे जिले में इतने विशाल हो गए हैं कि उनका खर्च करना एक जिला प्रशासन के लिए मुमकिन नहीं है तो फिर इस राज्य में ऐसे कुछ जिलों का यह फंड कुछ दूसरे जिलों में भी बांटा गया जिन्हें खनन कार्य और खनिज आवाजाही से प्रभावित माना गया। चूंकि छत्तीसगढ़ कोयला और लौह अयस्क के विशाल भंडार वाला प्रदेश है, और इसके अलावा कुछ दूसरे खनिज भी राज्य में मौजूद हैं, इसलिए यहां खनिज रायल्टी का एक हिस्सा संबंधित जिलों को मिलता है, और यह कलेक्टरों के लिए एक बहुत बड़ा आकर्षण भी रहता है। खनिज संपन्न जिलों में कलेक्टर बनने के लिए अफसरों में होड़ लगी रहती है, और उसके बाद फिर इस फंड के तकरीबन मनचाहे इस्तेमाल से अफसर ऐसे प्रोजेक्ट तैयार करते हैं जो कि उनको निजी शोहरत भी दिला सकें। 
लेकिन हाल के बरसों में यह देखने में आया है कि इस फंड के इस्तेमाल के लिए जो नियम बनाए गए थे उनको खींचतान कर इस हद तक ले जाया गया कि उनका पूरा मकसद ही पिट गया। इसे खनन कार्यों से होने वाले नुकसान के मुआवजे के रूप में रखा गया था। यह नुकसान धरती, पानी, हवा, कुदरत, और इंसानों-जानवरों को होता है, और इस नुकसान की अधिकतम मुमकिन भरपाई के लिए इसे रखा गया था। लेकिन हुआ यह कि कलेक्टरों ने अपनी मर्जी से जिला मुख्यालय में कहीं बहुमंजिला पार्किंग बनवा दी, जो कि जाहिर तौर पर शहरी वाहन मालिकों के लिए थी। कहीं पर सरकार के नियमित खर्च की जगह डीएमएफ का पैसा इस्तेमाल किया गया। जब देश की एक बड़ी पर्यावरण-संस्था सीएसई ने छत्तीसगढ़ में इसे लेकर एक व्यापक और गंभीर अध्ययन किया, तो पता लगा कि इस फंड के तहत अधिकतर हिस्सा निर्माण कार्यों पर लगाया गया, और उसके बाद शिक्षा जैसे काम में जो कि सरकार के नियमित कामकाज का एक हिस्सा है। दरअसल छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों ने इसे राज्य शासन के कहे खुलकर ऐसे कामों पर खर्च किया जो कि खनन-नुकसान से जुड़े हुए ही नहीं थे। दूसरी तरफ कई कलेक्टरों ने इसे अपने पॉकेट मनी की तरह इस्तेमाल किया। कहने के लिए तो जिला स्तर पर एक ऐसी कमेटी जरूर रहती थी जिसमें जनप्रतिनिधि भी थे, लेकिन कहीं भी इसकी राय पर काम नहीं हुआ, और राज्य शासन और कलेक्टरों ने इसे इसके मकसद से परे ही खर्च किया। बिलासपुर में तो इस मद से एयरपोर्ट बनाने का काम किया जा रहा है, और पूछने पर जिला प्रशासन ने जवाब यह दिया कि खनिज प्रभावित लोग भी तो विमान यात्रा कर सकते हैं। 
जिला खनिज न्यास का एक मनमाना इस्तेमाल निहायत गलत था, और हम इस अखबार में पहले भी इसके खिलाफ लिख चुके थे। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसके तहत होने वाले निर्माण कार्य रोककर अच्छा काम किया है क्योंकि यह फंड राज्य सरकार की नियमित जिम्मेदारी के किसी विकल्प की तरह नहीं है, और इसका इस्तेमाल बहुत कड़ाई से खनन-प्रभावित लोगों, बाकी प्राणियों, और धरती-कुदरत की भरपाई के लिए ही किया जाना चाहिए। इस बारे में राज्य के अलग-अलग इलाकों में काम कर रहे जनसंगठनों ने समय-समय पर इस फंड की बर्बादी का मामला उठाया है। और जब राष्ट्रीय स्तर पर सीएसई ने एक आयोजन किया था, तो भी यह बात सामने आई थी कि देश के बहुत से प्रदेशों में इस फंड का ऐसा बेजा इस्तेमाल हो रहा है। हमारी सलाह है कि जिला स्तर पर काम करने वाले जनसंगठनों द्वारा उठाए गए मुद्दों को सरकार गंभीरता से सुने ताकि उसे घर बैठे अपने अमले के कामकाज की जानकारी मिल जाए। 
-सुनील कुमार

(Daily Chhattisgarh) 
5:00 PM

भय्यूजी महाराज की बदकिस्मत कि आज मनोहर कहानियां नहीं

संपादकीय
19 जनवरी 2019


मध्यप्रदेश में बसे हुए, और हिन्दू संगठनों, पार्टियों के बीच खासे लोकप्रिय रहे आध्यात्मिक गुरू कहे जाने वाले भय्यूजी महाराज का अंत जिस तरह हुआ है उसने संत और गुरू नाम की नस्लों के बारे में लोगों को एक बार फिर सोचने का मौका दिया है। आध्यात्म और धर्म, संतई और गुरुडम के नाम पर अथाह दौलत इक_ी करना, वैध-अवैध संबंध रखना, ब्लैकमेल करना या ब्लैकमेल होना, और आखिर में अपने ही कर्मों से घिरकर आत्महत्या कर लेना! जिसकी खुद की ऐसी दुर्गति हुई हो उनको बड़े-बड़े राजनीतिक दल और बड़े-बड़े नेता मध्यस्थता करने के लिए सम्मान देते आए हैं। लेकिन हाल के बरसों में बापू कहा जाने वाला आसाराम, बाबा कहा जाने वाला रामपाल, बाबा कहा जाने वाला राम-रहीम, और महाराज कहे जाने वाले भय्यूजी की जो कहानियां सामने आई हैं उनसे आस्थावान लोगों की अक्ल थोड़ी सी तो लौटनी चाहिए, लेकिन हो सकता है कि न भी लौटे, और वे अब तक न पकड़ाए, अब तक जेल न गए किसी और चोगाधारी से अपनी तबाही का सामान जुटाते रहें। 

धर्म और आध्यात्म के नाम पर होने वाली जालसाजी और धोखाधड़ी बड़ी भयानक है। लोग ईश्वर, गुरू, या संत कहे जाने वाले पर ऐसी अंधश्रद्धा रखने लगते हैं कि आस्था के ऐसे केन्द्रों का तबाह होना आसान होने लगता है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ऐसी ही आस्था की एक दुकान बड़ी करते-करते एक आदमी के हाथ इतने लंबे हो गए कि उसने विश्वविद्यालय खोल लिया, और उसके पैरों पर बड़े-बड़े अफसर, जज, और मंत्री पड़े दिखते थे। आस्था के ऐसे बुलबुले फूटने में वक्त लगाते हैं, लेकिन अमूमन फूट ही जाते हैं। इस बीच वे मध्यस्थता के नाम पर कई किस्म की दलाली करते हैं। जिनके नाम पर विश्वविद्यालय चलता है उनकी दलाली का हाल यह है कि सबसे बुरे मुजरिमों को अदालतों से छुड़वाने के लिए वे जज के साथ मध्यस्थता कर लेते हैं, और पुलिस के आला अफसरों के साथ मध्यस्थता करते हैं ताकि अदालत तक पहुंचने वाला केस ही कमजोर हो जाए। ऐसी भी चर्चा है कि वे मध्यप्रदेश में अपने ठिकाने से मुजरिमों को बंदूकें भाड़े पर देते हैं, और अपने पैरों पर पड़े मंत्रियों से सरकारी कामकाज में जुर्म की दलाली भी करते हैं। 

यह देश किस्मत पर भरोसा करने वाले भाग्यवादियों से भरा हुआ है, और वे अपने काम पर भरोसा करने के बजाय इस तरह के पाखंडों पर भरोसा करते हैं जो कि उनके घर की महिलाओं की इज्जत लूटते हैं, बच्चों का देह शोषण करते हैं, दलाली, भ्रष्टाचार, और जुर्म से अरबपति-खरबपति हो जाते हैं, और लोगों के दिल-दिमाग को गुलाम भी बनाकर रखते हैं। अंधविश्वास रखने वाले लोग किसी न किसी पाखंड की तलाश में रहते हैं ताकि अपनी सब दिक्कतों को उस पर डाल देने, और उनके हल हो जाने की खुशफहमी में जिंदा रह सकें। आत्मविश्वास की कमी, कोशिशों की कमी, और भाग्यवादी होना, ऐसी तमाम बातों को लेकर लोग ऐसे कमजोर दिल-दिमाग के होने लगते हैं कि फीस देकर एक निर्मल बाबा के पास चले जाते हैं, और उसका बताया इलाज करने के लिए बाहर आकर बुधवार को काली बकरी को मीठी चटनी वाला गुपचुप खिलाकर अपने भाग्य के उदय का इंतजार भी करते हैं। अनगिनत ऐसे लोग रहते हैं जो अपने नाबालिग बच्चों की देह भी ऐसे पाखंडियों के हवाले कर देते हैं, यह जानते हुए कि उनके साथ बलात्कार हो रहा है, और वे इसे स्वर्ग तक पहुंचने की राह मान लेते हैं। 

दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तानियों की सोच से वैज्ञानिक समझबूझ को तो सोच-समझकर भारी कोशिशों से मिटाया गया है, उनकी अपनी सामान्य समझबूझ और प्राकृतिक तर्कशक्ति भी पाखंडियों के आभामंडल में खो चुकी है। जिनकी उम्र मेहनत करने की है वे घंटों तक रोज ईश्वर के सामने बैठे रहते हैं, उसी ईश्वर के सामने जो कि बच्चियों से बलात्कार को देखता हुआ चुप बैठे रहता है, और जिसे अपने को सर्वज्ञ, सर्वत्र, और सर्वशक्तिमान कहलाने में भी कोई शर्म नहीं आती है। जिन लोगों का जी ऐसे ईश्वरों से नहीं भरता है, वे उसके जीते-जागते दलाल या एजेंट ढूंढ लेते हैं, और अपने मन की कमजोरियों को इन दलालों के साये में आत्मविश्वास में बदलने की खुशफहमी पाल लेते हैं। हर समझदार इंसान की यह जिम्मेदारी है कि अपने आसपास के ऐसे नासमझ अंधविश्वासियों को बार-बार याद दिलाए कि उनकी आस्था के केन्द्र किस तरह बलात्कारी हैं, भ्रष्ट हैं, और अरबपति-खरबपति होते हुए भी आसपास के गरीब भक्तों को किस तरह लूटते हैं। जो बेवकूफ लोग हजारों की टिकट खरीदकर किसी बाबा से यह सुनने जाते हैं कि भूरे चावलों की खीर बनाकर इतवार को उसे काले कुत्ते को खिलाने से भाग्योदय हो जाएगा, उन बेवकूफों की मदद करना समाज के बाकी लोगों की जिम्मेदारी है, खीर और कुत्ते से नहीं, उन्हें अक्ल देकर। फिलहाल लोग भय्यूजी महाराज जैसे चर्चित आदमी के सेक्स और ब्लैकमेल की कहानियों को पढ़कर, मजा लेकर उनकी खुदकुशी पर अफसोस जाहिर कर सकते हैं। दिक्कत यह है कि ऐसी पूरी कहानी को छापने के लिए एक वक्त की बड़ी मशहूर अपराध-पत्रिका मनोहर कहानियां आज शायद निकलती नहीं है। (Daily Chhattisgarh) 

बात की बात, 19 जनवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जनवरी

मामलों से लदे सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसी बारीकियों का वक्त?

संपादकीय
18 जनवरी 2019


महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार के समय से डांस बार पर रोक लगाने की जो नीयत शुरू हुई थी, वह वहां पर अब भाजपा-शिवसेना सरकार के चलते हुए भी उसी तरह जारी है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट एक से अधिक बार इस मामले में फैसला दे चुका है, और डांस बार शुरू करने के अदालती आदेश के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार ने कानून बनाने जैसा काम भी किया ताकि उसे लागू न करना पड़े। अभी कल सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला सामने आया है उसमें एक बार फिर डांस बार को इजाजत दी गई है, और कुछ किस्म की बंदिशें लगाई गई हैं जो कि सरकारी तर्क को मानना भी है, और डांस बार चलाने वाले लोगों के तर्क को मानना भी है। अदालत ने यह रोक लगाई है कि लोग डांसरों पर नोट नहीं लुटा सकेंगे, लेकिन उन्हें टिप दे सकेंगे। दूसरी तरफ महाराष्ट्र सरकार की इस बात को अदालत ने खारिज कर दिया कि डांस बार के भीतर कैमरे लगाए जाएंगे, और पास के थाने में टीवी स्क्रीन पर उनकी रिकॉर्डिंग को देखा जा सकेगा। अदालत ने इसे निजता के खिलाफ माना, और इसकी इजाजत नहीं दी। दूसरी तरफ डांस देखते हुए शराब पीने की छूट दी गई है। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट ने डांस बार को कानूनी माना, उन्हें चलाने की छूट दी, और नोट लुटाने पर रोक जैसी कुछ छोटी-मोटी बंदिशें जरूर लगाई हैं। 

अब इस रोक की बात करें, तो लगता है कि हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट के पास आखिर वक्त कितना है कि वह डांस बार में डांस करती वयस्क महिला पर वयस्क लोगों द्वारा नोट लुटाने या उन्हें टिप देने में फर्क कर रहा है? सोशल मीडिया पर आए दिन ऐसे वीडियो तैरते हैं जिनमें उत्तर भारत के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में बहुत ही कम कपड़ों में नाचती हुई किसी लड़की या महिला पर वहां के कोई नेता नोट लुटा रहे हैं। यह भारत के एक बड़े हिस्से की संस्कृति है। इससे परे कव्वाली के जितने सार्वजनिक कार्यक्रम होते हैं, उनमें यह एक सांस्कृतिक हिस्सा ही है कि लोग कोई शेर पसंद आने पर चलकर-जाकर स्टेज के पास खड़े होकर कव्वाल या कव्वालन को नोट देते जाते हैं। कुछ कार्यक्रमों में तो यह एक मजेदार नजारा रहता है कि नोटों से लबालब प्रशंसक सामने खड़े रहते हैं, और एक-एक कर खासी देर तक नोट देते जाते हैं। गुजरात और राजस्थान के ऐसे बहुत से वीडियो सामने आते हैं जिनमें किसी कीर्तन या धार्मिक संगीत के आयोजन में लोग खड़े होकर नोट लुटाते हैं, और आखिर में ऐसे आंकड़े भी आते हैं कि एक आयोजन में किस तरह दसियों लाख रूपए इक_े हुए, और उन्हें समाज सेवा के किस काम में लगाया गया। इससे परे सड़कों पर निकलती बारातों में देखा जा सकता है कि किस तरह दूल्हे पर से नोट उतारे जाते हैं, या लुटाए जाते हैं। और तो और हिन्दुओं में जब अर्थी निकलती है, तो उसके ऊपर से भी सिक्के लुटाए जाते हैं, और शवयात्रा के साथ-साथ गरीब बच्चे दौड़-दौड़कर उन सिक्कों को उठाते दिखना एक आम बात है। 

अब सवाल यह है कि वयस्क मनोरंजन की एक रोजी-रोटी में लगी हुई महिला को अगर उस पर लुटाए गए कुछ नोट मिल जाएं, तो इस पर सुप्रीम कोर्ट को कोई दिक्कत आखिर क्यों होनी चाहिए? अगर देश की मुद्रा को इस तरह हवा में उछालना मुद्रा का अपमान है, तो फिर वह कीर्तनों पर भी लागू करने लायक रोक है, महज डांस बार पर क्यों? सुप्रीम कोर्ट का फैसला मोटे तौर पर एक अच्छा फैसला है जो लोगों की वयस्क मनोरंजन की जरूरतों को मान्यता देता है, और ऐसे मनोरंजन से महिलाओं को रोजी-रोटी कमाने को भी। लेकिन फिजूल की छोटी-छोटी बातों में सुप्रीम कोर्ट को नहीं जाना चाहिए, और मोहब्बत या खुदा के नाम पर होने वाली कव्वाली में, ईश्वर के नाम पर होने वाले कीर्तन में नोटों को लुटाना या थमाना अगर जायज है, तो डांस बार से मजदूरी कमाने वाली महिला के लिए वैसी बख्शीश क्यों नाजायज होनी चाहिए? 

हम पिछले बरसों में कई बार महाराष्ट्र की डांस-बार-रोक के खिलाफ लिख चुके थे, और यह भी कहा था कि इस तरह दसियों हजार महिलाओं से सुरक्षित मनोरंजन का यह रोजगार छीनकर महाराष्ट्र सरकार ने किस तरह उनको देह बेचने के धंधे की तरफ धकेला था। अब सुप्रीम कोर्ट की कई बार की दखल के बाद इस सरकारी बददिमागी को खत्म मानना चाहिए जो कि कांग्रेस सरकार से लेकर भाजपा-शिवसेना सरकार तक जारी है। वयस्क मनोरंजन की जरूरत को मानने से इंकार करना एक पाखंड से परे कुछ नहीं है, और इक्कीसवीं सदी में भी सरकारी पाखंड को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट की दखल का जरूरी होना निहायत शर्मिंदगी की बात है, और लोकतंत्र में परिपक्वता की कमी की बात भी है। इस देश के इतिहास में सदियों से नृत्यांगनाओं के रोजगार की परंपरा रही है, और यह आज की वयस्क मनोरंजन की जरूरत भी है।  (Daily Chhattisgarh) 

गंदी बातों का टीवी कारोबार, और भारतीय सोच का हाल...

संपादकीय
17 जनवरी 2019


भारतीय क्रिकेट टीम के दो खिलाड़ी, हार्दिक पंड्या और के.एल. राहुल को कॉफी विद करण नाम के एक कार्यक्रम में अपने सेक्स जीवन और महिलाओं के प्रति हिकारत की गंदी बातों की वजह से टीम से हटा दिया गया है। यह सजा वैसे तो दो मैचों के लिए दी गई है, लेकिन इससे परे भी उनका एक नुकसान यह हुआ है कि करोड़ों के मॉडलिंग के काम उनसे छीन लिए गए हैं। यह बवाल इस कार्यक्रम के प्रसारण के बाद हुआ, और अब तक खत्म होते दिख नहीं रहा है। 

दरअसल जिन लोगों ने इस कार्यक्रम को पहले भी देखा है वे जानते हैं कि करण जौहर मुम्बई की फिल्मी दुनिया में सबसे बड़े अफवाहबाज का तमगा अपने लिए कई लोगों के मुंह से सुनते हुए भारी खुश होते हैं, और एक फिल्म निर्माता-निर्देशक या टीवी-जज की हैसियत से वे पूरे फिल्म उद्योग के बीच रहते हैं, और लोगों की निजी जिंदगी, आपसी रिश्तों की हकीकत और अफवाह से अच्छी तरह वाकिफ रहते हैं। नतीजा यह होता है कि उनका कार्यक्रम फिल्मी सितारों की निजी जिंदगी की ऐसी परतें उधेडऩे की ताकत रखता है जिसे आम जनता सुनना चाहती है। अब अगर इन दो क्रिकेट खिलाडिय़ों पर कार्रवाई न हुई होती, तो उस कार्यक्रम को देखने वाले अधिकतर लोगों ने उसे भारी सनसनीखेज मजे वाला पाया होगा। फिर जब कुछ जागरूक लोगों ने उसके खिलाफ हल्ला किया, तो लोगों को लगा होगा कि अरे उसमें कुछ गलत भी था। सच तो यह है कि इंसानी मिजाज उन वर्जित चीजों के बारे में अधिक सुनना, अधिक देखना, और उन्हें अधिक करना चाहता है जिससे उसे सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से रोका गया है। हिन्दुस्तानी समाज में जिस तरह सेक्स की चर्चा को एक वर्जित विषय बना दिया गया है, उसका एक नतीजा यह भी निकला है कि लोग इस वर्जित विषय के बारे में रद्दी से रद्दी तरह से सोचते हैं, और बातें करते हैं। हिन्दुस्तान की आम सेक्स-चर्चा, सेक्स के जुर्म, उसकी विकृति, और उसके नकारात्मक पहलुओं तक सीमित रह जाती है। ऐसा सेक्स-कुंठित समाज जब करण जौहर जैसे शो में सितारों की निजी अफवाहों को सनसनीखेज तरीके से सुनता है, तो वह बंधा रह जाता है। 

यह तो ठीक है कि सार्वजनिक जीवन के जो घोषित पैमाने होते हैं, उन पर खोटा उतरने के बाद इन दो क्रिकेट खिलाडिय़ों को दो मैचों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया, लेकिन लोगों को उनकी उत्तेजक सेक्स-चर्चा से जो मजा पाना था, वे पा चुके, और करण जौहर के इस शो को जो अतिरिक्त शोहरत हासिल होनी थी, वह भी हो चुकी। यह सजा गलत नहीं है, लेकिन समाज के बहुत ही कम लोगों को इस कार्यक्रम को देखते हुए यह अहसास रहा होगा कि यह सजा के लायक है। कुछ जागरूक लोगों ने सार्वजनिक रूप से जब ऐसी गंदी चर्चा पर आपत्ति की, तो फिर उसके बाद क्रिकेट बोर्ड के सामने सिवाय सजा देने के और कोई विकल्प बचा नहीं था। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि फिल्मी सितारे, संगीत या क्रिकेट सितारे अपने आसपास के मंत्रमुग्ध प्रशंसकों के साथ आए दिन शोषण का ऐसा बर्ताव करते हैं, और उनके आभा मंडल से बावले हो गए लोग उनके सामने अपने कपड़े भी खुद होकर ही शायद उतार देते हैं। ऐसे में भारत की सार्वजनिक चर्चा को लेकर यह सोचने की जरूरत है कि क्या वर्जित विषयों पर बातचीत इस हद तक खत्म हो जानी चाहिए कि उसे निजी स्तर तक उधेड़कर लोग टीवी पर दर्शकों को बांधने का कारोबार करें? क्या इस देश में वयस्क विषयों पर वयस्क लोगों के बीच गंभीर और परिपक्व चर्चा की गुंजाइश नहीं है? और तो और हिन्दुस्तान में वयस्क विषयों पर किसी पत्रिका की गुंजाइश भी कभी नहीं निकल पाई, और घटिया पोर्नोग्राफी को ही वयस्क सामग्री मान लिया गया। 

अंग्रेजों के वक्त चर्च के थोपे गए वर्जित विषयों के पैमानों से उसके पहले तक परिपक्व रहते आए भारत को अपनी वयस्क जरूरतों को बेहतर समझने की जरूरत क्या नहीं है?  (Daily Chhattisgarh)