पाक की बातचीत की पेशकश का इस्तेमाल किया जाना चाहिए

संपादकीय
28 फऱवरी 2019



भारत और पाकिस्तान के बीच चल रही फौजी तनातनी में कल दो नाटकीय मोड़ आए, एक तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने सार्वजनिक रूप से भारतीय प्रधानमंत्री से अपील की कि वे बातचीत शुरू करें, और पाकिस्तान तमाम मुद्दों पर बात करने के लिए तैयार है जिसमें आतंक का मुद्दा भी शामिल है। इमरान ने यह भी कहा कि एक बार अगर जंग छिड़ जाएगी, तो उसे रोकना किसी के हाथ में नहीं रह जाएगा। इस पर भारत की ओर से सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, और प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार में लगे हुए दिख रहे हैं। दोनों देशों के लोगों सहित दुनिया के कई देशों के लोग यह इंतजार कर रहे हैं कि बातचीत की इस पेशकश पर भारत का क्या रूख रहता है, और अधिकतर लोग यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि फौजी कार्रवाई आगे बढऩे के बजाय सिलसिला थमेगा, और बातचीत का कोई रास्ता निकलेगा। इस बीच भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर, संयुक्त राष्ट्र में इस बात की कोशिश कर रहा है कि भारत पर कई आतंकी हमले करने वाले पाकिस्तान में बसे आतंकी मसूद अजहर को आतंकियों की विश्व-सूची में शामिल किया जाए। हो सकता है कि भारत यह राह देख रहा हो कि एक बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान कुछ और दूरी तक अलग-थलग पड़ जाए, तब किसी बातचीत में उसका रूख नर्म रहेगा, और समझौते का रहेगा। सरकार से परे भारत के बहुत से दूसरे बवाली और बकवासी लोग यह आरोप दुहराने में लगे हैं कि इमरान खान पाकिस्तानी फौज का पि_ू है, और उससे बातचीत से कोई फायदा नहीं है। 
हमने दो दिन पहले इसी जगह यह लिखा था कि यह मोदी सरकार के आखिरी कुछ हफ्ते चल रहे हैं, और ऐसे में सरकार कोई बड़ी फौजी कार्रवाई भी शायद न कर सके, और कोई गंभीर बातचीत भी शायद चुनाव के पहले के इन हफ्तों में न हो सके। हमारे लिखने के अगले ही दिन भारत ने पाकिस्तान पर जो बम बरसाए हैं, उसे लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे हैं, पाकिस्तान का कहना है कि उससे जान और माल की कोई बर्बादी नहीं हुई है, और रात के अंधेरे में हुए हमले के बाद सुबह-सुबह भारत ने ढाई-तीन सौ मौतों का आंकड़ा अनौपचारिक रूप से मीडिया को बताया है। इसके बाद कल फिर दोनों देशों के बीच फौजी विमानों की आवाजाही हुई है, कुछ-कुछ बम बरसाने के दावे किए गए हैं, कुछ विमान गिराने के दावे किए गए हैं, और इन सबके बीच में जो सबसे गंभीर बात हुई है, वह है भारत का एक लड़ाकू विमान पाकिस्तान में गिरना, और उसके पायलट का पाकिस्तान के हाथ जिंदा लगना। अब इस पायलट की रिहाई चुनाव के मुहाने पर खड़ी मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी, और पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह की बातचीत, तोलमोल, इन सबका सीधा लेना-देना इस पायलट की रिहाई और चुनाव, ये दोनों ही रहेंगे। ऐसे में इमरान खान की इस बात को अनदेखा करना शायद ठीक नहीं होगा कि भारत और पाकिस्तान को बातचीत करनी चाहिए। 
जो लोग यह मानते हैं कि पाकिस्तान के भीतर इमरान का कोई वजन नहीं है, और चुनावों में धांधली के रास्ते वहां की फौज ने ही अपने एक पि_ू को प्रधानमंत्री बनवाया है, उनको यह बात याद रखनी चाहिए कि भारत ने तो पाकिस्तान के साथ उस वक्त भी बातचीत जारी रखी जब एक के बाद एक फौजी तानाशाह वहां की हुकूमत चलाते रहे। इसलिए पाकिस्तान की सत्ता किसके हाथ है, यह देखना हिन्दुस्तान का काम नहीं है। अगर लगता है कि उस देश से बात करनी है, तो फिर उस देश की हुकूमत से ही बात करनी होगी। भारतीय पायलट के पाकिस्तानी कैद में होने से परे भी दोनों देशों को अमन-चैन की एक और कोशिश करनी चाहिए। शांति की हजार मील लंबी राह भी पहला कदम बढ़ाने के बाद ही कम होना शुरू होती है, और आज जब हिन्दुस्तान मोदी के पौने पांच बरस पूरे होने के बाद भी आतंकी हमलों पर किसी तरह काबू नहीं कर पाया है, तो पाकिस्तान की बातचीत की पेशकश को एक मौका जरूर देना चाहिए, ऐसा न करके हिन्दुस्तान एक रणनीतिक चूक भी करेगा, और बाकी दुनिया के सामने उसकी यह तस्वीर बनेगी कि वह बातचीत से कतराते रहा है। आज जिस तरह पाकिस्तान की यह तस्वीर बन रही है, या कि बन चुकी है कि उसकी जमीन से आतंकी तैयारी करते हैं, और हिन्दुस्तान पर हमला करते हैं, ऐसे में भारत को अपनी अंतरराष्ट्रीय साख भी बनाए रखना चाहिए, और पड़ोस में स्थायी रूप से खड़े हुए तनाव, खड़ी हुई दुश्मनी को भी कम करने की कोशिश करना चाहिए। ऐसा न होने पर भारत की विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा, फौजी तैयारी का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान-केन्द्रित होकर रह गया है, जो कि दोनों ही मुल्कों की गरीब जनता के पेट काटकर हो रहा है। पाकिस्तान की फौजी तैयारी भी वहां की गरीबी की कीमत पर ही हो रही है। हमारा ख्याल है कि बातचीत की पेशकश जिस वक्त भी, जिस तरफ से भी आए, उसके लिए कोशिश की जानी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 28 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 27 फरवरी

ओडिशा के लोक कलाकार क्या छत्तीसगढ़ के नहीं हैं?

संपादकीय
27 फऱवरी 2019



छत्तीसगढ़ में पिछले दो दिनों के अखबार राजधानी की एक सांस्कृतिक-हलचल की खबरों को छाप रहे हैं कि किस तरह यहां एक सरकारी कार्यक्रम में पड़ोस के ओडिशा से बुलाए गए लोक कलाकारों का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया क्योंकि राज्य सरकार ने यह तय किया था कि छत्तीसगढ़ में बाहरी कलाकारों को नहीं बुलाया जाएगा, और राज्य के ही कलाकारों के कार्यक्रम करवाए जाएंगे। ओडिशा के कलाकार रायपुर पहुंच चुके थे, और तब उन्हें यह आदेश थमाया गया कि उनका कार्यक्रम नहीं होगा। संस्कृति मंत्री ताम्रध्वज साहू के इस फैसले पर जब लोगों ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ध्यान खींचा तो उन्होंने कहा कि बाहरी कलाकारों पर रोक का मतलब बॉलीवुड जैसे कलाकारों को करोड़ों रूपए देकर छत्तीसगढ़ बुलाने से था जो कि पिछली सरकार कर रही थी। उन्होंने साफ किया कि सरकार के उस रूख का मतलब लोक कलाकारों को रोकने से नहीं था। मुख्यमंत्री के आदेश के बाद ओडिशा के लोक कलाकारों का कार्यक्रम हुआ, तो अपने आपको छत्तीसगढ़ का एक संगठन बताने वाले लोगों ने वहां पहुंचकर तोडफ़ोड़ की, और इस हरकत से छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक-सामाजिक इतिहास पर कालिख मल दी। बाद में ऐसा उजागर हुआ है कि छत्तीसगढ़ सरकार के संस्कृति विभाग ने ठेकेदारी की तरह काम करने वाले राज्य के कुछ कारोबारी-कलाकार कंपनियों ने यह बवाल खड़ा किया था। 
छत्तीसगढ़ का संस्कृति विभाग कितना भ्रष्ट था, और आज कितना भ्रष्ट है, इस पर अलग से चर्चा की जा सकती है। लेकिन आज यहां पर बात यह है कि ओडिशा से आए हुए वहां के परंपरागत लोक कलाकारों का कार्यक्रम सरकार द्वारा इस तरह रद्द करना, और उसके बाद स्थानीयता के नाम पर ऐसी हिंसक आक्रामकता की इजाजत देना किस तरह की लोक संस्कृति है? क्या छत्तीसगढ़ महज उन्हीं छत्तिसगढिय़ों का है जो कि यहां के मूल निवासी हैं? या उनका भी है जो कि पीढिय़ों से यहां बसे हुए हैं? जिस वक्त छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा भी नहीं था, और वह ओल्ड सीपी एंड बरार का हिस्सा था, उस वक्त से छत्तीसगढ़ और उड़ीसा (तब नाम ओडिशा नहीं था) के सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध इतने गहरे थे कि दोनों राज्यों की सरहद के तमाम इलाकों में, देवभोग से लेकर सराईपाली तक, और रायगढ़ से लेकर जशपुर तक का इलाका ओडिशा से लगा हुआ है, और तमाम सरहदी इलाकों में पीढिय़ों से ओडिशा के लोग आकर छत्तीसगढ़ में बसे हुए हैं। वे यहां मेहनत-मजदूरी करते हैं, कमाते-खाते हैं, और यहीं पर खर्च भी करते हैं, अगली पीढ़ी भी यहीं पर बसती है। छत्तीसगढ़ में ऐसे दसियों लाख उडिय़ा हैं, और संस्कृति विभाग के इस ताजा रूख के बाद सवाल यह उठता है कि क्या वे दसियों लाख उडिय़ा इंसान अपने सांस्कृतिक अधिकार खोकर इस राज्य में बसे हैं? क्या उनकी अपनी मूल लोककला को छोड़कर ही उनको इस प्रदेश में बसना होगा? पूरे छत्तीसगढ़ में लाखों उडिय़ा महिलाएं लोगों के घरों का काम करती हैं, लाखों रिक्शेवाले बाकी लोगों को ढोते-खींचते हैं, हर शहर-कस्बे की सफाई में उडिय़ा कर्मचारी लगे हैं, और छोटी-छोटी होटलों में उडिय़ा कर्मचारी ही पकाते और खिलाते हैं। वे अपनी मूल सांस्कृतिक लोककला को देखने क्या वापिस अपने पुरखों के जन्म-प्रदेश ओडिशा जाएंगे? 
कल के दिन यह तंगदिली और कितनी तंग होगी?क्या बस्तर की कला को बस्तर की सरहद पार करने से रोक दिया जाएगा कि बाकी छत्तीसगढ़ में उसे आने की इजाजत इसलिए नहीं है कि रायपुर संभाग की लोककला अलग है, दुर्ग संभाग की अलग है, बिलासपुर संभाग की अलग है, और सरगुजा संभाग की सोनाबाई रजवार के परिवार के मौजूदा लोक कलाकारों को सरगुजा के भीतर ही सीमित रहना चाहिए। चूंकि छत्तीसगढ़ में लोककला को लेकर यह ताजा तनाव सरकार के स्तर पर शुरू हुआ है इसलिए इसे हम महज छत्तीसगढ़ के कारोबारी लोककला कंपनियों के खड़े किए हुए तनाव तक सीमित नहीं मान सकते। सरकार के स्तर पर बाहरी और भीतरी का फैसला भौगोलिक सीमाओं के आधार पर करना गलत होगा, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसे साफ भी कर दिया है। लेकिन उनकी मंजूरी के बाद भी ओडिशा के लोक कलाकारों को मंच पर जिस तरह की तोडफ़ोड़ और हिंसा का सामना करना पड़ा है उससे मुम्बई में शिवसेना और राज ठाकरे के उस हिंसक क्षेत्रवाद की याद पड़ती है जो कि वहां शिवसैनिक यूपी-बिहार के लोगों के खिलाफ सड़कों पर निकालते रहते हैं। यह सिलसिला छत्तीसगढ़ की गौरवशाली सहिष्णुता और उदारता के चेहरे पर कलंक की तरह है, और जानकार लोगों का यह जानना-मानना है कि इसके पीछे छत्तीसगढ़ की आम जनता की सांस्कृतिक समझबूझ का कोई हाथ नहीं है, इसके पीछे महज उन कारोबारियों का हाथ है जो कि लोककला के नाम पर इस राज्य में हर बरस करोड़ों का सरकारी कारोबार करते हैं। ऐसे लोगों को अगर राज्य सरकार एक निहायत तंग नजरिए वाली क्षेत्रीयता को बढ़ावा देने की इजाजत देगी, तो कल के दिन ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर पहुंचने वाले छत्तीसगढ़ी-भक्तों को वहां के पंडे लौटा देंगे कि अपने राज्य में अपने देवता की पूजा कर लें। छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को यह भी समझना चाहिए कि राजधानी में संस्कृति विभाग और संस्कृति मंत्री ताम्रध्वज साहू ने आज जिस अंदाज में ओडिशा के लोक कलाकारों को सदमा दिया है, उसका जवाब कांग्रेस पार्टी द्वारा ओडिशा के प्रभारी बनाए गए टी.एस. सिंहदेव को वहां जरूर देना पड़ेगा। आने वाले आम चुनाव के लिए छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ मंत्री टी.एस. सिंहदेव को कांग्रेस ने ओडिशा का प्रभारी बनाया है, और वहां हर जगह उनसे अगर रायपुर में ऐसी बदसलूकी के बारे में पूछा जाएगा, तो क्या उनके पास कोई जवाब रहेगा? 
जो कांग्रेस पार्टी अपने आपको राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बताते नहीं थकती, उस पार्टी का छत्तीसगढ़ का संस्कृति मंत्री अगर राज्य के दसियों लाख उडिय़ा लोगों की कला को बाहरी गिनता है, तो फिर यह पार्टी एक आक्रामक क्षेत्रवाद की सोच के सामने लेट जा रही है। यह सिलसिला तुरंत ही खत्म होना चाहिए, और सरकार की तरफ से उन अतिथि कलाकारों से दिल की गहराई से माफी मांगनी चाहिए जिनको छत्तीसगढ़ से अपमानित करके भेजा गया है। जितना हक पुरी के जगन्नाथ पर छत्तीसगढ़ का है, उतना ही हक छत्तीसगढ़ के लोकमंच पर ओडिशा के कलाकारों का है क्योंकि उनकी कला छत्तीसगढ़ की अपनी लोककला भी है, वे पराए नहीं हैं, बल्कि यहां की आबादी की मूल-लोककला के प्रतिनिधि भी हैं। यह भी याद रखने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ में कसडोल के इलाके में ओडिशा की विख्यात संबलपुरी साडिय़ों की बुनाई होती है, ओडिशा से व्यापारी आते हैं, धागे और डिजाइन देकर जाते हैं, और कुछ वक्त बाद उसे ले जाकर संबलपुर से बेचते हैं। राज्यों के बीच ताने-बाने इस साड़ी के ताने-बाने की तरह ही गुंथे रहते हैं, इसे तोडऩे की क्षेत्रीयता छत्तीसगढ़ की गौरवशाली परंपरा के ठीक खिलाफ है, ऐसी सरकारी या कारोबारी हरकत तुरंत खत्म होनी चाहिए। और जिन लोगों को अपने आपको छत्तीसगढ़ी बताने का, और ओडिशा के लोक कलाकारों को बाहरी बताने का हिंसक-कारोबारी शौक है, वे अपनी जाति और अपने मूल को देख लें, और फिर यह बात अच्छी तरह समझ लें कि छत्तीसगढ़ की मूल लोककला को ही इस राज्य में सरकारी मंच मिलना चाहिए, तो फिर महज गोंड-आदिवासियों की लोककला का ही एकाधिकार यहां रहेगा, बाकी सब छत्तीसगढ़ी लोक कलाकार अपना कोई और प्रदेश ढूंढें।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 26 फरवरी

आतंकी हमलों के जवाब में भारत के पाक पर बम

संपादकीय
26 फऱवरी 2019



सरहद से काफी भीतर तक घुसकर भारतीय लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तानी जमीन पर हमला किया, और यह दावा किया कि उसने कई आतंकी ठिकाने तबाह कर दिए। भारतीय फौज का अंदाज है कि सैकड़ों आतंकी इस हमले में मारे गए हैं। रात के अंधेरे में दर्जन भर लड़ाकू विमानों ने जाकर तीन जगहों पर बमबारी की, और हिफाजत से अपनी जमीन पर लौट आए। पाकिस्तान ने अब तक किसी नुकसान को नहीं माना है, और उसका कहना है कि हिंदुस्तानी लड़ाकू विमान सरहद से कुछ किलोमीटर आगे तक आए थे, और पाकिस्तानी वायुसेना जैसे ही हवा में पहुंची, हिंदुस्तानी विमान लौटते-लौटते बम गिराकर चले गए।
सरहद के दोनों तरफ का मीडिया ऐसे मामलों में हकीकत के लिए अपनी-अपनी सरकारों पर निर्भर रहता है, और वहीं से खबर मिलती है। आगे चलकर जब जमीनी हकीकत पता लगेगी तो समझ आएगा कि भारतीय विमान कितने भीतर तक गए थे, और नुकसान कितना हुआ है। लोगों को याद होगा कि पिछले बरस भी भारत ने अपने एक फौजी कैंप पर हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तानी आतंकी कैंपों पर एक सर्जिकल स्ट्राइक करने का दावा किया था, और पाकिस्तान ने उस दावे को खारिज कर दिया था। खुद भारत के भीतर एक बात को लेकर बहस छिड़ी थी कि क्या मोदी सरकार का किया गया सर्जिकल स्ट्राइक देश का पाकिस्तान पर पहला सर्जिकल स्ट्राइक था, या मनमोहन सरकार बिना किसी प्रचार के अपने वक्त ऐसा कर चुकी थी। खैर उस वक्त की बात अलग थी, आज भारत के तमाम राजनीतिक दल इस बात के हिमायती हैं कि भारत पर बार-बार होते हुए आतंकी हमलों के मद्देनजर पाकिस्तान पर कोई कार्रवाई की जाए। और ऐसी ही राष्ट्रीय सहमति के चलते मोदी सरकार ने बीती रात जब यह बमबारी की है, तो राहुल गांधी से लेकर ममता और केजरीवाल तक तमाम लोगों ने भारतीय वायुसेना को उसकी क्षमता और उसकी कार्रवाई के लिए बधाई दी है। और जैसी कि उम्मीद थी, मोदी समर्थक इस कार्रवाई के लिए मोदी को बधाई दे रहे हैं, साथ-साथ वायुसेना को भी।
भारत में पुलवामा में सीआरपीएफ पर हुए बड़े आतंकी हमले के बाद दिल्ली में दर्जनों देशों के राजदूतों को विदेश मंत्रालय बुलाकर इस बात के सुबूत सामने रखे थे कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान की जमीन से कैसी साजिशें की गई थीं। इसके अलावा दुनिया के तमाम बड़े देशों में भारत के राजदूतों ने वहां सरकारों को बताया था, संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपनी बात रखी थी और पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई मांगी थी। इन सबके बाद आज आतंकी हमले के दस दिन गुजर जाने पर भारत ने जो फौजी कार्रवाई की है, उसे औपचारिक रूप से गैरफौजी कार्रवाई कहा गया है। इसके पीछे तर्क यह है कि यह बमबारी न तो पाकिस्तानी जनता पर की गई, और न ही पाकिस्तानी फौजी ठिकानों पर। भारत सरकार का कहना है कि पुख्ता खुफिया जानकारी की बुनियाद पर यह हमला किया गया जो कि आतंकी ठिकानों तक सीमित था, और इसमें केवल आतंकी लोग मारे गए हैं। अब सरहद के दोनों तरफ सरकारों का बारीक सच आते-आते सामने आएगा क्योंकि सैकड़ों आतंकियों की मौत के दावे से लेकर किसी की भी मौत न होने के दावे के बीच का सच बताएगा कि यह हमला किस निशाने पर कितना सही बैठा, कितना कामयाब रहा। लेकिन इससे परे भी यह बात समझना जरूरी है कि जिस तरह पाकिस्तान की जमीन से भारत के खिलाफ खुलकर, सार्वजनिक रूप से आतंकी फतवे दिए जाते रहे हैं, और उन्हीं के मुताबिक हमले होते भी रहे हैं, तो ऐसे में भारत के पास अपनी आत्मरक्षा के लिए ऐसी किसी कार्रवाई के अलावा और कोई विकल्प बाकी नहीं था। भारत सरकार ने दुनिया को भरोसे में लेने के बाद यह कार्रवाई की है, जो कि बहुत सीमित है, और संतुलित दिखती है। यह अनुपातहीन कड़ी कार्रवाई नहीं है जैसी आशंका अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चार दिन पहले से जाहिर कर रहे थे। भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु ताकतें हैं, और दोनों ही गरीबी और कुपोषण के झेल भी रहे हैं। ऐसे में इस कार्रवाई से परे, इस कार्रवाई के बाद, दोनों देशों के बीच किसी बातचीत की एक कोशिश दोनों के दोस्त देशों को करनी चाहिए, और उसका वक्त भारत के आम चुनावों के बाद आएगा। फिलहाल यह मनाना चाहिए कि भारत सरकार ने अपने लोगों के सामने हमलों के जवाब में यह कार्रवाई कर ली है, और पाकिस्तान इसके जवाब में कोई ऐसी कार्रवाई नहीं करेगा जो कि सरहद पर एक जंग की शुरूआत करे।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 फरवरी

राजनीतिक झंडे तले बच्चों का अपहरण और कत्ल

संपादकीय
25 फऱवरी 2019



मध्यप्रदेश के सतना में दो छोटे जुड़वां भाईयों का अपहरण हुआ, परिवार से बीस लाख रूपए की फिरौती ली गई, और अब उनकी लाशें पानी मेें तैरते मिली हैं। इस बीच प्रदेश की कांग्रेस सरकार के खिलाफ भाजपा ने जमकर हल्ला बोला, और विपक्ष का अपना जिम्मा निभाया। अब जब हत्यारा पकड़ाया है तो वह आरएसएस और बजरंग दल, भाजपा और उसके नेताओं का करीबी निकला है, जिन गाडिय़ों का इस्तेमाल अपहरण और कत्ल में हुआ है, उन पर नंबर प्लेट की जगह रामराज्य लिखा हुआ है, हिन्दू धर्म के दूसरे निशान बने हुए हैं, और मोदी-भाजपा का झंडा लगा हुआ है। हत्यारे का फेसबुक पेज उसके संघ-भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरों से भरा हुआ है। मध्यप्रदेश में यह अपने किस्म की अकेली वारदात नहीं है। इसके पहले केन्द्र की मोदी सरकार की जांच एजेंसियों ने और मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार की पुलिस ने पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के जुर्म में जिन लोगों को गिरफ्तार किया था, उनमें भी भाजपा का एक नेता शामिल था। 
अब सवाल यह उठता है कि जब साम्प्रदायिक संगठनों और राजनीतिक दलों का बैनल इस्तेमाल करने वाले लोग स्थानीय पुलिस पर एक दबाव बनाते हुए जुर्म करते हैं, तो उनके पकड़ाने की गुंजाइश वैसे भी कम हो जाती है। हिन्दुस्तान में शायद ही ऐसा कोई राज्य होगा जहां पर पुलिस सत्तारूढ़ पार्टी के दबाव के बिना काम करती होगी, और रिश्वत दिए बिना अपनी खुद की कोई पोस्टिंग पाती होगी। हिन्दुस्तान वैसे तो कई मुद्दों पर जगह-जगह बंटा हुआ है, लेकिन इस एक बात पर कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है कि पुलिस सत्तारूढ़ पार्टी के भ्रष्टाचार का, उसके लोगों के जुर्म छुपाने का, सबसे बड़ा जरिया है। ऐसे में भ्रष्ट पुलिस का हौसला वैसे भी मंदा रहता है, और वह सत्तारूढ़ नेताओं या सत्ता की मेहरबानी हासिल किए हुए नेताओं के जुर्म को अनदेखा करने की आदी हो जाती है। लेकिन इस एक बात से परे की भी एक दूसरी बात जगह-जगह सामने आई है कि धर्म और जाति के नाम पर, सम्प्रदाय और साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले लोगों में से हिन्दू संगठनों के ही लोग ऐसे अधिक मिल रहे हैं जो कि तरह-तरह के जुर्म में शामिल पकड़ा रहे हैं। देश के राज पड़ोस के दुश्मन माने जाने वाले देश को बेचने की गद्दारी करने वाला मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़ा हुआ था। 
सत्ता का मिजाज ही ऐसा होता है कि वह अपने बीच के मुजरिमों का हौसला बढ़ाती है। ऐसे में पार्टियों को, उनसे जुड़े हुए धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठनों को यह सोचना चाहिए कि अगर वे सचमुच अपने संगठन की किसी भी इज्जत की परवाह करते हैं, तो उन्हें कैसा बर्ताव करना चाहिए, अपने लोगों के कैसे बर्ताव पर काबू करना चाहिए। आज अगर मध्यप्रदेश में इस ताजा भांडाफोड़ के बाद भी भाजपा, आरएसएस, और बजरंग दल के मुंह बंद हैं, तो यह चुप्पी इन संगठनों के भीतर के बाकी मुजरिमों का हौसला बढ़ाने वाली है। दिक्कत यह है कि दूसरे राजनीतिक दलों के पास अपने कुछ और मुजरिम हैं, जो उनके पसंदीदा, चहेते, और इस्तेमाल के हैं। इसलिए मौका पडऩे पर लोग दूसरी पार्टी के मुजरिमों का नाम लेकर तो तोहमत लगा लेते हैं, लेकिन अपने मुजरिमों की बात आने पर चुप्पी साध लेते हैं। ऐसे में मीडिया अकेला ऐसा रह जाता है जो संगठनों से जवाब मांगता है। जनता के बीच के संगठनों को भी गैरराजनीतिक रूप से, राजनीतिक-निष्पक्षता निभाते हुए ऐसे हर मामले पर सवाल उठाने चाहिए, और पूछना चाहिए कि उनके संगठन के ऐसे मुजरिमों के बारे में उनका क्या कहना है। दूसरी बात यह कि सार्वजनिक जीवन में गाडिय़ों पर झंडे-डंडे और नारे लगाकर चलने का सिलसिला खत्म करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में अब रोजाना यह दिखता है कि सत्तारूढ़ पार्टी बदली तो गाडिय़ों की नंबर प्लेट पर भाजपा पदाधिकारियों के नाम दिखना कम हो गए, और आज की सत्तारूढ़ पार्टी के हजारों लोगों की तख्तियां नंबर प्लेट की जगह लग गई। ऐसी बददिमागी से सड़कों पर पुलिस पर एक निहायत अनैतिक दबाव पड़ता है, और यह सिलसिला कड़ाई से खत्म करना चाहिए। मजे की बात यह है कि जब चुनाव आचार संहिता लागू होती है, तब चुनाव आयोग के डंडे से डरा-सहमा पुलिस-प्रशासन ऐसी नंबर प्लेट पर कार्रवाई करता है, लेकिन चुनाव निकलते ही मानो देश से कानून खत्म हो जाता है। मध्यप्रदेश के इस ताजा दोहरा अपहरण-हत्याकांड में यह बात सामने आई है कि इस हत्यारे पर कोई धरपकड़ इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि अपहरण के बाद वह भाजपा के झंडे-डंडे वाली, मोदी की तस्वीर वाली गाड़ी चला रहा था। कम से कम ऐसी हत्याओं के बाद तो पुलिस को अपना तौर-तरीका सुधारना चाहिए, और सरकार को सार्वजनिक जीवन से अराजकता खत्म करनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 24 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 24 फरवरी

भारत-पाक टकराहट में किसी बड़ी कार्रवाई का वक्त अब नहीं

संपादकीय
24 फऱवरी 2019



ताजा आतंकी हमले में दर्जनों सीआरपीएफ जवानों की शहादत के बाद कश्मीर को लेकर हलचल बहुत तेज हो गई है। देश की जनता में एक मुखर तबका गिनती में छोटा है, लेकिन उसकी जंग की हसरतें बड़ी हैं, वह सरहद से दूर बसा है, और जिसे कश्मीर और पाकिस्तान दोनों ही मुस्लिम इलाके दिखते हैं, और इस नाते नफरत के लायक लगते हैं। ऐसा तबका लगातार जंग की फरमाईश कर रहा है, और कल अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जाने किस बुनियाद पर, जाने किस मकसद से यह बयान दिया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच हालात बहुत खराब हैं, और भारत कोई बहुत ही खतरनाक कार्रवाई करने जा रहा है। भारत के कुछ जंगखोर और नफरतजीवी टीवी-समाचार चैनलों से परे किसी गंभीर अखबार में ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है कि भारत कोई बड़ी कार्रवाई करने जा रहा है, यह हिन्दुस्तान के सबसे घटिया चैनलों और अमरीकी राष्ट्रपति की ही खबर दिख रही है। ऐसे में केन्द्र सरकार के मातहत काम करते हुए कश्मीर की राज्यपाल सरकार ने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की हिफाजत खत्म कर दी है, और पुलिस या सुरक्षा कर्मचारियों को हटा दिया है। एक अलगाववादी नेता को गिरफ्तार भी किया है, और कश्मीर मानो किसी तूफान के पहले के सन्नाटे को झेल रहा है। 

आज भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात की आखिरी किस्त रेडियो-टीवी पर बोली है, और कहा है कि अगली किस्त चुनाव के बाद आएगी। जाहिर है कि अगले दस दिनों में आम चुनाव की घोषणा की उम्मीद की जा रही है, और संसद का आखिरी सत्र निपट चुका है। ऐसे में पाकिस्तान के साथ किसी भी मोर्चे पर किसी दीर्घकालीन नीति या रणनीति की न तो कोई गुंजाइश है, और न ही मौजूदा मोदी सरकार का ऐसा करना ठीक ही दिखेगा। लेकिन सवाल यह है कि सीआरपीएफ जवानों पर ऐसा बड़ा हमला होने के कुछ घंटों के भीतर पाकिस्तान का हाथ होने की बात तो भारत सरकार ने कर दी, लेकिन दस दिन हो जाने पर भी कोई ऐसी कार्रवाई नहीं दिखी है जिसके फतवे नरेन्द्र मोदी विपक्ष में रहते हुए भी देते आए हैं, और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनकी पार्टी, पार्टी के सहयोगी संगठन लगातार देते हैं। 

अब चुनाव की घोषणा के पहले के इस आखिरी पखवाड़े में क्या सरकार कोई बड़ी फौजी कार्रवाई कर सकती है, क्या वह पाकिस्तान के साथ किसी तरह की बातचीत का सिलसिला शुरू कर सकती है, या फिर इन दोनों ही बातों का वक्त अब निकल गया है? यह सवाल थोड़ा सा मुश्किल है, और उलझा भी रहा है। चुनाव के ठीक पहले किसी भी सरकार के लिए यह चुनावी नफे की बात भी होती है, और अपनी साख को कायम रखने के लिए भी शायद ऐसा जरूरी लगता है कि सरकार आतंकी हमले के जवाब में किसी तरह का हमला करे, या कि कोई कार्रवाई करे। यह भी है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से लेकर पाकिस्तानी मंत्री तक ने इस हमले के बाद अपना हाथ न होने की बात कहते हुए मोदी के खिलाफ काफी कुछ कहा है, या किसी हमले का जमकर जवाब देने की बात कही है। चुनाव के ठीक पहले इतनी गर्मागर्म बातों के बावजूद ऐसा सन्नाटा थोड़ा अजीब लग रहा है, और ऐसा लग रहा है कि मानो फिल्म शोले के ए.के. हंगल आकर पूछ रहे हैं कि इतना सन्नाटा क्यों है भाई? 

हम सरहद पर किसी लड़ाई के हिमायती नहीं हैं, और हमारा यह मानना है कि हर हाल में बातचीत की गुंजाइश कायम रखनी ही चाहिए क्योंकि दुनिया की तमाम टकराहट का इलाज बातचीत से ही निकल सकता है। अब बातचीत का माहौल कैसे बने, यह अंतरराष्ट्रीय कोशिश किसी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहती है, बजाय सरहद पर छोटी-मोटी लड़ाई छेडऩे के। अमरीका सरीखे जंग के सौदागर हर हाल में यह चाहते हैं कि दुनिया में कहीं न कहीं जंग चलती रहे, गृहयुद्ध चलते रहें, आतंकी हमले चलते रहें ताकि फौजी सामानों के कारखाने चलते रहें, और अमरीका को दखल का मौका मिल सके। शायद इसी हसरत से अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत की किसी संभावित बहुत खतरनाक कार्रवाई का जिक्र खुद होकर किया है, जैसी किसी कार्रवाई की हिन्दुस्तान में भी कोई चर्चा नहीं है। चूंकि मोदी सरकार का कार्यकाल अब हफ्तों में बाकी है, इसलिए उसे ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जो कि अगले पांच बरस की सरकार पर भारी पड़े। अब वक्त अपनी हिफाजत को बढ़ाकर बिना किसी अगले हादसे के चुनाव में जाने का है, और इस बीच भारत सरकार को पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान के खिलाफ अपने पास के सुबूतों को पेश करके उनका समर्थन जुटाने की कोशिश करनी चाहिए। सरकार को अपने आखिरी कुछ हफ्तों में अगले कई बरसों का टकराव छोड़कर नहीं जाना चाहिए। यह सलाह सरहद के दोनों तरफ के युद्धोन्मादी जंगखोरों को नहीं सुहाएगी, लेकिन दोनों देशों की बेहतरी इसी में है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भी बातचीत की पेशकश दुहराई है, लेकिन इस ताजा हमले के साथ बातचीत की गुंजाइश घट गई है, और इसके लिए हिन्दुस्तान में अगली सरकार के आने की राह देखनी होगी।  


(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 23 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 23 फरवरी

कानून इतना अंधा भी न हो  कि वह इंसाफ देख न सके
संपादकीय ''दैनिक छत्तीसगढ़'' 23 फऱवरी : 2019


जंगलों से आदिवासियों और वहां बसे वनवासियों को निकालने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हिन्दुस्तान पूरी तरह विभाजित होने जा रहा है। जंगल की जमीन पर हजारों बरस से बसे हुए लोगों को हटाने का यह आदेश इस देश को शहरी, और वनवासी हिन्दुस्तान, ऐसे दो तबकों में बांट रहा है। अब यह बात खुलकर जाहिर हो रही है कि सुप्रीम कोर्ट में देश के सबसे पुराने, आदिवासी-वनवासी बाशिंदों को लेकर समझ की कमी है, और यही हाल केन्द्र और राज्य सरकारों का है जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चल रहे इस मामले में इन तबकों के हितों का ध्यान नहीं रखा, और अदालत से एक ऐसा कड़ा आदेश आ गया है जिससे देश के दस-बीस लाख आदिवासी-वनवासी परिवार बेदखल किए जा सकते हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में वन्य प्राणियों के लिए दायर की गई एक जनहित याचिका को लेकर चल रहा था जिसमें इस संगठन ने वन अधिकार अधिनियम की वैधता को चुनौती दी थी। आज इस अधिनियम के तहत देश में एक वक्त के पहले से बसे हुए आदिवासियों को वहां पर जमीनों का पट्टा देने का प्रावधान है, और इस प्रावधान को चुनौती दी गई थी।
देश के आदिवासी इलाकों वाले प्रदेशों में लंबे समय से यह टकराव चले ही आ रहा है कि जंगल की जमीन पर बसे हुए लोगों को वहां पर पट्टे दिए जाएं, या नहीं। सरकार का पूरा अमला इसके सख्त खिलाफ रहता है, और एक आम सरकारी तर्क यह है कि आदिवासी खेती करने के लिए जंगलों को काट लेते हैं, वहां पर पेड़ों की जगह खेत बना लेते हैं, और फिर उस जमीन पर पट्टे की मांग करते हैं। सरकारी तर्क यह रहते आया है कि आदिवासियों की वजह से जंगल घट रहे हैं, खत्म हो रहे हैं, और जंगली जानवरों पर भी खतरा है। दूसरी तरफ आदिवासियों की वकालत करने वाले समूहों का यह कहना है कि देश में आज जितने भी जंगल बचे हुए हैं, वे आदिवासियों की वजह से बचे हैं, उनका तर्क यह है कि जंगल और आदिवासी, या दूसरे शब्दों में कहें तो वन और वनवासी एक-दूसरे के लिए बने हैं, और सहअस्तित्व उनकी जिंदगी की सोच है। वे हजारों बरस से इन्हीं पेड़ों के बीच रहते आए हैं, और इन पेड़ों से उनसे अधिक और कोई मोहब्बत नहीं कर सकते।
यह बात बहुत साफ है कि जहां खदानें हैं, उनमें से बहुत से इलाकों पर जंगल हैं। और जहां जंगल हैं, उनके बीच आदिवासी बसाहटें हैं। ऐसे में कारखानेदार, खदान मालिक, और लकड़ी के कारोबारियों की आंखों में आदिवासी जाहिर तौर पर किरकिरी की तरह खटकते रहते हैं। इनको जंगल से बेदखल करने का सिलसिला अंग्रेजों के वक्त से शुरू हुआ, और अवतार नाम की हॉलीवुड फिल्म में वह दूसरे ग्रहों पर जाकर भी जारी रहा। आदिवासियों के अधिकार महज हिन्दुस्तान में ही नहीं छीने गए, बल्कि अमरीका जैसे देश में वहां के मूल निवासियों से परे की सारी की सारी गोरी और काली आबादी बाहर से आई हुई है, और वहां आज भी मूल निवासियों के हक और मुद्दों की लड़ाई चलती ही रहती है। यह लड़ाई लैटिन अमरीकी देशों में भी चलती है जहां पर आदिवासियों को बेदखल किए बिना बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कई कारोबार आगे ही नहीं बढ़ सकते, ठीक उसी तरह जैसे कि ओडिशा में आदिवासियों को बेदखल किए बिना वेदांत का पहला कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता।
जो लोग देश से दस-बीस लाख आदिवासी-वनवासी परिवारों की बेदखली के खतरे को नहीं समझ रहे हैं, उनको हाल का सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला याद रखना चाहिए। अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए बनाए गए एसटी-एससी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट ने जो फेरबदल किया था, उस पर जो बवाल हुआ था, उसे देखते हुए संसद में कानून बदलकर उस प्रावधान को वापिस लागू करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट का बेदखली का यह आदेश एक शहरी सोच का संवेदनाशून्य आदेश है, जो कि जानवरों के हक को इंसानों के हक के ऊपर समझ रहा है, और यह एक ऐसा फैसला होने जा रहा है जो कि सरकारी अफसरों की साजिश के चलते अदालत में कमजोर तर्कों की वजह से आई हुई नौबत रहेगा। यह मामला इस देश के भीतर सरकारों को पलटने की ताकत भी रखेगा, और इस फैसले को लागू करना मुमकिन भी नहीं होगा। बहुत से जानकार लोगों का यह कहना है कि शहरी कानून की कम समझ रखने वाले, लेकिन जंगल पर सबसे अधिक हक रखने वाले आदिवासी-वनवासी तबकों को इंसान न मानने वाली यह सरकारी-अदालती सोच इस देश में एक नई हथियारबंद लड़ाई शुरू कर सकती है। कानून को इतना अंधा भी नहीं होना चाहिए कि वह इंसाफ को देख न सके।

दीवारों पर लिक्खा है, 22 फरवरी

तथागत रॉय पर राष्ट्रपति जिम्मेदारी से मुंह चुरा रहे

संपादकीय
22 फऱवरी 2019



मेघालय के राज्यपाल तथागत रॉय सोशल मीडिया पर लगातार घोर साम्प्रदायिक, भड़काऊ, और हिंसक बातें लिखते रहते हैं। लेकिन उनकी ताजा बात देश में हिंसा भड़काने की एक बड़ी वजह बन सकती है जिसमें भारतीय सेना के एक रिटायर्ड अफसर की अपील से अपनी सहमति जताते हुए उसे री-ट्वीट किया है जिसमें कहा गया है कि कश्मीर न जाएं, दो बरस अमरनाथ भी न जाएं, कश्मीर एम्पोरियम से कोई सामान न खरीदें, कश्मीरी फेरीवालों से कोई सामान न खरीदें, और हर कश्मीरी चीज का बहिष्कार करें। 
तथागत रॉय राज्यपाल के संवैधानिक पद पर हैं, और संविधान की शपथ लेकर ऐशोआराम के इस ओहदे पर काबिज हैं, और इस संवैधानिक दर्जे की वजह से उन पर कोई मुकदमा भी नहीं चलाया जा सकता है। लेकिन आज जब देश में जगह-जगह कश्मीरी छात्रों पर, कश्मीरी कारोबारियों पर, फेरीवालों पर हमले हो रहे हैं, तब भाजपा का यह नेता और राज्यपाल ऐसी हिंसक बात कहकर भी कुर्सी पर बना हुआ है। इसे लेकर देश में बहुत से लोग यह बात उठा रहे हैं कि राज्यपाल की ऐसी असंवैधानिक बात को लेकर राष्ट्रपति कब उन पर कार्रवाई करेंगे? संविधान के मुताबिक राज्यपाल राष्ट्रपति की मर्जी से नियुक्त होते हैं, और वे कब तक के लिए ही नियुक्त रहते हैं, जब तक राज्यपाल की मर्जी हो। लेकिन देश के बहुत से भाजपा-एनडीए विरोधी लोगों द्वारा की जा रही आलोचना के बीच आज एनडीए में भाजपा के एक सबसे पुराने साथी अकाली दल ने राज्यपाल से मांग की है कि वे तथागत रॉय के कश्मीर बहिष्कार की ट्वीट पर तुरंत कार्रवाई करें। इस पार्टी के सांसद और वरिष्ठ नेता नरेश गुजराल ने कहा है कि 1980 के दशक में सिक्ख समुदाय को पंजाब के आतंक की वजह से जिस तरह अलग-थलग किया गया था, उसका दुहराव आज कश्मीरियों के साथ नहीं होना चाहिए। गुजराल ने कहा कि कश्मीरी समुदाय के कुछ लोग आतंक में शामिल हो सकते हैं, और सरकार को उन पर कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरे कश्मीरी समुदाय का ही बहिष्कार कर दिया जाए। गुजराल का कहना है कि यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि तथागत रॉय जैसे लोग राज्यपाल बनाए गए हैं, ऐसे लोग हमारे धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक धब्बा हैं। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच अघोषित युद्ध पंजाब में शुरू किया गया था, और यह डेढ़ दशक चलते रहा, जिसमें 40 हजार से अधिक बेकसूर जिंदगियां खत्म हुईं, लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान तब हुआ जब पूरे सिक्ख समुदाय को शक की नजर से देखा गया, और 1984 के दंगों में उन्हें मारा गया। नरेश गुजराल ने राष्ट्रपति से कहा है कि तथागत रॉय की हिंसक बातों को देखकर तुरंत उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। 
हम इस सिलसिले में जो कहना चाहते हैं, वह तकरीबन पूरे का पूरा उस एनडीए के एक सबसे पुराने और खांटी भागीदार अकाली दल ने कह दिया है इसलिए हम उन्हीं तर्कों को यहां दुहराना नहीं चाहते। लेकिन अगर राष्ट्रपति देश के ऐसे माहौल में न लोगों से खुद कोई अपील कर रहे हैं, न एक राज्यपाल द्वारा फैलाई जा रही भड़काऊ हिंसा पर कोई कार्रवाई कर रहे हैं, तो ऐसी चुप्पी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होने जा रही है। यह बात कोई दबी-छुपी नहीं है, और न ही चर्चा के लिए नाजायज है कि राष्ट्रपति देश के उस दलित समुदाय से आए हैं जो कि एक समुदाय के रूप में सैकड़ों बरस से हिन्दुस्तान में ऐसी ही हिंसा झेल रहा है, बहिष्कार झेल रहा है, सामाजिक छुआछूत झेल रहा है। एक दलित के रूप में उनकी समझ सामाजिक बहिष्कार की तकलीफ को समझने वाली होनी चाहिए, फिर चाहे वह एक दलित का बहिष्कार हो, किसी मुस्लिम का बहिष्कार हो, या किसी प्रदेश के व्यक्ति का बहिष्कार हो। राष्ट्रपति उस उत्तरप्रदेश के हैं जिसने मुम्बई में लंबे अरसे से शिवसेना के फतवों में बहिष्कार झेला है, और हिंसा झेली है। यह तमाम तजुर्बा राष्ट्रपति को देश में आज कश्मीरियों पर खतरा, और उन्हें हिफाजत देने की समझ देने वाला होना चाहिए। तथागत रॉय की साम्प्रदायिक और हिंसक बातों से केन्द्र की मोदी सरकार को कभी कोई परहेज नहीं रहा, और इसीलिए मेघालय के राजभवन से निकला नफरत का लावा सोशल मीडिया के रास्ते देश भर में फैलते रहता है। लेकिन  अब पानी सिर के ऊपर निकल गया है, और अब भी अगर राष्ट्रपति चुप रहते हैं तो उसका यही मतलब होगा कि सत्ता और सुख पाने के बाद उनके भीतर का तमाम दलित-तजुर्बा भुलाया जा चुका है, और वे अपनी आज की संवैधानिक जिम्मेदारी से मुंह चुरा रहे हैं।


(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 21 फरवरी

बात की बात, 21 फरवरी

काँव-काँव, 21 फरवरी

पिक्सटून, 21 फरवरी

संपादकीय दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 फरवरी : शराब से कमाना और नशे से गंवाना, बारीकी से देखा जाए

संपादकीय
21 फऱवरी 2019

छत्तीसगढ़ में दूसरे कई राज्यों के मुकाबले शराब एक अधिक बड़ा मुद्दा रहा है। गुजरात में तो परंपरागत रूप से गांधी का प्रदेश होने के नाते शराबबंदी रहते आई है, और इस पश्चिमी राज्य के ठीक दूसरी तरफ उत्तर-पूर्व में मिजोरम में शराबबंदी चर्च के असर से चली आ रही है, और वहां यंग मिजो एसोसिएशन नाम का नौजवान संगठन बाहुबल का इस्तेमाल करके शराब या किसी भी दूसरे नशे के खिलाफ राज्य में अपना कानून चलाता है, और उसे चर्च का पूरा सहयोग रहता है, और सरकार भी घोषित रूप से उसकी हिंसा को अनदेखा करती है कि नशाबंदी लोगों के हित में है। लेकिन अभी भारत सरकार के जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ प्रति व्यक्ति आय में जिन विकसित प्रदेशों से बहुत पीछे है, शराबखोरी में प्रति व्यक्ति खपत और खर्च में उन विकसित राज्यों से बहुत आगे है। और यह नौबत तब है जब इस राज्य में शराब बिक्री को घटाने का दावा करने वाली पिछली भाजपा सरकार, और अपने इस नए कार्यकाल में शराबबंदी करने का वायदा करने वाली कांग्रेस सरकार ने पूरी शराब खरीदी और बिक्री का कारोबार अपने हाथ में रखा है। यह धंधा पूरी तरह सरकार चला रही है, पिछले बरसों में छोटे गांवों से दुकानें कम करने के फैसले लगातार होते रहे, लेकिन खपत और खर्च दोनों में जनता आगे है। दूसरी तरफ अखबार रोजना ऐसी खबरों से भरे रहते हैं कि नशे की लत की वजह से परिवार में कैसी हिंसा हुई, किसने हत्या की, किसने आत्महत्या की। 

अब सवाल यह है कि पूरी तरह सरकारी काबू वाले कारोबार के चलते हुए जब दुकानों के सामने खरीददारों की भीड़ में मारपीट की नौबत रोज की बात है, तब शराब इतनी बिक रही है जितनी कि विकसित महाराष्ट्र में भी नहीं बिकती। महाराष्ट्र में हर कुछ दूरी पर शराब दुकानें हैं, शराबखाने हैं, और वहां सरकार ने इस कारोबार पर ऐसी कोई मजबूत पकड़ भी नहीं रखी है। ऐसे में लगता है कि छत्तीसगढ़ में जनता के हाथ में आने वाले पैसे बेदर्दी से खर्च हो रहे हैं, बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और पिता नशे में धुत्त हैं। यह एक बड़ी सामाजिक चुनौती है जिसे सरकारी फैसलों से रातोंरात बदला नहीं जा सकता। नशाबंदी सुनने में एक बड़ा आकर्षक नारा लगता है, लेकिन आज पंजाब जिस नशे में डूब गया है, वह शराब नहीं है, बल्कि दूसरे किस्म का अंतरराष्ट्रीय बाजार से आने-जाने वाला नशा है जिसने पीढ़ी-दर-पीढ़ी बर्बाद कर दी है। छत्तीसगढ़ सरकार नशाबंदी करके हजारों करोड़ की कमाई भी खो सकती है, और नशे के आदी अपने लोगों को किसी दूसरे अधिक खतरनाक नशे के हाथों भी खो सकती है। ऐसे में किसी जनकल्याणकारी सरकार के लिए फैसला आसान नहीं हो सकता। 
नशे को लेकर जागरूकता समाज के भीतर तेजी से बढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि जिन देशों में, जिन प्रदेशों में शराब छत्तीसगढ़ के मुकाबले अधिक आसानी से मिलती है, यहां के मुकाबले सस्ती भी है, वहां भी लोग शराब इतनी नहीं पीते हैं, जितनी कि यहां पीते हैं। इसलिए इसे जनता को मिलने वाले सस्ते चावल की वजह से बचे पैसों से पीना भी कहा जाता है, धान के दाम की गारंटी से भी कुछ लोग शराब की खपत को जोड़ते हैं, और अब किसान कर्जमाफी से भी कुछ लोग शराब की बढ़ती खपत को जोड़ेंगे। छत्तीसगढ़ में शराब से होने वाले आर्थिक-सामाजिक नुकसान की कीमत सरकार की कमाई के मुकाबले कई गुना अधिक है। लाखों परिवार तबाह हो रहे हैं, और दसियों हजार करोड़ की उत्पादकता खत्म होती है। दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां पर लोग अधिक समझदारी के साथ दारू पीते हैं, लेकिन जहां लोग नशा करने में अधिक गैरजिम्मेदार हो जाते हैं, वहां नशे से मजा नहीं मिलता, बल्कि सजा मिलती है, छत्तीसगढ़ ऐसा ही एक राज्य होते जा रहा है, हो चुका है। 
भारत जैसे लोकतंत्र में किसी सरकार की आर्थिक योजनाएं अधिक आसान होती हैं, और सामाजिक योजनाएं मुश्किल। सामाजिक फेरबदल लाना एक अधिक बड़ी चुनौती रहती है। छत्तीसगढ़ में लोगों को नशे से बचाने के लिए बड़ी कड़ी मेहनत करने की जरूरत है। कर्जमाफी जैसे खर्चीले फैसले करने की वजह से सरकार आज कमाई का एक मोटा जरिया तुरंत छोडऩा भी नहीं चाहेगी, और नई कांग्रेस सरकार का यह भी मानना है कि रातोंरात नशाबंदी करके प्रदेश को नोटबंदी जैसे नुकसान में नहीं डाला जा सकता। देश में नशे के ताजा आंकड़ों को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी शराब कारोबार, और नशामुक्ति अभियान की नीतियों को बारीकी से देखने की जरूरत भी है। 

आत्मा किस रेट पर बेचने के लिए एक पैर पर खड़े हैं

संपादकीय
20 फऱवरी 2019



देश में स्टिंग ऑपरेशनों के जरिए भांडाफोड़ पत्रकारिता के लिए विख्यात कोबरापोस्ट  ने बॉलीवुड के अभिनेताओं, गायकों, और हास्य कलाकारों के स्टिंग किए हैं जिनमें वे मोटे भुगतान के एवज में अपने सोशल मीडिया पेज से किसी भी राजनीतिक दल या नेता के समर्थन की पोस्ट करने के लिए एक बेताबी के साथ तैयार हो जाते हैं। कोबरापोस्ट की साख अब तक इस मामले में अच्छी है, और भुगतान लेकर साम्प्रदायिकता भड़काने, मुस्लिमों के खिलाफ जहर फैलाने के एक फर्जी प्रस्ताव पर कोबरापोस्ट ने देश के बड़े-बड़े मीडिया घरानों को भी कैमरों में कैद किया था, उस बात को कुछ ही महीने हुए हैं। स्टिंग ऑपरेशनों की इस बात को आज के छत्तीसगढ़ से जोड़कर देखा जाए तो यह समझ आता है कि इसकी चोट कितनी गंभीर हो सकती है, और पत्रकारिता का यह तरीका कितना जायज है, या कितना नाजायज है। 
छत्तीसगढ़ में अभी हुए विधानसभा चुनावों के ठीक पहले कुछ ऐसे स्टिंग ऑपरेशन सामने आए थे जिनमें सरकारी अफसर और नेता पत्रकारों और नेताओं के स्टिंग ऑपरेशन के लिए मोटा भुगतान करते दिख रहे थे, या उनकी बातें रिकॉर्ड थीं। छत्तीसगढ़ की नई सरकार ने जिन पुराने मामलों की जांच शुरू की है, उनमें अभी इस मामले की बारी नहीं आई है, लेकिन वह स्टिंग ऑपरेशन करने वाले पत्रकार का यह कहना है कि उन्होंने सरकार की नीयत का भांडाफोड़ करने के लिए पत्रकारों की सेक्स-सीडी बनाने का एक फर्जी प्रस्ताव सामने रखा था, और सरकार ने उसे लपक लिया था। यह तर्क इन दिनों खबरों में बने हुए एक दूसरे टेपकांड में भी दिया गया है जिसमें अंतागढ़ के कांग्रेस उम्मीदवार की खरीदी-बिक्री की टेलीफोन कॉल रिकॉर्डिंग करने वाले स्टिंग ऑपरेटर का कहना है कि वह लोकतंत्र में उम्मीदवार खरीदने का अपराध करने वाले लोगों का भांडाफोड़ करना चाहता था, इसलिए उसने फोन की ये तमाम बातें रिकॉर्ड की थीं। 
पत्रकारिता के पुराने तौर-तरीकों का इस्तेमाल करने वाले लोगों को यह लगता है कि खुफिया कैमरे और माइक्रोफोन से रिकॉर्ड करना, या टेलीफोन कॉल को रिकॉर्ड करना एक नाजायज बात है, और ऐसा नहीं करना चाहिए। लेकिन नए तौर-तरीके वाले लोगों का यह मानना है कि दुष्ट से निपटना हो, तो दुष्टता के कुछ औजारों का इस्तेमाल नाजायज नहीं रह जाता और अगर वैसा न किया जाए तो दुष्टों का कभी भांडाफोड़ ही न हो। यह बात कुछ हद तक सही इसलिए है कि इस देश में जब तक लोग कैमरे या माइक्रोफोन पर, टेलीफोन या वीडियो कैमरों पर सुबूत के दर्जे की रिकॉर्डिंग में नहीं फंस जाते, वे हर आरोप को झूठा बताते रहते हैं, और उनके चेहरों पर शिकन भी नहीं आती। इसलिए ऐसी तकनीक का इस्तेमाल तो जायज है। लेकिन इसके बावजूद एक बात यह रह जाती है कि क्या झूठा लालच देकर लोगों की टपकती लार को कैमरों पर दर्ज करना क्या किसी अपराध को दर्ज करने जैसा हो सकता है? इससे उनकी अनैतिक नीयत तो दर्ज हो जाती है, लेकिन कोई अपराध दर्ज नहीं होता। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में जिस तरह अंतागढ़ टेप की रिकॉर्डिंग हुई है, उम्मीदवार खरीद-बिक्री की वह रिकॉर्डिंग किसी लालच में नहीं हुई है, वह एक असल सौदे की रिकॉर्डिंग है, जिसे करने के लिए कोई झांसा नहीं दिया गया, और वह असल सौदा उम्मीदवार की खरीद-बिक्री का असल सौदा था, किसी स्टिंग ऑपरेटर का दिया गया लालच नहीं। इसलिए आज के हालात देखते हुए ऐसा लगता है कि अगर किसी जुर्म को साबित करने के लिए, या किसी अनैतिक नीयत को साबित करने के लिए देश का कोई कानून तोड़े बिना स्टिंग ऑपरेशन किया जाता है, फोन रिकॉर्ड किया जाता है, तो वह मंजूर करने लायक अनैतिक काम है जो कि अखबारनवीसी के पुराने पैमानों पर तो खरा नहीं उतरता, लेकिन आज के पैमानों पर खरा उतरता है। लेकिन यह बात किसी को नहीं भूलनी चाहिए कि तकनीक एक दुधारी तलवार होती है, और कई ऐसे मौके सामने आए हैं जिनमें स्टिंग ऑपरेटर खुद भी स्टिंग का शिकार हो गए हैं। फिलहाल कोबरापोस्ट के ताजा स्टिंग को देखकर लोग मजे लें कि उनके लोकप्रिय फिल्मी सितारे अपनी आत्मा किस रेट पर बेचने के लिए एक पैर पर खड़े हैं। 

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दीवारों पर लिक्खा है, 20 फरवरी

कार में ग्यारह करोड़ के नोट! नोटबंदी का असर क्या हुआ?

संपादकीय
19 फऱवरी 2019



छत्तीसगढ़ में आज सुबह ओडिशा से यूपी जा रही एक कार की तलाशी ली गई तो उसमें सीट के भीतर बनाई गई तिजोरी से करीब ग्यारह करोड़ रुपये के दो हजार-पांच सौ के प्रचलित नोट बरामद हुए। आम तौर पर इस रास्ते में इसी अंदाज में गांजा पकड़ाता है लेकिन अभी मजदूरों की तरह के गरीब ड्राइवर और एक महिला सहित दूसरे लोग इस कार में पकड़ाए और पुलिस ने सारे नोट जब्त कर लिए हैं। जिस अंदाज में आज बिना किसी चुनावी माहौल के इतनी बड़ी नगदी जा रही थी, वह हक्का-बक्का करने वाली है, और यह बात जाहिर है कि हजार में से किसी एक गाड़ी की ही ऐसी बारीकी से जांच हो पाती होगी। ऐसे में इतने नोट लेकर जाने कितनी गाडिय़ां आती-जाती होंगी।
अब इससे एक सवाल यह उठता है कि देश की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने के दावे का आखिर क्या हुआ? मोदी सरकार ने जब नोटबंदी की थी तो यह दावा किया गया था कि इससे देश में कालाधन खत्म हो जाएगा, आतंकियों की फंडिंग रूक जाएगी, कालाधन बैंकों तक नहीं पहुंच पाएगा, और लोग टैक्स देने लगेंगे। ऐसे कई दावे किए गए थे, लेकिन हकीकत यह है कि रिजर्व बैंक दो बरस बाद भी यह नहीं बता पा रहा है कि उसके छापे गए नोट तकरीबन पूरे के पूरे कैसे बैंकों में लौट आए, और एक आशंका यह भी है कि हड़बड़ी और आपाधापी में नकली नोट भी बैंकों में जमा हो गए होंगे। आतंक की किसी घटना में कोई कमी नहीं आई, बल्कि कश्मीर से आए हुए आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के बाद से अभी तक कश्मीर में जितने आतंकी हमले हुए हैं, उतने बीते कई दशकों में कभी नहीं हुए थे। 
नोटबंदी के साथ-साथ उसे कामयाब करने के लिए, या बताने के लिए बैंकों ने जितने किस्म के नियम लादे, लोगों का एटीएम से पैसा निकालना जितना मुश्किल और महंगा किया गया, उससे लोग आजतक उबर नहीं पाए हैं। इसके बाद जीएसटी से टैक्स चोरी रोकने और कालाधन घटाने, समानांतर अर्थव्यवस्था खत्म करने के जो दावे किए गए थे, वे तो अलग रहे, बाजार और मजदूर अब तक जीएसटी की मार से उबर नहीं पाए हैं। ऐसे माहौल में जब इतनी बड़ी-बड़ी नगद रकम मामूली पुलिस पकड़ रही है, तो सवाल यह उठता है कि केंद्र सरकार के सारे दावों का आखिर क्या हुआ? अगर चार मजदूर अनाज की बोरियों की तरह कार में ग्यारह करोड़ के नोट लेकर जा रहे हैं, तो देश में दो नंबर के पैसों और कारोबार का क्या हाल है!
छत्तीसगढ़ में अभी तीन दिन पहले ही जीएसटी अफसरों ने दो ऐसे कारोबारियों को पकड़ा है जो सैकड़ों-हजारों करोड़ के फर्जी सौदे फर्जी कंपनियों के नाम दिखाकर जीएसटी की चोरी कर रहे थे। अगर जीएसटी लागू होने के इतने समय बाद भी उसके जाल में ऐसे बड़े-बड़े छेद बने हुए हैं, तो उसकी कामयाबी पर सवाल उठना जायज है। फिलहाल केंद्र सरकार को मालूम हो, या न मालूम हो, नोटबंदी के बाद भी पूरे देश में हवाला कारोबार उसी धड़ल्ले से जारी है जिस तरह नोटबंदी के पहले चलता था, और आतंकी संगठन उसी तरह चल रहे हैं, जिस तरह नोटबंदी के पहले चलते थे। इसलिए नोटबंदी से दूसरे कोई फायदे हुए हों तो वह अलग हैं। लेकिन जिस घोषित मकसद से नोटबंदी लागू की गई थी, वह मकसद किसी किनारे नहीं पहुंच पाया।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 19 फरवरी

बात की बात, 18 फरवरी

बात की बात, 18 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 18 फरवरी

कश्मीर पर दावा, और कश्मीरियों से नफरत साथ नहीं चल सकते...

संपादकीय
18 फऱवरी 2019



कश्मीर के आतंकी हमले के बाद देश में कुछ ऐसे तनाव का माहौल बना हुआ है कि जैसे कश्मीर के हर इंसान सीआरपीएफ पर हमले में शामिल रहे हों। कश्मीर के मुस्लिम लोगों से एक नफरत बहुत से लोग इसलिए करते हैं कि वे मुस्लिम हैं। बहुत से लोग कश्मीरियों से इसलिए नफरत करते हैं कि वे जनमत संग्रह के एक ऐतिहासिक वायदे की याद दिलाते हैं, और उस पर भरोसा रखते हैं कि कश्मीर को लेकर यह तय करना उनका हक है कि वे हिन्दुस्तान के साथ रहें, पाकिस्तान के साथ रहें, या कश्मीर को एक आजाद मुल्क बनाएं। इस ऐतिहासिक दस्तावेज की अनदेखी करके कश्मीर पर अपना दावा करने वाले बाकी हिन्दुस्तानी कश्मीरियों पर कोई दावा नहीं करते। वे कश्मीर को जमीन के एक टुकड़े की तरह चाहते हैं, वहां के इंसानों के बिना। और इसीलिए पिछले चार दिनों से हवा में ये फतवे भी तैर रहे हैं कि कश्मीर में फौज को भेजकर सबको निपटा दिया जाए। जो लोग जंग और एक नस्ल के खात्मे की ऐसी बातें कर रहे हैं, वे इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि पिछले तकरीबन पांच बरस से भाजपा कश्मीर की सरकार में भागीदार रही, या फिर राज्यपाल के शासन में वह दिल्ली से कश्मीर पर राज कर ही रही है। इसके बावजूद अगर वहां हिंसा आसमान पर पहुंच रही है, मोदी सरकार आने के पहले के बरसों के मुकाबले बाद के बरसों में कई गुना बढ़ गई है, तो इसके पीछे की ठोस वजहों को देखने की जरूरत है। 
पिछले पांच बरस का हिन्दुस्तान देखें तो किसी न किसी बहाने देश के बहुत से प्रदेशों में कश्मीरी छात्रों को स्थानीय गैर-मुस्लिम हिंसा का सामना करना पड़ा, और उन्हें कश्मीर वापिस भेजने के फतवे पिछले चार दिनों में जिस तरह लाठियों के साथ भीड़ की हिंसा के साथ कई प्रदेशों में गूंजे हैं वे देखते ही बनते हैं। फिर सड़कों की हिंसा से परे सोशल मीडिया पर कश्मीरियों के खिलाफ जो आग उगली जा रही हैं, वह भी कश्मीरियों का दिल तोडऩे वाली है। शायद यही सरहद पार के उन आतंकियों का मकसद भी है जो कि कश्मीरियों को गुस्से से भरना चाहते हैं, हिन्दुस्तान के खिलाफ नफरत से भरना चाहते हैं, और इसके बाद उनके हाथों हिंसा करवाना चाहते हैं। कश्मीर के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री, नौजवान उमर अब्दुल्ला ने कल ट्विटर पर ऐसी एक बात लिखी भी है कि देश भर में कश्मीरियों को पीटकर लोग आतंकियों के ही मंसूबे पूरे कर रहे हैं। और अब तक शायद केन्द्र सरकार के जिम्मेदार और जवाबदेह मंत्रियों की ओर से ऐसी हिंसा के खिलाफ कोई बात नहीं कही गई है, न ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से। जबकि प्रधानमंत्री ने सीआरपीएफ पर आतंकी हमले के बाद से लगातार बदले की बात कही है, हिसाब चुकता करने की बात कही है, सजा देने की बात कही है, सुरक्षा बलों को खुली छूट देने की बात कही है, लेकिन किन बेकसूरों के साथ कोई हिंसा नहीं की जानी चाहिए उस बारे में कुछ नहीं कहा है। सवाल यह उठता है कि जब देश ऐसी विशाल और जलती-सुलगती भावनाओं के सैलाब में घिरा हुआ है, डूबा हुआ है, तब कुछ बातों का न कहा जाना, कुछ और बातों को कहने से अधिक कहने वाला भी हो जाता है। इसलिए देश भर में बिखरी हुई बड़ी-बड़ी पार्टियां अगर कार्यकर्ताओं, समर्थकों, और सहयोगी संगठनों के विशाल ढांचे के बावजूद अमन का कोई फतवा नहीं देती हैं, तो फिर ऐसी चुप्पी को वे सारे समर्थक-संगठन मौन-सहमति का फतवा मान लेते हैं। 
जो लोग कश्मीर को एक जमीन की शक्ल में पाकिस्तानी सरहद पर हिन्दुस्तान की हिफाजत के लिए साथ रखना चाहते हैं, हिन्दुस्तान बनाए रखना चाहते हैं, उन्हें यह भी समझना होगा कि बिना कश्मीरी कोई कश्मीर नहीं हो सकता। और जिस अंदाज में फतवे जारी हो रहे हैं, गद्दारी की तोहमतें लग रही हैं, बेकसूरों को मारा और भगाया जा रहा है, उससे हिन्दुस्तान का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है। छत्तीसगढ़ की मिसाल दें तो जिस बस्तर में आदिवासियों के बीच नक्सली दशकों से हिंसा कर रहे हैं, और कश्मीर से भी बड़े हमले सीआरपीएफ पर करके एक अकेले हमले में पौन सौ लोगों को मार चुके हैं, क्या वहां के आदिवासियों को देश भर से मार-मारकर भगाया जा सकता है? क्या उन आदिवासियों में से हर किसी को नक्सलियों से मिला हुआ बताया जा सकता है? क्या उन्हें बस्तर के बाहर बाकी छत्तीसगढ़ से भी मारकर भगाया जा सकता है? क्या बस्तर में फौज भेजकर नक्सल-सफाए के नाम पर आदिवासी-सफाया किया जा सकता है? आज हिन्दुस्तान के आधा दर्जन राज्यों में नक्सल हिंसा है, और क्या इन तमाम राज्यों के ऐसे तमाम इलाकों में स्थानीय लोगों को खत्म किया जा सकता है? 
जो लोग आज देश भर में जगह-जगह कश्मीरियों को मारकर भगाने में लगे हैं, जो रात-दिन जागकर ओवरटाईम करके सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने में लगे हैं, उन तमाम लोगों को यह समझने की जरूरत है कि ज्वालामुखी से निकलकर बहते हुए लावे को रोकना मुमकिन नहीं होता। अगर किसी प्रदेश का होने की वजह से बाकी प्रदेशों से उनको मारकर भगाना है, तो फिर मुम्बई में शिवसेना और राज ठाकरे क्या गलत करते हैं? तो फिर कुछ उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिन्दीभाषियों पर हिंसा में क्या गलत है? जब कभी किसी बेकसूर पर तोहमत लगती है, और उस पर हमला होता है, तो उससे आगे चलकर एक मुजरिम के खड़े होने, एक आतंकी बनने, एक नक्सली बनने का खतरा भी खड़ा हो जाता है। इसलिए जिन्हें कश्मीर चाहिए, उन्हें यह भी चाहिए कि वे कश्मीरियों को खत्म करने की न सोचें। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

शहादत पर मुआवजा और राहत के राष्ट्रीय पैमाने बनें

संपादकीय
17 फऱवरी 2019



कश्मीर में सीआरपीएफ पर हुए हमले में चूंकि एक दर्जन अलग-अलग प्रदेशों से आए हुए जवानों की एक साथ शहादत हुई है, इसलिए इन तमाम जगहों से बड़े गमगीन माहौल में ताबूतों के पहुंचने और अंतिम संस्कार होने की दिल दहलाती तस्वीरें आ रही हैं। इसके साथ-साथ यह भी आ रहा है कि किस प्रदेश ने अपने प्रदेश के शहीद के परिवार के लिए कितनी मदद मंजूर की है। यह मदद 25 लाख रूपए से लेकर एक करोड़ रूपए तक अलग-अलग प्रदेशों में अब तक देखने में आई है। किसी किस्म की राहत या मुआवजे के ऐसे कई दूसरे मामलों पर भी हम पहले लिख चुके हैं कि देश में एक किस्म की रीति-नीति रहनी चाहिए। 
इसमें एक दिक्कत यह आती है कि किसी को राहत देना राज्य सरकार का अपना विशेषाधिकार रहता है। केन्द्र सरकार जिसे चाहे उसे मदद दे सकती है, और उससे परे राज्य सरकारें भी ऐसा कर सकती हैं, करती हैं। शहादत से परे भी कई बार कोई प्राकृतिक या मानवनिर्मित हादसा इतना बड़ा होता है कि उस पर केन्द्र या राज्य सरकारें, या दोनों ही, सहायता घोषित करती हैं, और देती हैं। लेकिन जब किसी एक आतंकी हमले में एक ही सुरक्षा बल के लोग एक साथ मारे जा रहे हैं, और अलग-अलग राज्य सरकारें अपने राज्य में अपनी क्षमता या अपनी नीति के मुताबिक अलग-अलग रकम की मदद कर रही हैं, तो यह फर्क खटकता है। उत्तरप्रदेश से गया हुआ जवान शहीद हो तो उसे एक करोड़, और झारखंड से गया हुआ शहीद हो तो उसे 25 लाख जैसा फर्क राज्यों का विशेषाधिकार तो है, लेकिन यह देखने-सुनने में भी अच्छा नहीं लगता है। इसलिए हमने इसी कॉलम में एक बार पहले भी यह सुझाया था कि सहायता, राहत, या मुआवजा की रकम को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक आम सहमति बननी चाहिए, ताकि इंसानी जान की अलग-अलग कीमत लगाने जैसी तस्वीर न बने। इसी के साथ जुड़ी हुई एक दूसरी बात यह है कि सड़क हादसों में या रेल हादसे में जब कोई एक-दो लोग मरते हैं, तो किसी राहत की घोषणा नहीं होती। लेकिन जब किसी एक हादसे में बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं, तो उनमें से हर किसी के लिए राहत राशि की घोषणा होती है। सरकारी नियमों और कानून के मुताबिक जहां सरकार की जिम्मेदारी बनती है, वहां मुआवजा देना तो ठीक है, और वह तो हर किसी को बराबरी से मिलता है, लेकिन राहत या सहायता तो हादसे में मारे गए 25 लोगों को अगर मिल रही है, तो वह एक को भी मिलनी चाहिए। इससे जुड़ी हुई एक और बात यह भी है कि किसी भी तरह की राहत या सहायता लोगों को जरूरत के मुताबिक मिलनी चाहिए। जो संपन्न तबके के लोग हैं, उनको किसी हादसे के बाद भी क्यों कोई राहत मिलनी चाहिए? कानूनी मुआवजा अलग है, उसके लिए नियम-कानून बने हुए हैं, लेकिन जनता के पैसों से जब राहत या सहायता दी जाती है, तो वह परिवार की जरूरत को देखते हुए ही दी जानी चाहिए। अभी सीआरपीएफ के जो जवान मारे गए हैं, वे बहुत ही जूनियर कर्मचारी हैं, और उनका परिवार ऐसी राहत का हकदार हैं। लेकिन यहां पर सवाल यह भी आता है कि इन जवानों के परिवारों को सीआरपीएफ के नियमों के मुताबिक मुआवजा तो मिलना ही है, उसके बाद उन्हें जो राहत दी जा रही है, वैसी ही राहत किसी एक अकेले सिपाही या सैनिक की मौत होने पर भी क्यों नहीं दी जाती? 
इसलिए दिल दहलाने वाली बड़ी खबरों से प्रभावित होकर आनन-फानन बड़ी-बड़ी राहत की घोषणा के बजाय केन्द्र और राज्य सरकारों को यह करना चाहिए कि एक न्यायसंगत, और तर्कसंगत तरीके से मुआवजा, राहत, या सहायता की राष्ट्रीय नीति मिलकर तय करें, और खबरों से उफनती भावनाओं को राहत राशि कम या अधिक करने का मौका न दें। दूसरी बात यह कि देश के मोर्चे पर या राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों में काम करते हुए शहादत पर परिवार को मिलने वाली मदद ऐसी न रहे कि एक प्रदेश दूसरे से आगे बढ़कर वाहवाही पाने के लिए कुछ करे। पूरा देश एक सरीखा रहना चाहिए, और राज्यों को एक समान बर्ताव करने के लिए एक नीति राष्ट्रीय स्तर पर बनानी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM