चुनाव खर्च देखते हुए कौन कह सकते हैं कि ये प्रलोभनमुक्त चुनाव हैं?

संपादकीय
31 मार्च 2019



सुप्रीम कोर्ट के एक चर्चित वकील, बागी तेवरों वाले प्रशांत भूषण ने कहा है कि भाजपा लोकसभा का यह चुनाव जीतने के लिए 90 हजार करोड़ रूपए खर्च करेगी। यह रकम इतनी बड़ी है कि इसके बारे में कोई अंदाज लगाना भी आसान नहीं है, लेकिन देश की 543 लोकसभा सीटों पर अगर सब जगह भाजपा उम्मीदवारों पर खर्च करेगी, तो भी हर सीट पर करीब 165 करोड़ रूपए खर्च हो सकते हैं। ये आंकड़ा किसी तरह विश्वसनीय नहीं लग रहा है, और बिना सुबूतों की संभावना के भी ऐसा बयान भाजपा को एक विश्वसनीयता देने के अलावा और कुछ नहीं करता। लेकिन इससे परे एक दूसरी बात समझने की जरूरत है कि एक लोकसभा सीट के लिए चुनाव आयोग द्वारा तय की गई अधिकतम खर्च की सीमा, 70 लाख रूपए का सम्मान बड़ी पार्टियों के कोई नेता नहीं करते। लेकिन चुनाव में सीटों पर खर्च दो तरीके से होता है, एक तो उस सीट पर होने वाला स्थानीय खर्च, और दूसरा पार्टी द्वारा प्रदेश या देश के स्तर पर किया जाने वाला खर्च जो कि उम्मीदवार की खर्च सीमा में नहीं आता। 

देश में गंभीर उम्मीदवारों में शायद वामपंथी उम्मीदवार ही ऐसे रहते हैं जो कि सीमा के भीतर खर्च करते हैं, और सीमा से कम ही खर्च करते हैं। बाकी तमाम बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां, और प्रदेश स्तर पर दमखम रखने वाली पार्टियां बेतहाशा खर्च करती हैं, और उम्मीदवार भी अपने स्तर पर ऐसा ही खर्च करते हैं। एक राष्ट्रीय पार्टी के बारे में हमेशा यह चर्चा रहती है कि उसकी अध्यक्ष दस-बीस करोड़ रूपए लेकर लोकसभा की टिकट देती हैं, और सौ-पचास करोड़ रूपए लेकर लोगों को राज्यसभा भेजती हैं। अब ऐसी बातों का कोई सुबूत तो है नहीं, इसलिए उनके नाम सहित इस बात को लिख पाना मुमकिन नहीं है। लेकिन ऐसी चर्चा कुछ दूसरी पार्टियों के लिए भी बाजार में रहती है, और पंजाब के चुनावों में आज से दस बरस पहले एक बड़ी पार्टी के पैनल में आ चुके तीन नामों में से किसी एक को टिकट दिलवा देने पर भी पांच-पांच करोड़ रूपए का रेट दिल्ली के चुनावी बाजार में चल रहा था। छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव के कुछ महीने पहले ही विधानसभा के चुनाव हुए हैं जिनमें मोटा खर्च हुआ है। अब 90 विधानसभा सीटों की जगह कुल 11 लोकसभा सीटों का चुनाव होना है, और ऐसे में एक-एक लोकसभा सीट के तहत 7-8 विधानसभा सीटें रहेंगी, और कार्यकर्ता-मतदाता उसी तरह के खर्च की उम्मीद रखेंगे। छत्तीसगढ़ की एक सबसे महंगी लोकसभा सीट के बारे में एक बड़ी पार्टी के एक जानकार नेता का अंदाज है कि दोनों उम्मीदवारों की तरफ से 25-25 करोड़ रूपए खर्च होंगे। यह बात कुछ लोगों को अविश्वसनीय लग सकती है, और कुछ लोगों को भरोसेमंद भी। लेकिन यह खर्च 70 लाख रूपए की खर्च-सीमा से इतना अधिक है कि चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक अगर चौकन्ने रहें, तो वे ऐसे अंधाधुंध खर्च के कई सुबूत की वीडियो रिकॉर्डिंग भी कर सकते हैं। 

चुनावों में सीमा से बहुत अधिक खर्च का बड़ा साफ असर होता है कि पार्टियां अपनी सरकार चलते सौ किस्म के गलत काम करके धन्ना सेठों को उपकृत करती हैं, और उनसे मोटी रकम या तो पहले रखवा लेती हैं, या चुनाव के वक्त लेती हैं। दूसरी बात यह होती है कि एक बार जो किसी तरह सांसद बन गए रहते हैं, वे लोग अगले चुनाव की तैयारी में पांच बरस भ्रष्टाचार और दलाली करते गुजार देते हैं, ट्रांसफर-पोस्टिंग के कारोबार में लगे रहते हैं, अपने चुनाव क्षेत्र या अपने प्रदेश में चलने वाले बड़े कारखानों या बड़ी खदानों से मोटी उगाही करते रहते हैं। जब तमाम भ्रष्ट लोगों से वसूली ही उनका मकसद रहता है, तो जाहिर है कि ऐसे भ्रष्टाचार से जनता को बचाने की वे कोशिश भी नहीं कर सकते। छत्तीसगढ़ में हम देखते हैं कि कारखानों और खदानों के लिए पर्यावरण-मंजूरी की जनसुनवाई से लेकर बाद में उनके प्रदूषण और मजदूर कानूनों के उल्लंघन तक कोई भी सांसद कुछ भी नहीं बोलते, और अधिकतर विधायक भी चंदादाताओं को अनदेखा करते चलते हैं। चुनावों के महंगे होने से किसी गरीब पार्टी या गरीब उम्मीदवार की जीत की उम्मीद खत्म सी हो जाती है, और वोटरों को नगदी या सामान देकर खरीदे गए वोटों से पाई जीत से एक ऐसा झांसा खड़ा होता है कि ऐसे सांसद या विधायक जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। जबकि यह जीत के मैनेजमेंट और खरीददारी की क्षमता की कामयाबी का सर्टिफिकेट होता है। चुनाव आयोग भारत में हिंसा के बिना निष्पक्ष चुनाव करवाने में महज तकनीकी रूप से कामयाब है, वह चुनाव को प्रलोभनमुक्त करवाने की अपनी जिम्मेदारी को जरा भी पूरा नहीं कर पा रहा है। कल ही एक खबर थी कि किस तरह चुनाव में कालेधन को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने जितने किस्म के सुझाव मोदी सरकार को दिए थे, वे तमाम खारिज कर दिए गए, सरकार ने उन्हें मंजूर नहीं किया। ऐसी हालत में सुप्रीम कोर्ट को सोचना चाहिए कि उसकी दखल की गुंजाइश कहां निकलती है, और किस तरह वह लोकतंत्र को खरीदे गए तंत्र से अलग करने में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकता है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 31 मार्च

जो लोग लोकतंत्र पर भरोसा रखते हैं उनकी जिम्मेदारी...

संपादकीय
30 मार्च 2019



जैसे-जैसे चुनाव का दिन करीब आ रहा है, हिन्दुस्तान की हवा में नारे बड़ी तेजी से शक्ल बदल रहे हैं। पिछले कुछ महीनों से चले आ रहा चौकीदार चोर है का नारा अब एकाएक एक जवाबी नारे में तब्दील हो गया है कि मैं भी चौकीदार। इसके अलावा सर्जिकल स्ट्राईक, अंतरिक्ष हमले की क्षमता, पाकिस्तान का खतरा जैसे नारे एकाएक पिछले दो-तीन महीनों में हवा में उछाले गए, और ठंड की हवा में ठहर जाने वाले प्रदूषण की तरह ठहर गए। अब जैसे-जैसे हर दिन चुनावी सभाओं की गिनती बढ़ रही है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके साथी लगातार एक ऐसी चुनावी मिसाइल पर सवार होते जा रहे हैं जो कभी पाकिस्तान में घुसकर आतंकी कैम्पों को खत्म करने का दावा करती है, तो कभी अंतरिक्ष में जाकर अपने खुद के उपग्रह को बर्बाद करने की मिसाल पेश करती है। लेकिन यह पूरा सिलसिला पिछले कुछ महीनों का है, और इन नए नारों तक चुनाव अभियान को सीमित रखते हुए मोदी और उनके साथी यह नहीं बता रहे हैं कि अनायास देश की गरीब जनता पर नोटबंदी का जो सर्जिकल स्ट्राईक किया गया था, उसके फायदे कहां गए? देश की संसद में आधी रात मुल्क की आजादी के जलसे के टक्कर का जलसा जीएसटी लागू करने का किया गया था, लेकिन उस जीएसटी से देश के कितने लोग आबाद हुए, और कितने लोग बर्बाद हुए, इसकी चर्चा भी आज हवा में नहीं है। काला धन लाकर देश के हर नागरिक के खाते में 15 लाख डालने का जो वायदा किया गया था, वह रकम कहां गई, इसकी भी कोई बात नहीं हो रही है। अच्छे दिनों की बात तो खैर कब की खारिज कर दी गई है कि वह उछाला गया एक जुमला थी, कोई गंभीर बात नहीं थी, इसलिए जनता अब अच्छे दिनों से परे कुछ अच्छा ढूंढने की कोशिश कर रही है तो उसे गिरता हुआ रूपया और उठता हुआ पेट्रोलियम-दाम दिखता है, ये ही दोनों चीजें हैं जिन्हें लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार मनमोहन सरकार पर हमले करते थे। फिर एक और मुद्दा हवा में कहीं नहीं दिख रहा कि दो करोड़ रोजगार या नौकरियां मोदी सरकार देगी। हालत यह है कि नौकरियां घट गई हैं, रोजगार खत्म हो गए हैं, और खुद मोदी सरकार के सर्वे के आंकड़ों को बस्ता बांधकर सर्जिकल स्ट्राईक में भेज दिया गया है ताकि देश की जनता उसे देख न सके। इन पांच बरसों में मोदी सरकार ने नोटबंदी के बाद बैंकों में लौटे नोटों के आंकड़े जारी नहीं किए, बेरोजगारी के आंकड़े जारी नहीं किए, देशके बाहर से कालाधन लाने, और जनता के खातों में डालने के आंकड़े भी कहीं नहीं दिखे, और भी न जाने कौन-कौन से आंकड़े जारी नहीं किए गए। 

अब जब भाजपा का प्रचार का हमला इतना तेज हो गया है, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आमसभा के लाउडस्पीकर की तरह का हो गया है, तो फिर कांग्रेस के लोगों को, गैरभाजपाई पार्टियों को, और देश के लोकतंत्र के लिए फिक्र रखने वाले लोगों को यह याद रखना होगा कि पांच बरस के मुद्दे न सिर्फ रफाल हैं, न सिर्फ चौकीदार हैं। इन पांच बरस के हिन्दुस्तानी जिंदगी के असल मुद्दों को अगर उनके अनुपात में नहीं उठाया गया, तो फिर यह आने वाला चुनाव देश की रक्षा और राष्ट्रवाद, पड़ोस के दुश्मन देश और देश के गद्दार जैसे नारों के सैलाब में बहकर किसी एक खास किनारे लगा दिया जाएगा। जनता के बीच के लोगों को भी चाहिए कि पूरे पांच बरस के मुद्दों को एक नजर में दिखाने लायक बातें उठाई जाएं। चुनाव के आखिरी हफ्तों में इसके पहले के ढाई सौ हफ्तों की बातें दब या कुचल नहीं जानी चाहिए। आज का चुनावी हल्ला मतदाताओं को प्रभावित करने वाले सीमित और भावनात्मक मुद्दों तक अगर सीमित रह गया, तो फिर देश की पांच बरस की सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होने को मजबूर नहीं की जा सकेगी। इसलिए देश के लोकतांत्रिक तबकों को आखिरी दौड़ के इस अंधड़ की धूल को जनता की आंखों में भरने नहीं देना चाहिए, और पूरे पांच बरसों पर एक ऐसी संतुलित बहस करनी चाहिए जो कि जनता को प्रभावित करने वाली बातों को तर्कसंगत तरीके से उठाए। यह जिम्मेदारी विपक्ष की भी है, और उन तमाम लोगों की भी है जो लोकतंत्र पर भरोसा रखते हैं। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 30 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मार्च

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय

संपादकीय
29 मार्च 2019



मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-1 सरकार का कार्यकाल यूपीए-2 सरकार से बेहतर माना जाता है कि पहले कार्यकाल में सरकार ने भ्रष्टाचार कम किया, या नहीं किया। इन दोनों कार्यकालों में एक ही फर्क था कि यूपीए-1 अपने दम पर बनी सरकार नहीं थी, और उसे वामपंथियों का बाहरी समर्थन हासिल था। चूंकि सरकार इस सहयोगी के प्रति जवाबदेह थी, इसलिए चौकन्ना भी थी, और वामपंथी अपने समर्थन से जुड़ी हुई अपनी साख का ख्याल रखते हुए सरकार से सवाल भी करते थे। यूपीए-2 को ऐसे समर्थन की जरूरत नहीं रही, और वे पांच साल घपलों से भरे हुए रहे। सरकार के घपलों पर अधिक चर्चा कोई नई बात नहीं होगी, लेकिन सरकार के हिस्सेदार या सरकार के समर्थक दलों से होने वाले नफे पर जरूर बात करनी चाहिए। 

पिछले पांच बरस इस देश ने देखा है कि किस तरह मोदी सरकार से लेकर महाराष्ट्र की राज्य सरकार तक शुरू में भागीदार रही शिवसेना बाद में किस तरह के बागी तेवरों के साथ गठबंधन सरकार से अलग हुई, और सरकार में रहते, या सरकार छोडऩे के बाद, उसने भाजपा और मोदी सरकार के सबसे कटु आलोचक के रूप में काम किया। अगर कतरनों को निकालकर देखा जाए तो शिवसेना ने मोदी के पूरे कार्यकाल में इंटनरल ऑडिटर का काम किया जो कि काम होने के साथ-साथ दफ्तर में बैठकर ऑडिट करते चलते हैं। राज्यों में जहां म्युनिसिपलों में परले दर्जे का भ्रष्टाचार होने का खतरा रहता है, वहां मध्यप्रदेश के जमाने से छत्तीसगढ़ ने इंटरनल ऑडिटर देखे हैं, और इनका फायदा भी देखा है। ठीक इसी तरह मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के तमाम विवादास्पद फैसलों और कामों पर शिवसेना पूरे वक्त चढ़ाई करते दिखती थी, और कई मौकों पर वह कांग्रेस के मुकाबले भी अधिक कटु आलोचक रहती थी। खैर, अब चुनाव के कुछ हफ्ते पहले भाजपा और शिवसेना का चुनावी तालमेल हो गया है, सीटों का बंटवारा भी हो गया है, और अब शिवसेना इन तमाम कतरनों को छोड़कर आगे बढ़ गई है। शिवसेना-भाजपा की विरोधी पार्टियां अगर समझदार चौकन्नेपन से काम लें, तो ये कतरनें पूरे चुनाव में उनकी खासी विश्वसनीय प्रचार सामग्री बन सकती हैं। 

राजनीतिक दलों को अगर अधिक कामयाब होना है, तो उन्हें पार्टी के भीतर पीछे के एक बंद कमरे में अपने सबसे कटु आलोचकों की एक ऐसी टीम को तनख्वाह पर रखना चाहिए जो कि घर के भीतर विपक्ष की तरह काम करके पार्टी को बड़ी गलतियों से बचाने के छोटे-छोटे काम रोजाना ही करती रहे। ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में घोषित रूप से छाया मंत्रिमंडल की परंपरा है जिसमें सत्तारूढ़ मंत्रियों के कामकाज पर नजर रखने के लिए विपक्ष अपने एक-एक नेता को तैनात करता है। शिवसेना ने मोदी सरकार के भीतर और बाहर रहते हुए कुछ इसी किस्म का काम किया था। लेकिन आज जब हिन्दुस्तान लोकसभा चुनाव के दौर से गुजर रहा है तो ऐसा महसूस होता है कि हर संसदीय सीट पर सांसद के पीछे ऐसे शैडो-एमपी रहने चाहिए जो कि पूरे कार्यकाल सांसद के काम पर नजर रखें, कमजोरियों को दर्ज करें, और अगले चुनाव की तैयारियों में जुटे रहें। जब हर विधानसभा क्षेत्र और हर संसदीय सीट पर, सरकार के हर मंत्रालय या विभाग पर नजर रखने के लिए ऐसी गंभीर परंपरा शुरू होगी, तो उससे विधायक-सांसद, और मंत्रालयों के कामकाज पर रोजाना भी निगरानी रहेगी, और वहां पर बड़े-बड़े भ्रष्टाचार रूक सकेंगे, या देर से पकड़ आएंगे तो चुनाव के वक्त काम आएंगे।

संसदीय परंपरा में आलोचक-समर्थक, या निगरानी रखने वाले विरोधियों का अपना महत्व होता है। समझदार सरकार को कुछ ऐसे मुखर-आलोचक रखने चाहिए जिनके बारे में सदियों पहले जब लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं थी, उस वक्त कबीर कह गए थे- निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। कबीर कह गए थे कि जो निंदा करते हैं, उन्हें करीब रखना चाहिए, अपने ही आंगन कुटी बनाकर उन्हें बसाना चाहिए, क्योंकि वे बिना पानी या साबुन के हमारे स्वभाव को साफ करते रहते हैं। सदियों पहले की यह एक लाईन आज के हिन्दुस्तान के देश-प्रदेश की सरकारों को गड्ढे में जाने से बचाने की ताकत रखती है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मार्च

कन्हैया को गैरभाजपा पार्टियां सर्वसम्मत उम्मीदवार बनाएं...

संपादकीय
28 मार्च 2019



जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार सीपीआई के सदस्य पहले से हैं, और अब वे बिहार के बेगूसराय से पार्टी की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। उनके खिलाफ भाजपा ने अपने एक बड़बोले बड़े नेता और मंत्री गिरिराज सिंह को उम्मीदवार बनाया है जो कि अपनी सीट बदलने को लेकर कुछ विचलित चल रहे हैं कि पार्टी ने उनसे बात किए बिना उनकी सीट बदल दी। कन्हैया कुमार उस वक्त सुर्खियों में आए जब जेएनयू में छात्र-छात्राओं का प्रदर्शन चल रहा था, और वामपंथी छात्र संगठन को बदनाम करने के लिए ऐसे झूठे वीडियो बनाए गए थे जिनमें भारत के खिलाफ नारे सुनाई पड़ते थे, और बाद में फोरेंसिक जांच में ये वीडियो गढ़े हुए, झूठे साबित हुए। इसके बाद अब जब कन्हैया कुमार मैदान में हैं, तो उन्होंने वामपंथी तौर-तरीकों से कुछ अलग जाकर इंटरनेट पर अपने लिए चंदा जुटाना शुरू किया है। अब तक 28 घंटे में 28 लाख रूपए जुट जाने की खबर है। कन्हैया कुमार के भाषणों के जो वीडियो चलन में हैं, और टीवी पर उनके जो इंटरव्यू दिखाई पड़ते हैं, वे लोगों को बांध लेते हैं कि देश के जटिल मुद्दों को कोई कितनी सरल भाषा में सामने रख सकता है। कन्हैया कुमार दिल्ली पुलिस के हाथों गिरफ्तारी और मुकदमेबाजी भी झेल चुके हैं, और बिहार में जहां कांग्रेस-लालू पार्टी ने दूसरी पार्टियों को साथ लेकर भाजपा के खिलाफ एक बड़ा गठबंधन बनाया है, उसने भी कन्हैया कुमार का साथ देने के बजाय बेगूसराय से राजद का उम्मीदवार खड़ा किया है। यह उम्मीद की जा रही थी कि नई पीढ़ी की नई रौशनी की तरह सामने आए, धर्मनिरपेक्षता के एक बड़े आंदोलनकारी, और साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक बड़े योद्धा की तरह सामने आए कन्हैया कुमार को मोदी विरोध का एक प्रतीक बनाते हुए सभी गैरएनडीए पार्टियां उनका साथ देंगी, लेकिन वैसा होते दिख नहीं रहा है। इन सबसे परे कन्हैया कुमार बेगूसराय से चुनाव लडऩे जा रहे हैं, और बिना किसी चर्चित वंश के, बिना किसी नेता के पसंदीदा हुए, पहली बार के वे ऐसे उम्मीदवार हैं जिनकी शोहरत अपनी पार्टी सीपीआई से भी अधिक है। लेकिन वामपंथी दलों में बूढ़ी हो चली पीढिय़ों के बोझतले दबे होने की जो समस्या है, उसे कम करने के लिए कन्हैया कुमार जैसे कुछ नौजवान लोगों को भी आगे लाने की जरूरत है जो कि पूरी तरह से वामपंथ के प्रति प्रतिबद्ध भी हैं, और संभावनाओं वाले भी हैं। 

चुनाव के वक्त जनता के बीच से इस तरह से पैसा इक_ा होना एक अच्छी बात है। एक तरफ जहां भाजपा और कांग्रेस जैसे पुराने और स्थापित दल बड़ी-बड़ी रकमों का चंदा पाते हैं, वहीं पर बिल्कुल ही फटेहाल कन्हैया कुमार को भी लोग जीतने लायक चंदा जुटाकर दे रहे हैं, यह छोटी बात नहीं है। देश में यह बात भी स्थापित होनी चाहिए कि चुनाव जीतने के लिए किसी का अरबपति या करोड़पति होना जरूरी नहीं है, जो उम्मीदवार लोगों के बीच भरोसा पैदा कर सके उसे एक नोट और एक वोट देकर जनता भी जिता सकती है। कन्हैया कुमार देश के जटिल मुद्दों पर जितनी ईमानदारी और साफगोई से अपनी बात रखते हैं, वह वामपंथी वक्ताओं के बीच भी एक दुर्लभ खूबी है, और देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतों को इस पीढ़ी का इस्तेमाल करना चाहिए, ऐसे लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए। यह कांग्रेस और राजद जैसी बड़ी पार्टियों की तंगदिली और तंगनजरिए की एक मिसाल ही है कि वे एक सीट कन्हैया कुमार जैसे प्रतीक के लिए छोडऩे को तैयार नहीं हैं जो कि मोदी सरकार के खिलाफ, भाजपा के खिलाफ, एनडीए के भागीदारों के खिलाफ एक एजेंडा सेट करने का दमखम रखते हैं। अब घोर साम्प्रदायिक और घोर अलगाववादी, अलोकतांत्रिक बयानबाजी के लिए मशहूर गिरिराज सिंह के सामने कन्हैया कुमार देश के भीतर बहस के दो खेमों को खबरों में लाने में भी कामयाब होंगे, और उनके उठाए मुद्दों, सवालों के जवाब न तो आसान होंगे, और न ही खबरों से परे रहेंगे। भाजपा विरोधी पार्टियों को आपस में बात करके ऐसे उम्मीदवार को अपना सर्वदलीय प्रत्याशी बनाना चाहिए क्योंकि देश की संसद में ऐसे होनहार नौजवान की जरूरत है जो कि उसे देशद्रोही साबित करने की साजिशों के खिलाफ भी हौसले के साथ खड़ा रहा। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

पुलिस के ऐसे-ऐसे और इतने जुर्म फिक्र की बात

संपादकीय
27 मार्च 2019



पिछले हफ्ते-दो हफ्ते में छत्तीसगढ़ में बड़े भयानक ऐसे जुर्म हुए हैं जिनसे या तो पुलिस खुद जुड़ी रही, या उसके परिवार के लोग। एक महिला इंस्पेक्टर ने अपने पति को गोली मारी कि उसका किसी और से अवैध संबंध है। जख्मी पति ने अस्पताल में बयान दिया कि उसकी इंस्पेक्टर पत्नी का एक सिपाही से अवैध संबंध है, और इस वजह से उसने गोली मारी है। रायगढ़ में एक पुलिस अफसर का बेटा बलात्कार में पकड़ाया। रायपुर में दो दिन पहले एक कार चोरी में एक सिपाही गिरफ्तार हुए। इसके पहले दुर्ग में एक सिपाही एक कत्ल में गिरफ्तार हुआ। कल रायपुर में एक सिपाही पुलिस की रायफल लेकर एक व्यापारी के शोरूम पहुंचा, और खरीदी की किसी बहस पर उसे गोली मारकर खत्म कर दिया। 

अगर गिने-चुने दिनों में इतनी घटनाएं नहीं होतीं, तो शायद पुलिस के बारे में कुछ सोचने की जरूरत भी नहीं होती। लेकिन एक के बाद एक ऐसे मामले हो रहे हैं जिनमें पुलिस बड़े संगीन जुर्म करते पकड़ा रही है। यह समझने की जरूरत है कि जिस पुलिस पर जुर्म दर्ज करके मुजरिम को पकडऩे का जिम्मा रहता है, वही जब जुर्म में शामिल हो जाती है, तो शुरुआती दौर में उसके फंसने का खतरा बड़ा कम रहता है। दुर्ग में तो जिस पुलिस सिपाही को कत्ल के जुर्म में पकड़ा गया वह कई दिन तक खुद ही जांच में शामिल घूम रहा था। ऐसे में पुलिस के खिलाफ न तो तेजी से शिकायत आती, और न ही आसानी से सुबूत जुटते। इसलिए जब पुलिस की गिरफ्तारी की नौबत आ जाती है तो यह मानकर चलना चाहिए कि ऐसे, या दूसरे किस्म के, सैकड़ों मामले हो जाने के बाद ही किसी एक मामले में जब सुबूत चीख-चीखकर बोलते हैं, तब पुलिस अपने साथ के लोगों को गिरफ्तार करती है। 

छत्तीसगढ़ में पुलिस की नौबत को लेकर सोचने की जरूरत कई वजहों से है। लोगों को याद होगा कि पिछली भाजपा सरकार के आखिरी महीनों में पुलिस-परिवार आंदोलन चला जिसमें पुलिस की काम की स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए कई मांगें सामने रखी गईं। पुलिस और प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत से इस आंदोलन को कुचलकर रख दिया था, और इसके पीछे जो लोग थे उनको गिरफ्तार भी किया गया था। इसके बाद बनी एक कमेटी ने पुलिस को साप्ताहिक अवकाश देने सहित कई किस्म की सिफारिशें की थीं, और वर्तमान सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने चुनाव के पहले ऐसा वायदा भी किया था कि पुलिसवालों का हाल सुधारा जाएगा। 

देश में पुलिस का तनाव, और उसके भीतर अपराध की भावना न तो नई बात है, और न ही यह छत्तीसगढ़ तक सीमित है। कई दशक पहले पुलिस तनाव और पुलिस की हिंसा को लेकर अर्धसत्य जैसी फिल्म बनी थी, और लोग उस हिंसक चेहरे को एक कहानी में भी देखकर हड़बड़ा गए थे जबकि वह हकीकत के एकदम करीब था। इसके बाद मुम्बई फिल्म उद्योग ने अब तक 56 नाम की फिल्म सामने रखी जिसमें मुठभेड़-हत्याओं की शौकीन पुलिस का किरदार था। फिल्मों में ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर बनी कई पुलिस सुधार रिपोर्ट में भी तरह-तरह के सुझाव पिछले दशकों में सामने आए हैं कि पुलिस के भीतर तनाव और कुंठा की वजहों को कैसे सुधारा जाए, कैसे उनके परिवार को हिंसा से दूर रखा जाए, कैसे पुलिस जवानों के बच्चों को अपराधी बनने से रोका जाए। लेकिन बस्तर में हिंसा करने वाली, बलात्कार और मुठभेड़-हत्या करने वाली, गांव जलाने वाली पुलिस को छत्तीसगढ़ ने अच्छी तरह दर्ज किया है। दूसरी तरफ राजधानी रायपुर में पुलिस के बड़े अफसरों ने किस कदर नियम-कायदे तोड़कर पिछली सरकार के दौरान गलत काम किए थे, वह जांच अभी चल ही रही है। ऐसे में छत्तीसगढ़ पुलिस को अपने मुखिया के स्तर पर राजनीतिक लोगों के साथ बैठकर यह सोचने की जरूरत है कि इतने, और ऐसे-ऐसे जुर्म में शामिल पुलिस को देखते हुए, इस महकमे में कैसे सुधार की जरूरत है। यह हाल देश के दूसरे प्रदेशों में भी हो सकता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह लगातार सामने आ रहा है, और इतने कम अरसे में पुलिस के ऐसे इतने जुर्म लोगों को याद नहीं पड़ रहे हैं। वर्तमान सरकार को इस बारे में गंभीरता से देखना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मार्च

दलबदल के दलदल को कम करने कानून जरूरी

संपादकीय
26 मार्च 2019



अभी इस पल खबर आ रही है कि लंबे समय से समाजवादी पार्टी से जुड़ी रहीं, उस पार्टी से कई बार संसद पहुंचीं एक भूतपूर्व अभिनेत्री जया प्रदा भाजपा में चली गई हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति में एक वक्त मुलायम सिंह के सबसे करीबी मुस्लिम नेता आजम खां के साथ जया प्रदा, और उनके मार्गदर्शक-मित्र अमर सिंह के रिश्ते सांप-नेवले सरीखे थे, और आजम-अमर सार्वजनिक रूप से ओछी बातें करते भी रहते थे। फिर लोगों ने अभी हाल में यह भी देखा कि किस तरह समाजवादी पार्टी छोड़कर बिना किसी किनारे मंझधार में तैरते अमर सिंह ने अभी-अभी चौकीदारी का काम संभाला था। इसके बाद यह स्वाभाविक ही था कि अनिवार्य रूप से उनके साथ ही चलने वाली जया प्रदा भी भाजपा चली जाएंगी। लेकिन यह दलबदल न तो कोई नई बात हैं, और न ही उत्तरप्रदेश या भाजपा तक सीमित है। अभी हाल के बरसों में उत्तर-पूर्व के छोटे-छोटे राज्यों में दलबदल से पूरी सरकारबदल करने के काम में भाजपा और कांगे्रस दोनों बराबरी से लगी रही हैं, और उत्तर-पूर्व एक अस्थिर सरकारों का इलाका हो गया है। एक वक्त था जब दलबदल, और थोक में दलबदल का रिकॉर्ड हरियाणा में कायम होता था, और वहां ऐसे लोगों के लिए भारतीय राजनीति में पहली बार आयाराम-गयाराम का इस्तेमाल हुआ था। 

अभी अधिक वक्त नहीं हुआ है जब इसी जगह पर हमने इस किस्म की दलदली दलबदल-गंदगी को घटाने के लिए चुनाव कानून में ऐसे संशोधन की सलाह दी थी जिससे चुनाव के कई महीने पहले लोगों का दलबदल बंद करवा दिया जाए। किसी को पार्टी बदलने से रोकना अलोकतांत्रिक होगा, इसलिए ऐसे कानून की जरूरत है जिससे चुनाव के छह महीने के भीतर दलबदल करने वाले लोगों के नई पार्टी के निशान पर चुनाव लडऩे पर रोक लगे। कुछ लोग इसे भी अलोकतांत्रिक कह सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र को गटर बनाने पर आमादा लोगों को अगर रोकना है, तो ऐसे किसी कानून की जरूरत है। जिनको दलबदल करना है वे इसे चुनाव के छह महीने पहले कर लें, और मतदाताओं के सामने गंदगी रंग बदलकर पेश न हो।

आज हम छत्तीसगढ़ में हर दिन एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में जाते हुए लोग देख रहे हैं। जिस वक्त राज्य में अजीत जोगी की पहली कांगे्रस सरकार आई, तो वह बहुमत की सरकार थी, लेकिन जोगी ने तेरह भाजपा विधायकों का थोक में दलबदल करवाया था। इसके बाद के बरसों में भी इसी किस्म से छोटेमोटे दलबदल होते रहे, और आखिर में अंतागढ़ के विधानसभा उपचुनाव में तो कांगे्रस के उम्मीदवार बनने के बाद मंतूराम पवार का ऐसा हृदय परिवर्तन हुआ था कि उन्होंने नाम वापिस ले लिया, और फिर वे भाजपा में चले गए। इस हृदय परिवर्तन की बातचीत और खरीद-फरोख्त की टेलीफोन रिकॉर्डिंग आज पुलिस जांच के घेरे में है, और छत्तीसगढ़ के तमाम वोटर इनकी आवाजों को अच्छी तरह पहचान भी रहे हैं। लोकतंत्र का मखौल बनाने में जब तमाम बड़ी पार्टियां, या छोटी क्षेत्रीय पार्टियां एक-दूसरे के साथ गलाकाट मुकाबला कर रही हैं, तो लोकतंत्र के नाम पर अतिसंवेदनशील होने के बजाय लोकतंत्र की हत्या को रोकने की कोशिश करनी चाहिए। अभी हाल के बरसों में यह देखने में आया है कि कांगे्रस और भाजपा जैसे एक-दूसरे से सैद्धांतिक रूप से पूरी तरह विरोधी पार्टियां भी एक-दूसरे की गंदगी को लाकर अपने सिर पर बिठाने में जुटी हुई हैं। देश में जनता के सामने दलबदलुओं की लिस्ट को ईवीएम पर पेश कर देना लोकतंत्र नहीं है। इसलिए वे कानून बनाकर चुनाव के छह महीने पहले दलबदल रोक देना चाहिए, और बाद के दलबदल को चुनावी अपात्रता बनाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

सोनिया और सपना के खिलाफ गंदा बयान, और अमित शाह का दिया गया एक अच्छा तर्क

संपादकीय
25 मार्च 2019



हरियाणा की एक डांसर सपना चौधरी दो दिनों से खबरों में हैं। वे उत्तर भारत में खासी मशहूर हैं, और पहले कांग्रेस ने यह दावा कि वे उनकी पार्टी में आ गई हैं, फिर भाजपा ने ऐसा दावा किया। दोनों ही पार्टियों ने अपने नेताओं के साथ सपना की तस्वीरें पोस्ट कीं, दूसरी पार्टी के दावे को झूठा बताया, और खुद सपना चौधरी की बातें मिली-जुली हैं कि वे क्या करेंगी। खैर, आज इस पर लिखने का मुद्दा यह नहीं है कि यह लोकप्रियता किस पार्टी को फायदा पहुंचाती है, बल्कि मीडिया और सोशल मीडिया पर इन दोनों पार्टियों के लोगों की लिखी बातें हैं कि सपना चौधरी का कांग्रेस में जाना, या राजनीति में आना कैसा होगा। उत्तरप्रदेश के एक भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह ने ओछेपन का अब तक का रिकॉर्ड तोड़ते हुए सार्वजनिक रूप से राहुल गांधी को सलाह दी है कि वे सपना चौधरी से शादी कर लें। सुरेंद्र सिंह ने कहा कि राहुलजी भी अपनी कुल परंपरा को आगे बढ़ाएं यह अच्छी बात है। उनकी माताजी भी इटली में इसी पेशे से थीं, आज उन्होंने सपना को भी अपना बना लिया। मैं तो धन्यवाद दूंगा राहुलजी को कि जैसे आपके पिताजी ने सोनिया गांधी को अपना बना लिया, आप भी आज भारत की राजनीति में सपना को अपना बनाकर राजनीति की नई पारी की शुरुआत करें। इसके लिए आपको साधुवाद।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अभी कल ही एक पे्रस कांफे्रंस लेकर यह बयान दिया था कि कांग्रेस के नेता जिस तरह भारत पर आतंकी हमले, उसमें पाकिस्तान की भूमिका, पाकिस्तान पर भारत की सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर बयान दे रहे हैं उन पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को जवाब देना चाहिए। उन्होंने खासे आक्रामक तेवर में ऐसे सारे बयानों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था और कांग्रेस के समय-समय पर दिए गए ऐसे तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया था कि ये बयान इन नेताओं के निजी बयान थे जिनसे कांग्रेस पार्टी सहमत नहीं है। अमित शाह ने काफी जोर देते हुए इस बात को दुहराया था कि राजनीति में और सार्वजनिक जीवन में निजी क्या होता है? उन्होंने कहा था कि जब किसी पार्टी के नेता या पदाधिकारी कोई बयान देते हैं, तो वह पार्टी का ही बयान होता है। अमित शाह की यह बात पूरी तरह तर्कसंगत है कि कोई पार्टी अपने नेताओं की गलतबयानी से किनारा नहीं कर सकती, उनको अनदेखा नहीं कर सकती, और उन्हें नेता की निजी राय नहीं बता सकती। अमित शाह के बयान के कुछ घंटों के भीतर ही जिस तरह यूपी के इस भाजपा विधायक ने कैमरों के सामने खुलकर जिस तरह की बात कही है, उसे खुद अमित शाह के तय किए हुए पैमानों के मुताबिक नेता की निजी राय नहीं माना जा सकता। हमने दो दिन पहले इसी जगह पर कांग्रेस के सैम पित्रोदा और दूसरे नेताओं के अनर्गल और अवांछित बयानों के खिलाफ लिखा था कि किस तरह ऐसे बयान कांग्रेस के खिलाफ जाते हैं। सैम पित्रोदा के उसी बयान को लेकर अमित शाह ने मीडिया के सामने खुलकर अपनी तर्कसंगत बात रखी थी। और अब उनकी पार्टी के विधायक ने महिलाओं के प्रति हिकारत की अपनी सोच जाहिर करते हुए, सोनिया परिवार से खास नफरत जाहिर करते हुए उनकी बेइज्जती का जो काम किया है, वह काम भाजपा का कोई नफा नहीं करने जा रहा है, उससे आम हिंदुस्तानियों के मन में भाजपा के लिए अरूचि होगी। लेकिन भाजपा या कांग्रेस के प्रति लोगों की अरूचि हमारी फिक्र की बात नहीं है। ओछेपन और गंदगी के बयान, चाहे वे किसी भी पार्टी के कोई भी नेता दें, वे आम हिंदुस्तानी की फिक्र की बात होनी चाहिए, क्योंकि पुरूषवादी सोच का ऐसा ओछा हमला आने वाले कल को किसी दूसरी महिला पर भी होगा ही होगा, और ऐसी दूसरी महिला जरूरी नहीं है कि राजनीति की हो, वह कोई ऐसी महिला भी हो सकती है जो जिंदगी के किसी और दायरे में कामयाब होने जा रही हो। यह नफरत राजनीतिक कम है, यह कामयाब महिलाओं से नफरत अधिक है, फिर चाहे वह सपना चौधरी हो, या सोनिया गांधी। अमित शाह ने किसी भी पार्टी के नेताओं के बयानों को लेकर जो कहा है, वह पैमाना सचमुच ही सभी पर लागू करना चाहिए, दो दिन पहले वह कांग्रेस पर लागू हो रहा था, और आज वह भाजपा पर लागू हो रहा है।

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दीवारों पर लिक्खा है, 25 मार्च

नफरत की वजहें कुछ और, हिंसा का उफान कहीं और...

संपादकीय
24 मार्च 2019



अभी तीन दिन पहले देश के बलात्कार-राजधानी सरीखे मध्यप्रदेश से एक ऐसी खबर आई कि जिसके बाद इंसानियत, रिश्ते-नातों, इन सभी से भरोसा पूरी तरह उठ ही जाता है। ऐसा भी नहीं कि ऐसी कोई वारदात पहली बार हुई हो, लेकिन इसकी भयावहता अनोखी है। एक नाबालिग बच्ची के साथ उसके तीन भाईयों और एक चाचा ने बलात्कार किया। जब उसने इसकी शिकायत पुलिस में करने की बात कही, तो उसकी चाची ने हंसिए से उसका सिर काटकर अलग कर दिया। इन दो वाक्यों के बाद अधिक खुलासे की जरूरत बचती नहीं है। जम्मू के कठिया में तो एक खानाबदोश बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले लोगों में पुलिस भी थी, और एक बाप-बेटे भी थे। लेकिन इस मामले में तो तीन भाई, एक चाचा, और एक चाची! 
इधर छत्तीसगढ़ में भी लगातार कोई न कोई ऐसी खबर आ रही है जिसमें परिवार के भीतर ही भाई बहन पर गोली चला रहा है, पत्नी पति की हत्या कर रही है, पति पत्नी को मार रहा है, और बाप बेटे की हत्या कर रहा है, बेटा बाप को मार डाल रहा है। इन सबको देखकर यह लगता है कि पुराने जमाने से जो कहावत चली आ रही है कि अपना खून अपना ही होता है, या फिर हिन्दी फिल्मों में जो एक घिसापिटा डायलॉग चले आ रहा है कि उसकी रगों में भी वही खून दौड़ता है जो कि मेरी रगों में दौड़ता है, ये तमाम बातें लतीफा लगने लगती हैं। फिर जहां तक इंसानियत की बात है, तो हम बार-बार यह लिखते हैं कि लोग अपने भीतर की अच्छी खूबियों को तो इंसानियत कह लेते हैं, और उन्हें अपना मान लेते हैं। लेकिन अपने भीतर की हिंसक-खामियों को वे हैवानियत कहकर एक अवांछित बच्चे की तरह किसी और का बताने लगते हैं। हकीकत यह है कि यह तथाकथित इंसानियत, और यह गाली की तरह इस्तेमाल होने वाली हैवानियत, दोनों ही हर इंसान के भीतर मौजूद हैं, मौलिक हैं, और इंसानों की अपनी हैं। अब लोगों की भलमनसाहत यही होती है कि वे अपने भीतर के हैवान को काबू में रखकर, दबाकर, उसे खत्म करके अपने भीतर के इंसान को ताकतवर बनाते चलते हैं, और समाज को बेहतर बनाते हैं। दूसरी तरफ बुरे लोगों के भीतर हैवान वाला हिस्सा सिर चढ़कर बोलता है, और उनके भीतर के भले इंसान वाले हिस्से को कुचलकर रख देता है। 
परिवार के भीतर की इस तरह की जानलेवा या आत्मघाती हिंसा एक मानसिक रूप से बीमार समाज का संकेत है। जिस तरह बीमारी के कुछ लक्षण होते हैं, कि बदन तपता है, या खांसी आती है, या चक्कर आता है, ठीक उसी तरह जान ले लेने, या जान दे देने, किसी नाबालिग या मासूम बच्ची से बलात्कार कर लेने की हिंसा जब एक वारदात की शक्ल में सामने आती है, तो उसका यह मतलब भी रहता है कि वह समाज के बदन के भीतर कई ऐसी छोटी-छोटी हिंसक और हैवानी वारदातों की शक्ल में जारी रहती है, जिंदा रहती है, जो कि खबरों में नहीं आ पातीं। ऐसी वारदातें परिवार के भीतर ही दबा दी जाती हैं, बर्दाश्त कर ली जाती हैं, या माफ कर दी जाती हैं। लेकिन चर्चा में आने वाली हर वारदात के पीछे हजार-हजार ऐसी और छोटी-छोटी वारदातों की बुनियाद रहती है जिन पर बड़ी वारदात की इमारत खड़ी होती है, और पुलिस या अदालत तक पहुंचने पर वह दिखती है। कुल मिलाकर आज की बात का मकसद यह है कि ऐसी हिंसा से भरा हुआ समाज सिर्फ एक परिवार के हिंसक होने का लक्षण नहीं है, वह समाज के बड़े हिस्से के बीमार या हिंसक होने, या दोनों ही होने का सुबूत है। ऐसे जुर्म का पुलिस जांच और अदालत के रास्ते जेल में इलाज इसलिए काफी नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा तो महज उतने ही लोगों के साथ हो सकता है जितने लोग पकड़ में आते हैं। आज जब दुनिया भर में यह चर्चा चल रही है कि कौन सा देश कितना खुश रहता है, तो यह समझने की जरूरत है कि पारिवारिक और सामाजिक सुरक्षा पाकर और हिंसा से बचे रहकर लोग कितने खुश रह सकते हैं। मानसिक रूप से बीमार या हिंसक को मानसिक परामर्श या मनोचिकित्सा की सलाह दी जाती है। लेकिन हिन्दुस्तान की तरह जो मानसिक रूप से बीमार और हिंसक समाज है, उसके लिए कोई डॉक्टरी नुस्खा नहीं है। दिक्कत यह है कि साम्प्रदायिक या राजनीतिक कारणों से, चुनावी या कारोबारी वजहों से जिस तरह नफरत और हिंसा का खौलता लावा पूरे देश में फैलाया जा रहा है, उससे महज चुनिंदा किस्म की हिंसा नहीं बढ़ती, उससे कई किस्म की और हर किस्म की हिंसा बढ़ती है। आज इस देश में अगर परिवार के भीतर भी एक-दूसरे से रिश्तों में देह के भीतर का हैवान फैसले ले रहा है, हिंसा कर रहा है, तो इस हैवान को बढ़ावा देने में देश की राजनीतिक नफरत भी जिम्मेदार है, और साम्प्रदायिक नफरत भी। इन दो बातों का रिश्ता जोडऩा कुछ लोगों को एक अटपटी बात लगेगी, लेकिन समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के जानकार इन बातों को जानेंगे कि धर्मान्धता ने हाल के बरसों में कुछ मुस्लिम देशों में ऐसी-ऐसी हिंसा करवाई है जो कि उन्हीं लोगों के धर्म में सबसे बुरी सजा के लायक करार दी गई है। जब किसी देश या समाज की सोच में नफरत और हिंसा की बोतलों को सुई से दिल-दिमाग की रगों में डाला जाता है, तो फिर वैसे दिल-दिमाग अपने काबू के बदन से कई किस्म की हिंसा करवाते हैं। 

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5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च

कांग्रेस के बड़बोलेपन से नुकसान सिवा कुछ नहीं

संपादकीय
23 मार्च 2019



अब जब देश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, तारीखें आ चुकी हैं, और उम्मीदवार भी तकरीबन आते जा रहे हैं, तब कांग्रेस के लोग अनर्गल बातें कहकर पार्टी को नुकसान पहुंचाने का सिलसिला चलाए हुए हैं। इस बार मानो दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, और शशि थरूर कहीं आगे न बढ़ जाएं इसलिए सैम पित्रोदा ने पुलवामा के आतंकी हमले को लेकर एक ऐसी गंभीर तर्कसंगत और बेमौके की बात कह दी है कि जिससे पार्टी को नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होगा। भारत पर होने वाले आतंकी हमलों की सजा पूरे पाकिस्तान को नहीं दी जानी चाहिए, यह एक तर्कसंगत और न्यायसंगत बात हो सकती है। लेकिन चुनाव के मौके पर बिना किसी बहस के खुद होकर ऐसी चर्चा छेडऩा और ऐसी बात कहना जिसका विरोधी दल तुरंत ही एक जायज या नाजायज फायदा उठा लें, कहां की समझदारी है? 
कांग्रेस पार्टी के यह बेहतर होगा कि वह पाकिस्तान के साथ रिश्तों को लेकर अपने अधिकृत प्रवक्ताओं को ही बोलने की इजाजत देती, और बाकी नेताओं से कहती कि वे अपने दायरे की बात करें। ऐसा करते हुए कांगे्रस अपने प्रवक्ताओं को एक छोटा प्रशिक्षण दिला सकती थी कि भारत की जनभावनाओं को नुकसान पहुंचाए बिना किस तरह सच बोला जा सकता है। यह बात किसी बेईमानी की नहीं है, गांधी भी यही कह गए थे कि सच कहो, लेकिन कड़वा मत कहो। अब भारत में इस चुनावी माहौल में जब भाजपा ने पूरी हवा को एक ऐसी आक्रामक राष्ट्रवाद में केसरी कर रखा है कि अक्षय कुमार की फिल्म भी इस तौले गए मौके पर आकर भी इस माहौल से कम ही केसरी दिख रही है, तब बाकी पार्टियों को राष्ट्रवाद के इस खतरे को समझना चाहिए जो कि चुनाव के रूख को पूरी तरह मोड़ सकता है। आज इस देश में सबसे अफसोस की बात यह है कि पांच बरस की मोदी सरकार अपने पिछले चुनावी घोषणापत्र से लेकर पिछले बरसों में नोटबंदी और जीएसटी सरीखे बहुत से फैसलों का चुनाव में जिक्र भी करने की हालत में नहीं है। और ऐसे में अगर नए ढूंढे गए सर्जिकल स्ट्राइक जैसे नारों में कांग्रेस और बाकी भाजपा-विरोधी उलझकर रह जाते हैं, बिन मौके की अटपटी बात कहते हैं, तो इससे मोदी को नफा छोड़ और कुछ नहीं है।
मनमोहन सिंह सरीखे सबसे कम बोलने वाले, और सबसे समझदारी से बोलने वाले प्रधानमंत्री ने भी एक बार बिना जरूरत यह कहा था कि देश के साधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है। किसी प्रधानमंत्री को ऐसा कहने की कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि सरकार के हाथ में किसी समुदाय के कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाना रहता ही है। फिर भी वे ऐसा कह बैठे, और इसका कांग्रेस के खिलाफ भरपूर इस्तेमाल भी हुआ। दूसरी तरफ भाजपा और उससे जुड़े हुए लोग भी ऐसी भरपूर बातें करते हैं, लेकिन उनके पास उसकी भरपाई के लिए अपने दूसरी भावनात्मक और राष्ट्रवादी नारे हैं। कांग्रेस अगर आने वाले दिनों में बयानबाजी में ऐसी ही लापरवाह रहेगी, तो वह उसका खासा दाम चुकाएगी। कम बोलना कोई कमजोरी नहीं रहती, और सैम पित्रोदा जैसे लोग जो कि तकरीबन तमाम वक्त देश के बाहर ही रहे हैं, उन्हें कम ही बोलना चाहिए, और बाकी लोगों को भी। सैम की कही बात पर हाथों-हाथ भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने प्रेस कांफे्रंस भी ले ली है, और कांग्रेस के पास जनभावना के अनुकूल इसका कोई जवाब मुश्किल होगा।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च

बात की बात, 19 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मार्च

छत्तीसगढ़ भाजपा का यह ब्लड ट्रांसफ्यूजन या किडनी ट्रांसप्लांट?

संपादकीय
20 मार्च 2019



आम चुनाव के पहले छत्तीसगढ़ के लिए जो सबसे बड़ी खबर बन सकती थी, वह शायद बन चुकी है, अगर भाजपा कल शाम की अपनी इस मुनादी पर कायम रहे कि पिछले चुनाव में उसके जीते हुए दस सांसदों में से किसी को दुबारा उम्मीदवार नहीं बनाया जा रहा है। जिस ग्यारहवीं सीट पर कांग्रेस जीती थी, वहां के हारे हुए भाजपा उम्मीदवार की बात सोचना तो वैसे भी फिजूल होगा क्योंकि पार्टी ने तमाम ग्यारह सीटों पर नए चेहरों को लाने की घोषणा कर दी है। छत्तीसगढ़ के इतिहास का यह शायद सबसे बड़ा चुनावी फैसला है कि तकरीबन तमाम सीटों पर जीती हुई पार्टी ने तमाम नए चेहरों का फैसला लिया है। विधानसभा चुनावों में भाजपा की शर्मनाक हार का हाल यह था कि वह ग्यारह लोकसभा सीटों के तहत आने वाली विधानसभा सीटों के आंकड़ों के मुताबिक एक भी लोकसभा सीट पर पहली पार्टी नहीं थी। जोगी-बसपा गठबंधन की मेहरबानी से वह महज एक लोकसभा सीट, बिलासपुर, पर कांग्रेस से आगे थी। विधानसभा की नब्बे सीटों में से पन्द्रह बरस की सत्तारूढ़ भाजपा कुल पन्द्रह सीटों पर सिमट गई थी, पिछली बार की अपनी सीटों से एक तिहाई से भी कम सीटों पर। और आंकड़े बताते हैं कि अगर आगी-बागी या बसपा-जोगी का सहारा न रहता, तो भाजपा कुल तीन सीटों पर जीती होती। 
भाजपा हाईकमान का यह फैसला सही या गलत तो चुनावी नतीजों के बाद ही साबित हो पाएगा, फिलहाल यह एक साहसी फैसला है जो कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की खराब किडनी को देखते हुए उसके ब्लड-ट्रांसफ्यूजन जैसा है, या क्या ऐसा कहना बेहतर नहीं होगा कि पार्टी यहां पर किडनी ट्रांसप्लांट ही कर रही है? पार्टी के बार बदन का पूरा खून बदल दे रही है, और इससे वह एक नई जिंदगी की उम्मीद कर रही है। आज जब चुनाव के नामांकन शुरू हो चुके हैं, तो यह बात मायने नहीं रखती कि मौजूदा सांसद कैसे थे, उन्होंने काम ठीक से किया या नहीं। अब मायने सिर्फ यही बात रखती है कि किसकी जीत की कितनी संभावना है। और जाहिर है कि भाजपा अपने सांसदों की जीत को लेकर जरा भी भरोसे में नहीं थी, इसलिए पूरे के पूरे बल्ब एक साथ बदल डालूंगा वाले इश्तहार की तरह भाजपा ने छत्तीसगढ़ में तमाम चेहरों को बदल डालने का फैसला सुनाया है। जहां तक पिछले पांच बरस में संसद में छत्तीसगढ़ के लोकसभा सदस्यों की कही हुई बात का सवाल है, तो जिस किसी को एक भी सांसद की कही एक भी बात याद हो, उसे एक बड़ा ईनाम दिया जाना चाहिए। ये तमाम सांसद राज्य और केन्द्र की भाजपा सरकारों पर परजीवियों की तरह बैठे हुए पेट भरते रहे, और पार्टी को ऐसी बदहाली में लाकर छोड़ दिया है। राज्य की भाजपा सरकार, और प्रदेश का भाजपा संगठन तो इस बदहाली के लिए जिम्मेदार थे ही, संसद में मौनव्रत रखे हुए छत्तीसगढ़ी सांसद भी इस हाल के लिए जिम्मेदार थे जिनका सदन में कहा हुआ एक-एक शब्द शायद देश को दस-दस हजार रूपए का पड़ा होगा। 
चूंकि भाजपा इस फैसले के साथ एक बड़ा हौसला दिखा रही है, इसलिए उसे यह भी सोचना चाहिए कि वह वंशवाद से किस तरह छुटकारा पा सकती है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने-आपको परिवारमुक्त नेता बताते हैं, दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का परिवार भी चुनाव में राजनीति से परे है, ऐसे में भाजपा को छत्तीसगढ़ में अपने मटियामेट होने की वजहों में वंशवादी राजनीति के योगदान को भी आंकना चाहिए, और इसे खत्म करना चाहिए। अगर भाजपा में मोदी-शाह वंशवाद को घटा न सके, तो फिर उनके मंत्री किस मुंह से पप्पू की पप्पी जैसी घटिया जुबान बोलकर बच सकते हैं? भारतीय राजनीति में जिस कुनबापरस्ती को लेकर जनसंघ के जमाने से भाजपा कांग्रेस को कोसती आ रही है, वह कुनबापरस्ती छत्तीसगढ़ में भाजपा में भी सिर चढ़कर बोल रही है, और इस मौके पर भाजपा उसको भी किनारे कर सकती है। आज ही सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि वंशवाद की राजनीति से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान हुआ है। यह मौका है जब वे नुकसान घटाने की जिम्मेदारी में अपना हिस्सा बंटा सकते हैं, और छत्तीसगढ़ सहित बाकी देश में टिकटें बांटते हुए इसकी शुरुआत कर सकते हैं। आज जब यह लिखा जा रहा है, तभी खबर आ रही है कि छत्तीसगढ़ के मौजूदा सभी दस भाजपा सांसद आज शाम प्रदेश के सबसे वरिष्ठ भाजपा सांसद रमेश बैस के घर पर इकट्ठा हो रहे हैं, और यह मजमा ब्लड ट्रांसफ्यूजन या किडनी ट्रांसप्लांट के काम में कैसे अड़ंगा डाल सकता है, यह देखना भी बड़ा दिलचस्प होगा। फिलहाल पहली नजर में भाजपा का यह फैसला प्रदेश के संगठन को हिला गया है, ठीक उसी तरह जिस तरह छत्तीसगढ़ में कल अपने गठबंधन के भागीदार अजीत जोगी से चर्चा बिना, उनको बताए बिना, मायावती ने अपने उम्मीदवार घोषित करके हिला दिया था। चुनाव वैसे भी नाटकीय उठापटक का दौर होता है, और छत्तीसगढ़ में ये नाटक पारसी थियेटर के अंदाज में पांव पटक-पटककर, जोर-जोर से बोलकर चल रहे हैं। बिना मनोरंजन टैक्स के इन नाटकों का मजा लें।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

ऐसे तमाम मर्दों को भी हाथ बंटाना चाहिए जिनको किसी महिला ने जन्म दिया

संपादकीय
19 मार्च 2019



वैसे तो 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर किसी नसीहत का वक्त तकरीबन निकल चुका है लेकिन एक मुद्दा ऐसा जिस पर चर्चा जरूरी है। भारत में संसद में कुल ग्यारह फीसदी सीटों पर महिलाएं हैं। देश की आधी आबादी संसद और विधानसभाओं से लगभग गायब है। कहने के लिए तैंतीस फीसदी सीटों पर महिला आरक्षण का झांसा दशकों से जारी है, और राजनीतिक दल अपनी आदतन बेईमानी के चलते, मर्दाना दबदबे के चलते इस झांसे को हकीकत में बदलने से बचे रहते हैं। लेकिन दो पार्टियों ने हौसला दिखाया है, ओडिशा में नवीन पटनायक ने तीस फीसदी टिकटें महिलाओं को दी हैं, और बंगाल में ममता बैनर्जी ने चालीस फीसदी। इससे बाकी पार्टियों के सामने भी एक दुविधा जरूर खड़ी हुई होगी, लेकिन इसका कोई खास असर अभी दिख नहीं रहा है। कांगे्रस अध्यक्ष राहुल गांधी यह बयान जरूर दे रहे हैं कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो वे महिला आरक्षण बिल पास करवाकर तैंतीस फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखवाएंगे। लेकिन इंदिरा और सोनिया की इस पार्टी ने लगातार दस बरस सत्ता में रहने पर भी यह बिल क्यों पास नहीं करवाया, इसका कोई जवाब राहुल के पास है नहीं। हकीकत तो यह है कि राहुल को जो बात पसंद नहीं आई, उस अध्यादेश को उन्होंने मनमोहन सरकार के खिलाफ जाकर दिल्ली पे्रस क्लब में प्रेस कांफे्रंस के बीच फाड़कर फेंक दिया था, और मनमोहन सरकार को मनमसोस सरकार बनकर उनके फैसले को सिर पर बिठाना पड़ा था। अब अगर महिला आरक्षण को लेकर यूपीए के दस बरसों में राहुल अगर सांसद रहते हुए आमरण अनशन पर बैठ गए होते तो बात की बात में वह लागू हो चुका रहता। लेकिन कांग्रस के हाथ से भी वह मौका निकल चुका है और अब वह मौका खोकर एक चुनावी वायदा हाथ में लेकर खड़ी हुई है। दूसरी तरफ भाजपा ऐसे किसी वायदे को छू भी नहीं रही है।
इस नौबत का जनता की तरफ से एक इलाज हो सकता है। चूंकि वोटरों की आधी आबादी महिलाओं की है, इसलिए अगर वे यह तय कर लें कि वे अपने चुनाव क्षेत्र की सबसे अच्छी महिला उम्मीदवार को ही जिताएंगी, फिर चाहे वह किसी भी पार्टी की हो, तो अपने-आपको राष्ट्रीय या ताकतवर कहने वाली पार्टियों की अक्ल पलभर में ठिकाने लग जाएगी। और ऐसा करने के लिए किसी राजनीतिक पहल की जरूरत नहीं है, महिला अधिकारों को लेकर, मानवाधिकार को लेकर, सामाजिक न्याय को लेकर लडऩे वाले कोई संगठन भी सोशल मीडिया के रास्ते सड़क तक ऐसा एक आंदोलन खड़ा कर सकते हैं जिससे अगले कुछ हफ्तों में ही हवा बन जाए। इस देश ने सोशल मीडिया पर ऐसे कई अभियान देखे हैं, जैसे मी-टू, या चौकीदार चोर है, या मैं भी चौकीदार। इसलिए अगर हर लोकसभा क्षेत्र को लेकर सोशल मीडिया पर ऐसी कोई मुहिम छेड़ी जाए कि मेरी सांसद एक महिला ही होगी, और ऐसी मुहिम अगर जोर पकड़ ले, तो बड़ी-बड़ी स्थापित पार्टियों का सारा हिसाब-किताब गड़बड़ा जाएगा।
भारत की महिलाओं को अपने जायज हक के लिए किसी पार्टी या किसी कानून का मोहताज नहीं होना चाहिए। उनके बीच इतना दमखम है कि वे खुद होकर ऐसी नौबत खड़ी कर सकती हैं कि पार्टियां गिरते-पड़ते दौड़ें, और जाकर महिला आरक्षण लागू करें। दुनिया के इतिहास में बहुत से जायज हक मांगे नहीं मिलते हैं, उन्हें छीनकर लेना पड़ता है, और यह छीनना बलपूर्वक नहीं होता है। जिस तरह गांधी ने अंगे्रजों से आजादी अहिंसा और शांति के साथ छीनकर ली थी, उसी तरह का काम भारत की महिलाएं भी कर सकती हैं। यह कहना राजनीतिक दलों की खालिस और खासी बेईमानी है कि उन्हें लोकसभा सीट के स्तर पर मजबूत महिला उम्मीदवार नहीं मिलतीं। जिस देश में पंचायत स्तर पर पंच और सरपंच के लिए आरक्षित तबके तक की महिला गांव-गांव तक मिल जाती हैं, शहर के एक-एक वार्ड में आरक्षित वर्ग की महिला उम्मीदवार मिल जाती हैं, पालिका अध्यक्ष और म्युनिसिपल के लिए महापौर की महिला उम्मीदवार मिल जाती हैं, लेकिन पार्टियों को विधानसभा और लोकसभा सीटों के लिए महिला उम्मीदवार नहीं मिलेंगी! यह पूरी तरह बेईमानी से भरा हुआ झांसा है, और जो पार्टी एक तिहाई टिकटें महिलाओं को न दें, उनके खिलाफ महिलाओं को एक होकर अपने चुनाव क्षेत्र की किसी महिला को ही वोट देना चाहिए। अगली सरकार बनाने के लिए एनडीए और यूपीए के सारे सपने चकनाचूर हो जाएंगे, और इस चकनाचूर कांच के टुकड़ों से बसंती के पैर क्यों लहूलुहान हों, राजनीतिक गब्बरों के पैर लहूलुहान होने चाहिए। इसी चुनाव में जो पार्टी एक तिहाई महिला उम्मीदवार न रखे, उसके उम्मीदवार की जगह किसी भी अच्छी महिला को वोट देकर गब्बरों को सजा देना चाहिए। और यह काम महज महिलाएं करें यह भी जरूरी नहीं, ऐसे तमाम मर्दों को भी इस काम में हाथ बंटाना चाहिए जिनको किसी महिला ने जन्म दिया है। 


(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 18 मार्च

निजी ईमानदारी से भरपूर एक सादगीपसंद नेता गया

संपादकीय
18 मार्च 2019



गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के गुजरने पर आम लोगों को बहुत तकलीफ हुई क्योंकि खास ओहदे पर पहुंचने के बाद भी वे आम बने हुए थे। आईआईटी से पढ़कर निकलकर मुख्यमंत्री बनने वाले वे पहले हिन्दुस्तानी थे, और उन गिने-चुने सादगीपसंद नेताओं में से एक थे जो मुख्यमंत्री बनकर भी स्कूटर पर चलते थे, सड़क किनारे ठेले पर चाय पी लेते थे, और एयरपोर्ट पर कतार मेें लगकर सुरक्षा जांच करवाते थे, या विमान में सवार होते थे। उन पर निजी भ्रष्टाचार का कोई दाग भी नहीं लगा था, और यही बात उनकी साख बनकर आज लोगों के मन को उदास कर रही है। किसी नेता के गुजरने पर उससे कभी न मिलने वाले, उसके प्रदेश के बाहर के लोग भी अगर इस तरह उदास हैं, और सादगी की याद कर रहे हैं, तो उसका मतलब यही है कि हिन्दुस्तानी सत्ता की राजनीति में सादगी अभी भी मायने रखती है, वजन रखती है। 
आमतौर पर किसी गुजरने वाले के खिलाफ कुछ सोचा भी नहीं जाता, लिखना तो दूर की बात रहती है। फिर गुजरने वाला अगर पर्रिकर जैसा निजी ईमानदारी वाला हो, तो फिर उनकी जिंदगी और उनके काम का कोई बारीक विश्लेषण आसान भी नहीं रह जाता। लेकिन इस मौके पर लोगों को यह भी समझने की जरूरत है कि ईमानदारी दो किस्म की होती है, एक व्यक्तिगत ईमानदारी, और दूसरी संस्थागत ईमानदारी। लोग जिस पार्टी संगठन में काम करते हैं, उसकी बेईमानी को अनदेखा करते हुए बस अपने ही हाथ साफ रखना एक हिसाब से ईमानदारी हो सकती है, और दूसरे हिसाब से नहीं भी हो सकती है। भारत में बहुत से मौकों पर प्रतिरक्षा मंत्री ऐसे व्यक्ति को ही बनाया जाता है जिसकी निजी साख अच्छी हो। कांग्रेस में भी ए.के. एंटोनी को प्रतिरक्षा मंत्री बनाया गया था जो सादगी के लिए भी जाने जाते थे, और निजी ईमानदारी के लिए भी। यहां पर यह समझने की जरूरत है कि ईमानदारी और निजी ईमानदारी में खासा फर्क होता है। लोग सरकार में रहते हुए खुद एक पैसा भी न कमाए, यह निजी ईमानदारी होती है। लेकिन दूसरी तरफ अगर वे अपने सामने आई हुई ऐसी फाईलों की अनदेखी करें जो कि सरकार की संस्थागत बेईमानी या गड़बड़ी दिखाती हो, तो फिर निजी ईमानदारी का कोई महत्व नहीं रह जाता, और संस्थागत ईमानदारी की अनिवार्यता सामने आ जाती है। 
अभी भारत में जो सबसे बड़ा मुद्दा पिछले हफ्तों में हाशिए पर धकेल दिया गया है, वह है फ्रांस की एक कंपनी से रफाल विमान की खरीदी का। अभी तक सुप्रीम कोर्ट के सामने जितने तरह की गोपनीय फाईलों के कागज कुछ लोगों ने जनहित याचिका के तहत पेश किए हैं, वे बताते हैं कि मनोहर पर्रिकर के प्रतिरक्षा मंत्री रहते हुए उनके सामने ऐसी फाईलें आई थीं जिन पर लिखा था कि प्रतिरक्षा मंत्रालय की मोलभाव कमेटी से परे भारत का प्रधानमंत्री कार्यालय फ्रांस की कंपनी या सरकार से ऐसी सीधी बातचीत कर रहा है जिससे कि मोलभाव कमेटी की स्थिति कमजोर हो रही है। इन फाईलों पर मनोहर पर्रिकर के दस्तखत भी थे, लेकिन अपने ही मंत्रालय की इस आपत्ति को उन्होंने अनदेखा किया था, और प्रधानमंत्री कार्यालय की नाजायज दखल का विरोध नहीं किया था। बाद में यह सामने आ रहा है कि इस विमान सौदे में शायद भारत ने बहुत अधिक रेट पर खरीदी की है, और भुगतान किया है। इसके अलावा यह भी सामने आ रहा है कि भारत सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने की अपनी शर्तों को खत्म करके सिर्फ इस एक सौदे के लिए कई किस्म की रियायतें फ्रांसीसी कंपनी या फ्रांस की सरकार को दी है। ये तमाम बातें एक प्रतिरक्षा मंत्री के सामने आई हुई फाईलों पर खासे खुलासे से दर्ज है, लेकिन पर्रिकर ने इसे रोकने की कोई कोशिश की हो, ऐसी बात अब तक सामने आई हुई फाईलों में नहीं दिख रही है। 
अब सवाल यह उठता है कि निजी ईमानदारी तो ठीक है, लेकिन एक सरकार का हिस्सा रहते हुए जब वह सरकार जाहिर तौर पर कुछ गलत करते दिख रही है, तो भी उस गलत के खिलाफ कुछ न करना क्या निजी ईमानदारी के साथ कदमताल कर सकता है? यह एक विरोधाभास है जो कि पर्रिकर के कामकाज में सामने आया है कि रफाल सौदे में देश के सबसे भले के फैसले शायद मोलभाव के दौरान नहीं लिए गए, और मोदी सरकार के पीएमओ की दखल शायद देश के सौदे के हित में नहीं थी। यह बात खुद पर्रिकर के मंत्रालय ने लिखने की जुर्रत की थी, लेकिन मंत्री अपने विभाग के हित में, अपनी वायुसेना के हित में, और अपने देश के हित में पीएमओ का विरोध करने के बजाय चुप रह गए। अब सोचने की बात यह है कि क्या ऐसी चुप्पी को उनकी निजी ईमानदारी को देखते हुए अनदेखा किया जाए, या यह चुप्पी उनकी निजी ईमानदारी को ढांककर रख देती है? किसी गुजरे हुए की जिंदगी अगर सार्वजनिक जीवन के जनता के पैसों से जुड़ी रहती है, तो उसका मूल्यांकन खुलकर होना चाहिए, और पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। किसी की जिंदगी के एक पहलू को छोड़कर उसका कोई सार्थक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। 
और आज तो देश में माहौल ऐसा है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के किए हुए, या नहीं किए हुए कामों को लेकर सच्चे इतिहास को लेकर तो उनको खलनायक साबित करने की कोशिश हो रही है, और यह कोशिश कामयाब न होने पर एक ऐसा इतिहास गढ़ा भी जा रहा है जो कि पल भर में झूठा साबित हो भी जाता है। लेकिन इस पल भर के वक्त में भी नेहरू के आलोचक लोग उस झूठे इतिहास को सच्चा बताते हुए चारों तरफ फैला रहे हैं, और अफवाहों की इस गढ़ी हुई गंदगी को साफ करने में समझदार लोगों का एक सीमित समुदाय मेहनत करते रह जाता है, पूरी गंदगी कभी साफ नहीं हो पाती। ऐसे झूठ के माहौल में जब आधी सदी पहले के इतिहास को गढ़ा जा रहा है, जब कब्र से लोगों को निकालकर बदनाम किया जा रहा है, जब पंचतत्वों में विलीन शरीर को फिर से सभी तत्व जुटाकर बनाया जा रहा है, और उसे खलनायक की तरह चौराहे पर खड़ा करके उस पर पत्थर चलाए जा रहे हैं। ऐसे वक्त में फाइलों और कागजात पर दर्ज बातों को लेकर किसी का सार्थक विश्लेषण जरूरी हो जाता है, और मनोहर पर्रिकर सार्वजनिक जीवन में रहने की वजह से जनता के प्रति जवाबदेह हैं, अपने जाने के बाद भी। इस किस्म के विश्लेषण से यह जवाबदेही उनकी पार्टी की सरकार के बाकी लोगों पर भी आती है कि मनोहर पर्रिकर को ऐसी चुप्पी क्यों साधनी पड़ी थी? 
हमने छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भी देखा है जब पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने प्रदेश के सबसे भ्रष्ट और बदनाम सरकारी विभाग, आबकारी विभाग का मंत्री रामचन्द्र सिंहदेव जैसे एक खाटी ईमानदार को बनाया था जिन पर विपक्ष भी पूरी जिंदगी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा पाया। इसके बाद रामचन्द्र सिंहदेव किसी दुकान के शोकेस के पुतले की तरह इस्तेमाल किए जाते रहे, विभाग उतने ही भ्रष्टाचार के साथ चलाया गया था, महज उसके मुखिया की ईमानदार साख को भुनाया गया था। आज रामचन्द्र सिंहदेव भी इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जब कभी उनके काम का विश्लेषण होगा, तो बेरहम इतिहास उस दौर की उनकी चुप्पी को भी अच्छी तरह दर्ज करेगा, या आज हम यहां पर उसे दर्ज कर ही रहे हैं। 
फिलहाल मनोहर पर्रिकर की जिंदगी से देश भर के नेताओं को कम से कम यह तो सीखने की जरूरत है ही कि गांधी की पार्टी का न होने के बावजूद गांधीवादी किफायत इस देश के प्रति वफादारी की एक अनिवार्य खूबी होनी चाहिए, अगर ऐसे नेता जनता के पैसों पर जीते हैं। गरीब जनता के हक के खजाने से अपने ऊपर ऐशोआराम जुटाना लोकतंत्र के तहत एक जुर्म है, इसके खिलाफ कोई कानून तो नहीं है, लेकिन इतिहास इसे जुर्म की तरह ही दर्ज करता है। मनोहर पर्रिकर की सादगी भी इतिहास में उन्हें हमेशा एक सम्मान दिलाती रहेगी।


(Daily Chhattisgarh) 

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चुनाव आयोग की सीमाओं के भीतर और बाहर की संभावनाएं

संपादकीय
17 मार्च 2019



हिन्दुस्तान में पिछले दशकों में चुनाव आयोग ने दो कामों में कामयाबी पाई है। उत्तर भारत के बहुत से इलाकों में जिस तरह पोलिंग बूथ पर कब्जा करके वोटों की छपाई कर दी जाती थी, वह सिलसिला खत्म हो गया है। अब बलपूर्वक मतदान इतिहास की बात हो गई है। दूसरी बात यह कि धीरे-धीरे आयोग ने अपने स्तर पर कई नियमों को कड़ा किया है, और उससे चुनावी भ्रष्टाचार कुछ हद तक घटा है। यह एक अलग बात है कि देश के बाकी कानून के मुताबिक जहां-जहां भ्रष्ट और दुष्ट नेताओं और पार्टियों को लचीलापन दिखता है, कानून में छेद दिखते हैं, वे अब भी चुनाव में उसका बेजा इस्तेमाल कर लेते हैं, और चुनावी कानून तमाम गड़बडिय़ों को रोकने वाला नहीं हो पाया है। ऐसे में आयोग हर चुनाव के वक्त कुछ न कुछ सुधार की कोशिश करता है, और ताजा बात यह सामने आई है कि चुनाव के 48 घंटे पहले पार्टियों को अपने घोषणापत्र जारी कर देने होंगे, वरना वे घोषणापत्र जारी नहीं कर पाएंगे। और यह बात सच भी है कि लंबे-चौड़े घोषणापत्र पढ़कर, समझकर, वोटर उनका मतलब निकाल सकें, दूसरी पार्टियों के घोषणापत्रों से उसकी तुलना कर सकें, ऐसा दो दिनों में भी होना संभव नहीं है, इसलिए यह समय सीमा एक समझदारी का फैसला है। हमारा तो ख्याल यह भी है कि चुनाव आयोग अगर एक शर्त यह भी लागू कर दे कि पार्टियों को पिछले चुनाव का अपना घोषणापत्र नए घोषणापत्र के साथ अनिवार्य रूप से जोडऩा होगा, तो वह एक और अच्छा सुधार हो सकता है, और वोटर यह देख सकते हैं कि पांच बरस पहले की घोषणाओं पर पार्टियों में कितना अमल किया है। 
लेकिन इसके अलावा आज के चुनावी माहौल में हिन्दुस्तान में जो बात सबसे भयानक दिख रही है, वह है दलबदल की। कांग्रेस और भाजपा जैसी देश भर में फैली हुई दो सबसे बड़ी पार्टियां आज जिस अश्लील तरीके से एक-दूसरे के नेताओं से अपनी पार्टी में ला रही हैं, उन्हें उम्मीदवार बना रही हैं, नेताओं के बच्चों को लेकर भी छीनाझपटी चल रही है, वह परले दर्जे की अनैतिक बेईमानी का मामला है। भारत में एक ऐसे चुनाव सुधार की जरूरत है जिससे चुनाव के छह महीने पहले लोग किसी पार्टी में शामिल हो जाएं, या पार्टी बदलना हो तो बदल लें। ऐसा न होने पर आखिरी दिन तक लोग टिकट के चक्कर में पार्टी छोड़ते हैं, और दूसरी पार्टी जाकर रातों-रात वहां उम्मीदवार हो जाते हैं। केरल में अभी चार दिन पहले 20 बरस पुराने एक कांग्रेसी नेता ने पार्टी छोड़ी, और भाजपा में जाकर उम्मीदवार बनने की उम्मीद लगाकर बैठे हैं। इसके चार दिन पहले तक वे भाजपा के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में ट्वीट किए जा रहे थे। अभी यह बात हमारे सामने साफ नहीं है कि दलबदल पर ऐसी कोई रोक चुनाव आयोग अपने स्तर पर लगा सकता है, या इसके लिए अलग से एक संविधान संशोधन की जरूरत होगी, लेकिन जहां से भी हो सके इसके लिए पहल करनी चाहिए, ताकि अठारहवीं सदी के गुलामों की मंडी की तरह अब मंडियां न लगें, और उम्मीदवारों की खरीद-फरोख्त न हो। 
एक दूसरे चुनाव सुधार की जरूरत यह है कि सीमा से कई गुना अधिक खर्च करना, नोट और दारू बांटना, साडिय़ां और दूसरे तोहफे बांटना इतना आम हो गया है और इतने भयानक स्तर पर पहुंच गया है कि उस पर कोई भी रोक लग नहीं पा रही है। नतीजा यह हो रहा है कि लोग चुनावी जीत को एक किस्म से खरीद ही लेते हैं। यह सुधार कैसे हो सकेगा, इस पर संसद और विधानसभाओं के बाहर चर्चा शुरू होनी चाहिए क्योंकि ये दोनों संसदीय मंच तो इसी किस्म से जीत खरीदकर आने वाले लोगों से भरे हुए हैं, और उनके लिए पांच बरस की जनसेवा के मुकाबले ऐसी खरीदी अधिक आसान बात है क्योंकि मंडी में उनसे कमजोर और गरीब खरीददार तो वैसे भी कोई संभावना रखते नहीं हैं। लेकिन यह सिलसिला भारतीय लोकतंत्र को खोखला कर चुका है, और पिछले कई चुनावों के बाद जीतकर आने वाले लोगों की संपत्ति के आंकड़े देखें तो यह साफ दिखता है कि पहले जितने लखपति हुआ करते थे, आज संसद और विधानसभाओं में उतने करोड़पति हैं, और पहले जितने करोड़पति होते थे, उससे अधिक अब अरबपति हैं। ऐसे लोगों से भरे हुए सदन कभी इस देश की गरीब जनता की तकलीफों को न समझ पाएंगे, न सुलझा पाएंगे। लेकिन चुनाव आयोग की सीमा एक जगह खत्म हो जाती है, उसके आगे का चुनाव सुधार करने के लिए संसद और सुप्रीम कोर्ट की जरूरत पड़ेगी। और यह काम भी तभी हो सकेगा जब जनता का दबाव इन दोनों पर रहेगा। एक आखिरी बात जो यहां पर जरूरी है और दशकों से चर्चा में बनी हुई है, वह है महिला आरक्षण की। राजनीतिक दल आमतौर पर मर्दाना दबदबे या मर्दाना कब्जे वाले हैं, और इस वजह से संसद में महिला आरक्षण विधेयक पास नहीं हो पा रहा है। इसके लिए भी देश में एक नया जनमत खड़ा करने की जरूरत है क्योंकि ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने अपनी पार्टी की 30 फीसदी टिकटें महिलाओं को देने की घोषणा की है, और पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने 40 फीसदी। बाकी पार्टियों के ऊपर जनता को दबाव बनाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

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