दीवारों पर लिक्खा है, 30 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अप्रैल

कांग्रेस के अपने सांसदों का अधिक होना किस काम का होगा अगर...

संपादकीय
30 अप्रैल 2019



इन दिनों हिंदुस्तान में जारी आम चुनाव इस मायने में बहुत दिलचस्प हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गठबंधन की जीत, और उनके फिर प्रधानमंत्री बनने का दावा करने वाले राजनीतिक विश्लेषकों के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जिन राज्यों में भाजपा-एनडीए की सीटें कम होते दिख रही हैं, उनकी भरपाई कैसे और कहां से होगी। उनका विश्लेषण बड़ा सरल और सहज है-जीतेगा तो मोदी ही।

अब ऐसे सरल विश्लेषण की कोई काट मुमकिन नहीं होती है क्योंकि अंधविश्वास का भला क्या जवाब हो सकता है? लेकिन मोदी से परे अगर देखें तो कांग्रेस पार्टी की सत्ता में वापिसी की उम्मीद एक और बड़ा अंधविश्वास लगती है क्योंकि देश के अलग-अलग प्रदेशों में कांग्रेस ने जिस अंदाज में अकेले चलने का फैसला लिया है, वह एक ऐसे अतिआत्मविश्वास से भरा हुआ लगता है जो शायद पूरा न हो सके। चुनावी नतीजे कई बार तमाम भविष्यवाणियों को खारिज करके जनता के एक अनोखे विवेक का सुबूत पेश करते हैं, इसलिए हम अभी जीत-हार पर नहीं जा रहे, महज रूख और तौर-तरीकों की बात कर रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी के बारे में आज ही किसी ने ट्वीट किया है कि वह दिल्ली में आम आदमी पार्टी से लड़ रही है, केरल में वामपंथियों से लड़ रही है, यूपी में एसपी-बीएसपी से लड़ रही है, बंगाल में लेफ्ट-तृणमूल से लड़ रही है, इसके बाद क्या राहुल गांधी में बीजेपी से लडऩे की ताकत और उसका वक्त बाकी है? यह सवाल एक हिसाब से जायज है क्योंकि कांग्रेस का रूख राहुल गांधी में एक अभूतपूर्व अंधविश्वास का दिख रहा है कि बिना व्यापक गठबंधन के भी वह बहुत सी सीटें जीत सकती है, इतनी अधिक सीटें जीत सकती है कि एनडीए-मोदी सत्ता से बाहर रहें, और कांग्रेस बाकी पार्टियों के बीच सबसे बड़ी और पहली पसंद रहे। सपने देखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब सपनों को सही देखने का मौका पांच बरस में एक बार मिलता है, तो सपनों के लायक खाट-बिस्तर का इंतजाम करने से परहेज नहीं करना चाहिए। 

भाजपा और एनडीए की गलतियां गिनाने के मौके दिन में चार बार आते हैं। आज कांगे्रस को तौला जाए जिसने कि बिहार के बेगूसराय में सीपीआई के कन्हैया कुमार को मोदी-एनडीए के खिलाफ एक बड़ा प्रतीक बनाने का मौका खो दिया है, और बिहार के स्थानीय समीकरणों को देखते हुए लालू की पार्टी को भी ऐसा बेहतर लग रहा होगा, लेकिन यह देश में दूरदर्शिता, दरियादिली, और उदार नजरिए के खिलाफ रूख है, और इसके दाम एक सीट के दाम से खासे अधिक चुकाए जा रहे हैं। कन्हैया कुमार की यह एक जीत संसद के भीतर और बाहर भाजपा-एनडीए के खिलाफ एक बड़ी फतह होती, लेकिन वह मौका गंवा दिया गया है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ खींचतान, मोलभाव इतने लंबे चले कि कांग्रेस ने वहां भी अपनी संभावनाएं खो दी हैं। दरअसल कांग्रेस का रूख कुछ ऐसा दिख रहा है कि देश में मोदी के खिलाफ, और राहुल के पक्ष में एक बड़ी लहर चल रही है, और कांग्रेस को औरों से हाथ मिलाकर चलने, कदम मिलाकर, कंधे जोड़कर चलने की कोई खास जरूरत है नहीं।

यह तो चुनावी नतीजे बताएंगे कि कांग्रेस का आत्मविश्वास सही था या उसकी आत्ममुग्धता आत्मघाती थी, लेकिन इन नतीजों से परे एक बात जो आज से कही जा सकती है वह यह कि कांग्रेस हाशिए पर से निकलकर पेज के बीचों-बीच आकर खड़ी है, और उसे अनदेखा करना, कम आंकना अब मुमकिन नहीं है। यह एक अलग बात है कि गठबंधन के इस युग में बाहुबलियों को भी पूरे देश की चुनौतियों को एक साथ देखते हुए साथी बनाने पड़ते हैं, साथ रखने पड़ते हैं, और कांग्रेस के हिस्से चुनाव के बाद यह मलाल भी आ सकता है कि वह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनने के बावजूद पर्याप्त बड़े गठबंधन की मुखिया नहीं बन पा रही है। आज बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि कांग्रेस ने जगह-जगह क्षेत्रीय गठबंधन की जरूरतों को अपने निजी फायदे के अंदाज से अनदेखा किया है कि उसे खुद अधिक से अधिक सीटें मिल जाएं। लेकिन अगर भाजपा-एनडीए विरोधी गठबंधन भाजपा-एनडीए से बड़ा नहीं बन पाया, तो कांग्रेस के निजी सांसद अधिक होना भी किस काम का रहेगा? हो सकता है कि भाजपा विरोधी पार्टियों से परे अकेले चलती हुई कांग्रेस कुल मिलाकर भाजपा का नफा ही कर जाए। खैर, कांग्रेस ने अपने भविष्य के बारे में बेहतर सोचा होगा यही माना जा सकता है, और नतीजों का इंतजार किया जा सकता है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 29 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अप्रैल

खराब लोग खारिज किए जाएं, और बेहतर लोग बढ़ावा पाएं

संपादकीय
29 अप्रैल 2019



देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी ने अभी एक वीडियो-बयान में मुंबई के एक कांग्रेस उम्मीदवार, मिलिंद देवड़ा का समर्थन किया। उन्हें आमतौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करीबी माना जाता है, लेकिन हो सकता है कि मिलिंद में उन्हें अधिक संभावनाएं दिखी हों, और यह एक चतुर कारोबारी का दोनों नावों पर पांव रखने का एक तरीका भी हो। भारतीय राजनीतिक-कारोबार के इतिहास में यह बड़ी अच्छी तरह दर्ज है कि इन दोनों के पिता के बीच बड़ा घरोबा रहा है। धीरू भाई अंबानी को देश में कांग्रेस सरकार की नीतियों को ढालकर सबसे अधिक फायदा पाने का श्रेय जाता है, और मुरली देवड़ा को मुंबई में कांग्रेस का सबसे बड़ा चंदा-इंतजामअली माना जाता था। इसलिए दूसरी पीढ़ी के बीच भी अगर ऐसा ही रिश्ता बना रहता है तो वह बड़ा स्वाभाविक कारोबारी गठबंधन ही रहेगा। लेकिन ऐसे गठबंधन और सत्ता-कारोबार के लेन-देन पर लिखने को नया कुछ नहीं है, आज यहां लिखने का मकसद एक दूसरी घटना से पैदा हुआ। पंजाब में बसे हुए एक रिटायर्ड डिप्लोमेट के सी सिंह ने ट्विटर पर कांगे्रस उम्मीदवार मनीष तिवारी के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है कि वे इस चुनाव में किसी पार्टी का समर्थन नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे सबसे अच्छे नेताओं का समर्थन कर रहे हैं। क्योंकि देश की संसद को उनकी जरूरत है, फिर चाहे वे किसी भी पार्टी के हों। सोशल मीडिया पर कुछ और लोग भी हैं जो देश भर के कुछ चुनिंदा लोगों को वोट देने की अपील कर रहे हैं, और ऐसे उम्मीदवार अलग-अलग पार्टियों के हैं, या निर्दलीय भी हैं।

हिंदुस्तान में कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जिसे डाले गए वोटों में से औसतन तीस-चालीस फीसदी से अधिक मिलें। ऐसे में यह जाहिर रहता है कि संसद में बहुत सी पार्टियों के लोग जाएंगे ही। ऐसा लोकतंत्र के अपने भले के लिए है क्योंकि एक दानवाकार संसदीय बाहुबल पाए हुए राजीव गांधी की सरकार के बूटतले शाहबानो का कुचलना देश के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है, और वैसा ही दानवाकार बाहुबल पाए हुए नरेन्द्र मोदी सरकार की नोटबंदी भी लोगों ने देखी है जो कि देश के लोगों पर केंद्र सरकार का सबसे बड़ा सर्जिकल स्ट्राइक रहा है। ऐसे में कुछ लोग तो ऐसे जरूर हो सकते हैं जिनकी प्रतिबद्धता किसी पार्टी के लिए है, और ऐसे धार्मिक लोगों को नास्तिक बनाने की किसी को सोचना नहीं चाहिए। लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि हर चुनाव में कभी पार्टी देखकर, कभी उम्मीदवार देखकर, और कभी देश-प्रदेश के मुद्दे देखकर वोट डालते हैं। दरअसल यही तबका देश की या प्रदेश की सरकार तय करने वाला रहता है क्योंकि दोनों ओर के प्रतिबद्ध वोट तो तकरीबन पार्टियों के साथ बने रहते हैं। खुले दिमाग वाला, बिना पूर्वाग्रह वाला, बिना पार्टी-प्रतिबद्धता वाला यह तबका बिना झिझक या आत्मग्लानि के हर बार अपना उम्मीदवार तय करता है। इसलिए इस तबके की अगर बात करें तो वह दिल-दिमाग से आजाद है, और वह हर बार नए-नए उम्मीदवार को या नई-नई पार्टी को वोट दे सकता है।

एक वक्त था जब लोग अटल बिहारी वाजपेयी को जनसंघ या भाजपा से बेहतर मानते थे और कहते थे कि वे एक खराब पार्टी में एक अच्छे  इंसान हैं। इसीलिए आधी-चौथाई सदी तक अटलजी जनसंघ और भाजपा के पोस्टर-बॉय बने रहे, और उनकी रौशनी दिए से अधिक रही, और उनकी खुशबू कमल से अधिक। बहुत से लोग जो आमतौर पर जनसंघ-भाजपा को वोट नहीं देते, वे भी अटलजी को वोट दे देते थे। अब ऐसे में एक रास्ता यह दिखाई पड़ता है कि सबसे अच्छे उम्मीदवार को वोट देकर संसद को अच्छे लोगों से भरा जाए, फिर वे चाहे किसी भी पार्टी के हों। दूसरी तरफ पार्टी और विचारधारा के प्रति निष्ठा रखने वाले लोगों को यह बात कभी नहीं सुहा सकती और वे पार्टी के निशान पर ही वोट देंगे, भले उन्हें इस बात का पूरा एहसास हो कि उनका वोट भी जमानत बचाने में मददगार नहीं होगा।

आज के माहौल में बहुत से लोग कन्हैया कुमार को वोट देने की बात लिख रहे हैं फिर चाहे वे कम्युनिस्ट उम्मीदवार हों। भोपाल में दिग्विजय सिंह ने बयान दिया है कि वे अपने प्रचार के लिए कन्हैया कुमार को बुलाएंगे, जबकि यह बात अच्छी तरह दर्ज है कि बेगूसराय में कन्हैया के खिलाफ कांग्रेस-राजद गठबंधन का उम्मीदवार है, और पूरे बंगाल में कांग्रेस वाममोर्चे के खिलाफ लड़ ही रही है, पूरे केरल में भी यही नजारा है। लेकिन भोपाल को जिस तरह राष्ट्रवाद के नाम पर एक घोर साम्प्रदायिकता का मोर्चा बना दिया गया है, उसे देखते हुए यह बात पूरी तरह अटपटी नहीं लगती कि कन्हैया कुमार एक व्यापक सैद्धांतिक हित को देखते हुए साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ दिग्विजय सिंह का प्रचार करने भोपाल आएं। इससे यह बात भी लगती है कि देश में जगह-जगह अलग-अलग पार्टियों के बेहतर इंसानों को छांटकर उनका समर्थन करने की ऐसी असंगठित या संगठित कोशिश हो सकती है जो कहीं दिल्ली में स्कूलों को आसमान तक पहुंचाने वाली एक महिला को संसद तक पहुंचाए, या कहीं किसी और काबिल विशेषज्ञ को जीतने में मदद करे। जो प्रतिबद्ध हैं वे बने रहें, लेकिन जो किसी सोच के साथ सात फेरे न ले चुके हैं, वे लोग ऐसी कोशिश कर सकते हैं कि खराब लोग खारिज किए जाएं, और बेहतर लोग बढ़ावा पाएं। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के बाद भी बड़े-बड़े लोग पूरे बचे हुए...

संपादकीय
28 अप्रैल 2019



छत्तीसगढ़ में पन्द्रह बरस की भाजपा सरकार के जाने, और कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार के आने के साथ ही कई विभागों के ऐसे मामलों की जांच शुरू हुई है जिस पर जांच की मांग कांग्रेस ने विपक्ष में रहते हुए भी की थी। कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में भी इन विभागों में बहुत बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, और ऐसे में यह जायज और जरूरी ही था कि सत्ता में आने पर कांग्रेस अपनी मांग और अपने वायदे के मुताबिक इन विभागों की जांच करवाए। पहली नजर में कांग्रेस ने जिन विभागों के जिन मामलों की जांच शुरू करवाई है, जुर्म दर्ज करवाया है, और विशेष जांच दल बनाए हैं, उन सबमें भ्रष्टाचार दिखता है। पिछली सरकार के रहते हुए भी कुछ चर्चित विभागों में बड़े संगठित और योजनाबद्ध भ्रष्टाचार की बात इतनी जानकारियों के साथ सामने आती थीं कि लोगों को उन पर भरोसा था। और कांग्रेस की चुनावी जीत में थोड़ा बहुत योगदान इस जनधारणा का भी था कि रमन सरकार भ्रष्ट है।

अब जब राजधानी के सबसे बड़े सरकारी सुपरस्पेशलिटी डीकेएस हॉस्पिटल के कायाकल्प में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च में बड़ी गड़बड़ी सामने आ रही है तो इस अस्पताल के इंचार्ज बनाए गए तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता शक के घेरे में हैं। वे अब तक पुलिस पूछताछ से बचकर चल रहे हैं, और हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत पा चुके हैं, लेकिन पूछताछ महज वक्ती बात है जो कि आज नहीं तो कल हो ही जाएगी। अब इस जुड़े हुए कुछ बुनियाद सवाल उठते हैं जिन पर सरकार को डॉ. पुनीत गुप्ता से परे भी जवाब लेना होगा। सरकारी कामकाज में मंत्रियों का जिम्मा एक सीमा तक होता है, और उसके बाद विभागीय अफसर जिम्मेदार होते हैं। डीकेएस अस्पताल को जिस मनमाने तरीके से नया किया गया, क्या उसके लिए डॉ. पुनीत गुप्ता को सरकार में बैठे आला अफसरों ने अधिकार दिए थे? यह रियायत दी थी कि वे नियमों की अनदेखी करके भी बिना किसी प्रक्रिया के इस अस्पताल को अपनी मर्जी से ढाल सकते हैं? और जब इस अस्पताल को लेकर पहले भी लगातार स्वास्थ्य-सामाजिक कार्यकर्ता सरकार के पास भ्रष्टाचार की शिकायतें लेकर जाते रहते थे, तब उस समय के बड़े अफसरों ने क्या किया? क्या शिकायतों की अनदेखी करना अपनी जिम्मेदारी की अनदेखी करना नहीं था? सरकार अगर डीकेएस अस्पताल के भ्रष्टाचार के गुनहगार तय करना चाहती है, तो स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार बड़े अफसरों की जिम्मेदारी तय किए बिना यह करना जायज नहीं होगा।

ठीक ऐसा ही हाल आबकारी विभाग का है जहां पर एक मंझले दर्जे के संविदा अधिकारी पर छापेमारी हो रही है कि उसने हजारों करोड़ का नाजायज फायदा कुछ चुनिंदा लोगों को पहुंचाया और सरकार को चूना लगाया। परले दर्जे के भ्रष्ट अफसर होने की साख वाले इस आदमी को रिटायर होने के बाद सरकार में बैठे किन लोगों ने नौ-नौ बार संविदा नियुक्ति दी इसकी भी जांच होनी चाहिए, और जिस तरह से इस एक संविदा-अफसर ने सरकार की एक सबसे बड़ी कमाई वाले विभाग को हांका है, वह न तो तत्कालीन आबकारी मंत्री की मर्जी के बिना हो सकता था, और न ही यह भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री की जानकारी के बिना हो रहा था। आबकारी विभाग, और शराब कारोबार के लिए बनाए गए निगम संगठित भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा नमूना बन गए थे, और आज उस बड़े ढांचे में बीच के एक पुर्जे को घेरकर अगर यह माना जा रहा है कि भ्रष्टाचार की सजा दी जाएगी, तो यह एक खुशफहमी से अधिक कुछ नहीं।

तीसरा चर्चित मामला नागरिक आपूर्ति निगम का है जिसमें फिर एक बहुत बड़ा संगठित भ्रष्टाचार चल रहा था, उस पर पिछली सरकार के चलते ही छापा पड़ा, दस्तावेज जब्त हुए, वैध-अवैध टेलीफोन टैपिंग हुई, गिरफ्तारियां हुईं, करोड़ों की नगदी जब्त हुई, और कांग्रेस पार्टी तबसे लेकर अब तक रमन सिंह के अफसरों और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार की तोहमत लगाते आई है। लेकिन आज इस मामले की जांच उतने ही नए शक से घिर गई है जितने शक से पिछले सरकार के वक्त इसी भ्रष्टाचार की जांच शक से घिरी हुई थी। अब तक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से लेकर मीडिया तक में आए बयानों को देखा जाए, तो यह बात लगती है कि कुछ चुनिंदा लोग घिर रहे हैं, और कुछ चुनिंदा लोग घेरे से बाहर निकल रहे हैं। जिस आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने नान का मामला पकड़ा था, उसके तत्कालीन मुखिया और राज्य के सबसे विवादास्पद आईपीएस अफसर मुकेश गुप्ता ने नई सरकार की जांच को अदालत में कड़ी चुनौती दी है, और अदालत ने सरकार पर कई किस्म की बंदिशें भी लगाई हैं। 

इन तीन मामलों को देखें तो यह बात लगती है कि इन तीनों के गुनहगार ठहराए जा रहे लोगों के ऊपर के अफसरों और मंत्रियों की जिम्मेदारी पर अब तक कोई चर्चा नहीं हो रही है। बड़े जुर्म और बड़े भ्रष्टाचार पर इंसाफ के लिए सरकार का मौजूदा रूख नाकाफी है, और इस सरकार को पिछली सरकार के और बड़े लोगों तक पहुंचना होगा, वरना जिम्मेदारी नीचे के स्तर तक ही आकर रूक जाएगी। इन तीनों भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी विभागीय सचिवों, विभागीय मंत्रियों, और मुख्यमंत्री तक पहुंचे बिना नहीं रूख सकती। ये तीनों भ्रष्टाचार इन तीनों स्तर के लोगों की जानकारी, सहमति, और भागीदारी के बिना हुए नहीं दिखते हैं, और इसलिए सरकार को जांच का दायरा बढ़ाना चाहिए। कानून में साजिश में भागीदार लोगों के लिए 120-बी जैसी धारा रखी गई है, और बहुत जाहिर तौर पर यह दिख रहा है कि यह जिन लोगों पर लागू होनी चाहिए, वे सारे बड़े लोग अब तक बचे हुए हैं। इस देश में बोफोर्स के चौथाई सदी बाद भी यह तोप महज चुनावी मुद्दा बनी रही, और उसका कोई भ्रष्टाचार किसी सजा तक नहीं पहुंच सका। इस दौरान कई गैर कांगे्रस सरकारें भी केंद्र पर काबिज रहीं, लेकिन बात बनी नहीं। छत्तीसगढ़ में भी ये चर्चित भ्रष्टाचार महज खबर बनकर न रह जाएं, या महज कुछ छोटे लोगों को सजा दिलाकर दब न जाएं।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अप्रैल

कन्हैया कुमार की शक्ल में, भारतीय लोकतंत्र देख रहा है सब कुछ अभूतपूर्व, अनोखा

संपादकीय
27 अप्रैल 2019



बिहार के बेगूसराय से सीपीआई उम्मीदवार कन्हैया कुमार को देश भर की खबरों में जितनी जगह मिल रही है, उसे देखकर देश के बड़े से बड़े नेता को रश्क ही हो सकता है। एक उम्मीदवार के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी खबरों में उतनी जगह नहीं मिली, और न ही राहुल गांधी को। एक बिल्कुल ही नौजवान, फक्कड़, सड़कछाप, और नफरतजीवियों द्वारा टुकड़े-टुकड़े गैंग के सरदार की तरह बदनाम किया गया कन्हैया कुमार कई मायनों में एक बिल्कुल ही अलग किस्म की मिसाल है। वह अपनी खुद की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी एक अनोखा चेहरा और किरदार है क्योंकि किसी ने ऐसा कोई कम्युनिस्ट उम्मीदवार देखा नहीं था जिसके लिए इंटरनेट पर चंदा इक_ा हो, और जो चुनाव आयोग की सीमा के भीतर ही खर्च करे, और उतना पैसा जुट भी जाए।

देश के सबसे विख्यात वामपंथी तेवरों वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार को कुछ बरस पहले देश ने तब जाना जब कन्हैया पर तोहमत लगी कि वे जेएनयू में देश के खिलाफ लगने वाले नारों की भीड़ में मौजूद थे। इस बात को लेकर कन्हैया और उनके साथियों पर देश के साथ गद्दारी की रिपोर्ट लिखाई गई, उन्हें गिरफ्तार किया गया, और बाद में अदालत के सामने यह साबित हुआ कि वैसे नारों वाले वीडियो गढ़े गए थे, और हकीकत में वैसे कोई नारे लगे नहीं थे। लेकिन जिनका कारोबार नफरत की बुनियाद पर ही खड़ा है, वे आज भी अपने भाषणों में, पे्रस कांफे्रंस में, और टीवी डिबेट में कन्हैया को टुकड़े-टुकड़े गैंग ही करार देते हैं। और फिर अब तो बेगूसराय से कन्हैया के सामने भाजपा के एक ऐसे हमलावर तेवरों वाले, साम्प्रदायिकता को फैलाने वाले गिरिराज सिंह उम्मीदवार हैं जिनकी अकेली खूबी नफरत खिला-खिलाकर दानवाकार बनाए गए हिंसक-हिंदुत्व की है। ऐसे गिरिराज सिंह के सामने कल का छोकरा वामपंथी धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक तो है ही, लेकिन कन्हैया कुमार की बातें वामपंथ की परंपरागत प्राचीन डिक्शनरी से बाहर की हैं, उनकी पूरी जुबान सड़क के आम इंसानों की है, उन्हीं की जुबान में। उनके इस अंदाज से बुजुर्ग वामपंथियों का एक बड़ा तबका बेचैन हो सकता है क्योंकि बिहार के लेनिनग्राद कहा जाने वाला बेगूसराय कन्हैया के भाषणों में न माक्र्स को पाता, न लेनिन को, और न ही वे वामपंथ शब्द का इस्तेमाल करते। ऐसे में कल कन्हैया कुमार से एक सवाल यह भी किया गया कि उनके प्रचार में वामपंथ कहीं भी नहीं दिख रहा है!

दरअसल किसी सोच को सामने रखने के लिए उसकी परंपरागत और एक्सपायर हो चुकी शब्दावली का इस्तेमाल कहीं जरूरी नहीं है। भारतीय राजनीति, लोकतंत्र, और चुनाव में कन्हैया कुमार ने जनता के मुद्दों को जनता की जुबान में इतने सरल तरीके से सामने रखा है कि वह किसी और वामपंथी नेता के लिए मुमकिन नहीं लगता है। उनकी जीत-हार एक त्रिकोणीय संघर्ष का नतीजा रहेगी क्योंकि देश की नौजवान पीढ़ी के प्रतीक बनकर उभरे, भाजपा के घोर विरोधी, और धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय की वकालत कर रहे कन्हैया कुमार के लिए भी कांगे्रस-लालू ने यह एक सीट छोडऩा भी ठीक नहीं समझा। यह लालू की पार्टी और कांगे्रस, इन दोनों की एक परले दर्जे की तंगदिली भी है, और तंगनजरिए का सुबूत भी है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी भाजपा के खिलाफ देश भर में सबसे सरल जुबान में सबसे आक्रामक बातें बोलने वाले कन्हैया कुमार के महत्व को इन दोनों पार्टियों ने जिस तरह नकारा है, वह देश के बहुत से बुनियादी मूल्यों को नकार देना है। एक सीट का मोह इन दोनों पार्टियों की बुनियादी समझ को भी उजागर करता है। आज देश भर से बिना दलीय-प्रतिबद्धता के भी जितने लोग कन्हैया कुमार के प्रचार के लिए बेगूसराय पहुंच रहे हैं, वैसा हाल के चुनावों में किसी और उम्मीदवार के लिए याद नहीं पड़ता। उत्तर भारत में चुनावी रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे किसी भी रिपोर्टर का पेट तब तक नहीं भर सकता जब तक वे इस चुनाव में कन्हैया से बातचीत दर्ज न कर लें। वामपंथी पार्टियां देश में अपनी बुनियाद काफी कुछ खो चुकी हैं, लेकिन कन्हैया कुमार एक ऐसा प्रतीक बनकर उभर रहा है जो कि अपनी पार्टी और उसकी सोच, उसके सिद्धांतों, इन सबको एक नई ऊर्जा दे सकता है, एक नया तौर-तरीका दे सकता है। एक कम्युनिस्ट उम्मीदवार बिना इश्तहारों के, मीडिया को रिश्वत दिए बिना, महंगे चुनाव प्रचार के बिना किस तरह मुफ्त खबरों में आ सकता है, और नौजवान पीढ़ी की उम्मीद जगा सकता है, यह देखने लायक है। इस देश की संसद में अगर किसी एक आवाज की सबसे अधिक जरूरत है, तो वह कन्हैया कुमार की है क्योंकि वह न सिर्फ भारतीय लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों की वकालत कर रहा है, बल्कि वह देश के आर्थिक और सामाजिक मोर्चों पर भी इंसाफ की बात कर रहा है, एक अभूतपूर्व जुबान में, एक अभूतपूर्व तेवर के साथ, और एक अभूतपूर्व संभावना के साथ भी।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल

बलात्कारी-आसाराम का बेटा भी बलात्कारी साबित

संपादकीय
26 अप्रैल 2019



बलात्कार के जुर्म में कैद काट रहे एक वक्त बापू कहलाते और आज आसाराम नाम के आम कैदी के बेटे को भी बलात्कार के जुर्म में आज गुनहगार ठहराया गया है। अदालत इसकी सजा चार दिन बाद सुनाएगी। जैसा कि दुनिया आसाराम की ताकत के बारे में जानती है, निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हर जगह देश के सबसे महंगे वकीलों में आसाराम को बचाने की, छुड़ाने की, जमानत की तमाम कोशिशें कर डाली, लेकिन उसके खिलाफ सुबूत इतने पक्के थे कि कोई ताकत काम नहीं आई, और वह जेल काट रहा है। आज गुजरात की एक जिला अदालत ने उसके बेटे नारायण साईं को एक साध्वी से बलात्कार के मामले में कुसूरवार ठहराया है। बाप-बेटे की इस जोड़ी ने 1997 से 2006 के बीच अहमदाबाद के अपने आश्रम में दो बहनों से कई बार बलात्कार किया था। बड़ी बहन से बलात्कार के जुर्म में आसाराम को कैद हुई, और छोटी बहन से बलात्कार का गुनाह अब बेटे के खिलाफ साबित हुआ है। बलात्कार में मदद करने के लिए आसाराम की बीवी और उसकी बेटी सहित चार और महिलाओं के नाम भी मुकदमे में दर्ज हैं। आसाराम को राजस्थान की एक अदालत ने नाबालिग से बलात्कार के लिए उम्रकैद सुनाई है। दिलचस्प बात यह है कि आसाराम के खिलाफ चले बलात्कार-मामले में जाने कितने ही गवाहों पर हमले हुए, और कम से कम तीन गवाहों की हत्या कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम के खिलाफ जांच को कमजोर करने के लिए गुजरात की पुलिस को भी फटकारा था। 

धर्म और आध्यात्म के नाम पर बाप-बेटे की यह टोली जाने कितने ही और बलात्कार कर चुकी होगी, लेकिन हिन्दुस्तानी अदालती ढर्रे को देखते हुए बहुत अधिक महिलाओं या लड़कियों का यह हौसला नहीं होता है कि वे पुलिस की पूछताछ और वकीलों के अदालती सवालों का सामना करते हुए समाज में भी बहिष्कार और प्रताडऩा झेलें, और जब मामला आसाराम जैसे बलात्कारी का हो तो जान का खतरा भी खुलकर सामने आया ही है। ऐसे में जिन गिने-चुने लोगों ने यह हौसला दिखाया है उनकी शिनाख्त बिना भी उनकी तारीफ की जानी चाहिए कि ईश्वर के नाम बलात्कार करने वाले ऐसे अरबपति-खरबपति को उम्रकैद दिलवाने का काम उन्होंने किया है। ऐसे पाखंडी और बलात्कारी-बाबाओं का भांडाफोड़ होने से समाज में ऐसे बाकी बलात्कारियों के हाथ बाकी लड़कियों, महिलाओं, और बच्चों की दुर्गति होना कम होती है। 

लेकिन हम छत्तीसगढ़ में लगातार यह देखते हैं कि आसाराम के भक्तजन कभी सरकारी स्कूलों में आसाराम की किताबें बांटते हैं, कभी सार्वजनिक जगहों पर पंडाल लगाकर आसाराम के बैनर लगाकर कार्यक्रम करते हैं, और कभी आसाराम की शोभायात्रा निकालते हैं। सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहिए, और ऐसे सजायाफ्ता कैदियों को महिमामंडित करने की सार्वजनिक कोशिशों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। सजा पाए हुए जो कैदी हैं, उनका गौरवगान करते हुए उनके जो अनुयायी सरकारी जगह पर कार्यक्रम करते हैं, उस पर पूरी रोक लगनी चाहिए। नाबालिग बच्चों के साथ बलात्कार करने वाले ऐसे बाप-बेटे की पूजा करना भी आज जिन मूर्ख मां-बाप को सही लगता है, जो अपने बच्चों को साथ लेकर आसाराम के पर्चे बांटते हैं, उनकी समझ को धिक्कार है। चूंकि मूर्खता के खिलाफ भारत में कोई कानून नहीं बना है, इसलिए बच्चों के बलात्कारी की भक्ति करने का काम अपने बच्चों के साथ भी लोग कर सकते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती, ऐसे बच्चों को उनके मां-बाप की मूर्खता से बचाया नहीं जा सकता। लेकिन सार्वजनिक जगहों पर जब मुजरिमों का गौरवगान किया जाए, तो उस पर रोक लगाना सरकार की जिम्मेदारी है। समाज के दूसरे तबके के लोगों को भी ऐसे बलात्कारी-बाबाओं का पर्दाफाश करने के लिए सामने आना चाहिए, और जहां कहीं आसाराम-भक्त अपने बच्चों के साथ ऐसी भक्ति दिखाते नजर आएं, समाज के दूसरे तबके के लोगों को जाकर ऐसे मां-बाप को समझाना चाहिए। यह एक सामूहिक-सामाजिक-सरोकार की बात है, और सरकार अपना जिम्मा पूरा करे, और समाज भी बलात्कारी का गौरवगान रोकने के लिए आगे आए। 

ऐसे ही बड़े-बड़े मामलों में जब अदालत से सजा होती है, तो आम लोगों का भरोसा अदालतों पर बढ़ता है कि सामाजिक और राजनीतिक ताकत से भी ऐसे पाखंडी गुरू बच नहीं सकते, और न ही देश के सबसे महंगे वकील सबसे बेबस लोगों को तोड़ सकते, अदालत का रूख मोड़ सकते। बलात्कारी-आसाराम के बलात्कारी बेटे का गुनहगार साबित होना देश के लिए एक खुशी की बात है क्योंकि समाज से ऐसे बलात्कारियों के हटने पर ही बाकी लड़कियां, महिलाएं, बच्चे सुरक्षित रहेंगे। देश के बाकी बाबाओं पर भी बारीक नजर रखने की जरूरत है, ताकि उनका कोई जुर्म हो, तो साबित हो सके।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

इन तकनीकों और तरकीबों के बिना चुनाव अब नामुमकिन...

संपादकीय
25 अप्रैल 2019



फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार ने दो दिन पहले जब ट्विटर पर लिखा कि वे एक नए रोल में सामने आने वाले हैं, तो लोगों ने आनन-फानन उनके भाजपा में शामिल होने, और चुनाव लडऩे की अटकल लगा ली। पिछले बरसों में अक्षय ने लगातार जिस तरह मोदी के उठाए हुए शौचालय जैसे मुद्दों से लेकर राष्ट्रवाद में फिट बैठने वाले मुद्दों तक पर बड़ी फिल्मों में काम किया, और अपनी एक ऐसी छवि बनाई जो कि भाजपा और राष्ट्रवाद के अनुकूल है, तो उनके ट्वीट से ऐसी अटकल स्वाभाविक ही थी। लेकिन हुआ कुछ और। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक ऐसा वीडियो इंटरव्यू लिया जो कि एक हिसाब से पूरी तरह गैरराजनीतिक था, मोदी की निजी जिंदगी, निजी पसंद-नापसंद के अनछुए मुद्दों को उघाडऩे वाला था, लेकिन साथ-साथ यह मोदी के भविष्य के सबसे नाजुक और महत्वपूर्ण राजनीतिक मौके पर लिया गया एक ऐसा इंटरव्यू था जो कि चुनाव प्रचार के उफान के बीच मानो लहरों पर सर्फिंग करता हुआ आया, और तमाम चैनलों और अखबारों पर छा गया। मोदी की छोटी-छोटी गैरराजनीतिक बातें लोककथाओं की तरह चर्चा में आईं, और फिर भक्तों की एक फौज ने उसके हिस्सों को बाकी देश तक फैला दिया। न तो अक्षय कुमार पत्रकार होने का दावा करते, न ही यह इंटरव्यू पत्रकारिता है, इसलिए यह महज प्रचार का एक ऐसा नमूना है जिसकी संभावना बाकी नेताओं और पार्टियों के सामने भी बनी हुई थी। यह अलग बात है कि मोदी ने जो जवाब दिए हैं, उनका सच-झूठ तलाशते हुए इस बार का यह चुनाव तो निपट ही जाएगा। 

अब भारतीय लोकतंत्र की सीमाओं और संभावनाओं को देखें, तो इस इंटरव्यू में नाजायज क्या है? न तो अक्षय कुमार कोई पत्रकार हैं कि उन्होंने तीखे और पैने सवाल क्यों नहीं किए? न ही चुनाव के बीच ऐसे किसी इंटरव्यू पर कोई रोक है, और न ही बीते बरसों में अक्षय कुमार की शौचालय से लेकर सेना और जंग तक की छवि बनाने में कोई बात गलत है। दरअसल मोदी-शाह की अगुवाई में भाजपा ने अपने आपको छवि बनाने, ब्रांडिंग करने, प्रचार करने, मार्केटिंग करने की एक ऐसी शानदार मशीन बना लिया है कि देश की बाकी तमाम विपक्षी पार्टियां उस तरह से सोच भी नहीं पा रही हैं जब तक भाजपा असर डालकर आगे बढ़ चुकी होती है। भारतीय लोकतंत्र ऐसा लचीला है कि वह ऐसी तमाम कोशिशों को छूट देता है, यह एक अलग बात है कि चुनाव के दौरान मोदी और भाजपा इतने किस्म की नाजायज कोशिशों में लगे हुए हैं, और इन पर चुनाव आयोग को शिकायतें की गई हैं, और इन पर चुनाव आयोग मोटेतौर पर अनदेखी दिखा रहा है। एक पुरानी, और अलोकतांत्रिक कहावत है कि मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज होता है। इसी पर अमल करते हुए भारतीय चुनावों में भी सब कुछ जायज की तर्ज पर चुनाव प्रचार होता है, और भाजपा ने पिछले बरसों में टीवी सीरियलों से लेकर फिल्मों तक, मोदी के नाम पर शुरू किए गए नमो टीवी चैनल तक, और इस किस्म के कहने को गैरराजनीतिक, लेकिन राजनीतिक-चुनावी अग्निपरीक्षा के बीच ऐसे इंटरव्यू तक, भाजपा ने हर औजार-हथियार का गजब का इस्तेमाल किया है। हम पांच बरस पहले के चुनाव के ठीक पहले के ऐसे टीवी सीरियलों की बात उस वक्त भी उठा चुके हैं जो कि चुनावी वक्त पर हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी धर्म के लोगों की ज्यादती की कहानी पर बनाए गए थे। और उनका प्रसारण पूरा होने का वक्त अनायास ही चुनाव के ठीक पहले का नहीं था। कहने के लिए कांग्रेस पार्टी की लीडरशिप भाजपा की लीडरशिप से एक पीढ़ी छोटी दिखती है, अधिक नौजवान दिखती है, लेकिन राजनीति के बाजारूकरण की तरकीबों और तकनीकों में वह मोदी-शाह के मुकाबले कहीं नहीं टिकती है। 

जिस अंदाज में भारत के राजनीतिक दलों ने घोषित और अघोषित चंदा इकट्ठा किया है, जिस अंदाज में विदेशी और देशी प्रचार-विशेषज्ञों का इस्तेमाल किया है, जिस तरह चुनाव के मौके पर हर नाजुक मुद्दे को दुहा है, वह गजब का है, और ऐसा लगता है कि राजनीतिक खूबी और खामी से परे चुनावी जीत एक ऐसे मैनेजमेंट का खेल हो गया है जिसमें बाकी पार्टियां भाजपा को छू भी नहीं पा रही हैं। अब ऐसे में चुनावी नतीजे चाहे जो हों, वे भाजपा की तकनीक और तरकीब से बहुत हद तक प्रभावित रहेंगे यह तय है। अब भारतीय लोकतंत्र महज खरे और खोटे, अच्छे और बुरे, काबिल और नाकाबिल के बीच का चुनाव, असली और नकली मुद्दों के बीच का चुनाव नहीं रह गया है। यह चुनाव तो आधे से अधिक गुजर चुका है, और कुछ हफ्तों में नई सरकार का फैसला सामने आ जाएगा। लेकिन उसके बाद भी ऐसे कई चुनाव आगे आएंगे जिनमें इन तकनीकों और तरकीबों का दखल रहेगा ही रहेगा, और बढ़ता भी चलेगा।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल

दलबदल की गंदगी खत्म करने निष्ठा और नीचता का फर्क...

संपादकीय
24 अप्रैल 2019



भाजपा सांसद, और देश के एक चर्चित दलित नेता, उदित राज आज सुबह कांग्रेस में शामिल हो गए। वे जेएनयू से पढ़े हुए, और आईआरएस अफसर रहे हुए हैं, और 2003 में सरकारी नौकरी छोड़कर इंडियन जस्टिस पार्टी बना चुके हैं। 2014 में वे भाजपा में शामिल हुए थे, और लोकसभा चुनाव में भाजपा टिकट मिलने पर उन्होंने घोषणा की थी कि दलितों का भाजपा में बेहतर भविष्य है। अब पिछले कुछ दिनों से भाजपा उन्हें इस चुनाव दुबारा टिकट देते नहीं दिख रही थी, और उन्होंने कल लिखा था कि मेरे टिकट की घोषणा में देर होने से पूरे देश में मेरे दलित समर्थकों में रोष है, और जब मेरी बात पार्टी नहीं सुन रही, तो आम दलित कैसे इंसाफ पाएगा। उन्होंने यह भी लिखा था कि मैं टिकट की राह देख रहा हूं जो न मिली तो मैं भाजपा को अलविदा कह दूंगा। और हुआ वही। उनकी सीट से दूसरे को टिकट दे दी गई और आज सुबह वे कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके साथ-साथ यह चर्चा भी शुरू हो गई कि कांग्रेस उन्हें उत्तरप्रदेश से उम्मीदवार बना सकती है। आज देश में लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं, मतदान के कई दौर हो चुके हैं, कुछ दौर बाकी हैं, और आधी लोकसभा सीटों पर वोट डलने के बाद बाकी सीटों पर कहीं-कहीं नामांकन बाकी है, और उन्हीं सीटों को लेकर यह आखिरी वक्त तक का दल-बदल चल रहा है। 
भारत में एक दिक्कत यह भी है कि दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, या और किसी धर्म या जाति के नेता अपने आपको मिलने वाले महत्व को अपने समुदाय को महत्व मिलने के बराबर बताने लगते हैं, या अपने हाशिए पर चले जाने को समुदाय को हाशिए पर धकेल दिया जाना बताते हैं। ऐसे लोग अपने समुदाय के ऐसे ठेकेदार रहते हैं जो कि समुदाय की प्रतिबद्धता को, समुदाय के समर्थन को ऐसे फाइनांसर के हाथों आनन-फानन बेच देते हैं जो उन्हें चुनाव में एक टिकट, या मंत्री का एक ओहदा, या संगठन में कोई बड़ा पद दे देते हैं। उनके लिए उनका निजी भला ऐसा होता है जिसे कि वे समुदाय को अपना भला मान लेने को कहते हैं, और हो सकता है कि उनका समुदाय किसी आस्था या झांसे के चलते ऐसा मान भी लेता हो। ऐसे लोग अपने समुदाय की गिनती, और उसके वोटों को अपने मालिकाना हक के रेवड़ की भेड़ों की तरह गिनवाने लगते हैं, और मंडी में खड़े-खड़े उन भेड़ों की बोली भी लगवा देते हैं। ऐसा महज एक दलित नेता के बारे में नहीं लिखा जा रहा है, ऐसा दूसरी जातियों, दूसरे धर्मों के लोगों के साथ भी होता है, और वे ऊपर खरीददार को अपने एक विशाल जनाधार होने का झांसा देते रहते हैं, और नीचे बिकने को तैयार की गई भीड़ को अपने पीछे चलने को ही उद्धार का झांसा भी देते हैं। 
यह रूख, दोनों तरफ का यह रूख देश भर में जगह-जगह देखने मिलता है, और इसीलिए भारतीय राजनीति में बहुत से धर्मों की गद्दियां सम्हाले हुए लोगों को सरकारी और संवैधानिक कुर्सियां नसीब होती हैं, और जनता को लूटकर कमाने का मौका भी दिया जाता है। अगर हिन्दुस्तान के दलितों की बुनियादी दिक्कतें ऐसी हैं कि जिनका सबसे बड़ा समाधान बीती शाम तक भाजपा के हाथ में था, और आज सुबह कोई ऐसा ईश्वरीय चमत्कार हो गया कि वह समाधान कांग्रेस के हाथ आ गया, तब तो उदित राज का फैसला जायज माना जा सकता है। वरना तो यह बात साफ है कि बाकी दूसरे बहुत से नेताओं की तरह, धार्मिक और सामाजिक मुखियाओं की तरह उदित राज भी अपने निजी नफे-नुकसान के लिए उनके समर्थक बताए जा रहे समुदाय के हितों को कभी इस हाथ बेच रहे हैं, तो कभी उस हाथ। अपने करीब के छत्तीसगढ़ में भी हमने बीती आधी सदी में ऐसे बहुत से नेताओं को देखा है जो अपनी जाति के ठेकेदार की तरह बर्ताव करते हैं, अपने धर्म के ठेकेदार की तरह बर्ताव करते हैं। 
बात महज उदित राज और उनके आज कांग्रेस में शामिल होने की नहीं है। हो सकता है कि शाम तक कांग्रेस का कोई नेता भाजपा में शामिल हो जाए, इस झांसे के साथ कि उसके साथ, उसके पीछे उसका पूरा समुदाय खड़ा है। हम पिछले महीनों में कई बार यह बात लिख चुके हैं कि चुनाव के वक्त दल-बदल का यह धंधा खत्म करने के लिए चुनाव सुधार में एक ऐसे फेरबदल की जरूरत है जो कि नामांकन के छह महीने पहले, या एक साल पहले से दल-बदल पर ऐसी रोक लगाए कि नई पार्टी की ओर से दलबदलू को उम्मीदवार न बनाया जा सके। यह एक बहुत बुनियादी और मामूली फेरबदल होगा लेकिन इससे सौदेबाजी और दलबदल की गंदगी खत्म हो जाएगी। लोगों को भी यह समझ आएगा कि वे रातोंरात अपनी निष्ठा बदलकर नीचता नहीं कर सकते। ये दोनों शब्द उच्चारण में बड़े आसपास के हैं, और इन दोनों शब्दों को किसी भी धर्म या जाति से परे सभी के लिए लागू करके देखने की जरूरत है क्योंकि लोकतंत्र अगर दलबदल की इजाजत देता है, तो संसदीय परंपराएं राजनीतिक खरीद-बिक्री, मोलभाव, और ब्लैकमेलिंग के खिलाफ मजबूत भी होना जरूरी है।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अप्रैल

बात की बात, 23 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अप्रैल

सुप्रीम कोर्ट में नाटकीय और सनसनीखेज आरोपों का दौर

संपादकीय
23 अप्रैल 2019



https://www.dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=26896&path_article=18सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ उनकी एक भूतपूर्व अस्थाई कर्मचारी द्वारा लगाए गए सेक्स-शोषण के आरोप की बात आगे बढ़ती चली जा रही है। इस पर हमने दो दिन पहले  विरोध किया था कि मुख्य न्यायाधीश को कोई हक नहीं था कि वे अपने पर लगे ऐसे आरोप के खिलाफ खुद अपनी अदालत में सुनवाई करें, और सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार से अपनी बेकसूरी का बयान जारी करवाएं, और शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ जवाबी आरोप लगाएं। खैर, इस बारे में हम काफी खुलासे से लिख चुके हैं, और आज चूंकि कुछ नए मुद्दे हैं, इसलिए दो दिन पहले की बातों को यहां दुहराना मुमकिन नहीं है। इस आरोप के बाद सुप्रीम कोर्ट बार ऐसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश का साथ देते हुए उन्हीं की जुबान में इसे एक साजिश करार दिया था। मुख्य न्यायाधीश का मानना है कि यह न्यायपालिका को अस्थिर करने की एक साजिश है। फिर अचानक एक ऐसे वकील का हलफनामा आता है जो कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ऐसी एक साजिश को बयां करते हुए बताता है कि दाऊद इब्राहीम से लेकर हिंदुस्तान के एक बहुत बड़े कारोबारी तक ऐसी साजिश में शामिल हैं, और यह बात उसे एक ऐसे आदमी ने बताई है जो कि मुख्य न्यायाधीश को इस्तीफे के लिए मजबूर करने के एवज में डेढ़ करोड़ रुपये का प्रस्ताव लेकर आया था।
यह पूरा सिलसिला बहुत भयानक रूप से नाटकीय हो चला है। मुख्य न्यायाधीश और उनकी बेंच में बैठे दो दूसरे जजों ने अब तक महिला की सेक्स-शोषण की शिकायत को किसी जांच कमेटी को नहीं भेजा है जो कि एक अनिवार्य जरूरत है। कानून के इस प्रावधान को किनारे रखकर सुप्रीम कोर्ट की यह बेंच मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में उस वकील से पूछताछ कर रही है जिसने यह सनसनीखेज आरोप लगाया है। ऐसे आरोप के सच्चे या झूठे होने के बारे में हम कोई अटकल लगाना नहीं चाहते क्योंकि दुनिया का कारोबार ऐसी कई साजिशों से भरा रहता है। दुनिया में मर्जी के फैसलों के लिए जजों को खरीदा भी जाता है, और उन्हें धमकाया भी जाता है। उन्हें ब्लैकमेल भी किया जाता है, और उन्हें लालच देकर मर्जी के फैसले लिए भी जाते हैं। इसलिए किसी भी किस्म के आरोप पर हम अपना दिमाग तय करना नहीं चाहते हैं, सिवाय इसके कि जब एक महिला ने ऐसा हलफनामा दिया है, तो उसकी शिकायत पर कानून के मुताबिक तुरंत जांच होनी चाहिए, और इस काम में इसलिए देर करना नाजायज होगा कि शिकायत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ है, जिनके खाते में महज सात लाख रुपये से कम हैं, जिनके साथ उस महिला ने बहुत कम काम किया था, या जिसके परिवार के ऊपर कई तरह के आरोप लगे हुए हैं, या कि मामले दर्ज हैं। हमारे हिसाब से मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले में न सिर्फ अनैतिक और कानून के खिलाफ शुरूआत की है, बल्कि उन्होंने अदालत और जजों से पारदर्शिता की जो उम्मीद की जाती है, उसे भी कुचलकर रख दिया है। हो सकता है कि वे किसी साजिश के शिकार हों, लेकिन ऐसी आशंका उनको सेक्स-शोषण के बुनियादी आरोप से कोई बचाव नहीं देती है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

हिन्दुस्तानी वोटर की सोच में दान शब्द से लग गई दीमक

संपादकीय
22 अप्रैल 2019



हिन्दुस्तान में प्रचलित जुबान में बहुत से शब्द लोगों को हक और जिम्मेदारी का एहसास नहीं करने देते। कानून जिन्हें पब्लिक सर्वेंट कहता है, उनको सरकार की हिन्दी भाषा अधिकारी कहती है। नतीजा यह होता है कि सरकारी अफसरों के सिरों पर सारे वक्त उनके अधिकार चढ़े रहते हैं, और उनकी जिम्मेदारियां, यानी जनता के अधिकार, अफसरों के बूटों तले रहते हैं। कुछ ऐसा ही हाल वोट डालने की जिम्मेदारी का है। लोकतंत्र में अच्छी सरकार चाहने वाले लोगों के लिए वोट डालना एक जवाबदेही और जिम्मेदारी होनी चाहिए। लेकिन वोट के लिए हिन्दी में मतदान शब्द का इस्तेमाल होता है, जिसका मतलब भी दान करना होता है। इसलिए दान, जो कि मर्जी से किया जा सकता है, और नहीं भी किया जा सकता है, वही हिन्दुस्तानी सोच पर हावी हो गया है। हालत यह है कि मतदान को अनिवार्य करने की बात करनी पड़ रही है क्योंकि वोट डालने के बजाय लोग घर बैठे रहते हैं, और आमतौर पर जीतने वाले उम्मीदवार के वोट भी, घर बैठे वोटरों की गिनती से कम रहते हैं। यानी जितने वोट पाकर कोई सांसद या विधायक बन जाते हैं, उससे अधिक वोट डलते ही नहीं। नतीजा यह होता है कि नालायक वोटरों के निकम्मेपन से हो सकता है कि एक नालायक जीत जाए, और काबिल उम्मीदवार हार जाए। 
लोगों को याद होगा कि एक वक्त भारत में समाजवादी सोच के सबसे बड़े नेता राममनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। उनका यह कहना शायद इस सिलसिले में था कि संसद या विधानसभा अपना कार्यकाल पूरा करने के पहले दुबारा चुनाव में जाने की नौबत कई बार झेलती हैं, और लोग इसे चुनाव की मेहनत की बर्बादी मानते हैं। लोहिया का कहना था कि जरूरत पडऩे पर आ खड़े हुए ऐसे चुनाव में नुकसान नहीं है, क्योंकि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं कर सकतीं। लेकिन हिन्दुस्तान में वोट न डालने वाले एक तिहाई से अधिक वोटरों को क्या कहा जाए? इनको जिंदा गिना जाए, या मुर्दा कहा जाए? सोचने-समझने और महसूस करने वाली कौमें तो ऐसी होती हैं जो कि दो चुनावों के बीच भी बेसब्र हो जाती हैं, और ऐसी ही बेसब्री के लिए भारतीय लोकतंत्र में एक अधिकार जोडऩे की बात हो रही है, मांग हो रही है, चुने हुए प्रतिनिधियों को वापिस बुलाने की। तो एक तरफ इस देश में राईट-टू-रीकॉल की चर्चा होती है, दूसरी तरफ हाथ में टीवी का रिमोट कंट्रोल लिए मौजूदा राईट (अधिकार) पर सोते हुए एक तिहाई से अधिक हिन्दुस्तानी वोटर हैं। 
दरअसल दिक्कत जुबान की भी है। मतदान, रक्तदान, नेत्रदान, देहदान, जैसी बहुत सी सामाजिक जवाबदेही, और इंसानी जिम्मेदारी को एक दान का दर्जा देकर लोगों को इनकी तरफ से बेफिक्र कर दिया गया है। लोग अपने मरने के बाद अपने देह को, और मरने के पहले अपने खून को, इस तरह अपनी दौलत मान लेते हैं, मानो वे उन्हें कुदरत से खरीदकर लाए हों। कुदरत से मुफ्त में मिली देह को भी कुदरत की दुनियादारी में दुबारा लौटाने की सोच हिन्दुस्तान में नहीं है। इसी दुनिया से कमाई गई दौलत को भी समाजसेवा में लौटा देने की सोच हिन्दुस्तान में बहुत कम लोगों में है। 
खैर, आज हम यहां पर बहुत दार्शनिक अंदाज में इस बात को बिखराना नहीं चाहते, और मुद्दे की बात पर आना चाहते हैं। जो लोग मतदान की जिम्मेदारी को दान करने का अधिकार मानते हैं, वे लोग सबसे खराब सरकार के हकदार खुद भी होते हैं, और अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए वे अपनी दौलत तो विरासत में छोड़ जाते हैं, घर-मकान तो बच्चों के नाम कर जाते हैं, लेकिन साथ-साथ एक घटिया लोकतंत्र  की गारंटी भी अपनी अगली पीढिय़ों के नाम कर जाते हैं। वोट का दान न करना लोकतंत्र की इमारत में, चौखटों और बाकी लकडिय़ों में दीमक छोड़कर जाने जैसा है। ताजा भारतीय इतिहास में ऐसी अनगिनत दीमकें देश को खोखला करते सामने आ चुकी हैं। क्या हिन्दुस्तानी वोटर अपने बच्चों के लिए ऐसे मकान वसीयत में छोड़कर जाना चाहते हैं, जिसमें हर तरफ दीमक लगी हो? 
आज यह मौका है कि पांच बरस में एक बार दीमकों का इलाज, वोटरों के हाथ है। आज भी जो अपने वारिसों को एक दीमकमुक्त मकान नहीं देंगे, वे मरने के बाद, ऊपर, स्वर्ग या नर्क में जहां कहीं भी, बैठे हुए अपनी पीढिय़ों को एक खोखले लोकतंत्र में तकलीफ पाते देखने की तकलीफ पाते रहेंगे। इसलिए लोगों को आज जिंदा रहने का, जिंदा होने का एक सुबूत देना होगा, और लाख-लाख वोट वाले चुनाव क्षेत्र में सौ-सौ वोटों के लिए साजिशें करने वाले लोगों को सबक सिखाने के लिए सामने आना होगा। यह नौबत वोट का हक रखने वालों के लिए शर्मनाक है, शर्मिंदगी की है कि उनके हाथ दीमक खत्म करने की दवा है, और दीमक है कि वह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को हमेशा के लिए खोखली करती चल रही है। यह मतदान का अधिकार नहीं है, वोट देने की जिम्मेदारी है। और दुनिया में कोई भी अधिकार बिना जिम्मेदारी के नहीं आते। इसलिए हर वोटर को हर चुनाव में दीमक मारने निकलना चाहिए, जरा सा वक्त निकालना चाहिए, वरना कब इमारत खोखली होकर उन पर गिर पड़ेगी, इसका कोई ठिकाना नहीं है।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अप्रैल

सेक्स-शोषण के आरोपों पर मुख्य न्यायाधीश का रूख न न्यायसंगत, न तर्कसंगत..

संपादकीय
21 अप्रैल 2019



सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर देह शोषण का आरोप हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बार लगा है। अमूमन यह माना जाता है कि रात-दिन इंसाफ की बात सोचने वाले, बड़े-बड़े मामलों से लदे रहने वाले, और बेइंसाफी के खतरों को अच्छी तरह समझने वाले बड़े जजों का चाल-चलन काबू में रहता होगा, लेकिन कल जो आरोप लगे हैं, वे उसके ठीक खिलाफ हैं। जैसा कि सड़क पर चलता कोई आम बलात्कारी भी उस पर लगे आरोपों को गलत बताता ही है, जिस तरह तमाम नेता बलात्कार या छेडख़ानी के आरोपों को गलत बताते ही हैं, उसी तरह सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस रंजन गोगोई ने इन आरोपों को खारिज किया है। जब शिकायतकर्ता महिला ने इस आरोप के साथ लंबा-चौड़ा खुलासा करते हुए हलफनामा या शिकायत सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को भेजी, तो ऐसी उम्मीद की जाती थी कि जस्टिस गोगोई अपने आपको इस शिकायत की जांच के लिए पेश कर देंगे, और अपने आपको इस जांच से अलग रखेंगे। लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा। उन्होंने खुद होकर इस मामले की सुनवाई शुरू की, खुद बेंच में बैठे, जज की कुर्सी पर बैठकर उन्होंने न सिर्फ आरोपों को झूठा बताया, बल्कि अदालत की इस कार्रवाई में उन्होंने रिकॉर्ड पर यह बात कही कि यह सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ एक साजिश है, उसे अस्थिर करने की कोशिश है, उसकी विश्वसनीयता खत्म करने की कोशिश है, और ऐसा इसलिए किया जा रहा हो सकता है कि अगले हफ्ते वे कुछ ऐसे बड़े मामलों की सुनवाई करने वाले हैं जिनको लोग रोकना चाहते हैं। कुल मिलाकर उन्होंने शिकायतकर्ता महिला को झूठा करार देने के साथ-साथ उसकी एक साजिश में हिस्सेदारी की बात भी कही, उस महिला की साख के खिलाफ बातें कहीं, और अपने पर हुए इस हमले को उन्होंने पूरे सुप्रीम कोर्ट पर हमला करार दिया। 

हिन्दुस्तान में किसी भी संस्था में जब कोई महिला देह शोषण की शिकायत करती है, तो उसकी जांच की एक प्रक्रिया बनी हुई है। और उसे सरकार ने तय नहीं किया है, खुद सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है। इस प्रक्रिया के तहत ही मुख्य न्यायाधीश को उन पर लगा यह गंभीर आरोप सुप्रीम कोर्ट की एक जांच कमेटी को भेज देना था, और अपने आपको किसी भी जांच, किसी भी कार्रवाई से परे कर लेना था। चूंकि मुख्य न्यायाधीश से ऊपर सुप्रीम कोर्ट में कुछ नहीं होता, इसलिए उनको इस मामले पर कुछ कहने से भी बचना था क्योंकि उनका कहा हुआ कुछ भी जांच करने वाले संभावित जजों को प्रभावित करने से कम और कुछ नहीं माना जा सकता। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार से इन आरोपों पर एक सूचना जारी करवाई जिसमें इस असाधारण सुनवाई की बात तो थी ही, उस महिला की शिकायत को पूरी तरह खारिज भी उसमें किया गया था, और हमारे हिसाब से सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार के अधिकार, और उसकी जिम्मेदारियों में ऐसे आरोपों के किसी तरह के खंडन की बात नहीं आती है, और सुप्रीम कोर्ट संस्था का ऐसा इस्तेमाल एक पूरी तरह बेजा इस्तेमाल था। 

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कल इस मामले में जो कुछ किया है, वह पूरी तरह अवांछित और नाजायज दोनों ही हैं, पूरी तरह न्याय के खिलाफ है, जांच प्रक्रिया के खिलाफ है, और देश के मुख्य न्यायाधीश के एक बेजा घमंड का सुबूत भी है कि वे जज की कुर्सी पर बैठकर शिकायतकर्ता महिला के चाल-चलन पर तोहमत लगा सकते हैं, और अपने आपको पाक साफ होने का सर्टिफिकेट दे सकते हैं। उनकी यह बात भी निहायत बोगस है कि उनके खाते में महज कुछ लाख रूपए हैं, जिससे अधिक तो सुप्रीम कोर्ट के चपरासी के खाते में होंगे। इस बात को सेक्स-शोषण के खिलाफ एक ढाल की तरह इस्तेमाल करना एक परले दर्जे का घटिया तर्क है क्योंकि जिनके खातों में 6 लाख से कम रूपए हों, क्या वे सेक्स-शोषण नहीं कर सकते? या जिनके खातों में करोड़ों हैं, क्या महज वे ही सेक्स-शोषण करते हैं? 

जस्टिस रंजन गोगोई का विचलित होना तो जायज है, क्योंकि वे गुनहगार हों, तो भी उन्हें एक यह भरोसा तो रहा ही होगा कि उनके खिलाफ भला कौन शिकायत की हिम्मत कर सकते हैं? और अगर वे बेगुनाह हों, तो भी वे विचलित तो हुए ही होंगे। लेकिन इन आरोपों के सामने आने के बाद उनका आचरण सुप्रीम कोर्ट का मुखिया बने रहने के लायक नहीं है, और उनको अपने आपको तुरंत ही इस पद से अलग कर लेना चाहिए। अभी हम उनके इस्तीफे की बात नहीं करते क्योंकि उन पर लगे आरोपों की जांच होना अभी बाकी है, लेकिन इस महिला की शिकायत में पुलिस की असाधारण सक्रियता की बहुत सी बातें लिखी गई हैं जो कि जज के महिला पर हमले के बाद उस महिला के परिवार के साथ हुई हैं। वे तमाम बातें जांची-परखी जा सकती हैं, और चूंकि देश के सबसे बड़े जज पर यह सबसे बुरा आरोप लगा है, इसलिए इस शिकायत के एक-एक शब्द को अग्निपरीक्षा से गुजारना चाहिए, पुलिस सक्रियता और पुलिस कार्रवाई की जांच करनी चाहिए कि उन्होंने किस प्रभाव में इस महिला के कुनबे को इतना परेशान किया, अगर किया तो। 

यह एक ऐसा मामला है जो देश की अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर तोहमत लगा रहा है, उसे शक के घेरे में ला रहा है, ऐसे में इसे एक मिसाल बनाकर ऐसी बारीक जांच करनी चाहिए कि देश की बाकी न्यायपालिका, देश की बाकी संवैधानिक संस्थाओं, सरकारों, सभी पर काबिज लोगों को एक सबक मिले। यह शिकायत अगर बारीकी से देखी जाए तो यह महज एक जज के बयान और उसके खिलाफ एक महिला के बयान तक सीमित नहीं है। उस महिला ने अपने परिवार के साथ पुलिस और सरकारी ज्यादती के जितने मामले गिनाए हैं, उनकी जांच से भी हकीकत सामने आ सकती है, और लानी ही चाहिए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने अपने खुद पर लगे आरोपों को लेकर जो रूख दिखाया है, वह न तो न्यायसंगत है, न ही तर्कसंगत। आखिर में हक्का-बक्का करने वाली एक बात का जिक्र जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट के जज जो कि बहुत से लिखे गए फैसलों में भी एक-दूसरे से असहमत रहते हैं, एक-दूसरे के विरोध का हौसला दिखाते हैं जिनमें से कुछ ने पिछले बरस मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ एक सामूहिक प्रेस कांफ्रेंस ली थी जिसमें खुद रंजन गोगोई शामिल थे, आज उनकी इस नाजायज सुनवाई के खिलाफ उस बेंच पर बैठे हुए दो दूसरे जज, जस्टिस अरूण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना, ने असहमति जाहिर नहीं की यह भी हैरानी की बात है। चूंकि ऐसी नौबत पहली बार आई है, इसलिए कानून की हमारी सीमित समझ ठीक-ठीक अंदाज नहीं लगा पा रही है कि जस्टिस रंजन गोगोई की यह हरकत उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए काफी है या नहीं? हो सकता है कि उस महिला के आरोप जस्टिस गोगोई के खिलाफ एक साजिश का हिस्सा हो, लेकिन अपने मामले में खुद सुनवाई करके जवाबी आरोप लगाकर जस्टिस गोगोई ने महाभियोग के लायक तो अपने आपको बना ही लिया है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट जज पर महाभियोग संसद में बड़ी संख्या में सांसदों की जरूरत मांगता है, इसलिए यह अंदाज लगाना नामुमकिन है कि नई संसद में इसके लिए सांसद जुटेंगे या नहीं? या फिर पार्टियां जजों को लेकर अपनी पसंद-नापसंद पर टिकी रहेंगी? संविधान के जानकार लोग संसद के बाहर भी शायद जस्टिस गोगोई से उनकी इस कार्रवाई को लेकर इस्तीफा मांगेंगे, या उन्हें मांगना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अप्रैल

इंसानी दर्जे से नीचे की जिंदगी जीते पुलिसवाले

संपादकीय
20 अप्रैल 2019



छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, और गृहमंत्री के अपने जिले में मुख्यमंत्री के हैलीपैड से ड्यूटी करके लौटते एक पुलिस जवान की बस में दिल का दौरा पडऩे के बाद अस्पताल में मौत हो गई। उसका पिता भी पुलिस में था जो ड्यूटी के दौरान गुजर गया था, और उसकी जगह पर इस बेटे को बाल आरक्षक बनाया गया था जो कि अब आरक्षक था। वैसे तो इस मौत में कोई बहुत अटपटी बात नहीं दिख रही है, लेकिन ऐसी दूसरी कई खबरों को देखें तो लगता है कि सरकार और पुलिस को अपने तौर-तरीकों को कुछ सुधारना चाहिए। पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों में लगातार आत्महत्या, या साथियों और सीनियरों की हत्या के मामले सामने आते हैं, और खबरों में आकर चले भी जाते हैं, उन्हें देखते हुए कुछ होता नहीं है। छत्तीसगढ़ में पिछली भाजपा सरकार के वक्त पुलिस-परिवार ने पुलिस के काम की बेहतर स्थितियों की मांग को लेकर आंदोलन किया था, और उससे हड़बड़ाए हुए पुलिस विभाग ने पूरी ताकत लगाकर उसे कुचल दिया था। बाद में कांग्रेस ने इसे एक चुनावी वायदा बनाया था, और नई सरकार ने एक कमेटी बनाकर उससे पुलिस कर्मचारियों की बेहतरी की कुछ बातों पर सोचा तो है, लेकिन उन पर अमल शुरू हुआ हो ऐसा पता नहीं चला है। आज ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एक न्यूज छपी है कि किस तरह एक गुजर गए पुलिसवाले की पत्नी को अनुकम्पा नियुक्ति देने की फाईल पर पुलिस मुख्यालय तीन बरस तक बैठा रहा। अब हाईकोर्ट ने तुरंत नौकरी देने कहा है। अपने ही विभाग के गुजर गए लोगों के परिवार के साथ अगर विभाग का यह रूख है, तो यह पुलिस हिरासत में प्रताडऩा के बराबर ही है। 

दूसरी तरफ देश या प्रदेश के नेताओं का इंतजाम हो, किसी राजनीतिक या धार्मिक जलसे और जुलूस का इंतजाम हो, या किसी भी दूसरे मेले-ठेले की बात हो, पुलिस को जिस अंदाज में झोंक दिया जाता है, उस पर सरकार को, खासकर पुलिस विभाग को एक बार फिर सोच लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से दूसरे राज्य भी होंगे जिनमें बिना किसी खतरे वाले लोगों को, सत्ता पर मंडराने वाले छोटे-छोटे नेताओं को हथियारबंद पुलिस हिफाजत ऐसे मिलती है कि अगर पास से बंदूक हटी तो हत्या घटी। ऐसा इंतजाम अफसरों के बंगलों पर, नेताओं के बंगलों पर, काफिलों में, और नेता-अफसर के परिवारों तक बिखरा हुआ है, और छोटे कर्मचारियों को किसी खम्भे की तरह घंटों तक तपती धूप या बरसते पानी में खड़ा कर दिया जाता है, तब तक, जब तक कि नेताजी आकर लौट न जाएं। न पानी का इंतजाम, न खाने का, और न तैनाती की जगह से हिलने की गुंजाइश। बात-बात में बड़े अफसरों की बदसलूकी, और सस्पेंड हो जाने का खतरा। ये तमाम बातें पुलिस का आत्मसम्मान कुचलकर रख देती हैं, और अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करने का मनोबल उनमें बचता नहीं है। 

छत्तीसगढ़ में पुलिस-हालात सुधार के कागजात तैयार पड़े हैं, लेकिन वे महज हफ्ते की एक छुट्टी की बात करते हैं। पुलिस के बेजा निजी इस्तेमाल के खिलाफ कोई बात इसलिए नहीं है कि कागजों पर तो सिपाहियों की तैनाती कहीं और होती है, और यह एक अलग बात है कि वे बड़े अफसरों और नेताओं के कुत्ते घुमाते, उनके घर खाना पकाते या जूठन उठाते नौकरी गुजारते हैं। अगर किसी सरकार में सरकारी पैसों की बर्बादी खत्म करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, और दिखावे के तामझाम को घटाने का हौसला हो, तो राज्य में एक चौथाई पुलिस का लगातार घरेलू इस्तेमाल और अपमान खत्म हो सकता है। यह बात न सिर्फ सरकारी किफायत के खिलाफ है, बल्कि साथी इंसान के आत्मसम्मान के खिलाफ भी है कि पुलिस होते हुए उनका घरेलू नौकरों सरीखा इस्तेमाल हो, या बड़े नेताओं के इंतजाम में उन्हें बांस-बल्ली की तरह बांधकर खड़ा कर दिया जाए। 

अगर मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाओं में रीढ़ की हड्डी होती, और इन संस्थाओं में बैठे हुए लोग उन्हें मिलने वाले नमक की जिम्मेदारी पूरी करने के लिए जागरूक हों, तो वे खुद होकर भी पुलिस के ऐसे राजनीतिक और प्रशासनिक घरेलू इस्तेमाल के खिलाफ नोटिस जारी कर सकते हैं, लेकिन ऐसी संस्थाओं में बैठे लोग खुद भी शायद पुलिस का घरेलू नौकरों जैसा इस्तेमाल कर रहे होंगे। यह पूरा सिलसिला तब तक ऐसे ही चलता रहेगा जब तक कोई पुलिस जवान कुंठा और प्रताडऩा के बाद बंगले की तैनाती में किसी किस्म की हिंसा न कर बैठे। ऐसा अगर कुछ होगा, तो ही बाकी लोगों की नींद खुलेगी, वरना सरकार का एक बड़ा हिस्सा इंसानी दर्जे से नीचे की जिंदगी जीते हुए पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसी तरह खत्म होता रहेगा। इन लोगों के लिए जिम्मेदार बड़े पुलिस और शासकीय अफसर चूंकि खुद भी ऐसे बेजा इस्तेमाल में लगे रहते हैं, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी अर्दली के काम के लिए पुलिस सुहाती है, आने-जाने के लिए पुलिस की सायरन गाड़़ी सामने चलती सुहाती है, इसलिए छोटे पुलिस कर्मचारियों को किसी भी कोने से इंसाफ मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। इसीलिए उनमें से कोई खुद अपने ऊपर गोली चलाते हैं, कोई परिवार पर गोली चलाते हैं, और कोई अपने अफसरों पर। यह नौबत खतरनाक है।  

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दीवारों पर लिक्खा है, 19 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अप्रैल

ऐसा लचीला लोकतंत्र दुनिया में कहीं नहीं...

संपादकीय
19 अप्रैल 2019



राजनीति बड़ी अजीब जोडिय़ां बनाती है। और खासकर हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में यह दूसरे देशों के मुकाबले अधिक हैरतअंगेज दर्जे का सिलसिला है। अमरीका या ब्रिटेन में दलबदल, या दलों का विचित्र, अस्वाभाविक, अप्राकृतिक गठबंधन सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन हिन्दुस्तान में हर चुनाव के पहले के छह महीने इतिहास के कई किस्म के गठबंधन दर्ज करते हैं। अब आज ही जैसे उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के चुनाव क्षेत्र मैनपुरी में बसपा की मुखिया मायावती प्रचार करने को पहुंचीं, तो करीब चौथाई सदी बाद ये दोनों नेता एक मंच पर एक साथ नजर आए। इसके पहले उत्तरप्रदेश में एक कुख्यात रेस्ट हाऊस कांड हुआ था जिसमें मायावती के साथ मुलायम के मवालियों ने बदसलूकी की थी, और उसके बाद दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते सांप-नेवले सरीखे हो गए थे। पिछले बरस जब मुलायम के विरोध के बावजूद अब पार्टी सम्हाल रहे बेटे अखिलेश यादव ने मायावती से गठजोड़ किया था तो खुद मुलायम को ऐसे दिन का अंदाज नहीं था कि मायावती उनके लिए वोट मांगने उनकी सीट पर आएंगी, और वे मंच से कहेंगे कि वे इस अहसान को कभी नहीं भूलेंगे। कुल मिलाकर भाजपा के खिलाफ ये दो पार्टियां आज जिस तरह मिलकर उत्तरप्रदेश में चुनाव लड़ रही हैं, वे पिछले चुनाव की कटुता के ठीक खिलाफ है, और इन दोनों पार्टियों के सामाजिक समीकरण के हिसाब से ठीक भी है। इन दोनों की जमीन पिछड़ों, दलितों, और अल्पसंख्यकों के बीच है, और इन वोटों के बंटने से यूपी में योगीराज आ गया था, जो हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में शिकस्त पाए। 

लेकिन दूसरी तरफ दिल्ली में एक दूसरे मामले में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने पार्टी के तमाम पदों से, और सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है क्योंकि उत्तरप्रदेश में उनके साथ बदसलूकी के बाद निलंबित पार्टी के कुछ नेताओं को चुनाव के इस मौके पर पार्टी में वापिस ले लिया गया है। यह बात गिनाते हुए प्रियंका ने कांग्रेस छोड़ दी, और आज शिवसेना में शामिल हो गई हैं। अब कांग्रेस और शिवसेना में भला ऐसा क्या हो सकता है कि प्रवक्ता जैसे वैचारिक जिम्मेदारी वाले ओहदे की महिला एक पार्टी छोड़ दूसरे में जाए! कांग्रेस और शिवसेना के सारे मूल्य एक-दूसरे के खिलाफ हैं, रीति-नीति एक-दूसरे के खिलाफ है, और साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर दोनों आमने-सामने हैं। ऐसे में महज एक बात इन दोनों पार्टियों में एक सरीखी है कि इनका इतिहास, वर्तमान, और भविष्य, एक-एक कुनबे की लीडरशिप पर टिके हुए हैं। लेकिन जो प्रियंका चतुर्वेदी पिछले दस बरस से लगातार साम्प्रदायिकता के खिलाफ बोलती आ रही थीं, वे अब शिवसेना की जुबान बोलेंगी! खैर, भारतीय लोकतंत्र में ऐसा होते रहता है क्योंकि लंबे समय तक शिवसेना की तेजाबी जुबान बोलने वाले संजय निरूपम उस पार्टी को छोड़कर सीधे कांग्रेस में आए थे। 

हिन्दुस्तान की राजनीति का राष्ट्रीय और प्रादेशिक इतिहास ऐसे ही दलबदल से, गठबंधन और चुनावी तालमेल से भरा हुआ है। अब कल का दिन ही देखें, तो अभी दो हफ्ते पहले तक भाजपा के सांसद रहे शत्रुघ्न सिन्हा पहले तो कांग्रेस में आए, और कल वे सपा में गई अपनी पत्नी का चुनाव प्रचार करने के लिए कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ मंच पर पहुंच गए। वे खुद पटना से कांग्रेस उम्मीदवार हैं, और अपनी पत्नी के अलावा वे समाजवादी-परिवार के अखिलेश-डिम्पल के लिए भी प्रचार करने जाने को तैयार हैं। भारतीय लोकतंत्र का यह लचीलापन दूसरे बहुत से देशों में देखने नहीं मिलता, जहां पर दलबदल और दिलबदल इतना आम नहीं है। लेकिन हिन्दुस्तानी वोटर भी इस किस्म से खाल बदल-बदलकर आने वाले उम्मीदवारों को देखने के आदी हैं, और वे इन्हीं के बीच से अपनी पसंद तय करने की खूबी भी रखते हैं। 

हम पहले भी लिखते आए हैं कि राजनीति की गंदगी को कम करने के लिए चुनाव के आधे या एक बरस पहले से दलबदल पर ऐसी रोक लगनी चाहिए कि इन महीनों में पार्टी बदलने वाले नई पार्टी से उम्मीदवार न बन सकें। लेकिन अपनी राजनीतिक निष्ठा को आधी रात सबसे बड़ी बोली बोलने वाले के हाथ नीलाम करने पर उतारू नेता क्या कभी ऐसा चुनाव सुधार होने देंगे?  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM