दीवारों पर लिक्खा है, 31 मई

कांग्रेस का टीवी बहिष्कार, कितना सही, कितना गलत

संपादकीय
31 मई 2019



मीडिया के हिस्से में कांग्रेस की इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि उसने एक महीने तक टीवी चैनलों की बहस में अपने पार्टी प्रवक्ताओं के जाने पर रोक लगा दी है। अलग-अलग राजनीतिक दलों के लोगों को बिठाकर बहस छेडऩा समाचार चैनलों की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ मामला है, और ऐसे में मानो थाली से एक सब्जी ही हटा दी गई है, तो ऐसे में चैनलों की शिकायत जायज है। दूसरी तरफ यह समझने की जरूरत है कि कांग्रेस ने ऐसा किया क्यों है।

अभी जब चार दिन पहले कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक चल रही थी, और उस बीच ही मीडिया में तेजी से ये खबरें आईं कि राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की है, तो कार्यसमिति चलते-चलते ही कांग्रेस के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने जोर-शोर के साथ इसका खंडन किया, और इसे गलत बताया। लेकिन घंटे दो घंटे के भीतर ही यही प्रवक्ता उतने ही जोर-शोर से यह कहते हुए मीडिया के सामने आए कि राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की है, और उसे वापिस लेने से इंकार भी कर दिया है। तब से लेकर अब तक राहुल के इस्तीफे की गंभीरता और कांग्रेस अध्यक्ष पद का भविष्य तरह-तरह की अटकलों के सामान बने हुए हैं, और ऐसे में कांग्रेस के कोई प्रवक्ता कह भी क्या सकते हैं? किसी भी टीवी बहस पर कांग्रेस से पहला सवाल तो पार्टी के अध्यक्ष पर ही होगा, और इस पर अगर आज सोनिया और प्रियंका भी कुछ नहीं बोल पा रहे हैं, तो बाकी और किसी की हस्ती ही क्या है कि इस पर कुछ बोले? 

लेकिन इसके अलावा भी कुछ बातें और हैं जिनकी वजह से कांग्रेस महीने भर के लिए टीवी की बहस से दूर रहना तय कर चुकी है। एक तो यह कि जो चुनावी हार अब आंकड़ों का इतिहास बन चुकी है, उसे कुरेद-कुरेदकर टीवी चैनल और दूसरी पार्टियों के प्रवक्ता उसे वर्तमान बनाना जारी रखेंगे, और उसे ही भविष्य साबित करना भी। अभी तो कांग्रेस खुद ही अपनी हार का विश्लेषण नहीं कर पाई है, और यह भी नहीं तय कर पाई है कि कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी से कौन विश्लेषण करेंगे, इसलिए भी तब तक टीवी से दूर रहना ठीक है। लेकिन इससे भी परे एक बात और है जिसकी वजह से कांग्रेस टीवी चैनलों से दूर जा रही है। न सिर्फ पिछले महीनों के चुनाव प्रचार के दौरान, बल्कि उसके पहले के एक-दो बरस में भी समाचार के कई चैनलों का हाल ऐसा खराब था कि कांग्रेस के अलावा भी कई विपक्षी पार्टियां उन्हें गोदी-मीडिया कहने लगी थीं, यानी मोदी की गोदी में बैठा हुआ मीडिया। लोगों को याद होगा कि जब हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए, और दो हजार रूपए के नोट शुरू किए गए, तो देश का नंबर वन चैनल होने का दावा करने वाले एक हिन्दी चैनल की स्टार-एंकर बड़े जोर-शोर से समाचार बुलेटिनों में यह साबित करते दिखी कि दो हजार के नोट में एक ऐसा माइक्रोचिप फिट किया गया है कि वह जमीन के बहुत नीचे भी दबाया जाएगा, तो भी भारतीय उपग्रह उसे पकड़ लेंगे। मीडिया के नाम पर एक बहुत ही बदमजा लतीफे की तरह यह वीडियो आज भी इंटरनेट पर मौजूद है, और समय-समय पर लोग मीडिया का मखौल बनाने के लिए उसका इस्तेमाल भी करते हैं। इस किस्म के सैकड़ों ऐसे टीवी पत्रकार और चैनल रहे जो कि प्रचारक की तरह काम करते रहे, और देश के अखबारनवीसों ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अविश्वसनीयता को लेकर काफी कुछ लिखा भी। एक ऐसी जनधारणा बनी रही, और आज भी है कि टीवी चैनलों का एक बहुत बड़ा हिस्सा मोदी की टीम की तरह काम करता रहा। इसलिए पार्टियों के बीच पहले भी यह बात होती रही है कि कुछ अधिक बड़े प्रचारक-चैनलों का बहिष्कार किया जाए। 

कांग्रेस के पास अगले एक महीने में खोने के लिए कुछ भी नहीं हैं। लेकिन वह इत्मीनान से अपना घर सम्हालकर उसके बाद फिर मीडिया के सामने आ सकती है जिसमें टीवी मीडिया भी शामिल होगा। लोकतंत्र में ऐसे कोई भी बहिष्कार अंतहीन नहीं होते। कई बार राजनीति के लोग जब मीडिया से बदसलूकी करते हैं, तो मीडिया भी कुछ पार्टियों का, या कुछ नेताओं का बहिष्कार करता है, और एक वक्त गुजर जाने के बाद दोनों फिर साथ काम करने लगते हैं। ऐसे बहिष्कार लोगों को सोचने, समझने, और सम्हलने का मौका भी देते हैं। यह मौका यहां पिछले चुनाव को लेकर कांग्रेस के सोचने, समझने, और सम्हलने का है, वहीं पर यह मौका इलेक्ट्रॉनिक मीडियाके लिए भी यही सब कुछ करने का भी है। एक वक्त था जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नाम की कोई चीज नहीं थी, और महज अखबार ही प्रेस कहलाते थे। उस वक्त श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन मजबूत था और वह पत्रकारिता के नीति-सिद्धांतों की फिक्र करने वाला देश का अकेला संगठन भी था। जैसे-जैसे वह संगठन खत्म हुआ, वैसे-वैसे पत्रकारिता के उसूलों की फिक्र भी खत्म होती गई। आज मीडिया में काम करने वाले तब के मुकाबले शायद सौ गुना बढ़ चुके हैं, लेकिन सिद्धांतों की फिक्र  एक फीसदी भी नहीं बची है। ऐसे में सबको अपने-अपने हाल पर एक बार सोचना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मई

बारह बरस में संन्यास का फैसला क्या सचमुच सही?

संपादकीय
30 मई 2019



गुजरात का सूरत अभी-अभी एक कोचिंग सेंटर में लगी आग से करीब 25 छात्र-छात्राओं की मौत को लेकर खबरों में था। और अभी कल एक दूसरी खबर इस शहर को खबरों में लाई, यहां की एक बारह बरस की जैन परिवार की छात्रा ने सांसारिकता छोड़कर दीक्षा ली, और साध्वी हो गई। इस मौके पर संपन्न जैन समाज की धार्मिक परंपराओं के अनुसार बहुत बड़ा जलसा हुआ जिसमें शहर के और आसपास के समाज के लोग शामिल हुए, बहुत बड़ी शोभायात्रा निकली, और समाज के साधु-संत जुटे। परिवार में माता-पिता ने भी इस बात पर खुशी जाहिर की कि उनकी बेटी संन्यास की राह अपनाकर परिवार का गौरव बढ़ा रही है, और कहा कि यह पूर्वजन्म के संस्कारों का नतीजा है। 

ऐसा पहले भी कई बार हुआ है जब कम उम्र के बच्चे संन्यास लेकर जैन साधु या साध्वी बनें, और समाज में यह बहस हो कि क्या बालिग हुए बिना, दुनिया को और देखे बिना क्या इतना बड़ा फैसला किसी बच्चे को लेने देना चाहिए? अभी जब यह खबर आई तो एक बार फिर मीडिया और सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि जिस उम्र में शादी की इजाजत नहीं है, वोट देने का हक नहीं है, अपनी जिंदगी के बाकी फैसले लेने का हक नहीं है, तब जिंदगी का इतना बड़ा और कठिन फैसला लेने का हक किसी बच्चे को कैसे दिया जाना चाहिए? यह बात न तो जैन धर्म के खिलाफ है, और न ही धर्म के तहत संन्यास लेने के खिलाफ है, यह बात महज उन बच्चों के हक में है जो कि उम्र और समझ के हिसाब से, परिपक्वता और शारीरिक जरूरतों के हिसाब से इतने बड़े नहीं हुए हैं कि बाकी पूरी जिंदगी के लिए शायद जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे कड़ा फैसला ले सकें। 

बहुत से धर्मों में, या कि अधिकतर धर्मों में धर्म के संगठन की अपनी व्यवस्था के लिए संन्यास का प्रावधान रहता है। कहीं लोग पादरी बनते हैं, कहीं नन बनती हैं, और कहीं बौद्धभिक्षु। लेकिन बारह बरस की उम्र में किसी बच्ची को बाकी पूरी जिंदगी के लिए संन्यास की कठिन राह का पूरा अहसास हो सकता हो, ऐसा लगता नहीं है। इंसान के तन-मन की परिपक्वता का एक सिलसिला रहता है, और दुनिया के अधिकतर देशों में 18 बरस के आसपास की उम्र को स्वतंत्र फैसले लेने के लिए सही माना गया है। गाड़ी चलाने का लाइसेंस हो, वोट डालने का हक हो, या मर्जी से शादी करने का  मामला हो, हिन्दुस्तान में भी लड़कियों के लिए 18 बरस, और लड़कों के लिए कुछ मामलों में 18 बरस, और कुछ में 21 बरस की न्यूनतम उम्र तय की गई है। अब सूरत की इस बच्ची की खबर को अगर बारीकी से देखें, तो उसके मां-बाप इसे अपनी बेटी का पक्का इरादा बताते हुए उसकी इच्छा पूरी करने की बात कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्ची बचपन से ही संन्यास देखते आई है, और साध्वियों के साथ उसने लंबा पैदल सफर भी किया है। इसलिए वह इस कड़ी जिंदगी से वाकिफ है। लेकिन दूसरी तरफ जब खुशी नाम की इस बच्ची का इंटरव्यू देखें तो वह साफ-साफ कहती दिखाई पड़ती है कि जब वह तीन माह की थी तब उसके परिवार में चार दीक्षाएं हो चुकी हैं, और तब से उसकी आत्मा में यह बीज रोपा जा चुका है, और बाद में माता-पिता ने, महाराज साहब ने इस बीज को अच्छे से उगाया, और अच्छे से खिलाया। वह यह भी कहती है कि वह चार बरस लेट हो चुकी है, महाराज साहब ने कहा था कि 8 बरस की उम्र में ही दीक्षा लेनी चाहिए। इससे जाहिर है कि बच्ची के मन में परिवार और धर्म प्रमुखों ने ऐसी बात डाली है कि 8 बरस की उम्र में ही दीक्षा ले लेनी चाहिए थी। 

जैन समाज को अपने बच्चों के भले के लिए, और धर्म के लिए भी इस बात पर सोचना चाहिए कि क्या इतनी कम उम्र में किसी को संन्यास दिलाना चाहिए? जिन सांसारिक सुखों को, सांसारिकता को त्याग करके संन्यास लेने की भावना ऐसे बच्चों में रहती है, क्या उन बच्चों ने अब तक तमाम सांसारिक सुखों को, सांसारिकता को देखा भी है? जो देखा ही नहीं, पाया ही नहीं, भोगा ही नहीं, उसे त्याग करना क्या एक अपरिपक्व फैसला नहीं है? क्या धर्म को खुद ही ऐसा नियम लागू नहीं करना चाहिए कि बच्चे बालिग होने के बाद ही इस बारे में कोई फैसला लें? आज भारत का कानून बच्चों को बालिग होने के पहले तमाम किस्म के बड़े फैसले लेने से रोकता है, और उनके मां-बाप ही उनके लिए फैसले ले सकते हैं। ऐसे में क्या यह फैसला मां-बाप का लिया हुआ नहीं माना जाएगा, या नहीं होना चाहिए? बारह बरस की उम्र की एक बच्ची को ऐसी कड़ी और कठोर बाकी तमाम जिंदगी तय करने का फैसला उस बच्ची के ही हित में नहीं लगता है। इस बारे में जैन समाज के भीतर ही गंभीर सोच-विचार होना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मई

बात की बात, 29 मई

आदिवासी डॉक्टर की प्रताडऩा और आत्महत्या से उठे सवाल

संपादकीय
29 मई 2019



देश के सबसे बड़े महानगर मुम्बई के एक अस्पताल में काम कऱ रही एक आदिवासी डॉक्टर छात्रा को उसकी जाति को लेकर इतना प्रताडि़त किया गया कि उसने आत्महत्या कर ली। अब जांच के बाद पुलिस ने तीन सवर्ण सहकर्मियों को गिरफ्तार किया है जिन पर प्रताडि़त करने, और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगे हैं। आज हिन्दुस्तान में जब लाखों लोग मेडिकल कॉलेज में दाखिले का इम्तिहान देते हैं, तो उनमें से कुछ हजार लोगों को ही इस पढ़ाई का मौका मिलता है। एक वंचित आदिवासी तबके से आई हुई लड़की अगर पढ़ाई पूरी करने के बाद अस्पताल में काम कर रही है, तो उसने इस पूरे दौर में भी अपने गरीब परिवार के साथ कई किस्म की दिक्कतें झेली होंगी। इसके बाद अगर उसे उसकी जाति को लेकर, आरक्षण के फायदे को लेकर इस तरह प्रताडि़त किया गया, तो उसमें हिन्दुस्तान में आज कुछ भी अटपटा नहीं है, और यह एक आम बात हो चुकी है, यह आम बात रहते आई है, और शायद आगे भी रहेगी। 

देश में आज आरक्षण का फायदा पाने वाले लोगों के बारे में बाकी लोगों के बीच बैठकर जरा सी चर्चा करें, तो लोगों के बीच का जातिवाद एक हिंसक तरीके से सामने आता है। पढ़ाई और नौकरी के एक हिस्से पर हजारों बरस के अन्याय के शिकार लोगों को दिया गया हक बाकी लोगों पर भारी गुजरता है, और उनमें से बहुत से लोग अपनी नफरत निकालने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन दलितों और आदिवासियों को खासकर यह भेदभाव झेलना पड़ता है क्योंकि वे समाज के सबसे निचले आय वर्ग से आते हैं। एक अन्य आरक्षित तबका, ओबीसी, ऐसा है जो कि बेहतर आर्थिक स्थिति वाला है, और उसे तकलीफ इतनी नहीं झेलनी पड़ती, उसे अछूत नहीं माना जाता, उसे जानवर नहीं माना जाता। रामायण की कहानी से लेकर आज तक आदिवासियों को इंसान का दर्जा देने से भी परहेज करने वाले लोग महज हिन्दुस्तान में ही नहीं हैं, बल्कि पश्चिम के गोरों के बीच भी यह हिंसक बेइंसाफी सिर चढ़कर बोलती है, और बहुत से ऐसे देश रहे जहां पहुंचे हुए हमलावर गोरों ने स्थानीय आदिवासियों या मूल निवासियों को गुलाम बनाकर उन्हें जानवरों से भी बदतर हालत में रखा है। 

एक दूसरी दिक्कत यह होती है कि इन आरक्षित तबकों से जो लोग राजनीति की बड़ी कुर्सियों पर या बड़ी सरकारी नौकरियों में आते हैं, वे अपनी इस नई ताकत का इस्तेमाल महज अपने बच्चों के लिए करते हैं, और उनकी बिरादरी बिना किसी फायदे के रह जाती है। आरक्षण का फायदा पाकर ऊपर आए हुए लोग लगातार उस फायदे को इस्तेमाल अपनी अगली पीढ़ी को दिलाने के लिए कभी भी मलाईदार तबके पर रोक का कानून बनने नहीं देते, और सबसे कमजोर तबका अपने आरक्षित तबके के भीतर भी कमजोर बने ही रहता है। देश भर में जगह-जगह कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से जाति के आधार पर भेदभाव के मामले सामने आते हैं, और आजादी की पौन सदी पूरी होने को है, लेकिन भारतीय समाज जातिवादी हिंसा से आजाद होने का नाम नहीं ले रहा है। देश में दलित-आदिवासी तबकों को सुरक्षा देने के लिए कानून तो कड़े बना दिए हैं, लेकिन उनको लागू करने वाली पुलिस जैसी एजेंसियों के भीतर सामाजिक हकीकत को लेकर समझ बहुत कमजोर है, और सरकार के भीतर भी संवेदनशीलता शून्य है। ऐसे में मुम्बई का यह मामला एक बार फिर एक नई बहस शुरू कर सकता है जिसकी कि देश को बहुत जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मई

उत्तेजना के पलों में मजबूर होने के पहले सोच रखें...

संपादकीय
28 मई 2019



एक वक्त फिल्मों और व्यंग्य लेखों के लिए पति-पत्नी और वो, ऐसे प्रेम त्रिकोण की कहानी सोची जाती थी, और खाए गोरी का यार, बलम तरसे मन बरसे जैसे गाने शूट किए जाते थे। अब असल जिंदगी में यह प्रेम त्रिकोण सीधे-सीधे सेक्स त्रिकोण में बदल गया है और इसके नतीजे अखबारों में खबरों के पन्नों पर भरे पड़े हैं। रोजाना कई खबरें ऐसी आ रही हैं कि शादीशुदा जिंदगी में एक या दोनों भागीदार शादी से बाहर के प्रेम या महज सेक्स संबंधों में ऐसे उलझते हैं कि जिनका नतीजा हत्या और आत्महत्या में दिखता है। बहुत से ऐसे सेक्स-जुर्म सामने आ रहे हैं जिनमें दो लोगों के बीच प्रेम या सेक्स संबंध चलते हुए तस्वीरें ली गईं, वीडियो रिकॉर्डिंग की गईं, और फिर रिश्ते अच्छे न रहने पर उनकी बिना पर ब्लैकमेलिंग की गई, और कुछ मामलों में ऐसी ब्लैकमेलिंग से थककर भूतपूर्व प्रेमी ने भूतपूर्व प्रेमिका की हत्या कर दी, या इसका उल्टा भी देखने में आ रहा है।

जुर्म की ऐसी बहुत सी खबरों को पढ़कर जो कुछ बातें दिमाग में आती हैं उनकी शुरूआत करें तो पहली बात यह है कि प्रेम या सेक्स संबंधों के चलते लापरवाही से ऐसे सुबूत तैयार करते न चलें जो कि किसी तीसरे के हाथ लगकर ब्लैकमेलिंग का सामान बनें, या किसी चूक की वजह से सोशल मीडिया पर फैलकर खुदकुशी को मजबूर करें। दूसरी बात यह कि प्रेम संबंधों को सेक्स की उस हद तक ले जाने के पहले याद रखें कि शादी के पहले किसी भी जोड़ीदार का इरादा बदल सकता है, और उस दिन यह मलाल नहीं रहना चाहिए कि शादी का वायदा करके, झांसा देकर रेप किया। अब कुछ बड़ी अदालतों ने भी ऐसे फैसलों में यह मानना शुरू किया है कि ऐसे सेक्स संबंधों को बलात्कार करार देना जायज नहीं है। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि आपसी रिश्तों में बेवफाई करके बाहर जब कोई त्रिकोण खड़ा किया जाता है, तो वह जिंदगी के लिए एक किस्म का बरमूडा त्रिकोण भी बन जाता है जिसमें जिंदगी के जहाज का डूबना महज वक्त की बात होती है, आशंका की नहीं। 

जिंदगी में थोड़ा सा आगे बढ़ें तो यह समझने की जरूरत है कि इंसानी चूक प्रेम या सेक्स में हो गई, तो हो सकता है कि बिना बड़े नुकसान के उससे उबरना भी हो जाए। लेकिन दूसरी तरफ अगर ऐसी चूक फोन, ईमेल, कम्प्यूटर, फोन जैसे किसी सुबूत को पैदा कर जाती है, तो देश में कानून बड़ा कड़ा है, और उससे बाकी जिंदगी के बर्बाद होने का एक बड़ा खतरा खड़ा हो जाता है। फिर अगर ऐसे सुबूतों की वजह से या उनके बिना भी अगर लोग सीधे-सीधे किसी किस्म का हिंसक जुर्म कर बैठते हैं, तो आज के वक्त डिजिटल सुबूतों की वजह से तकरीबन सभी मुजरिम पकड़ा जाते हैं, और ऐसे नौसिखिए मुजरिमों के पकड़े जाने की तो गारंटी सी होती है। रोज की खबरों को ही देख लें तो ऐसे अधिकतर मुजरिम दो-चार दिनों के भीतर ही गिरफ्तार होते हैं।

इसलिए प्रेम और सेक्स के त्रिकोण में, या ब्लैकमेलिंग के खतरे में फंसने के पहले, और फंसाने के पहले ऐसे जुर्म के अंत के बारे में जरूर सोच लेना चाहिए जिसमें शिकार को सामाजिक बदनामी मिलती है, रिश्ते खत्म होते हैं, कई मामलों में मौत भी मिलती है, और मुजरिम को लगभग शर्तिया सजा और कैद मिलती ही है। इसलिए ऐसे संबंधों के तमाम पहलुओं पर उत्तेजना के पलों में मजबूर होने के पहले ही जरूर सोचकर रखें, क्योंकि उत्तेजना के पलों में बदन का दिमाग वाला हिस्सा काम नहीं करता है, पे्रम की उत्तेजना, सेक्स की उत्तेजना, या हिंसा की उत्तेजना, जिसका भी पल हो।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मई

बात की बात, 27 मई

राज्य का सरकारी इलाज 5 बरस में नहीं, युद्धस्तर पर सुधारने की जरूरत..

संपादकीय
27 मई 2019



छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव आए दिन किसी न किसी सरकारी अस्पताल का दौरा कर रहे हैं, बदहाली देख रहे हैं, और हालत सुधारने का बीड़ा भी उठा रहे हैं। दूसरी तरफ एक भी दिन का अखबार ऐसा नहीं है जिसमें पिछली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के भ्रष्टाचार की कोई न कोई खबर न छपी हो। और ये तमाम खबरें राज्य के स्तर पर, या राजधानी के एक बड़े सरकारी अस्पताल को लेकर ही हैं, न कि गांव-गांव तक बिखरे हुए प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के बारे में। ऊपर से नीचे तक स्वास्थ्य विभाग का ढांचा राज्य बनने से लेकर अब तक जिस तरह भयानक भ्रष्टाचार का शिकार रहा है, और इसमें जिस तरह मंत्री से लेकर सचिव स्तर तक के बड़े-बड़े अफसरों का शामिल होना पहली नजर में ही दिखता है, वह बहुत भयानक है। टी.एस. सिंहदेव को यह बहुत ही बिगड़ा हुआ विभाग मिला है, और यह चुनौती भरा भी है, और संभावना भरा भी। 

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में ही हर किसी के लिए चिकित्सा सुविधा का वायदा किया था, और स्वास्थ्य मंत्री ने वैसा ही रूख दिखाया भी है। लेकिन अभी यह बात समझ से परे है कि राज्य का सरकारी चिकित्सा का ढांचा क्या ऐसी किसी योजना का बोझ उठाने के लायक है, या इसमें बुनियादी फेरबदल करके इसका बहुत विस्तार करना होगा, और एक अलग ही ढांचा खड़ा करना होगा? इसके साथ-साथ यह भी देखने-समझने की जरूरत है कि केन्द्र सरकार की बीमा योजना से क्या इस राज्य को कुछ हासिल हो सकता है, या वह इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि राज्य के निजी अस्पताल बीते बरसों में बिना जरूरत नौजवान महिलाओं के गर्भाशय निकालकर बिल बनाते रहे, और अभी भी दांतों के अस्पताल या क्लीनिक बच्चों के दांतों की गैरजरूरी वायरिंग करके झूठे बिल बना रहे हैं। ये तमाम बातें प्रदेश कांग्रेस के ही एक सक्रिय डॉक्टर सदस्य, डॉ. राकेश गुप्ता, लगातार उठाते रहे हैं, और आज भी इस सरकार में भ्रष्ट अफसरों की बड़ी मौजूदगी और उनकी बड़ी ताकत की बात वे उठाते ही हैं। लेकिन सरकार में भ्रष्ट लोगों का कम से कम इतना तो बोलबाला आज भी दिख ही रहा है कि ऐसे लोग नई सरकार में भी कुर्सियों पर बने हुए हैं, और कमाऊ कुर्सियों पर बने हुए हैं। दूसरी तरफ पिछले बरसों के हजारों करोड़ के जो भ्रष्टाचार खरीदी में सामने आ रहे हैं, उसके जिम्मेदार अफसर अब तक खुले घूम रहे हैं, और मेडिकल-खरीदी के खुले अपराध का कोई असर उन पर दिख नहीं रहा है। 

ऐसे में कांग्रेस सरकार प्रदेश के चिकित्सा विभाग को कैसे सुधारेगी, कैसे वह हर गरीब या हर नागरिक को इलाज दे पाएगी। भ्रष्टाचार से परे भी डॉक्टरों की सैकड़ों कुर्सियां खाली हैं। सरकार के आज के वेतनमान पर कोई काबिल डॉक्टर काम करने को तैयार नहीं हैं, कोई डॉक्टर गांवों में जाकर काम करने को भी तैयार नहीं  हैं। करोड़ों की ऐसी मशीनें खरीद ली गई हैं जिनको चलाने के लिए न तो तकनीशियन हैं, और न ही उनकी जांच का मतलब निकालने वाले डॉक्टर। जो सरकारी डॉक्टर हैं, वे निजी प्रैक्टिस की शर्तों वाली सीमित प्रैक्टिस के बजाय बड़े-बड़े अस्पताल चला रहे हैं, और सरकार उसे अनदेखा करते आई है, और आज भी कर रही है। ऐसे में नए डॉक्टरों को लाने के लिए राज्य सरकार को बाजार में डिमांड और सप्लाई का संतुलन देखना होगा। अगर कम तनख्वाह पर डॉक्टर नहीं आ रहे, तो बाजार व्यवस्था के मुताबिक उनके लिए अलग तनख्वाह तय करनी होगी। गरीबों का इलाज, गांव-गांव तक इलाज, और भ्रष्टाचारमुक्त इलाज खासा मुश्किल काम है, और इसे कामयाबी से करने में हो सकता है कि इस सरकार का बचा कार्यकाल भी कम पड़े। 

टी.एस. सिंहदेव जिस तरह दिलचस्पी से मेहनत कर रहे हैं, हो सकता है कि वे कामयाब हो जाएं, लेकिन हर दिन दसियों हजार मरीज आज भी कमजोर चिकित्सा पा रहे हैं, या चिकित्सा नहीं पा रहे हैं। इसलिए इस एक विभाग को पांच साल के कार्यकाल के हिसाब से सुधारने की धीमी रफ्तार कुछ ज्यादती होगी, और इसे युद्ध स्तर पर सुधारना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 26 मई

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मई

राजनीतिक भविष्यवाणी और वायदों का भांडाफोड़ जरूरी

संपादकीय
26 मई 2019



लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भोपाल में दिग्विजय सिंह के लिए यज्ञ करने वाले एक किसी बाबा ने साढ़े पांच क्विंटल मिर्च जलाकर यज्ञ किया था, और फिर यह मुनादी भी की थी कि अगर दिग्विजय नहीं जीतेंगे तो वे यज्ञ की जगह पर ही समाधि ले लेंगे। अब सोशल मीडिया पर एक टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग तैर रही है जिसमें कोई आदमी इस बाबा से फोन पर बात कर रहा है, और पूछ रहा है कि समाधि कब ले रहे हैं, देर क्यों कर रहे हैं, और बाबा है कि झल्लाए जा रहा है। एक दूसरा कॉर्टून एक विख्यात कॉर्टूनिस्ट सुधीर दर ने पोस्ट किया है जिसमें किसी भविष्यवक्ता के दरवाजे पर एक नेता चप्पल लेकर पहुंचा हुआ है। देश भर में ऐसी कई और घोषणाएं हुई थीं जिनमें कई भविष्यवक्ताओं ने अलग-अलग नेताओं और पार्टियों की जीत बताई थी, जो कि एक-दूसरे से अलग भी थीं, और नतीजों के पहले भी यह तो जाहिर था ही कि उनमें से कोई एक तो गलत होगी ही। 

चूंकि हिन्दुस्तान में हर पांच बरस में आम चुनाव होते हैं, और हर कुछ महीनों में कुछ प्रदेशों के चुनाव होते हैं, या उपचुनाव होते हैं। ऐसे में लोकतंत्र के लिए यह जरूरी हो गया है कि भविष्यवाणी करने वाले सभी पेशेवर ज्योतिषियों की कतरनों को सम्हालकर रखा जाए, और नतीजे आने के बाद नतीजों के साथ मिलाकर उनका भांडाफोड़ किया जाए। ऐसा जरूरी इसलिए भी है कि इनमें से कई ज्योतिषी नतीजे आने के बाद कम्प्यूटर और फोटोशॉप की मेहरबानी से पिछली तारीखों की कतरनें गढ़वा लेते हैं जिनमें उनकी भविष्यवाणी आए हुए नतीजों से मेल खाते दिखती हैं, और वे इसे दिखाकर लोगों को आगे बेवकूफ बनाना जारी रखते हैं। लोगों को ऐसे पाखंड से बचाने के लिए समझदार लोगों की यह सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है कि अंधविश्वास का पर्दाफाश किया जाए। 

चुनावी नतीजे हिन्दुस्तान में किसी भी दूसरे नतीजे के मुकाबले अधिक बड़े सट्टे का सामान रहते हैं। शेयर बाजार भी चुनावी नतीजों पर नजर रखता है, और उनसे प्रभावित होता है। फिर देश में अंधविश्वास में डूबी हुई आबादी का अनुपात खासा बड़ा है, इसलिए उन पर भी ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं की बातों पर असर होता है, और किसी नेता या पार्टी के वोट घटते हैं, किसी दूसरे नेता या पार्टी के वोट बढ़ते हैं। लोकतंत्र में जनता के फैसले को अंधविश्वास से प्रभावित करने की ऐसी हरकत को भी उजागर करना चाहिए। आज जब इक्कीसवीं सदी में भी बहुत से अखबारों में रोजाना का भविष्यफल छापा जाता है, और जिस दिन ज्योतिषी के पास मैटर नहीं आता, अखबार का कोई सबएडिटर ही राशियों और लाईनों की अदला-बदली करके भविष्यवाणी तैयार कर लेता है, तो ऐसे में आज देश में एक वैज्ञानिक सोच और तर्कशक्ति को फिर से जिंदा करने की जरूरत है। अभी पिछले दो महीनों में ही देश के हर बड़े भविष्यवक्ता ने चुनावी भविष्यवाणी की हैं, और इनका एक विश्लेषण कई झूठ उजागर कर सकता है। 

इससे परे जो नेता या उनके समर्थक बड़े-बड़े दावे करते हैं, उनके सिर, उनकी मूंछें मुंडवाने पर भी जोर डालना चाहिए, और उनकी कतरनों को अगले चुनाव के लिए भी सम्हालकर रखना चाहिए। जागरूक मतदाता कैसा कर सकते हैं इसकी एक वीडियो मिसाल कुछ हफ्ते पहले चंडीगढ़ से आई थी। वहां भाजपा प्रत्याशी किरण खेर के प्रचार के लिए पहुंचे उनके पति अनुपम खेर जब बाजार में एक दुकान पर पहुंचे तो दुकानदार ने पांच बरस पहले के भाजपा के चुनावी घोषणापत्र को दिखाते हुए पूछा कि इन पुराने वायदों का क्या हुआ? बेजवाब अनुपम खेर तुरंत वहां से निकलकर आगे बढ़ लिए। ऐसा कई जगहों पर कई पार्टियों और कई नेताओं के साथ हुआ होगा, और अगर वोटर ऐसे ही चौकन्ने हो जाएं, तो नेताओं के वायदे, उनकी भविष्यवाणियां, इन सब पर लगाम लग जाएगी। 

ठीक ऐसा ही टीवी और अखबारों के एक्जिट पोल या ओपिनियन पोल के साथ होना चाहिए, और उन्हें करने वाली एजेंसियों के साथ भी। जिस तरह आज भारत में एडीआर नाम का एक एनजीओ उम्मीदवारों की दौलत, उनके जुर्म, और उनकी बाकी बातों का विश्लेषण करके लगातार जनता के सामने रखता है, ठीक उसी तरह चुनाव नतीजों के बाद कोई ऐसा संगठन रहना चाहिए जो कि किसी भी किस्म की, या हर किस्म की भविष्यवाणी, वायदे, चुनौती को लेकर बैठे, और नतीजों के साथ उनका मिलान करके जनता के सामने रखे। वोटों और सीटों को लेकर पार्टियों और नेताओं के दावों को नतीजों के बाद उजागर करना भी जरूरी है, और जब अगले किसी चुनाव में वे यही काम फिर से करें, तो उन्हें उनका इतिहास याद दिलाना भी जरूरी है। चूंकि आम जनता अपनी समझदारी के इस्तेमाल के लिए बहुत गंभीर नहीं रहती, इसलिए उसके सामने ऐसे विश्लेषण को पकाकर तश्तरी में पेश करना जरूरी है, और कुछ लोगों को यह काम करना चाहिए। आज समाचारों की कुछ वेबसाइटें ऐसी हैं जो कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर झूठ और फेक का पर्दाफाश करने के एक जिम्मेदार काम में लगी हुई हैं, इसलिए इसी तरह का काम भविष्यवाणियों और दावों के साथ भी होना चाहिए, अधूरे वायदों के साथ भी होना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 25 मई

दीवारों पर लिक्खा है, 25 मई

राहुल की लीडरशिप पर सवाल, पहला पत्थर मारने का हक...

संपादकीय
25 मई 2019



कांग्रेस की सबसे बड़ी कमेटी की बैठक अभी चल रही है, और उससे यह खबर छनकर आ रही है कि अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर इस्तीफे की पेशकश की, कांग्रेस कार्यसमिति ने खारिज कर दिया। ऐसी चर्चा पिछले दो दिनों से चली आ रही थी, और इसमें अटपटा कुछ नहीं था क्योंकि किसी भी पार्टी के मुखिया को एक बहुत बड़ी शिकस्त की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए। अब सवाल यह उठता है कि यह कितनी बड़ी शिकस्त है? 

राहुल गांधी 2014 के आम चुनावों के बाद पार्टी के अध्यक्ष बने, और यह उनका पहला आम चुनाव रहा। वे खुद पहले संसद का चुनाव जीतते आए हैं, और इस बार भी दो में से एक सीट पर उनकी जीत बरकरार है। वे परिवार की पुरानी परंपरागत सीट अमेठी को खो बैठे हैं, और इसे भी लीडरशिप से इस्तीफे की एक बड़ी वजह करार दिया जा रहा है। लेकिन आंकड़ों को देखकर यह समझने की जरूरत है कि अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने क्या पाया है, और क्या खोया है। पिछले आम चुनाव, 2014 में कांग्रेस के वोट 19.5 फीसदी रह गए थे, और भाजपा के वोट 31.34 फीसदी थे जिससे नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी थी। इसके बाद अभी के ताजा नतीजों में कांग्रेस के वोट 19.5 फीसदी बरकरार हैं, और भाजपा के वोट बढ़कर 37.4 फीसदी हो गए हैं। 2014 में कांग्रेस ने 44 सीटें पाई थीं, और उसकी अगुवाई वाली यूपीए गठबंधन को 90 सीटें मिली थीं। अभी 2019 में कांग्रेस की सीटें 10 फीसदी से अधिक बढ़कर 52 हो गई हैं, और यूपीए गठबंधन की सीटें 92 हो गई हैं। देश भर में एनडीए और नरेन्द्र मोदी की जैसी लहर दिखाई पड़ रही है, और नतीजों में उन्हें जितनी अधिक सीटें मिली हैं, उन्हें देखते हुए ऐसा लग रहा है कि यह यूपीए और राहुल गांधी की बहुत बुरी शिकस्त है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यूपीए और कांग्रेस इन दोनों को पिछले आम चुनाव से अधिक सीटें मिली हैं, और उनका वोट जरा भी कम नहीं हुआ है। यहां पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि भाजपा एक वक्त लोकसभा में महज दो सदस्यों की पार्टी थी, और वहां से बढ़ते हुए वह तीन सौ से अधिक तक पहुंची है। इसलिए आंकड़ों की संभावनाएं हर किसी के सामने रहती हैं। 

वे तमाम लोग जो कि पिछले पांच बरस या उसके भी पहले से राहुल गांधी को पप्पू साबित करने पर उतारू थे, उनका यह हक बनता है कि वे राहुल गांधी से इस्तीफे की मांग करें, और कांग्रेस पार्टी को खत्म करने की भी मांग करें। लोकतंत्र में लोग एक-दूसरे पर इतना हमला तो करेंगे ही करेंगे। लेकिन जहां तक यूपीए, कांग्रेस, और राहुल का सवाल है, तो ये राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण की ऐसी सुनामी के बीच भी अपने पैरों पर पांच बरस पहले की जगह पर अगर टिके हुए हैं, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या यह बहुत बुरी शिकस्त है? लोगों के अपने-अपने पैमाने रहते हैं, और मीडिया ने मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को पेश करके खबरों के लिए जो नाटकीयता खड़ी की थी, वह उसकी अपनी रोजी-रोटी की मजबूरी थी। इस आम चुनाव में इन दोनों गठबंधनों के अलावा इतनी बड़ी संख्या में क्षेत्रीय पार्टियां गठबंधन के बाहर भी थीं, और चुनावी नतीजे भी बताते हैं कि इन दोनों से परे के सांसदों की गिनती यूपीए के सांसदों से अधिक है। किसी राज्य में तीन उम्मीदवार मैदान में थे, तो कहीं चार। ऐसे में यह जाहिर है कि कुछ दशक पहले जिस तरह कांग्रेस के मुकाबले बाकी तमाम पार्टियों में वोट बंटते थे, उसी तरह इन दो आम चुनावों में भाजपा के मुकाबले बाकी पार्टियों में वोट बंटे हैं। नतीजा यह है कि मोदी और एनडीए ने सरकार बनाने की जरूरत से बहुत अधिक सीटें हासिल कीं। लेकिन एक और बात जो याद रखने की है वह यह कि कुछ महीने पहले ही राहुल गांधी की ही अगुवाई में उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी ने मोदी की भाजपा की सरकारों को तीन राज्यों, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान से बेदखल किया था। उस जीत के वक्त भी कांग्रेस के मुखिया राहुल गांधी ही थे जो कि लोकसभा चुनाव में भी थे। 

अब राहुल के खिलाफ एक और बात जो रह जाती है वह वंशवाद की है। आज बहुत से लोग इस बात को कह और मान रहे हैं कि कांग्रेस जब तक एक परिवार के कब्जे में रहेगी, वह आगे नहीं बढ़ पाएगी, जिंदा भी नहीं रह पाएगी। लोकतंत्र में वंशवाद जाहिर तौर पर बुरी बात है। और इस बुरी बात के बारे में थोड़ा सा सोचें तो ठाकरे वंश के कब्जे की शिवसेना याद पड़ती है, बादल वंश के कब्जे का अकाली दल याद पड़ता है, एक वक्त एनडीए के साथ रहे चन्द्राबाबू नायडू का परिवार याद पड़ता है, अभी कल तक भाजपा की भागीदार रही मेहबूबा की पीडीपी याद पड़ती है, एनडीए की पिछली पारी में उसके साथ रहे कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी याद पड़ती है, और यह फेहरिस्त काफी लंबी हो सकती हैं। इसलिए वंशवाद पर पहला पत्थर चलाने का हक उस गठबंधन को ही हो सकता है जिसमें वंशवादी नेता और पार्टियां न हों। अभी कल तक चुनावी नतीजों के जो विश्लेषण आ रहे थे, उनमें भाजपा नेताओं की भी दूसरी पीढ़ी के ढेरों नाम आ रहे थे। ऐसे में कांग्रेस पार्टी अपना मुखिया किसे रखती है, यह पार्टी के भीतर तय होना है, और अगर उस पार्टी को लगता है कि देशभर में बिखरे उसके महत्वाकांक्षी नेताओं के बीच शक्ति संतुलन बनाकर रखने और उन्हें एक साथ बांधकर रखने के लिए सोनिया परिवार का कोई जरूरी है, तो यह उस पार्टी की अपनी जरूरत और अपनी सोच है। हम इसी जगह पर कुनबापरस्ती के खिलाफ दर्जनों बार लिखते आए हैं, लेकिन यह हमला छांट-छांटकर कुछ पार्टियों और कुछ नेताओं पर करना जायज नहीं है। गुड़ खाने वाले गुलगुलों को कोसें, यह कुछ नाजायज बात है।

फिर भी कांग्रेस पार्टी के सामने एक लंबा भविष्य है, और जब 15 बरस पहले देश सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री मान चुका था, कांग्रेस संसदीय दल उन्हें औपचारिक रूप से नेता चुन चुका था, जब डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति भवन में सोनिया गांधी के नाम की चि_ी शपथ ग्रहण के लिए टाईप हो चुकी थी, तब सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था, और राष्ट्रपति को चि_ी दुबारा टाईप करवानी पड़ी थी, यह बात डॉ. कलाम ने खुद अपनी किताब में लिखी है। इसलिए यह परिवार आज अध्यक्ष की कुर्सी किसी और को देता है तो भी वह अटपटी बात नहीं होगी, और नहीं भी देता है, तो भी वह इस कुनबापरस्त देश की बाकी पार्टियों के बीच अटपटी बात नहीं होगी। किसी एक हार से, और जैसा कि हमने शुरू में गिनाया है, यह कांग्रेस की आंकड़ों की हार नहीं है, सीटों की हार नहीं हैं, और राजनीति में लोकतांत्रिक मुद्दों की, नैतिकता की हार भी नहीं है, ऐसे में उसके नेता के इस्तीफे की कोई जरूरत भी नहीं है। इस बहुत ही चुनौतीपूर्ण चुनाव में भी कांग्रेस और यूपीए अगर मोटेतौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों पर बने रहे, तो यह आंकड़ों के मुकाबले लोकतंत्र की अधिक बड़ी जीत है। और जैसा कि कल पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने ट्वीट किया है- लोकतंत्र में किसी हारे हुए का मखौल नहीं उड़ाना चाहिए। ऐसा करने वाले विजेता को आगे इसका खासा दाम चुकाना पड़ता है। इस देश में पहले इससे बड़ी चुनावी जीत भी देखी है लेकिन अहंकार आगे चलकर शिकस्त दिलाता है। इसलिए मखौल उड़ाने वाले सावधान रहें।

(Daily Chhattisgarh) 

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दीवारों पर लिक्खा है, 24 मई

दो चुनाव, और दो पार्टियां, छत्तीसगढ़ को एक बड़े आत्ममंथन की जरूरत..

संपादकीय
24 मई 2019



लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर देश भर की तस्वीर पर कल इसी जगह हमने लिखा था, लेकिन उसमें छत्तीसगढ़ अकेले पर कुछ अधिक लिखने की गुंजाइश नहीं थी, लेकिन जरूरत तो थी ही। छत्तीसगढ़ में पिछले तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस महज एक सीट पा सकी थी, और दस सीटें भाजपा को मिलते आई थीं। इस बार कांग्रेस को इससे ठीक उल्टी उम्मीद थी क्योंकि कुछ महीने पहले के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस दस लोकसभा क्षेत्रों में नंबर वन थी, और कुल एक लोकसभा सीट  के विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा कांग्रेस से आगे थी। प्रदेश में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में जमकर मेहनत की थी, एक बहुत लुभावना चुनाव घोषणा पत्र बनाया था, कर्जमाफी, अधिक समर्थन मूल्य, और धान बोनस की घोषणा की थी, और भाजपा से करीब दस फीसदी वोट अधिक पाकर 90 में से 68 सीटें पाई थीं। राज्य में सरकार बनने के तुरंत बाद इन तीनों वायदों को सरकार ने तकरीबन पूरा भी किया था, और इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तकरीबन हर दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर किसी न किसी तरह का राजनीतिक और चुनावी हमला भी किया था। वे देश के कांग्रेस मुख्यमंत्रियों में सबसे मुखर थे, और शायद अपने आपको अपनी पार्टी के मुखिया के सामने एक अलग तरह से स्थापित भी कर रहे थे। लेकिन चुनावी नतीजे मुख्यमंत्री, जो कि प्रदेश अध्यक्ष भी हैं, को एक बड़ा सदमा देने वाले निकले। हो सकता है कि दिल के बहलाने को कुछ लोग यह तर्क ढूंढ लाएं कि पूरे देश में ही जब कांग्रेस इस बुरी तरह हारी है, तब छत्तीसगढ़ में भी ऐसा हाल तो होना ही था। लेकिन कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री ने पंजाब में पार्टी की इज्जत बचाने का काम किया है, और एक मिसाल पेश की है। इसलिए कांग्रेस को बैठकर यह देखना होगा कि कुछ महीने पहले जीता गया तकरीबन पूरा प्रदेश, आज तकरीबन पूरा का पूरा हाथ से कैसे निकल गया? कैसे छत्तीसगढ़ के लगभग हर मंत्री की सीटों पर कांग्रेस हारी है, सिवाय दो मंत्रियों के। कैसे सबसे अधिक मंत्रियों वाले, खुद मुख्यमंत्री के गृह जिले में कांग्रेस हारी है? कैसे मुख्यमंत्री पद के तीनों दावेदार रहे लोगों के प्रभाव क्षेत्र में कांग्रेस हारी है? प्रदेश के जिस अनपढ़-आदिवासी मंत्री कवासी लखमा का बड़ा मजाक बनाया जाता है, महज उसी के जिले में कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती है, और विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत की पत्नी श्रीमती ज्योत्सना महंत ने प्रदेश में कांग्रेस को दूसरी जीत दिलाई है। 

लेकिन जितना कांग्रेस के सोचने को है, उससे जरा भी कम भाजपा के सोचने को नहीं है। पूरे देश में जब भाजपा की टिकटें तय हो रही थीं, तो छत्तीसगढ़ अकेला प्रदेश था जहां 15 बरस से अकेले मुख्यमंत्री चले आ रहे डॉ. रमन सिंह, और इन तमाम बरसों में उनकी पसंद के बनते आ रहे प्रदेश अध्यक्षों की बनाई हुई लिस्ट को अमित शाह ने पूरी तरह खारिज कर दिया था, और कुछ असंभव से लगते पैमाने लागू किए थे कि किसी भी सांसद को, किसी भी विधायक को, किसी भी हारे हुए सांसद-प्रत्याशी को, किसी भी हारे हुए विधायक-प्रत्याशी को, या उनके रिश्तेदारों को टिकट नहीं दी जाएगी। ऐसे में लगता था कि राज्य में कोई ढंग का उम्मीदवार ही नहीं मिलेगा। लेकिन अमित शाह ने तमाम 11 नए लोगों को मैदान में उतारा, और उनमें से 9 ने चुनाव जीता, और इनमें से अधिकतर लाख-लाख वोटों से अधिक से जीते। लोगों को याद होगा कि जब यह लिस्ट आई थी तब हमने इसी जगह लिखा था कि अगर राज्य भाजपा की लिस्ट को पूरी तरह खारिज करके दिल्ली की बनाई हुई लिस्ट अगर कामयाब होती है, तो उससे छत्तीसगढ़ का भाजपा संगठन, यहां के नेता बेअसर और अप्रासंगिक साबित हो जाएंगे कि मोदी-शाह जिसे चाहें उसे जिता सकते हैं। और हुआ भी वही, 11 में से 9 का जीतना एक असंभव सी लगती बात थी, और राज्य के किसी अतिरिक्त योगदान के बिना मोदी-शाह के असर ने बाकी देश की तरह छत्तीसगढ़ को भी जीतकर दिखा दिया, और तमाम ऐसे सांसद बनाए जो कि उनकी सीधी पसंद के हैं। राज्य में भाजपा के पास इस जीत को लेकर खुशी मनाने के तर्क तो हैं क्योंकि सीटों के अलावा देश में उनका प्रधानमंत्री फिर लौट रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नतीजे राज्य की भाजपा की अहमियत किसी भी तरह से बढ़ा रहे हैं, या फिर महज यह साबित कर रहे हैं कि मोदी-शाह दिल्ली में बैठे देश भर में जिसे जहां चाहे जिता सकते थे, और उन्होंने जिता लिया? 

छत्तीसगढ़ में कुछ महीनों बाद म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में पार्षद और पंच का फैसला ईकाई-दहाई के वोटों से हो जाता है। ऐसे में सत्तारूढ़ कांग्रेस, और हाल ही में दिल्ली की सत्ता तक पहुंची, और राज्य में भारी कामयाब साबित हुई भाजपा दोनों के सामने यह एक बड़ी चुनौती रहेगी कि वे कैसे इन चुनावों में कामयाब होते हैं? दिल्ली को इतनी फुर्सत नहीं रहेगी कि वे गली-मुहल्ले के चुनाव के बारे में देखें। और ऐसे में राज्य के ही नेताओं पर यह चुनौती रहने जा रही है। इन दोनों ही पार्टियों की अपनी बहुत सी बुनियादी दिक्कतें इस प्रदेश में हैं। उन सबकी यहां पर चर्चा मुमकिन नहीं है। लेकिन यह तय है कि आज से लेकर स्थानीय संस्थाओं के चुनावों तक जो पार्टी ढंग से तैयारी करेगी, पक्ष या विपक्ष का अपना जिम्मा ठीक से निभाएगी, उसे जीत हासिल होगी। विधानसभा कांग्रेस के हिस्से गई, और लोकसभा भाजपा के हिस्से। अब स्थानीय चुनाव इन दोनों के बीच एक बड़ी अहमियत वाला मुकाबला रहेंगे। लेकिन इसकी तैयारी के लिए यह भी जरूरी होगा कि इन दोनों पिछले चुनावों के नतीजों को देखकर अपनी-अपनी कमजोरियों को येे पार्टियां समझें, मानें, और उनको दूर करने की कोशिश करें। देश और प्रदेश दोनों में मजबूत सरकारें जारी रहने वाली हैं, लेकिन स्थानीय संस्थाओं के चुनाव के मुद्दे और गंभीर, और बारीक रहने वाले हैं, जो कि और बड़ी चुनौती भी रहेंगे। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मई

मोदी का जादू बरकरार, ऐसी ऐतिहासिक वापिसी

संपादकीय
23 मई 2019



जैसा कि चार दिन पहले के एक्जिट पोल ने बताया था, हिन्दुस्तानी वोटरों पर मोदी का जादू बरकरार है, और भाजपा की चुनाव जीतने की मशीन ने जो महारथ हासिल कर ली है, उसने एक बार फिर अपनी खूबी को साबित किया है। आज सुबह तक यह लग नहीं रहा था कि गिनती शुरू होने के तीन घंटों के भीतर देश में अगली मोदी सरकार की बुनियाद इतनी मजबूत हो जाएगी। अभी समंदर की लहरों के हर थपेड़े के साथ गिनती के आंकड़े किनारे लगते जा रहे हैं, और अब तक गिनती के रूझान से एनडीए की सरकार बन चुकी है, और बीजेपी तीन सौ सीटों को छू रही है। कांग्रेस और यूपीए के लिए एक मामूली तसल्ली की बात यह हो सकती थी कि उसने अपनी सीटें कुछ बढ़ा ली हैं, लेकिन दोपहर ढाई बजे जब यह लिखा जा रहा है, उस वक्त कांग्रेस और यूपीए के नेता राहुल गांधी अपनी पारिवारिक सीट अमेठी पर स्मृति ईरानी से पीछे चल रहे हैं। अगर यह रूख जारी रहता है तो कांग्रेस के पास पिछले चुनाव के मुकाबले हाथ छाप और यूपीए की सीटों में थोड़ी सी बढ़ोत्तरी गिनाने के लिए भी साहस नहीं रहेगा। देश के रूख और रूझान की एक झलक देखनी हो तो हांडी का वह चावल भोपाल है जहां पर हिंदुत्व का सबसे आक्रामक गोडसेपूजक चेहरा चुनाव जीत रहा है, और दिग्विजय सिंह निपट चुके हैं। 

आज के चुनावी नतीजों को संपादकीय के इन दो कॉलमों में समेटना मुमकिन नहीं हैं, लेकिन फिर भी कुछ कतरा-कतरा बातों को छुएं, तो यह बात जाहिर है कि देश की जनता की नब्ज पर हाथ धरने से लेकर जनता की धड़कन को अपने मुताबिक ढालने तक का जो काम नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने किया है, वह पूरी तरह अभूतपूर्व और ऐतिहासिक है। मोदी सरकार की पांच बरस की तमाम नाकामयाबी पर चुनाव अभियान का ऐसा सर्जिकल स्ट्राईक डिजाइन किया गया कि विपक्ष के हाथ से तमाम नारे छिन गए। हमने पिछले महीनों में लगातार यहां पर यह बात लिखी कि किसी लोकतंत्र में चुनाव जीतने के लिए जितने किस्म के कानूनी औजार गढ़े और इस्तेमाल किए जा सकते हैं, उन सबमें मोदी-शाह की जोड़ी ने रिकॉर्ड कायम किया है। इनसे परे भी कई किस्म के औजार न सिर्फ इन दोनों ने बल्कि बहुत सी पार्टियों और बहुत सी नेताओं ने इस्तेमाल किए होंगे, लेकिन हम उनकी चर्चा नहीं कर रहे हैं। अब जिस दिन देश का आखिरी हिस्सा वोट डाल रहा था, उस दिन 24 घंटे अगर लगातार मोदी की केदारनाथ यात्रा टीवी पर छाई हुई थी, तो उसमें न कुछ गैरकानूनी था, न अनैतिक, और न अलोकतांत्रिक। बीजेपी ने इस तरकीब को सोचा और इसका इस्तेमाल कर लिया। और यह पहला मौका नहीं था। पिछले बरस 12 मई को जब कर्नाटक वोट डाल रहा था, और चुनाव प्रचार दो दिन पहले बंद हो चुका था, तो नरेन्द्र मोदी दिन भर नेपाल के मंदिरों में घूमते रहे, और हिन्दुस्तानी टीवी चैनलों पर वही चलते रहा। इस बार वे केदारनाथ की गुफा से आंखें और मुंह खोले बिना खबर बनते रहे, और किसी ने उनके विरोधियों को ऐसी किसी तरकीब से रोका नहीं था। 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बड़े दमखम से मोदी के खिलाफ चुनावी हमला आखिरी दिन तक जारी रखा, लेकिन ऐसा लगता है कि यूपीए की मुखिया के रूप में कांग्रेस पार्टी ने एक के बाद एक, कई गलतियां कीं। अभी दो दिन पहले ही इसी जगह पर हमने लिखा था-  ''पिछले आधे बरस को अगर देखें, तो जब देश की बहुत सी पार्टियां तरह-तरह के गठबंधन बना रही थीं, कांग्रेस ने जाने किस जोड़-घटाने के तहत एक के बाद दूसरा प्रदेश बिना गठबंधन अकेले लडऩा तय किया। उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा के साथ किसी तालमेल की कोशिश कम से कम मीडिया में नहीं आई, बंगाल में कांग्रेस न ममता के साथ रही, न वामपंथियों के साथ, केरल में कांग्रेस वामपंथियों के खिलाफ भी लड़ी, और उन्हें नाराज करने की हद तक लड़ी। ऐसा और भी कई प्रदेशों में हुआ जो कि दिल्ली में जाकर खत्म हुआ, और अरविंद केजरीवाल के साथ कोई तालमेल नहीं हुआ, न दिल्ली में, न पंजाब में। एक पार्टी की हैसियत से यह कांग्रेस का हक भी है और उसकी जिम्मेदारी भी है कि किसी प्रदेश में वह ऐसा अपमानजनक समझौता, गठबंधन, या तालमेल न करे जो कि उस प्रदेश में पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़कर रख दे और उस प्रदेश में पार्टी को जमीन से खत्म ही कर दे। यह बात तो ठीक है, लेकिन एक दूसरी बात यह भी है कि जब मामला संसद में एनडीए के खिलाफ यूपीए या किसी नए गठबंधन के आंकड़े खड़े करने का हो, तो कांग्रेस को क्षेत्रीय गठबंधन के बारे में अधिक सोचना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस अकेले चलने की नीति पर टिकी हुई, या अड़ी हुई दिखती रही। यूपीए के पिछले साथियों के साथ वह जरूर है, लेकिन बहुत से राज्यों में उसने जीत की संभावनाएं तभी खो दीं, जब उसने उन राज्यों में कोई तालमेल नहीं किया।'' 

दूसरी तरफ एनडीए के भीतर मोदी एक सबसे बड़े भागीदार शिवसेना की खुली बगावत पूरे पांच बरस तक झेलते रहे, जब उद्धव ठाकरे खुद और उनका अखबार सामना मोदी की एक-एक रीति-नीति के खिलाफ बोलते और लिखते रहे। इसके बावजूद जैसे-जैसे चुनाव करीब आया, भाजपा ने अपने तमाम साथियों के साथ तालमेल फिर कायम कर लिया, और यह उसके काम भी आया। 

लेकिन आज अगर कुछ ताजा बात करें, तो यह बात साफ है कि पांच बरसों के बहुत से गलत फैसलों के नुकसान के बावजूद भाजपा ने एक शानदार वापिसी की है, और शिवसेना जैसे उसके स्थाई आलोचक भागीदार ने भी उसका लोहा मान लिया है। भाजपा ने सात अलग-अलग तारीखों पर हुए मतदान को देखते हुए उन सीटों के मतदाताओं की नब्ज समझते हुए ठीक उसके पहले जिस तरह के मुद्दे उठाए, वह बारीक रणनीति देखने लायक थी। दूसरी तरफ देश भर में एनडीए के खिलाफ अभियान चला रही कांग्रेस पार्टी में ऐसे बारीक फेरबदल की न तैयारी थी, और न ही मानो उसे कोई फिक्र थी। ऐसा लगता है कि यूपीए और कांग्रेस में जो लोग भी सत्ता में अपने आने की संभावना देखते थे, उनको जनता के बीच मोदी के खिलाफ एक लहर की या तो उम्मीद थी, या महज हसरत थी। ये दोनों ही बातें गलत साबित हुईं, और भारत पर सरहद पार से जो आतंकी हमला मोदी सरकार की साख चौपट करने वाला होना चाहिए था उसी हमले पर एक जवाबी कार्रवाई करके मोदी ने पूरे देश में अपने पक्ष में एक लहर पैदा कर दी। देश को पाकिस्तान का खतरा दिखाया, अपने हाथों में देश को महफूज बताया, और देश के वोटरों के बीच अगर किसी एक मुद्दे ने सबसे अधिक काम किया लगता है, तो वह सर्जिकल स्ट्राईक का मुद्दा है। और मजे की बात यह रही कि जिन लोगों ने इस सर्जिकल स्ट्राईक के संदिग्ध पहलुओं और दावों पर मामूली सवाल किए, उन्हें भी पाकिस्तानपरस्त और हिन्दुस्तान के गद्दार साबित करने का एक काम सोशल मीडिया पर बखूबी किया गया। पूरे देश में एक हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद इस तरह देश के स्वाभिमान के लिए जरूरी साबित किया गया, कि किसी भी और पार्टी के लिए उसके मुकाबले कोई जवाब नहीं बचा। यहां तक कि चुनाव में भाजपा के जिन तीन नेताओं ने गोडसेवादी बयान दिए, गांधी को गालियां दीं, जिन्हें भाजपा ने नोटिस भी जारी किए, वे लाखों वोट से जीतते दिख रहे हैं, इससे देश में हवा कैसी थी यह साबित होता है। दूसरी तरफ मोदी सरकार के पांच बरस के गलत फैसलों, देश की खराब आर्थिक हालत, बेरोजगारी, हवा में साम्प्रदायिक तनाव, अल्पसंख्यकों को खतरा जैसे तमाम मुद्दों को चुनावी मोर्चे से हटाने में मोदी-शाह कामयाब रहे, और उनके विरोधी दल इन मुद्दों को उठाने में नाकामयाब रहे। जितने किस्म के वायदे पांच बरस पहले मोदी ने किए थे, उनमें से कोई भी इस चुनाव में मुद्दा नहीं बन पाए जबकि वे अधूरे रहे। आज सुबह से जितने टीवी चैनलों पर कुछ समझदार विश्लेषकों की बातचीत आ रही है, उनमें सबसे बड़ी एक बात यह है कि कांग्रेस ने हर गरीब परिवार को 72 हजार रूपए सालाना देने की जिस न्याय योजना का वायदा किया था, वह इस पूरे चुनाव अभियान में कहीं खो गई, और खुद कांग्रेस को उसका फायदा उठाने की परवाह नहीं रह गई। 

आज यहां पर यह लिखते हुए भी खबर यह है कि अमेठी से राहुल गांधी लगातार भाजपा की स्मृति ईरानी से पीछे चल रहे हैं। हालांकि वे केरल की वायनाड सीट पर बहुत लंबी लीड से आगे हैं, लेकिन वहां की कोई भी लीड उनको अमेठी के नुकसान से उबार नहीं सकेगी। ऐसा नहीं है कि देश के बड़े नेता कभी चुनाव हारते नहीं हैं, लेकिन राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद इस पहले आम चुनाव में अपने आपको बेहतर तरीके से स्थापित कर सकते थे अगर वे कांग्रेस और यूपीए की सीटों में इजाफा करने के साथ-साथ अमेठी में हार से बचे होते। खैर, अभी उम्र उनके साथ है, और अगले पांच बरस का संघर्ष सामने है। हो सकता है कि भाजपा की प्रचार की रणनीति, और उसके जनधारणा-प्रबंधन के लोकतांत्रिक हिस्सों में से राहुल कुछ सीख भी पाएं। महबूबा मुफ्ती ने अभी-अभी मोदी को बधाई देते हुए ट्वीट किया है कि कांग्रेस को एक अमित शाह की जरूरत है। 

नतीजे पूरे आने के बाद यह अधिक दूर तक समझ आएगा कि किस-किस मोर्चे पर हार और जीत की क्या वजहें रहीं, लेकिन फिलहाल तो इस शानदार और मजबूत जीत के लिए नरेन्द्र मोदी और अमित शाह अपने साथियों के साथ बधाई के हकदार हैं क्योंकि लोकतंत्र में मतदान के नतीजों से अधिक और कुछ साबित नहीं किया जा सकता। अगले पांच बरस के लिए एनडीए, भाजपा, और खासकर मोदी को जिस तरह का मजबूत जनादेश मिला है, वह मोदी के पिछले पांच बरसों को एक बड़ी चुनौती भी है। चुनाव अभियान से परे अगर इन बीते पांच बरसों की गलतियों से उन्होंने कुछ सीखा हो, तो देश के अगले पांच बरस बेहतर हो सकते हैं।


(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मई

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मई

तो ही भारत का लोकतंत्र पटरी पर लौटेगा

संपादकीय
22 मई 2019



कल दोपहर इसी वक्त तक हिन्दुस्तानी आम चुनाव के नतीजे आने शुरू हो जाएंगे, गिनती पूरी नहीं होगी, लेकिन अधिकतर सीटों पर पहला रूख जरूर दिखने लगेगा जिससे एक्जिट पोल की इज्जत भी तय होगी कि वे सही अंदाज लगा पाए हैं, या किसी वजह से उनका अंदाज गलत निकला, या सोच-समझकर एक गलत अंदाज सामने रखा गया था। दरअसल भारत की राजनीति साजिशों से इतनी भरी है कि एक जैसे दिखने वाले तमाम एक्जिट पोल को लेकर भी लोगों के मन में तरह-तरह के शक हैं कि क्या ये किसी एक पार्टी के पक्ष में रूझान दिखाने के लिए पूर्वाग्रह से भरे हुए हैं, या फिर कोई और बात है। कुछ अधिक सोचने वाले लोगों की कल्पना सट्टाबाजार और शेयर बाजार तक जाती है जो कि राजनीति से किसी भी मायने में साजिश के लिए कम ताकत नहीं रखते हैं। जिस तरह एक्जिट पोल के अगले दिन शेयर बाजार हजार पाइंट ऊपर चढ़ गया, और खरबों का नफा-नुकसान हो गया, उसे देखते हुए इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए कि शेयर बाजार चलाने वाले लोग ऐसी हसरत रखते हों कि एक्जिट पोल को प्रभावित करें। जो भी हो, अगले एक दिन में यह साफ हो जाएगा कि एक्जिट पोल जीता या हारा। 

पिछले किसी भी चुनाव में केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन का विपक्ष से इतना अधिक चुनावी-तनाव नहीं हुआ था जितना कि इस बार हुआ है। नतीजे चाहे जो हों, अगली संसद तो पक्ष और विपक्ष दोनों वाली रहेगी, और अगले पूरे पांच बरस देश के जरूरी मुद्दों पर या तो इसमें चर्चा हो सकेगी, या पिछले पांच बरस की तरह तनातनी जारी रहेगी, या और आगे बढ़ेगी। चुनाव के दौरान हवा में जितना जहर घुला है, उतना जहर भोपाल गैस त्रासदी में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से वहां की हवा में भी नहीं घुला था। और लोगों को याद होगा कि किस तरह कारखाने के स्टॉक में बचा हुआ जहरीला मिक नाम का रसायन खत्म करने के लिए और भी लंबे समय तक कार्रवाई करनी पड़ी थी। आज हिन्दुस्तान में नेताओं और पार्टियों के मन में एक-दूसरे के लिए ऐसा बहुत सा जहर बाकी है, और इसे खत्म करना आसान नहीं रहेगा। 

आज केन्द्र और राज्यों में अलग-अलग पार्टियों और गठबंधनों की सरकारें हैं। इस आम चुनाव के पहले से केन्द्र और राज्यों के बीच एक तनातनी चली आ रही है जिसकी सबसे बड़ी मिसाल केन्द्र की मोदी, और बंगाल की ममता सरकार के बीच देखने मिली है। चूंकि संसद और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ नहीं हो रहे हैं, और जो पार्टी या गठबंधन केन्द्र पर राज करेंगे, उनसे ठीक खिलाफ कई पार्टियां राज्यों में अलग-अलग वक्त के लिए जारी रहेंगी। इस चुनाव के बाद यह भी एक बड़ी चुनौती रहेगी कि भारत के संघीय ढांचे को ऐसी तनातनी के बीच कैसे बनाए रखा जाए, कैसे उसे असरदार रखा जाए, और कैसे दो राजधानियों की पार्टियां देश के हित में, देश के विकास के लिए ठीक से काम कर सकें। आज देश के बहुत से नेताओं के बीच बातचीत का रिश्ता भी नहीं बचा है। जितनी गालियां एक-दूसरे को इस चुनाव के दौरान दी गई हैं, वे कम नहीं हैं। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के हाथ में बहुत सी ऐसी टैक्स और जांच एजेंसियां हैं जिनका इस्तेमाल विपक्ष के नेताओं के खिलाफ हो सकता है, या कि होते रहने के आरोप लगते ही रहे हैं। 

आज हिन्दुस्तानी राजनीति में दरियादिली की उम्मीद करना बेकार है कि देश की संसदीय परंपराओं को बेहतर बनाने के लिए लोग काम करेंगे। ऐसी निराशा के बीच ही कुछ तबकों को तो यह कोशिश करनी ही चाहिए कि देश का संसदीय ढांचा, देश का संघीय ढांचा, और इस देश में केन्द्र-राज्य के परस्पर संबंध इतनी अधिक कड़वाहट से न भरे रहें कि तमाम राजनीति महज अविश्वास पर चलती रहे। हवा में धर्म को लेकर, जाति को लेकर, लोगों की देशभक्ति को लेकर जितने किस्म की हिंसक और गंदी बातें चुनाव के इन महीनों में घुल चुकी हैं, उनको भी दूर करने की जरूरत है, और अगले पांच बरस पूरे होने तक रहेगी। जो कोई भी इस देश की सत्ता चलाए, उसे चुनावी जहर से ऊपर उबरना चाहिए, और सत्ता पर ही बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वह विपक्ष को विश्वास में लेकर चले। जो भी गठबंधन सत्ता में आए उसके सामने ऐसी ढेरों मिसालें मौजूद हैं कि किसी सरकार को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। ऐसी मिसालों को सोचते-समझते हुए अगली सरकार काम करे, तो ही भारत का लोकतंत्र पटरी पर लौटेगा।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 21 मई

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मई

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मई

चुनाव आयोग की प्रशंसा करके प्रणब साबित कर रहे हैं कि वे भारतरत्न...

संपादकीय
21 मई 2019



पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं, और वे कभी आरएसएस मुख्यालय पहुंचकर सुर्खियां बन जाते हैं, तो कभी कोई और बयान देकर। मोदी सरकार ने जब इंदिरा के समय से कांगे्रस के एक स्तंभ रहे प्रणब को भारतरत्न दिया, तो लोग चौंके भी थे और मोदी की अचानक प्रणब मुखर्जी से निकटता खबरों में आई थी। अब दो दिन पहले कांगे्रस के कुछ नेता प्रणब से मिलने पहुंचे, तो वे फिर सुर्खियों में आए कि ममता बैनर्जी सहित कई गैरएनडीए, गैरयूपीए नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं, और क्या कांगे्रस उनसे सहयोग मांगने गई है? लेकिन कल उन्होंने दिल्ली के एक सार्वजनिक समारोह में चुनाव आयोग की खुलकर तारीफ की और लोकसभा का अभी चल रहा चुनाव कामयाबी से शानदार तरीके से करवाने की चर्चा की।

प्रणब मुखर्जी का यह बयान आज के वक्त खासा हैरान करता है। वे अब उम्र और ओहदे के उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां से आगे वे कहीं नहीं जा सकते। वे राष्ट्रपति रह चुके हैं, और भारतरत्न बन चुके हैं। इसके बाद भारत के संविधान में और लोकतांत्रिक परंपराओं में उनके लिए कुछ नहीं बचा है। यह जरूर हो सकता है कि देश की बहुत सी पार्टियां मिलकर उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश करें, और वे परंपराओं को तोड़कर इसे मंजूर कर लें। लेकिन ऐसे कोई आसार दिखते नहीं हैं, और एनडीए को उनकी कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में एनडीए विरोधी पार्टियों को चुनाव आयोग से जितनी बड़ी शिकायत रही है उसे देखते हुए प्रणब की यह तारीफ बहुत ही अटपटी और बेमौके की है।

आज चुनाव आयोग की विश्वसनीयता एकदम ही नीचे गिरी हुई है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने उसे जैसी फटकार लगाई है, वैसा कोई पुराना मामला याद नहीं पड़ता है। चुनाव आयोग इस चुनाव में अपने भारी पक्षपाती नजरिए के लिए अच्छी तरह दर्ज हो चुका है, और आयोग के ही एक आयुक्त ने उनकी असहमति दर्ज न करने को लेकर बैठकों में जाना बंद कर दिया है। इस बीच प्रणब का यह कहना कि कार्यपालिका तीनों आयुक्त नियुक्त करती है और वे अपना काम अच्छे से कर रहे हैं, आप उनकी आलोचना नहीं कर सकते, यह चुनाव आयोग का सही रवैया है। प्रणब मुखर्जी का यह प्रमाणपत्र बहुत ही बेमौके पर आया है, और साख खो चुकी संस्था की ऐसी स्तुति करने की उनकी क्या मजबूरी है, यह समझ से परे है। आज जब चुनाव आयोग के खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हुए हैं, जब आयोग मतभेद से बंट चुका है, तब ऐसी तारीफ बहुत ही अजीब है, और एक भूतपूर्व राष्ट्रपति की हैसियत से प्रणब मुखर्जी को साख खोए हुए आयोग की ऐसी हिमायत करनी नहीं चाहिए थी। भूतपूर्व राष्ट्रपति की हैसियत से न तो उन्हें चुनाव आयोग की आलोचना करनी थी, और न ही तारीफ। फिर भी अगर उनका मन बेचैन था, तो आयोग पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां देखते हुए उन्हें आयोग की आलोचना ही करनी थी जो कि जायज मानी जातीं। उनका बर्ताव बिल्कुल भी समय से परे है, हो सकता है उम्र उन पर हावी हो गई हो, या उम्र के इस पड़ाव पर आकर वे धार्मिक रूझान में उलझ गए हों, और उन्हें लग रहा हो कि मंदिर वहीं बनाएंगे। यह भी लगता है कि वे अपात्र होते हुए भी जिस तरह भारतरत्न बनाए गए, क्या वे उस उपकार का बदला चुकाने के लिए मोदी सरकार के हिमायती दिख रहे चुनाव आयोग की तारीफ को अपनी नैतिक जिम्मेदारी मान रहे हैं? यह याद रखने की जरूरत है कि मोदी सरकार यूपीए सरकारों पर जितने तरह के आरोप लगाकर 2014 में सत्ता में आई थी, उनमें से अधिकतर ऐसे फैसले थे जिनमें प्रणब मुखर्जी भागीदार थे। और ऐसे में उन्हें भारतरत्न बनाना अपने-आपमें गलत था। आज जब वे इस तरह के चुनाव आयोग को चरित्र प्रमाणपत्र दे रहे हैं, तो वे एक बार फिर साबित कर रहे हैं कि वे भारतरत्न के लायक नहीं थे।

(Daily Chhattisgarh)

5:00 PM

उनके सपनों का हिस्सा बनने...

-सुनील कुमार
छोटे बच्चों का दिल बहलाने के लिए परिवार के लोग आमतौर पर उनके सामने टीवी, कम्प्यूटर, या मोबाइल फोन पर बच्चों के गानों के वीडियो लगा देते हैं। ये गाने बच्चों के गाए हुए नहीं रहते, ये बच्चों को बहलाने के लिए खास तैयार किए गए गाने रहते हैं, और अलग-अलग आवाजों में अलग-अलग वीडियो इंटरनेट पर मुफ्त में मौजूद भी रहते हैं। नतीजा यह होता है कि दवा पिलाने से लेकर, खाना खिलाने तक, दिल बहलाने के लिए बच्चों को वीडियो के हवाले कर दिया जाता है। ऐसे बहुत से गाने अंग्रेजी में हैं, और बहुत से हिन्दी में भी। बहुत से गाने दूसरी भारतीय भाषाओं में भी वीडियो की शक्ल में मौजूद हैं, और हो सकता है कि बोलियों में भी लोकगीत हों। लेकिन इनके बारे में कुछ और गहराई से सोचने की जरूरत है। 

वैसे तो टीवी, कम्प्यूटर, और स्मार्टफोन, ये सब एक आय वर्ग से ऊपर के लोगों को ही नसीब है, लेकिन इन दिनों कई जगहों पर मुफ्त का इंटरनेट रहता है, और गरीब भी खींचतान कर किसी तरह स्मार्टफोन पा जाते हैं। ऐसे में लगता है कि जो रंगारंग वीडियो बच्चों के लिए, उनके गानों के साथ, अच्छे संगीत के साथ नजारे पेश करते हैं, वे सबसे गरीब बच्चों को कहां ले जाते हैं? यह तो ठीक है कि हर बच्चे को सपने देखने का हक होना चाहिए, परीकथाओं को पढऩे का हक होना चाहिए, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे देश में आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो अपने अंत तक ऐसे सपनों को हकीकत में तब्दील होते नहीं देख पाता। ऐसे बच्चों के लिए ऐसे गाने और ऐसे वीडियो क्या मायने रखते हैं, और उन्हें कहां ले जाकर छोड़ते हैं? 

कुछ बरस पहले का एक तजुर्बा मैंने किसी और कॉलम में शायद लिखा था। एक प्रदेश की राजधानी की महिला जेल में महिला कैदियों के साथ बंद उनके छोटे बच्चों से मिलने जब एक समाजसेवी संगठन के लोग पहुंचे, उनसे बात की, कि वे क्या सोचते हैं, क्या करना चाहते हैं, तो उनकी एक अलग ही दुनिया सामने आई। ऐसे बच्चे छह बरस की उम्र तक ही अपनी कैदी मां के साथ जेल में रहते हैं, उसके बाद उन्हें बाहर परिवार के पास भेज दिया जाता है, या सरकार के किसी दूसरे बाल संरक्षण गृह में रखा जाता है। इस शहर की महिला जेल के भीतर अहाते में से जेल के पास की एक होटल का बोर्ड दिखता था। होटल की छत पर लगा हुआ यह बोर्ड रात में भी होटल के नाम को दिखाते हुए चमचमाता था, और जेल के बच्चे उस नाम को लेकर उत्सुक थे कि वह क्या है? उनको पूछताछ से यह पता लगता था कि यह होटल है, लेकिन होटल क्या होता है, कैसा होता है, यह उनको समझ नहीं पड़ता था क्योंकि समझ आने के पहले वे जेल आ चुके थे, या जेल में ही पैदा हुए थे, और किसी होटल को देखना कभी हुआ नहीं था। इस समाजसेवी संस्था के सदस्यों ने तय किया कि वे अफसरों से इजाजत लेकर इन बच्चों को पास की ही इस होटल तक ले जाएंगे, और वहां के रेस्त्रां में खाना खिलाकर वापिस जेल छोड़ देंगे। लेकिन इस सोच पर एक प्रतिक्रिया भी आई कि जिन बच्चों को अभी कुछ बरस जेल में ही रहना है, या बाहर निकलकर भी किसी बाल संरक्षण गृह में रहना है, या बिना मां के किसी परिवार में उपेक्षित रहना है, उसे एक बार ऐसी होटल दिखाकर और वहां खाना खिलाकर उन्हें क्या दिया जाएगा? क्या महज एक बार का ऐसा तजुर्बा जिसके दुबारा होने का आसार बरसों तक शायद उनकी जिंदगी में न आए? 

कुछ ऐसा ही हाल बच्चों के लिए बनाए गए रंगबिरंगे वीडियो और गानों का भी होता है जो कि बहुत गरीब तबके के किसी बच्चे से सपनों के स्तर पर भी नहीं जुड़े रहते। वे एक ऐसी चमकीली और रंगीन, चकाचौंध करने वाली और खूबसूरत दुनिया दिखाते हैं जो फुटपाथ या झोपड़पट्टी पर बैठकर, या लेटकर सपने देखने के लायक भी नहीं होते। जाहिर है कि दुनिया के बहुत से दूसरे सामानों की तरह खूबसूरत बाल-गीतों की दुनिया भी उन्हीं के लायक, और शायद उन्हीं के लिए भी, बनाई जाती है जो कि किसी चीज के ग्राहक हो सकते हैं, चॉकलेट या खिलौनों के, कपड़ों और जूतों के, या साइकिल और तिपहिया के। ऐसे गानों के साथ इस तरह के सामानों को बेचने की एक नीयत साथ-साथ चलती है, और इन सामानों के इश्तहारों से ऐसे गानों का खर्च भी निकलते चलता है। इसलिए यह जाहिर और जायज है कि ऐसा गीत-संगीत एक न्यूनतम आय वर्ग से ऊपर के तबके के बच्चों के लिए और उनके लायक ही बनता है। महज कागजों तक सीमित कुछ गाने, गीत, और बाल कविताएं ऐसे हो सकते हैं जो कि गरीब बच्चों की कल्पनाओं से भी मेल खाते हुए हों, उनके भी काम के हों। लेकिन उनके लायक, और उनकी जिंदगी के साथ तालमेल से चलने वाले गाने कैसे हो सकते हैं, कैसे बन सकते हैं, यह एक बहुत बड़ी चुनौती भी हो सकती है। 

हो सकता है कि बाल मनोविज्ञान के जानकार यह कहें कि जिन्हें हासिल नहीं है उन्हें भी हसरत करने के लिए ऐसी रंगीन कल्पनाएं जरूरी हैं, या ठीक हैं। हो सकता है यह बात सही हो, लेकिन फिर भी यह लगता है कि इतनी रंगीन और चमकीली दुनिया को कुछ मिनट देखने के बाद क्या इन बच्चों को अपना खुद का फुटपाथ या झोपड़पट्टी का दायरा खटकता नहीं होगा? क्या उनके बीच एक हीनभावना नहीं आती होगी? न तो मैंने ऐसे तबके के बच्चों से बहुत अधिक बात की है, और न ही मुझे बाल मनोविज्ञान की कोई जानकारी है। बस महज सहज समझ से इतना लगता है कि उनकी असल जिंदगी और ऐसे चमकीले गानों के बीच का एक विरोधाभास शायद उनके लिए अच्छा न रहता हो। यहां मैं जो लिख रहा हूं, वह किसी किस्म की सलाह नहीं है क्योंकि इस विषय पर सलाह देने जितनी जानकारी और समझ मेरी नहीं है। मैं महज एक फिक्र और उत्सुकता सामने रख रहा हूं कि वंचित तबके के बच्चों के लिए क्या होना चाहिए? उनकी सपनों की दुनिया का हिस्सा बनने के लिए किस तरह के गाने और वीडियो होने चाहिए? 

एग्जिट पोल, मनोरंजन तो बेईमान होता नहीं है

संपादकीय
20 मई 2019



बीती शाम हिन्दुस्तानी आम चुनाव के आखिरी दौर का वोट खत्म हुआ, और एग्जिट पोल आना शुरू हुआ। अधिकतर समाचार चैनलों ने किसी न किसी एजेंसी के साथ मिलकर वोट डालकर निकले मतदाता का रूख भांपने का काम किया, और फिर पूरी तरह ईमानदार नतीजे सामने रखे, या जैसा कि लोगों की आशंका है मिलावटी नतीजे पेश किए, और जिन लोगों को पोल के नतीजे पसंद नहीं आए, उन्हें पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उछाला हुआ एक नया शब्द याद पड़ा, और उन्होंने इन तमाम एग्जिट पोल को महामिलावटी साबित करने की कोशिश की। जिन लोगों की निजी पसंद जैसी थी, उनको ये नतीजे वैसे ही लगे। कुछ लोगों को लगा कि आएगा तो मोदी ही, और कुछ लोगों को लगा कि हिन्दुस्तानी मीडिया मोदी के हाथों बिका हुआ  गोदी मीडिया बन चुका है, और वह उसी नमक का बदला चुका रहा है। 

चुनाव के पहले के ओपिनियन पोल हों, या मतदान के बाद के एग्जिट पोल, इनमें गलती की गुंजाइश खासी हो सकती है, और पिछले बरसों में बहुत से नामी-गिरामी चैनलों, और नामी-गिरामी एजेंसियों के नतीजे गलत साबित हुए भी हैं। लेकिन इनको अधिक गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि हिन्दुस्तानी टीवी-समाचार चैनलों में से शायद सभी का सरकार में रजिस्ट्रेशन समाचार और मनोरंजन चैनल के रूप में है। ये चैनल इसीलिए दिन में कई बार कॉमेडी या नाच-गाना भी दिखाते हैं, महज समाचार नहीं। इसलिए ओपिनियन पोल हो, या एग्जिट पोल, इन दोनों को ही अपनी जरूरत जितनी गंभीरता से ही लेना चाहिए, वरना इन्हें मनोरंजन वाला हिस्सा मानकर इनका मजा लेकर फिर दूसरे किसी चैनल पर चले जाना चाहिए। 

हिन्दुस्तान में जो समाचार-पत्रिकाएं हैं, उनमें जो सबसे प्रतिष्ठित कही या मानी जाती हैं, उनमें भी एक चलन पिछले कई बरसों से लगातार चल रहा है। वे साल में एक-दो बार हिन्दुस्तानी नौजवानों, महिलाओं, या शादीशुदा जोड़ों के प्रेम और सेक्स संबंधों, विवाह से परे के बेवफाई के संबंधों के बारे में एक सर्वे करके उसे सनसनीखेज तरीके से छापती हैं। नतीजा यह होता है कि वह अंक खासा अधिक बिकता है, और जो लोग उस पत्रिका को पढऩा छोड़ चुके थे, वे भी कम से कम उस एक अंक की तरफ वापिस लौटते हैं, और एक यह संभावना बनती है कि वे एक बार फिर पाठक या ग्राहक बन सकते हैं। यह काम कहने के लिए तो पत्रकारिता के दायरे में आता है, लेकिन यह मोटे तौर पर बाहर किए गए एक सर्वे का नतीजा रहता है, और ऐसा सर्वे पत्रकारिता नहीं रहता, वह एक अलग तकनीक रहती है। सेक्स से लेकर वोट तक, लोगों की राय को जानकर, या बिना जाने भी, उस पर नतीजे निकालना, और उसे अपने ग्राहकों, पाठकों, या दर्शकों के सामने पेश करना कुछ लोगों को फिजूल का और बेईमानी का काम लग सकता है, कुछ लोगों को यह एक जरूरी जिम्मा लग सकता है। यह गर गंदा है, तो भी धंधा है, यही मानकर इसका मजा लेना चाहिए। भारत का चुनावी इतिहास हर किस्म के ओपिनियन और एग्जिट पोल से भरा हुआ है। कुछ लोग बार-बार गलत साबित होते हैं, और उसके बावजूद वे बाजार में बने भी रहते हैं। ऐसी भविष्यवाणी कुछ अखबारों में अब तक, इक्कीसवीं सदी में भी छपने वाले भविष्यफल जैसी रहती है जिसे कुछ लोग अब भी पढ़ते हैं, और उनमें से कुछ लोग अब भी भरोसा करते हैं। हिन्दुस्तान का इस बार का आम चुनाव इतना लंबा चला है कि लोग थक गए हैं, और इसी तरह के मनोरंजन से काम चलेगा। जिस तरह लोग अंतिम संस्कार के लिए मरघट जाते हैं, और वहां पर चिता की तैयारी में वक्त लगता है, फिर आग पकडऩे में समय लगता है, और कपालक्रिया की नौबत आने तक घंटे भर से ज्यादा लग चुका रहता है। वहां पर मौजूद लोग धूप, धूल, और धुएं से थककर मरने वाले की बेईमानी या बदचलनी, बदमिजाजी या बदनामी तक हर पहलू पर चर्चा कर लेते हैं, उसी तरह वोट डलने के हफ्तों बाद आने वाले नतीजों को लेकर लोगों को इंतजार भारी न पड़े, इसलिए टीवी पर कई तरह की बहस चलती हैं ताकि लोगों का वक्त कटे, और इस तरह के एग्जिट पोल सामने आते हैं ताकि लोग शर्त और सट्टा लगा सकें। इन्हें महज इतनी ही गंभीरता से लिया जाए तो किसी मीडिया पर बिके हुए होने का आरोप लगाने की नौबत नहीं आएगी क्योंकि मनोरंजन तो बेईमान होता नहीं है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM