बात की बात, 31 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अगस्त

ऐसी तमाम हौसलामंद महिलाओं को सलाम

संपादकीय
31 अगस्त 2019



छत्तीसगढ़ का जो आदिवासी इलाका बस्तर लगातार नक्सल हिंसा की वजह से खबरों में रहता है, या वहां की बाकी खबरें सुरक्षाबलों के हाथों नक्सलियों के मारे जाने की रहती हैं, उस बस्तर में देश और दुनिया के बाकी हिस्सों के लोग आने से भी कतराते हैं, और अपनी बच्चों को भेजने से भी कतराते हैं कि धमाकों में इतनी मौतों वाले इलाके में क्यों जाया जाए। यह एक अलग बात है कि खुद बस्तर के जो पर्यटन केंद्र हैं, उनको नक्सली हाथ भी नहीं लगाते हैं, और तमाम सैलानी महफूज रहते आए हैं। लेकिन बस्तर के नक्सल हिंसाग्रस्त इलाकों में बसे हुए लोगों का हाल बहुत अलग है, और आज जब वहां की दंतेवाड़ा विधानसभा सीट पर उपचुनाव का मौका आ खड़ा हुआ है, तो कांगे्रस और भाजपा दोनों की तरफ से दो ऐसी महिलाओं के बीच चुनाव होना तकरीबन तय माना जा रहा है जिन्होंने नक्सल हिंसा में ही अपने-अपने पति खोए हैं। नक्सलियों के खिलाफ बस्तर में सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई लडऩे वाले कांगे्रस के बड़े नेता महेंद्र कर्मा को बस्तर के झीरम घाटी हमले में नक्सलियों ने छांटकर, तलाशकर, नाम पूछकर मारा था, और कुछ महीने पहले ही वहां से भाजपा विधायक बने भीमा मंडावी पुलिस चेतावनी के बावजूद बस्तर में सफर करते हुए नक्सली धमाके में मारे गए थे। ऐसे दोनों परिवारों से इन दोनों की पत्नियां चुनाव मैदान में उतरने को तैयार हैं, और इस मौके पर इनका यह रूख देखते हुए यह लगता है कि नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र और कब्जे वाले इलाके में रहते हुए ये महिलाएं इतना हौसला दिखा रही हैं, बावजूद इसके कि वे कभी भी नक्सली निशाने पर आ सकती हैं, जान खो सकती हैं। लोगों को याद होगा कि महेंद्र कर्मा राज्य बनने के बाद से लगातार नक्सलियों के निशाने पर थे, और अपने घर में भी वे संगीनों के साए में ही सो पाते थे।

इस तरह का हौसला उन परिवारों में भी देखने मिलता है जिनके कोई सदस्य पुलिस या किसी दूसरे सुरक्षाबल में रहते हुए नक्सल मोर्चे पर शहीद हुए हैं, और परिवार के दूसरे सदस्य इसके बाद भी वर्दी वाली ऐसी खतरनाक नौकरी करने जाते हैं, और फिर नक्सल मोर्चे पर पहुंच जाते हैं। ऐसी कहानियां फौज में शहीद हुए लोगों की भी सुनाई पड़ती हैं जहां एक शहादत के बाद भी मां-बाप दूसरे बच्चों को फौज में भेजते हैं। अभी-अभी तो एक शहीद फौजी की पत्नी की कहानी अखबारों में आई है कि किस तरह वह एक सौंदर्य स्पर्धा जीतने के करीब थी, और पति की शहादत के बाद उसने इस ब्यूटी कान्टेस्ट से बाहर निकलकर फौज में जाने का इम्तिहान दिया, और फौज में नौकरी भी पा ली।

इस किस्म की बातों को सुनकर लगता है कि इसी देश की आबादी के बीच चाहे गिनती में कम हों, लेकिन ऐसे लोग हैं जो कि लगातार हौसला दिखाते हैं, और जान की जोखिम उठाते हुए भी दिखाते हैं। यह उस देश में है जहां पर लोग ट्रैफिक के चालान से बचने के लिए सड़कों पर गाडिय़ां दौड़ाते भाग निकलते हैं, जहां पर लोग अपनी लाश को जल जाने देते हैं, लेकिन जीते-जी नेत्रदान का फॉर्म भी भरने की जहमत नहीं उठाते। लोग अस्पताल में भर्ती अपने रिश्तेदार को भी खून देने को तैयार नहीं होते, सड़क पर जख्मी को अस्पताल पहुंचाने भी तैयार नहीं होते, और ऐसे लोगों को लालच देने के लिए अभी पुदुचेरी राज्य में यह योजना बनाई है कि किसी जख्मी को अस्पताल पहुंचाने वाले को पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।

आज का हिंदुस्तान कहने के लिए तो एक बहुत ही आक्रामक राष्ट्रवाद के रास्ते पर चल रहा है जिस सड़क को बनाने के लिए पड़ोसी देश को भी एक दुश्मन के पुतले की तरह पेश किया गया, और देश के भीतर भी कुछ तबकों को दुश्मन की तख्ती लगाकर निशाने पर खड़ा किया गया है। आक्रामक राष्ट्रवाद के चलते जो लोग भीतर और बाहर के ऐसे दुश्मन करार दिए गए लोगों की भीड़त्या पर उतारू रहते हैं, उन लोगों का राष्ट्रवाद भी देश के भीतर उन्हें कोई भला काम करने की तरफ नहीं ले जाता, कोई चुनौती मंजूर करने की तरफ नहीं ले जाता। ऐसे माहौल में हम उन महिलाओं को सलाम करते हैं जो कि जान के खतरे के बीच भी लोकतंत्र पर खड़े रहकर या तो विधानसभा और संसद पहुंचने की चुनौती मंजूर करती हैं, या जो परिवार की शहादत के बाद भी पुलिस, सुरक्षाबल, या फौज पहुंचकर फिर जोखिम उठाती हैं, या फिर अपने बेटे-बेटियों या भाई-बहनों को ऐसे खतरों के बीच लोकतंत्र या देश की सेवा के लिए भेजती हैं। ऐसी तमाम हौसलामंद महिलाओं को सलाम।


(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अगस्त

तबादलों का एक तो मौसम गलत, और फिर तरीका भी

संपादकीय
30 अगस्त 2019



छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ हफ्तों से तबादलों को लेकर भारी गहमागहमी चल रही है। सरकारी विभागों में हजारों तबादले हुए हैं, और तकरीबन ऐसा ही किसी भी सरकार के रहते हुए होते आया है। इस बार कुछ विधायक अपनी नाराजगी के साथ स्कूल शिक्षा मंत्री पर पिल पड़े इसलिए खबरें कुछ अधिक बनी, वरना स्कूल शिक्षा विभाग सरकार का सबसे बड़ा विभाग है, और उसमें सबसे अधिक संख्या में तबादले होते ही हैं। लेकिन हर विपक्ष सत्ता पर तबादला उद्योग का आरोप लगाता है, और ये शब्द अब धीरे-धीरे अपना असर खो बैठे हैं। इसलिए आरोपों से परे यह सोचने की जरूरत है कि किसी सरकार की तबादला नीति और उस पर अमल में कौन सी बातों का ख्याल रखना चाहिए, ताकि सरकार का कामकाज बेहतर चल सके, और अधिकारी-कर्मचारी भी अपने परिवार का ख्याल रख सकें। 

छत्तीसगढ़ में बस्तर एक ऐसा इलाका है जहां जाकर कम ही लोग ऐसे हैं जो कि अधिक समय तक रूकना चाहते हैं। अधिकतर अफसर-कर्मचारी नक्सल-हिंसा वाले, पिछड़े हुए बस्तर जाने से बचने के लिए मोटा खर्च करने के लिए भी तैयार रहते हैं, और पिछली रमन सरकार के सुरक्षा सलाहकार देश के सबसे चर्चित पुलिस अफसर केपीएस गिल ने एक औपचारिक इंटरव्यू में कहा भी था कि बस्तर से बाहर निकलने के लिए पुलिस के छोटे कर्मचारी भी बड़े अफसरों को लाखों रूपए की रिश्वत देते हैं। गिल उस समय छत्तीसगढ़ सरकार के सुरक्षा सलाहकार रह चुके थे, और उन्होंने खास बस्तर पर राय देने के लिए ही मेहनताने पर रखा गया था। आज भी ऐसी चर्चाएं आम रहती हैं। ऐसे में राज्य शासन को यह सोचना चाहिए कि क्या वह बस्तर और सरगुजा को मिलाकर आदिवासी क्षेत्र का एक ऐसा अमला बांट सकती है जो कि अधिक वेतन-भत्ते पाकर इन्हीं इलाकों में आखिरी तक काम करने के लिए तैयार हो? तबादले पर लोग वहां न जाएं, या जाते ही छुट्टी लेकर बैठ जाएं, या लौटने की फिराक में खर्च पर उतारू रहें, तो ऐसे लोगों से जनता की किसी सेवा की उम्मीद की नहीं जा सकती। प्रदेश में सबसे भ्रष्ट और कमाऊ माने जाने वाले आरटीओ दफ्तर के दुर्ग जिले के अफसर को बस्तर भेजा गया, तो उसने आनन-फानन नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसलिए बस्तर जैसे इलाके के लिए सरकार को परंपरागत तौर-तरीकों से अलग एक ऐसा काडर बनाना चाहिए जो कि अपनी मर्जी से वहां काम करने वाला हो। राज्य शासन के भीतर राजधानी में मंत्रालय की एक इमारत में काम करने के लिए कर्मचारियों का एक अलग काडर बना हुआ है, और वे कर्मचारी वहां से बाहर कहीं और नहीं भेजे जा सकते। इसलिए बस्तर-सरगुजा के लिए, या अकेले बस्तर के लिए एक काडर बनाना चाहिए ताकि सरकार हर बरस इसी बात से न जूझती रहे कि बरसों से बस्तर में फंसे लोगों को कैसे मैदानी इलाकों में तैनाती दी जाए, क्योंकि आज तो जब तक कोई एवजी वहां पहुंच न जाए, तब तक वहां तैनात अफसर-कर्मचारी को तबादले पर भी निकलने की इजाजत नहीं रहती। इस मुद्दे पर लिखने की बात आज इसलिए सूझी कि बस्तर के धुर नक्सल इलाके में जंगल के बीच गांवों में एक ऐसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता 11 बरस से लगातार काम कर रही है जो खुद कैंसर से जूझ भी रही है, इलाज के लिए शहर जाना भी पड़ता है, लेकिन वह वहां डटी हुई है। 

दूसरी बात यह कि स्कूल-कॉलेज में दाखिलों का वक्त मई-जून में निकल चुका है। अब किसी के तबादले से उसका परिवार महीनों तक परेशान रहता है, या फीस और यूनिफॉर्म के नुकसान में रहता है, पढ़ाई का नुकसान झेलता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। सरकारी अमला इंसान है, और उसका परिवार भी है जिसके बच्चे पढ़ते हैं। इसलिए शैक्षणिक सत्र शुरू होने के महीने-दो महीने पहले ट्रांसफर का काम खत्म हो चुका रहना चाहिए ताकि लोग नई जगहों पर जाकर वहां अपने बच्चों का दाखिला करवा सकें। तबादलों को महज राजनीतिक नाराजगी निकालने के लिए, या किसी को उपकृत करने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना गलत है। आज एक अखबार की रिपोर्ट है कि मुख्यमंत्री के अपने जिले दुर्ग में कितनी स्कूलें सैकड़ों बच्चों के रहते हुए एक-एक शिक्षक की रह गई हैं, बाकी का या तो तबादला हो गया है, या उनकी तैनाती ही नहीं हुई है। यह सिलसिला भी खत्म होना चाहिए, और इसके लिए सरकार पारदर्शी तरीके से इंटरनेट पर यह डाल सकती है कि किस स्कूल-कॉलेज में कितने पद हैं, कितने भरे हुए हैं, और खाली पद कब से खाली हैं। यह बहुत आसान सा काम है, और इससे एक नजर में लोगों को पूरे प्रदेश का हाल दिख जाएगा।  

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अगस्त

देश की अदालतों का रूख लोकतंत्र के लिए खतरा...

संपादकीय
29 अगस्त 2019



2018 में पुणे के भीमा कोरेगांव सालगिरह के मौके पर हुई हिंसा के बाद उसे भड़काने के आरोप में या उस सिलसिले में देश में कई जगहों से राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था, उनमें छत्तीसगढ़ की एक वकील और एक्टिविस्ट सुधा भारद्वाज भी शामिल थीं। इस मामले में आंदोलनकारियों के पीछे नक्सलियों-माओवादियों के होने का आरोप भी लगाया गया था। गिरफ्तार लोगों में से एक वर्नन गोंजाल्वेज की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान कल बाम्बे हाईकोर्ट के एक जज ने उनसे सवाल किया कि उन्होंने वॉर एंड पीस नाम का लियो ताल्सतॉय का उपन्यास घर पर क्यों रखा था जो कि किसी दूसरे देश के युद्ध से संबंधित है। यह विश्व विख्यात उपन्यास पूरी दुनिया में बड़े सम्मान से देखा जाता है, और साहित्य की दुनिया की कोई भी लाइब्रेरी इसके बिना पूरी नहीं हो सकती। इसके नाम को लेकर मुकदमा दर्ज करने वाली पुलिस की बेवकूफी तो एक बार अनदेखी की जा सकती है कि वह साहित्य की समझ नहीं रखती, लेकिन सरकारी वकील से तो कम से कम साक्षर होने की उम्मीद की जाती है। और इन सबसे ऊपर हाईकोर्ट के जज की भारी ताकतवर कुर्सी पर बैठने वाले से ऐसी समझ की कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह ताल्सतॉय के इस महान उपन्यास को राज्य के खिलाफ बगावत के मुकदमे में जब्त आपत्तिजनक सामग्री मानकर आरोपी से यह पूछेगा कि उसने यह किताब क्यों रखी थी? इसका एक सीधा सा जवाब अदालत के बाहर की दुनिया दे सकती है कि यह आदमी पढ़ा-लिखा था, उसे साहित्य की समझ थी, और अपने दिमाग का इस्तेमाल वह सोचने-समझने के लिए करता था, इसलिए विश्व के महान साहित्य को पढऩे का यह खतरनाक जुर्म कर बैठा था। दुनिया के इतिहास का यह पहला मौका होगा कि एक उपन्यास को रखने का जुर्म लोकतंत्र में राजद्रोह मान लिया जाए, और जज भी पुलिस की समझ को आगे बढ़ाते हुए साहित्य को रखने के जुर्म की वजह पूछने लगे। 

हिन्दुस्तान में वक्त कुछ अधिक ही खराब आ गया है। कल की एक खबर है कि पटना हाईकोर्ट के एक जज ने अपने एक फैसले में उसी हाईकोर्ट के जजों के भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर लिखा है, और अभी खबर आ रही है कि उस जज से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने काम छीनकर कमरे में बिठा दिया है। एक दूसरी खबर तीन दिनों से हवा में थी, और देश की राजधानी दिल्ली के पत्रकार उसके लिए आंदोलन भी कर रहे थे कि देश में मीडिया की आजादी और मीडिया से जनता की शिकायतों की सुनवाई करने के लिए बनाई गई प्रेस काऊंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन, सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज ने कश्मीर में केन्द्र सरकार द्वारा मीडिया पर लगाई गई पाबंदी की हिमायत की है। देश के पत्रकारों और विचारकों ने जब इसके खिलाफ जमकर आवाज उठाई, तो प्रेस काऊंसिल ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दखल-याचिका में अपना रूख बदला। इसी दौरान कल ही सुप्रीम कोर्ट में जब कश्मीर पर बहुत सी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई चल रही थी, तो सीपीएम नेता सीताराम येचुरी की अपील पर अदालत ने उन्हें अपनी पार्टी के एक भूतपूर्व विधायक और प्रमुख नेता की सेहत पूछने के लिए कश्मीर जाने की इजाजत दी, लेकिन साथ-साथ कहा कि वे वहां और कोई काम नहीं करेंगे। हैरानी इस बात की है कि जिस सुप्रीम कोर्ट को आज सरकार से यह जवाब-तलब करना था कि वह कश्मीर में ऐसी अंतहीन पाबंदियां क्यों लगा रही है, कब तक लगाए रखेगी? लेकिन अदालत मानो अपनी ओर से ही सरकार की लगाई बंदिशों को न्यायोचित मानते हुए देश के एक बहुत ही जिम्मेदार वामपंथी नेता को एक व्यक्ति से मिलने के अलावा बाकी कुछ भी करने के लिए मना कर रही है, मानो वह कश्मीर के राजभवन का एक विभाग हो। 

देश भर में जगह-जगह बहुत सी अदालतों में साम्प्रदायिक बयान सामने आ रहे हैं, तमिलनाडू के एक हाईकोर्ट जज ने ईसाई शैक्षणिक संस्थाओं के खिलाफ भयानक साम्प्रदायिक बयान अदालत में या फैसले में दिया है, और कहीं पर हिन्दू धर्म को स्थापित करने वाला फैसला उत्तर-पूर्व का एक हाईकोर्ट जज दे रहा है, तो कहीं कुछ और। यह देश के जागरूक और दिमागदार लोगों को सोचना है कि क्या इस देश की ऊंची अदालतें सरकार या सरकारों के विभागों की तरह काम करेंगी? एक प्रदेश में हाईकोर्ट का हाल ऐसा था कि सरकार की मर्जी के खिलाफ कोई फैसला नहीं होता था, और लोग व्यंग्य में उसे शासकीय उच्च न्यायालय कहने लगे थे। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ दिन पहले ही यह लिखा था कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज अपने रिटायरमेंट के बाद सरकारी पुनर्वास पाने के लिए सत्ता को सुहाते फैसले न दें, इसके लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि जज जिस-जिस राज्य में काम कर चुके हैं, उन राज्यों में उन्हें कोई वृद्धावस्था पुनर्वास न दिया जाए। अगर ऐसा नहीं किया जाएगा, तो सत्ता की मेहरबानी पाने के लिए देश के बहुत से जज अपनी अदालतों को शासकीय उच्च न्यायालय, या शासकीय सर्वोच्च न्यायालय साबित करने के लायक संदेह खड़े करते रहेंगे। फिलहाल पिछले दो-चार दिनों के भीतर के ये तमाम अदालती रूख देश के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बता रहे हैं कि विश्व का एक महानतम उपन्यास रखना लोकतंत्र में राजद्रोह समझा जा रहा है, और जज भी वैसा ही मानते हुए सवाल कर रहा है! 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अगस्त

स्वीडन दूर बहुत है लेकिन उससे कुछ सीख सकते हैं..

संपादकीय
28 अगस्त 2019



स्वीडन की एक रिपोर्ट है कि वहां के नेताओं को सरकार की तरफ से न तो सरकारी कारें मिलतीं, न ही ड्राइवर मिलते, न ही उनके दफ्तर बहुत बड़े होते। हजार फीट से छोटे दफ्तर में वे काम करते हैं, और बस या ट्राम में सफर करते हैं। सिर्फ प्रधानमंत्री को एक कार मिलती है और वहां के नेताओं को आम नागरिकों की तरह ही मुकदमों का सामना करना पड़ता है उनके बचाव के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। स्वीडन प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 12वें नंबर पर है। इसका अंदाज लगाने के लिए यह भी समझ लेना ठीक है कि हिन्दुस्तान इस लिस्ट में 145वें नंबर है, बांग्लादेश से महज चार नंबर ऊपर। एक औसत हिन्दुस्तानी के मुकाबले एक स्वीडिश नागरिक की आय 25 गुना अधिक है। और ऐसे गरीब हिन्दुस्तान में सत्ता तो सत्ता, विपक्ष में बैठे हुए नेता भी मानो दबी-कुचली जनता को पूरी तरह निचोड़कर अपने लिए ऐशोआराम जुटा लेना चाहते हैं। 

लेकिन स्वीडन अकेला ऐसा देश नहीं है जहां नेता सादगी से जीते हैं, और आम नागरिकों की तरह रहते हैं। हिन्दुस्तान के पड़ोस के भूटान को देखें तो प्रधानमंत्री साइकिल पर घूमते दिखते हैं, और योरप के बहुत से देशों में प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्री साइकिलों पर आते-जाते हैं। जिन अंग्रेजों की गुलामी से उबरकर हिन्दुस्तानियों ने आजादी पाई थी, उन अंग्रेज सांसदों और मंत्रियों को भी ऐसी शानोशौकत नहीं मिलती जैसी कि आज हिन्दुस्तानी नेता पाते हैं। नेता तो नेता हिन्दुस्तान में सत्ता पर बैठे हुए अफसर भी अधिक से अधिक सुविधा जुटा लेने को अपनी पहली जिम्मेदारी मानते हैं, और उसके बाद अगर वक्त बच जाए तो फिर सरकारी काम करते हैं। सरकार के तमाम नियम रहते हुए एक-एक अफसर के पास कई-कई सरकारी गाडिय़ां रहती हैं, और उनके बंगलों पर काफिला सा खड़ा दिखता है। नेता और अफसर एक-दूसरे की ऐसी निजी हसरतों की हिफाजत करते चलते हैं क्योंकि इसके लिए दोनों को एक-दूसरे के दस्तखतों की, इजाजत की, या कम से कम अनदेखी की जरूरत पड़ती है। लोगों को याद होगा कि पिछली रमन सरकार में गृहमंत्री के बंगले का एक बदनाम अदना सा अफसर टैक्सी का ऐसा इस्तेमाल करके उसका भुगतान कर रहा था जिसमें एक दिन में वह गाड़ी हजारों किलोमीटर चलना बताई गई थी। यह बात अपने आपमें जाहिर है कि जो लोग ऐसा बेजा इस्तेमाल करते हैं, वे बुनियादी रूप से भ्रष्ट भी रहते हैं, और जनता के पैसों का नुकसान तो होता ही है, सरकार की कमाई को घटाकर भी ये अपनी कमाई बढ़ाने की साजिश करते रहते हैं। 

पिछली रमन सरकार के वक्त जब नया रायपुर में बहुत बड़े-बड़े दफ्तर बनाए जा रहे थे, बहुत बड़े-बड़े बंगलों की योजना बनाई जा रही थी तब भी हमने इस बात को लिखा था कि इस सरकार के हाथ में यह अनोखा मौका है कि वह किफायत बरतकर हमेशा के लिए प्रदेश का खर्च घटाए। हमने यह सुझाव भी दिया था कि मंत्रालय जैसे बड़े मंत्रियों-अफसरों के दफ्तरों की जगह पर सबके कमरे छोटे बनाए जाएं, और हर मंजिल पर कई तरह के मीटिंग-कमरे बना दिए जाएं जिन्हें कि अधिक लोगों से मिलने के लिए खोला जा सके, इससे निर्माण की लागत भी घटेगी, और बाद में बिजली का भारी-भरकम खर्च भी घटेगा। लेकिन सरकार की सोच ऐसी रहती है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से पूरा करने के बजाय अपने घर-दफ्तर को बेहतर बनाने को प्रदेश का सम्मान मान लेती है, प्रदेश की जनता का सम्मान भी मान लेती है जिसका पेट काटकर यह शान-शौकत होती है। 

पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ में जिस तरह सरकारी अफसरों ने कहीं सरकारी बंगले में स्वीमिंग पूल बनवाया, तो कहीं राजधानी के अपने दफ्तर में लाखों का झूला लगवा लिया, दस-दस, बीस-बीस लाख रूपए के सोफा लगवा लिए, और बंगलों पर करोड़ों रूपए अघोषित खर्च करवा लिया, उस पर एक बड़ी जांच होनी चाहिए, और उसकी भरपाई ऐसे नेताओं और अफसरों से होनी चाहिए। कहने के लिए तो यह ऐसा गरीब प्रदेश है जिसमें करीब आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और जो रियायती चावल की वजह से दो वक्त खा पाती है। दूसरी तरफ ऐसी गरीब आबादी के बीच सामंती और राजसी ऐशोआराम के टापू बनाकर नेता और अफसर रहते हैं, जो कि पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, पूरी तरह गैरकानूनी भी है। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त

मारक शक्ति के रहते भारत को क्या जरूरत परमाणु शक्ति की?

संपादकीय
27 अगस्त 2019



देश के पहले योगीराज में जुर्म उसी रफ्तार से रिकॉर्ड तोड़ रहा है जिस रफ्तार से विराट कोहली। अब तक किसी और राज्य में कोई योगी मुख्यमंत्री हुआ नहीं था, और उत्तरप्रदेश से तो सीएम ने केरल को नसीहत दी थी कि वह राज चलाने का तरीका यहां सीखकर जाए। ऐसे उत्तरप्रदेश में ताजा भीड़-हिंसा बच्चा चुराने की अफवाह को लेकर है जो कि जगह-जगह हो रही है। यह अफवाह झारखंड और बिहार से होते हुए अब उत्तरप्रदेश में पूरी रफ्तार से पहुंची है। पिछले राज्यों में इस अफवाह के चलते गरीबों और अल्पसंख्यकों को, विक्षिप्त या मानसिक विचलित लोगों को, कमजोर और बेसहारा लोगों को मारा गया था। भीड़-हिंसा अकसर कमजोर लोगों के साथ ही होती है और अमूमन भीड़ के हत्यारे अदालतों से बच निकलते हैं। ऐसे में जाहिर है कि देश की सोच अगर अंधविश्वास पर टिकी हुई हो, तो भीड़ का विश्वास जुटाना बड़ा आसान हो जाता है। 

दो घटनाओं का अगर जाहिर तौर पर एक-दूसरे से रिश्ता दिखता नहीं, तो उनका रिश्ता न हो ऐेसा भी नहीं रहता। अब हिंदुस्तान में इंसानों की जातियों के पीछे की बुनियाद में कौन सा देशी या विदेशी डीएनए है इसकी बात अगर खुलासे से की जाए, तो देश में दंगा होने से रोका नहीं जा सकेगा। जब लोग झूठ और अंधविश्वास पर भरोसा करने को देशप्रेम और देशभक्ति से जोड़ लेते हैं, और जब तर्कसंगत या न्यायपूर्ण बात देश के साथ गद्दारी मान ली जाए, तो ऐसी उपजाऊ जमीन पर अंधविश्वास-आधारित हिंसा की फसल लहलहाने लगती है। आज देश में सोचे-समझे तरीके से एक साजिश के तहत जनता की वैज्ञानिक सोच को खत्म किया जा रहा है ताकि वे कई सदी पहले के, या कई हजार बरस पहले के एक नामौजूद इतिहास पर भरोसा कर सकें, उस पर गर्व कर सकें। ऐसे माहौल में गोबर और गोमूत्र को लेकर अंधविश्वास फैलाया जा रहा है, और दुनिया के हर विज्ञान की खोज हिंदुस्तान के पौराणिक काल में होने का भरोसा लोगों को दिलाया जा रहा है। जब वैज्ञानिक सोच की इस अंदाज में भीड़त्या की जा रही है, तो उसके मालिक लहूलुहान इंसान भला क्या खाकर, कब तक अंधविश्वासों और अफवाहों के गुलाम होने से बच सकेंगे? नतीजा यह है कि हजारों बरस पहले हिंदुस्तानी समाज में जो गरीब, विकलांग, महिलाएं, बूढ़े और बीमार, विक्षिप्त और विचलित तिरस्कार के लायक माने जाते थे, वे आज मारे जा रहे हैं। भीड़ ने इनमें आज के माहौल में कमजोर हो चुके अल्पसंख्यकों को भी जोड़ लिया है, और दलित-आदिवासी तो हमेशा से ही कमजोर रहे ही हैं। ऐसे में चाहे बच्चा चोरी की अफवाह हो, चाहे किसी धर्म में पवित्र या अपवित्र माने जाने वाले जानवर को मारकर किसी जगह पर फेंकने की बात हो, या गाय को कसाईखाने ले जाने की बात हो, गोमांस रखने की बात हो, इनमें से किसी भी किस्म की अफवाह को छांटकर या गढ़कर, उसे वॉट्सऐप जैसे नए भोंपुओं से चारों तरफ फैलाकर किसी भी किस्म की हिंसा फैलाई जा सकती है, फैलाई जा रही है।

जब देश की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर सत्तारूढ़ पार्टी की सांसद साध्वी प्रज्ञा अपनी पार्टी के लंबे समय से बीमार चल रहे नेताओं के गुजरने पर उन मौतों की तोहमत विपक्ष पर लगाती हैं कि मारक शक्ति का प्रयोग करके भाजपा नेताओं को मारा जा रहा है, तो जाहिर है कि देश में अंधविश्वास तो बढ़ेगा ही। लोगों को याद होगा कि इन्हीं साध्वी प्रज्ञा ने पाकिस्तानी आतंकी हमलावरों का मुकाबला करते हुए शहीद होने वाले पुलिस अफसर के लिए कहा था- ''मैंने हेमंत करकरे से कहा था कि तुमने मुझे इतनी यातनाएं दीं कि तेरा सर्वनाश होगा। गिरफ्तारी के ठीक सवा महीने बाद आतंकियों ने उनका अंत कर दिया। मैंने कहा तेरा सर्वनाश होगा। ठीक सवा महीने में सूतक लगता है। जब किसी के यहां मृत्यु होती है या जन्म होता है। जिस दिन मैं गई थी उस दिन इसके सूतक लग गया था। ठीक सवा महीने में जिस दिन इसको आतंकवादियों ने मारा उस दिन सूतक का अंत हो गया।''

इस देश में इसके बाद ज्ञान और विज्ञान की क्या जरूरत है? हिंदुस्तानी फौजों को भी मारक मंत्र सीखना चाहिए ताकि चीन-पाकिस्तान को उसी से मार सकें, और हथियारों पर मोटा खर्च बंद हो। ऐसा हो जाने पर अभी हिंदुस्तानी सरकारी हथियार कारखानों में चली हड़ताल तुड़वाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, और सरकार का खासा खर्च बचेगा।

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त

अराजकता को सामाजिक मान्यता, सिलसिला जाने कहां जाकर थमेगा

संपादकीय
26 अगस्त 2019



लोकतंत्र में हर बात कानूनी के शिकंजे में कसकर नहीं की जा सकती। बहुत से ऐसे पहलू रहते हैं जिनमें लोकतांत्रिक परंपराओं, या इंसानियत कहे जाने वाले मूल्यों के पैमानों पर चीजों को आंका जाता है, और कानूनी बंदिश न रहने पर भी सही और गलत तय करके काम किए जाते हैं। भारत जैसे देश में अदालत का हाल यह है कि किसी गुनहगार के छूट जाने की पूरी संभावना या आशंका रहती है, और बहुत कम मुजरिम सजा पाते हैं। जो सजा पाते भी हैं, उनकी भी अगर ऊपरी अदालत में अपील करने की ताकत रहती है तो वे लड़ते-लड़ते ही पूरी जिंदगी गुजार लेते हैं, और बहुत कम लोग निचली अदालत से मिली हुई सजा काटते हैं। ऐसे में अभी जब उत्तरप्रदेश में एक पुलिस अफसर की हत्यारी भीड़ को अदालत से जमानत मिली, और आरोपी जेल से निकलकर बाहर आए, तो समारोह करके जयश्रीराम और वंदेमातरम के नारों के साथ उनका सम्मान किया गया। यह पहला मौका नहीं है, झारखंड में कई महीने पहले उस वक्त के एक केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने भी जेल से जमानत या पैरोल पर छूटकर आए बलात्कार के आरोपियों, या कत्ल के आरोपियों का माला पहनाकर स्वागत किया था। उत्तरप्रदेश के जिस बलात्कारी विधायक सेंगर को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को दखल देना पड़ा, और राज्य की योगी सरकार की उसे बचाने की साजिशों के खिलाफ जमकर लताड़ लगानी पड़ी, उस सेंगर की तस्वीरें अभी भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरों के साथ होर्डिंग्स पर दिखीं। 

देश की अधिकतर पार्टियों को अपने मुजरिमों से अधिक परहेज नहीं दिखता है। भाजपा इस मामले में बाकी पार्टियों के मुकाबले बहुत आगे चल रही है, लेकिन बहुत सी दूसरी पार्टियां भी उससे कुछ किलोमीटर पीछे चल रही हैं। यह हाल उन पार्टियों की बदहाली नहीं बताता, लोकतंत्र की बदहाली बताता है कि किसी को कोई शर्म नहीं रह गई है, और हत्या और बलात्कार जैसे मामले भी अब राजनीति में पूरी तरह से सम्माननीय हो गए हैं। लोगों को याद होगा कि जम्मू में जब एक खानाबदोश बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी और पुलिस समेत कई लोगों ने, जिनमें एक जोड़ी बाप-बेटे भी थे, बलात्कारियों में कई लोग देवताओं के नाम वाले लोग भी थे, जिन्हें आखिर में जाकर अदालत से सजा हुई, उन्हें बचाने के लिए जम्मू में भाजपा के एक बड़े नेता की अगुवाई में तिरंगे झंडे लेकर लोगों ने जुलूस निकाला था। उस मामले में पुलिस को जांच नहीं करने दी जा रही थी, बलात्कार की शिकार बच्ची को वकील नहीं मिलने दिया जा रहा था, और वैसे में भी देश के कई साम्प्रदायिक संगठन खुलकर बलात्कारियों के साथ खड़े हुए थे, गिरफ्तार आरोपियों की रिहाई की मांग हो रही थी।

भारत में आज हवा इतनी जहरीली हो चुकी है कि दूसरे धर्म की बच्ची से बलात्कार भी सामाजिक मान्यता पाते जा रहा है। राजनीतिक दलों को अगर अदालती फैसलों की वजह से किसी बलात्कारी को पार्टी से निकालना भी पड़ रहा है, तो रात गुजरने के पहले उसकी पत्नी को या परिवार के किसी व्यक्ति को पार्टी में आनन-फानन स्थापित कर दिया जाता है। लोकतंत्र में ऐसी सोच को रोकने के लिए किसी तरह का कानून न तो है, और न ही बनाया जा सकता। भारत में जहां की चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट, संसद और सरकार, इन सबके बनाए हुए नियम-कानून आए दिन कुचले जाते हैं, वहां पर नए कानून बनाकर किसे रोका जा सकता है कि वे बलात्कारी का सम्मान न करें, हत्यारे का सम्मान न करें। हर किसी के पास या तो जनता की अदालत का तर्क है, या कानून की अदालत का तर्क है। जो लोग जनता की अदालत में फंस जाते हैं, उन्हें अचानक कानून की अदालत पर पूरा भरोसा हो जाता है। और जो लोग कानून की अदालत में घिर जाते हैं वे जनता की अदालत में जाने की बात कहने लगते हैं। लोकतंत्र ऐसी घटिया सोच का सामना करने के लिए, उसमें जिंदा रहने के लिए बना हुआ तंत्र नहीं है। यह तो एक बुनियादी भलमनसाहत के लिए बना हुआ तंत्र है जो कि आज के हिन्दुस्तान में बहुत हद तक बेअसर हो चुका दिख रहा है, पेनिसिलिन की तरह जिससे कि आज कोई बीमारी ठीक नहीं हो सकती। देश में धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, राजनीतिक विचारधारा के नाम पर अराजकता बढ़ते-बढ़ते अब इतनी आम हो गई है कि उसे सामाजिक मान्यता मिल गई है। यह सिलसिला जाने कहां जाकर थमेगा। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

किसी के मूल्यांकन के इस सदी के नए पैमाने

संपादकीय
25 अगस्त 2019



किसी के गुजरने पर उसके बारे में अच्छी बातें कहना तो ठीक है, लेकिन तारीफ के चक्कर में कई लोग कुछ मौकों पर लोगों की तारीफ करते-करते उनकी एक बुरी तस्वीर ही पेश कर डालते हैं। कल पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरूण जेटली गुजरे जो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहुत करीबी थे, और भाजपा के हर शासनकाल में जो एक प्रमुख मंत्री रहे, संसद में विपक्ष के नेता भी रहे, भाजपा के बड़े पदाधिकारी भी रहे, सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील रहे, और कुल मिलाकर यह कि पिछले तीस बरस से वे लगातार खबरों में रहे। उनका सबसे महत्वपूर्ण जिम्मा केन्द्रीय वित्तमंत्री का था, और हमेशा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए कि किसी जाने वाले का मूल्यांकन उसके ऐसे सबसे महत्वपूर्ण काम को लेकर किया जाए। 

कल अरूण जेटली के गुजरने पर आई खबरों को देखें, तो एक खबर बड़े खुलासे से छपी है कि वे किस तरह दुनिया के कुछ सबसे महंगे ब्रांडों के शौकीन थे। दुनिया की सबसे महंगी घडिय़ां, सबसे महंगे पेन, और जाहिर है कि बाकी सामान भी उसी किस्म के सबसे महंगे। कुछ खबरों में इन सामानों के ब्रांड लिखे हुए थे कि वे किस तरह भारत के अमीरों की पसंद के सामानों से भी अधिक महंगे सामान खरीदते थे, उनसे पहले खरीदते थे। अरूण जेटली देश के सबसे महंगे वकीलों में से थे, और जाहिर है कि वे अपनी इस कानूनी कमाई से ही अरबपति थे, और सामानों को खरीदने का उनका अपना एक जायज जरिया था, और हक था। भारत का कोई भी कानून नेताओं को अपनी जायज कमाई अपने पर खर्च करने से नहीं रोकता, और वामपंथियों को छोड़ दें, तो बाकी पार्टियों के भी ऐसे कोई नियम-कायदे नहीं है, ऐसी कोई संस्कृति नहीं है कि राजनीति में आए हुए लोग किफायत में जिएं। इसलिए जेटली के लिए अलग से कोई पैमाना नहीं बनाया जा सकता कि वे ऐसी खर्चीली जिंदगी के शौकीन क्यों थे। 

लेकिन मीडिया से यह उम्मीद तो की जानी चाहिए कि गरीबों से लबालब, और गरीबी से भी लबालब इस देश का वित्तमंत्री हिन्दुस्तान की आम जनता की जिंदगी को समझ सके, उसकी तकलीफदेह हकीकत से वाकिफ रहे। जेटली के बारे में जितनी बातें सामने आई हैं, वे बताती हैं कि वे पूरी जिंदगी दिल्ली में ही बसे रहे, और पार्टी या सरकार में उनकी कोई जिम्मेदारी ऐसी नहीं रही जिससे कि उनका वास्ता गरीबों से पड़ता रहा हो। ऐसे में उनके वित्तमंत्री के कार्यकाल को लेकर यह सोचना चाहिए था कि उनकी आर्थिक नीतियां, उनकी टैक्स नीतियां देश की नीचे की आधी आबादी का कितना भला करने वाली थीं? मीडिया के बड़े-बड़े दिग्गज भी उनके बारे में ऐसी यादें लिख रहे हैं या बोल रहे हैं कि वे कितने अच्छे वक्ता थे, उन्हें संसद में उठने वाले मुद्दों की कितनी समझ थी, वे कितने काबिल वकील थे, उन्हें टैक्स मामलों की कितनी समझ थी, लेकिन जिसके कार्यकाल के सबसे बड़े महत्व का काम वित्तमंत्री का रहा हो, उसने गरीब और मध्यम वर्ग के लिए कौन सी नीतियां बनाईं, कौन से कार्यक्रम बनाए इसके बारे में श्रद्धांजलियां और संस्मरण दोनों ही मौन हैं। 

यह एक नया हिन्दुस्तान है जिसमें जमीनी हकीकत हाशिए पर है, और मीडिया को पसंद आने वाले मुद्दे, राजनीतिक रूप से और चुनाव में दुहे जा सकने वाले भावनात्मक मुद्दे, धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण को करने, बढ़ाने, और स्थायी करने वाले मुद्दे इतने हावी हो गए हैं कि जमीनी मुद्दों को अब सोच में भी जगह मिलनी बंद हो गई है। लोग किसी का मूल्यांकन करते हुए उसकी करोड़ों की घडिय़ों और करोड़ों के पेन के ब्रांड गिना रहे हैं, लेकिन उसके कार्यकाल में गरीबों की हालत क्या हुई इस बारे में चर्चा नहीं कर रहे। यह हिन्दुस्तान की नई बौद्धिक हकीकत है कि किसी की निजी कामयाबी, किसी की निजी संपन्नता का जिक्र उसके सामाजिक, राजनीतिक, और सरकारी-संसदीय जिम्मेदारियों से अधिक महत्व रखने लगा है। किसी की बोलने की शैली उसकी बातों से अधिक महत्व रखने लगी है। अरूण जेटली अकेले ऐसे नहीं हैं जिनका मूल्यांकन ऐसे नए पैमानों पर हो रहा है, इन दिनों अधिकतर लोगों का मूल्यांकन ऐसे ही पैमानों पर होता है जो कि मौजूदा सरकार को सुहाए, ताकतवर पार्टियों और तबकों को सुहाए, और किसी अप्रिय चर्चा का खतरा रखने वाले पैमानों को पहले ही ताक पर धर दिया जाए।  


(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त

बात की बात, 25 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अगस्त

नेताओं की संपन्नता और लोकतंत्र की विपन्नता...

संपादकीय
24 अगस्त 2019



अभी एक भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के बड़े नामी-गिरामी वकील पी.चिदंबरम को सीबीआई ने एक ऐसे मामले की जांच करते हुए गिरफ्तार किया है जिसमें उन पर और उनके बेटे पर यह तोहमत है कि चिदंबरम के वित्तमंत्री रहते हुए एक विदेशी कंपनी के भारत में पूंजीनिवेश को सरकार के नियमों में ढील दिलवाने के एवज में बेटे की कंपनी ने करोड़ों का फायदा पाया था। कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध कह रही है, और देश की मौजूदा दिक्कतों की तरफ से जनता का ध्यान हटाने की हरकत भी। अब जो भी हकीकत हो, चिदंबरम को देश के सबसे बड़े कई वकीलों की पूरी फौज हासिल है, इसलिए यह तो कहा नहीं जा सकता कि वे इंसाफ पाने की कोशिश करने लायक नहीं हैं। और सरकार कोई भी हो, विपक्ष का यह आरोप तो गुफाकाल से अब तक चले आ रहा है कि सरकारी जांच एजेंसियों की कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध से की जा रही है। चाहे वह केन्द्र सरकार हो, या फिर कोई राज्य सरकार हो। 

फिलहाल हमारा सोचना यह है कि संपन्न नेताओं को तो देश की सबसे महंगी कानूनी सेवा हासिल करके अपने को बचाने का पूरा मौका हासिल रहता है, गरीब, अगर नेताओं के बीच ऐसा कोई शब्द होता हो तो, नेता कैसे ऐसी महंगी कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं? यह बात इसलिए भी सोचनी होती है कि बिहार में लंबे समय से जेल में कैद लालू यादव से लेकर हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री चौटाला तक बहुत से ऐसे भ्रष्ट साबित नेता हैं जिन पर करोड़ों से लेकर सैकड़ों करोड़ तक की कमाई की तोहमत लगी हुई है, जुर्म साबित हो चुका है। अब जाहिर है कि जिस नेता के पास इतनी कमाई होगी, उसके वकील अदालतों में इंसाफ को इधर-उधर मोडऩे की तमाम तिकड़में कर सकते हैं, और अपने मुवक्किल को अधिक से अधिक समय तक बाहर रख सकते हैं, उनकी सजा को कम से कम करवाने के लिए पहाड़ हिला सकते हैं। अब यह लिखना अप्रासंगिक होगा कि नेताओं की ऐसी दौलत जांच एजेंसियों से लेकर, सुबूतों तक, गवाहों तक, और अगर बिकाऊ हों तो जजों तक को खरीद सकती है, और जो न बिके उसे निपटा भी सकती है। 

नेताओं की दौलत की एक दूसरी ताकत को भी समझने की जरूरत है जो लोकतंत्र को जूते मार-मारकर लहूलुहान करने की ताकत रखती है। दौलतमंद से चुनाव जीतना अगर नामुमकिन नहीं, तो तकरीबन नामुमकिन तो हो ही जाता है। जिस चुनाव में खर्च की सीमा से 25-50 गुना अधिक खर्च करना इस देश की आम चुनावी संस्कृति हो चुकी है, वहां पर अदने और आम उम्मीदवार भला कैसे बराबरी से मुकाबला कर सकते हैं? इसलिए एक बात बहुत जाहिर है कि राजनीतिक जीवन में, संसद और विधानसभाओं में पहुंचने वाले लोगों की अपनी खुद की संपन्नता की एक सीमा तय होनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है कि जब अरबपति लोग संसद को और दसियों करोड़ वाले लोग विधानसभा को, और खरबपति लोग कर्नाटक विधानसभा को भरने लगते हैं, तो देश के आम गरीबों की बहुसंख्यक आबादी की जलती-सुलगती दिक्कतें न तो उनकी समझ में आ सकती हैं, और न ही उनकी प्राथमिकता हो सकती है। इसलिए संसद की बहस धीरे-धीरे खोखली होती चल रही है, और गैरगरीब होती चल रही है। और ठीक इसी के मुताबिक राज्यों की विधानसभाएं भी संसद को मिसाल मानकर चलती हैं, या नहीं चलती हैं। 

यह सिलसिला देश का कानून पता नहीं कभी शुरू कर पाएगा या नहीं क्योंकि संपत्ति इस देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार है जिसे शायद किसी चुनाव कानून से छीना नहीं जा सकेगा, लेकिन पार्टियों पर यह रोक नहीं है कि वे एक सीमा से अधिक संपन्नता के लोगों को अपने उम्मीदवार न बनाए। यह बात कुछ लोगों को परले दर्जे की बेवकूफी की लग सकती है कि जब कुछ बड़ी पार्टियां अथाह दौलत जुटाने और फिर उसे खर्च करने को अपना सबसे बड़ा चुनावी हथियार बना चुकी हैं, तब भला कौन सी पार्टी दौलतमंद नेताओं और उम्मीदवारों से परहेज कर सकती है। लेकिन हम एक विचार के रूप में इस बात को सामने रखना चाहते हैं कि देश की संसद और विधानसभाओं में संपन्नता की एक सीमा रहनी चाहिए क्योंकि इस देश की बहुसंख्यक आबादी की विपन्नता असीमित है। यह बात इसलिए भी जरूरी है कि हाल के बरसों में हमने जिस अंदाज में सांसदों और विधायकों की थोक में खरीदी देखी है, दौलत की वह ताकत भी खत्म होनी चाहिए। कुछ दशक पहले एक दलबदल कानून बना था जिसके तहत एक तिहाई से कम विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोडऩे पर दलबदल के दायरे में अपात्रता पाते थे, लेकिन अब इस कानून को महंगे जूतों तले इतना कुचल दिया गया है कि एक तिहाई का एक कहीं पड़ा हुआ है, तो तिहाई कहीं और। इसलिए राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों, और चुनावों में अगर पैसों की ताकत पर काबू नहीं पाया जा सका, तो लोकतंत्र को किसी भी तरह बचाया नहीं जा सकेगा। इसकी शुरुआत कोई ऐसी पार्टी कर सकती है जिसमें यह हौसला हो कि अपने दस करोड़ से अधिक दौलत वाले नेताओं से कहे कि या तो बाकी दौलत पार्टी या देश को दें, या फिर किसी चुनाव के टिकट न मांगें। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अगस्त

राजकीय तामझाम सामंती सोच, लोकतांत्रिक नहीं...

संपादकीय
23 अगस्त 2019



बिहार में अभी वहां के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र गुजरे तो किसी भी राज्य की आम परंपरा के मुताबिक उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार नसीब हुआ। यह एक अलग बात है कि उनका नाम भ्रष्टाचार के मामलों में उलझा हुआ था, लेकिन मौत के बाद तो कानून के लंबे हाथ भी इंसान तक नहीं पहुंच सकते इसलिए परंपरा अधिक कायम रहती है, कानून धरे रह जाता है। इस मौके पर एक अटपटी बात यह हुई कि राजकीय सम्मान के एक हिस्से की तरह बंदूकों से सलामी दी जाती है, और सलामी की 22 रायफलों में से एक से भी धमाके की गोली नहीं चली। मुख्यमंत्री और राज्य के तमाम बड़े लोग वहां मौजूद थे, और उनकी मौजूदगी में पुलिस की रायफलों और कारतूसों का यह हाल सामने आया है। 

हमें इस बात पर जरा भी अफसोस नहीं है कि किसी को सलामी देने के लिए चलाई जाने वाली गैरजरूरी गोलियां काम न करें। अगर ये चलतीं, तो सिवाय प्रदूषण फैलाने के और कुछ नहीं करतीं। यह एक पूरे का पूरा सामंती सिलसिला है कि किसी को इस तरह की सलामी दी जाए। सरकार इस तरह किसी का सम्मान करने का फैसला करे, वह भी भला क्या सम्मान होगा? सम्मान तो किसी नेता का वह हो सकता है कि उसके अंतिम संस्कार में लोग खुद होकर पहुंचें। सरकार से सामंती सोच का खात्मा होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के राजभवन में जब एक सभागृह बनाया गया, और उसका नाम दरबार हॉल रखा गया, तब भी हमने उस भाषा के खिलाफ लिखा था कि लोकतंत्र में दरबार शब्द अपमानजनक है, और इसका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जब म्युनिसिपल की बिल्डिंग महल की तरह बनाई गई, तब भी उस डिजाइन के खिलाफ हमने लिखा कि जिस स्थानीय संस्था की बुनियादी जिम्मेदारी जनसेवा की है, उसे खुद महल की तरह की इमारत में क्यों बैठना चाहिए? पिछले बरसों में कई बार हमने यह सलाह दी थी कि जिला कलेक्टरों का पदनाम बदलकर जिला जनसेवक रखना चाहिए जिससे उन्हें उनकी भूमिका और उनकी जिम्मेदारी का अहसास रहे। इस कुर्सी पर बैठे लोग अंग्रेजों के वक्त लगान कलेक्ट करते रहे होंगे, लेकिन आज तो वे कलेक्ट करने से अधिक जनता पर खर्च करने के लिए बिठाए गए हैं, लेकिन वह सामंती पदनाम उसी सोच के साथ अब तक चले आ रहा है। 

सत्ता को जिस किस्म का तामझाम जिंदा रहने तक, और गुजर जाने पर भी राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की शक्ल में सुहाता है, वह सारा तामझाम जनता के पैसों पर पूरा होता है। और तामझाम की लत ऐसी होती है कि एक गंजेड़ी के धुएं के दायरे में बैठे लोग भी गांजा पीने लग जाते हैं, लोग सत्ता के किसी भी पहलू के सामंती तामझाम को देखकर खुद भी उसी में घिर जाते हैं। यह सब कुछ उस गरीब जनता के पैसों पर होता है जो कि सरकारी रियायती राशन मिलने पर जिंदा रह पाती है। अभी पिछले दिनों जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राजधानी नवा रायपुर में बनने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री बंगलों की योजना दिखाने ले जाया गया, तो वे इस बात पर भड़क गए कि सीएम के लिए बंगला 16 एकड़ पर क्यों बन रहा है? उन्होंने इसे घटाकर 6 एकड़ करने कहा। हिन्दुस्तान में आमतौर पर सत्ता पर बैठे लोग किसी किफायत की बात नहीं सोचते जबकि सत्ता के अधिकतर सुख केवल सत्ताकाल के लिए रहते हैं, और बाद में उनमें से अधिकतर सुख छोडऩे पड़ते हैं। ऐसे में भी कुछ लोग सत्ता सुख को हर-हमेशा का मान बैठते हैं और अपने जाने के बाद सलामी की बंदूकों की हसरत भी लिए जाते हैं, फिर चाहे उन बंदूकों के कामयाब या नाकामयाब कारतूसों की आवाज या सन्नाटा सुनने के लिए वे न भी रहें। 

सत्ता पर बैठे लोगों को ऐसी सामंती सोच से बचना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है, और सबसे गरीब जनता का पेट काटकर जुटाई जाती है। सत्ता या विपक्ष, जहां कहीं नेता हों, या राजभवन में हों, या बड़ी अदालतों में हों, तमाम ताकतवर लोगों को अपनी हसरतों से ऊपर लोकतांत्रिक मूल्यों को रखना चाहिए, और जनता के पैसों के मामले में अधिक से अधिक किफायत बरतना चाहिए। यह बात सुनने में कम ही ताकतवर लोगों को अच्छी लगेगी, लेकिन हम हर कुछ महीनों में किसी न किसी मौके पर यह बात याद दिलाते रहते हैं कि यह गांधी का देश है जिन्होंने  किफायत की मिसाल पूरी दुनिया के सामने रखी थी, यह नेहरू का देश है जिन्होंने अपनी निजी संपत्ति देश को दान कर दी थी, यह लालबहादुर शास्त्री का देश है जो गरीबी में जिए, और गरीबी में ही मर गए। यह देश सरकारी सादगी से जीने वालों को याद रखता है, उन्हीं का सम्मान करता है। अब जगन्नाथ मिश्र गुजर चुके हैं, इसलिए उनके बारे में कोई कड़वी बात कहना हिन्दुस्तानी संस्कृति के खिलाफ माना जाएगा, लेकिन फिर भी हम तो यह बात कहेंगे ही कि राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की सलामी की 22 बंदूकें मान लीजिए चल भी गई होतीं, तो क्या उन 22 धमाकों से जगन्नाथ मिश्र को भ्रष्टाचार में मिली कई साल की कैद की खबर दब गई होती?  

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

बात की बात, 22 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त

सच को छुपाने और दबाने से नुकसान छोड़ कोई नफा नहीं

संपादकीय
22 अगस्त 2019



छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उईके के फर्जी दस्तखत से एक चिट्ठी छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी विधायकों को भेजी गई जिनमें राज्यपाल नियुक्त होते ही उनकी तरफ से कांग्रेस विधायकों की खरीद-फरोख्त की बात कही गई थी। वे खुद भाजपा की नेता रही हैं और छत्तीसगढ़ की राज्यपाल बनने के पहले वे राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में मनोनीत उपाध्यक्ष थीं। ऐसे में छत्तीसगढ़ के कांग्रेस विधायकों को खरीदने की बात लिखकर उनको बदनाम करने की कोशिश जरूर की गई है, लेकिन वह कोशिश इतनी बचकानी, फूहड़, और अविश्वसनीय हो गई है कि साधारण समझ वाले लोग भी इसे फर्जी ही मानेंगे। लेकिन आजकल लोग अपनी समझ से अधिक भरोसा वॉट्सऐप पर आई हुई अफवाहों पर करते हैं, गढ़े हुए झूठों पर करते हैं, इसलिए ऐसी साजिश का भांडाफोड़ भी जरूरी है। आज जब हम अपने अखबार में इस समाचार को सबसे पहले उजागर कर रहे थे, तो सरकार के कुछ लोगों को यह ठीक लगा कि इसे प्रकाशित न किया जाए। लेकिन इसे न छापने से वॉट्सऐप पर तैरती हुई जालसाजी का भांडाफोड़ तो नहीं हो पाता, और महज एक फर्जी चिट्ठी घूमती रहती, और हर कोई तो इसे जांच-परख नहीं पाते। इसलिए सच को रोकना ठीक नहीं होता, अगर सच घर बैठे रहता है तो झूठ पूरे शहर का फेरा लगाकर आ जाता है। 

आज महज इसी बात पर हम इस जगह इस मुद्दे पर नहीं लिखते, अगर इस देश में कश्मीर में आज खबरों पर लगी हुई रोकटोक इतनी लंबी न खिंच गई होती। केन्द्र सरकार ने धारा 370 हटाने और कश्मीर को केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाने के फैसले की घोषणा करने के पहले ही कश्मीर में सुरक्षा बलों की इतनी बड़ी तैनाती कर दी थी, पूरे फोन और इंटरनेट बंद कर दिए गए थे, लोगों की जिंदगी थाम दी थी, और खबरों पर पूरी रोक लगा दी थी। नतीजा यह हुआ कि वहां से निकलने वाली खबरों में क्या सच है और क्या नहीं इसका खुलासा करने के लिए सरकार अपने नजरिए से सच और झूठ स्थापित करती रही। दुनिया के कुछ विश्वसनीय समाचार स्रोतों के मुकाबले किसी भी सरकार की ऐसी हालत में विश्वसनीयता बहुत कम हो जाती है जिसने कि खबरों पर रोक लगाकर रखी है। इसलिए कश्मीर को लेकर जिन लोगों की भावनाएं केन्द्र सरकार के साथ है, उन्हें वहां की किसी खबर से कोई लेना-देना भी नहीं है। वे कश्मीर के हालात को लेकर फिक्रमंद भी नहीं हैं, और कश्मीरी लोग उनके जेहन में सबसे आखिर में आने वाली चीज हैं। लेकिन कम संख्या में रहने वाले जो लोग इंसाफ की बात सोचते हैं, कश्मीरियों के बुनियादी हकों को मानते हैं, वे वहां की सही खबरों को जानने की कोशिश करते हैं तो हिन्दुस्तान के मीडिया का एक छोटा हिस्सा ही उनको नसीब होता है जो कि सरकार की कार्रवाई की स्तुति का कीर्तन करने में नहीं लगा है। देश के बाहर का कुछ मीडिया मिलता है जो कि भारत सरकार के किसी किस्म के दबाव में नहीं है, जो सच को सामने रखने की हिम्मत रखता है, और पूरी ताकत से सच को जुटाने की कोशिश भी करता है। जब देश के अधिकतर मीडिया से लोगों को सच नहीं मिल पा रहा है, कश्मीर के आज के आंखों देखे हालात नहीं मिल पा रहे हैं, तो वे सच और झूठ का फर्क नहीं कर पा रहे हैं, और दोनों किस्म की अफवाहों के बीच अपनी भावनाओं से सच तय कर रहे हैं, आगे बढ़ा रहे हैं। 

कभी भी सच को दबाने या छुपाने से किसी का भला नहीं होता। इस देश में इंदिरा के वक्त आपातकाल देखा था, और छत्तीसगढ़ के विद्याचरण शुक्ल आपातकाल के सेंसर मंत्री के रूप में इतनी बदनामी पा चुके थे कि वे राष्ट्रीय राजनीति में कभी इस खोए हुए सम्मान को वापिस नहीं पा सके, और देश-दुनिया का मीडिया उनके आखिरी वक्त तक उनके खिलाफ रहा, इतिहास में सेंसरशिप का दौर सबसे अधिक बदनाम रहा। कश्मीर को लेकर सच को सामने आने देना चाहिए, और अभी वहां के बारे में अगर सोशल मीडिया पर कुछ लोग ऐसी बात करते हैं, तो भावनाओं के सैलाब पर आसमान पहुंचे हुए लोग उनके खिलाफ गालियों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। भीड़ की दी हुई गालियों से सच और हकीकत नहीं बदलते। कश्मीर में जैसी हिंसा की आशंका थी, वैसी कोई हिंसा नहीं हुई है, और अब केन्द्र सरकार को खुद अपनी साख के लिए कश्मीर को देश की मूलधारा में आने देना चाहिए। इतने लंबे समय तक उसे बाकी दुनिया से काटकर रखने से नफा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है।  

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

आरक्षण से सामाजिक न्याय व्यापक अर्थ से व्यापक दायरे में तुरंत करने की जरूरत है

संपादकीय
21 अगस्त 2019



छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता दिवस के अपने पहले भाषण में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया है, और कोई भी राजनीतिक दल इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि ओबीसी तबका राज्य की तकरीबन आधी आबादी है, और इसे एक संगठित समुदाय माना जाता है, राजनीतिक रूप से ताकतवर भी। लेकिन मध्यप्रदेश कुछ महीने पहले ही इस काम को कर चुका था, और वहां जो  एक मांग उठी है, उस पर छत्तीसगढ़ को भी गौर करना चाहिए। मध्यप्रदेश में ओबीसी समुदाय के भीतर भी अतिपिछड़ों के लिए एक आरक्षण की मांग की जा रही है। दूसरी मांग मध्यप्रदेश ने पहले ही पूरी कर दी है, अनारक्षित तबकों में से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए दस फीसदी आरक्षण, जो कि केन्द्र में मोदी सरकार पहले ही कर चुकी है। इस तरह अब छत्तीसगढ़ के सामने दो सवाल खड़े हुए हैं कि ओबीसी के भीतर अत्यंत पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण का एक हिस्सा सुरक्षित करना जिससे कि अनारक्षित तबकों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दूसरा मामला है अनारक्षित तबकों के भीतर गरीबों के लिए दस फीसदी का, जिससे कि गैरगरीब अनारक्षित लोगों के लिए नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में अवसर सीमित होंगे। 

सामाजिक न्याय के नजरिए से इन दोनों बातों के बारे में सोचना जरूरी है, और चूंकि छत्तीसगढ़ में ओबीसी आरक्षण हाल ही में 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किया गया है, इसलिए अगर जल्द ही इसके भीतर अतिपिछड़ों के लिए एक हिस्सा सुरक्षित किया जाता है, तो उसमें संपन्न ओबीसी तबके के अलावा किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि किसी भी आरक्षित तबके के भीतर जब उनकी आबादी का एक हिस्सा संपन्न और सक्षम हो जाता है, तो आरक्षण के तमाम फायदों को यही मलाईदार तबका खा लेता है। ऐसा सिर्फ ओबीसी के साथ होता हो वह भी नहीं, हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों के लिए भी यह मांग करते आ रहे हैं कि क्रीमीलेयर को इसके फायदों से बाहर किया जाए। जो लोग सांसद, विधायक या मंत्री बन चुके हैं, या अखिल भारतीय सेवा के अफसर या जज बन चुके हैं, या जिनकी कमाई एक सीमा से अधिक हो चुकी है, उनके बच्चों की तैयारी के मुकाबले उन्हीं के आरक्षित तबकों के गरीब बच्चे किस तरह मुकाबला कर सकते हैं, यह साफ समझ आता है। दिक्कत यह है कि दलित और आदिवासी आरक्षण से क्रीमीलेयर हटाने का अधिकार, और उसकी जिम्मेदारी जिस मलाईदार तबके पर है, उसके अपने हित ऐसे फैसले से सबसे पहले मारे जाएंगे। इसलिए न तो संसद-विधानसभा, और न ही सरकार या अदालत में बैठे ताकतवर लोग ऐसा होने दे रहे। जिस सामाजिक न्याय की सोच के साथ दलित-आदिवासी आरक्षण शुरू किया गया था, वह आरक्षित तबके के भीतर ही एक बहुत बड़ा सामाजिक अन्याय बन चुका है, और जब तक संपन्न-सक्षण तबके को हटाया नहीं जाएगा, सचमुच ही वंचित तबका आरक्षण का फायदा नहीं पा सकेगा। 

इसी तरह छत्तीसगढ़ में बढ़ाए गए ओबीसी आरक्षण के भीतर तुरंत ही अतिपिछड़ों के लिए इस बढ़े हुए आरक्षण को पूरे का पूरा अलग कर देना चाहिए। ओबीसी को पहले की तरह आरक्षण मिलता रहे, और यह नई बढ़ोत्तरी सिर्फ अतिपिछड़ों के लिए लागू की जाए, या 27 फीसदी का एक पर्याप्त हिस्सा अतिपिछड़ों के लिए लागू किया जाए। छत्तीसगढ़ राज्य में गरीबी के सर्वे के जो आंकड़े हैं, वे बताते हैं कि पिछड़े वर्ग के भीतर भी गरीबी रेखा के नीचे की एक बड़ी आबादी है। ऐसे लोग सक्षम और संपन्न  ओबीसी नेताओं, कारोबारियों, और बड़े किसानों के बच्चों का कोई मुकाबला नहीं कर सकते। अब रहा सवाल अनारक्षित तबके के भीतर आर्थिक कमजोर लोगों के लिए अनारक्षित सीटों में से 10 फीसदी को अलग रखने का। यह इसलिए जरूरी है कि अनारक्षित तबके का भी 90 फीसदी हिस्सा ऐसा होगा जो कि आर्थिक कमजोर होगा, लेकिन जो मुकाबले की तैयारी नहीं कर पाता। ऐसे 90 फीसदी हिस्से के लिए अगर 10 फीसदी सीटों को अलग कर भी दिया जाता है, तो उससे अनारक्षित तबके के भीतर भी किसी सक्षम से बराबरी के अवसर नहीं छिनेंगे क्योंकि सामान्य सीटों में से 90 फीसदी सीटें तो इन अनारक्षित तबके के 10 फीसदी लोगों के लिए मौजूद रहेंगी ही।

आरक्षण के मुद्दे पर जब सामाजिक न्याय की बात होती है तो वह चुनिंदा मुद्दों पर नहीं की जा सकती, सामाजिक न्याय को एक व्यापक अर्थ में और व्यापक दायरे में लागू करने पर ही न्याय हो सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी ताजा घोषणा के साथ जोड़कर इन दो बातों को तुरंत ही लागू करना चाहिए, और संविधान के दायरे में दलित-आदिवासी तबकों में से मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने की एक राजनीतिक पहल करनी चाहिए, क्योंकि संसद की सहमति के बिना शायद कोई राज्य उसे अपने स्तर पर न कर सके। आज जनता के भीतर से इंसाफ के लिए लडऩे वाले जो लोग हैं, उन्हें भी किसी भी तबके के फायदों से क्रीमीलेयर को अलग करने के लिए संघर्ष करना चाहिए ताकि सामाजिक न्याय सचमुच ही अन्याय के शिकार लोगों तक पहुंच सके। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

बात की बात, 20 अगस्त

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अगस्त

ऐसे दानवाकार सपनों पर जनता के पैसों से अमल सचमुच लोकतांत्रिक है?

संपादकीय
20 अगस्त 2019



सन् 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना तो तीन बरस के लिए राज्य और सरकार चलाने का मौका उस वक्त के एक गैरविधायक सोनियापसंद अजीत जोगी को मिला, और उसी दौरान छत्तीसगढ़ की नई राजधानी की जगह छांटी गई, और उसकी बुनियाद रखी गई। सोनिया गांधी के हाथों रखी गई विशाल शिला इन दिनों एक विवाद की वजह भी बन गई है कि उसका रखरखाव ठीक नहीं हुआ, और वह जगह आईआईएम को दे दी गई, इसलिए एक सीनियर अफसर को अभी निलंबित भी कर दिया गया है। लेकिन वह आज की चर्चा का मुद्दा नहीं है। आज इस पर बात करने का मौका है कि जोगी सरकार के दौरान रखी गई बुनियाद पर रमन सिंह सरकार ने ऐसी राजधानी क्यों सोची और क्यों बनाई जो कि उसके कार्यकाल में किसी तर्कसंगत किनारे नहीं लग पाई? और यह कार्यकाल पांच बरस का एक निर्धारित कार्यकाल नहीं था, यह पांच के बाद अगले पांच बरस का, और उसके बाद पांच बरस के एक तीसरे कार्यकाल वाला डेढ़ दशक का कार्यकाल था जिसमें भी राजधानी न तो अपने पांवों पर खड़ी हो सकी, और न ही जिसका कोई भविष्य ही आज रह गया दिखता है। इससे परे एक दूसरी दिक्कत यह भी है कि सैकड़ों बरस पुरानी राजधानी रायपुर के साथ सरकार-निर्मित नई राजधानी का कोई रिश्ता अब तक कायम नहीं हो पाया। इसके लिए पिछली सरकार के दूसरे कार्यकाल में नया रायपुर के प्रशासनिक मुखिया, और भूतपूर्व मुख्य सचिव जॉय ओमेन ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला भी की थी जिसमें दर्जन भर देशों के विशेषज्ञों ने आकर नए और पुराने शहर के बीच तालमेल की कई किस्म की योजनाएं बनाई थीं, और आज भी यह जाहिर है कि किसी किस्म की सोच या योजना इन शहरों को जोड़ नहीं पाई। पन्द्रह बरसों की कसरत के बाद भी नया रायपुर जाना पुराने रायपुर के लोगों के लिए एक बदमजा काम रहता है क्योंकि शहर से पच्चीस किलोमीटर दूर बसाए गए मंत्रालय तक पहुंचने के पचास मिनट हर किसी पर भारी पड़ते हैं, और लोग इस योजना के इस पहलू के पीछे के दिमाग पर तरस खाते हुए, उसे कोसते हुए आते-जाते हैं। लेकिन इससे परे भी एक बात है कि भरी दोपहर में भी इस सफर का अधिकतर हिस्सा ऐसे मरघटी सन्नाटे वाले रास्ते से तय होता है जिसके बारे में छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है कि मरे रोवइया न मिले। फिर यह भी है कि हजारों एकड़ का यह ढांचा और उसकी सैकड़ों किलोमीटर सड़कें, दुगुने फुटपाथ उसी जनता के पैसों से बनाए गए जिस जनता की रोज दो वक्त खाने की औकात तभी हो पाई थी जब उसे एक रुपये किलो चावल मिलने लगा था। ऐसी गरीब जनता के पैसों से एक राज्य में निहायत गैरजरूरी ऐसा ढांचा एक विश्व रिकॉर्ड बनाने की नीयत से खड़ा किया गया जो कि महज नेता-अफसर-ठेकेदार का सपना होता है। यह बात इस संपादक ने रमन सरकार के दूसरे कार्यकाल में हुए इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन के जूरी की हैसियत से उस वक्त भी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच काफी खुलासे से रखी थी, और विकराल खर्च पर आपत्ति जाहिर की थी। इसे एक बिछा हुआ ताजमहल बताते हुए यह शक जाहिर किया था कि निकट भविष्य में इसके बसने के आसार नहीं रहेंगे। और आज उस बात के कई बरस बाद भी वही नौबत बनी हुई है।

आज इस पर चर्चा की जरूरत इसलिए है कि राज्य की नई कांगे्रस सरकार यह समझ नहीं पा रही है कि इस विकराल राजधानी का क्या करे? कैसे इसे बसाए, कैसे इसका रखरखाव करे, कहां से इसके लिए पैसे लाए, और इसकी किस-किस गड़बड़ी की जांच करे। यह नौबत कुछ उस किस्म की है कि पांच बरस के लिए किराए पर लिया गया मकान छोड़कर जाते हुए किराएदार अगले किराएदार के लिए तीन बरस का एक कुत्ता छोड़ जाए जिसे पालन भी मुश्किल हो, जिसका रखरखाव भी मुश्किल हो। किसी भी सरकार को अपने कार्यकाल से इतने अधिक लंबे समय तक चलने वाली विकराल योजना को कभी भी पूरे का पूरा शुरू नहीं करना चाहिए। और छत्तीसगढ़ में तो रमन सरकार को तीन-तीन कार्यकाल मिले, जिसके बाद आज तक अगर नया रायपुर एक महंगी पहेली बना हुआ खड़ा है, तो इस योजना की ऐसी विकरालता शुरू से ही सही नहीं थी।

आज इस बात को लिखने का मौका इसलिए भी है क्योंकि आंध्रप्रदेश में पिछले मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू ने अमरावती नाम की जगह पर जो नई राजधानी बनाना शुरू किया था, वह चंद्राबाबू की सरकार के डूबते ही बिना पानी डूब गई है। नए मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी विपक्ष में रहते हुए भी इस राजधानी के सख्त खिलाफ थे, और नई सरकार आते ही विश्व बैंक ने इस राजधानी के लिए मंजूर कर्ज देने से हाथ खींच लिया है, और एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक भी पीछे हट गया है। चंद्राबाबू के सपनों का यह उपग्रह आंध्र की छाती पर धूमकेतु की तरह आकर गिरा है। इन खबरों को देखते हुए लगता है कि पांच बरस के अपने कार्यकाल में चंद्राबाबू ने धरती की एक सबसे बड़ी राजधानी बनाने का जो महंगा सपना पाला था, उसका हक किसी एक सरकार को नहीं हो सकता। सरकारों को पांच बरस के ही सपने देखने चाहिए, तब तक जब तक कि वे किसी बांध, पुल, सड़क, बिजलीघर जैसे बुनियादी ढांचे के काम न हों। और राजधानियों जैसे सपने तो किसी सरकार को कागज पर चाहे देखना जायज हो, जमीन पर उसके उतने ही हिस्से को उतारना चाहिए जिसे कि अगली सरकार पाल सके, बढ़ा सके, या रोक भी सके। छत्तीसगढ़ का नया रायपुर इस बात की एक उम्दा मिसाल है कि किसी सरकार को कैसी-कैसी दीर्घकालीन योजना क्यों नहीं बनानी चाहिए, या कागजों पर बन भी जाए, तो भी उस पर जनता के पैसे खर्च करके ऐसा अमल नहीं करना चाहिए कि जिसे बाद में मिटाया भी न जा सके। छत्तीसगढ़ के इस नया रायपुर के और भी कई पहलुओं पर लिखने को बहुत कुछ है, और ताजा इतिहास के दस्तावेजीकरण के लिए वैसा लिखना जरूरी भी है, लेकिन इस कॉलम की सीमा इतनी ही है, और बाकी बातें फिर कभी।
 -सुनील कुमार


(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

भारत की इस मंदी को एक संभावना भी बना सकते हैं

संपादकीय
19 अगस्त 2019



भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग को लेकर रोज दिल दहलाने वाली खबरें आ रही हैं कि किस कंपनी ने अपने कितने कारखानों को कितने हफ्तों या महीनों के लिए बंद कर दिया, कौन सी ऑटो कंपनी कितने हजार कर्मचारियों की छंटनी कर रही है, और देश में पिछले तीन या छह महीनों में कितने हजार ऑटोमोबाइल डीलरशिप बंद हो चुकी हैं। हालत यह है कि आज कारखानों और डीलरों के अहातों में इक_ा दुपहिया-चौपहिया बिकने में अगले कई महीने लग जाएंगे, और ग्राहकी बढऩे के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। जाहिर है कि देश की अर्थव्यवस्था में मंदी का हाल यह है कि चड्डी-बनियान तक बिकना घट गया है, और इसकी खबरें दुनिया के एक मान्य सिद्धांत को भी बताती हैं कि जब पुरूषों के चड्डी-बनियान बिकना कम हो जाएं, तो वह अर्थव्यवस्था की बदहाली का सुबूत होता है। अब जब सावन खत्म हो चुका है, कांवड़ यात्रा निपट चुकी है, अमरनाथ यात्रा का वक्त भी खत्म हो गया है, कश्मीर बाकी देश का हिस्सा बना दिया गया है, देश की आबादी को काबू में करने का नया फतवा जारी हो गया है, और मानो उस फतवे के खिलाफ उसी खेमे के एक दूसरे वजनदार व्यक्ति ने हिन्दुओं को अपनी आबादी बढ़ाने का फतवा भी दे दिया है, तब देश की सब समस्याओं को खत्म मानते हुए, अर्थव्यवस्था पर भी थोड़ी सी चर्चा कर लेनी चाहिए। 

आज देश में जिस तरह फोन और इंटरनेट बाजार का एक बड़ा हिस्सा अंबानी के हाथ आ चुका है, और बाकी टेलीफोन कंपनियां एक-एक कर बिकती जा रही हैं। साल के आखिरी में देश की अर्थव्यवस्था के सरकारी आंकड़े दूरसंचार क्षेत्र की कमाई को बढ़ा हुआ जरूर बता देंगे, लेकिन उसमें कंपनियां घट चुकी रहेंगी, और एक अंबानी के हिस्से कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा रहेगा। देश का सकल राष्ट्रीय उत्पादन या जीडीपी एक धोखा खड़ा करने वाला आंकड़ा रहता है क्योंकि वह एक अंबानी, एक अदानी, और मनरेगा मजदूरों सबकी कमाई को मिलाकर उसका औसत निकालकर देश की औसत आय बता देता है, और उसकी कुल आय को वह सकल राष्ट्रीय उत्पादन बता देता है। इसलिए ये आंकड़े सफेद झूठ के और ऊपरी दर्जे का झूठ होते हैं, इनका कोई मतलब नहीं होता। लेकिन आज निजी गाडिय़ों की बिक्री का जो भट्टा बैठा हुआ है, उस बीच कुछ सोचने की भी जरूरत है। 

कहा जाता है कि जब बादल बहुत घने और काले रहते हैं, तो उन्हीं के किनारे से कहीं एक चमकीली लकीर उभरती है। ऐसी ही सिल्वर लाईनिंग आज ऑटोमोबाइल इस्तेमाल में हो सकती है। जब लोगों की औकात निजी गाडिय़ां खरीदने की रह नहीं गई हैं, तब सरकार और समाज दोनों के सामने यह मौका है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाए। शहरों में आवाजाही के लिए छोटी और बड़ी बसों का, मेट्रो या किसी और किस्म की ट्रेन का ऐसा ढांचा खड़ा किया जाए जो कि निजी गाडिय़ों की जरूरत को ही घटा दे। इससे यह हो सकता है कि कारों और दुपहियों का कारोबार घट जाए, लेकिन दुनिया में कई कारोबार घटते हैं, और कई कारोबार बढ़ते हैं। ऐसे ही लोगों के रोजगार भी एक जगह से हटकर दूसरी जगह चले जाते हैं। जब एटीएम शुरू हुए थे तो लोगों को लगता था कि बैंकों में कैशियरों की लाखों कुर्सियां छिन जाएंगी, लेकिन कोई नौकरी गई नहीं, और हर एटीएम के पीछे एक या दो चौकीदार लगने लगे। ऐसा ही हाल कार बनाने वाली कंपनियों का हो सकता है कि उनकी बढ़ोत्तरी रूक जाए, लेकिन बसें बनाने वाली कंपनियों का कारोबार खूब बढ़ सकता है, मेट्रो बनाने वाली निर्माण कंपनियों का काम खूब बढ़ सकता है। 

दरअसल ऑटोमोबाइल क्षेत्र की दिक्कत तो एक दिक्कत है, बड़ी दिक्कत दुनिया के शहरों में क्षमता की है कि वहां की सड़कें, वहां की पार्किंग कितनी गाडिय़ों को ढो सकती हैं। दुनिया को गाडिय़ों के बोझ और उनके जहर से बचाने के लिए यह जरूरी है कि लोगों की अपनी निजी गाडिय़ों पर निर्भरता घटाई जाए, और उनके सामने एक सस्ता, आसान, और सहूलियत का सार्वजनिक विकल्प उपलब्ध कराया जाए। भारत में सरकारें बहुत रफ्तार से ऐसा नहीं सोचती हैं, और अभी भी निजी गाडिय़ों को ही बैटरी से चलने वाली बनाने पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन इस बात को समझना चाहिए कि निजी गाडिय़ां लोगों के निजी घर में नहीं चलतीं, उनके लिए शहरीकरण की योजना और उसके ढांचे की जरूरत पड़ती है। इसलिए निजी वाहनों को निजी उपयोग की सुविधा के बजाय शहरों पर बोझ मानकर उस हिसाब से शहरी यातायात की एक नई योजना बनाना चाहिए जिसमें निजी गाडिय़ों को घटाना एक बड़ा मुद्दा हो। निजी गाडिय़ों की खपत घटने की फिक्र को मौका मानकर उसका इस्तेमाल करते हुए शहरी सार्वजनिक परिवहन की तरफ तेजी से जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अगस्त