गांधी का डीएनए आखिर कैसे धरती के उस पार पहुंच गया?

संपादकीय
30 सितंबर 2019



गांधी के जन्म को डेढ़ सौ बरस हो रहे हैं, और भारत सरकार ने इस मौके पर बड़े खास जलसे का ऐलान भी किया है। यह एक अलग बात है कि देश में कदम-कदम पर गांधी की सोच, गांधी की नसीहतों, और गांधी के बर्दाश्त के खिलाफ माहौल बढ़ाया जा रहा है, लेकिन फिर भी सरकार है तो जलसा करना उसका हक तो है ही। लेकिन इस मौके पर एक दूसरी वजह से भी गांधी की चर्चा हो रही है। धरती के दूसरी तरफ संपन्न और विकसित योरप के एक सबसे संपन्न और विकसित देश स्वीडन में एक संपन्न परिवार की स्कूल जाती सोलह बरस की ग्रेटा थनबर्ग ने पिछले बरस धरती के जलवायु परिवर्तन के खतरों के खिलाफ एक अहिंसक आंदोलन शुरू किया जिसने एक बरस के भीतर पूरी दुनिया में जोर पकड़ लिया है, और यह हाल के दशकों में किसी एक बच्ची का शुरू किया हुआ सबसे बड़ा आंदोलन भी बन गया है जिसने कि संयुक्त राष्ट्र में जुटे पौने दो सौ से अधिक देशों के नेताओं को भी इस बच्ची को सुनने पर मजबूर कर दिया। 

इन दो बातों में एक रिश्ता जाहिर तौर पर दिखता है जो कि हो सकता है कि मौजूद न हो। गांधी ने अपनी पूरी जिंदगी सादगी और किफायत से एक ऐसी जीवनशैली को सामने रखा था, और बढ़ावा दिया था जिससे कि धरती पर सबकी जरूरतें पूरी हो सकती हैं, चाहे आबादी जितनी भी हो। अब स्वीडन की इस छात्रा ने अपने मन से इसी बात को आगे बढ़ाया है जो कि सौ बरस पहले गांधी ने शुरू की थी, और दिलचस्प बात यह है कि अभी तक की खबरों में ऐसा कहीं पढऩे नहीं मिला है कि इसने गांधी को पढ़कर इस रास्ते पर चलना तय किया, अपने पूरे परिवार को एक बहुत किफायती जिंदगी जीने पर सहमत कराया, और एक अहिंसक आंदोलन शुरू किया। आज जब इस किशोरी की इस पहल और इस ऐतिहासिक कामयाबी की खबरें आती हैं, तो जाहिर तौर पर गांधी भी याद आते हैं। ऐसे में कुछ लोगों को यह बात नाजायज लग रही है कि हम गांधी को याद करने के लिए पश्चिम की एक छात्रा के रास्ते यह काम कर रहे हैं। लेकिन जैसा कि दुष्यंत कुमार ने लिखा था, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए, अगर गांधी की सोच को कोई गांधी को जाने बिना भी आगे बढ़ा रही है, तो वह तो सचमुच ही गांधी की बेटी है, और गांधी के हिन्दुस्तानी नामलेवा, और जानलेवा, लोगों के मुकाबले गांधीवाद की असली वारिस है, फिर चाहे उसने गांधी को पढ़ा भी न हो। दरअसल किसी को जानने के लिए उस सरीखी सोच भी काफी हो सकती है, उसे जानना जरूरी नहीं होता, और स्वीडन की इस बच्ची ने यही किया है। 

आज गांधी के जन्म के देश हिन्दुस्तान में जहां कि हर बच्चे को स्कूल के शुरू के कुछ बरसों में ही कई बार गांधी को पढऩा होता है, और साल में कम से कम चार बार स्कूल के जलसों में गांधी के बारे में सुनना होता है, उन बच्चों में से भी स्कूल में रहते-रहते एक ने भी गांधीवाद के बारे में कोई असल पहल अपनी जमीनी जिंदगी में नहीं की है, तो फिर एक स्वीडिश लड़की को बिना रक्तसंबंध के भी गांधी की वारिस मानने में क्या दिक्कत है जिसने कि सचमुच ही गांधी की सोच को आगे बढ़ाया है, बिना गांधी को पढ़े, बिना गांधी को जाने, और बिना गांधी को राष्ट्रपिता पाए। दरअसल पश्चिम से ऐसा परहेज भी किसी काम का नहीं है कि गांधी की सच्ची वारिस को देखते हुए भी हम उसकी पहल के रास्ते गांधी को देखने में हीनभावना महसूस करते हैं। गांधी के लिए स्कूलों में गांधी पढऩे वाले, या सालाना उनकी याद करने वाले लोग जरा भी अहमियत नहीं रखते हैं, उनके लिए तो वे लोग मायने रखते हैं जो उनकी राह पर चलते हुए धरती को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, और धरती के साधनों पर सारे लोगों के बराबरी के हक की ओर बढ़ रहे हैं। अपनी खपत को कम करके, खुद किफायत की जिंदगी जीकर, अपनी खुद की तकलीफ से हासिल की गई मिसाल को दूसरों के सामने रखकर जो लोग गांधी को याद दिलाते हैं, वे उन लोगों से बेहतर हैं जो गांधी को सालाना जलसों में राष्ट्रपिता मानते हैं, और इन दिनों तो गांधी के कातिल की पूजा भी करने में लगे हुए हैं। 

दरअसल हिन्दुस्तान के लोगों को स्वीडन की इस छात्रा के बारे में सोचना चाहिए कि उसने गांधी से हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए, गांधी को जाने-पहचाने बिना किस तरह गांधी की सोच का डीएनए हासिल किया? यह कामयाबी छोटी नहीं है, और गांधी के नामलेवा लोगों को सोचना चाहिए कि यह पारस पत्थर उन्हें छूकर भी क्यों नहीं बदल पाया? क्यों हिन्दुस्तान नाम का यह मुल्क गांधी नाम की वल्दियत पाकर भी आज इस हालत में पहुंचा हुआ है कि कदम-कदम पर, सड़क-चौराहे पर गांधी की सोच को घेरकर उसकी भीड़त्या की जा रही है? क्या ऐसे हिन्दुस्तानियों को भी इस बात पर आपत्ति करने का कोई हक है कि किसी फिरंगी गोरी लड़की की पहल की वजह से, उसका जिक्र करते हुए हम गांधी को क्यों याद कर रहे हैं? आज शायद गांधी दूसरे देशों से होते हुए ही हिन्दुस्तान को यह याद दिला सकेंगे कि वे थे, और आज उनकी सोच को जिंदा रहने देना चाहिए, अगर इस देश को जिंदा रखना है। स्वीडन की ग्रेटा ने न सिर्फ दुनिया को भविष्य का सबसे बड़ा खतरा दिखाया है, बल्कि अनजाने ही उसने हिन्दुस्तानियों को एक आईना भी दिखा दिया है जिसमें अपना चेहरा बड़ा बदशक्ल पाकर हिन्दुस्तानी इस पश्चिमी आईने को तोडऩा चाहते हैं। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 सितंबर

...तो फिर उस ईश्वर का न रहना ही बेहतर होगा..

संपादकीय
29 सितंबर 2019



हिन्दुस्तान में धार्मिक रीति-रिवाज कानून को तोडऩे का एक बड़ा मुद्दा रहते हैं। जब अपने रिवाजों को गुंडागर्दी के साथ बाकी सारे समाज पर थोपने की नौबत आती है, तो लोग अदालती फैसलों और कानून को पांवोंतले कुचलने लगते हैं। भोपाल से भाजपा की सांसद बनी साध्वी प्रज्ञा ने कल ही बयान दिया है कि नवरात्रि पर शोरगुल को लेकर किसी अदालत का कोई आदेश नहीं माना जाएगा, और लाउडस्पीकर भी बजेंगे, और डीजे भी। खुला और सार्वजनिक बयान अदालत के मुंह पर एक तमाचे की तरह है कि जिस अदालत की जो औकात हो वह करके देख ले, धर्म कानून को कुचलते ही रहेगा। इधर छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट जिलों को नोटिस ही जारी कर रहा है कि धार्मिक कार्यक्रमों में शोरगुल न हो, लेकिन हाल ही में गुजरे गणेशोत्सव को देखें तो शोरगुल पिछले बरसों के मुकाबले और ज्यादा हुआ, और सरकार मानो आरती की थाली घुमाते हुए खड़ी हुई थी। एक मोहल्ले में वहां के रहने वालों ने नवरात्रि पर आधी रात के बाद तक चलने वाले गरबा के खिलाफ मोर्चा खोला है कि वे इन 9 दिनों न अपने घर तक अपनी गाड़ी ले जा पाते, और न ही रात एक बजे तक सो पाते, इसलिए गरबा कॉलोनी के बीच न होने दिया जाए। और बात महज हिन्दू धर्म की नहीं है, जब जिस धर्म को मौका मिलता है, वह अपना बाहुबल दिखाने पर आमादा हो जाता है, उतारू रहता है, और हिंसा की अपनी सीमा को हर बार खुद ही हराता चलता है। और फिर एक धर्म के देखादेखी दूसरे धर्म के लोग अराजकता के मुकाबले में और ऊंची छलांग लगाने में लगे रहते हैं। 

धर्म जिसका असर इतना अधिक है कि उसका अगर सही इस्तेमाल होता तो वह दुनिया का बहुत कुछ भला भी कर सकता था। लेकिन आज धर्म दुनिया में सबसे अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार हो गया है, दुनिया में सबसे अधिक ऐसे प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हो गया है जिससे अर्थव्यवस्था नहीं चलती। धर्म ने लोगों को अपने बच्चों से पोलियो ड्रॉप्स को दूर रखवाकर उन्हें विकलांग होने की तरफ धकेलने की धर्मान्धता दी है, धर्म ने अड़ोस-पड़ोस के लोगों का गला काटने का हौसला दिया है, और जैसा कि हिन्दुस्तान के कुछेक दंगों में सामने आया, धर्म ने लोगों को इतना हिम्मती बना दिया कि उन्होंने विधर्मी गर्भवती महिला की कोख चीरकर अजन्मे बच्चे को भी निकाल बाहर फेंका। ऐसे असरदार धर्म को लेकर महाराष्ट्र का ताजा इतिहास बताता है कि किस तरह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव की शुरुआत अंग्रेजी राज के खिलाफ जनता में एक राजनीतिक जागरूकता पैदा करने के लिए, और आजादी की चाह वाला राष्ट्रवाद पैदा करने के लिए की थी। आज वह जागरूकता और वैसा राष्ट्रवाद खत्म हो गया है, और गणेश के नाम पर बेतहाशा शोर वाली अराजकता काबिज हो गई है। सरकारों में वोटों की चाह में इतना हौसला नहीं बचा है कि वे धार्मिक गुंडागर्दी और धार्मिक हिंसा को छू भी सकें। नतीजा यह है कि हर त्यौहार जिंदगी को मुश्किल, और अधिक मुश्किल बनाते चल रहा है, जीना हराम, और अधिक हराम करते चल रहा है। 

लेकिन जिन समाजों में राजनीतिक जागरूकता रहती है, वहां पर धर्म का इस्तेमाल कुछ बेहतर कामों के लिए भी किया जाता है। अभी मुस्लिमों का दुख का एक त्यौहार आया था, मुहर्रम। इस मौके पर आमतौर पर निकलने वाले परंपरागत जुलूसों में धर्म के इतिहास की तकलीफदेह शहादत को याद करके लोग अपने को जंजीरों से, हथेलियों और चाकुओं से पीट-पीटकर लहू-लुहान करते हैं। इस बार कुछ जगहों की तस्वीरें सामने आईं कि लहू को ऐसा बहाने के बजाय उस दिन मुस्लिम समाज के बहुत से युवक-युवतियों ने जाकर रक्तदान किया ताकि उनका खून किसी के काम आ सके। आज ही ट्विटर और फेसबुक पर एक चित्र सामने आया है जिसमें, शायद बंगाल के, एक चित्रकार सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय ने असम में नागरिकता-विहीन करार दिए गए लोगों की दहशत को दिखाया है। वहां 20 लाख ऐसे लोगों पर डिटेंशन कैम्प जाने का खतरा मंडरा रहा है, और इस तस्वीर में देवी दुर्गा को अपने बच्चों, गणेश, सरस्वती वगैरह को लेकर डिटेंशन कैम्प जाते हुए दिखाया गया है। धर्म का ऐसा इस्तेमाल करने के लिए कलाकारों में एक हौसला भी होना चाहिए। धर्म महज बुरी चीज नहीं है, अगर उसके इस्तेमाल से किसी जागरूकता को लाया जा सके। अगर धर्म से जुड़े हुए संन्यासी-स्वामी, और पादरी-मौलवी बलात्कार में लगे रहने के बजाय अगर कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दे को उठाते, प्लास्टिक-प्रदूषण के खिलाफ धार्मिक रीति-रिवाज खड़े करते, अगर पेड़ों को कटने से बचाते, और उनकी जगह खुद कटने के लिए खड़े हो जाते, तो उनके ईश्वर की बनाई हुई इस धरती का कुछ भला होता। लेकिन धर्म से जुड़े हुए लोग जिस बड़े पैमाने पर बलात्कारी पाए जा रहे हैं, और अभी पकड़े जाने से बचे हुए हैं, उससे धर्म की साख भी अब ऐसी नहीं रह गई है कि धार्मिक वर्दी में घूमने वाले स्वघोषित दिग्गज लोगों की बात का कोई अधिक असर हो। 

ऐसे में धार्मिक आयोजन करने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि वे धर्मान्धता को बढ़ाकर महज धर्म की साख चौपट कर रहे हैं, उसका कुछ भला कुछ नहीं कर रहे, और न ही अपने बच्चों को कोई सुरक्षित दुनिया दे रहे हैं। बेहतर यह होगा कि धर्म का इस्तेमाल आस्थावानों के ईश्वर की बनाई गई दुनिया को बेहतर करने में हो, न कि उसे बर्बाद करने में। अगर ईश्वर का नाम लोगों को जागरूक न कर सके, बेहतर इंसान न बना सके, तो फिर उस ईश्वर का न रहना ही बेहतर होगा।  

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

कामयाब इंसान और बेहतर इंसान का फर्क

संपादकीय
28 सितंबर 2019



आज दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी गूगल के मुखिया, हिन्दुस्तानी मूल के सुंदर पिचाई की बचपन से अब तक की कहानी आज खबरों में आई है जिसके मुताबिक जब वे आईआईटी से पढ़ाई पूरी करके आगे पढऩे अमरीका गए तब तक उनके पास अपना खुद का कम्प्यूटर भी नहीं था। परिवार मध्यमवर्गीय था, और मामूली मकान में सारे लोग जमीन पर ही सोते थे। घर में फ्रिज भी नहीं था, और फ्रिज आना, टेलीफोन लगना बहुत बड़ी बात रही। आईआईटी के दिनों की अपनी दोस्त से मोहब्बत के बाद भी वे उससे महीनों बात नहीं कर पाते थे क्योंकि विदेश की टेलीफोन कॉल बहुत महंगी थी। आज वे गूगल के सीईओ होने के नाते इतनी बड़ी तनख्वाह पाते हैं कि उसके शून्य गिन पाना भी कुछ मुश्किल बात है। 

इस बात पर लिखना जरूरी इसलिए है कि आज कई किस्म के इश्तहार मां-बाप को उकसाते हैं कि बच्चों की तेज रफ्तार से कद-काठी बढ़ाने के लिए, उनका दिमाग तेज करने के लिए, याददाश्त बढ़ाने के लिए दूध में घोलकर क्या-क्या दिया जाए। इसके बाद बच्चों के लिए बहुत महंगे किस्म के कुछ नए पढ़ाई के ऐसे कोर्स टीवी पर बेचे जा रहे हैं जिनमें से कोई शाहरूख खान बेचता है, तो कोई अमिताभ बच्चन। कुल मिलाकर माहौल इस तरह का है कि अगर इश्तहारों का सामान आप अपने बच्चों को खिला-पिला न सकें, टीवी पर सुझाया गया कोर्स न करवा सकें, तो वे बच्चे पीछे रह जाएंगे। कई महंगी स्कूलों की एयरकंडीशंड बसें सड़कों पर दिखती हैं, उनकी बहुत महंगी और महलनुमा इमारतें भी दिखती हैं, और अखबारों में उनके बड़े इश्तहार भी दिखते हैं। ऐसा लगता है कि महंगी कोचिंग और बाकी सारे महंगे तरीकों के बिना बच्चे दुनिया में कोई मुकाबला ही नहीं कर पाएंगे। 

लेकिन दुनिया के बहुत से सबसे कामयाब लोगों को देखें तो वे गरीबी और अभाव के बीच ही आगे बढ़े हुए हैं। जिस अमरीका की तरफ हिन्दुस्तानी मां-बाप और बच्चे टकटकी लगाकर देखते हैं, वहां तो आमतौर पर अरबपति भी अपने बच्चों को पढ़ाई के दौरान कोई न कोई काम करके खर्च जुटाने के लिए कहते हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान के संपन्न मां-बाप को एक दूसरी चीज समझना चाहिए कि कामयाबी महज पढ़ाई या औजारों से नहीं आती, एक बुनियादी मेहनत और पक्के इरादे की जरूरत भी उसके लिए पड़ती है जिन्हें खरीदा नहीं जा सकता। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि कामयाबी ही सबकुछ नहीं होती, बच्चों का बेहतर इंसान बनना कामयाब बनने से बेहतर बात होती है। बिल गेट्स आज दुनिया के सबसे कामयाब और सबसे संपन्न लोगों में से एक हैं, लेकिन उतने कामयाब और उतने संपन्न तो और भी बहुत से लोग हैं, आज उनकी चर्चा इसलिए होती है कि अपनी दौलत का एक बहुत बड़ा हिस्सा वे समाजसेवा में लगा चुके हैं, और दूसरे कारोबारियों को भी समाजसेवा के लिए अपनी दौलत दान करने के लिए प्रेरित करते हैं। 

सभी मां-बाप को यह समझना चाहिए कि कामयाबी संपन्नता के बावजूद दूर रह सकती है, विपन्नता के बावजूद आ सकती है, लेकिन इन दोनों बातों से परे बच्चों को बेहतर इंसान बनाने के लिए कोई संपन्नता नहीं लगती। आज के बहुत कामयाब लोगों को देखें, अगर वे समाज के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं, तो वे हकीकत में कामयाब हैं ही नहीं। दूसरी तरफ जो बेहतर इंसान हैं, वे संपन्नता के बिना भी कामयाब हैं। इसलिए आज लोगों को महत्वपूर्ण कॉलेजों में अपने बच्चों के दाखिले की अंधी दौड़ से परे भी सोचना चाहिए कि उनको कामयाब बनाने के पहले बुनियादी रूप से अच्छा इंसान कैसे बनाया जाए।

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 सितंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 27 सितंबर

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को लेकर सोचने की बातें

संपादकीय
27 सितंबर 2019



देश की बड़ी अदालतों की कुछ बातें समझ नहीं आती हैं। आजादी के पहले से चल रहा रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद का मामला अब निपटा देने के फेर में मौजूदा मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल के आखिरी कुछ हफ्तों में सुनवाई और फैसला लिखवाना, इन दोनों पर आमादा हो गए हैं। इंसाफ रफ्तार से होना तो अच्छी बात है, लेकिन इस रफ्तार को किसी के रिटायरमेंट से जोड़कर इस तरह बढ़ाना किसी बेइंसाफी का सबब भी बन सकता है। कुछ वकीलों ने पहले भी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की इस व्यवस्था का विरोध किया था कि सुनवाई पूरी होने तक हफ्ते में पांच दिन यही मामला चलेगा, और सभी पक्षों के वकील रोज सुनवाई में शामिल रहेंगे। यह रूख वकालत के पेशे के लिए भी दिक्कत का था क्योंकि वकीलों के पास कई मामले रहते हैं, और किसी एक मामले में महीनों तक लगे रहना उनके लिए परेशानी का सबब होता है। लेकिन मुख्य न्यायाधीश अपने रिटायरमेंट के पहले यह फैसला लिखकर जाना चाहते हैं क्योंकि यह एक ऐतिहासिक मामला है, और कोई भी जज ऐसा इतिहास बनाए बिना रिटायर हो जाना नहीं चाहते। दूसरी बात यह भी है कि सुनवाई वाले जज अगर रिटायर हो जाएं, तो नए जज को शायद फिर सिरे से मेहनत करनी होगी, और मामला फिर बड़ा लंबा खिंचेगा। 

लेकिन दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट में एक दूसरे मामले में अदालत का एक दूसरा रूख सामने आ रहा है। जोगी परिवार से जुड़े एक मामले की सुनवाई करने से कल बिलासपुर हाईकोर्ट के एक और जज न इंकार कर दिया। जोगी की जाति को लेकर अनंतकाल से चल रहे इस मामले में कल एक जज ने इसलिए अपने को अलग कर दिया कि वे पहले सरकारी वकील थे और उन्होंने इस मामले में सरकार की तरफ से जवाब दिया था। हमको अदालत की कार्रवाई की तकनीकी बारीकियां नहीं मालूम हैं, लेकिन यह बात अटपटी लगती है कि किसी मामले को सुनने से एक जज मना करते हैं, तो फिर वह मामला कई दिनों या कई हफ्तों बाद के लिए किसी दूसरे जज की अदालत में तय होता है। उसके बाद सुनवाई के दिन वे मना करते हैं, तो फिर तीसरे जज के साथ यही सिलसिला चलता है। एक आम समझ यह कहती है कि जैसे ही किसी जज को कोई मामला दिया जाता है, अगर उन्हें उसकी सुनवाई करने में कोई दिक्कत है तो उसकी कोई सुनवाई तय होने के पहले ही उनसे पूछ लिया जाना चाहिए कि कोई दिक्कत तो नहीं है। जिन अदालतों पर काम का बोझ लदा हुआ है, और जिन मामलों में लोग इंसाफ के लिए टकटकी लगाए बैठे रहते हैं, वहां पर तो जज खुद होकर मना कर दें कि वे किन वजहों से कोई मामला नहीं सुन सकते, तो बचे हुए जजों के नाम वह मामला चढ़ जाए, और वक्त बचे।

दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट आज अयोध्या को लेकर जो हड़बड़ी और रफ्तार दिखा रहा है, उसके बारे में भी देश को सोचने की जरूरत है कि क्या इस बेंच के जजों के रिटायरमेंट को कुछ हफ्तों के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है? अगर जरूरत हो तो संविधान में संशोधन करके भी ऐसा कोई इंतजाम करना चाहिए जिससे कि अदालत का लंबा वक्त खा चुके मामले आखिरी दौर में किसी जज के रिटायर होने से दम न तोड़ें। अभी तक भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, लेकिन असाधारण मामले, असाधारण परिस्थितियां कई असाधारण रास्ते सुझाते भी हैं। सुप्रीम कोर्ट को अयोध्या के मामले में हड़बड़-सुनवाई करके ऐसा फैसला नहीं देना चाहिए जिसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दर्ज की जाए, या जिसे लेकर बाद में तोहमत लगे कि इंसाफ नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कभी-कभी असाधारण फैसले लिए हैं, और हम नहीं जानते कि यह अदालत के अधिकार क्षेत्र में है, या नहीं कि सुनवाई या उसके बाद फैसला लिखने को कुछ हफ्तों के लिए आगे बढ़ाया जा सके। 

अदालतों से जुड़़े हुए ऐसे ही कुछ दूसरे पहलू भी हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में विचार करने की जरूरत है। एक बात तो यह भी हो सकती है कि हाईकोर्ट के जिन वकीलों ने जिस हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की है, उन्हें वहां पर जज ही न बनाया जाए। उन्हें काबिलीयत के आधार पर जज बनाना ही है, तो दूसरे प्रदेश में बनाया जाए जहां उन्होंने कोई मुकदमे नहीं लड़े हैं। इससे मामलों को छोडऩे की मजबूरी भी खत्म हो जाएगी और अदालतों में भेदभाव या अपने मातहत रहे जूनियर वकीलों के साथ पक्षपात के आरोप भी नहीं लगेंगे। जाहिर तौर पर ऐसी कोई वजह नहीं दिखती है कि किसी राज्य में उसी राज्य के वकीलों या जूनियर जजों को हाईकोर्ट जज बनाया जाए क्योंकि हाईकोर्ट जजों का तो दूसरे राज्यों में तबादला होते ही रहता है। बेहतर यही होगा कि कोई भी जूनियर जज या सीनियर वकील अपने ही राज्य में जज न बनें।

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 26 सितंबर

दलित, शौचालय, और पानी की कमी के कई पहलू...

संपादकीय
26 सितंबर 2019



मध्यप्रदेश के शिवपुरी इलाके में राजघरानों का असर आजादी की करीब पौन सदी बाद भी पूरी तरह गया नहीं है, और उस इलाके से दलितों पर जुल्म की खबरें कई बार आती हैं। लेकिन देश भर से जब भी ऐसी कुछ खबरें आती हैं तो वे हत्या या हिंसा की रहती हैं, बलात्कार की रहती हैं, आम जिंदगी में बड़े जुर्मों से नीचे की छोटी हिंसा तो खबरों में आ भी नहीं पाती। ऐसे में समाज में जो भेदभाव जारी है, वह महज बड़ी हिंसा के आंकड़ों तक सीमित मानना जायज नहीं होगा। अब कल की खबर यह है कि शिवपुरी जिले में दो दलित बच्चे सड़क किनारे पखाना कर रहे थे, और गांव के ही दो दबंग-जाति के नौजवानों ने लाठियों से पीट-पीटकर उन्हें मार डाला। गांव में इसी यादव जाति की आबादी अधिक है, और यहां पर गांव के सारे लोगों के पानी ले लेने के बाद ही दलितों को पानी लेने की इजाजत है। 

महिलाओं से बलात्कार और दलितों पर सभी किस्म के जुल्म के मामले में मध्यप्रदेश देश के सबसे ऊपर के राज्यों में हैं। मध्यप्रदेश के सीधी-सतना के इलाके, और ग्वालियर के आसपास के इलाके सैकड़ों बरस से एक सामंती सोच के शिकार हैं, और यहां पर सार्वजनिक जीवन की बोलचाल की भाषा में भी दबंग जातियों के नेताओं के लिए सामंती शिष्टाचार अनिवार्य रहता है। ऐसे में दलितों पर जुल्म इन इलाकों के लोगों के बीच एक ऐसा सामाजिक तनाव भी खड़ा कर रहा है जो कि इस सदी में शायद अधिक समय तक अहिंसक न रहे, हो सकता है कि हिंसा के जवाब में वंचित तबके के लोग भी हिंसा पर उतर आएं, और जिस तरह डकैत फूलन ने जुल्म के जवाब में जुल्म किए थे, हो सकता है कि संगठित दलित तबके भी कहीं-कहीं इसका जवाब देने को खड़े होने लगें। जब देश का कानून और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था लोगों को बचा नहीं पाती है, तो उनको अपने आपको बचाने का हक तो रहेगा ही। 

लेकिन इस जाति व्यवस्था से परे एक दूसरी बात को भी इससे जोड़कर देखने की जरूरत है। अभी कल ही अमरीका गए हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बिल गेट्स के बनाए हुए एक सामाजिक-समाजसेवी संगठन ने भारत में शौचालय बनाने के लिए सम्मानित किया है। हम पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को देखें तो यह समझ पड़ता है कि गांवों को, या जिलों को खुले में शौच से मुक्त घोषित करना सरकारी भ्रष्टाचार की एक बड़ी ढाल है, और हजारों करोड़ रूपए इस पर खर्च किए गए हैं जिनमें से पता नहीं कितना बड़ा हिस्सा फर्जी आंकड़ों को खड़े करने में खर्च कर दिया गया है, या अपनी जेब में रख लिया गया है। शौचालयों की दीवारें नहीं उठीं, सरकारी फाईलों पर आंकड़े उठ गए। लेकिन इन सबसे परे भी एक और बड़ी बुनियादी बात भारत के इस शौचालय अभियान को चुनौती देते हुए खड़ी है, वह है पानी की कमी। देश के एक बहुत बड़े हिस्से में साल के कई महीने पीने को भी पानी नसीब नहीं होता है, और इस बरस तो कुछ महानगरों में पानी पर कत्ल भी हो चुके हैं। कई-कई मील दूर अगर पानी मिलता भी है, तो भी उसे ढोकर लाने का जिम्मा अकेली महिला का रहता है, और शौचालय के लिए पानी ढोने का अतिरिक्त बोझ भी महिला पर ही पड़ता है। देश भर में कहीं पानी की कमी से, तो कहीं अधूरे निर्माण की वजह से शौचालय काम के नहीं हैं। ऐसे में जब बिल गेट्स फाऊंडेशन ने मोदी का सम्मान किया, तो राजनीतिक विचारधारा से परे के लोगों ने भी यह सवाल उठाए कि क्या शौचालयों की हालत देखते हुए, महिलाओं पर उनका अतिरिक्त बोझ देखते हुए यह सचमुच ही किसी सम्मान की बात है? 

शौचालयों को लेकर सत्ता की दीवानगी इस हद तक चली गई है कि देश में कई जगहों पर खुले में शौच करने वाले लोगों की तस्वीरें खींचने का काम वहां की म्युनिसिपल या पंचायत करने लगीं, बिना यह सोचे कि क्या लोगों की जिंदगी की निजता का भी कोई महत्व है? जगह-जगह लोगों पर सैकड़ों रूपयों का जुर्माना लगाया जाने लगा, और उन रसीदों की तस्वीरें हवा में तैरती रहीं। इसे एक सामाजिक उन्माद के रूप में इतना फैलाया गया कि जिस घर में शौचालय न हो, उस घर में अपनी बेटी न ब्याही जाए। लेकिन यह नहीं सोचा गया कि पानी की अधिक खपत वाले ऐसे फ्लश वाले शौचालयों के लिए पानी कहां से आएगा? सफाई को पेट भरने से भी बड़ा मुद्दा मान लिया गया, और जब दबंग जातियों या दबंग लोगों की बददिमागी बढ़ी तो सड़क किनारे शौच पर बैठे दलित बच्चों को लाठियों से पीटकर मार भी डाला गया। साफ-सफाई की सोच अच्छी है, लेकिन उसे ऐसे उन्मादी और हिंसक राष्ट्रवाद में तब्दील नहीं करना चाहिए कि वह देश की महिलाओं पर अंधाधुंध अतिरिक्त बोझ लाद दे, या जनता के पैसों को फर्जी आंकड़ों को गढऩे में खर्च करने लगे। जाति व्यवस्था, और शौचालय व्यवस्था, इन दोनों के बीच की एक कड़ी अभी सामने आना बाकी ही है, जब करोड़ों नए बन रहे शौचालयों की टंकियां साफ करने का समय आएगा, और उस समय उनकी सफाई के लिए एक बार फिर दलितों की तलाश होगी, जो कि सिर पर पखाना ढोकर ले जाकर खेतों में डालेंगे। यह सामाजिक दिक्कत आना अभी बाकी ही है। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 सितंबर

तो उसकी बद्दुआ की मार बहुत बुरी होती है

संपादकीय
25 सितंबर 2019



अखबारों में राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं के दफ्तरों के बहुत से स्टिंग छपते हैं। अधिक खोजी रिपोर्टिंग करने वाले अखबारनवीस किसी काम को करवाने का नाटक करते हुए खुफिया कैमरों से लैस होकर जाते हैं, और दफ्तरों में कर्मचारियों की रिश्वत की मांग, या किसी जनसेवा केन्द्र में निर्धारित फीस से कई गुना अधिक की मांग करते हुए लोगों को कैमरों पर या माइक्रोफोन में कैद करके रिपोर्ट छापते हैं। इसके बाद जब बड़े अफसरों से उनके मातहत लोगों के इस काम के बारे में पूछा जाता है, तो एक रटा-रटाया जवाब अखबार में देखने मिलता है कि वीडियो भेज दें, उस पर कार्रवाई की जाएगी। अखबारों में तकरीबन हर दिन ऐसे स्टिंग ऑपरेशन आते हैं जो कि रोजाना के छोटे-छोटे कामों में एक संगठित और नियमित रिश्वत के सुबूत रहते हैं, लेकिन अगर इन पर सच में ही कार्रवाई हुई रहती तो हर दिन के अखबार में पिछले पखवाड़े या पिछले महीने स्टिंग में फंसे लोगों की गिरफ्तारी की खबर भी आती रहती, लेकिन वैसा कुछ देखने में नहीं आता है। 

अब ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि छोटे-छोटे दफ्तरों के छोटे-छोटे कर्मचारियों का ऐसा रोजाना का संगठित अपराध जब एक जगह सामने आता है तो उस विभाग के मंत्री या सचिव अपने मातहत आने वाले बाकी शहरों के वैसे ही दफ्तरों का क्या करते हैं? क्या वे बाकी जगहों पर जांच करवाते हैं? क्या वे स्टिंग ऑपरेशन को लेकर कोई कड़ी कार्रवाई करते हैं जो कि बाकी भ्रष्ट लोगों के सामने मिसाल बन सके? या वे अधिक संगठित भ्रष्टाचार में लग जाते हैं? आम जनता को छोटे-छोटे कामों के लिए जब ऐसी मोटी रिश्वत कदम-कदम पर देनी पड़ती है, तो उसकी नाराजगी चुनाव के वक्त निकलती है, और फिर कितना भी चुनावी खर्च लोगों को उस नाराजगी से नहीं बचा पाता। और चुनावों से परे भी सोचें तो जब लोगों ने संविधान की कसम खाकर काम करना शुरू किया है, तो वे किसी भी अपराध के सुबूत सामने आने पर उसे अनदेखा किस तरह कर सकते हैं? 

जिस तरह अखबार रोजाना के स्टिंग पर रोज अफसरों का पक्ष लेते हैं, क्या उसी तरह हर महीने या हर तीन महीने में उनसे कार्रवाई का हिसाब लिया जा सकता है? यह पूरा सिलसिला सरकार के संवेदनाशून्य हो जाने का है जिसमें लोग खुले भ्रष्टाचार के ठोस सुबूतों को भी अपनी आंखें खोलने के लिए काफी नहीं मानते, और न ही उन्हें यह लगता है कि अपने मातहत व्यवस्था को सुधारना उनकी जिम्मेदारी है। अखबारों में सड़कों की बदहाली, या किसी और तरह के बुरे हाल की तस्वीरों और खबरों में जब अफसरों का पक्ष लिया जाता है, तो वहां भी एक रटा-रटाया जवाब मिलता है कि वे उसे दिखवाएंगे। अगर सब कुछ अखबार के रिपोर्ट के बाद ही दिखवाना है, तो फिर अखबार की रिपोर्ट छपने के पहले वे अफसर अपनी जिम्मेदारियों को लेकर क्या करते हैं? जब अखबार के फोटोग्राफर या रिपोर्टर ऐसे भ्रष्टाचार को आसानी से कैमरों में कैद कर लेते हैं, तो बड़े अफसर ऐसी जगहों पर पहले से खुद होकर कभी दौरा क्यों नहीं करते? राज्य भर में जिस विभाग से ऐसे भ्रष्टाचार की खबरें आती हैं, वे इस बात का सुबूत भी रहती हैं कि कैमरों में कैद भ्रष्ट लोगों के ऊपर, बहुत ऊपर तक सब कुछ गड़बड़ है। जनता को रोजमर्रा के काम के लिए ऐसी संगठित रिश्वतखोरी के रहमोकरम पर छोड़ देना बहुत ही गैरजिम्मेदारी की बात है, और सरकार को समय रहते जाग जाना चाहिए क्योंकि इतनी भ्रष्ट व्यवस्था को सुधारना रातों-रात का काम नहीं है, बरसों का काम है, और भारत जैसे लोकतंत्र में चुनाव पांच बरस में नहीं होते हैं, हर कुछ बरस में कोई न कोई चुनाव होते रहते हैं। गरीब और आम जनता जब लुटती है, तो उसकी बद्दुआ की मार बहुत बुरी होती है।

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

बात की बात, 24 सितंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 24 सितंबर

रिटायरमेंट और बुढ़ापा गुजारने, और कोई बेहतर जरिया नहीं

संपादकीय
24 सितंबर 2019



केंद्र सरकार में चल रहे एक विचार को लेकर देश भर के केंद्रीय कर्मचारियों के बीच खलबली मची हुई है कि क्या उन्हें साठ बरस के पहले भी रिटायर कर दिया जाएगा? सरकारी अमले के एक बड़े तबके  की यह सोच रहती है कि हिंदुस्तान में बेहतर सेहत के चलते, और औसत उम्र बढ़ जाने से लोग रिटायरमेंट के मौजूदा साठ बरस तक भी बूढ़े नहीं होते हैं, और उनमें काम करने का बहुत दमखम बचा होता है, ऐसे में वे रिटायर होकर बाकी जिंदगी क्या करें? इसलिए लोग नौकरी को लंबा करना चाहते हैं, बड़े-बड़े अफसर जिन्हें मोटी पेंशन भी मिलती है, वे भी रिटायर होने के बाद सरकार से संविदा नियुक्ति चाहते हैं, या तरह-तरह के आयोगों में कोई काम चाहते हैं ताकि ताकत का सरकारी जलवा बना रहे और कमाई भी होती रहे।

दूसरी तरफ लोगों का यह सोचना है कि जब सरकार की मोटी तनख्वाह के बाद रिटायर होने पर अच्छी खासी पेंशन भी मिलती है, और अगर एक दुर्लभ नस्ल की ईमानदारी भी पूरी जिंदगी बनी रहे, तो भी जिंदगी आसानी से गुजर जाने का पूरा इंतजाम रहता है, इसलिए लोगों को सरकारी काम से परे भी कुछ सोचना चाहिए। दुनिया में जो कामयाब देश है, उनमें जो मामूली भी कामयाब लोग हैं, वे कामकाजी जिंदगी के बीच भी अपना काम बदल लेते हैं, अपने शौक और मर्जी का काम करने लगते हैं, आधी कमाई पर भी पूरी तसल्ली पाकर खुश रहते हैं, और अपने जिंदगी के मकसद को पूरा करते हैं, एक मुर्दा नौकरी को नहीं। 

इस बारे में आज लिखना इसलिए सूझ रहा है कि कल देश के एक गांधीवादी समाजशास्त्री प्रोफेसर प्रभुदत्त खेड़ा का छत्तीसगढ़ में निधन हुआ जहां पर वे जंगलों के बीच आदिवासी समुदायों में काम करते हुए उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में जुटे हुए थे। वे चालीस बरस पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से रिटायर होने वाले थे, और उनके पास सहूलियतों से भरी दिल्ली में, या देश के किसी और शहर में बाकी जिंदगी चैन से गुजारने का पूरा मौका था। लेकिन उन्होंने अपने देखे हुए छत्तीसगढ़ के अचानकमार के जंगलों में बैगा आदिवासियों के बीच ही रहना तय किया, और वहीं से अपने साथ आए छात्रों के साथ छुट्टी की अर्जी भेज दी, अपनी पेंशन के पैसों से स्कूल बनवाया, और चार दशक से इन्हीं लोगों के बीच सेवा करते हुए कल आखिरी सांस ली।

लोग घरबार और अपने दायरे को पूरी तरह छोड़कर किसी जंगल में जाकर वहां बसे समुदाय की सेवा चाहे न कर पाएं, लेकिन अपने आसपास के दायरे में वे लोगों के बीच अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को पूरा करने का काम तो कर ही सकते हैं। वे इर्दगिर्द के जरूरतमंद बच्चों को पढ़ा सकते हैं, लोगों को सफाई के लिए पे्ररित कर सकते हैं, कोई लाइब्रेरी चला सकते हैं, कोई हुनर दूसरों को सिखा सकते हैं, ऐसे सौ किस्म के योगदान वे लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए दे सकते हैं, बजाय सरकारी नौकरी से चिपके रहने के। और आबादी का एक छोटा हिस्सा ही सरकारी नौकरी में रहता है, बाकी लोग तो निजी काम करते हैं और ऐसे निजी नौकरी करते हैं जिसमें कभी भी निकाला जा सकता है। इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी का जुगाड़-पानी पा लेने के बाद अपना बाकी वक्त, अपनी बाकी क्षमता, दूसरों की भलों के लिए लगाना चाहिए। आज दुनिया में प्रोफेसर खेड़ा जैसी बहुत सी मिसालें हैं, बहुत सी मिसालें तो बड़ी कम उम्र की भी हैं, स्वीडन की सोलह बरस की एक छात्रा ने दुनिया में मौसम के बदलाव के खतरे पर एक आंदोलन ही खड़ा कर दिया है, और संयुक्त राष्ट्र में बीती रात उसने दुनिया के तमाम शासन प्रमुखों को झकझोर कर रख दिया है। इसलिए रिटायरमेंट को डरावना मानने वाले, और उसकी आशंका से ही दहशत में आ जाने वाले लोगों को अपनी जरूरतों से परे सामाजिक जरूरतों को भी देखना चाहिए और अपने सरोकार तय करने चाहिए, रिटायरमेंट और बुढ़ापा गुजारने के लिए उससे बेहतर और कोई जरिया नहीं हो सकता।

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितंबर

मोदी से बहुत कुछ सीखने मिल रहा है, ये तकनीकें अनदेखी नहीं करनी चाहिए

संपादकीय
23 सितंबर 2019



बीती हिन्दुस्तानी रात अमरीका के टैक्सास प्रांत की ह्यूस्टन नाम की राजधानी में नरेन्द्र मोदी के नाम लिखी गई। हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए, उनको सुनने के लिए कई घंटों के इस कार्यक्रम के लिए वहां के एक सबसे बड़े स्टेडियम में 50 हजार भारतवंशी पूरे अमरीका से जुटे थे, और यह बीते बरसों में अमरीकी जमीन पर मोदी का तीसरा या चौथा ऐसा जलसा था जिसने हिन्दुस्तान में खबरों का एक सैलाब ला दिया था। इस बार एक दूसरी बड़ी बात यह थी कि चुनाव के करीब पहुंच चुके अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भी मोदी के इस कार्यक्रम में शामिल थे, और इसकी जाहिर तौर पर एक वजह भी थी कि भारतवंशी अमरीकी वहां पर अच्छे खाते-कमाते लोग हैं, और उनका समर्थन अमरीकी राजनीतिक दलों के लिए नोट और वोट दोनों का रहता है। देश भर से जुटे हुए भारतवंशियों में से भी अधिक कामयाब 50 हजार लोगों के बीच अपने आपको मोदी और हिन्दुस्तान के दोस्त की तरह पेश करना ट्रंप के चुनाव अभियान का एक हिस्सा था, और इसके लिए मोदी समर्थकों का तैयार किया हुआ इतना बड़ा कार्यक्रम भला किसे नहीं लुभाता? इसलिए ट्रंप वहां पूरे जोश के साथ थे, और हिन्दुस्तानियों के लिए, अमरीका में बसे भारतवंशियों के लिए यह एक बड़ा मौका था। इस पूरे आयोजन को इस तथ्य के साथ भी देखना चाहिए कि अपनी जमीन से दूर गए लोग, बाहर दूसरी संस्कृति और सभ्यता में बसे हुए लोग अपनी जमीन, अपने देश, अपने धर्म, और अपनी संस्कृति से जुडऩे के ऐसे आयोजनों को चूकते नहीं है, और ऐसा भारतवंशी समुदाय कई दिनों से मोदी के लिए इस कार्यक्रम, हाऊडी मोदी, की तैयारी कर रहा था। इस बात को इस हिसाब से भी समझना चाहिए कि ट्रंप अमरीका में बाहर से आकर बसे हुए, और काम कर रहे लोगों को बाहर निकालने पर आमादा हैं, और इनमें लाखों हिन्दुस्तानी प्रभावित होने वाले हैं। इसलिए भी ट्रंप और मोदी को एक साथ जुटाकर वहां पर भारतवंशियों की ताकत और उनकी मेजबानी दिखाकर ट्रंप को प्रभावित करने का यह एक अच्छा बड़ा मौका था, और अगर मोदी और भारतीय समुदाय के मिलेजुले असर से ट्रंप का रूख बदलता है, और भारतीयों के वहां पर काम करने के मौके घटते नहीं हैं, तो यह भारत के लिए भी एक अच्छी बात होगी, और लोगों ने इस मौके का ऐसा इस्तेमाल किया तो है। 

यह भी समझने की जरूरत है कि मोदी का यह कार्यक्रम ऐसे मौके पर हुआ है जब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों की घोषणा होनी तय थी, और पूरे देश के उपचुनावों की भी साथ-साथ घोषणा होनी थी। भारत में होने वाले चुनावों के मौके पर अगर अमरीका जैसे कारोबारी-कामयाबी वाले देश में मोदी का ऐसा बड़ा जलसा होता है, तो उसका हिन्दुस्तानी चुनावी-इस्तेमाल तो होगा ही, और इसमें गलत भी क्या है? दुनिया के किसी भी हिस्से में बसे हुए हिन्दुस्तानियों के साथ एक ऐसा अनोखा तालमेल बिठाना, उसके लिए बड़े-बड़े दर्शनीय और उल्लेखनीय जलसे करना, मोदी की एक मौलिक सोच रही, और मोदी के पहले के बहुत से कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों और नेताओं के सामने भी यह गुंजाइश तो थी ही, जिसका इस्तेमाल उन्होंने नहीं किया। इसलिए मोदी को चाहे एक कामयाब इवेंट मैनेजर कहा जाए, या सफल जनसंपर्क विशेषज्ञ कहा जाए, मोदी भारतवंशियों की एक सामूहिक ताकत खड़ी करके उसे अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की सूझबूझ तो रखते हैं, और लोकतंत्र में यह एक खूबी ही है, खामी नहीं। मोदी ने हिन्दुस्तान से बाहर ऐसा कार्यक्रम करवाकर, या उसमें शामिल होकर देश के भीतर अपने समर्थकों में एक लहर तो पैदा की ही है, और लोकतंत्र में यह एक छोटी चुनावी-कामयाबी नहीं होती, यह जनधारणा की एक मामूली सफलता नहीं होती। 

लेकिन अभी कुछ बातें सामने आना बाकी है जिनकी सुगबुगाहट शुरू हुई है। अभी यह देखना बाकी है कि हफ्ते भर के अमरीकी प्रवास में और ट्रंप के इस अघोषित चुनाव प्रचार में एक से अधिक आयोजन में शामिल होकर मोदी ट्रंप से उसके बदले क्या हासिल करते हैं? क्या पाकिस्तानी मोर्चे पर अमरीका भारत के अधिक करीब आएगा? क्या अमरीका में बसे और काम कर रहे भारतवंशियों का नुकसान होना रूकेगा? क्या भारतीयों के अमरीका में काम करने की संभावना बढ़ेगी? आखिर ट्रंप का चुनाव प्रचार करने के एवज में मोदी ट्रंप से क्या हासिल करने जा रहे हैं? मोदी के पिछले बहुत से विदेश प्रवास और दुनिया भर के नेताओं के साथ उनकी गलबहियां हिन्दुस्तान के ठोस फायदे की शक्ल में बदलते नहीं दिखी हैं, बल्कि सुगबुगाहट यह है कि उन देशों से ऐसे सार्वजनिक महत्व-प्रदर्शन के एवज में वहां के सरकार-कारोबार को भारत में कई किस्म की रियायतें देकर ऐसा महत्व पाया है। इसलिए मोदी का अमरीका में यह एक हफ्ता सामने खड़े विधानसभा चुनावों और उपचुनावों के पहले तो अंतहीन प्रचार पाएगा, लेकिन उसका ठोस हासिल बाद में जाकर पता लगेगा। 

जो ही हो, हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री अगर दुनिया भर के देशों में बसे भारतवंशियों के साथ अगर एक अनोखा तादात्म्य स्थापित कर रहे हैं, तो यह मोदी के बाद के लोगों के लिए भी एक साबित-संभावना की तरह बनी रहने वाली बात रहेगी। अमरीका के 44 लाख कामयाब हिन्दुस्तानियों में से अधिकतर इस हालत में रहते हैं कि वे उस देश के किसी भी कोने से ह्यूस्टन तक आने-जाने की टिकट ले सकें, और वहां एक दिन ठहर सकें, इस आयोजन में शामिल होने का भुगतान कर सकें। अकेले टैक्सास राज्य में ही लाखों भारतवंशी रहते हैं। इसलिए इसकी कामयाबी को वहां बसे हुए हिन्दुस्तानियों की मौजूदा कामयाबी के अनुपात में ही देखना ठीक होगा, और लोकतंत्र में प्रचार और जनसंपर्क, जनधारणा प्रबंधन और जनसमर्थन की तकनीकों को मोदी से काफी कुछ सीखने मिल रहा है, और उनके इस योगदान को अनदेखा नहीं करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितंबर

हर बात रिकॉर्ड की जाती रहे तो क्या नफा, क्या नुकसान?

संपादकीय
22 सितंबर 2019



बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में अभी एक केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के साथ वहां के छात्रों की एक झड़प हुई। भाजपा के इस केन्द्रीय मंत्री का विरोध इस विश्वविद्यालय के वामपंथी, या भाजपा-विरोधी तृणमूल समर्थक छात्र कर रहे थे, और इस दौरान धक्का-मुक्की, खींचतान की बहुत सी तस्वीरें सामने आई हैं, बहुत से वीडियो सामने आए हैं, और विश्वविद्यालय परिसर में इस तनाव के बाद वहां के राज्यपाल जगदीप धनकर खुद अतिरिक्त पुलिस लेकर विश्वविद्यालय गए, और वहां से केन्द्रीय मंत्री को साथ लेकर लौटे। इस घटना की रिपोर्ट मीडिया में सभी जगह आई और कोलकाता के एक प्रमुख अखबार द टेलीग्राफ में छपी खबर से नाराज केन्द्रीय मंत्री ने अखबार के संपादक को फोन किया और उसकी रिपोर्ट पर माफी मांगने को कहा। टेलीग्राफ ने बाद में छपी एक खबर के मुताबिक, संपादक के यह कहने पर कि अखबार ने कुछ भी गलत नहीं छापा है, बाबुल सुप्रियो गाली-गलौज पर उतर आए, और उन्होंने गंदी जुबान का इस्तेमाल किया जिसके बारे में टेलीग्राफ ने अपनी खबर में लिखा भी है। इसके बाद बाबुल सुप्रियो ने ट्वीट करके लिखा कि टेलीग्राफ के संपादक ने उन्हें गंदी गालियां दीं, और टेलीफोन पर इस बातचीत की उनके पास रिकॉर्डिंग मौजूद है। इस पर अखबार के संपादक ने उन्हें चुनौती दी है कि वे इस टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग जारी करें, और कार्रवाई करें। 

इस एक मामले की हकीकत की तह में जाना हमारे लिए अभी यहां मुमकिन नहीं है, और ये दोनों पक्ष एक-दूसरे पर अपने पास मौजूद सुबूतों को लेकर कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन हम एक दूसरी बात पर आज यहां लिखना चाहते हैं कि किसी बातचीत या टेलीफोन कॉल को लेकर जब दो पक्ष एक-दूसरे के ठीक खिलाफ बयान दे रहे हों, तो ऐसे में सच तक पहुंचने के लिए क्या किया जाना चाहिए? क्या आज हर मोबाइल फोन पर मौजूद रिकॉर्डिंग की सहूलियत का इस्तेमाल करते हुए लोगों को अपने फोन को लगातार रिकॉर्डिंग पर रखना चाहिए ताकि किसी विवाद की नौबत आने पर सच सामने रखा जा सके? या ऐसा करना गैरकानूनी या अनैतिक होगा? सवाल यह भी उठता है कि एक पेशेवर अखबारनवीस क्या बिना बताए ऐसी रिकॉर्डिंग करे जो कि बाद में सुबूत के काम तो आए लेकिन जो विश्वास तोडऩे वाली भी कहलाए? अगर भारतीय टेलीग्राफ एक्ट ऐसी रिकॉर्डिंग को गलत न भी मानता हो, तो भी क्या लोग एक-दूसरे को बताए बिना बातचीत इस तरह रिकॉर्ड करें? और अगर रिकॉर्ड न करें तो फिर तोहमतों के आने पर अपना बचाव कैसे करें? 

इस बात का एक दूसरा पहलू भी है। बीच-बीच में कई प्रदेशों से ऐसी रिकॉर्डिंग सामने आती हैं जिनमें कोई नेता किसी अफसर को धमका रहे हैं, या कोई अफसर किसी पत्रकार को धमका रहे हैं, या कोई पत्रकार ब्लैकमेलिंग के अंदाज में किसी और से वसूली या उगाही कर रहे हैं। ऐसे मामलों में आवाज की रिकॉर्डिंग एक पुख्ता सुबूत होती है, और अब तक ऐसा कोई जुर्म दर्ज हुआ नहीं है कि अपने फोन से ऐसी रिकॉर्डिंग करना कोई जुर्म है। ऐसे में अगर कोई सत्तारूढ़ मंत्री या नेता, या कोई बड़े अफसर, अपने मातहत को फोन पर कोई जायज या नाजायज निर्देश देते हैं, तो क्या वह मातहत आगे अपने बचाव के लिए उसे रिकॉर्ड करके रख सकते हैं? या रूबरू भी सरकारी काम को लेकर ऐसे निर्देश दिए जाते हैं, तो क्या उसकी रिकॉर्डिंग करने का हक सरकारी अमले को है? अभी तक ऐसा भी कोई विवाद अदालत तक पहुंचा नहीं है जिसमें सरकारी कामकाज की बातचीत की ऐसी रिकॉर्डिंग को नाजायज कहा गया हो, इसलिए यह मानना चाहिए कि यह गैरकानूनी काम नहीं है।  अब जो गैरकानूनी नहीं है, उसे सरकारी कामकाज में क्या अनिवार्य रूप से सही मान लिया जाएगा, या फिर सरकारी सेवा नियमों की कुछ बहुत धुंधली शर्तों की आड़ लेकर ऐसा करने वाले अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्रवाई की जाएगी? 

बात शुरू तो हुई थी एक केन्द्रीय मंत्री और संपादक के बीच की बातचीत को लेकर, लेकिन किसी भी किस्म की बातचीत या फोन कॉल की रिकॉर्डिंग को लेकर नैतिकता के, पेशे के, और कानून के जो सवाल सामने हैं, उनके बारे में सोचना चाहिए। किसी फोन कॉल पर बातचीत के बीच जब धमकी मिलती है, या कोई गलत बात सुनने मिलती है, उस वक्त तो रिकॉर्डिंग शुरू नहीं की जा सकती। किसी कॉल की रिकॉर्डिंग पहले से ही शुरू हो सकती है, और अगर हर कोई ऐसा करने लगे तो उससे क्या अच्छा होगा, और क्या बुरा? एक पल को तो यह लगता है कि अगर लोगों को पता हो कि उनकी कॉल दूसरे सिरे पर रिकॉर्ड हो रही है, तो वे कई किस्म की गैरकानूनी या नाजायज बातें बोलने से बच ही जाएंगे। इसी तरह रूबरू बातचीत को लेकर भी अगर यह समझबूझ या तालमेल पहले से रहे कि कोई भी पक्ष बातचीत को रिकॉर्ड कर रहे होंगे, तो भी गलत बात और गलत काम घट जाएंगे। इन बातों से जुड़े हुए और पहलुओं के बारे में सोचना चाहिए कि इससे काम के रिश्तों और निजी रिश्तों पर किस तरह का फर्क पड़ेगा। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

बात की बात, 21 सितंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 21 सितंबर

एक बच्ची की ईमानदार पहल की गूंज दुनिया भर के दिल और दिमागों में, इसे हमारा सलाम...

संपादकीय
21 सितंबर 2019



योरप का जो देश स्वीडन सबसे साफ देशों में से एक माना जाता है, जहां पर लोगों के खुश रहने की बहुत सी वजहें रहती हैं, लोग बहुत संपन्न भी हैं, देश को विकसित माना जाता है, वहां पर एक स्कूली छात्रा ने एक इतिहास रच दिया है। उसे गांधी की तरह रंगभेद का शिकार होकर दक्षिण अफ्रीका की ट्रेन में लात-जूते नहीं झेलने पड़े थे, और न ही उसका देश हिन्दुस्तान की तरह किसी विदेशी सरकार का गुलाम था। लेकिन आज जिस अंदाज में धरती इंसान के लालच की गुलाम हो चुकी है, जिस तरह विकसित देश, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, और लापरवाह सरकारें धरती के मौसम को खत्म कर रही हैं, उसके खिलाफ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए पन्द्रह बरस की यह छात्रा ग्रेटा थनबर्ग स्कूल के सामने हड़ताल पर बैठी थी। वह अपने देश की सरकार का ध्यान तो खींचना चाहती ही थी, साथ-साथ वह दुनिया का ध्यान भी खींचना चाहती थी। उसका यह आंदोलन पिछले बरस से शुरू होकर अब न्यूयार्क में पहुंचकर पूरी दुनिया का ध्यान खींच रहा है जहां अगले कुछ दिनों में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के लिए दुनिया भर के नेता इक_ा हो रहे हैं। ग्रेटा को देखते हुए दुनिया भर के छात्रों ने तय किया है कि वे दुनिया में हो रहे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक दिन प्रदर्शन करेंगे। आज सुबह से अमरीका सहित योरप के बहुत से देशों की तस्वीरें खबरों और सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं जिसमें छात्रों के इस आंदोलन, फ्राईडेज फॉर फ्यूचर, के तहत बच्चे सड़कों पर हैं। 

इस बच्ची की कहानी दुनिया में एक बड़ा हौसला पैदा करने वाली है कि दुनिया को बचाने और बेहतर बनाने के लिए शुरुआत अपने से करनी चाहिए। इस बच्ची ने दुनिया के पर्यावरण का नुकसान पहुंचाने वाले सामानों का इस्तेमाल रोकने का काम अपने घर से शुरू किया, और अपने मां-बाप को शाकाहारी बनाया क्योंकि मांस तैयार करने में धरती का बहुत सारा पानी खर्च होता है। उसने अपने मां-बाप के हवाई सफर रूकवा दिए क्योंकि उनसे बहुत प्रदूषण होता है, और बड़ा ईंधन खर्च होता है। पिछले बरस इसी महीने में स्वीडन में चुनाव था, और ग्रेटा के साथ वहां के बहुत से छात्र-छात्राओं ने यह तय किया कि जब तक देश में जिम्मेदार सरकार न आए वे संसद के बाहर बैठकर आंदोलन करेंगे। इसके साथ-साथ इस छोटी सी लड़की ने एक बड़ा लंबा समुद्री सफर भी बोट से तय किया जो बिना ईंधन के ब्रिटेन से अमरीका तक गई। उस बोट पर कुछ और नौजवानों के साथ वह अकेली लड़की थी। आज उसकी प्रेरणा से पूरी दुनिया में जितनी बड़ी क्लाईमेट-स्ट्राईक हो रही है, वह अपने आपमें एक इतिहास है और उसने दुनिया को हिलाकर रख दिया है। 

अब इस मुद्दे पर आज लिखने की जरूरत यहां इसलिए लग रही है कि उसकी उम्र के या उससे बड़े भला ऐसे इतने लोग इस दुनिया में हैं जो कि दुनिया को बचाने के लिए एक जागरूकता के साथ अपनी निजी जिंदगी में फेरबदल करने को तैयार हैं, अपने स्वाद, अपने शौक, और अपने सुख को कुछ छोडऩे के लिए तैयार हैं? इस पर लिखने की जरूरत इसलिए भी है कि अगर दुनिया में एक अकेली लड़की भी किसी मुद्दे को लेकर एक ईमानदार अभियान शुरू करती है, तो वह दुनिया के एक सबसे बड़े आंदोलन में तब्दील हो सकता है। ऐसे बहुत से पहलू इस नाबालिग छात्रा के संघर्ष के हैं जिनके बारे में अलग-अलग देशों के किशोर-किशोरियों, और नौजवानों को सोचना चाहिए कि क्या वे अपने-अपने दायरे में सचमुच ही ऐसा कुछ कर रहे हैं जिससे कि धरती को बचने में मदद मिल सके? और यह भी कि क्या एक वक्त पूरी दुनिया को गांधी ने अहिंसा और किफायत की जो राह दिखाई थी, वह राह खुद हिन्दुस्तान में मिटा दी गई है, उसकी जगह गांधी के पदचिन्हों पर कांक्रीट की नई सड़क बना दी गई है ताकि किफायत के बारे में चर्चा भी न हो, और बाजार का कारोबार अधिक से अधिक बढ़ता चले? यह पूरा सिलसिला इक्कीसवीं सदी का एक नया इतिहास रच रहा है, और बताता है कि ईमानदार सोच की गूंज दुनिया भर में करोड़ों दिल-दिमाग से उठती है, और नेक काम में कोई भी अकेले नहीं है, अगर वह डटकर किया जाए। आज अमरीका जैसे अंतरराष्ट्रीय मवाली-कारोबारी देश दुनिया के मौसम को, पर्यावरण को बर्बाद करके अपना सुख तो जुटा ही रहे हैं, अपने कारोबार को भी बढ़ा रहे हैं, और इस काम को वे पूरी हिंसा और अश्लीलता के साथ कर रहे हैं। ऐसे अमरीका, और ऐसे कई दूसरे देशों की बर्बादी की आदतों को बदलने के लिए, वहां के नेताओं को झंकझोरकर जगाने के लिए एक बच्ची ने जो पहल की है, जो मुहिम शुरू की है, जो इतिहास रचते चले जा रहा है, उन सबको हमारा सलाम। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

ऐसे डिनर की तस्वीरों और खबर का इंतजार

संपादकीय
20 सितंबर 2019



जिंदगी कैसे रूख बदलती है इसे असल जिंदगी में देखना बड़ा दिलचस्प होता है। और ऐसे में ही लोगों को कभी किस्मत पर भरोसा होने लगता है, तो कभी लगता है कि जिंदगी कैसे-कैसे खेल खेलती है। आज दुनिया के एक सबसे कामयाब फुटबॉलर, और सबसे रईस खिलाडिय़ों में से एक, क्रिश्चियानो रोनाल्डो की एक तलाश पूरी हुई जब उन्होंने एक इंटरव्यू में अपने बचपन का हाल बताया था कि किस तरह वे अपने दूसरे साथी खिलाड़ी बच्चों के साथ एक मैकडोनाल्ड रेस्तरां के पीछे का दरवाजा खटखटाकर पूछते थे कि कुछ खाना बचा हुआ है क्या, और उस वक्त खाना देने वाली तीन युवतियों में से एक ने आज सार्वजनिक रूप से अपना खुलासा किया। रोनाल्डो ने इंटरव्यू में बताया था कि किस तरह से मैकडोनाल्ड की तीन महिला कर्मचारी बड़ी रहमदिल थीं, और बचा हुआ खाना उन बच्चों को देती थीं। उन्होंने एक हसरत जाहिर की कि अगर वे महिलाएं उन्हें मिल जाएं, तो वे उन्हें अपने साथ डिनर पर ले जाना चाहेंगे। इस इंटरव्यू के बाद इनमें से एक महिला पॉला लेका सामने आई और उसने कहा कि वह उन तीनों में से एक है, और उसे रोनाल्डो के साथ डिनर पर जाने में खुशी होगी। 

हर कुछ हफ्तों में दुनिया के किसी न किसी कोने से आधी या चौथाई सदी पुरानी ऐसी कोई तलाश पूरी होने की खबर आती है जिसमें कहीं मां-बाप खोए हुए या बिछुड़े बच्चे को पा लेते हैं, या बच्चे अपने मां-बाप तक पहुंच जाते हैं। ऐसे मामलों को देखें तो लगता है कि जिंदगी बड़ी हैरतअंगेज और अविश्वसनीय होती है, और जाने कैसी-कैसी हसरतें वक्त पूरी कर देता है। जिन लोगों को जिंदगी में कभी ऐसा कुछ होने का भरोसा नहीं होता, और जो उम्मीद छोड़ चुके होते हैं, उनको भी असल जिंदगी की इन कहानियों को देखकर अपना हौसला रखना चाहिए कि अपना टाईम आएगा। भला कौन यह सोच सकते थे कि मांगकर खाने वाले एक बच्चे की जिंदगी अपने हुनर से ऐसी बदल जाएगी कि वह दुनिया का सबसे कामयाब और रईस खिलाड़ी बन जाएगा? और उस पर, एक फुटपाथी बच्चे की मदद करने वाली महिलाओं को भी भला यह क्या मालूम रहा होगा कि एक दिन वह बच्चा उन्हें दुनिया के सबसे महंगे रेस्त्रां में ले जाकर खाना खिला सकता है? 

इससे दो सबक मिलते हैं। पहला तो यह कि दया, प्रेम, और लोगों की मदद कभी बेकार नहीं जाते। जिस तरह कुदरत सिखाती है कि आम बोते चलें, तो जिंदगी में आम मिलते भी चलेंगे, फिर चाहे वे अपने बोए हुए आम न हो, किसी और के बोए हुए आम के फल हों। आज जो लोग सागौन के फर्नीचर पर बैठते हैं, वह उनकी अपनी जिंदगी का तो बोया हुआ रहता नहीं है, लेकिन लोग बोते चलते हैं, और पाते भी चलते हैं। इसीलिए नेक नीयत से किए हुए अच्छे काम कभी बेकार नहीं जाते, और रोनाल्डो की एक वक्त मदद करने वाली पॉला लेका का कहना है कि उसे कभी कर्म के फल पर भरोसा नहीं था, वह मानती थी कि ऐसा कुछ नहीं होता है, लेकिन अब उसे इस पर भरोसा होने लगा है। वह अब अपनी जिंदगी में आए इस मोड़ के बारे में सोच रही है, और साथ-साथ अपने इंटरव्यू के बाद रोनाल्डो की भी इस बात को लेकर चारों तरफ तारीफ हो रही है कि वह इतनी कामयाबी और संपन्नता के बाद भी विनम्र बना हुआ है।

धर्म तो नहीं, लेकिन कुदरत जरूर यह सिखाती है कि लोगों को अच्छा काम करते रहना चाहिए, और उसका अच्छा फल इसी दुनिया में, इसी जिंदगी में मिल जाता है। धर्म तो मौत के बाद स्वर्ग और जन्नत जैसे सपने दिखाता है, लेकिन कुदरत इसी धरती पर बोए हुए को काटने की बात साबित करते रहता है। जिन लोगों को आज अपनी जिंदगी में सामने आने वाले कमजोर, गरीब, और जरूरतमंद लोगों को हिकारत से देखने की आदत है, उन लोगों को यह सोचना चाहिए कि जिंदगी का सैलाब कब किसे बहाकर किसके सामने ले जाकर खड़ा कर दे, उसका कोई ठिकाना तो है नहीं। इसलिए और किसी वजह से न सही, कम से कम अपने खुद के भले के लिए लोगों को भला करना चाहिए, और बिना उम्मीद करते रहना चाहिए। सबसे अधिक भला वह होता है जो उन लोगों के लिए किया जाता है जो कि आज जाहिर तौर पर कुछ वापिस नहीं कर सकते। जिनसे कुछ हासिल होने की उम्मीद है, उनका भला करना कोई महान काम नहीं होता। जिन लोगों ने रोनाल्डो और इस महिला की यह खबर पढ़ी है, वे लोग जाहिर तौर पर ऐसे किसी डिनर की तस्वीरें और खबर देखने का इंतजार कर रहे होंगे। 

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 20 सितंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 19 सितंबर

आने वाला वक्त पता नहीं कैसे खतरे लेकर आएगा

संपादकीय
19 सितंबर 2019



सऊदी अरब में सबसे बड़ी तेल कंपनी पर एक ड्रोन हमले से उसके पेट्रोलियम कारखाने को बड़ा नुकसान पहुंचा है, और पूरी दुनिया में तेल के भाव एकदम से बढऩे का बड़ा खतरा खड़ा हो गया है। लेकिन इससे भी बड़ा खतरा यह है कि यह हमला सऊदी अरब के खिलाफ काम कर रहे यमन के विद्रोहियों ने किया है जो कि किसी देश की फौज जितनी ताकतवर नहीं हैं, महज हथियारबंद बागी लोग हैं जो कि दुनिया के अलग-अलग देशों में कई जगह रहते हैं, हिन्दुस्तान में भी कहीं नक्सली हैं, तो कहीं कोई और समूह काम कर रहा है। अब अगर ड्रोन से ऐसे हमले करके किसी कारखाने पर एक हमले से दुनिया की अर्थव्यवस्था में तहलका लाया जा सकता है, तो यह भी सोचना चाहिए कि ड्रोन जैसी अब मामूली हो चुकी तकनीक से और क्या-क्या हो सकता है? 

मोटे तौर पर फोटोग्राफी के लिए इस्तेमाल होने वाले ड्रोन का फौजी निगरानी के लिए भी इस्तेमाल होता है, और सामानों को घर पहुंचाने वाली कंपनियां लगातार प्रयोग कर रही हैं कि वे किस तरह ड्रोन से सामान पहुंचाएं। कुल मिलाकर हवा में उड़कर जाने वाला यह छोटा सा उपकरण अधिकतर जगहों पर कानूनी दर्जा प्राप्त है, और ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि वह गैरकानूनी इस्तेमाल से आखिर कितनी दूर है? दुनिया के कई देश अपनी फौज में ड्रोन का इस्तेमाल न सिर्फ निगरानी के लिए बल्कि हथियार गिराने के लिए भी कर रहे हैं, या उसकी क्षमता हासिल कर चुके हैं। ऐसे में बागियों तक, या आतंकियों तक ऐसी तकनीक के पहुंच जाने में कोई शक तो है नहीं। अब दुनिया को साइबर हमले जैसे एक नए खतरे के अलावा ड्रोन हमले की अलग-अलग किस्मों की आशंकाओं को भी देखना होगा। ड्रोन हमलों से अगर पानी की टंकियों में कोई रसायन डाला जा सके, या बिजली के बड़े खंभों को नुकसान पहुंचाया जा सके, किसी इलाके में मोबाइल फोन के टॉवर पर हमला किया जा सके, तो क्या होगा? क्या आज हम सचमुच ऐसे किसी खतरे से कुछ दूर हैं, या फिर वह खतरा आ चुका है, और बस ऐसे हमले की देर है? 

जैसा कि दुनिया में हर वक्त होता है, टेक्नालॉजी का इस्तेमाल जब तक सरकार या सुरक्षा एजेंसियां करती हैं, तब तक बड़े मुजरिम उसका इस्तेमाल कर चुके होते हैं, और उसकी तोड़ भी निकाल चुके होते हैं। बैंक जितने किस्म की तकनीक से जालसाजी रोकने की कोशिश करती हैं, मुजरिम उससे चार कदम आगे चलते हैं। ठीक ऐसा ही दूसरी तकनीक के बारे में भी रहता है और ड्रोन की हमलावर-संभावनाओं को आतंकियों ने अब तक नजरअंदाज तो किया नहीं होगा। लोगों को याद होगा कि अमरीकी राष्ट्रपति भवन के बारे में कई बार खबरें आती हैं कि खतरनाक-जानलेवा रसायन लगी हुई चिट्ठियां अमरीकी राष्ट्रपति के नाम भेजी जाती हैं, और वहां सुरक्षा कर्मचारी उनकी रासायनिक जांच करके उन्हें पहले ही रोक देते हैं। अब पल भर के लिए यह सोचें कि ऐसे फैलने वाले रसायनों को ड्रोन से किसी घर पर, किसी बगीचे में, किसी स्वीमिंग पूल के पानी में अगर डाल दिया जाए, तो कौन सी सुरक्षा तकनीक ऐसे हमलों को रोक सकेगी? दरअसल तकनीक और हथियारों के बेजा इस्तेमाल के खतरे को समय रहते आंक पाना हिन्दुस्तान जैसी सरकार की न तो प्राथमिकता में दिखता, और न ही उसकी कोई ऐसी तैयारी दिखती। इस देश में बैंकिंग को आम लोगों के लिए भी बुलडोजर से धकेलकर तेजी से डिजिटल की ओर किया गया है, लेकिन न तो गरीब आम जनता की डिजिटल समझ इतनी है, और न ही डिजिटल तकनीक सुरक्षित ही है। नतीजा यह हो रहा है कि बड़ी संख्या में रोजाना ठगी हो रही है, लोगों को ऑनलाईन लूटा जा रहा है, और तरह-तरह के दूसरे जुर्म हो रहे हैं। डिजिटल तकनीक को एक तिलस्म की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, और सांस लेने पर भी हिन्दुस्तान में आधार कार्ड जैसी डिजिटल शिनाख्त को अनिवार्य करने की सोच लोगों की जिंदगी की निजता को पूरी तरह खत्म कर चुकी है। आने वाला वक्त ऐसे अनदेखे, अनसोचे खतरों का रहने वाला है जिसमें हर डिजिटल जानकारी पर साइबर हमला कामयाब हो सकेगा। 

ड्रोन तकनीक से अगर दुनिया के सबसे बड़े कारखानों पर ऐसा हमला हो सकता है, सऊदी अरब जैसी बड़ी फौज के रहते हुए हो सकता है, तो दुनिया में कहीं भी ड्रोन कैमरे आम जगहों पर जाने किस तरह के रसायन छिड़क सकते हैं, या रेडियोधर्मिता फैला सकते हैं। ऐसी तकनीक से रोकथाम और बचाव की कोई तैयारी आज नहीं दिख रही है, और आने वाला वक्त पता नहीं कैसे खतरे लेकर आएगा। 


(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 18 सितंबर

पार्किंग पर गोलीबारी से सूझता एक समाधान भी

संपादकीय
18 सितंबर 2019



छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल एक रिहायशी इलाके में घर के सामने निजी कार खड़ी करने को लेकर चले आ रहे एक विवाद के बाद एक रिटायर्ड फौजी ने अपनी बंदूक से गोली चलाकर एक कार के दोनों शीशे आरपार तोड़ दिए, और गिरफ्तारी के बाद उसकी रिहाई भी हो गई। इस घटना को आपसी झगड़ा मानकर भी छोड़ा जा सकता है और एक गुस्सैल की बंदूक का लाइसेंस कैंसल किया जा सकता है। लेकिन समझदारी इसमें होगी कि इस दिक्कत की जड़ में जाकर उसका रास्ता ढूंढा जाए। 

यह बात शुरू तो एक शहर से हुई है, और एक इलाके का एक अकेला मामला दिखता है, लेकिन यह बात हिन्दुस्तान के सभी औसत शहरों में तेजी से बढ़ती हुई एक दिक्कत भी बताती है कि शहरी ढांचा इतनी निजी और दूसरी गाडिय़ों के लिए बना नहीं है। न तो इतनी गाडिय़ों के लायक सड़कें हैं, और न ही इतनी गाडिय़ों के खड़े होने लायक जगह किसी इलाके में है। तकरीबन हर जगह लोगों की निजी गाडिय़ां उनके घरों के बाहर खड़ी रहती हैं, और बड़े शहरों के रिहायशी इलाकों में तो कुछ-कुछ इंच की दूरी पर गाडिय़ों को खड़ी करने में लोगों को महारथ हासिल करनी ही पड़ती है। जहां तक सरकार और स्थानीय संस्थाओं का सोचना है, तो हिन्दुस्तान के अधिकतर शहरों में कई मंजिलों की पार्किंग बनाने को एक समाधान समझ लिया गया है। जो सबसे व्यस्त बाजार हैं, या सरकारी इलाके हैं, वहां कई मंजिलों की पार्किंग बनाकर यह फख्र कर लिया जाता है कि वहां कितने सौ गाडिय़ों को खड़ा किया जा सकेगा। इसके अलावा शहरों में अब तक खाली बच गई गिनी-चुनी सरकारी जमीन पर लगातार बाजारू इमारतें बनाकर उनसे एक नंबर और दो नंबर की कमाई करने की बेचैनी स्थानीय संस्थाओं और सरकार दोनों में दिखती है। कांक्रीट के जंगलों के बीच अगर थोड़े से फेंफड़े बचे हैं, तो उन्हें भी बेच देने पर आमादा नेता और अफसर धरती की बची सारी उम्र के लिए उन शहरों को तबाह करने के गुनहगार बन रहे हैं, साथ-साथ दौलतमंद तो बन ही रहे हैं। 

पर्यावरण को बचाने के लिए शहरी योजना की जितनी भी बातें होती हैं, वे काली कमाई की उम्मीद दिखने पर बांधकर ताक पर धर दी जाती हैं। जिस रफ्तार से लोगों की निजी, कारोबारी, और स्कूल-कॉलेज की गाडिय़ां बढ़ रही हैं, उनके खड़े होने के लिए सिवाय सरकारी सड़कों के और कोई जगह नहीं बचती है। ऐसे में आज यह सोचने की जरूरत है कि जो लोग गाड़ी खरीदते वक्त मोटा टैक्स देते हैं, उसका बीमा करवाने पर खर्च करते हैं, उसे चलाने के लिए महंगा डीजल-पेट्रोल खरीदते हैं, वे उसे सरकारी सड़क पर या सरकारी जमीन पर खड़े करने के लिए एक फीस क्यों नहीं दे सकते, और स्थानीय संस्थाएं यह फीस वसूल क्यों नहीं करतीं? लोगों को कार खरीदते हुए अगर यह इत्मीनान रहता है कि उसे खड़े करने के लिए सरकारी या सार्वजनिक जगह हासिल है, तो वे बेफिक्र होकर बाकी खर्च का हिसाब लगाते हैं, और कार लाकर घर के बाहर बांध लेते हैं। जिस दिन पार्किंग का खर्च जुड़ जाएगा, उस दिन लोगों को समझ आएगा कि कार रखने पर यह बोझ भी पड़ता है, और वे उसके मुताबिक हिसाब लगाकर ही गाड़ी खरीदेंगे। 

पार्किंग को लेकर हुई यह गोलीबारी यह भी सोचने के लिए मजबूर करती है कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने की कितनी जरूरत है। पहले से व्यस्त बाजारों में कई मंजिलों की पार्किंग बनाना एक तुरंत-समाधान लग सकता है, लेकिन यह पूरी जिंदगी के लिए उस इलाके में सड़कों पर भीड़ बढ़ाने का एक इंतजाम भी हो जाता है। शहरी विकास के हर शहर के अपने मॉडल होने चाहिए, इसलिए इस बारे में सोच की बात ही हो सकती है, उस शहर के लोगों को अलग-अलग योजनाएं अपनी जरूरत के मुताबिक बनानी होंगी। लेकिन एक बात तय है कि शहरों के बीच खाली पड़ी जमीन पर इमारतें खड़ा करना तुरंत ही बंद होना चाहिए, और सार्वजनिक परिवहन तेजी से बढ़ाना चाहिए ताकि लोग निजी गाडिय़ों के मोहताज न रहें, और ईंधन बचे, सड़कों पर भीड़ बचे, पार्किंग को लेकर गोलीबारी बचे। हर शहर को एक पार्किंग फीस अनिवार्य रूप से लागू करनी चाहिए जिसे रजिस्ट्रेशन के वक्त लिया जाए, और उस टोकन के आधार पर ही किसी शहर में गाड़ी नियमित रूप से रखी जा सके। जिन लोगों के घरों में गाड़ी रखने का इंतजाम हो, वे भी बाकी वक्त तो शहर में अलग-अलग जगहों पर गाड़ी खड़ी करते ही हैं, इसलिए हर शहर की अपनी एक पार्किंग फीस ली जाए जो कि शहर के स्तर पर भी हो सकती है, या पूरे प्रदेश के लिए हो सकती है। निजी गाडिय़ों पर, कारोबारी गाडिय़ों पर ऐसा बोझ डालना जरूरी है क्योंकि इसके बिना लोग खरीदने की ताकत रहने तक गाडिय़ां खरीदते ही जाते हैं। 


(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 17 सितंबर

पूरे देश में एक जुबान की सोच नक्शे पर सरहदों को गाढ़ा लाल कर रही

संपादकीय
17 सितंबर 2019



हिंदी दिवस के पहले ही गृहमंत्री और भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने पूरे देश में एक भाषा हिंदी की वकालत करके मधुमक्खियों के खूब बड़े से छत्ते पर बड़ा सा पत्थर मार दिया, और बंगाल से लेकर दक्षिण भारत तक खुद भाजपा के नेता सफाई देते-देते, विरोध करते हुए हलाकान हो गए। अभी नए मोटर व्हीकल एक्ट को लेकर भाजपा राज्यों का विरोध खत्म हुआ नहीं था कि अब अमित शाह की हिंदी की वकालत ने करीब एक पखवाड़े में यह दूसरा बखेड़ा खड़ा कर दिया है।

दरअसल हिंदुस्तान में भाषा विवाद में नया कुछ नहीं है। उत्तर भारत या भारत के हिंदीभाषी इलाकों से आने वाले नेताओं को बीच-बीच में अपनी मातृभाषा का कीड़ा काटता है, और वे कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदी को थोपने पर आमादा हो जाते हैं। नतीजा यह निकलता है कि अहिंदीभाषी प्रदेशों में उसका जमकर विरोध होने लगता है। यह बखेड़ा तकरीबन सालाना के रेट से खड़ा होता ही है, और इस बार चूंकि भाजपाध्यक्ष-गृहमंत्री खासे बड़े कद के, बड़े वजन के नेता हैं, और कश्मीर पर उनका ताजा-कड़ा रूख हाल का गवाह है, इसलिए लोगों के बीच उनकी बात एक धमकी की तरह तैर गई, और हिंदी से परे जीने वाले लोग हड़बड़ा गए कि क्या उनके प्रदेश भी कश्मीर की तरह काबू में कर लिए जाएंगे। 

दरअसल सालाना हिंदी दिवस का मौका बहुत से लोगों के लिए अपनी भावनाओं से हवा को भड़काने का रहता है। लोगों को हिंदी की सेवा करना याद आता है, हिंदी पर गर्व करना सूझता है, और जिनके पास गर्व के लायक कुछ भी नहीं रहता वे लोग दूसरी भाषाओं पर हमला करके, या अपनी हिंदी की स्तुति करके अपना सालाना जिम्मा पूरा करते हैं। इस पूरे भावनात्मक भाषाई उन्माद में इस बात को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाता है कि कोई भाषा महज एक औजार होती है, और उसका महत्व तभी साबित होता है जब उसके इस्तेमाल से कोई महत्वपूर्ण काम होता है, जब उस भाषा में उत्कृष्ट साहित्य रचा जाता है, विज्ञान या दूसरे विषयों की बेहतरीन किताबें लिखी जाती हैं, जब कारोबार की दुनिया में उस भाषा का इस्तेमाल नफे का होता है, तभी कोई भाषा सम्मान पाती है। अपने-आपमें भाषा अक्षरों, व्याकरण, और लिपि का एक टूलबॉक्स है, और जब इसके इस्तेमाल से लोग महत्वपूर्ण बनते हैं, लोग कामयाब बनते हैं, तो ही इस भाषा का सम्मान होता है।

इसलिए भाषा को लेकर एक भावनात्मक गौरवोन्माद पूरी तरह गैरजरूरी और नाजायज होता है क्योंकि वह महज भाषा के महज सतही इस्तेमाल से संतुष्ट हो जाने वाला रहता है, और उसके लिए कुछ अधिक बड़ा करने की जरूरत नहीं होती। कई बार तो किसी दूसरी प्रतिद्वंद्वी भाषा का विरोध, या उसे नीचा दिखाना भी काफी मान लिया जाता है, और अपनी भाषा के लिए कुछ भी करने की जरूरत नहीं होती। एक नफरतजीवी राष्ट्रवाद की तरह दूसरी भाषाओं के विरोध के हमलावर तेवर कई लोगों को अपनी भाषा की कामयाबी की खुशफहमी दे जाते हैं। यह घटिया सिलसिला खत्म होना चाहिए। दूसरे देशों में बम फटने से अपने देश की अशांति का दाग कम नहीं होता। इसलिए लोगों को अपनी भाषा में अधिक कामयाबी हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए, और ऐसा होने पर ही कोई भाषा सम्मान हासिल कर सकती है, उसका गौरव बढ़ सकता है। आज अमरीका टूटी-फूटी किस्म की अंगे्रजी बोलकर भी दुनिया में सबसे कामयाब भाषा वाला देश इसलिए बन गया है कि वह दुनिया में सबसे कामयाबी वाला देश है। वरना सही व्याकरण वाले अंगे्रजों का देश ही सबसे कामयाब होता। 

भाषा को लेकर सालाना उन्माद हिंदुस्तान का नुकसान कर जाता है और देश के नक्शे पर राज्यों की सरहदों की लकीरें गाढ़ी होने लगती हैं, लाल रंग की होने लगती हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए और हिंदुस्तान के अलग-अलग प्रदेश अपनी भाषाओं और बोलियों को लेकर दुनिया के बहुत से देशों से बड़े हैं। आज दुनिया के देश अपनी छोटी-छोटी आबादी को लेकर भी अपनी खुद की भाषा के साथ कामयाब हैं, और हम हिंदुस्तान में उन देशों से बड़े-बड़े प्रदेश लेकर उनकी अपनी भाषाओं के साथ नाकामयाब हैं, और देश में सबसे अधिक नाकामयाब हिंदी बोलने वाले प्रदेश हैं। उत्तर भारतीयों के बारे में अभी एक केंद्रीय मंत्री ने योग्यता की कमी की बात कह दी तो बड़ा बवाल हो गया। लेकिन क्या यह हकीकत नहीं है कि दक्षिण भारतीय राज्यों ने अपनी अंगे्रजी की मामूली या बेहतर समझ के चलते दुनिया के दूसरे देशों तक जाकर वहां कामयाबी पाने का एक ऐसा काम किया है जिसे उत्तर भारतीय कभी नहीं कर पाए। इसलिए क्षेत्रीय उन्माद को परे रखकर हिंदीभाषी इलाकों को पहले तो दूसरी भाषाओं के राज्यों के मुकाबले अपने को सुधारना होगा, तब भी दूसरे राज्यों पर हिंदी थोपने का उनका कोई हक नहीं बनेगा। पूरे देश में एक भाषा की सोच देश को एक साथ बांधने की नहीं, देश के अलग-अलग प्रदेशों को अलग-अलग बांधकर बिठा देने की है, इससे भारतीय लोकतंत्र और भारतीय संस्कृति कहीं भी समृद्ध होने नहीं जा रहे।

(Daily Chhattisgarh) 


5:00 PM